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रूस के बाद भारत बनेगा फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करने वाला दूसरा देश: डॉ. जितेंद्र सिंह

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केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि रूस के बाद भारत दुनिया का दूसरा देश होगा जो व्यावसायिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करेगा। “स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स” विषय पर सांसदों और विधायकों की कार्यशाला को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि भारत ने तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का विकास कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, जिसने 6 अप्रैल 2026 को पहली बार क्रिटिकलिटी प्राप्त की।

यह रिएक्टर Indira Gandhi Centre for Atomic Research (IGCAR) द्वारा विकसित और BHAVINI द्वारा निर्मित है। यह भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत को दर्शाता है। इसमें यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड ईंधन का उपयोग होता है, जो जितना ईंधन खर्च करता है उससे अधिक उत्पन्न करता है। इस उपलब्धि के साथ भारत अपने विशाल थोरियम भंडार के उपयोग की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता तरुण चुघ ने की। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह उपलब्धि भारत को परमाणु रणनीति के तीसरे चरण में थोरियम के उपयोग की दिशा में ले जाती है। पूरी तरह संचालन में आने के बाद भारत, रूस के बाद, व्यावसायिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर चलाने वाला दूसरा देश बन जाएगा।

वर्तमान में केवल रूस ही व्यावसायिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित कर रहा है, जबकि भारत अपने रिएक्टर के कमीशनिंग के उन्नत चरण में है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, जर्मनी और चीन जैसे कई देशों ने पहले प्रयोगात्मक फास्ट रिएक्टर विकसित किए थे, लेकिन इनमें से अधिकांश कार्यक्रम अब बंद हो चुके हैं।

मंत्री ने कहा कि प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की स्थापना भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो परमाणु ईंधन के अधिक कुशल उपयोग को सक्षम बनाता है और थोरियम के उपयोग का मार्ग प्रशस्त करता है।

उन्होंने यह भी कहा कि फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तकनीक में केवल कुछ ही देशों ने प्रगति की है, जिससे भारत को वैश्विक स्तर पर एक विशेष स्थान मिलता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने जोर देकर कहा कि परमाणु ऊर्जा भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और दीर्घकालिक स्थिरता लक्ष्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, खासकर 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने में।

उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को भविष्य में निरंतर और विश्वसनीय स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता होगी, जहां परमाणु ऊर्जा अपरिहार्य होगी।

मंत्री ने स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs), नीतिगत समर्थन और SHANTI एक्ट जैसी पहलों के महत्व पर भी प्रकाश डाला, जो निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देंगे। “न्यूक्लियर मिशन” के तहत 20,000 करोड़ रुपये के निवेश के साथ 2033 तक 5 SMRs स्थापित करने की योजना है।

उन्होंने कहा कि SMRs उद्योगों, घनी आबादी वाले क्षेत्रों, दूरदराज के इलाकों और ग्रिड से दूर क्षेत्रों में बिजली उत्पादन के लिए उपयोगी होंगे।

अंत में, उन्होंने कहा कि परमाणु, नवीकरणीय और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का संतुलित मिश्रण 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

स्वदेशी तकनीक की जीत: भारत का PFBR रिएक्टर हुआ सफल

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भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में, 500 मेगावाट (MWe) प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने 6 अप्रैल 2026 को रात 08:25 बजे सफलतापूर्वक पहली क्रिटिकलिटी (नियंत्रित विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया की शुरुआत) हासिल की। यह देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और स्वदेशी परमाणु तकनीक को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह उपलब्धि डॉ. अजीत कुमार मोहंती (सचिव, परमाणु ऊर्जा विभाग एवं अध्यक्ष, परमाणु ऊर्जा आयोग), श्रीकुमार जी. पिल्लई (निदेशक, IGCAR), अल्लू अनंत (CMD-इन-चार्ज, BHAVINI) और  के.वी. सुरेश कुमार (पूर्व CMD, BHAVINI) की उपस्थिति में हासिल की गई। यह सभी मानकों को पूरा करने के बाद संभव हुआ, जिन्हें परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) ने कठोर सुरक्षा समीक्षा के बाद मंजूरी दी थी।

PFBR का डिजाइन और तकनीकी विकास पूरी तरह से इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) द्वारा किया गया, जो परमाणु ऊर्जा विभाग का एक अनुसंधान केंद्र है। इसका निर्माण और संचालन भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) द्वारा किया गया।

फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत की दीर्घकालिक परमाणु रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पारंपरिक रिएक्टरों के विपरीत, PFBR में यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग होता है। इसके कोर के चारों ओर यूरेनियम-238 की परत होती है, जो तेज न्यूट्रॉन की मदद से प्लूटोनियम-239 में परिवर्तित हो जाती है। इससे रिएक्टर जितना ईंधन उपयोग करता है, उससे अधिक उत्पन्न करने में सक्षम होता है।

इस रिएक्टर को भविष्य में थोरियम-232 के उपयोग के लिए भी डिजाइन किया गया है, जो परिवर्तित होकर यूरेनियम-233 बनेगा और भारत के परमाणु कार्यक्रम के तीसरे चरण को ऊर्जा प्रदान करेगा।

यह क्षमता देश के सीमित यूरेनियम संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करती है और भविष्य में थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन का मार्ग प्रशस्त करती है।

