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प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): कौशल विकास और क्षमता निर्माण से मत्स्य क्षेत्र को नई दिशा

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प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) मत्स्य पालन मूल्य श्रृंखला के आधुनिकीकरण, उत्पादकता बढ़ाने, कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने तथा विपणन संपर्कों की स्थापना के लिए कौशल विकास और क्षमता निर्माण को एक महत्वपूर्ण आधार मानती है। इस योजना का उद्देश्य मानव संसाधन और संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ कर मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाना है।

PMMSY के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने और मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र में विकसित भारत 2047 के विज़न के अनुरूप, केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने राष्ट्रीय मत्स्य कृषक दिवस (10 जुलाई 2025) के अवसर पर भुवनेश्वर (ओडिशा) स्थित ICAR–केंद्रीय मीठाजल जलीय कृषि संस्थान (CIFA) में“ICAR मत्स्य संस्थानों एवं उनके क्षेत्रीय केंद्रों का प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम कैलेंडर” तथा “NFDB एवं ICAR द्वारा प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण एवं एक्सपोज़र विज़िट कैलेंडर” का विमोचन किया।

यह कैलेंडर 2025–2027 की अवधि के लिए प्रशिक्षण, एक्सपोज़र विज़िट और ज्ञान-साझाकरण गतिविधियों का एक सुव्यवस्थित रोडमैप प्रदान करता है।

व्यापक कवरेज और प्रशिक्षण पाठ्यक्रम

इन कार्यक्रमों का उद्देश्य मछुआरों और मत्स्य किसानों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाना, वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना तथा पर्यावरण-सम्मत कार्यप्रणालियों को बढ़ावा देना है।
तेजी से विकसित हो रही जलीय कृषि तकनीकों और गुणवत्तापूर्ण मत्स्य उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए, प्रशिक्षण में पूर्व-उत्पादन, उत्पादन और उत्तर-उत्पादन चरणों को शामिल किया गया है, जिनमें—

  • हैचरी संचालन

  • उन्नत ग्रो-आउट तकनीक

  • समेकित/संयुक्त मत्स्य पालन

  • मत्स्य स्वास्थ्य प्रबंधन

  • फ़ीड निर्माण

  • समुद्री शैवाल (सीवीड) की खेती

  • मूल्यवर्धित मत्स्य प्रसंस्करण

पर विशेष ध्यान दिया गया है।

इसके अतिरिक्त, आधुनिक प्रणालियों जैसे रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS), बायोफ्लॉक, केज कल्चर और सजावटी मछली प्रजनन पर विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, जिससे किसान अपने कार्यों में विविधता और विस्तार कर सकें।
आजीविका एवं रोजगार केंद्रित प्रशिक्षण—जैसे सजावटी मत्स्य पालन, मत्स्य विपणन संपर्क तथा महिलाओं के लिए मूल्यवर्धित मत्स्य उत्पाद—भी कैलेंडर में सम्मिलित हैं।

अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित एक्सपोज़र विज़िट किसानों को उन्नत तकनीकों को प्रत्यक्ष रूप से देखने और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती हैं। साथ ही, फिश फेस्टिवल, मेले आदि के माध्यम से घरेलू मछली/झींगा उपभोग को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

बजट एवं कार्यान्वयन

इस उद्देश्य से मत्स्य पालन विभाग, भारत सरकार ने ₹2.93 करोड़ की वित्तीय राशि चिन्हित की है, जिसे राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB), हैदराबाद—PMMSY और PM-MKSSY के अंतर्गत प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की नोडल कार्यान्वयन एजेंसी—के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है।
मछुआरों और मत्स्य किसानों के प्रशिक्षण से संबंधित सभी व्यय विभाग द्वारा वहन किए जा रहे हैं।

प्रशिक्षण का संचालन राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेशों के मत्स्य विभागों, ICAR मत्स्य अनुसंधान संस्थानों एवं उनके क्षेत्रीय केंद्रों, कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs), एग्रीकल्चर स्किल काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI), CIFNET और NIFPHAT द्वारा किया गया।
पिछले छह महीनों में 499 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनसे 22,921 प्रतिभागी लाभान्वित हुए।

भविष्य की दिशा

मत्स्य पालन विभाग के नेतृत्व में यह पहल न केवल हितधारकों को सशक्त बना रही है, बल्कि मत्स्य एवं जलीय कृषि क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास, लचीलापन, रोजगार सृजन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए एक मजबूत आधार भी तैयार कर रही है। यह प्रयास देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

प्रशिक्षण कार्यक्रमों का सारांश

  • क्रम सं.
  • संस्थान का नाम
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम
  • प्रतिभागी
  • 1
  • ICAR-CIFE, मुंबई एवं क्षेत्रीय केंद्र
  • 55
  • 1830
  • 2
  • ICAR-CIFA, भुवनेश्वर
  • 27
  • 737
  • 3
  • ICAR-CIBA, चेन्नई
  • 31
  • 1207
  • 4
  • ICAR-CIFT, कोच्चि
  • 55
  • 1001
  • 5
  • ICAR-CIFRI, कोलकाता
  • 42
  • 1776
  • 6
  • ICAR–शीत जल मत्स्य अनुसंधान संस्थान, भीमताल
  • 50
  • 3040
  • 7
  • ICAR-CMFRI, कोच्चि
  • 23
  • 622
  • 8
  • ICAR-NBFGR, लखनऊ
  • 58
  • 5592
  • 9
  • ICAR-ATARI, कोलकाता
  • 48
  • 1660
  • 10
  • ICAR-ATARI, जबलपुर
  • 3
  • 75
  • 11
  • ASCI
  • 26
  • 796
  • 12
  • TSP
  • 51
  • 3185
  • 13
  • SCSP
  • 19
  • 950
  • 14
  • CIFNET
  • 11
  • 450
  • कुल

  • 499
  • 22,921




केंद्रीय मंत्री ललन सिंह करेंगे हैदराबाद में स्मार्ट ग्रीन एक्वाकल्चर फार्म एवं अत्याधुनिक RAS सुविधा का उद्घाटन

