Media24Media.com: चैत्र नवरात्रि

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Chaitra Navratri 2025 : आज दुर्गाष्टमी, जानें पूजन का शुभ मुहूर्त

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 Chaitra Navratri 2025 : पवित्र चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व चल रहे हैं और आज महाष्टमी है। हिंदू धर्म में महाष्टमी का विशेष महत्व होता है। इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा-आराधना और मंत्रोंचार का विधान होता है। महाष्टमी पर कन्या पूजन करने का भी विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता है कि नवरात्रि के 9 दिनों तक माता दुर्गा 2 से 10 उम्र की आयु की छोटी कन्याओं के अंदर विराजमान होती है। इसलिए कन्याओं को माता का रूप मानकर इन विधि-विधान के साथ पूजन और भोज कराया जाता है। आइए जानते हैं आज महाष्टमी पर बने दुर्लभ योग, पूजा मुहर्त और कन्या पूजन के लिए समय से लेकर सबकुछ।


वैदिक पंचांग के अनुसार आज 05 अप्रैल को महा अष्टमी पर देवी दुर्गा की पूजा-आराधना सवार्थिसिद्धि और सुकर्मा योग में की जाएगी। यह योग बहुत ही शुभ फलदायी माना जाता है। इसके अलावान पंचग्रही, लक्ष्मी नाराययण, शुक्रादित्य जैसे योगों का भी निर्माण हुआ है। इन शुभ योगों में मां दुर्गा की पूजा और कन्या पूजन करने से कई गुने फलों की प्राप्ति होती है।

महाष्टमी पर आज कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त

आज महाष्टमी पर कन्या पूजन के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 59 से लेकर दोपहर 12 बजकर 49 मिनट कर सकते हैं। यह समय कन्या पूजन के लिए सबसे अच्छा मुहूर्त होगा।

अष्टमी पर महागौरी पूजा का शुभ मुहूर्त

प्रात:काल पूजा मुहूर्त- 04 बजकर 35 मिनट से 06 बजकर 07 मिनट तक।
अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 49 मिनट तक।
विजय मुहूर्त- दोपहर 02 बजकर 30 मिनट से लेकर 03 बजकर 20 मिनट तक।
संध्या पूजा मुहूर्त- शाम 06 बजकर 40 मिनट से लेकर 07 बजकर 50 मिनट तक।

नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप ‘महागौरी की आराधना का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां महागौरी की उपासना से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और भक्त को सुख, शांति व समृद्धि प्राप्त होती है। इनकी पूजा अष्टमी के दिन की जाती है,और आमतौर पर इसी दिन कन्या पूजन किया जाता है।

महागौरी का स्वरूप

मां महागौरी अत्यंत सुंदर, उज्ज्वल और शांत स्वरूप वाली देवी हैं। इनका रंग पूर्णतः गौर अर्थात दूध के समान उज्ज्वल है, इसीलिए इन्हें महागौरी कहा जाता है। मां का वाहन वृषभ (बैल) है, इनके चार हाथ हैं-दाहिने दो हाथों में त्रिशूल और अभय मुद्रा तथा बाएं हाथों में डमरू और वर मुद्रा है। ये सौम्यता, करुणा और शुद्धता की प्रतीक मानी जाती हैं।

महागौरी पूजा का महत्व

महागौरी की पूजा से घर में सुख-शांति और ऐश्वर्य बढ़ता है। जो कन्याएं शीघ्र विवाह की इच्छा रखती हैं, उन्हें विशेष रूप से मां महागौरी की आराधना करनी चाहिए। कहा जाता है कि महागौरी की कृपा से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

दुर्गा अष्टमी की पूजन विधि

अष्टमी तिथि के दिन प्रात:काल स्नान-ध्यान के पश्चात् कलश पूजन के पश्चात मां की विधि-विधान से पूजा करें। इस दिन मां को सफेद पुष्प अर्पित करें, मां की वंदना मंत्र का उच्चारण करें। आज के दिन माँ की हलुआ,पूरी,सब्जी,काले चने एवं नारियल का भोग लगाएं।माता रानी को चुनरी अर्पित करें। अगर आपके घर अष्टमी पूजी जाती है तो आप पूजा के बाद कन्याओं को भोजन भी करा सकते हैं ये शुभ फल देने वाला माना गया है।

दुर्गा अष्टमी पूजा फल

इनकी उपासना से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं,उपासक सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है ।उसके पूर्व संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं और भविष्य में पाप-संताप,दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं रहते । धन-धान्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए माँ गौरी की उपासना की जानी चाहिए।

वंदना मंत्र

श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

कन्या पूजन मंत्र

स्तोत्र मंत्र:
"या देवी सर्वभूतेषु कन्या रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥"
ऊं श्री दुं दुर्गायै नम: ।।

महासमुंद : आंगनबाड़ी केंद्र में कन्या भोज का आयोजन, बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य और पोषण की जानकारी दी गई