पहली क्रिटिकलिटी हासिल करने के साथ ही भारत अपने तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को साकार करने के और करीब पहुंच गया है। फास्ट ब्रीडर तकनीक वर्तमान रिएक्टरों और भविष्य के थोरियम आधारित रिएक्टरों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती है।

यह उपलब्धि भारत की स्वदेशी डिजाइन, इंजीनियरिंग और निर्माण क्षमता को दर्शाती है। इस रिएक्टर में उन्नत सुरक्षा प्रणाली, उच्च तापमान तरल सोडियम कूलिंग तकनीक और क्लोज्ड फ्यूल साइकिल का उपयोग किया गया है, जिससे परमाणु सामग्री का पुनर्चक्रण संभव होता है और अपशिष्ट कम होता है।

यह परियोजना वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और उद्योग सहयोगियों के समर्पण का परिणाम है, जिन्होंने स्वदेशी तकनीकों और उपकरणों के माध्यम से इसका निर्माण किया। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में देश की बढ़ती तकनीकी क्षमता को भी दर्शाता है।

ऊर्जा उत्पादन के अलावा, यह कार्यक्रम परमाणु ईंधन चक्र, उन्नत सामग्री, रिएक्टर भौतिकी और बड़े पैमाने की इंजीनियरिंग में देश की रणनीतिक क्षमता को मजबूत करता है।

जैसे-जैसे भारत स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विश्वसनीय, कम-कार्बन और उच्च दक्षता वाली ऊर्जा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

पहली क्रिटिकलिटी की यह उपलब्धि न केवल एक तकनीकी मील का पत्थर है, बल्कि “विकसित भारत” के लिए एक सतत और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य की दिशा में बड़ा कदम भी है।


परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा: आयात पर शून्य कस्टम ड्यूटी

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परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आवश्यक वस्तुओं के आयात पर शून्य सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) लागू करने से देश में परमाणु ऊर्जा के विकास की गति तेज होने की उम्मीद है। साथ ही, इससे परियोजनाओं की कुल लागत और प्रति यूनिट बिजली की लागत में कमी आएगी, जिससे ऐसे प्रोजेक्ट अधिक व्यवहार्य बनेंगे, विशेष रूप से वे जिनमें विदेशी सहयोग और आयात की अधिक भागीदारी होती है।

लोकसभा में रमेश अवस्थी और रवि किशन द्वारा पूछे गए एक अतारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी दी।

मंत्री ने बताया कि वर्ष 2035 तक परमाणु ईंधन और रिएक्टर घटकों पर सीमा शुल्क में छूट से परियोजना लागत और बिजली उत्पादन लागत दोनों में कमी आएगी, जिससे परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार होगा।

700 मेगावाट के दस नए स्वीकृत प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) इकाइयों के लिए घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के संबंध में मंत्री ने बताया कि न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) ने कई कदम उठाए हैं। इनमें निरंतरता बनाए रखने के लिए थोक ऑर्डर देना, आवश्यक सहयोग के साथ विक्रेता आधार का विस्तार करना, आयात के स्थान पर स्वदेशी उपकरणों को बढ़ावा देना, कुछ उपकरणों को श्रेणी-1 स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के लिए आरक्षित करना तथा MSME को प्रोत्साहित करने और उन्हें निविदाओं में प्राथमिकता देने के लिए विक्रेता मीट आयोजित करना शामिल है।

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में अनुसंधान एवं विकास के लिए बढ़ी हुई फंडिंग के बारे में मंत्री ने कहा कि इसका उपयोग आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से बहु-विषयक प्रौद्योगिकी विकास में किया जा रहा है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में नए अनुसंधान रिएक्टरों का विकास, विशेष रूप से कैंसर उपचार के लिए आइसोटोप उत्पादन सुविधाएं, उन्नत रिएक्टर तकनीक जैसे स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) और हाइड्रोजन उत्पादन, एक्सेलेरेटर तकनीक, लेजर आधारित अनुप्रयोग तथा उन्नत सामग्री और विनिर्माण तकनीक शामिल हैं।

मंत्री ने आगे बताया कि वर्तमान में तटीय राज्यों में प्रस्तावित परमाणु पार्कों के निर्माण और लॉजिस्टिक्स को प्रधानमंत्री गति शक्ति ढांचे के साथ जोड़ने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने पत्रकारों और मीडिया प्रतिनिधियों के साथ अनौपचारिक लंच पर किया संवाद

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केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज नई दिल्ली स्थित अपने आवास पर पत्रकारों और मीडिया प्रतिनिधियों के लिए एक अनौपचारिक लंच का आयोजन किया।

डॉ. जितेंद्र सिंह पिछले एक दशक से समय-समय पर अपने आवास पर मीडिया के साथ इस प्रकार की अनौपचारिक बैठकों का आयोजन करते रहे हैं। यह आयोजन पत्रकारों के साथ खुले और सहज संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।

इस अवसर पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शासन सुधार और राष्ट्रीय विकास से जुड़े समकालीन विषयों पर व्यापक चर्चा हुई। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों ने विभिन्न नीतिगत पहलों, उभरते जनहित के विषयों और समसामयिक मुद्दों पर अपने विचार साझा किए तथा अनौपचारिक सुझाव भी दिए।