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केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह 5 जनवरी 2026 को तेलंगाना के हैदराबाद में आयोजित सामान्य निकाय बैठक के पश्चात स्मार्ट ग्रीन एक्वाकल्चर फार्म एवं अनुसंधान संस्थान तथा अत्याधुनिक रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS) सुविधा का उद्घाटन करेंगे।

स्मार्ट ग्रीन एक्वाकल्चर लिमिटेड द्वारा स्थापित यह भारत का पहला वाणिज्यिक स्तर का उष्णकटिबंधीय रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS) आधारित रेनबो ट्राउट एक्वाकल्चर फार्म एवं अनुसंधान संस्थान है, जो भारतीय मत्स्य पालन क्षेत्र के विकास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि का प्रतीक है। यह परियोजना तेलंगाना के रंगा रेड्डी जिले के कंदुकुर मंडल में स्थित है और यह निर्णायक रूप से सिद्ध करती है कि रेनबो ट्राउट जैसी उच्च मूल्य वाली शीत-जल प्रजातियों का उष्णकटिबंधीय जलवायु में भी वर्षभर पालन संभव है। यह उपलब्धि सटीक इंजीनियरिंग, नियंत्रित जैविक प्रणालियों और उन्नत जल पुनर्चक्रण तकनीकों के माध्यम से हासिल की गई है।

यह परियोजना उन दीर्घकालिक धारणाओं को चुनौती देती है, जिनके अनुसार प्रीमियम एक्वाकल्चर प्रजातियाँ केवल विशिष्ट भौगोलिक और जलवायु क्षेत्रों तक सीमित होती हैं, और यह स्थापित करती है कि एक्वाकल्चर की व्यवहार्यता में जलवायु नहीं बल्कि तकनीक निर्णायक कारक है।

यह परियोजना एक जीवंत प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन मंच के रूप में कार्य करती है, जहाँ युवाओं को उन्नत एक्वाकल्चर प्रणालियों, स्वचालन (ऑटोमेशन) तथा जैव-सुरक्षा (बायो-सिक्योरिटी) में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है, जिससे मत्स्य पालन क्षेत्र में मानव संसाधन सुदृढ़ होते हैं।

भारत सरकार ने मत्स्य पालन एवं एक्वाकल्चर क्षेत्र के समग्र विकास हेतु कई परिवर्तनकारी पहलें आरंभ की हैं। वर्ष 2015 से अब तक विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत इस क्षेत्र के लिए कुल ₹38,572 करोड़ के निवेश को स्वीकृति अथवा घोषणा दी जा चुकी है, जिससे इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

शीत-जल मत्स्य पालन मत्स्य क्षेत्र का एक उभरता हुआ और उच्च संभावनाओं वाला खंड बनकर तेजी से सामने आ रहा है। प्रीमियम शीत-जल प्रजातियों की बढ़ती बाजार मांग, घरेलू एवं निर्यात अवसरों के विस्तार तथा सतत एक्वाकल्चर तकनीकों में बढ़ते निवेश के कारण यह उप-क्षेत्र आजीविका सृजन और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, विशेषकर पर्वतीय और उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में।

ट्राउट पालन भारत के एक्वाकल्चर क्षेत्र का एक उच्च मूल्य वाला और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खंड है, जो मुख्यतः उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे हिमालयी एवं पर्वतीय राज्यों में केंद्रित है, जहाँ बर्फ से पोषित नदियों और नालों के शीतल एवं ऑक्सीजन-युक्त जल संसाधनों का उपयोग किया जाता है।

मत्स्य पालन विभाग ने रेनबो ट्राउट हैचरी के विकास के माध्यम से इन संसाधनों के प्रभावी उपयोग में उल्लेखनीय प्रगति की है, जिससे मत्स्य उत्पादन में वृद्धि हुई है और स्थानीय रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। नई हैचरी की स्थापना और उन्नत एक्वाकल्चर तकनीकों के अपनाने से वार्षिक 14 लाख ट्राउट बीज उत्पादन का लक्ष्य प्राप्त किया गया है। इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड सरकार ने वाइब्रेंट विलेज योजना के अंतर्गत इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) के साथ ट्राउट मछली आपूर्ति हेतु एक समझौता ज्ञापन (MoU) भी हस्ताक्षरित किया है।

भारत सरकार लक्षित निवेश, तकनीकी नवाचार और संस्थागत सुधारों के माध्यम से एक्वाकल्चर को एक रणनीतिक विकास इंजन के रूप में आगे बढ़ा रही है। RAS जैसी आधुनिक प्रणालियों, उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के विविधीकरण, क्षमता निर्माण तथा बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता देकर सरकार इस क्षेत्र को पारंपरिक आजीविका-आधारित मॉडल से हटाकर एक तकनीक-प्रेरित, बाजारोन्मुखी पारिस्थितिकी तंत्र की ओर अग्रसर कर रही है। ये हस्तक्षेप उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय में वृद्धि करने, क्षेत्रीय सीमाओं को कम करने और भारतीय एक्वाकल्चर को सतत एवं विस्तार योग्य तरीके से घरेलू मांग और उभरते निर्यात अवसरों को पूरा करने के लिए सक्षम बना रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, भारत सरकार के मत्स्य पालन विभाग ने जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड एवं हिमाचल प्रदेश में शीत-जल मत्स्य पालन क्लस्टर के विकास हेतु अधिसूचना जारी की है।

भारत में देशी मछली प्रजातियों के संवर्धन और मछली पालन में विविधीकरण को बढ़ावा

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भारत की विविध जलीय पारिस्थितिकी तंत्र, जो हिमालयी नदियों से लेकर भारतीय महासागर के तटीय जल तक फैली हुई है, में कई स्थानीय (देशी) मछली प्रजातियां पाई जाती हैं। ये प्रजातियां न केवल देश की पारिस्थितिकी संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान हैं। इन देशी मछली प्रजातियों को बढ़ावा देना आवश्यक है, क्योंकि यह मछली पालन की स्थिरता, खाद्य सुरक्षा, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन और जैव विविधता संरक्षण में योगदान देता है। बढ़ती मछली उत्पादों की मांग और पर्यावरणीय चुनौतियों को देखते हुए, इन देशी प्रजातियों का रणनीतिक संवर्धन इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का मार्ग प्रदान करता है और देश की जलीय विरासत को संरक्षित करता है।