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 महासमुंद : चैत्र नवरात्रि के शुभ अवसर पर कन्याओं का सम्मान और उनके बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण के लिए आज महासमुंद के शहरी सेक्टर के सक्षम आंगनबाड़ी केंद्र दलदली रोड में अध्ययनरत बालिकाओं का पूजन कर उन्हें कन्या भोज कराया गया।


बालिकाओं के बेहतर स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए कन्याओं को भोजन कराया गया जिसमें चावल-दाल, दूध और अन्य पौष्टिक चीजों से बनी खीर, प्रसाद आदि शामिल है। शहरी परियोजना के सेक्टर पर्यवेक्षक शीला प्रधान ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष ध्यान दिया जाता है, नवरात्रि के शुभ अवसर पर यह आयोजन किया गया।

उल्लेखनीय है कि आंगनबाड़ी केंद्र 3 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए विद्यालय पूर्व शिक्षा प्रदान करते हैं। यहां टीकाकरण सेवाएं, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा सहायता और रेफरल सेवाएं भी प्रदान करते हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य कन्याओं को सम्मान देना, उनके बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा सुनिश्चित करना, और समाज में उनकी भूमिका को मजबूत करना है। इस अवसर पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अंजू चंद्राकर, मितानिन, स्थानीय महिलाएं एवं बालिकाएं मौजूद थी।

मां चंद्रघंटा का आशीर्वाद: चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन की खास पूजा और भोग

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Chaitra Navratri : आज, यानी मंगलवार 1 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन है. नवरात्रि के तीसरे दिन देवी दुर्गा के चंद्रघंटा रूप की पूजा की जाती है. मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है. इनके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, मां के दस हाथ हैं, जिनमें अलग-अलग अस्त्र और शस्त्र होते हैं. वहीं, मां चंद्रघंटा का वाहन सिंह है. मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की सच्ची निष्ठा से पूजा-अर्चना करने से जीवन में शांति, समृद्धि और मानसिक संतुलन आता है. ऐसे में आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, भोग, मंत्र, शुभ रंग और कथा.


मां चंद्रघंटा की पूजा विधि

  1. स्नान और तैयारी: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें, अधिमानतः पीले या लाल रंग के, जो मां को प्रिय हैं।
  2. पूजा स्थल की सफाई: पूजा स्थल को साफ करें और मां चंद्रघंटा की मूर्ति या तस्वीर को लाल या पीले वस्त्र पर स्थापित करें।
  3. कलश पूजा: यदि नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की गई है, तो कलश की पूजा करें।
  4. अर्पण: मां को गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएं। फिर अक्षत (चावल), कुमकुम, सिंदूर, लाल चंदन, फूल (विशेष रूप से लाल गुलाब या कमल), और माला अर्पित करें।
  5. दीप और धूप: घी का दीपक और धूप जलाएं। शंख और घंटी बजाना भी शुभ माना जाता है।
  6. मंत्र जाप: मां के मंत्रों का जाप करें (नीचे दिए गए हैं) और दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
  7. भोग: मां को उनका प्रिय भोग अर्पित करें (विवरण नीचे)।
  8. आरती: अंत में मां चंद्रघंटा की आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।

मां चंद्रघंटा के मंत्र

  1. प्रधान मंत्र:
    ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः
    (इस मंत्र का 108 बार जाप करना शुभ माना जाता है।)
  2. बीज मंत्र:
    ऐं श्रीं शक्तयै नमः
  3. स्तोत्र मंत्र:
    पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
    प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।
  4. ध्यान मंत्र:
    वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
    सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥

मां चंद्रघंटा का प्रिय भोग

मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी मिठाइयां अत्यंत प्रिय हैं। नवरात्रि के तीसरे दिन उन्हें निम्नलिखित भोग लगाए जा सकते हैं:

  • केसर की खीर: दूध, चावल, केसर और मेवों से बनी खीर मां को विशेष रूप से पसंद है।
  • दूध की मिठाई: जैसे पेड़ा, बर्फी या रसगुल्ला।
  • शहद: शहद का भोग लगाने से घर में सुख-शांति बनी रहती है।
  • पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद और मिश्री का मिश्रण।
    भोग अर्पित करने के बाद इसे प्रसाद के रूप में बांटें और जरूरतमंदों को दान करें।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप और महत्व

मां चंद्रघंटा के दस हाथ हैं, जिनमें वे त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडल, कमल, धनुष, बाण और माला धारण करती हैं। उनका वाहन सिंह है और शरीर स्वर्ण की तरह चमकीला है। माना जाता है कि मां ने राक्षसों का संहार करने के लिए यह रूप धारण किया था। उनकी घंटे की प्रचंड ध्वनि दुष्ट शक्तियों को भयभीत करती है। उनकी पूजा से:

  • भक्तों को भय से मुक्ति मिलती है।
  • आत्मविश्वास और पराक्रम में वृद्धि होती है।
  • मंगल ग्रह के दोष दूर होते हैं।
  • सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है।

शुभ रंग और अन्य टिप्स

  • प्रिय रंग: मां चंद्रघंटा को लाल और पीला रंग प्रिय है। पूजा के दौरान इन रंगों के वस्त्र पहनना शुभ होता है।
  • फूल: लाल गुलाब, कमल या गेंदे के फूल अर्पित करें।
  • दान: दूध, सफेद मिठाई या लाल वस्त्र का दान करें।

इस विधि से मां चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में शांति व समृद्धि आती है। जय मां चंद्रघंटा!