संवाद के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने SHANTI अधिनियम, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) की भूमिका और देश के विभिन्न हिस्सों में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की स्थिति जैसे महत्वपूर्ण विधायी और नीतिगत विषयों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि परमाणु ऊर्जा भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में अहम भूमिका निभाती रहेगी।

सरकार के सुधार एजेंडे पर प्रकाश डालते हुए मंत्री ने कहा कि विज्ञान सुधारों का दायरा लगातार बढ़ रहा है, जबकि शासन सुधार तेजी से प्रौद्योगिकी आधारित हो रहे हैं। उन्होंने CPGRAMS जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार तकनीक पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक-केंद्रित शासन को मजबूत कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के प्रशासनिक और डिजिटल गवर्नेंस मॉडल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती रुचि देखने को मिल रही है, जिसके चलते विदेशी छात्र भारत आकर इन मॉडलों का अध्ययन कर रहे हैं।

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डॉ. जितेंद्र सिंह ने डिजिटल लाइफ सर्टिफिकेट (DLC) अभियान जैसी नागरिक-केंद्रित पहलों का भी उल्लेख किया, जिससे पेंशनधारकों को बड़ी सुविधा मिली है। उन्होंने कहा कि ऐसी डिजिटल सुधार पहलें सरकार की “ईज ऑफ लिविंग” और “ईज ऑफ वर्किंग” की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।

अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में हाल ही में घोषित ₹1 लाख करोड़ के अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) फंड का उल्लेख करते हुए मंत्री ने इसे भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि इससे निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा और विचार से प्रभाव तक की यात्रा तेज होगी।

अंतरिक्ष क्षेत्र में हो रहे विकास पर बात करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने संचार, मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन, कृषि और नेविगेशन जैसे क्षेत्रों में अंतरिक्ष अनुप्रयोगों की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने चंद्रयान-4 और चंद्रयान-5 जैसे आगामी अंतरिक्ष अभियानों की जानकारी भी साझा की, जो भारत की चंद्र अन्वेषण क्षमता को और मजबूत करेंगे।

मंत्री ने लैवेंडर क्रांति जैसे विज्ञान आधारित सामाजिक-आर्थिक अभियानों का भी उल्लेख किया, जो ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और स्थानीय उद्यमिता को जोड़कर आजीविका के नए अवसर सृजित कर रहे हैं।

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पूरे संवाद के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने मीडिया के साथ निरंतर संवाद के महत्व पर जोर देते हुए पत्रकारों को जटिल नीतिगत पहलों और वैज्ञानिक उपलब्धियों को आम जनता तक पहुँचाने में सरकार का अहम साझेदार बताया। उन्होंने सूचित जन विमर्श और रचनात्मक प्रतिक्रिया को बढ़ावा देने में मीडिया की भूमिका की सराहना की।

यह अनौपचारिक लंच खुले संवाद और आपसी सराहना के माहौल में संपन्न हुआ, जिसने सरकार और मीडिया के बीच पारदर्शिता, सहयोग और राष्ट्र निर्माण के प्रति साझा प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ किया।

SHANTI बिल मोदी सरकार का सबसे बड़ा विज्ञान सुधार: डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा – परमाणु ऊर्जा और नवाचार के क्षेत्र में ऐतिहासिक कदम

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नई दिल्ली- केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज एक मीडिया साक्षात्कार में कहा कि SHANTI बिल मोदी सरकार के सबसे बड़े विज्ञान सुधारों में से एक के रूप में इतिहास में दर्ज होगा।

मंत्री ने कहा कि जबकि संसद में सुधारों पर चर्चा पारंपरिक रूप से सार्वजनिक कल्याण योजनाओं और शासन उपायों पर केंद्रित रही है, देश का दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक स्वरूप अब विज्ञान और प्रौद्योगिकी में सुधारों द्वारा आकार लेगा। उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल, मोदी 3.0, में साहसिक और संरचनात्मक सुधारों की विशिष्ट पहचान है, जिसमें विज्ञान, नवाचार और उद्यमिता पर विशेष जोर दिया गया है।

SHANTI बिल – राष्ट्रीय परिवर्तन में विज्ञान का केंद्र

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि SHANTI बिल परंपरा से एक निर्णायक मोड़ है, जो राष्ट्रीय परिवर्तन के केंद्र में विज्ञान-प्रेरित सुधार को रखता है। उन्होंने बताया कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से वैज्ञानिक उन्नति को सुधारों की रूपरेखा में शामिल नहीं किया, बावजूद इसके कि इसका भविष्य की विकास, उद्योग और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर निर्णायक प्रभाव है।

उन्होंने बताया कि यह बिल भारत के परमाणु क्षेत्र में ऐतिहासिक सुधार का प्रतीक है, जो शांतिपूर्ण, स्वच्छ और सतत ऊर्जा की संभावनाओं को खोलता है, जबकि सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक हित के उच्चतम मानकों को बनाए रखता है। उन्होंने कहा कि पिछले छह दशकों में ऐसा सुधार असंभव था और यह केवल प्रधानमंत्री मोदी की विरासतों को तोड़ने और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप नीतियों को ढालने की क्षमता के कारण ही संभव हुआ।

शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा का निरंतर प्रतिबद्धता

डॉ. जितेंद्र सिंह ने याद दिलाया कि डॉ. होमी भाभा के समय से भारत का परमाणु कार्यक्रम विकास, स्वास्थ्य और ऊर्जा सुरक्षा के लिए था। SHANTI बिल इस मूल दर्शन को मजबूत करता है और इसे सिविल प्रयोजनों जैसे स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, चिकित्सा अनुप्रयोग और उन्नत अनुसंधान के लिए विस्तार योग्य बनाता है, जबकि किसी भी प्रकार की अशांतिपूर्ण गतिविधियों से पूरी तरह अलग रखा गया है।

परमाणु ऊर्जा और उभरती हुई अर्थव्यवस्था

मंत्री ने कहा कि उभरती हुई एआई, क्वांटम और डेटा-चालित अर्थव्यवस्था की मांगों के मद्देनजर, परमाणु ऊर्जा विश्वसनीय, 24×7 बिजली प्रदान करने में अपरिहार्य है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे भारत जीवाश्म ईंधन और कोयले से दूर जा रहा है, परमाणु ऊर्जा उन्नत प्रौद्योगिकी, डिजिटल अवसंरचना और रणनीतिक क्षेत्रों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

परमाणु ऊर्जा क्षमता और भविष्य की योजनाएँ

डॉ. सिंह ने बताया कि भारत की परमाणु बिजली क्षमता 2014 में लगभग 4.4 GW से बढ़कर आज लगभग 8.7 GW हो गई है। सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक परमाणु क्षमता को लगभग 100 GW तक बढ़ाया जाए, जिससे राष्ट्रीय नेट-जीरो प्रतिबद्धता को पूरा करने में मदद मिले और बिजली की लगभग 10% जरूरतें परमाणु ऊर्जा से पूरी हों।

परमाणु विज्ञान का स्वास्थ्य में योगदान

मंत्री ने कहा कि परमाणु विज्ञान अब स्वास्थ्य क्षेत्र में भी योगदान दे रहा है, खासकर कैंसर निदान और उपचार में। उन्होंने बताया कि न्यूक्लियर मेडिसिन और आइसोटोप तकनीकें जीवन रक्षक चिकित्सा हस्तक्षेपों में मदद कर रही हैं, जिससे यह साबित होता है कि परमाणु विज्ञान मानव कल्याण और सामाजिक भलाई का एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है।

छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर और भविष्य की तैयारी

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत Small Modular Reactors (SMRs) की ओर भी बढ़ रहा है, जो घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्र, औद्योगिक गलियारे और उभरते आर्थिक क्षेत्र के लिए उपयुक्त हैं। ये रिएक्टर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी को भी सुनिश्चित करेंगे।

वैज्ञानिक समुदाय और उद्योग का समर्थन

मंत्री ने कहा कि SHANTI बिल को वैज्ञानिक समुदाय, उद्योग, स्टार्टअप और नवाचार इकोसिस्टम में व्यापक समर्थन मिला है, जो देश में परमाणु क्षेत्र के सुधार और आधुनिकीकरण की आवश्यकता पर राष्ट्रीय सहमति को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि यह बिल मोदी 3.0 के सुधार-केंद्रित दृष्टिकोण का प्रतीक है, जहां विज्ञान-आधारित नीतिगत निर्णय भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र की दिशा में ले जा रहे हैं।


डॉ. जितेंद्र सिंह: स्वच्छ और विविध ऊर्जा की दिशा में भारत की यात्रा आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की ओर

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 नई दिल्ली- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि ऊर्जा स्वतंत्रता अब विकल्प नहीं बल्कि आर्थिक, रणनीतिक और भू-राजनीतिक आवश्यकता बन चुकी है। उन्होंने बताया कि भारत का स्वच्छ और विविध ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण आत्मनिर्भरता और भू-राजनीतिक अनुकूलता के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, जो आत्मनिर्भर भारत और भारत की वैश्विक भूमिका के दृष्टिकोण के अनुरूप है।

डॉ. सिंह ने दिल्ली में एक कार्यक्रम में कहा कि यह बहस कि हरी और स्वच्छ ऊर्जा को अपनाना चाहिए या नहीं, अब अप्रासंगिक हो गई है, क्योंकि आज वैश्विक सहमति मानती है कि ऊर्जा संक्रमण सतत विकास, आर्थिक लचीलापन और भू-राजनीतिक अनुकूलता के लिए अनिवार्य है। उन्होंने कहा, “यदि भारत को आगे बढ़ना है, तो कोई विकल्प नहीं है।”

उन्होंने बताया कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना न केवल आत्मनिर्भरता को मजबूत करता है, बल्कि भारत को एक अनिवार्य वैश्विक बदलाव के लिए तैयार भी करता है, क्योंकि पारंपरिक ऊर्जा निर्यातक खुद तेजी से अपने ऊर्जा पोर्टफोलियो को विविध बना रहे हैं। “पुराने ऊर्जा मॉडल को बनाए रखना वैसा ही है जैसे भावनाओं के आधार पर पुराने तकनीकी उपकरणों से चिपके रहना; कल यहां तक कि स्पेयर पार्ट्स भी उपलब्ध नहीं होंगे।”

डॉ. सिंह ने भारत की बढ़ती वैश्विक स्थिति पर जोर देते हुए कहा कि देश अब केवल अनुयायी नहीं बल्कि क्लाइमेट एक्शन, स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में दिशा-निर्देशक बन गया है। उन्होंने कहा, “आज अन्य देश भारत की ओर देख रहे हैं।”

