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मध्य-पूर्व में आपूर्ति सामान्य होने के बाद उद्योगों को फिर मिली एलपीजी की पूरी आपूर्ति

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नई दिल्ली- केंद्र सरकार ने देश के वाणिज्यिक (Commercial) और औद्योगिक (Industrial) उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी (LPG) की आपूर्ति को फिर से सामान्य स्तर पर बहाल कर दिया है। यह फैसला मध्य-पूर्व में आपूर्ति की स्थिति में सुधार के बाद लिया गया है।

हाल ही में मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति बाधित होने के कारण सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देते हुए वाणिज्यिक एवं औद्योगिक क्षेत्रों के लिए पैक्ड एलपीजी की आपूर्ति पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए थे। अब हालात सामान्य होने के बाद ये प्रतिबंध हटा दिए गए हैं।

सरकार के इस निर्णय से होटल, रेस्तरां, छोटे उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को राहत मिलेगी, क्योंकि उन्हें अब पहले की तरह नियमित एलपीजी आपूर्ति उपलब्ध होगी।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश में एलपीजी की उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था पर लगातार नजर रखी जा रही है, ताकि किसी भी क्षेत्र में ईंधन की कमी न हो और आवश्यक सेवाएं सुचारु रूप से संचालित होती रहें।

बिजली दरों में संशोधन से आम उपभोक्ताओं पर न्यूनतम असर

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41 लाख घरेलू उपभोक्ताओं को राहत

14.5 लाख परिवारों को अब भी मिल रही मुफ्त बिजली

सिंचाई पम्प धारी कृषकों पर कोई अतिरिक्त भार नहीं

सब्सिडी, सौर ऊर्जा एवं राहत योजनाओं से अधिकांश उपभोक्ताओं को संरक्षण

रायपुर- छत्तीसगढ़ में विद्युत टैरिफ के वार्षिक संशोधन के बावजूद  छत्तीसगढ़ सरकार ने आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त भार को न्यूनतम रखने के लिए कई स्तरों पर राहत और संरक्षण की व्यवस्था की है। विद्युत नियामक आयोग द्वारा वर्ष 2026-27 के लिए औसतन 6.23 प्रतिशत अर्थात लगभग 42 पैसे प्रति यूनिट की वृद्धि स्वीकृत की गई है, लेकिन राज्य में मुख्यमंत्री ऊर्जा राहत योजना, बिजली बिल समाधान योजना और पीएम सूर्यघर योजना जैसी पहलों के कारण अधिकांश उपभोक्ताओं पर इसका प्रभाव काफी सीमित रहेगा।

गौरतलब है कि विद्युत दरों का निर्धारण छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा किया जाता है, जो एक स्वतंत्र वैधानिक संस्था है। आयोग विद्युत कंपनियों की वार्षिक राजस्व आवश्यकता, उत्पादन लागत, कोयला, ट्रांसमिशन तथा वितरण व्यय सहित विभिन्न आर्थिक पहलुओं का अध्ययन कर दरों का निर्धारण करता है। नए टैरिफ में घरेलू उपभोक्ताओं की दरों में 30 से 50 पैसे प्रति यूनिट तक की वृद्धि की गई है। हालांकि मुख्यमंत्री ऊर्जा राहत योजना के कारण प्रदेश के अधिकांश परिवारों पर इसका अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा।

प्रदेश में लगभग 51 लाख घरेलू उपभोक्ता हैं। इनमें से 14.5 लाख बीपीएल परिवारों को 30 यूनिट तक बिजली निःशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है, जिसका पूरा खर्च राज्य सरकार वहन कर रही है। इसके अलावा 26.5 लाख ऐसे उपभोक्ता, जिनकी मासिक खपत 400 यूनिट तक है, उन्हें 200 यूनिट तक की खपत पर 50 प्रतिशत तक की छूट दी जा रही है। इन राहतों के कारण लगभग 41 लाख घरेलू उपभोक्ताओं पर बिजली दर वृद्धि का प्रभाव शून्य से लेकर मात्र 3.65 प्रतिशत तक ही होगा।