चैत्र नवरात्रि के पहले दिन करें मां शैलपुत्री की पूजा: जानें कथा और मंत्र

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Chaitra Navratri : आज से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा का विधाव है। मां शैलपुत्री को कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली माना जाता है। माता मुश्किलों के समयों अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। इसी के साथ उनकी सारी इच्छाओं को पूरा करती हैं। मां शैलपुत्री साधक के मूलाधार चक्र को जागृत करने में भी मदद करती हैं। मूलाधार चक्र हमारे शरीर में ऊर्जा का केंद्र है।


कैसा है मां शैलपुत्री का स्वरुप?

चैत्र नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। उनका स्वरूप अत्यंत शांत, सरल और दया से पूर्ण है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प शोभायमान है। उनकी सवारी वृषभ है। मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है।

कलश स्थापना

हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना का बहुत महत्व है। कलश स्थापना की दौरान देवी मां की चौकी लगाई जाती है और पूरे 9दिनों तक उनके 9अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। ऐसे में कलश की स्थापना मुहूर्त के अनुसार ही होनी चाहिए।

घटस्थापना का मुहूर्त - उदया तिथि के अनुसार, इस बार नवरात्रि का शुभारंभ 30मार्च (रविवार) से होगा। ऐसे में कलश स्थापना का मुहूर्त सुबह 6बजकर 13मिनट पर शुरु होगा। इसका समापन सुबह 10बजकर 22मिनट पर होगा।

घटस्थापना अभिजीत मुहूर्त - अभिजीत मुहूर्त की शुरुआत दोपहर 12बजकर 01मिनट पर होगी। जिसका समापन 12बजकर 50मिनट पर होगा।

कलश स्थापना की पूजन-विधि

नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना का बहुत महत्व है। घट यानी मिट्टी का घड़ा। घटस्थापना के लिए ईशान कोण शुभ माना जाता है। घट में पहले थोड़ी सी मिट्टी डालें और फिर जौ डालकर इसकी पूजा करें। फिर इसे ईशान कोण में स्थापित कर दें। कलश स्थापना की दौरान देवी मां की चौकी लगाई जाती है और पूरे 9दिनों तक उनके 9अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है।

मां शैलपुत्री का भोग

माता शैलपुत्री की पूजा में विशेष रूप से सफेद रंग का बहुत महत्व है। सफेद रंग शांति और पवित्रता का प्रतीक है। इसलिए मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए सफेद रंग की चीजों का भोग लगाना चाहिए। मां शैलपुत्री के भोग में आप सफेद मिठाई, जैसे खीर, खाजा अर्पित कर सकते हैं। इसके अलावा दूध और दही का भी भोग लगा सकते हैं।

मां शैलपुत्री का मंत्र

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

मां शैलपुत्री की पूजा से लाभ:

माना जाता है कि मां शैलपुत्री की पूजा से विशेष रूप से कुंवारी कन्याओं को अच्छे वर की प्राप्ति होती है।

घर में धन-धान्य की कमी नहीं रहती है और समृद्धि का वास होता है।
इसके अलावा, यह पूजा घर में सुख-शांति, प्रेम और समृद्धि लाती है।
श्रद्धापूर्वक पूजा करने से परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में स्थिरता प्राप्त होती है।

Chaitra Navratri 2024: महानवमी के दिन आज इस तरह करें मां सिद्धिदात्री की पूजा, जानिए समय, पूज विधि और भोग-मंत्र

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Chaitra Navratri 2024: चैत्र नवरात्रि के नौवें दिन मां दुर्गा के स्वरूप सिद्धिदात्री की पूजा होती है। मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना से सभी तरह की सिद्धियां प्राप्त होती है और लौकिक-परलौकिक सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति भी होती है।


मां का स्वरूप
मां सिद्धिदात्री का रूप अत्यंत ही परम दिव्य है। मां का वाहन सिंह है और देवी कमल पर भी आसीन होती हैं। इनकी चार भुजाएं हैं, दाहिने ओर के नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा और बाईं ओर के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का फूल है। मां सिद्धिदात्री को देवी सरस्वती का भी स्वरूप माना गया है। मां को बैंगनीऔर लाल रंग अतिप्रिय होता है। मां सिद्धिदात्री की अनुकंपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ और इन्हें अर्द्धनारीश्वर कहा गया।

शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 16 अप्रैल को दोपहर 1.24 बजे से शुरू हो जाएगी। यह अगले दिन 17 अप्रैल को दोपहर 3.14 बजे खत्म होगी। इस दिन राम नवमी भी मनाई जाएगी। नवमी के दिन भी बहुत से लोग अपना खत्म करते हैं। कुछ लोग अष्टमी के दिन भी व्रत तोड़ देते हैं। नवमी पर दोपहर 3.14 बजे के बाद नवरात्रि व्रत का पारण कर सकते हैं।

पूजा का महत्व
इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। इनकी उपासना से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। भक्त इनकी पूजा से यश, बल, कीर्ति और धन की प्राप्ति करते हैं। मां भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परमशांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाता है।

पूजा विधि
सिद्धि और मोक्ष देने वाली मां दुर्गा को सिद्धिदात्री कहा जाता है। इनके स्वरूप की बात करें तो देवी मां भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी के समान कमल के आसन पर विराजमान हैं और चार भुजाओं से युक्त हैं।
मां सिद्धिदात्री हाथों में कमल, शंख, गदा, सुदर्शन चक्र धारण किए हुए हैं. सिंह इनकी सवारी है।
मां सिद्धिदात्री समस्त संसार का कल्याण करती हैं. इसके लिए उन्हें जगत जननी भी कहते हैं।
नौवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा करने के लिए नौ तरह का प्रसाद और नवरस युक्त भोजन, नौ प्रकार के फल-फूल आदि अर्पित करना चाहिए। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप हैं।
मां सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना अन्य दिनों की तरह करें. लेकिन इस दिन परिवार के साथ हवन का भी विशेष महत्व है।
आज माता की पूजा करने के बाद सभी देवी-देवताओं की भी पूजा की जाती है।
स्थापित माता की तस्वीर या मूर्ति के आसापस गंगाजल से छिड़काव करें और फिर पूजा सामग्री अर्पित करके हवन करें।
हवन करते समय माता के साथ एक बार सभी देवी-देवताओं के नाम की आहुति भी दें। हवन के समय दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक के साथ मां की आहुति दें।
इसके साथ ही देवी के बीज मंत्र ‘ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:’ का 108 बार जाप करते हुए आहुति दें और फिर परिवार के साथ माता की आरती उतारें।
इसके बाद पूरे परिवार के साथ माता के जयकारे लगाएं और कन्या पूजन शुरू करें। मां सिद्धिदात्री को भोग में हलवा व चना चढ़ाने का विशेष महत्व है। इसके साथ ही पूड़ी, खीर, नारियल और मौसमी फल भी अर्पित कर सकते हैं।

अयोध्या में रामनवमी पर होगा रामलला का सूर्य तिलक, जानें सूर्याभिषेक का महत्व

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 Ram Lala Surya Tilak : चैत्र नवरात्रि  शुरू हो चुके हैं और इसी के साथ रामलला के भव्य जन्मोत्सव की तैयारी के लिए विविध अनुष्ठान भी शुरू हो गए हैं। नवरात्र में राम जन्मभूमि मंदिर में 9 दिन शक्ति की उपासना की जाएगी।


नवमी तिथि को बालक राम को 56 प्रकार के व्यंजन का भोग लगाया जाएगा। इस बार राम नवमी पर रामलला का सूर्याभिषेक किया जाए। राम नवमी पर 12 बजे अभिजीत मुहूर्त में सूर्य की किरणें रामलला के मस्तक पर पड़ेंगी, जिससे बालक राम का सूर्य तिलक भी होगा।

नवरात्र के पहले दिन से रामनवमी तक बालक राम विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करेंगे। प्राण प्रतिष्ठा के बाद पहली बार प्रभु के वस्त्रों की शैली को बदला गया है। मयूर व अन्य वैष्णव चिन्हों को रंग-बिरंगे रेशम के साथ-साथ असली तारों से काढ़ा गया है। भगवान राम के वस्त्र खादी कॉटन से निर्मित हैं और वस्त्रों पर असली चांदी एवं सोने की हस्त-छपाई की गई है। छपाई में प्रयोग किए हुए सभी चिन्ह वैष्णव पद्धति के हैं।

ऐसे होगा सूर्य अभिषेक

मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष ने बताया कि तैयारी पूरी चल रही है। रामनवमी पर चार मिनट तक रामलला का सूर्य तिलक होगा। इसके लिए राममंदिर में उपकरण लगाए जा रहे हैं। बताया कि दिन में 12 बजे ऑप्टोमैकेनिकल सिस्टम से सूर्य की किरणें प्रभु रामलला के ललाट पर डाली जाएगीं। मंदिर के भूतल पर दो दर्पण और एक लेंस लगाया जा चुका है। सूर्य की रोशनी दूसरे तल पर लगे तीन लेंस और 2 दर्पणों से होते हुए भूतल पर लगाए गए आखिरी दर्पण पर पड़ेगी। इससे परावर्तित होने वाली किरणों से मस्तक पर तिलक बनेगा। यह सूर्य अभिषेक 75 मिमी. का होगा। रविवार रात रामलला के शयन के बाद वैज्ञानिकों ने इसका ट्रायल भी किया।