भारत की स्वच्छ ऊर्जा प्रतिबद्धताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य घोषित किया और 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का संकल्प दोहराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि विभिन्न ऊर्जा स्रोतों को भेदभाव के नजरिए से नहीं, बल्कि उपयुक्तता, विश्वसनीयता और आवेदन-विशिष्ट उपयोगिता के आधार पर देखा जाना चाहिए।

डॉ. सिंह ने बताया कि जबकि नवीकरणीय ऊर्जा भारत के ऊर्जा मिश्रण का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगी, कुछ क्षेत्र—जैसे डेटा सेंटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत कंप्यूटिंग—में निरंतर, स्थिर, 24x7 बिजली की आवश्यकता होती है, जहां परमाणु ऊर्जा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा, “भविष्य एक मिश्रित ऊर्जा मॉडल में निहित है, जहां प्रत्येक स्रोत का उपयोग सबसे लागत-कुशल और प्रभावी क्षेत्र में किया जाएगा।”

उन्होंने तकनीकी विकास से तुलना करते हुए कहा कि जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब संतुलित ‘AI + मानव बुद्धि’ मॉडल में विकसित हो रहा है, वैसे ही भारत की ऊर्जा रणनीति भी नवीकरणीय, परमाणु, हाइड्रोजन और अन्य उभरते समाधानों को एकीकृत फ्रेमवर्क में संयोजित करेगी।

डॉ. सिंह ने सरकार के साहसिक सुधारों को भी रेखांकित किया, जिसमें परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को निजी भागीदारी के लिए खोला गया है। उन्होंने कहा, “सरकार ने स्टेटस क्वो से परे जाने का साहस दिखाया है, जो पैमाना, गति और स्थायित्व हासिल करने के लिए आवश्यक सार्वजनिक-निजी सहयोग को सक्षम करता है।”

उन्होंने सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग और विश्वास बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय प्रगति के लिए सामूहिक जिम्मेदारी, साझा उद्देश्य और समेकित कार्रवाई जरूरी है।

डॉ. सिंह ने निष्कर्ष में कहा कि ऊर्जा संक्रमण के प्रारंभिक चरण में चुनौतियां हैं, लेकिन भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सही मार्ग पर है। उन्होंने कहा, “स्वच्छ ऊर्जा अब केवल सेमिनार का विषय नहीं, बल्कि जीवनशैली बनती जा रही है। सभी हितधारक इसके अनुसार अनुकूलित होंगे, नवाचार करेंगे और नेतृत्व करेंगे।”

भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता विस्तार की रोडमैप और तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम

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सरकार ने वर्ष 2047 तक लगभग 100 गीगावाट (GW) परमाणु विद्युत क्षमता प्राप्त करने के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार किया है। वर्तमान में, क्रियान्वयनाधीन परियोजनाओं के क्रमिक पूर्ण होने के साथ परमाणु विद्युत क्षमता को 2031–32 तक लगभग 22 गीगावाट तक बढ़ाने की योजना है। इसके अतिरिक्त, भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (NPCIL) ने 2047 तक परिकल्पित 100 गीगावाट क्षमता में से लगभग 54 गीगावाट का योगदान देने की योजना बनाई है।

भारत में यूरेनियम के सीमित भंडार हैं, जबकि थोरियम के भंडार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। थोरियम, यूरेनियम के विपरीत, एक उपजाऊ (फर्टाइल) पदार्थ है और इसे परमाणु विखंडन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करने से पहले किसी परमाणु रिएक्टर में विखंडनीय यूरेनियम-233 में परिवर्तित करना आवश्यक होता है। इसे ध्यान में रखते हुए, विभाग द्वारा परिकल्पित तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का एक प्रमुख घटक बना हुआ है, जिसका उद्देश्य सीमित यूरेनियम संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करना तथा दीर्घकालिक एवं सतत ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रचुर थोरियम भंडारों का दोहन करना है।

तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का उद्देश्य घरेलू रूप से उपलब्ध विखंडनीय संसाधनों को बढ़ाना है। इसके प्रथम चरण में प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग दाबित भारी जल रिएक्टरों (PHWRs) में किया जाता है। दूसरे चरण में, PHWRs के प्रयुक्त ईंधन से प्राप्त प्लूटोनियम का उपयोग तीव्र प्रजनक रिएक्टरों (Fast Breeder Reactors – FBRs) में किया जाता है। इसके पश्चात, पर्याप्त FBR स्थापित क्षमता प्राप्त होने के बाद, प्लूटोनियम से ईंधनयुक्त प्रजनक रिएक्टरों में थोरियम से उत्पन्न विखंडनीय यूरेनियम-233 का उपयोग करते हुए थोरियम का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाएगा।

भारतीय भावी नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) वर्तमान में तमिलनाडु के कलपक्कम में 500 मेगावाट विद्युत (MWe) क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) परियोजना का कमीशनिंग कार्य कर रहा है। इसके अतिरिक्त, सरकार ने तमिलनाडु के कलपक्कम में 2 x 500 MWe क्षमता वाली जुड़वां इकाइयों—FBR-1 और FBR-2—परियोजनाओं के लिए पूर्व-परियोजना गतिविधियाँ प्रारंभ करने की स्वीकृति प्रदान की है।