देशी मछली प्रजातियां, जिन्हें स्थानीय या मूल प्रजातियां भी कहा जाता है, वे प्रजातियां हैं जो विशेष भौगोलिक क्षेत्रों और जलीय वातावरण में विकसित और अनुकूलित हुई हैं। भारत में इन प्रजातियों में ताजा पानी, खारी पानी और समुद्री मछलियों की विस्तृत विविधता शामिल है, जिनका पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व अद्वितीय है। अब तक 2800 से अधिक देशी मछली और शेलफिश प्रजातियां पहचानी जा चुकी हैं, जिनमें 917 ताजा पानी, 394 खारी पानी और 1548 समुद्री प्रजातियां शामिल हैं (स्रोत: ICAR-NBFGR)।

देश में अब तक 80 से अधिक वाणिज्यिक रूप से महत्वपूर्ण मछली/शेलफिश प्रजातियों के लिए प्रजनन और बीज उत्पादन तकनीक विकसित की गई है। हालांकि, भारत के मछली पालन उत्पादन का बड़ा हिस्सा कुछ चयनित प्रजातियों से ही आता है। तीन प्रमुख कॉर्प मछलियां – रोहु (Labeo rohita), कतला (Catla catla) और मृगल (Cirrhinus mrigala) और जायंट फ्रेशवाटर प्रॉन (Macrobrachium rosenbergii) भारतीय ताजे पानी के मछली पालन की रीढ़ हैं। इस कारण, 19.50 मिलियन टन ताजे पानी की मछली उत्पादन में तीन-चौथाई हिस्सेदारी भारतीय प्रमुख कॉर्प मछलियों की है।

खारी पानी में, वर्तमान उत्पादन का अधिकांश हिस्सा एक विदेशी झींगा प्रजाति (Penaeus vannamei) से आता है, जबकि देशी ब्लैक टाइगर झींगा (Penaeus monodon) का योगदान छोटा है। समुद्री मछली पालन अभी प्रारंभिक अवस्था में है।

मछली पालन में विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है कि ताजे पानी, खारी पानी और समुद्री पर्यावरण में आर्थिक महत्व वाली संभावित देशी मछली प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए। प्रारंभिक रूप से जिन देशी प्रजातियों को चुना गया है, वे इस प्रकार हैं:

  1. फ्रिंज्ड-लिप्ड कॉर्प (Labeo fimbriatus)

  2. ऑलिव बार्ब (Systomus sarana)

  3. पेंगबा (Osteobrama belangiri)

  4. स्ट्राइप्ड मुर्रेल (Channa striata)

  5. पबड़ा (Ompok spp.)

  6. सिंगही (Heteropneustes fossilis)

  7. एशियन सीबास (Lates calcarifer)

  8. पर्लस्पॉट (Etroplus suratensis)

  9. पॉम्पानो (Trachinotus spp.)

  10. मड क्रैब (Scylla spp.)

  11. Penaeus indicus

इन प्रजातियों को मछली पालन के लिए उत्कृष्ट उम्मीदवार माना गया है, और इनके प्रजनन, बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन और फार्मिंग तकनीकें उपलब्ध हैं। ये प्रजातियां स्थानीय समुदायों और उनके जलीय वातावरण के बीच गहरे संबंध को दर्शाती हैं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में मदद करती हैं। ये प्रजातियां न केवल सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये स्थानीय और क्षेत्रीय बाजारों में उच्च मूल्य रखती हैं। ये लाखों लोगों के आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मछली पालन उत्पादन और आय में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।

अक्सर देशी मछली प्रजातियों के लाभों के प्रति जागरूकता और तकनीकी ज्ञान की कमी होती है। इस कमी के कारण इन्हें मछली पालन प्रणालियों में पूरी तरह से शामिल करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए हितधारकों को देशी प्रजातियों के प्रजनन, बीज उत्पादन और फार्मिंग तकनीकों के लाभों और तरीकों पर प्रशिक्षण देना आवश्यक है।

भारत में ताजा पानी और मछली पालन उत्पादन कुल मछली उत्पादन का 75% से अधिक योगदान देते हैं, जो दर्शाता है कि फार्मिंग सिस्टम पकड़ मछली (कैप्चर फिशरीज) पर हावी हैं। इस दिशा में, मछली पालन विभाग (DoF), भारत सरकार, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), नया उप-योजना प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PMMKSSY) और फिशरीज एवं एक्वाकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (FIDF) के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण बीज और फीड की आपूर्ति को बढ़ावा देने, तकनीकी ज्ञान का प्रसार करने और प्रशिक्षण देने का कार्य कर रहा है।

PMMSY योजना का उद्देश्य मछली पालन उत्पादन बढ़ाना, मछुआरों की आजीविका सुधारना और जलीय संसाधनों के सतत उपयोग को सुनिश्चित करना है। यह योजना अक्वाकल्चर का विस्तार, प्रजातियों का विविधीकरण और आनुवंशिक सुधार पर केंद्रित है।

ICAR विभिन्न अनुसंधान संस्थानों के माध्यम से देशी मछली प्रजातियों पर अनुसंधान करता है, जिसमें उनकी जीवविज्ञान, प्रजनन आदतें, वाणिज्यिक रूप से महत्वपूर्ण मछली और शेलफिश प्रजातियों के आनुवंशिक सुधार कार्यक्रम और आवास आवश्यकताओं का अध्ययन शामिल है। ICAR संकटग्रस्त और लुप्तप्राय देशी मछली प्रजातियों के संरक्षण के प्रयासों में भी लगा हुआ है।

DoF ने ICAR के साथ परामर्श कर कुछ देशी प्रजातियों का आनुवंशिक सुधार हेतु चयन किया और गुणवत्तापूर्ण और स्वस्थ बीज उत्पादन के लिए वित्तीय सहायता दी। चयनित प्रजातियां हैं:

  1. स्कैम्पी

  2. रोहु

  3. कतला

  4. मुर्रेल

  5. Penaeus indicus

  6. Penaeus monodon

  7. भारतीय पॉम्पानो

इसके अलावा, PMMSY के तहत ICAR-CIFA, भुवनेश्वर में ताजे पानी की प्रजातियों के लिए न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर और ICAR-CMFRI, मंडपम में समुद्री प्रजातियों के लिए न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर की स्थापना को मंजूरी दी गई है।