किसानों पर अतिरिक्त व्यय भार नहीं

राज्य के 8.65 लाख कृषि उपभोक्ताओं के लिए ऊर्जा प्रभार में 40 पैसे प्रति यूनिट की वृद्धि की गई है, लेकिन इसकी प्रतिपूर्ति राज्य शासन द्वारा सब्सिडी के रूप में किए जाने के कारण किसानों पर इसका अतिरिक्त वित्तीय भार नहीं पड़ेगा। कृषि पंपों के स्थायी प्रभार को भी यथावत रखा गया है।

सौर ऊर्जा से हजारों परिवारों का बिल हुआ शून्य

ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा संचालित पीएम सूर्यघर योजना का छत्तीसगढ़ राज्य में तेजी से क्रियान्वयन किया जा रहा है। अब तक लगभग 66 हजार उपभोक्ता इस योजना का लाभ प्राप्त कर चुके हैं, जिनमें से 16 हजार परिवारों का बिजली बिल शून्य हो गया है। वर्तमान में लगभग 89 हजार घरों में सौर संयंत्र स्थापित करने का कार्य प्रगति पर है। राज्य सरकार ने आगामी वर्षों में 5 लाख घरों में सोलर प्लांट लगाने का लक्ष्य रखा है, जिससे बिजली उपभोग की लागत में कमी आएगी।

बिजली बिल समाधान योजना से मिली बड़ी राहत

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार द्वारा 12 मार्च 2026 से मुख्यमंत्री बिजली बिल समाधान योजना लागू की गई है। इस योजना के तहत बीपीएल, घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं को बकाया बिजली बिलों में विशेष राहत प्रदान की जा रही है।

बीपीएल उपभोक्ताओं को मूल बकाया राशि में 75 प्रतिशत तथा संपूर्ण सरचार्ज में छूट दी जा रही है। वहीं घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं को मूल राशि में 50 प्रतिशत तथा पूरे सरचार्ज में छूट का लाभ मिल रहा है। इसके साथ ही शेष राशि को अधिकतम 60 किस्तों में जमा करने की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। योजना के तहत अब तक 6 लाख बीपीएल, 1.5 लाख घरेलू तथा 33 हजार कृषि उपभोक्ताओं ने आवेदन किया है। लगभग 1328 करोड़ रुपये के बकाया देयकों का समाधान किया जा चुका है, जिसमें 749 करोड़ रुपये की राहत उपभोक्ताओं को दी गई है।

उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने पर भी जोर

राज्य में औद्योगिक निवेश और रोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए स्टील उद्योगों को लोड फैक्टर पर मिलने वाली 25 प्रतिशत छूट को पूर्ववत जारी रखा गया है। इससे राज्य के उद्योग अन्य राज्यों की तुलना में प्रतिस्पर्धात्मक बने रहेंगे और उत्पादन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

आदिवासी क्षेत्रों के छात्रावासों को विशेष राहत

बस्तर एवं सरगुजा आदिवासी विकास प्राधिकरण क्षेत्रों में संचालित छात्रावासों को गैर-घरेलू श्रेणी से घरेलू श्रेणी में शामिल कर विशेष राहत प्रदान की गई है। इससे इन संस्थानों के संचालन व्यय में कमी आएगी।

कम बिजली खर्च करने का नया अवसर

10 किलोवाट से अधिक भार वाले घरेलू, गैर-घरेलू, औद्योगिक तथा सार्वजनिक उपयोगिता उपभोक्ताओं को ऑफ-पीक समय (सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक) बिजली उपयोग पर 5 प्रतिशत तक की छूट दी जाएगी। वहीं पीक आवर्स में 5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क निर्धारित किया गया है। इससे उपभोक्ताओं को अपनी बिजली खपत का बेहतर प्रबंधन करने का अवसर मिलेगा।

