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अमेरिका में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ का रास्ता साफ, भारत-चीन पर भी असर की आशंका

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वॉशिंगटन- अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़ा एक व्यापक विधेयक पारित कर दिया है, जिसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को देने का प्रावधान है। भारत और चीन उन प्रमुख देशों में शामिल हैं, जो इस प्रावधान से प्रभावित हो सकते हैं।

‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नामक विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 262-159 मतों से मंजूरी दी। इससे पहले विधेयक अमेरिकी सीनेट से भी पारित हो चुका है। अब इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

भारत समेत प्रमुख खरीदारों पर पड़ सकता है असर

विधेयक का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाना और रूस से तेल एवं गैस खरीदने वाले देशों को वैकल्पिक स्रोतों की ओर जाने के लिए प्रोत्साहित करना है। प्रस्तावित प्रावधान के तहत अमेरिका रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले प्रमुख देशों पर भारी टैरिफ लगा सकता है। भारत और चीन को इस प्रावधान के संभावित रूप से प्रभावित देशों में प्रमुखता से बताया गया है।

हालांकि, विधेयक अपने आप भारत से आने वाले सभी सामानों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं करता। यह अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में ऐसा टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। 

भारत ने कहा- ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता

अमेरिकी कदम पर भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और ऊर्जा की खरीद बाजार की परिस्थितियों तथा उपलब्धता को ध्यान में रखकर की जाती रहेगी। भारत ने यह भी कहा है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।

भारत लंबे समय से रूस समेत विभिन्न देशों से ऊर्जा स्रोतों की खरीद करता रहा है। सरकार का कहना है कि ऊर्जा आपूर्ति में विविधता और किफायती कीमतें देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।

भारत-अमेरिका संबंधों पर भी नजर

अमेरिकी विधेयक ऐसे समय आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार एवं टैरिफ से जुड़े मुद्दों पर बातचीत चल रही है। प्रस्तावित नए अधिकारों से दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की संभावना पर भी चर्चा हो रही है।

अब सभी की नजर राष्ट्रपति ट्रंप के अगले कदम पर है। यदि विधेयक कानून बनता है और इसके तहत भारत जैसे देशों पर टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर ऊर्जा आयात, व्यापार लागत और व्यापक आर्थिक संबंधों पर पड़ सकता है।

जी20 ऊर्जा बैठक में भारत ने रखा सुरक्षित और किफायती ऊर्जा का पक्ष

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मनोहर लाल ने कहा- विकास के लिए सुरक्षित, सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा जरूरी; महत्वपूर्ण खनिजों की मजबूत आपूर्ति शृंखला पर दिया जोर

ह्यूस्टन- केंद्रीय विद्युत एवं आवासन और शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल ने अमेरिका के ह्यूस्टन में आयोजित जी20 ऊर्जा प्रचुरता मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत का नेतृत्व करते हुए सुरक्षित, किफायती और विश्वसनीय ऊर्जा व्यवस्था को वैश्विक विकास की बुनियाद बताया। अमेरिका की जी20 अध्यक्षता में 14 से 16 सितंबर तक आयोजित बैठक में ऊर्जा सुरक्षा, नियामक दक्षता और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।

बैठक के दौरान मनोहर लाल ने कहा कि ऊर्जा की सुरक्षित और किफायती उपलब्धता विशेष रूप से विकासशील देशों के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने वैश्विक ऊर्जा चुनौतियों से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग बढ़ाने तथा अलग-अलग देशों की परिस्थितियों और विकास प्राथमिकताओं का सम्मान करने पर जोर दिया।

552 गीगावाट पहुंची भारत की बिजली उत्पादन क्षमता

केंद्रीय मंत्री ने वैश्विक मंच पर भारत के ऊर्जा क्षेत्र में हुए बदलावों और उपलब्धियों को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि भारत की स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता बढ़कर 552 गीगावाट हो गई है। इसमें आधे से अधिक क्षमता गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से आती है।

उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसे ऊर्जा तंत्र का निर्माण कर रहा है, जो लचीला, भविष्य के लिए तैयार, डिजिटल, विकेंद्रीकृत और उपभोक्ता-केंद्रित हो। उन्होंने यह भी बताया कि भारत ने अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के कई प्रमुख लक्ष्यों को समय से पहले हासिल किया है। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य भी निर्धारित किया है।

निवेश और परियोजनाओं के लिए आसान हुई मंजूरी प्रक्रिया

मनोहर लाल ने ऊर्जा क्षेत्र में नियामक सुधारों और निवेश को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी भी दी। उन्होंने नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम, PARIVESH और पीएम गति शक्ति जैसी पहलों का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि इन पहलों से बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए मंजूरी प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित और पूर्वानुमेय बनाने में मदद मिली है। साथ ही, प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और ऊर्जा क्षेत्र में निजी एवं अन्य भागीदारों की भागीदारी तथा निवेश को सुगम बनाने के लिए भी कई सुधार किए गए हैं।

महत्वपूर्ण खनिजों पर भारत का जोर

बैठक में महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल बुनियादी ढांचे और उभरती प्रौद्योगिकियों के दौर में महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित और विविधीकृत आपूर्ति अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने भारत के राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन का उल्लेख करते हुए बताया कि यह मिशन खनिजों की पूरी मूल

तालाबीरा II एवं III कोयला खदान: ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी नवाचार और सतत विकास की दिशा में भारत की नई उपलब्धि

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भारत सरकार के घरेलू कोयला उत्पादन और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के प्रयासों को नामित प्राधिकरण (Nominated Authority—NA) के तहत आवंटित और नीलाम की गई कोयला खदानों के माध्यम से और मजबूती मिल रही है। 2 मई 2016 को कोयला खान (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015 की अनुसूची III के तहत NLC India Ltd. को आवंटित तालाबीरा II एवं III ओपन कास्ट कोयला खदान ऐसी NA-आवंटित खदानों में शामिल है, जो उत्पादन, डिस्पैच, प्रौद्योगिकी अपनाने, सुरक्षा, पर्यावरण प्रबंधन, रोजगार और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में मजबूत प्रदर्शन कर रही है।

ओडिशा के संबलपुर और झारसुगुड़ा जिलों में स्थित यह खदान घरेलू कोयला उपलब्धता में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में तालाबीरा II एवं III ने 19.14 मिलियन टन (MT) का अब तक का सर्वाधिक वार्षिक कोयला उत्पादन दर्ज किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 11.28% की साल-दर-साल वृद्धि है। खदान ने 21 मार्च 2026 को 1,26,138.07 टन का सर्वाधिक दैनिक उत्पादन तथा मार्च 2026 में 3.39 MT का सर्वाधिक मासिक उत्पादन भी दर्ज किया।

उत्पादन के साथ-साथ खदान ने कोयला डिस्पैच में भी मजबूत प्रदर्शन किया। वित्त वर्ष 2025-26 में खदान ने 17.69 MT का अब तक का सर्वाधिक वार्षिक डिस्पैच हासिल किया। इसमें लगभग 10.72 MT बिजली क्षेत्र को तथा 6.97 MT गैर-विनियमित क्षेत्र को आपूर्ति किया गया। तालाबीरा II एवं III से प्राप्त कोयला कई राज्यों में स्थित विद्युत उत्पादन संयंत्रों को उपलब्ध कराया जाता है, जिनमें NTPC दर्लीपाली, NTPC गाडरवारा, NTPC खरगोन, NTPC कुडगी तथा ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के अन्य विद्युत संयंत्र शामिल हैं।

उत्पादन शुरू होने के बाद से खदान ने लगातार वृद्धि की है। 14 अगस्त 2026 तक संचयी कोयला उत्पादन 72.23 MT और संचयी डिस्पैच 70.89 MT तक पहुंच गया है। यह प्रदर्शन दर्शाता है कि सरकार के कोयला-ब्लॉक आवंटन ढांचे के तहत आवंटित कोयला संसाधनों को परिचालन में लाकर किस प्रकार ठोस परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

प्रौद्योगिकी के माध्यम से परिचालन दक्षता

तालाबीरा II एवं III में परिचालन दक्षता बढ़ाने में प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। डिजिटल लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट सिस्टम (DLMS) RFID आधारित वाहन सत्यापन, AI-सक्षम कैमरों तथा तकनीक-सक्षम प्रवेश और निकास द्वारों के माध्यम से कोयला परिवहन एवं डिस्पैच की एंड-टू-एंड डिजिटल निगरानी सुनिश्चित करता है।