DoF ने क्षेत्रीय महत्व के आधार पर देशी प्रजातियों के उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टर भी स्थापित किए हैं, जिनका उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना, मूल्य श्रृंखला मजबूत करना, पश्चात-उत्पादन नुकसान कम करना और ग्रामीण महिलाओं और युवाओं को रोजगार प्रदान करना है। कुल 34 क्लस्टर की घोषणा की गई है, जिनमें शामिल हैं:

  • ओडिशा: स्कैम्पी क्लस्टर

  • तेलंगाना: मुर्रेल क्लस्टर

  • त्रिपुरा: पबड़ा क्लस्टर

  • मणिपुर: पेंगबा क्लस्टर

  • जम्मू-कश्मीर: ट्राउट क्लस्टर

  • लद्दाख: ट्राउट क्लस्टर

  • केरल: पर्लस्पॉट क्लस्टर

  • कर्नाटक: समुद्री देशी प्रजातियों का केज कल्चर

  • मदुरै: ऑर्नामेंटल फिशरीज क्लस्टर

ये प्रयास भारत में देशी मछली प्रजातियों के संवर्धन, उत्पादन और सतत उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।

भारत सरकार की मत्स्य और दुग्ध विकास योजनाओं से गुजरात में मत्स्य और डेयरी क्षेत्र को मिली मजबूती

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नई दिल्ली- भारत सरकार के मत्स्य विभाग (DoF) और पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) देश के सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मत्स्य और दुग्ध क्षेत्र के समग्र विकास के लिए विभिन्न योजनाओं को लागू कर रहे हैं, जिनमें गुजरात भी शामिल है।

मत्स्य क्षेत्र में प्रमुख पहल:

मुख्य योजनाओं में ब्लू रिवोल्यूशन योजना (2015-16 से 2019-20), मत्स्य पालन में किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का विस्तार (2018-19 से), Fisheries and Aquaculture Infrastructure Development Fund (FIDF) (2018-19 से 2025-26), प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) (2020-21 से 2024-26) और नया केंद्रीय उप-योजना प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह योजना (PM-MKSSY) (2023-24 से 2026-27) शामिल हैं। इन पहलों का मुख्य उद्देश्य मत्स्य उत्पादन बढ़ाना, मत्स्य अवसंरचना मजबूत करना, मत्स्यपालकों की आजीविका सुरक्षित करना और संसाधनों की स्थिरता सुनिश्चित करना है।

PMMSY के तहत, पिछले पांच वर्षों में गुजरात के 1200 मत्स्यपालकों को प्रशिक्षण दिया गया, जिसके लिए 10 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया। प्रशिक्षण में कृत्रिम रीफ स्थापित करना, सी-वीड फार्मिंग, रोग प्रबंधन, बेस्ट मैनेजमेंट प्रैक्टिस, झींगा पालन और मारीकल्चर जैसी सतत् प्रथाओं को बढ़ावा देना शामिल था।

साथ ही, गुजरात सरकार ने 2025–26 में तटीय एक्वाकल्चर कल्याण योजनाओं पर कुल ₹160 करोड़ का बजट खर्च किया। इस अवधि में कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन कामधेनु विश्वविद्यालय और ICAR-CIBA के सहयोग से किया गया।

डेयरी क्षेत्र में प्रमुख पहल:

राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) फरवरी 2014 से पूरे देश में लागू है। जुलाई 2021 में इसे पुनर्गठित किया गया, जिसके तहत दो प्रमुख घटक हैं:

  1. Component A: गुणवत्ता वाले दूध जांच उपकरण और प्राथमिक चिलिंग सुविधाओं के लिए अवसंरचना सृजन/मजबूती।

  2. Component B: सहकारी समितियों के माध्यम से डेयरीकरण।

NPDD के तहत गुजरात में 9 परियोजनाओं को मंजूरी मिली, जिनमें कुल 55,613.66 लाख रुपये का प्रावधान किया गया। इसके अलावा, डेयरी प्रसंस्करण अवसंरचना विकास कोष (DIDF) अब पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) में समाहित किया गया है। SDCFPO योजना के तहत, 12 दूध संघों को 31 अक्टूबर 2025 तक 559.78 करोड़ रुपये का ब्याज सब्सिडी लाभ प्रदान किया गया।

यह जानकारी लोकसभा में मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह (लल्लन सिंह) द्वारा दी गई।

भारत में विश्व मत्स्य दिवस 2025 का आयोजन: “भारत का ब्लू ट्रांसफॉर्मेशन: समुद्री निर्यात में मूल्य संवर्धन को सुदृढ़ करना”

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मछली पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य विभाग ने आज नई दिल्ली में विश्व मत्स्य दिवस 2025 मनाया। इस वर्ष का थीम था “भारत का ब्लू ट्रांसफॉर्मेशन: समुद्री निर्यात में मूल्य संवर्धन को सुदृढ़ करना”। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह alias ललन सिंह ने वीडियो संदेश के माध्यम से प्रतिभागियों को संबोधित किया। केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल और जॉर्ज कुरियन ने भी इस अवसर पर नई दिल्ली में भाग लिया।

इस अवसर पर मत्स्य विभाग ने राष्ट्रीय मत्स्य और एक्वाकल्चर ट्रेसबिलिटी फ्रेमवर्क 2025 जारी किया और कई महत्वपूर्ण पहलें प्रस्तुत कीं, जिनमें शामिल हैं:

  • मारीकल्चर के लिए SOP

  • स्मार्ट और इंटीग्रेटेड फिशिंग हार्बर के विकास और प्रबंधन के लिए SOP

  • नोटिफाइड मरीन फिश लैंडिंग सेंटर्स में न्यूनतम बुनियादी ढांचे के विकास के लिए SOP

  • जलाशय मत्स्य प्रबंधन के लिए दिशानिर्देश

  • तटीय एक्वाकल्चर दिशानिर्देशों का संकलन

ये पहलें मत्स्य अवसंरचना को आधुनिक बनाने, स्थिरता प्रथाओं को मजबूत करने और क्षेत्र में मूल्य संवर्धन को तेज करने का लक्ष्य रखती हैं।