इन परियोजनाओं के लिए लागू मानकों के अनुसार पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभाव आकलन अध्ययन किए जाएंगे। BHAVINI नियोजित कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) एवं जनसंपर्क गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय जनसमुदाय का विश्वास अर्जित करने हेतु पर्याप्त कदम उठा रहा है। इन जनसंपर्क गतिविधियों के अंतर्गत, परमाणु ऊर्जा के लाभों तथा PFBR की सुरक्षा विशेषताओं के बारे में स्थानीय नागरिकों और आसपास के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के छात्रों को जानकारी प्रदान की जाती है।

भारत में परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन: सुरक्षित, वैज्ञानिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यवस्था

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परमाणु विद्युत संयंत्रों के संचालन एवं अनुरक्षण के दौरान उत्पन्न होने वाला परमाणु अपशिष्ट मुख्यतः निम्न तथा मध्यम स्तर की रेडियोधर्मिता वाला होता है, जिसका प्रबंधन उसी स्थल पर किया जाता है। इन अपशिष्टों का उपचार, सघनीकरण, संपीड़न किया जाता है तथा इन्हें सीमेंट जैसे ठोस पदार्थों में स्थिरीकृत कर विशेष रूप से निर्मित संरचनाओं—जैसे प्रबलित कंक्रीट की खाइयों/टाइल होल्स—में निपटान अथवा भंडारण हेतु रखा जाता है, जो संयंत्र परिसर में ही स्थित होती हैं।

इसके अतिरिक्त, भारत में लगभग बंद परमाणु ईंधन चक्र (Nearly Closed Nuclear Fuel Cycle) अपनाया गया है, जिसके अंतर्गत घरेलू स्रोतों से प्राप्त प्रयुक्त ईंधन (Spent Fuel) का पुनःप्रसंस्करण (रीप्रोसेसिंग) किया जाता है, ताकि अपशिष्ट भार को कम किया जा सके और उपयोगी तत्वों की पुनर्प्राप्ति कर उनका पुनर्चक्रण/पुनःउपयोग किया जा सके। प्रयुक्त ईंधन के पुनःप्रसंस्करण से प्राप्त विखंडनीय तत्वों को भविष्य के रिएक्टरों के लिए ईंधन के रूप में पुनः उपयोग किया जाता है। पुनःप्रसंस्करण के दौरान उत्पन्न उच्च-स्तरीय रेडियोधर्मी अपशिष्ट को कांचीय निष्क्रिय मैट्रिक्स में स्थिरीकृत (विट्रिफिकेशन) किया जाता है तथा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के दिशानिर्देशों के अनुरूप, अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं के समान, ठोस भंडारण निगरानी सुविधाओं (Solid Storage Surveillance Facilities) में अंतरिम भंडारण के लिए रखा जाता है।

सभी परमाणु विद्युत संयंत्र स्थलों पर एक सुदृढ़ एवं सुव्यवस्थित परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली स्थापित है। भारत ने “लगभग बंद ईंधन चक्र” को अपनाया है, जिसमें प्रयुक्त परमाणु ईंधन को एक संसाधन सामग्री के रूप में माना जाता है। बंद ईंधन चक्र का उद्देश्य प्रयुक्त ईंधन का पुनःप्रसंस्करण कर विखंडनीय पदार्थों की पुनर्प्राप्ति एवं उन्हें ईंधन के रूप में उपयोग करना है। इससे अंततः प्रयुक्त परमाणु ईंधन में उपस्थित अवशिष्ट पदार्थ का केवल अत्यंत छोटा प्रतिशत ही परमाणु अपशिष्ट के रूप में प्रबंधन हेतु शेष रहता है। वर्तमान में विद्यमान स्थलों पर निकट सतह निपटान सुविधाओं (Near Surface Disposal Facilities – NSDF) की क्षमता परमाणु विद्युत संयंत्रों से उत्पन्न अपशिष्ट के सुरक्षित भंडारण के लिए पर्याप्त है।

अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में नई प्रौद्योगिकियों के विकास हेतु अनुसंधान एवं विकास कार्य किए जा रहे हैं, जिनमें दीर्घजीवी रेडियोधर्मी घटकों—विशेषकर एक्टिनाइड्स—के पृथक्करण के लिए पार्टिशनिंग तकनीकें, समाजोपयोगी अनुप्रयोगों हेतु उपयोगी रेडियोआइसोटोप्स का निष्कर्षण तथा अपशिष्ट आयतन में कमी लाने की तकनीकें शामिल हैं।

रेडियोधर्मी अपशिष्ट के भंडारण एवं निपटान की प्रथाएँ अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के दिशानिर्देशों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय मानकों के समकक्ष हैं। अब तक विभिन्न स्थलों पर निपटान क्षेत्रों की निगरानी से यह पुष्टि हुई है कि निपटान प्रणाली अपशिष्ट के सुरक्षित संरोधन में अत्यंत प्रभावी है। आज तक निपटित अपशिष्ट से रेडियोधर्मिता के उत्सर्जन की कोई घटना नहीं हुई है तथा न ही निपटित अपशिष्ट से जनसामान्य या पर्यावरण पर विकिरण का कोई प्रतिकूल प्रभाव देखा गया है।