DLMS लागू होने के बाद औसत एंट्री-गेट प्रोसेसिंग समय 1.42 मिनट से घटकर 0.54 मिनट प्रति वाहन हो गया, जबकि टैरे वेटमेंट का समय 1.34 मिनट से घटकर 0.48 मिनट रह गया। खदान में धूल-नियंत्रण प्रणाली से युक्त सरफेस माइनर्स, GPS आधारित फ्लीट मैनेजमेंट और जियो-फेंसिंग, GNSS रिसीवर के साथ 3D टेरेस्ट्रियल लेजर स्कैनिंग, ड्रोन आधारित सर्वेक्षण, मशीनीकृत ट्रक लोडिंग, निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन (CAAQMS) और CCTV निगरानी जैसी तकनीकों का भी उपयोग किया जा रहा है।

तालाबीरा II एवं III OCP में डिजिटल लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट सिस्टम (DLMS) का कार्यान्वयन कोयला परिवहन और डिस्पैच की एंड-टू-एंड डिजिटल निगरानी एवं नियंत्रण के लिए किया गया है।

पर्यावरण संरक्षण और सतत खनन

खदान के परिचालन प्रदर्शन के साथ जिम्मेदार और पर्यावरण-अनुकूल खनन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। खदान पट्टा क्षेत्र के भीतर 23.43 हेक्टेयर में पौधरोपण किया गया है, जिसमें 64,288 पौधे लगाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, पट्टा क्षेत्र के बाहर 29.48 हेक्टेयर में 65,202 पौधे लगाए गए हैं।

खदान में 11.68 kW की सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित की गई है, जिसमें आसपास के गांवों में सोलर स्ट्रीट लाइटिंग और खदान के बुनियादी ढांचे में सौर प्रकाश व्यवस्था शामिल है।

धूल नियंत्रण के लिए वेट ड्रिलिंग, जल छिड़काव, फॉग कैनन, फिक्स्ड स्प्रिंकलिंग सिस्टम, विंड बैरियर, ट्रक-वॉशिंग सिस्टम और मशीनीकृत सड़क सफाई जैसी व्यवस्थाएं अपनाई गई हैं।

सुरक्षा को प्राथमिकता

सुरक्षा खदान के प्रदर्शन का एक प्रमुख हिस्सा है। स्थापना के बाद से यहां कोई घातक दुर्घटना नहीं हुई है। सुरक्षा उपायों में सुरक्षा प्रबंधन योजना, बेहतर हॉल रोड एवं यातायात प्रबंधन, PPE अनुपालन, मजबूत ब्लास्टिंग प्रक्रियाएं, सुरक्षा प्रशिक्षण और ARAN Safety App के माध्यम से नियर-मिस रिपोर्टिंग शामिल हैं।

खदान को Annual Mines Safety Fortnight के तहत कई पुरस्कार एवं मान्यताएं प्राप्त हुई हैं। साथ ही, वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक लगातार पांच वर्षों में कोयला मंत्रालय के Star Rating Evaluation के तहत Five-Star Rating हासिल की गई है।

रोजगार और कौशल विकास

खदान का प्रभाव उत्पादन और ऊर्जा आपूर्ति तक सीमित नहीं है। तालाबीरा II एवं III से 3,277 रोजगार अवसर जुड़े हैं, जिनमें 1,277 प्रत्यक्ष और परिवहन तथा संबद्ध गतिविधियों के माध्यम से लगभग 2,000 अप्रत्यक्ष रोजगार शामिल हैं।

5 परियोजना प्रभावित व्यक्तियों (PAPs) को भुवनेश्वर स्थित Skill Development Institute में कौशल विकास प्रशिक्षण दिया गया है। इसके अलावा 101 ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को RSETI तथा PMKVY केंद्रों के माध्यम से सतत आजीविका से जुड़ी पहलों में प्रशिक्षित किया गया है।

सामुदायिक विकास और CSR

सामुदायिक विकास भी परियोजना के व्यापक प्रभाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वित्त वर्ष 2025-26 में ₹5.32 करोड़ का CSR व्यय किया गया, जिसके तहत स्वास्थ्य सेवा, पेयजल, शिक्षा, स्कूल परिवहन, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों और सौर प्रकाश व्यवस्था जैसी पहलों को समर्थन दिया गया।

स्वास्थ्य एवं रक्तदान शिविरों से लगभग 1,500 लोगों को लाभ मिला, जबकि टैंकरों के माध्यम से पेयजल आपूर्ति से लगभग 10,000 लोग लाभान्वित हुए।

वित्त वर्ष 2026-27 में जुलाई 2026 तक ₹4.20 करोड़ अतिरिक्त खर्च किए जा चुके हैं। इन पहलों में पेयजल आपूर्ति, स्वास्थ्य सेवाओं में सहायता, सौर प्रकाश व्यवस्था, स्कूल और आंगनवाड़ी बुनियादी ढांचा, ग्रामीण सड़कें, सामुदायिक सुविधाएं तथा जलाशयों के पुनरुद्धार जैसी गतिविधियां शामिल हैं।

तालाबीरा II एवं III OCP, NLC India Ltd. द्वारा आयोजित मेगा मेडिकल कैंप।

ऊर्जा सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान

2016 में आवंटन से लेकर उच्च क्षमता वाले निरंतर उत्पादन तक, तालाबीरा II एवं III ने यह प्रदर्शित किया है कि परिचालन में लाए गए कोयला संसाधन किस प्रकार घरेलू कोयला उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी आधारित खनन, सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, रोजगार सृजन और स्थानीय विकास में योगदान दे सकते हैं।

वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड उत्पादन और डिस्पैच, 72.23 MT के संचयी उत्पादन, 70.89 MT के संचयी डिस्पैच तथा इसके मापनीय सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय परिणामों के साथ, तालाबीरा II एवं III भारत की ऊर्जा सुरक्षा को आगे बढ़ाने तथा आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के व्यापक विजन को समर्थन देने वाले NA-आवंटित कोयला संसाधनों के प्रभाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरा है।

भारत में LPG सप्लाई बढ़ाने की तैयारी, सरकार ने रिफाइनरियों के लिए तय किए उत्पादन लक्ष्य

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नई दिल्ली- पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे पैदा हुई ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता के बीच भारत सरकार ने घरेलू LPG सप्लाई को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने सरकारी और निजी क्षेत्र की रिफाइनरियों तथा तेल कंपनियों के लिए LPG उत्पादन के अधिकतम दैनिक लक्ष्य तय किए हैं। इस कदम का उद्देश्य देश में खाना पकाने वाली गैस की उपलब्धता बनाए रखना, आयात पर निर्भरता के जोखिम को कम करना और भविष्य के लिए पर्याप्त बफर स्टॉक तैयार करना है।

63,810 मीट्रिक टन प्रतिदिन का उत्पादन लक्ष्य

13 अगस्त 2026 के सरकारी आदेश के अनुसार, देश की सरकारी और निजी रिफाइनरियों के लिए कुल 63,810 मीट्रिक टन LPG प्रतिदिन तक उत्पादन की क्षमता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है। रिपोर्टों के मुताबिक यह व्यवस्था 24 रिफाइनरी और अपस्ट्रीम तेल कंपनियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

सरकार ने कंपनियों को मौजूदा उत्पादन स्तर से आगे बढ़कर LPG उत्पादन बढ़ाने के लिए तकनीकी और आर्थिक रूप से संभव उपाय करने को कहा है। इसमें उपलब्ध फीडस्टॉक के वैकल्पिक इस्तेमाल जैसे उपाय भी शामिल हैं, ताकि अधिक मात्रा में LPG तैयार की जा सके।

पश्चिम एशिया संकट से क्यों बढ़ी चिंता?