सूर्याभिषेक का महत्व

भगवान राम का जन्म सूर्य वंश में हुआ था और उनके कुल देवता सू्र्यदेव हैं। साथ ही भगवान राम का जन्म मध्य काल में अभिजीत मुहूर्त में हुआ था, तब सूर्य अपने पूर्ण प्रभाव में थे। भारतीय धर्म दर्शन में बताया गया है कि उगते हुए सूर्यदेव को अर्घ्य देने, दर्शन व पूजा करने से बल, तेज व आरोग्य की प्राप्ति होती है और कुंडली में सूर्य की स्थिति भी मजबूत रहती है। विशेष दिनों में जब सूर्यदेव की पूजा की जाती है, तब दोपहर के समय में ही होती है क्योंकि तब सूर्यदेव अपने पूर्ण प्रभाव में होते हैं। अयोध्या के मंदिर में रामलला के मस्तक पर भेजने के लिए सूर्य तिलक तंत्र का प्रयोग किया जाएगा। इस तंत्र का प्रयोग हर साल राम नवमी के दिन ही किया जाएगा।

चैत्र नवरात्रि की अष्टमी पर इस तरह करें मां महागौरी की पूजा, मिलेगी माता रानी की कृपा, जानें मंत्र, पूजा विधि, भोग और आरती

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 Chaitra Navratri 2024 : चैत्र नवरात्रि का आठवां दिन भक्तों के लिए बेहद खास होता है. इस बार अष्टमी मंगलवार, 16 अप्रैल 2024 को है. इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा-आराधना की जाती है. हिंदू धर्म में महाअष्टमी का विशेष महत्व होता है.


इस दिन कन्यापूजन भी कराया जाता है. कहा जाता है कि मां महागौरी की सच्चे मन और अनुशासन से पूजा करने पर हर तरह के पाप मिट जाते हैं और महिलाओं को अखंड सुहाग सौभाग्य की प्राप्ति होती है. यहां जानिए अष्टमी (Ashtami) पर मां महागौरी की पूजा करने के नियम और उनका अत्यंत प्रिय भोग क्या है.

मां महागौरी पूजा या दुर्गा महाअष्टमी पूजा
चैत्र नवरात्रि में बहुत से भक्त 9 दिन का उपवास रखते हैं और कुछ सिर्फ प्रतिपदा और अष्टमी तिथि के दिन ही व्रत रखते हैं. देवीभगवत् पुराण के अनुसार, नवरात्रि के 8वें दिन की पूजा मां दुर्गा के मूल भाव की पूजा होती है. महादेव के साथ उनकी पत्नी के रूप में महागौरी सदैव विराजमान होती हैं. यही कारण है कि उन्हें शिवा नाम से भी पुकारा जाता है.

मां महागौरी का स्वरूप कैसा है
मां महागौरी का स्वरूप उज्जवल कोमल, श्वेत वर्ण, श्वेत वस्त्रधारी है. अपने भक्तों के लिए मां अन्नपूर्णा स्वरूप हैं. उनकी चार भुजाएं हैं और मां बैल की सवारी करती हैं. देवी मां के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू है. एक हाथ अभय और एक वरमुद्रा में है. हाथ डमरू होने से ही मां को शिवा भी कहा जाता है. मां का यह स्वरूप बेहद शांत है. उन्हें संगीत-भजन अत्यंत प्रिय है. मान्यता है कि मां की पूजा करने से ही हर तरह के दुख नष्ट हो जाते हैं.

मां महागौरी मंत्र का प्रिय भोग
महाअष्टमी के दिन 'या देवी सर्वभू‍तेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता..' इस मंत्र से मां की पूजा करनी चाहिए. उन्हें भोग (Bhog) में नारियल और चीनी की मिठाई बनाकर चढ़ाना चाहिए. माता का प्रिय रंग सफेद है. उन्हें इसी रंग के फूल अर्पित करने चाहिए. इससे जीवन खुशहाल होता है.

मां महागौरी की पूजा विधि
महाअष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले स्नान करें और साफ कपड़े पहनें.
मां का ध्यान करें और उनकी प्रतिमा को गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएं.
कलश की पूजा और मां दुर्गा की आराधना करें.
मां को सफेद रंग के वस्त्र, पुष्प चढ़ाएं. रोली कुमकुम लगाएं.
मां को मिष्ठान, पंच मेवा, नारियल, फल भोग लगाएं. उन्हें काले चने का भोग भी अवश्य लगाएं.
इस दिन कन्या पूजन होता है जिसका विशेष महत्व है.
अब घी का दीपक और धूप जलाकर दुर्गा चालीसा का पाठ करें, महागौरी मंत्र, स्तुति करें.
अब आरती कर प्रसाद सभी को बांटें.