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने वीडियो संदेश में भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि नवाचार और वैश्विक साझेदारियों को बढ़ावा देकर निर्यात प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया जाएगा। उन्होंने हितधारकों से अनुरोध किया कि वे पैकेजिंग, प्रमाणन मानकों और मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उठाकर समुद्री उत्पादों के मूल्य श्रृंखला को मजबूत करें। उन्होंने ट्रेसबिलिटी, ब्रांडिंग और जैव-सुरक्षा को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाए रखने का महत्व भी रेखांकित किया।

जॉर्ज कुरियन ने भारत में मछली उत्पादन को पिछले दशक में 96 लाख टन से बढ़ाकर 195 लाख टन करने की उपलब्धि को उजागर किया और 2030 तक समुद्री उत्पादों के निर्यात को 1 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाने की महत्वाकांक्षा व्यक्त की, जिसमें 30% उच्च मूल्य वाले उत्पाद होंगे। प्रो. एस. पी. सिंह बघेल ने मत्स्य क्षेत्र के 3 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका में योगदान और निर्यात में वृद्धि के महत्व पर जोर दिया।

मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलाक्ष लिक्खी ने कहा कि भारत का मत्स्य क्षेत्र 9% की वार्षिक दर से बढ़ रहा है और FY 2024–25 में समुद्री उत्पादों का निर्यात 16.85 लाख टन तक पहुँच गया है। उन्होंने मूल्य संवर्धन, विविधीकरण और नियामक अनुपालन पर केंद्रित सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया।

FAO के भारत प्रतिनिधि ताकायुकी हगीवारा ने भी भारत के खाद्य सुरक्षा, स्थिरता और मत्स्य पालन में वैश्विक सहयोग की प्रतिबद्धता दोहराई।

इस अवसर पर 19 देशों के दूतावासों और विश्व बैंक, FAO, AFD, GIZ, JICA, BoBP, MSC जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भाग लिया, जिससे मत्स्य और एक्वाकल्चर क्षेत्र में वैश्विक सहयोग को बढ़ावा मिला।

राष्ट्रीय मत्स्य और एक्वाकल्चर ट्रेसबिलिटी फ्रेमवर्क 2025 के तहत डिजिटल उपकरणों जैसे ब्लॉकचेन, IoT, QR कोड और GPS का उपयोग कर ‘फार्म टू प्लेट’ और ‘कैच टू कंज्यूमर’ तक समुद्री उत्पादों का ट्रैकिंग सुनिश्चित की जाएगी। यह छोटे मछुआरों और किसानों के लिए भी समावेशी रूप से लागू किया जाएगा।

मुख्य पहलें:

  • National Framework on Traceability in Fisheries and Aquaculture 2025

  • SOP for Mariculture

  • SOP on Development and Management of Smart and Integrated Fishing Harbours

  • SOP on Development of Minimum Basic Infrastructure at Notified Marine Fish Landing Centres

  • Guidelines for Reservoir Fisheries Management

  • Compendium of Coastal Aquaculture Guidelines

जॉर्ज कुरियन ने ‘मरीन फिशरीज़ जनगणना 2025’ और व्यास ऐप्स का शुभारंभ किया — मत्स्य क्षेत्र में डिजिटल क्रांति की ओर ऐतिहासिक कदम

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कोच्चि में आज आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने मरीन फिशरीज़ जनगणना (Marine Fisheries Census - MFC) 2025 के घरेलू सर्वेक्षण की शुरुआत की और VYAS–BHARAT तथा VYAS–SUTRA मोबाइल ऐप्स लॉन्च किए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि एमएफसी 2025 का शुभारंभ भारत में मत्स्य क्षेत्र की गणना प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक डिजिटल परिवर्तन का प्रतीक है। परंपरागत कागज-आधारित पद्धति से पूर्णत: डिजिटल रूप में परिवर्तन करते हुए, यह जनगणना अब तक का सबसे व्यापक, सूक्ष्म और भौगोलिक रूप से संदर्भित राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार करेगी, जिससे साक्ष्य-आधारित योजना निर्माण को नई दिशा मिलेगी।

जॉर्ज कुरियन ने मत्स्यपालन समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार मत्स्यजनों के कल्याण के लिए ट्रांसपोंडर, टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस जैसी कई वैज्ञानिक तकनीकों को नि:शुल्क उपलब्ध करा रही है। उन्होंने मछुआरों और मछली किसानों से NFDP पोर्टल पर पंजीकरण कराने का आग्रह किया ताकि वे विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें।

एमएफसी 2025: एक ऐतिहासिक डिजिटल पहल और प्रौद्योगिकी आधारित मत्स्य कल्याण

पूर्णत: डिजिटल और भू-संदर्भित जनगणना

एमएफसी 2025 अपने पूर्ववर्ती संस्करणों (2005, 2010, 2016) से एक बड़ा परिवर्तन है। यह लगभग 12 लाख मछुआरा परिवारों को कवर करेगी, जो 13 तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप सहित) के 5,000 गांवों में फैले हैं।

गणना अवधि

घरेलू सर्वेक्षण 3 नवंबर से 18 दिसंबर 2025 तक 45 दिनों तक चलेगा।

डिजिटल आर्किटेक्चर

यह प्रक्रिया ICAR–सेंट्रल मरीन फिशरीज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) द्वारा विकसित बहुभाषी एंड्रॉइड एप्स –

  • VYAS–NAV (गांवों और बंदरगाहों का सत्यापन),

  • VYAS–BHARAT (घरेलू और बुनियादी ढांचे की गणना),

  • VYAS–SUTRA (रीयल-टाइम निगरानी और पर्यवेक्षण)
    पर आधारित है।

सटीकता और दक्षता

रीयल-टाइम, भू-संदर्भित डाटा संग्रहण से मानवीय त्रुटियाँ समाप्त होंगी और डाटा प्रोसेसिंग तेज़ होगी।

निगरानी और नियंत्रण

पूरा अभियान बहु-स्तरीय वेब डैशबोर्ड्स और सुपरवाइजरी ऐप के माध्यम से मॉनिटर किया जाएगा, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होगी।