भारत अपनी LPG जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। 2025-26 में देश में LPG की खपत करीब 33.2 मिलियन टन रही, जबकि घरेलू उत्पादन करीब 13.1 मिलियन टन था और लगभग 21.3 मिलियन टन LPG का आयात किया गया। यानी भारत की LPG जरूरतों में आयात की हिस्सेदारी 64 प्रतिशत से अधिक रही।

पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण समुद्री परिवहन और खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है। भारत के LPG आयात का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर आता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर घरेलू LPG उपलब्धता पर पड़ सकता है।

सरकार का फोकस—घरेलू उत्पादन और बफर स्टॉक

सरकार का नया फैसला सिर्फ उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। रिफाइनरियों और संबंधित कंपनियों को LPG की स्टोरेज और परिवहन क्षमता मजबूत करने पर भी ध्यान देने को कहा गया है। इसका मकसद किसी संभावित वैश्विक सप्लाई संकट के दौरान देश के पास पर्याप्त घरेलू भंडार उपलब्ध रखना है।

Reliance को मिला सबसे बड़ा उत्पादन लक्ष्य

निजी क्षेत्र की Reliance Industries को तय किए गए उत्पादन लक्ष्यों में सबसे बड़ा हिस्सा मिला है। इससे देश की LPG जरूरतों को पूरा करने में बड़े निजी रिफाइनरों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।

इससे पहले भी संकट के दौरान भारतीय रिफाइनरियों ने घरेलू LPG उत्पादन बढ़ाया था। मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में भारतीय रिफाइनरियों का LPG उत्पादन सालाना आधार पर 30.8 प्रतिशत बढ़कर करीब 1.4 मिलियन मीट्रिक टन हो गया था।

आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

सरकार का यह कदम मुख्य रूप से LPG की उपलब्धता और सप्लाई सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है। घरेलू उत्पादन बढ़ने और बफर स्टॉक मजबूत होने से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में अचानक आने वाली बाधाओं का असर कम करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि LPG की कीमतों में तत्काल कमी आ जाएगी। LPG की कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों, आयात लागत, परिवहन खर्च और सरकारी नीतियों समेत कई कारकों का असर पड़ता है। पश्चिम एशिया संकट के दौरान वैश्विक ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है।

अमेरिका से LPG आयात बढ़ाने की भी तैयारी

घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ भारत आयात के स्रोतों में भी विविधता लाने की कोशिश कर रहा है। Reuters की जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अमेरिका से LPG खरीद बढ़ाई है और जून में अमेरिकी LPG आयात पहली बार 10 लाख टन से अधिक पहुंच गया था। इसका उद्देश्य पश्चिम एशिया से होने वाली आपूर्ति पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को कम करना है।

ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में अहम कदम

सरकार द्वारा रिफाइनरी-वार LPG उत्पादन लक्ष्य तय करना भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में लंबे समय तक अस्थिरता रहने की स्थिति में घरेलू उत्पादन, वैकल्पिक आयात स्रोत, पर्याप्त भंडारण और मजबूत परिवहन व्यवस्था भारत को LPG सप्लाई में संभावित झटकों से बचाने में मदद कर सकती है।

कुल मिलाकर, सरकार का नया फैसला ‘घरेलू उत्पादन बढ़ाओ, आयात जोखिम घटाओ और बफर स्टॉक मजबूत करो’ की रणनीति पर आधारित है। आने वाले महीनों में इन उत्पादन लक्ष्यों को किस तरह लागू किया जाता है, यह देश में LPG की उपलब्धता और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण होगा।

एसईसीएल की दीपका ओपनकास्ट परियोजना बनी भारत के कोयला क्षेत्र की नई पहचान, उत्पादन, लाभ और सतत विकास में स्थापित किए नए मानक

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रायपुर- साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की दीपका ओपनकास्ट (OCP) परियोजना आज भारत के कोयला खनन क्षेत्र में हुए उल्लेखनीय परिवर्तन का सशक्त उदाहरण बनकर उभरी है। वर्ष 1992 में मात्र 10 लाख टन कोयला उत्पादन करने वाली यह परियोजना आज देश की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक खदानों में शामिल है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में परियोजना ने 37.5 मिलियन टन (एमटी) का रिकॉर्ड कोयला उत्पादन तथा 39.43 मिलियन टन कोयला प्रेषण (डिस्पैच) कर नया कीर्तिमान स्थापित किया।

हाल ही में परियोजना को 40 मिलियन टन प्रतिवर्ष (MTPA) की पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance) प्राप्त हुई है। साथ ही 60 MTPA तक क्षमता विस्तार के स्पष्ट रोडमैप के साथ दीपका परियोजना उत्पादन, दक्षता और पर्यावरणीय संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण बन चुकी है।

वित्तीय वर्ष 2026-27 की शानदार शुरुआत

पिछले वर्ष के रिकॉर्ड प्रदर्शन के बाद दीपका परियोजना ने चालू वित्तीय वर्ष की भी मजबूत शुरुआत की है।

25 जुलाई 2026 तक परियोजना ने 12.66 मिलियन टन कोयला उत्पादन कर निर्धारित लक्ष्य का 104 प्रतिशत हासिल किया। पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में उत्पादन में 30.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो खदान की बेहतर उत्पादकता और मशीनों के प्रभावी उपयोग को दर्शाती है।

इसी अवधि में 13.87 मिलियन टन कोयले का डिस्पैच किया गया, जो निर्धारित लक्ष्य का 109 प्रतिशत है। इससे देश के ताप विद्युत संयंत्रों और औद्योगिक उपभोक्ताओं को निर्बाध कोयला आपूर्ति सुनिश्चित हुई।

उत्पादन के साथ लाभप्रदता में भी उल्लेखनीय वृद्धि

दीपका परियोजना केवल उत्पादन ही नहीं बल्कि वित्तीय प्रदर्शन में भी अग्रणी रही है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में परियोजना ने 3,230.91 करोड़ रुपये का लाभ अर्जित किया, जिससे यह SECL के सबसे अधिक लाभ देने वाले परियोजनाओं में शामिल हो गई।

बेहतर लागत प्रबंधन और परिचालन दक्षता के कारण प्रति टन लाभ बढ़कर 827 रुपये पहुंच गया। इससे यह साबित हुआ कि बड़े पैमाने पर उत्पादन के साथ लागत नियंत्रण भी प्रभावी ढंग से संभव है।

भविष्य की उत्पादन क्षमता के लिए मजबूत आधार

दीर्घकालीन उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास कार्यों को प्राथमिकता दी गई है।

मालगांव का सफल अधिग्रहण होने के बाद अब हरदी बाजार क्षेत्र में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R) का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। परियोजना प्रभावित परिवारों के लिए आधुनिक पुनर्वास नगर विकसित किया जा रहा है, जहां सड़क, विद्यालय, स्वास्थ्य सुविधाएं, सामुदायिक भवन और अन्य नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

इस पारदर्शी और सहभागी मॉडल से खनन के लिए भूमि उपलब्ध कराने के साथ-साथ स्थानीय समुदाय का विश्वास भी मजबूत हुआ है।

बेहतर आधारभूत संरचना से तेज हुआ कोयला परिवहन

दीपका परियोजना के पास कोयला परिवहन की अत्याधुनिक व्यवस्था उपलब्ध है।

परियोजना में एमजीआर (MGR) आधारित साइलो, फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी (FMC) साइलो, रेलवे लोडिंग प्रणाली तथा सड़क परिवहन का एकीकृत नेटवर्क विकसित किया गया है।

इस व्यवस्था के माध्यम से एनटीपीसी सीपत सहित पश्चिमी एवं मध्य भारत के कई ताप विद्युत संयंत्रों तक समय पर कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।

आधुनिक तकनीक से बढ़ी उत्पादकता

दीपका परियोजना ने आधुनिक तकनीकों को अपनाकर उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है।

परियोजना में 42 घनमीटर क्षमता वाले इलेक्ट्रिक रोप शोवेल, उच्च क्षमता के सरफेस माइनर, इन-पिट बेल्ट कन्वेयर, आधुनिक साइलो लोडिंग प्रणाली, ड्रोन आधारित निगरानी तथा डिजिटल माइन मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जा रहा है।

इन तकनीकों से खदान की योजना, निगरानी और मशीनों की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

पर्यावरण संरक्षण के साथ जिम्मेदार खनन

दीपका परियोजना ने यह सिद्ध किया है कि अधिक उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ संभव हैं।

परियोजना में Continuous Ambient Air Quality Monitoring System (CAAQMS), फॉग कैनन आधारित धूल नियंत्रण, व्हील वॉशिंग सिस्टम, वृहद वृक्षारोपण अभियान, इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग तथा प्लास्टिक अपशिष्ट पुनर्चक्रण जैसी अनेक पर्यावरणीय पहलें लागू की गई हैं।

डिजिटल पर्यावरण निगरानी प्रणाली के माध्यम से नियामकीय अनुपालन और पारदर्शिता भी सुनिश्चित की जा रही है।