ऊर्जा अधोसंरचना को मजबूत करने बड़ा निवेश

राज्य सरकार बिजली उत्पादन और वितरण व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है। वर्तमान में 2×660 मेगावाट क्षमता के सुपरक्रिटिकल ताप विद्युत संयंत्र का कार्य प्रारंभ किया जा चुका है, जिसकी पहली इकाई मार्च 2029 तक शुरू होने की संभावना है। इसके अलावा मड़वा में 800 मेगावाट क्षमता के नए विद्युत संयंत्र की योजना पर भी कार्य चल रहा है।

आगामी वर्षों में 400/132 केवी के 4, 220/132 केवी के 17 तथा 132/33 केवी के 34 नए उपकेंद्र स्थापित किए जाएंगे। वहीं वितरण व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 106 नए 33/11 केवी उपकेंद्रों का निर्माण जारी है तथा लगभग 300 अतिरिक्त उपकेंद्र स्थापित करने की योजना बनाई गई है।

उपभोक्ता हित और व्यवस्था दोनों का संतुलन

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती उत्पादन एवं वितरण लागत, पूर्व वर्षों के वित्तीय दायित्वों तथा विद्युत अधोसंरचना विस्तार की आवश्यकताओं को देखते हुए किया गया यह संशोधन सीमित दायरे का है। राज्य सरकार ने सब्सिडी, राहत योजनाओं और सौर ऊर्जा कार्यक्रमों के माध्यम से आम उपभोक्ताओं पर इसका प्रभाव न्यूनतम रखने का प्रयास किया है।

कोयला गैसीफिकेशन मिशन में बड़ी उपलब्धि

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कोयला मंत्रालय ने भारत के कोयला गैसीफिकेशन मिशन को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। ₹8,500 करोड़ की वित्तीय प्रोत्साहन योजना (Financial Incentive Scheme) के तहत राउंड-II की कैटेगरी-III में लेटर ऑफ अवॉर्ड (LoA) जारी किया गया है।

इस अवसर पर  संजय कुमार झा अतिरिक्त सचिव (कोयला मंत्रालय) ने कार्तिकेय वायुनंदना प्राइवेट लिमिटेड को महाराष्ट्र के गडचिरोली में कोल-टू-एसेटिक एसिड प्लांट स्थापित करने के लिए LoA सौंपा।

प्रोजेक्ट की मुख्य बातें:

  • 💰 कुल निवेश: ₹793 करोड़

  • 🏭 उत्पादन: एसेटिक एसिड

  • ⚙️ क्षमता: 75,900 टन प्रति वर्ष (TPA)

  • 📍 स्थान: गडचिरोली, महाराष्ट्र

यह परियोजना घरेलू कोयले के वैल्यू-एडेड उपयोग की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

योजना की प्रगति

  • पहले राउंड में 7 परियोजनाएं पहले से कार्यान्वयन में हैं।

  • राउंड-II के तहत कैटेगरी-II और III में निवेश को बढ़ावा देने के लिए RFP आमंत्रित किए गए हैं।

कैटेगरी-III के तहत:

  • प्रति प्रोजेक्ट ₹100 करोड़ तक या

  • कुल लागत (Capex) का 15% (जो कम हो) तक वित्तीय सहायता दी जाती है।

क्या होगा फायदा?

  • घरेलू केमिकल उत्पादन को बढ़ावा

  • आयात पर निर्भरता में कमी

  • आत्मनिर्भर भारत को मजबूती

  • स्वच्छ और कुशल कोयला उपयोग से टिकाऊ औद्योगिक विकास

यह पहल भारत में सस्टेनेबल इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम बनाने और कोयले के बेहतर उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

न्यू मैंगलोर पोर्ट के बर्थ-9 के पुनर्विकास को मंजूरी, ₹438 करोड़ की परियोजना

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नई दिल्ली- भारत के बंदरगाह अवसंरचना को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने न्यू मैंगलोर पोर्ट अथॉरिटी (NMPA) के बर्थ नंबर 9 के पुनर्विकास के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह परियोजना PPP मॉडल (DBFOT आधार) पर लागू की जाएगी। इसकी स्वीकृति 25 मार्च 2026 को प्रदान की गई।