प्रौद्योगिकी एकीकरण और ड्रोन सर्वेक्षण

ड्रोन तकनीक का उपयोग प्रमुख मछली बंदरगाहों पर नावों और मत्स्य उपकरणों की एरियल गणना के लिए किया जा रहा है।
पूर्वी तट पर – विशाखापट्टनम, काकीनाडा, तूतीकोरिन,
पश्चिमी तट पर – मंगलुरु, बेयपोर, पुथियप्पा जैसे केंद्र शामिल हैं।

सटीक और लक्षित कल्याण के लिए विस्तृत डाटा संग्रहण

एमएफसी 2025 में पहली बार विस्तृत सामाजिक-आर्थिक जानकारी शामिल की जा रही है, जैसे –

  • परिवार की कुल आय

  • गृहस्वामित्व

  • ऋण स्थिति और वित्तीय स्रोत

  • बीमा कवरेज

  • कोविड-19 के प्रभाव

  • पीएम–एमकेएसएसवाई जैसी योजनाओं से प्राप्त लाभ

इसके अलावा, फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (FFPOs) और सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स (SHGs) के लिए भी नए सर्वेक्षण फॉर्म तैयार किए गए हैं।

पृष्ठभूमि

यह राष्ट्रीय मरीन फिशरीज़ जनगणना 2025, भारत सरकार के मत्स्यपालन विभाग द्वारा पूर्ण वित्तपोषित है।
इसका संचालन ICAR–CMFRI (नोडल एजेंसी) और फिशरी सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के सहयोग से किया जा रहा है।
यह भारत में मत्स्य समुदाय का सबसे बड़ा और व्यापक “स्मार्ट जनगणना, स्मार्ट मत्स्य” अभियान है, जो महिला और युवाओं के सशक्तिकरण के साथ-साथ जलवायु-समर्थ, समावेशी विकास को प्रोत्साहित करेगा।

निष्कर्ष

एमएफसी 2025 भारत की मत्स्य नीति में एक नया युग लेकर आ रहा है — डिजिटल, पारदर्शी और सशक्तिकरण-उन्मुख। यह पहल न केवल डाटा आधारित नीति निर्माण को सक्षम करेगी, बल्कि मत्स्य समुदाय के कल्याण, आजीविका और सशक्तिकरण के लिए एक ठोस आधार भी तैयार करेगी।


डॉ. अभिलक्ष लखी ने मुंबई में FSI और CIFNET की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप द्वीपों में मत्स्य क्षमता निर्माण पर दिया जोर

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मछलीपालन विभाग (DoF), मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के सचिव डॉ. अभिलक्ष लखी ने आज मुंबई में एक हाइब्रिड समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें मछली सर्वेक्षण भारत (FSI) और केंद्रीय मत्स्य नौवहन एवं इंजीनियरिंग प्रशिक्षण संस्थान (CIFNET) द्वारा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप द्वीप समूह में किए गए जनसंपर्क और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की समीक्षा की गई।

अपने संबोधन में, डॉ. लखी ने क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की सहयोगात्मक योजना और अधीनस्थ कार्यालयों के बीच समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि परिणाम अधिक प्रभावशाली और समेकित हों। उन्होंने कहा कि लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भारत की समुद्री मत्स्य विकास रणनीति में विशेष रूप से टूना मत्स्य क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने स्थानीय मछुआरों के कौशल विकास, आधुनिक मत्स्य तकनीकों को अपनाने, और कटाई पश्चात् प्रबंधन तकनीकों में सुधार के लिए लक्षित हस्तक्षेपों की आवश्यकता पर जोर दिया। डॉ. लखी ने सुझाव दिया कि इन क्षेत्रों के अत्यधिक प्रेरित और कुशल मछुआरों को उच्च गुणवत्ता वाले टूना (सशीमी-ग्रेड) के हैंडलिंग, प्रोसेसिंग और कोल्ड-चेन संरक्षण तकनीकों में विदेशी उन्नत प्रशिक्षण का अवसर दिया जाए।

उन्होंने कहा कि ऐसे कदम कटाई पश्चात् हानियों को कम करने और भारतीय समुद्री उत्पादों की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में सहायक होंगे। साथ ही, उन्होंने FSI और CIFNET की भूमिका को द्वीपीय क्षेत्रों में समुद्री क्षमता सुदृढ़ करने में रणनीतिक बताया।

बैठक के दौरान FSI और CIFNET ने लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में चल रही गतिविधियों और जनसंपर्क पहलों पर विस्तृत प्रस्तुतियाँ दीं। समीक्षा में मछुआरों और मत्स्य कर्मियों की तकनीकी दक्षताओं को बढ़ाने, प्रायोगिक प्रशिक्षण, फील्ड-स्तरीय प्रदर्शन, और तकनीकी प्रसार गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय मत्स्य समुदायों की आजीविका सुधारने के उपायों पर भी चर्चा की गई।

इस समीक्षा बैठक में NFDB, ICAR, MPEDA, NABARD, NCDC, महाराष्ट्र सरकार के मत्स्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, द्वीप प्रशासन के प्रतिनिधि, और अन्य हितधारक उपस्थित रहे।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुंबई में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत ‘डीप सी फिशिंग वेसल्स’ का किया शुभारंभ, सहकारिता आधारित मत्स्य क्षेत्र को मिलेगा बढ़ावा

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केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने आज मुंबई के मझगांव डॉक में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana) के तहत ‘डीप सी फिशिंग वेसल्स’ का शुभारंभ किया। इस अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उपमुख्यमंत्री अजित पवार और केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोळ भी उपस्थित रहे।

अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह कदम भारत के समुद्री मत्स्य क्षेत्र के आधुनिकीकरण और तटीय क्षेत्रों में सहकारिता आधारित विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को साकार करने और ब्लू इकॉनमी को सशक्त बनाने के लिए सहकारिता की भावना के साथ कार्य कर रही है।