40 MTPA से आगे 60 MTPA की ओर बढ़ता कदम

हाल ही में प्राप्त 40 MTPA पर्यावरणीय स्वीकृति दीपका परियोजना के विकास की अंतिम मंजिल नहीं बल्कि अगले विस्तार चरण की शुरुआत है।

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, आधुनिक आधारभूत संरचना और उन्नत तकनीक के सहारे परियोजना अब 60 MTPA उत्पादन क्षमता हासिल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

दीपका ओपनकास्ट परियोजना आज वैज्ञानिक खनन, तकनीकी नवाचार, वित्तीय अनुशासन और पर्यावरणीय जिम्मेदारी का उत्कृष्ट उदाहरण बन चुकी है। SECL की यह प्रमुख परियोजना उत्पादन, लाभप्रदता, परिचालन दक्षता और सतत विकास के नए मानक स्थापित करते हुए देश की ऊर्जा सुरक्षा को लगातार मजबूत कर रही है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘समुद्र मंथन’ राष्ट्रीय अपतटीय (ऑफशोर) अन्वेषण योजना को मंजूरी दी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कल ‘समुद्र मंथन’ (Samudra Manthan) राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को मंजूरी दी। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस केंद्रीय क्षेत्र की योजना (Central Sector Scheme) के लिए वित्त वर्ष 2030–31 तक ₹84,084 करोड़ का प्रावधान किया गया है। यह अब तक का भारत का सबसे महत्वाकांक्षी अपतटीय तेल एवं गैस अन्वेषण अभियान है।

यह निर्णय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश के हाइड्रोकार्बन अन्वेषण एवं उत्पादन क्षेत्र में किए गए व्यापक सुधारों की श्रृंखला का महत्वपूर्ण परिणाम है।

‘समुद्र मंथन’ योजना इन सुधारों को जमीन पर उतारते हुए भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की दिशा में एक नया अध्याय शुरू करती है।

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है और हर वर्ष लगभग 144 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब ₹13 लाख करोड़) का कच्चा तेल आयात करता है। हाल की वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने यह स्पष्ट किया है कि तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा संसाधनों की सुरक्षित और निर्बाध उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है।

आने वाले दशकों में भारत की ऊर्जा मांग लगातार बढ़ने की संभावना है। ऐसे में घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन बढ़ाना आयात पर निर्भरता कम करने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और दीर्घकालिक आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है।

सरकार द्वारा किए गए प्रमुख सुधार

वर्ष 2014 से सरकार ने हाइड्रोकार्बन अन्वेषण एवं उत्पादन क्षेत्र में कई संरचनात्मक सुधार किए हैं—

  1. ऑफशोर क्षेत्रों को खोलना – पहले प्रतिबंधित ("नो-गो") क्षेत्रों में से लगभग 99% क्षेत्र खोल दिए गए, जिससे भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में पहली बार अन्वेषण संभव हुआ।

  2. अनुबंध प्रणाली में सुधार – उत्पादन साझेदारी अनुबंध (Production Sharing Contract) की जगह राजस्व साझेदारी अनुबंध (Revenue Sharing Contract) लागू किया गया, जिससे पारदर्शिता बढ़ी और प्रशासनिक हस्तक्षेप कम हुआ।

  3. विधायी सुधार – ऑयलफील्ड्स (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) संशोधन अधिनियम, 2025 के माध्यम से कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाया गया, अनुबंधीय स्थिरता सुनिश्चित की गई तथा विवाद समाधान व्यवस्था को मजबूत किया गया।

  4. नए नियमों का कार्यान्वयन – पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियम, 2025 लागू कर कारोबार को आसान बनाया गया और नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल किया गया।

  5. समान निर्णय प्रणाली – सभी अनुबंध व्यवस्थाओं के लिए सशक्त सचिव समिति (Empowered Committee of Secretaries) की संरचना और अधिकारों को एकरूप बनाया गया।

  6. अन्वेषण पर विशेष जोर – ओएनजीसी और ऑयल इंडिया के प्रदर्शन मानकों में बदलाव कर अन्वेषण गतिविधियों को प्राथमिकता दी गई।

क्यों जरूरी है यह योजना?

तेल एवं गैस का अन्वेषण अत्यधिक पूंजी-गहन और लंबी अवधि वाली प्रक्रिया है। किसी ब्लॉक के आवंटन से व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने में सामान्यतः 5 से 10 वर्ष लगते हैं।

इसके अलावा, मौजूदा तेल एवं गैस क्षेत्रों का उत्पादन हर वर्ष लगभग 6–7% स्वाभाविक रूप से घटता है। इसलिए नई खोजें और निरंतर अन्वेषण आवश्यक हैं।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए सरकार ने अन्वेषण-आधारित विकास (Exploration-led Growth) की रणनीति अपनाई है।

‘समुद्र मंथन’ योजना की प्रमुख विशेषताएं

इस योजना के तहत सरकार गहरे समुद्र (Deepwater) में खोजी कुओं की ड्रिलिंग लागत का अधिकतम 50% वहन करेगी। इससे निवेशकों का जोखिम कम होगा, निजी निवेश बढ़ेगा और भारत की अपतटीय हाइड्रोकार्बन क्षमता का तेजी से विकास होगा।

भारत की भविष्य की तेल एवं गैस संभावनाएं मुख्य रूप से कृष्णा-गोदावरी, कावेरी, महानदी तथा अंडमान जैसे गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में हैं। यहां एक खोजी कुएं की ड्रिलिंग पर लगभग 125–150 मिलियन अमेरिकी डॉलर का खर्च आता है।

इसीलिए सरकार जोखिम-साझेदारी (Risk Sharing) मॉडल अपनाकर अन्वेषण को प्रोत्साहित करेगी।

₹84,084 करोड़ की योजना के चार प्रमुख घटक

  1. आधुनिक अपतटीय भूकंपीय (Seismic) डेटा संग्रह एवं प्रसंस्करण – ₹28,534 करोड़

  2. 60 गहरे समुद्री खोजी कुओं की ड्रिलिंग – ₹43,200 करोड़

    • सरकार पात्र लागत का अधिकतम 50% या ₹675 करोड़ प्रति कुआं (जो भी कम हो) सहायता देगी।

  3. साझा अपतटीय अवसंरचना (Common Offshore Infrastructure Hubs) – ₹10,000 करोड़

  4. ऑयल एवं गैस विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र (Manufacturing & Services Zones) – ₹2,000 करोड़

इसके अतिरिक्त योजना के निगरानी, डिजिटल हस्तक्षेप, मानव संसाधन, जन-जागरूकता एवं मूल्यांकन जैसे कार्यों के लिए ₹350 करोड़ का प्रावधान किया गया है।

संभावित लाभ

यदि अन्वेषण सफल रहता है तो इस योजना से—

  • भारत का घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन 62 MMTOE से बढ़कर 80 MMTOE प्रतिवर्ष हो सकता है।

  • देश का हाइड्रोकार्बन संसाधन आधार 1.6 अरब टन तेल समतुल्य (TOE) से बढ़कर 2.2 अरब TOE तक पहुंच सकता है।

  • कच्चे तेल के आयात में हर वर्ष लगभग ₹1 लाख करोड़ की कमी आने की संभावना है।

  • भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और आयात पर दीर्घकालिक निर्भरता घटेगी।

बेहतर डेटा, जोखिम-साझेदारी, साझा अवसंरचना और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देकर ‘समुद्र मंथन’ योजना भारत को गहरे समुद्र में तेल एवं गैस अन्वेषण तथा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पहल सिद्ध होगी।

नीति आयोग ने ‘शांति अधिनियम, 2025’ के कार्यान्वयन पर हितधारक परामर्श बैठक आयोजित की

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नीति आयोग ने 10 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के समरसता ऑडिटोरियम में ‘शांति अधिनियम, 2025’ (SHANTI Act, 2025) के कार्यान्वयन पर एक हितधारक परामर्श (Stakeholder Consultation) आयोजित किया। इस बैठक में सरकार, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग जगत के प्रमुख नीति-निर्माताओं, विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों ने भाग लेकर इस ऐतिहासिक अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए परिचालन ढांचे (Operational Framework) पर विचार-विमर्श किया।