परियोजना की मुख्य बातें

यह परियोजना पुराने ढांचे को हटाकर आधुनिक सुविधाओं के साथ बर्थ नंबर 9 का पुनर्निर्माण करेगी, जिससे क्रूड ऑयल, पेट्रोलियम उत्पाद (POL) और LPG जैसे तरल कार्गो का संचालन किया जा सकेगा।

  • ड्राफ्ट गहराई: 10.5 मीटर से बढ़ाकर 14 मीटर (भविष्य में 19.8 मीटर तक)

  • जहाज क्षमता: 2 लाख DWT तक, जिसमें VLGC जहाज शामिल

लागत और समयसीमा

  • कुल लागत: ₹438.29 करोड़

  • निर्माण अवधि: 2 वर्ष

  • कुल कंसेशन अवधि: 30 वर्ष

क्षमता

  • कुल क्षमता: 10.90 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA)

  • न्यूनतम गारंटीकृत कार्गो (MGC): 7.63 MTPA (5वें वर्ष तक)

प्रमुख लाभ

  • लगभग 50 साल पुराने ढांचे का आधुनिकीकरण

  • बड़े जहाजों के संचालन से लॉजिस्टिक्स लागत में कमी

  • ऑटोमेशन और आधुनिक मशीनरी से कार्यक्षमता में वृद्धि

  • उन्नत सुरक्षा और अग्निशमन प्रणाली

रणनीतिक महत्व

यह परियोजना कर्नाटक और केरल के क्षेत्रों में व्यापार को बढ़ावा देगी, ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत करेगी और न्यू मैंगलोर पोर्ट को एक महत्वपूर्ण समुद्री हब के रूप में स्थापित करेगी।

मंत्री का बयान

मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि यह परियोजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में समुद्री क्षेत्र के आधुनिकीकरण का हिस्सा है और इससे भारत वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत स्थिति बनाएगा।


परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा: आयात पर शून्य कस्टम ड्यूटी

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परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आवश्यक वस्तुओं के आयात पर शून्य सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) लागू करने से देश में परमाणु ऊर्जा के विकास की गति तेज होने की उम्मीद है। साथ ही, इससे परियोजनाओं की कुल लागत और प्रति यूनिट बिजली की लागत में कमी आएगी, जिससे ऐसे प्रोजेक्ट अधिक व्यवहार्य बनेंगे, विशेष रूप से वे जिनमें विदेशी सहयोग और आयात की अधिक भागीदारी होती है।

लोकसभा में रमेश अवस्थी और रवि किशन द्वारा पूछे गए एक अतारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी दी।

मंत्री ने बताया कि वर्ष 2035 तक परमाणु ईंधन और रिएक्टर घटकों पर सीमा शुल्क में छूट से परियोजना लागत और बिजली उत्पादन लागत दोनों में कमी आएगी, जिससे परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार होगा।

700 मेगावाट के दस नए स्वीकृत प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) इकाइयों के लिए घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के संबंध में मंत्री ने बताया कि न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) ने कई कदम उठाए हैं। इनमें निरंतरता बनाए रखने के लिए थोक ऑर्डर देना, आवश्यक सहयोग के साथ विक्रेता आधार का विस्तार करना, आयात के स्थान पर स्वदेशी उपकरणों को बढ़ावा देना, कुछ उपकरणों को श्रेणी-1 स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के लिए आरक्षित करना तथा MSME को प्रोत्साहित करने और उन्हें निविदाओं में प्राथमिकता देने के लिए विक्रेता मीट आयोजित करना शामिल है।

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में अनुसंधान एवं विकास के लिए बढ़ी हुई फंडिंग के बारे में मंत्री ने कहा कि इसका उपयोग आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से बहु-विषयक प्रौद्योगिकी विकास में किया जा रहा है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में नए अनुसंधान रिएक्टरों का विकास, विशेष रूप से कैंसर उपचार के लिए आइसोटोप उत्पादन सुविधाएं, उन्नत रिएक्टर तकनीक जैसे स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) और हाइड्रोजन उत्पादन, एक्सेलेरेटर तकनीक, लेजर आधारित अनुप्रयोग तथा उन्नत सामग्री और विनिर्माण तकनीक शामिल हैं।