परमाणु ऊर्जा पर नया कानून: लोकसभा में डॉ. जितेंद्र सिंह का जवाब, सुरक्षा के साथ आधुनिक ढांचा मजबूत करने पर जोर

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केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने मंगलवार को लोकसभा में सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल, 2025 पर हुई बहस का जवाब देते हुए सदस्यों की चिंताओं का समाधान किया और सरकार द्वारा व्यापक नए परमाणु कानून की आवश्यकता को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम से चली आ रही मूल सुरक्षा, संरक्षा और नियामक व्यवस्थाओं को बनाए रखते हुए, आधुनिक तकनीकी, आर्थिक और ऊर्जा संबंधी वास्तविकताओं के अनुरूप भारत के परमाणु ढांचे का आधुनिकीकरण करता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि प्रस्तावित कानून मौजूदा प्रावधानों का एकीकरण करता है और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को वैधानिक दर्जा देकर नियामक ढांचे को सुदृढ़ बनाता है, जो अब तक कार्यकारी आदेश के तहत काम करता था। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षा मानक, विखंडनीय पदार्थ, उपयोग किया हुआ ईंधन और भारी जल पर नियंत्रण तथा नियमित निरीक्षण सरकार के अधीन ही रहेंगे—भले ही निजी भागीदारी क्यों न हो। निजी संस्थाओं को संवेदनशील सामग्री पर कोई नियंत्रण नहीं होगा और स्पेंट फ्यूल का प्रबंधन पहले की तरह सरकार ही करेगी।

देयता (लायबिलिटी) के मुद्दे पर मंत्री ने कहा कि विधेयक पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे को कमजोर नहीं करता। उन्होंने समझाया कि रिएक्टर के आकार से जुड़े क्रमिक (ग्रेडेड) कैप्स के जरिए ऑपरेटर देयता को तार्किक बनाया गया है, ताकि स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स जैसी नई तकनीकों को बढ़ावा मिले, साथ ही पीड़ितों को पूर्ण मुआवजा सुनिश्चित हो। इसके लिए बहु-स्तरीय व्यवस्था प्रस्तावित है—ऑपरेटर देयता, सरकार समर्थित न्यूक्लियर लायबिलिटी फंड, और कन्वेंशन ऑन सप्लीमेंटरी कम्पनसेशन के तहत अंतरराष्ट्रीय सहायता। उन्होंने कहा कि वैश्विक प्रथाओं और रिएक्टर सुरक्षा में प्रगति को देखते हुए सप्लायर देयता हटाई गई है, जबकि लापरवाही और दंडात्मक प्रावधान कानून में यथावत लागू रहेंगे।

मंत्री ने यह भी खारिज किया कि विधेयक से सार्वजनिक क्षेत्र की क्षमता कमजोर होगी। उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में परमाणु ऊर्जा विभाग का बजट लगभग 170% बढ़ा है और 2014 से परमाणु स्थापित क्षमता दोगुनी हुई है। उन्होंने कहा कि वैश्विक मानकों की तुलना में भारत की ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी अभी भी कम है, जबकि डेटा प्रोसेसिंग, स्वास्थ्य सेवा और उद्योग जैसे क्षेत्रों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए—नवीकरणीय ऊर्जा के साथ—परमाणु ऊर्जा का विस्तार आवश्यक है। यह विधेयक जिम्मेदार निजी और संयुक्त उद्यम भागीदारी को सक्षम बनाता है, ताकि संसाधन सीमाओं को पाटा जा सके, परियोजनाओं की अवधि घटे और 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल किया जा सके—वह भी राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित से समझौता किए बिना।

व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि परमाणु ऊर्जा केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि कैंसर उपचार, कृषि और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी इसका उपयोग है। उन्होंने रेखांकित किया कि प्रस्तावित कानून में पहली बार पर्यावरणीय और आर्थिक क्षति को भी परमाणु क्षति की परिभाषा में शामिल किया गया है। स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स और अनुसंधान व नवाचार के लिए घोषित निवेशों के साथ यह कानून स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए स्वच्छ, विश्वसनीय ऊर्जा का सक्षम पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करेगा—और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग की भारत की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को भी सुदृढ़ बनाए रखेगा।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) का 52वां स्थापना दिवस समारोह

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केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA), जो विद्युत मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत शीर्ष तकनीकी संगठन है, ने अपना 52वां स्थापना दिवस 11 अक्टूबर 2025 को केंद्रीय जल आयोग (CWC), सेक्टर-1, आर.के. पुरम, नई दिल्ली स्थित ऑडिटोरियम, लाइब्रेरी भवन में आयोजित किया। इस समारोह का मुख्य उद्देश्य देश में वर्ष 2047 तक 100 गीगावॉट (GW) परमाणु क्षमता के विकास के रोडमैप पर विचार-विमर्श करना था, जो भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा और जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप है।

देश के सभी उपभोक्ताओं को 24×7 गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के विजन की दिशा में कार्य करते हुए, CEA भारत के विद्युत क्षेत्र के विकास में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है। अपनी स्थापना से लेकर पिछले पाँच दशकों में प्राधिकरण ने देश को विश्वसनीय और सतत विद्युत आपूर्ति उपलब्ध कराने में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पंकज अग्रवाल, सचिव, विद्युत मंत्रालय, उपस्थित रहे। इस समारोह में विद्युत मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के प्रतिनिधि, राज्य विद्युत उपयोगिताएँ, उद्योग संघों के सदस्य, तथा CEA के अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल हुए।