माता महागौरी को प्रसन्न करने के लिए करें इस मंत्र का जप
श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥

चैत्र नवरात्रि के 5वें दिन बन रहे शुभ योग, कैसे करें स्कन्दमाता की पूजा, जानें मुहूर्त, मंत्र, विधि

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 Chaitra Navratri 2024 Day 5: आज दिन शनिवार को चैत्र नवरात्रि का पांचवां दिन है. चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मां दुर्गा के 5वें स्वरूप स्कन्दमाता की पूजा करते हैं. ​ये देवी पांचवीं नवदुर्गा हैं. स्कन्दमाता की पूजा करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है. दांपत्य जीवन सुखमय होता है. पाप मिटते हैं और जीवन के अंत में व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस देवी की कृपा से व्यक्ति को कार्य में सफलता भी प्राप्त होती है. इस बार स्कन्दमाता की पूजा शोभन योग में होगीर. जाने स्कन्दमाता की पूजा विधि, मुहूर्त, मंत्र, भोग, आरती और योग के बारे में.


चैत्र नवरात्रि के 5वें दिन के मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त: 04:28 एएम से 05:13 एएम तक
अभिजित मुहूर्त: 11:56 एएम से 12:47 पीएम तक
शुभ-उत्तम मुहूर्त: 07:34 एएम से 09:10 एएम तक

कौन हैं स्कन्दमाता?

स्कन्दमाता के नाम का अर्थ है स्कंद कुमार की माता. भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय को स्कंद कुमार भी कहा जाता है. इस तरह से माता पार्वती स्कन्दमाता हुईं. ये पांचवीं दुर्गा हैं.

स्कन्दमाता की पूजा के मंत्र

1. महाबले महोत्साहे महाभय विनाशिनी।
त्राहिमाम स्कन्दमाते शत्रुनाम भयवर्धिनि।।

2. ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कन्दमातायै नम:।

स्कन्दमाता का प्रिय भोग

आज के दिन स्कन्दमाता को केले का भोग लगाना चाहिए. इसके अलावा आप चाहें तो आप माता को खीर का भी भोग लगा सकते हैं.

स्कंदमाता की पूजा कैसे करें?

आज सुबह में स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनें. फिर 5वीं नवदुर्गा का ध्यान करके स्कंदमाता की पूजा करें. स्कंदमाता के मंत्रोच्चार के साथ अक्षत्, कुमकुम, लाल रंग के फूल, केले, बताशे, खीर, धूप, दीप आदि चढ़ाते हुए देवी मां की पूजा करें. घी के दीपक या कपूर से उनकी आरती करें. जो लोग संतानहीन हैं, वे स्कंदमाता से संतान सुख प्राप्ति की प्रार्थना करें. उनके आशीर्वाद से परिवार में खुशहाली आती है.

Chaitra Navratri 2024 : चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन आज, करें मां कूष्मांडा की पूजा, जानें मुहूर्त, पूजन विधि

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 Chaitra Navratri 2024 : आज दिन शुक्रवार को चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन है. चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा करते हैं. हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मां कूष्मांडा की उपासना का विधान है. इस बार मां कूष्मांडा की पूजा सौभाग्य योग में होगी.  मां कूष्मांडा की पूजा कैसे करते हैं? पूजा का शुभ मुहूर्त, मंत्र, भोग और आरती क्या है?


सौभाग्य योग में होगी मां कूष्मांडा की पूजा

आज पूरे दिन सौभाग्य योग बना हुआ है. सौभाग्य योग आज प्रात:काल से लेकर कल 02:13 ए एम तक बना हुआ है. इतना ही नहीं, रोहिणी नक्षत्र भी पूरे हदन है. आज प्रात:काल से लेकर देर रात 12 बजकर 51 मिनट तक रोहिणी नक्षत्र है, उसके बाद से मृगशिरा नक्षत्र है. सौभाग्य योग और रोहिणी नक्षत्र को कार्यों को करने के लिए शुभ माना जाता है.

चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन के मुहूर्त

चर-सामान्य मुहूर्त: 05:59 एएम से 07:34 एएम तक
लाभ-उन्नति मुहूर्त: 07:34 एएम से 09:10 एएम तक
अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: 09:10 एएम से 10:46 एएम तक
शुभ-उत्तम मुहूर्त: 12:22 पीएम से 01:58 पीएम तक

आज के दिन का ब्रह्म मुहूर्त 04:29 एएम से 05:14 एएम तक है. वहीं अभिजीत मुहूर्त 11:56 एएम से 12:48 पीएम तक है. रवि योग आज देर रात 12:51 एएम कल सुबह 05:58 एएम तक है.

कौन हैं मां कूष्मांडा?