मंत्री ने आगे बताया कि वर्तमान में तटीय राज्यों में प्रस्तावित परमाणु पार्कों के निर्माण और लॉजिस्टिक्स को प्रधानमंत्री गति शक्ति ढांचे के साथ जोड़ने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

सरकार ने कोयला उपयोग में पारदर्शिता व दक्षता बढ़ाने हेतु CoalSETU नीति को मंजूरी दी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की केंद्रीय मंत्रिमंडल समिति (CCEA) ने आज CoalSETU (Seamless, Efficient & Transparent Utilisation) नीति के तहत कोयला लिंकज की नीलामी की मंजूरी दे दी है। इसके लिए NRS (गैर-नियामित क्षेत्र) लिंकज नीति में “CoalSETU विंडो” नामक एक नया प्रावधान जोड़ा जाएगा। इस नई नीति का उद्देश्य किसी भी औद्योगिक उपयोग और निर्यात के लिए कोयले के पारदर्शी और कुशल उपयोग को बढ़ावा देना है। यह नीति कोयला क्षेत्र में सरकार द्वारा किए जा रहे सुधारों की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण कदम है।

नीति की मुख्य विशेषताएँ

  • नई नीति के तहत NRS लिंकज नीति 2016 में CoalSETU विंडो जोड़ी जाएगी।

  • इस विंडो के माध्यम से किसी भी घरेलू खरीदार को कोयला लिंकज की दीर्घकालिक नीलामी में भाग लेने की अनुमति होगी।

  • इस विंडो में कोकिंग कोयला की पेशकश नहीं की जाएगी।

  • ट्रेडर्स को इस नई विंडो में भाग लेने की अनुमति नहीं होगी।

मौजूदा नीति की तुलना में बड़ा बदलाव

वर्तमान NRS लिंकज नीति केवल सीमित उद्योगों—सीमेंट, स्टील (कोकिंग), स्पंज आयरन, एल्युमिनियम आदि—तक सीमित थी। इन्हें केवल नियत एंड-यूज़ के लिए ही कोयला मिलता था।
लेकिन अब बदलते बाज़ार परिदृश्य और Ease of Doing Business को ध्यान में रखते हुए:

  • कोयला लिंकज को बिना किसी एंड-यूज़ प्रतिबंध के उपलब्ध कराया जाएगा,

  • जिससे घरेलू उद्योगों को कोयला उपलब्धता बढ़ेगी,

  • आयातित कोयले पर निर्भरता कम होगी,

  • और देश के कोयला भंडार का तेज उपयोग संभव होगा।

यह संशोधन उन सुधारों के अनुरूप है, जिनके तहत वाणिज्यिक खनन के लिए भी एंड-यूज़ प्रतिबंध हटाए गए थे।

नई विंडो की विशेष शर्तें

  • कोयला लिंकज का उपयोग स्वयं की खपत, निर्यात (50% तक) या कोयला धुलाई (वॉशिंग) के लिए किया जा सकेगा।

  • कोयले की देश के भीतर पुनर्विक्रय (resale) की अनुमति नहीं होगी।

  • लिंकज धारक अपनी समूह कंपनियों के बीच कोयले का लचीला उपयोग कर सकेंगे।

  • वाशरी ऑपरेटरों को लिंकज देने से भविष्य में धोया हुआ कोयला (washed coal) अधिक उपलब्ध होगा, जिससे आयात कम होंगे।

  • धोया हुआ कोयला विदेशों में भी निर्यात किया जा सकेगा।

NRS की मौजूदा नीलामी जारी रहेगी

निर्दिष्ट उद्योगों (सीमेंट, स्टील आदि) के लिए मौजूदा कोयला लिंकज नीलामी जारी रहेगी।
वे उद्योग भी चाहें तो CoalSETU विंडो में भाग ले सकते हैं।