अपने संबोधन में पंकज अग्रवाल ने भारतीय विद्युत क्षेत्र के समन्वित विकास में CEA के उत्कृष्ट योगदान की सराहना की। उन्होंने नीतिगत निर्माण, विद्युत प्रणाली नियोजन, और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने में CEA की भूमिका को रेखांकित किया, जिससे देश में विश्वसनीय, किफायती और सतत विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित हुई है। उन्होंने कहा कि भारत के “नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य – 2070” की दिशा में अग्रसर होने के साथ, CEA की भूमिका नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण, परमाणु क्षमता विस्तार, और ग्रिड सुरक्षा एवं लचीलापन बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।

अपने स्वागत भाषण में घनश्याम प्रसाद, अध्यक्ष, CEA, ने वर्ष 1973 में स्थापना के बाद से प्राधिकरण की यात्रा का उल्लेख किया। उन्होंने उत्पादन और प्रसारण योजना, तकनीकी मानकों के निर्माण, तथा विद्युत ग्रिड के आधुनिकीकरण में प्राधिकरण की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने डेटा-आधारित निर्णय-निर्माण, डिजिटलीकरण और नवाचार के बढ़ते महत्व पर बल दिया, जिससे भारत के विद्युत क्षेत्र को अधिक सतत और दक्ष बनाया जा सके।

स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष, CEA, द्वारा कई महत्वपूर्ण प्रकाशन और पहलें जारी की गईं —

  1. ‘विद्युत वाहिनी’ (Vidyut Vahini) — हिंदी त्रैमासिक पत्रिका (विशेषांक) का विमोचन, जिसका विषय था “विद्युत क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा का योगदान”, जिसे CEA द्वारा प्रकाशित किया गया।

  2. “Road Map for Achieving the Goal of 100 GW of Nuclear Capacity by 2047” का विमोचन — यह दस्तावेज़ भारत की परमाणु उत्पादन क्षमता को 2047 तक 100 गीगावॉट तक बढ़ाने के लिए रणनीतिक मार्गदर्शिका प्रस्तुत करता है।

  3. “Master Plan for Evacuation of Power from Hydroelectric Plants in the Brahmaputra Basin” का विमोचन — यह रिपोर्ट लगभग 65 गीगावॉट जलविद्युत क्षमता के निर्गमन हेतु आवश्यक चरणबद्ध प्रसारण अवसंरचना का विवरण देती है और जलविद्युत परियोजनाओं के नियोजन में मार्गदर्शन करेगी।

  4. “Electrical Accident Data Monitoring System (EADMS)” पोर्टल का शुभारंभ — CEA की यह डिजिटल पहल देशभर में विद्युत दुर्घटनाओं की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और कमी के लिए एक केंद्रीकृत मंच प्रदान करेगी, जिससे सुरक्षा निगरानी और नीति हस्तक्षेप को सुदृढ़ किया जा सकेगा।

इस अवसर पर पंकज अग्रवाल द्वारा विद्युत क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले CEA के अधिकारियों को पुरस्कार भी प्रदान किए गए। कार्यक्रम के अंतर्गत “नेट ज़ीरो हेतु परमाणु ऊर्जा: अवसर, चुनौतियाँ और मार्ग” विषय पर एक विशेष तकनीकी सत्र भी आयोजित किया गया। इस सत्र में प्रतिष्ठित वक्ताओं और क्षेत्र विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

डॉ. आर. बी. ग्रोवर, सदस्य, परमाणु ऊर्जा आयोग एवं एमेरिटस प्रोफेसर, होमी भाभा राष्ट्रीय संस्थान, ने “न्यूक्लियर, नवीकरणीय और अन्य स्रोतों के साथ एकीकृत ऊर्जा प्रणाली” पर व्याख्यान दिया, जिसमें परमाणु ऊर्जा की भूमिका को गहराई से कार्बन उत्सर्जन कम करने में सहायक बताया गया।

एस. ए. भारद्वाज, पूर्व अध्यक्ष, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB), ने “परमाणु ईंधन चक्र और उन्नत रिएक्टर प्रौद्योगिकी की संभावनाएँ” विषय पर प्रस्तुति दी, जिसमें तकनीकी नवाचारों और सुरक्षा उपायों पर प्रकाश डाला गया।

सत्र में NTPC लिमिटेड, टाटा पावर, अदाणी पावर, एल एंड टी, तथा EDF के प्रतिनिधियों ने भी उद्योग सहयोग, तकनीकी अपनाने, और परमाणु क्षेत्र में भविष्य की संभावनाओं पर अपने विचार साझा किए। चर्चा का समापन विशेषज्ञों की समापन टिप्पणियों और प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ।

स्थापना दिवस समारोह ने यह पुनः पुष्टि की कि CEA नवाचार, स्थिरता, और लचीलापन के माध्यम से भारत के विद्युत क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है। यह आयोजन भारत के ऊर्जा परिवर्तन में CEA की तकनीकी, सहयोगात्मक और रणनीतिक भूमिका का प्रमाण प्रस्तुत करता है।


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