बैठक की अध्यक्षता प्रो. अभय करंदीकर, सदस्य, नीति आयोग ने की। इस अवसर पर पंकज अग्रवाल (सचिव, विद्युत मंत्रालय), घनश्याम प्रसाद (अध्यक्ष, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण), गुरदीप सिंह (सीएमडी, एनटीपीसी लिमिटेड), डॉ. अंशु भारद्वाज (कार्यक्रम निदेशक, नीति आयोग), राजनाथ राम (सलाहकार, नीति आयोग), डॉ. गरिमा शर्मा (प्रमुख, एसएसएसडी, परमाणु ऊर्जा विभाग) तथा  हरि कुमार (विशिष्ट वैज्ञानिक एवं निदेशक, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड) सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया।

तकनीकी चर्चाओं को अधिनियम के सफल कार्यान्वयन के लिए तीन प्रमुख स्तंभों में विभाजित किया गया:

1. विधायी एवं नियामकीय ढांचा (Legislative & Regulatory Framework):

इस सत्र में शांति अधिनियम, 2025 के मसौदा नियमों, विनियमों तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से संबंधित प्रावधानों पर चर्चा हुई। साथ ही अधिनियम के तहत वैधानिक अनुपालन (Statutory Compliance) की रूपरेखा प्रस्तुत की गई और इस बात पर विचार किया गया कि घरेलू हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए विदेशी निवेश को कैसे आकर्षित किया जा सकता है।

2. वित्त, बीमा एवं जनधारणा (Finance, Insurance & Public Perception):

हितधारकों ने अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक वित्तीय तंत्र तथा जोखिम-प्रबंधन व्यवस्था पर विचार-विमर्श किया। दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए उपयुक्त बीमा व्यवस्था, जन-जागरूकता बढ़ाने, स्थानीय समुदायों का विश्वास मजबूत करने तथा परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के प्रति व्यापक जन-स्वीकृति विकसित करने की रणनीतियों पर भी चर्चा हुई।

3. विनिर्माण, संचालन एवं क्षमता निर्माण (Manufacturing, Operations & Capacity Building):

इस सत्र में अधिनियम के क्रियान्वयन चरण पर विशेष ध्यान दिया गया। घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने, परिचालन तैयारियों को सुनिश्चित करने, कुशल मानव संसाधन विकसित करने, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को अधिक सुदृढ़ बनाने तथा उद्योग के विस्तार के लिए विशेष क्षमता निर्माण कार्यक्रम तैयार करने पर विचार किया गया।

बैठक के दौरान हितधारकों ने इन तीनों प्रमुख विषयों पर अपने महत्वपूर्ण सुझाव और विचार साझा किए। इन सुझावों से ‘शांति अधिनियम, 2025’ के कार्यान्वयन ढांचे को और अधिक प्रभावी, मजबूत एवं व्यावहारिक बनाने में सहायता मिलेगी।

ब्रिक्स 2026 की अध्यक्षता में भारत ग्लोबल साउथ को देगा ऊर्जा सुरक्षा का नेतृत्व: प्रधानमंत्री मोदी

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर द्वारा लिखे गए एक लेख को साझा करते हुए कहा कि ब्रिक्स (BRICS) 2026 की अध्यक्षता के दौरान भारत का लक्ष्य ग्लोबल साउथ को सुरक्षित, लचीले, न्यायसंगत और सतत वैश्विक ऊर्जा भविष्य के केंद्र में स्थापित करना है।

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स (X) पर कहा कि भारत का मानना है कि मजबूत और टिकाऊ ऊर्जा प्रणाली केवल प्रभावी घरेलू नीतियों से ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मजबूत वैश्विक साझेदारी से भी निर्मित होती है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अपने लेख में स्पष्ट किया है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और वैश्विक सहयोग के माध्यम से विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत की ब्रिक्स 2026 अध्यक्षता के दौरान ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग, नवाचार और सतत विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ ग्लोबल साउथ की आवाज़ को वैश्विक मंच पर और अधिक प्रभावी बनाने पर विशेष जोर दिया जाएगा।

सरकार का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारी भविष्य की वैश्विक चुनौतियों से निपटने और सभी देशों के लिए सुरक्षित एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

मध्य-पूर्व में आपूर्ति सामान्य होने के बाद उद्योगों को फिर मिली एलपीजी की पूरी आपूर्ति

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नई दिल्ली- केंद्र सरकार ने देश के वाणिज्यिक (Commercial) और औद्योगिक (Industrial) उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी (LPG) की आपूर्ति को फिर से सामान्य स्तर पर बहाल कर दिया है। यह फैसला मध्य-पूर्व में आपूर्ति की स्थिति में सुधार के बाद लिया गया है।

हाल ही में मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति बाधित होने के कारण सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देते हुए वाणिज्यिक एवं औद्योगिक क्षेत्रों के लिए पैक्ड एलपीजी की आपूर्ति पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए थे। अब हालात सामान्य होने के बाद ये प्रतिबंध हटा दिए गए हैं।

सरकार के इस निर्णय से होटल, रेस्तरां, छोटे उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को राहत मिलेगी, क्योंकि उन्हें अब पहले की तरह नियमित एलपीजी आपूर्ति उपलब्ध होगी।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश में एलपीजी की उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था पर लगातार नजर रखी जा रही है, ताकि किसी भी क्षेत्र में ईंधन की कमी न हो और आवश्यक सेवाएं सुचारु रूप से संचालित होती रहें।

अमेरिका-ईरान वार्ता में प्रगति, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर तनाव कम होने के संकेत

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अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में हुई उच्चस्तरीय वार्ता में सकारात्मक प्रगति देखने को मिली है। दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने कई अहम मुद्दों पर चर्चा की और मध्यस्थ देशों ने बताया कि अगले 60 दिनों के भीतर एक व्यापक समझौते की दिशा में रोडमैप तैयार किया गया है।

यह वार्ता ऐसे समय में हुई जब दुनिया की निगाहें होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर टिकी हुई हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हाल के महीनों में क्षेत्रीय तनाव और नौवहन संबंधी बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ गई थी।

वार्ता में प्रगति की खबर सामने आते ही वैश्विक बाजारों ने राहत की सांस ली। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि एशियाई शेयर बाजारों में तेजी देखी गई। निवेशकों को उम्मीद है कि यदि दोनों देशों के बीच समझौता आगे बढ़ता है, तो ऊर्जा आपूर्ति पर मंडरा रहा संकट काफी हद तक कम हो सकता है।

ईरान ने दावा किया है कि उसे तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण लाभ मिले हैं, वहीं अमेरिका ने क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षित समुद्री यातायात सुनिश्चित करने पर जोर दिया है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच अभी कई संवेदनशील मुद्दों पर अंतिम सहमति बनना बाकी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रगति मध्य पूर्व में तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए आने वाले सप्ताह बेहद अहम होंगे। 

कोयला मंत्रालय के रोडशो में कोयला गैसीफिकेशन को लेकर बड़े निवेश और ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर जोर

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नई दिल्ली- कोयला मंत्रालय ने नई दिल्ली में “सरफेस कोल/लिग्नाइट गैसीफिकेशन परियोजनाओं के संवर्धन” योजना पर एक सफल रोडशो का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों, उद्योग जगत के नेताओं, तकनीकी प्रदाताओं, निवेशकों और वित्तीय संस्थानों की बड़ी भागीदारी देखी गई।

कार्यक्रम में केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि राज्य मंत्री सतिश चंद्र दुबे  विशिष्ट अतिथि रहे। साथ ही मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

कोयला गैसीफिकेशन को बताया रणनीतिक मिशन

केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने अपने संबोधन में कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारत आत्मनिर्भर और भविष्य-उन्मुख ऊर्जा प्रणाली की ओर तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि कोयला गैसीफिकेशन केवल एक ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक राष्ट्रीय मिशन है।

उन्होंने बताया कि सरकार ने इस क्षेत्र के लिए ₹8,500 करोड़ की प्रोत्साहन योजना शुरू की है और हाल ही में ₹37,500 करोड़ की अतिरिक्त वित्तीय सहायता को मंजूरी दी गई है। इससे लगभग ₹2.5 लाख करोड़ तक के निवेश आकर्षित होने की उम्मीद है।

आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर

मंत्री ने कहा कि कोयला गैसीफिकेशन से भारत की LNG, मेथनॉल, अमोनिया और उर्वरकों जैसे महत्वपूर्ण उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम होगी। इससे किसानों, उद्योगों और उपभोक्ताओं को वैश्विक मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा मिलेगी।

उन्होंने कहा कि यह तकनीक उर्वरक, पेट्रोकेमिकल्स, हाइड्रोजन और उन्नत निर्माण जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा करेगी और देश को स्वच्छ कोयला तकनीक में वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जाएगी।