पेट्रोलियम उद्योग में बड़ा बदलाव: श्रम संहिताओं से सुरक्षा और कल्याण को नई दिशा

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मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • ओएसएचडब्ल्यूसी कोड, 2020 (OSHWC Code) पेट्रोलियम यूनिट्स, रिफ़ाइनरी से लेकर फ़्यूल डिपो तक सभी को एक एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचे के अंतर्गत लाता है।

  • अनिवार्य मेडिकल सर्विलांस, कौशल-आधारित प्रशिक्षण व प्रमाणन, आधुनिक सुरक्षा मानक, और आपातकालीन तैयारी के माध्यम से श्रमिक सुरक्षा को और मजबूत किया गया है।

  • सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 ESIC कवरेज का विस्तार करता है और डिजिटल, सरल अनुपालन प्रक्रिया लागू करता है, जिससे पेट्रोलियम क्षेत्र में कल्याणकारी प्रावधानों और प्रशासन में सुधार होता है।

परिचय (Introduction)

भारत सरकार ने चार श्रम संहिताओं —

  1. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियाँ संहिता 2020 (OSHWC),

  2. सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020,

  3. औद्योगिक संबंध संहिता 2020,

  4. वेतन संहिता 2019 —
    के माध्यम से श्रम क़ानूनों में ऐतिहासिक सुधार किए हैं।

ये सुधार औद्योगिक प्रतिष्ठानों में सुरक्षा, कार्य परिस्थितियों और सामाजिक सुरक्षा के लिए एक समग्र, समन्वित एवं आधुनिक ढाँचा स्थापित करते हैं। पेट्रोलियम उद्योग, जो उच्च-जोखिम वाले पदार्थों का संचालन करता है, इस एकीकृत ढाँचे से विशेष रूप से लाभान्वित होगा।

नई श्रम संहिताओं के लागू होने के साथ, पेट्रोलियम उद्योग विखंडित और निरीक्षक-प्रधान व्यवस्था से निकलकर एकीकृत, अनुपालन-उन्मुख और तकनीक-सक्षम प्रणाली की ओर बढ़ रहा है। यह संहिताएँ पेट्रोलियम के पूरे मूल्य-श्रृंखला — अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम तक — को कवर करती हैं।

पेट्रोलियम उद्योग के विनियामक ढाँचे में परिवर्तन

पेट्रोलियम उद्योग देश के सबसे खतरनाक एवं सुरक्षा-संवेदी क्षेत्रों में से है। यहाँ अत्यधिक ज्वलनशील हाइड्रोकार्बन, हाइड्रोजन सल्फ़ाइड जैसे विषैले गैस, बेंजीन वाष्प, LNG, LPG, उच्च तापमान वाले प्रोसेस फ्लुइड्स आदि लगातार संभाले जाते हैं, जिससे थर्मल रेडिएशन और एक्सपोज़र संबंधी बीमारियों का खतरा रहता है।

पहले सुरक्षा व्यवस्था का आधार मुख्यतः फ़ैक्टरी अधिनियम, 1948 पर था, जो आधुनिक पेट्रोलियम जोखिमों के लिए पर्याप्त नहीं था। इसमें:

  • सीमित मेडिकल निगरानी,

  • बिखरी हुई आपातकालीन आवश्यकताएँ,

  • धीमी और अप्रभावी प्रवर्तन प्रणाली,

  • कागज़-आधारित रिकॉर्ड,

  • बहु-विभागीय अनुमतियाँ

जैसी समस्याएँ थीं। पाइपलाइनों, रिटेल आउटलेट्स, स्टोरेज हब आदि के लिए अलग-अलग विभागों से अनुमतियाँ लेनी पड़ती थीं।

OSHWC कोड, 2020 के प्रमुख प्रावधान

OSHWC कोड, 2020 पेट्रोलियम उद्योग के लिए एकीकृत, जोखिम-आधारित और राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचा स्थापित करता है। सभी पेट्रोलियम यूनिट्स एक ही सुरक्षा प्रणाली के अंतर्गत आती हैं।