8 भुजाओं वाली मां कूष्मांडा शेर पर सवार होती हैं. वे अपने भुजाओं में कमल पुष्प, धनुष, बाण, गदा, चक्र, माला, अमृत कलश आदि धारण करती हैं. वे इस पूरे ब्रह्मांड की रचना करने वाली देवी हैं. उन्होंने अत्याचार और अधर्म को खत्म करने के लिए यह अवतार लिया. वे चौथी नवदुर्गा हैं. उनके अंदर निर्माण की शक्ति समाहित होती है.

मां कूष्माण्डा की पूजा के मंत्र
1. ओम देवी कूष्माण्डायै नमः

2. ऐं ह्री देव्यै नम:

मां कूष्माण्डा का भोग
मां कूष्मांडा को पूजा के समय मालपुए का भोग लगाना चाहिए. उनको मालपुआ बहुत प्रिय है.

8 या 9 अप्रैल, कब है चैत्र नवरात्रि? जानिए कलश स्थापना का मुहूर्त और पूजन विधि

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Chaitra Navratri 2024: हिंदू पंचांग के अनुसार 9 अप्रैल, मंगलवार से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो रही है. हिंदू धर्म में किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले कलश स्थापना की जाती है. नवरात्रि में दुर्गा की घटस्थापना या कलश स्थापना के बाद देवी मां की चौकी स्थापित की जाती है तथा 9 दिनों तक इन देवियों का पूजन-अर्चन किया जाता है. कलश को भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है.


मां दुर्गा की पूजा करने से पहले कलश की पूजा की जाती है. नवरात्रि में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है. सालभर में कुल 4 नवरात्रि आती हैं जिसमें चैत्र और शारदीय नवरात्रि का महत्व काफी ज्यादा होता है. माना जाता है कि नवरात्रि में माता की पूजा-अर्चना करने से देवी दुर्गा की खास कृपा होती है. मां दुर्गा की सवारी वैसे तो शेर है लेकिन जब वह धरती पर आती हैं तो उनकी सवारी बदल जाती है और इस बार मां दुर्गा घोड़े पर सवार होकर धरती पर आएंगी.

चैत्र नवरात्रि घटस्थापना मुहूर्त 

चैत्र नवरात्रि मंगलवार, 9 अप्रैल 2024
घटस्थापना मुहूर्त- सुबह 6 बजकर 02 मिनट से सुबह 10 बजकर 16 मिनट तक
अवधि- 4 घंटे 14 मिनट्स
घटस्थापना अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11 बजकर 57 मिनट से दोपहर 12 बजकर 48 मिनट तक

चैत्र नवरात्रि की तिथि 

प्रतिपदा तिथि प्रारंभ- 8 अप्रैल को रात 11 बजकर 50 मिनट से शुरू होगी
प्रतिपदा तिथि समापन- 9 अप्रैल को रात 8 बजकर 30 मिनट तक

चैत्र नवरात्रि पूजन विधि 

घट अर्थात मिट्टी का घड़ा. इसे नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त के हिसाब से स्थापित किया जाता है. घट को घर के ईशान कोण में स्थापित करना चाहिए. घट में पहले थोड़ी सी मिट्टी डालें और फिर जौ डालें. फिर इसका पूजन करें. जहां घट स्थापित करना है, उस स्थान को साफ करके वहां पर एक बार गंगा जल छिड़ककर उस जगह को शुद्ध कर लें. उसके बाद एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं.

फिर मां दुर्गा की तस्वीर स्थापित करें या मूर्ति. अब एक तांबे के कलश में जल भरें और उसके ऊपरी भाग पर लाल मौली बांधें. उस कलश में सिक्का, अक्षत, सुपारी, लौंग का जोड़ा, दूर्वा घास डालें. अब कलश के ऊपर आम के पत्ते रखें और उस नारियल को लाल कपड़े से लपेटकर रखें. कलश के आसपास फल, मिठाई और प्रसाद रख दें. फिर कलश स्थापना पूरी करने के बाद मां की पूजा करें.

नवरात्रि घटस्थापना सामग्री 

हल्दी, कुमकुम, कपूर, जनेऊ, धूपबत्ती, निरांजन, आम के पत्ते, पूजा के पान, हार-फूल, पंचामृत, गुड़ खोपरा, खारीक, बादाम, सुपारी, सिक्के, नारियल, पांच प्रकार के फल, चौकी पाट, कुश का आसन, नैवेद्य आदि.