रोजगार और औद्योगिक विकास को बढ़ावा

राज्य मंत्री सतिश चंद्र दुबे ने कहा कि यह योजना देश की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगी। उन्होंने बताया कि यह पहल विशेष रूप से कोयला-समृद्ध और पिछड़े क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करेगी और औद्योगिक विकास को गति देगी।

भारत को वैश्विक ऊर्जा हब बनाने की दिशा

कोयला सचिव विक्रम देव दत्त ने कहा कि भारत अपने प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम और समझदारीपूर्ण उपयोग कर रहा है। उन्होंने कहा कि कोयला गैसीफिकेशन के जरिए भारत सिंथेटिक गैस, अमोनिया, यूरिया, हाइड्रोजन और स्टील उत्पादन जैसे क्षेत्रों में आयात निर्भरता को कम कर सकता है।

उन्होंने यह भी बताया कि यह योजना लगभग 25 परियोजनाओं के माध्यम से करीब 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित कर सकती है।

भविष्य की ऊर्जा रणनीति पर फोकस

कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव और भू-राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए भारत को अपनी घरेलू क्षमताओं को मजबूत करना आवश्यक है। रोडशो में उद्योग जगत और निवेशकों के साथ तकनीकी, वित्तीय और नीति संबंधी मुद्दों पर विस्तृत चर्चा भी हुई।

मंत्रालय ने कहा कि कोयला गैसीफिकेशन को “आत्मनिर्भर भारत” और “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में विकसित किया जाएगा।


SECL दौरे में कोयला उत्पादन, डिजिटलीकरण और ऊर्जा सुरक्षा पर जोर, छत्तीसगढ़ सीएम से हुई अहम चर्चा

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केंद्रीय कोयला एवं खान राज्य मंत्री, भारत सरकार, सतीश चंद्र दुबे ने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) का एक दिवसीय दौरा किया, जिसके दौरान उन्होंने कंपनी के परिचालन प्रदर्शन, बुनियादी ढांचा पहलों और भविष्य की विकास योजनाओं की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने रायपुर में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से भी मुलाकात की, जिसमें कोयला उत्पादन, अवसंरचना विकास, लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी, ऊर्जा सुरक्षा और राज्य में औद्योगिक विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

बैठक में केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय को मजबूत करने, प्रमुख विकास परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने, संचालन को सुगम बनाने और कोयला-समृद्ध क्षेत्रों में आर्थिक विकास तथा रोजगार के नए अवसर सृजित करने पर विशेष जोर दिया गया। मंत्री ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा कोयला क्षेत्र के विकास में दिए जा रहे निरंतर सहयोग की सराहना की और विश्वास व्यक्त किया कि यह सहयोगात्मक दृष्टिकोण राज्य की ऊर्जा सुरक्षा में योगदान को और मजबूत करेगा।

SECL मुख्यालय में आयोजित समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते हुए मंत्री ने कोयला उत्पादन, डिस्पैच, गुणवत्ता प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था, डिजिटलीकरण, पर्यावरणीय स्थिरता उपायों, कोल गैसीफिकेशन परियोजनाओं, माइन क्लोजर गतिविधियों, CSR पहलों और कंपनी की भविष्य की कार्ययोजनाओं की समीक्षा की। इस बैठक में SECL के सीएमडी हरिश दुहन, कार्यकारी निदेशक, मुख्य सतर्कता अधिकारी, कोयला मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी और SECL के अधिकारी उपस्थित रहे।

मंत्री ने सुरक्षित और सतत खनन प्रक्रियाओं, आधुनिक तकनीकों के उपयोग और परिचालन दक्षता बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि SECL भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और उत्पादन, गुणवत्ता, सुरक्षा मानकों तथा पर्यावरण प्रबंधन में कंपनी के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने यह भी कहा कि CSR गतिविधियों को कोयला क्षेत्र में रहने वाले लोगों के समावेशी विकास और कल्याण पर केंद्रित रहना चाहिए।

इस अवसर पर SECL के सीएमडी हरिश दुहन ने बताया कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 में SECL ने कोल इंडिया के 100 मिलियन टन के संचयी उत्पादन लक्ष्य में 26.86 मिलियन टन का सर्वाधिक योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि कंपनी कोयला मंत्रालय के मार्गदर्शन में देश की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है।

SECL की डिजिटल परिवर्तन पहल के तहत मंत्री ने ई-डैडास (e-DADAS – Design and Drawings Approval in SECL) पोर्टल और अस्पताल प्रबंधन एवं सूचना प्रणाली (HMIS) पोर्टल का शुभारंभ किया। ई-डैडास पोर्टल प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से संबंधित इंजीनियरिंग डिज़ाइन और ड्रॉइंग के ऑनलाइन मूल्यांकन, निगरानी और अनुमोदन को सुगम बनाएगा, जिससे पारदर्शिता और समयबद्ध कार्यान्वयन सुनिश्चित होगा। वहीं HMIS पोर्टल अस्पतालों में मरीजों के रिकॉर्ड और प्रबंधन प्रणाली के डिजिटलीकरण के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करेगा।

दौरे के दौरान दुबे ने बिलासपुर स्थित इंदिरा विहार स्वास्थ्य केंद्र में अत्याधुनिक 5-पार्ट हेमेटोलॉजी एनालाइज़र यूनिट का भी उद्घाटन किया। यह उन्नत स्वचालित परीक्षण क्षमता से युक्त मशीन तेज और अधिक सटीक रक्त परीक्षण सुनिश्चित करेगी तथा स्वास्थ्य सेवाओं की निदान दक्षता को बढ़ाएगी। मंत्री ने स्वास्थ्य केंद्र की सुविधाओं की समीक्षा भी की और SECL द्वारा चिकित्सा अवसंरचना एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के प्रयासों की सराहना की।



सीएमपीडीआई के प्रदर्शन की समीक्षा बैठक में मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने खनन क्षेत्र में सुधार एवं आत्मनिर्भर भारत पर दिया जोर

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केंद्रीय कोयला एवं खान राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने 14 मई 2026 को रांची में सीएमपीडीआई के प्रदर्शन की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। इस समीक्षा बैठक में सीएमपीडीआई के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक चौधरी शिवराज सिंह, सीसीएल के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक नीलेंदु कुमार सिंह, एमईसीएल के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक आई. डी. नारायण, सीएमपीडीआई के तकनीकी निदेशक तथा सीएमपीडीआई, सीसीएल और एमईसीएल के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

समीक्षा के दौरान वर्ष 2025-26 में सीएमपीडीआई द्वारा अन्वेषण, प्रतिवेदन तैयार करना, पूंजीगत व्यय, अनुसंधान एवं विकास परियोजनाएं, कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व पहल तथा सौर परियोजनाओं के विभिन्न क्षेत्रों में किए गए कार्यों की जानकारी प्रस्तुत की गई। साथ ही वर्ष 2026-27 के लक्ष्यों पर भी चर्चा की गई।

मंत्री ने सीएमपीडीआई के प्रदर्शन की सराहना करते हुए स्वच्छ कोयला प्रौद्योगिकियों तथा महत्वपूर्ण खनिजों के रणनीतिक अन्वेषण के महत्व पर बल दिया, जो देश की भविष्य की ऊर्जा एवं आर्थिक सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने खरीद प्रक्रियाओं को सरल बनाने, पारदर्शिता बढ़ाने तथा परियोजनाओं में देरी रोकने के लिए बाजार पहुंच में सुधार करने और अधिक बोलीदाताओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

मंत्री ने यह भी कहा कि खदान बंदी गतिविधियों को स्थानीय समुदायों के लिए स्थायी सामाजिक-आर्थिक अवसरों में बदला जाना चाहिए। उन्होंने पुनः प्राप्त खनन क्षेत्रों में मखाना की खेती और मत्स्य पालन को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि इसे सरकार की “एक जिला, एक उत्पाद” पहल से जोड़ा जा सके। यह दूरदर्शी पहल परित्यक्त खनन क्षेत्रों को कृषि एवं जलीय कृषि परिसंपत्तियों में बदलकर स्थानीय लोगों को दीर्घकालिक और सतत आर्थिक सहायता प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करेगी।

बैठक के दौरान सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड तथा मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड के बीच कोयला तथा ऊर्जा एवं गैर-ऊर्जा खनिजों के अन्वेषण के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देने हेतु 14 मई 2026 को एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। यह समझौता केंद्रीय कोयला एवं खान राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे की उपस्थिति में संपन्न हुआ।