अमित शाह ने बताया कि आज जिन दो ट्रॉलरों का शुभारंभ किया गया है, वे भारत की मत्स्य संपदा की संभावनाओं को और अधिक बढ़ाने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करेंगे कि मछली उद्योग का लाभ मेहनती मछुआरों के घर तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि अब तक मत्स्य ट्रॉलरों पर काम करने वाले लोग वेतन पर काम करते थे, लेकिन सहकारिता आधारित मत्स्य पालन के तहत ट्रॉलरों का पूरा लाभ सीधे मछुआरों तक पहुंचेगा।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि फिलहाल 14 ट्रॉलर प्रदान किए जा रहे हैं, और निकट भविष्य में केंद्र सरकार, सहकारिता मंत्रालय एवं मत्स्य विभाग की ओर से और अधिक ट्रॉलर मछुआरों को सहकारी मॉडल पर दिए जाएंगे। ये ट्रॉलर गहरे समुद्र में 25 दिनों तक रह सकते हैं और 20 टन तक मछलियां ले जा सकते हैं। इसके साथ ही बड़े जहाजों के माध्यम से समुद्र से तट तक मछलियों के परिवहन की भी व्यवस्था की जाएगी।

अमित शाह ने कहा कि लगभग 11,000 किलोमीटर लंबी भारतीय समुद्री तटरेखा पर मछली पकड़कर आजीविका चलाने वाले गरीब भाइयों और बहनों के लिए आने वाले दिनों में एक बड़ी योजना बनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि देश की वास्तविक समृद्धि तभी संभव है जब ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाला गरीब व्यक्ति आर्थिक रूप से सशक्त बने। केवल जीडीपी वृद्धि को विकास का पैमाना मानने से वास्तविक विकास नहीं होता, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से प्रत्येक परिवार की समृद्धि सुनिश्चित करनी होती है।

अमित शाह ने कहा कि मत्स्य क्षेत्र में सहकारिता अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन रही है। भविष्य में मछलियों के प्रसंस्करण, निर्यात और बड़े संग्रहण पोतों की तैनाती की योजनाएं बनाई जा रही हैं। उन्होंने बताया कि ये प्रसंस्करण केंद्र और चिलिंग यूनिट मछुआरों के स्वामित्व में होंगे, और निर्यात भी बहु-राज्य सहकारी समितियों के माध्यम से किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई मत्स्य योजनाओं के सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। वर्ष 2014-15 में भारत का कुल मत्स्य उत्पादन 102 लाख टन था, जो अब बढ़कर 195 लाख टन हो गया है। इसमें समुद्री मत्स्य उत्पादन 35 लाख टन से बढ़कर 48 लाख टन हुआ है, जबकि मीठे पानी की मत्स्य उत्पादन में 119 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

अमित शाह ने कहा कि महाराष्ट्र की शुगर मिलों ने गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है, और गुजरात में अमूल ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। अमूल के माध्यम से आज लगभग 80,000 करोड़ रुपये का कारोबार ग्रामीण महिलाओं के हाथों में है। यही सहकारिता की भावना है, जो भारत की आत्मा और विकास की दिशा है।

इस अवसर पर श्री शाह ने कहा कि सहकारिता के माध्यम से ही भारत मानव-केंद्रित आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है — यही “विकसित भारत” की सच्ची परिकल्पना है।

लक्षद्वीप में मत्स्य क्षेत्र के विकास और निवेश बढ़ाने पर उच्च स्तरीय परामर्श बैठक

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लक्षद्वीप में मत्स्य क्षेत्र के विकास पर उच्च स्तरीय परामर्श बैठक आयोजित

लक्षद्वीप द्वीपसमूह में मत्स्य क्षेत्र के विकास, विशेष रूप से टूना मत्स्य पालन, समुद्री शैवाल (Seaweed) और Ornamental fisheries पर ध्यान केंद्रित करते हुए आज कोच्चि में उच्च स्तरीय परामर्श बैठक आयोजित की गई। बैठक में केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह, केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन और लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल पटेल उपस्थित थे।

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने घोषणा की कि नवंबर 2025 में लक्षद्वीप में निवेशकों और निर्यातकों की बैठक आयोजित की जाएगी, ताकि टूना मत्स्य पालन, समुद्री शैवाल और Ornamental fisheries में निवेश और निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके। उन्होंने कहा, “यदि मछली पकड़ बढ़ती है, तो लक्षद्वीप की अर्थव्यवस्था विकसित होती है, और इसके परिणामस्वरूप देश की अर्थव्यवस्था भी बढ़ती है। यह प्रधानमंत्री के 2047 तक ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने में मदद करेगा।”

मंत्री ने लक्षद्वीप को एक रणनीतिक मत्स्य हब के रूप में उसकी अनूठी स्थिति पर भी प्रकाश डाला, जो भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) का लगभग 20% हिस्सा है और विशाल गहरे समुद्र संसाधनों, विशेषकर उच्च-मूल्य टूना तक पहुंच प्रदान करता है। उन्होंने लक्षद्वीप में सतत मत्स्य पालन पद्धतियों जैसे कि पोल-एंड-लाइन और हैंडलाइन टूना मत्स्य पालन को वैश्विक स्तर पर पर्यावरण-स्नही और बाईकैच-मुक्त के रूप में मान्यता प्राप्त होने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लक्षद्वीप का रणनीतिक स्थान गहरे समुद्र में मत्स्य पालन गतिविधियों का विस्तार करने की महत्वपूर्ण संभावनाएं प्रदान करता है।

मंत्री ने टूना मूल्य श्रृंखला के विकास, समुद्री शैवाल और Ornamental fisheries में उद्यमिता कार्यक्रम शुरू करने और FFPOs को सशक्त बनाने पर जोर दिया। उन्होंने आश्वासन दिया कि प्रमाणन और ट्रेसबिलिटी सतत, पर्यावरण के अनुकूल टूना निर्यात को सहारा देगा। उन्होंने भारत सरकार और लक्षद्वीप प्रशासन के बीच एक संयुक्त कार्य समूह बनाने का आह्वान किया ताकि लंबित प्रस्तावों और तकनीकी आवश्यकताओं का समाधान किया जा सके, और हर हितधारक को आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित किया।

केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने अपने संबोधन में लक्षद्वीप की भारत के मत्स्य क्षेत्र में रणनीतिक भूमिका पर प्रकाश डाला, और प्रधानमंत्री के “समुद्र से समृद्धि” दृष्टिकोण की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि आईटी क्षेत्र के बाद मत्स्य क्षेत्र भारत में दूसरा सबसे तेजी से बढ़ता क्षेत्र है और इसलिए इसे नीतिगत ध्यान की आवश्यकता है। उन्होंने आत्मनिर्भर भारत, वोकल फॉर लोकल और स्वदेशी लक्ष्यों के साथ मत्स्य क्षेत्र को जोड़ने पर जोर दिया।