नवरात्रि की तिथि 

प्रतिपदा (मां शैलपुत्री): 9 अप्रैल 2024
द्वितीया (मां ब्रह्मचारिणी): 10 अप्रैल 2024
तृतीया (मां चंद्रघंटा): 11 अप्रैल 2024
चतुर्थी (मां कुष्मांडा): 12 अप्रैल 2024
पंचमी (मां स्कंदमाता): 13 अप्रैल 2024
षष्ठी (मां कात्यायनी): 14 अप्रैल 2024
सप्तमी (मां कालरात्रि): 15 अप्रैल 2024
अष्टमी (मां महागौरी): 16 अप्रैल 2024
नवमी (मां सिद्धिदात्री): 17 अप्रैल 2024

Chaitra Navratri 2023 : 3 किलो सोने से सजा मां बम्लेश्वरी का गर्भगृह

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राजनांदगांव। चैत्र नवरात्रि 22 मार्च से शुरू हो रहा है। इसके लिए मंदिरों में तैयारियां शुरू हो गई हैं। डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर स्थिति मां बम्लेश्वरी का दरबार इस बार बेहद भव्य नजर आएगा। क्योंकि मंदिर के गर्भगृह की दीवारों में राजस्थानी कलाकृति को उकेरा गया है।


नवरात्रि पर भक्तों को माता के भव्य स्वरूप के दर्शन होंगे। इसके लिए मंदिर ट्रस्ट ने दान में मिला करीब तीन किलो सोना उपयोग में लाया है। ट्रस्टी संजीव गोमास्ता के मुताबिक इस काम के लिए राजस्थान और जयपुर से बीस कारीगरों की टीम लगी थी।

26 फरवरी से 13 मार्च तक इस काम को पूरा किया। गर्भगृह में उभारदार आकृति बनाने के लिए इम्पोर्टेड सिरेमिक कोटेट पेंट का इस्तेमाल किया गया है। इस कलाकृति का उपयोग राजस्थान के ऐतिहासिक इमारतों में किया गया है। उसी तर्ज पर मां बम्लेश्वरी मंदिर में इस तरह का प्रयोग पहली बार ट्रस्ट ने किया है। बताया गया कि कारीगरों को मंदिर ट्रस्ट से सात लाख रुपए का भुगतान करेगी।


राज्यपाल ने नवरात्रि के पहले दी प्रज्वलित की ज्योति कलश, CM ने की गंगादई माता की पूजा

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राज्यपाल अनुसुईया उइके ने चैत्र नवरात्रि पर्व के पहले दिन राजभवन के उपासना कक्ष में विधिवत घट स्थापना और ज्योति कलश प्रज्वलित कर पूजा-अर्चना की। राज्यपाल उइके ने मां दुर्गा की पूजा-आरती कर देश और प्रदेशवासियों की खुशहाली की कामना की। 

मुख्यमंत्री ने की गंगादई माता की पूजा

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बस्तर के पुजारीपारा में स्थित गंगादई माता के मंदिर में पहुंचकर पूजा-अर्चना की। साथ ही प्रदेश की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना की। इस अवसर मौके पर उद्योग मंत्री कवासी लखमा, सांसद दीपक बैज, बस्तर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष लखेश्वर बघेल, संसदीय सचिव रेखचंद जैन, हस्तशिल्प विकास बोर्ड के अध्यक्ष चंदन कश्यप,विधायक चित्रकोट राजमन बेंज़ाम, विधायक दंतेवाड़ा देवती कर्मा, ऊर्जा विकास बोर्ड के अध्यक्ष मिथलेश स्वर्णकार, मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष एमआर निषाद,  जगदलपुर महापौर सफीरा साहू, कमिश्नर श्याम धावड़े, पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी, मुख्य वन संरक्षक मोहम्मद शाहिद, कलेक्टर रजत बंसल, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जितेन्द्र मीणा समेत जनप्रतिनिधिगण उपस्थित रहे।

गंगादई माता के प्रति है बस्तरवासियों की श्रद्धा

बस्तर रियासत की पूर्व राजधानी बस्तर में माता की प्रतिमा की उत्पत्ति बांस के जड़ को एक ग्रामीण द्वारा उसके कंद को निकालते समय अपने आप जमीन से हुई है, जिसे गंगादई माता का नाम दिया गया। ये दंतेश्वरी माता की ही बहन है। बाद में भव्य मंदिर का रूप दिया गया। राजा प्रवीरचंद भंजदेव भी यहां पूजा करने आया करते थे। ये राजा महाराजा के जमाने का मंदिर है।

ये मंदिर बस्तर के 112 गांवों के लोगों के देवी आस्था का केंद्र है। हर साल माघ पूर्णिमा को मेला भरता है, जिसमें सभी 112 गांवों के देवी देवता माता से भेंट करने आते हैं। इसी मंदिर परिसर में एक प्राकृतिक जल कुंड भी स्थित है। इस कुंड का जल कभी सूखता नहीं है। इसके जल से कई प्रकार की चर्म रोग, बीमारी ठीक हो जाती है। प्राचीन समय से कुंड के जल से ही माता का स्नान किया जाता है।

सामूहिक विवाह कार्यक्रम में शामिल हुए CM 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने विकासखंड मुख्यालय बस्तर के लालबहादुर शास्त्री मैदान में आयोजित सामूहिक विवाह कार्यक्रम में शामिल होकर नव दंपत्तियों को आशीर्वाद प्रदान किया।

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