यह संयुक्त अन्वेषण गतिविधियां देश में कोयला एवं अन्य खनिजों के राष्ट्रीय भंडार को बढ़ाने तथा नई खदानों के विकास को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

यह पहल आत्मनिर्भर भारत के विजन को साकार करने, भारत की खनिज संपदा के विकास को गति देने तथा खनिज क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

भारत में स्वदेशी टाइप-IV CNG कंपोजिट सिलेंडर निर्माण सुविधा स्थापित करने हेतु TDB और NTF Energy Solutions के बीच समझौता

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भारत सरकार के स्वच्छ ऊर्जा गतिशीलता को बढ़ावा देने, कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने तथा आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत स्वदेशी विनिर्माण को सशक्त करने के दृष्टिकोण के अनुरूप, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार ने दिल्ली स्थित M/s NTF Energy Solutions Private Limited के साथ “टाइप-IV CNG सिलेंडर के व्यावसायीकरण हेतु विनिर्माण सुविधा की स्थापना” नामक परियोजना के लिए एक समझौता किया है।

इस परियोजना का उद्देश्य उन्नत विनिर्माण सुविधा स्थापित करना है, जिसके माध्यम से अत्याधुनिक फिलामेंट वाइंडिंग, ब्लो मोल्डिंग और उच्च-दबाव परीक्षण तकनीकों का उपयोग कर स्वदेशी रूप से विकसित टाइप-IV कंपोजिट CNG सिलेंडरों का उत्पादन और व्यावसायीकरण किया जाएगा। यह पहल स्वच्छ परिवहन और उभरते ऊर्जा अनुप्रयोगों के लिए उन्नत गैस भंडारण प्रणालियों में भारत की घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

टाइप-IV कंपोजिट सिलेंडर पारंपरिक इस्पात सिलेंडरों का अगली पीढ़ी का विकल्प हैं, जो लगभग 75% तक वजन में कमी प्रदान करते हैं, जिससे वाहन की दक्षता बढ़ती है और कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आती है। इन सिलेंडरों में जंग-रोधी पॉलिमर लाइनर, अनुकूलित CFRP ले-अप और उन्नत मैकेनिकल लॉकिंग सिस्टम का उपयोग किया गया है, जो सुरक्षा, टिकाऊपन तथा रिसाव, कंपन और दबाव चक्रों के प्रति प्रतिरोध को बढ़ाते हैं। इनका डिज़ाइन 600 बार से अधिक बर्स्ट प्रेशर प्राप्त करता है, जो नियामक मानकों से काफी अधिक है और संचालन सुरक्षा को मजबूत बनाता है।

यह तकनीक NTF Energy Solutions Pvt. Ltd. द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित की गई है और इसे भारत के तेजी से बढ़ते CNG मोबिलिटी इकोसिस्टम को समर्थन देने के लिए डिजाइन किया गया है। यह परियोजना सरकार के स्वच्छ परिवहन, स्वच्छ ईंधन और उन्नत मोबिलिटी घटकों के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के व्यापक लक्ष्य के अनुरूप है।

प्रस्तावित सुविधा स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल और उन्नत विनिर्माण प्रक्रियाओं का उपयोग कर उच्च-दबाव कंपोजिट सिलेंडरों के लिए एक लागत-प्रतिस्पर्धी और भविष्य-उन्मुख उत्पादन प्रणाली विकसित करेगी। यह परियोजना आयात प्रतिस्थापन, तकनीकी आत्मनिर्भरता और देश में एक मजबूत स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगी।

इस अवसर पर TDB के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा, “उन्नत टाइप-IV कंपोजिट सिलेंडरों का विकास और व्यावसायीकरण भारत के स्वच्छ गतिशीलता ढांचे और स्वदेशी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। NTF Energy Solutions को TDB का समर्थन सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके तहत वह सतत परिवहन, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत में योगदान देने वाली अगली पीढ़ी की तकनीकों को सक्षम बना रही है।”

NTF Energy Solutions Pvt. Ltd. के प्रबंध निदेशक नवीन जैन और निदेशक नमन जैन ने TDB के समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया और कहा कि यह सहायता स्वदेशी हल्के कंपोजिट सिलेंडर तकनीकों के व्यावसायीकरण को तेज करेगी, जिससे कंपनी भारत के स्वच्छ और अधिक दक्ष गतिशीलता समाधान की दिशा में संक्रमण में योगदान दे सकेगी।

रूस के बाद भारत बनेगा फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करने वाला दूसरा देश: डॉ. जितेंद्र सिंह

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केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि रूस के बाद भारत दुनिया का दूसरा देश होगा जो व्यावसायिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करेगा। “स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स” विषय पर सांसदों और विधायकों की कार्यशाला को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि भारत ने तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का विकास कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, जिसने 6 अप्रैल 2026 को पहली बार क्रिटिकलिटी प्राप्त की।

यह रिएक्टर Indira Gandhi Centre for Atomic Research (IGCAR) द्वारा विकसित और BHAVINI द्वारा निर्मित है। यह भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत को दर्शाता है। इसमें यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड ईंधन का उपयोग होता है, जो जितना ईंधन खर्च करता है उससे अधिक उत्पन्न करता है। इस उपलब्धि के साथ भारत अपने विशाल थोरियम भंडार के उपयोग की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता तरुण चुघ ने की। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह उपलब्धि भारत को परमाणु रणनीति के तीसरे चरण में थोरियम के उपयोग की दिशा में ले जाती है। पूरी तरह संचालन में आने के बाद भारत, रूस के बाद, व्यावसायिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर चलाने वाला दूसरा देश बन जाएगा।

वर्तमान में केवल रूस ही व्यावसायिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित कर रहा है, जबकि भारत अपने रिएक्टर के कमीशनिंग के उन्नत चरण में है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, जर्मनी और चीन जैसे कई देशों ने पहले प्रयोगात्मक फास्ट रिएक्टर विकसित किए थे, लेकिन इनमें से अधिकांश कार्यक्रम अब बंद हो चुके हैं।

मंत्री ने कहा कि प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की स्थापना भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो परमाणु ईंधन के अधिक कुशल उपयोग को सक्षम बनाता है और थोरियम के उपयोग का मार्ग प्रशस्त करता है।

उन्होंने यह भी कहा कि फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तकनीक में केवल कुछ ही देशों ने प्रगति की है, जिससे भारत को वैश्विक स्तर पर एक विशेष स्थान मिलता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने जोर देकर कहा कि परमाणु ऊर्जा भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और दीर्घकालिक स्थिरता लक्ष्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, खासकर 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने में।

उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को भविष्य में निरंतर और विश्वसनीय स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता होगी, जहां परमाणु ऊर्जा अपरिहार्य होगी।

मंत्री ने स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs), नीतिगत समर्थन और SHANTI एक्ट जैसी पहलों के महत्व पर भी प्रकाश डाला, जो निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देंगे। “न्यूक्लियर मिशन” के तहत 20,000 करोड़ रुपये के निवेश के साथ 2033 तक 5 SMRs स्थापित करने की योजना है।

उन्होंने कहा कि SMRs उद्योगों, घनी आबादी वाले क्षेत्रों, दूरदराज के इलाकों और ग्रिड से दूर क्षेत्रों में बिजली उत्पादन के लिए उपयोगी होंगे।

अंत में, उन्होंने कहा कि परमाणु, नवीकरणीय और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का संतुलित मिश्रण 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

कोयला मंत्रालय ने 15वें दौर की वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी की शुरुआत की

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नई दिल्ली: विक्रम देव दत्त  सचिव, कोयला मंत्रालय   ने 15वें दौर की वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी की शुरुआत की। इस अवसर पर अतिरिक्त सचिव रूपिंदर बरार, कोल कंट्रोलर सजीश कुमार एन सहित मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और अन्य हितधारक उपस्थित रहे।

इस दौर में कुल 11 कोयला ब्लॉकों की नीलामी की जा रही है, जिनमें 7 पूरी तरह से अन्वेषित और 4 आंशिक रूप से अन्वेषित खदानें शामिल हैं। इनमें से 3 खदानें कोल माइंस (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 2015 के तहत और 8 खदानें माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957 के तहत पेश की गई हैं। इसके अलावा 13वें दौर के दूसरे प्रयास में 6 खदानें भी शामिल की गई हैं।