MoS कुरियन ने CMFRI और KVK लक्षद्वीप, विशेषकर Ornamental fisheries में उनके कार्यों की सराहना की और कहा कि इसमें बड़ी संभावनाएं हैं। उन्होंने स्थानीय मछुआरों को सशक्त बनाने के लिए आधुनिक बुनियादी ढांचे, कोल्ड चेन सिस्टम और मूल्य वर्धित प्रसंस्करण में अधिक निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया।

लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल पटेल ने कहा कि लक्षद्वीप भारत का सबसे छोटा संघीय क्षेत्र है, जिसकी मुख्य भूमि से सीमित कनेक्टिविटी है और ऐतिहासिक रूप से यह विकासात्मक चुनौतियों का सामना करता रहा है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के 75 वर्षों के बाद भी सुरक्षित पेयजल एक बड़ा मुद्दा था, लेकिन प्रधानमंत्री की पहल के कारण अब सभी द्वीपों में डिसेलिनेशन प्लांट स्थापित किए गए हैं। उन्होंने बताया कि लक्षद्वीप के सभी कक्ष अब स्मार्ट क्लासरूम हैं, जिससे बच्चे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, और अस्पतालों और हवाई अड्डों का विकास भी किया जा रहा है।

प्रशासक ने कहा कि पोत प्रौद्योगिकी और मछली प्रसंस्करण पर प्रशिक्षण और जागरूकता की आवश्यकता है, साथ ही विभागीय योजनाओं के लिए एक संरचित आउटरीच योजना बनानी चाहिए ताकि अधिक हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। उन्होंने कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं को प्राथमिकता देने और मत्स्य क्षेत्र में निजी निवेश आकर्षित करने के लिए निवेशकों की बैठक आयोजित करने का प्रस्ताव रखा।

मत्स्य विभाग, भारत सरकार के सचिव डॉ. अभिलाक्ष लिक्खी ने कहा कि प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (PMMSY) के तहत लक्षद्वीप के मत्स्य क्षेत्र को विभिन्न सहायता प्रदान की जा रही है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने समुद्री शैवाल की खेती के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ ऑफशोर क्लस्टर की जरूरत बताई और कहा कि स्मार्ट, इंटीग्रेटेड बंदरगाह विकसित किए जा रहे हैं ताकि मैकेनाइज्ड मछली पकड़ बढ़ाई जा सके।

लक्षद्वीप प्रशासन के सचिव (मत्स्य) राजथिलक एस ने टूना मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने और लाइवबेट वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम रीफ्स की शुरूआत के अपडेट साझा किए। उन्होंने कहा कि INCOIS नियमित रूप से संभावित मत्स्य क्षेत्रों का डेटा स्थानीय मछुआरों के साथ साझा करता है और लाइवबेट की उपलब्धता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि गहरे समुद्र में मत्स्य पालन से उत्पादन में काफी वृद्धि होने की उम्मीद है और रेफ्रिजरेटेड फिश वॉटर टैंक के परिचय से पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान कम होगा और हिस्टामिन सामग्री का मूल्यांकन संभव होगा।

इस परामर्श बैठक में लक्षद्वीप प्रशासन, मत्स्य विभाग (भारत सरकार), गृह मंत्रालय, बंदरगाह, जलमार्ग एवं शिपिंग मंत्रालय, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, MPEDA, ICAR, NITI Aayog, NCDC और NABARD के प्रमुख हितधारक और प्रतिनिधि शामिल हुए।


कोच्चि दौरे में डॉ. लखी ने मछली प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन में आधुनिक तकनीक अपनाने पर बल दिया

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केंद्रीय सचिव डॉ. अभिलाक्ष लखी ने कोच्चि में मत्स्य संस्थानों और बंदरगाह परियोजना की समीक्षा की

कोच्चि- केंद्रीय मत्स्य पालन सचिव डॉ. अभिलाक्ष लखी ने 19 सितम्बर को आईसीएआर – केंद्रीय मत्स्य प्रौद्योगिकी संस्थान (CIFT) का दौरा कर इसके कार्यों की समीक्षा की। इस अवसर पर राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारी, समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA), स्टार्टअप्स, सीफूड निर्यातक और अन्य हितधारक भी हाइब्रिड मोड में शामिल हुए।

डॉ. लखी ने कहा कि मछली प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन में आधुनिक तकनीकों को अपनाना आवश्यक है। उन्होंने ICAR-CIFT और अन्य हितधारकों से कटाई-पश्चात प्रबंधन (Post-Harvest Management) को मजबूत करने और मत्स्य मूल्य श्रृंखला (Value Chain) के लिए व्यापक रोडमैप तैयार करने का आह्वान किया।

इस अवसर पर संयुक्त सचिव (अंतर्देशीय मत्स्य पालन) सागर मेहरा ने “फिश टेक फॉर पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट एंड वैल्यू एडिशन” पर प्रस्तुति दी और मछली उत्पादों के विविधीकरण तथा नई तकनीकों के उपयोग से क्षेत्रीय वृद्धि और मछुआरों की आय बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. लखी ने 20 सितम्बर को कोच्चि के थोप्पुम्पडी मत्स्य बंदरगाह का दौरा कर प्रगति की समीक्षा की और मछुआरों तथा नौका संचालकों से संवाद किया। उन्होंने बंदरगाह प्राधिकरण से प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत चल रही बंदरगाह परियोजना को समय पर पूरा करने के निर्देश दिए।

पृष्ठभूमि: कोच्चि मत्स्य बंदरगाह के आधुनिकीकरण और उन्नयन की परियोजना को मार्च 2022 में मंजूरी दी गई थी। ₹169.17 करोड़ की इस परियोजना में केंद्र सरकार का वित्तीय सहयोग PMMSY के तहत ₹100 करोड़ तक है। यह योजना सागरमाला कार्यक्रम के अंतर्गत बंदरगाह, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय के साथ अभिसरण में लागू की जा रही है।


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