ये खदानें झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में स्थित हैं, जिससे निवेश बढ़ने, घरेलू कोयला उत्पादन में वृद्धि और रोजगार के अवसर सृजित होने की उम्मीद है।

अब तक कोयला मंत्रालय 13 दौरों में 135 कोयला खदानों की सफल नीलामी कर चुका है, जिसकी कुल उत्पादन क्षमता लगभग 325 मिलियन टन प्रतिवर्ष है।

अपने संबोधन में विक्रम देव दत्त ने कहा कि कोयला क्षेत्र में किए गए सुधार प्रधानमंत्री Narendra Modi के पारदर्शिता और दक्षता के विजन के अनुरूप हैं। उन्होंने बताया कि 2020 में शुरू की गई वाणिज्यिक कोयला खनन व्यवस्था ने इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाया है, जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी और प्रतिस्पर्धा बढ़ी है।

उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा के लिए घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाने, कोयला गैसीकरण जैसी स्वच्छ तकनीकों को अपनाने और वैज्ञानिक खदान बंद करने (माइन क्लोजर) पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने CSR गतिविधियों के माध्यम से कोयला क्षेत्रों में सामुदायिक विकास को मजबूत करने की बात कही।



अतिरिक्त सचिव रूपिंदर बरार ने भी सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक हितों के संतुलन पर जोर देते हुए कोयला क्षेत्र में नवाचार और निवेश को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।

कार्यक्रम के दौरान तकनीक, नवाचार, कोयला गैसीकरण, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। हितधारकों ने मिलकर एक आधुनिक, जिम्मेदार और आत्मनिर्भर कोयला क्षेत्र के निर्माण की दिशा में विचार-विमर्श किया।

कोयला मंत्रालय का यह कदम देश में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, निवेश बढ़ाने और कोयला क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम: ऊर्जा सुरक्षा हेतु कोयला—15वें वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी चरण का शुभारंभ

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कोयला मंत्रालय 17 अप्रैल 2026 को “आत्मनिर्भर भारत: ऊर्जा सुरक्षा के लिए कोयला” विषय पर एक हितधारक परामर्श (Stakeholder Consultation) आयोजित करने जा रहा है, साथ ही वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामी के 15वें चरण का शुभारंभ भी किया जाएगा। यह कार्यक्रम मुंबई में आयोजित होगा, जिसमें श्री विक्रम देव दत्त, सचिव, कोयला मंत्रालय मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। यह पहल भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने और आत्मनिर्भर राष्ट्र के विजन को आगे बढ़ाने के प्रति मंत्रालय की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

वाणिज्यिक कोयला खदान नीलामियों की उल्लेखनीय सफलता को आगे बढ़ाते हुए, कोयला मंत्रालय देश के ऊर्जा परिदृश्य को मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वाणिज्यिक कोयला खनन की शुरुआत के बाद से घरेलू कोयले की उपलब्धता में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिली है।

आगामी 15वां चरण इसी प्रगतिशील यात्रा को आगे बढ़ाता है। इसमें कोयला खदानों को अत्यंत उदार शर्तों पर उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस को बढ़ावा मिले, विविध निवेश आकर्षित हों और उद्योग की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हो। इस चरण में पूरी तरह से अन्वेषित (fully explored) और आंशिक रूप से अन्वेषित (partially explored) कोयला ब्लॉकों की पेशकश की जाएगी, जिसमें अनुभवी खनन कंपनियों के साथ-साथ नए और तकनीक-आधारित उद्यमों को भी भाग लेने का अवसर मिलेगा।

यह पहल कोयला क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने, निवेश को प्रोत्साहित करने, रोजगार सृजन और समग्र क्षेत्रीय विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। वाणिज्यिक कोयला खनन ढांचे ने पारदर्शिता को बढ़ाया है, प्रतिस्पर्धा को मजबूत किया है और सभी प्रतिभागियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित किए हैं। इसके परिणामस्वरूप घरेलू उद्योगों के लिए कोयले की उपलब्धता बढ़ी है और आयात पर निर्भरता कम हुई है, जो आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के अनुरूप है।

वाणिज्यिक कोयला खनन देश की आर्थिक प्रगति का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है, जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई है और विभिन्न उद्योगों के लिए कोयले की स्थिर और विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित हुई है। आने वाला चरण इस मजबूत नींव को और सुदृढ़ करेगा और क्षेत्र के उज्ज्वल भविष्य में विश्वास को बढ़ाएगा।

कोयला मंत्रालय देश को विश्वसनीय और किफायती ऊर्जा उपलब्ध कराने के साथ-साथ सतत विकास, नवाचार और दीर्घकालिक स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

स्वदेशी तकनीक की जीत: भारत का PFBR रिएक्टर हुआ सफल

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भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में, 500 मेगावाट (MWe) प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने 6 अप्रैल 2026 को रात 08:25 बजे सफलतापूर्वक पहली क्रिटिकलिटी (नियंत्रित विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया की शुरुआत) हासिल की। यह देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और स्वदेशी परमाणु तकनीक को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह उपलब्धि डॉ. अजीत कुमार मोहंती (सचिव, परमाणु ऊर्जा विभाग एवं अध्यक्ष, परमाणु ऊर्जा आयोग), श्रीकुमार जी. पिल्लई (निदेशक, IGCAR), अल्लू अनंत (CMD-इन-चार्ज, BHAVINI) और  के.वी. सुरेश कुमार (पूर्व CMD, BHAVINI) की उपस्थिति में हासिल की गई। यह सभी मानकों को पूरा करने के बाद संभव हुआ, जिन्हें परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) ने कठोर सुरक्षा समीक्षा के बाद मंजूरी दी थी।

PFBR का डिजाइन और तकनीकी विकास पूरी तरह से इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) द्वारा किया गया, जो परमाणु ऊर्जा विभाग का एक अनुसंधान केंद्र है। इसका निर्माण और संचालन भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) द्वारा किया गया।

फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत की दीर्घकालिक परमाणु रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पारंपरिक रिएक्टरों के विपरीत, PFBR में यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग होता है। इसके कोर के चारों ओर यूरेनियम-238 की परत होती है, जो तेज न्यूट्रॉन की मदद से प्लूटोनियम-239 में परिवर्तित हो जाती है। इससे रिएक्टर जितना ईंधन उपयोग करता है, उससे अधिक उत्पन्न करने में सक्षम होता है।

इस रिएक्टर को भविष्य में थोरियम-232 के उपयोग के लिए भी डिजाइन किया गया है, जो परिवर्तित होकर यूरेनियम-233 बनेगा और भारत के परमाणु कार्यक्रम के तीसरे चरण को ऊर्जा प्रदान करेगा।

यह क्षमता देश के सीमित यूरेनियम संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करती है और भविष्य में थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन का मार्ग प्रशस्त करती है।

पहली क्रिटिकलिटी हासिल करने के साथ ही भारत अपने तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को साकार करने के और करीब पहुंच गया है। फास्ट ब्रीडर तकनीक वर्तमान रिएक्टरों और भविष्य के थोरियम आधारित रिएक्टरों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती है।

यह उपलब्धि भारत की स्वदेशी डिजाइन, इंजीनियरिंग और निर्माण क्षमता को दर्शाती है। इस रिएक्टर में उन्नत सुरक्षा प्रणाली, उच्च तापमान तरल सोडियम कूलिंग तकनीक और क्लोज्ड फ्यूल साइकिल का उपयोग किया गया है, जिससे परमाणु सामग्री का पुनर्चक्रण संभव होता है और अपशिष्ट कम होता है।

यह परियोजना वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और उद्योग सहयोगियों के समर्पण का परिणाम है, जिन्होंने स्वदेशी तकनीकों और उपकरणों के माध्यम से इसका निर्माण किया। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में देश की बढ़ती तकनीकी क्षमता को भी दर्शाता है।

ऊर्जा उत्पादन के अलावा, यह कार्यक्रम परमाणु ईंधन चक्र, उन्नत सामग्री, रिएक्टर भौतिकी और बड़े पैमाने की इंजीनियरिंग में देश की रणनीतिक क्षमता को मजबूत करता है।

जैसे-जैसे भारत स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विश्वसनीय, कम-कार्बन और उच्च दक्षता वाली ऊर्जा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

पहली क्रिटिकलिटी की यह उपलब्धि न केवल एक तकनीकी मील का पत्थर है, बल्कि “विकसित भारत” के लिए एक सतत और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य की दिशा में बड़ा कदम भी है।


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