1. अनिवार्य जोखिम आकलन और परिचालन अनुमोदन

  • जोखिम पहचान और HIRA आधारित अनुमोदन।

  • खतरनाक कार्य शुरू करने से पहले सरकारी अनुमति अनिवार्य।

  • भंडारण, परिवहन, संचालन आदि के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा मानक।

  • डिजिटल अनुपालन, जोखिम-आधारित निरीक्षण और आधुनिक सुरक्षा ऑडिट।

2. बेहतर श्रमिक सुरक्षा

  • जाँच केवल समय-समय पर नहीं, बल्कि

    • नियुक्ति-पूर्व,

    • आवधिक,

    • एक्सपोज़र के बाद मेडिकल परीक्षण अनिवार्य।

  • खतरनाक कार्य में लगे श्रमिकों के लिए वार्षिक मुफ्त स्वास्थ्य परीक्षण।

3. कौशल-आधारित प्रशिक्षण और आधुनिक सुरक्षा उपकरण

  • पेट्रोलियम/रसायन संभालने से पहले प्रमाणित प्रशिक्षण अनिवार्य।

  • सुरक्षा उपकरणों के मानक आधुनिक और बाध्यकारी बनाए गए।

  • सतत-प्रक्रिया संयंत्रों में 8 घंटे की शिफ़्ट सीमा लागू।

4. आपातकालीन तैयारी और श्रमिक अधिकार

  • ऑन-साइट इमरजेंसी प्लान अब कागज़ी औपचारिकता नहीं, बल्कि कानूनी रूप से लागू प्रणाली।

  • नियमित मॉक ड्रिल अनिवार्य।

  • श्रमिकों को खतरनाक कार्य से इनकार करने का अधिकार।

  • गर्भवती महिलाओं और किशोरों के लिए विशेष सुरक्षा प्रावधान।

5. निरीक्षण की बजाय सुविधा-आधारित प्रवर्तन

  • “इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर” मॉडल।

  • एकल-खिड़की अनुमतियाँ और डिजिटल सबमिशन।

  • उद्योग-अनुकूल, पारदर्शी प्रवर्तन तंत्र।

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधान

1. विस्तृत कल्याण लाभ

  • पेट्रोलियम क्षेत्र में अधिक कर्मियों को ESIC कवरेज।

  • चिकित्सा, चोट मुआवजा, विकलांगता लाभ, निर्भर लाभ, मातृत्व लाभ।

  • व्यावसायिक रोगों और दुर्घटनाओं के लिए संरक्षण।

2. पारदर्शिता और सरल अनुपालन

  • डिजिटल स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा रिकॉर्ड।

  • लाभों की पोर्टेबिलिटी और तेज़ वितरण।

निष्कर्ष

OSHWC कोड एक आधुनिक, एकीकृत, सक्रिय सुरक्षा प्रणाली बनाता है, जिससे:

  • पेट्रोलियम प्रतिष्ठान अधिक सुरक्षित,

  • आपातकालीन क्षमता मजबूत,

  • कार्यकर्ता अधिक स्वस्थ,

  • संचालन अधिक विश्वसनीय व वैश्विक मानकों के अनुरूप होते हैं।

वहीं, सामाजिक सुरक्षा संहिता व्यापक कल्याण और अनुपालन सुधार सुनिश्चित करती है।

दोनों संहिताएँ मिलकर पेट्रोलियम उद्योग की सुरक्षा प्रणाली को:

  • प्रतिक्रिया-आधारित से रोकथाम-आधारित,

  • जटिल से सरल,

  • कागज़ आधारित से डिजिटल,

  • निरीक्षक-प्रधान से गवर्नेंस-प्रधान

मॉडल में परिवर्तित करती हैं।

इन प्रावधानों का परिणाम है:

  • अधिक अनुशासित संचालन,

  • कुशल और स्वस्थ कार्यबल,

  • कम बाधाएँ और दुर्घटनाएँ,

  • उच्च उत्पादकता,

  • बेहतर वैश्विक अनुपालन।

सामूहिक रूप से, यह भारत के पेट्रोलियम क्षेत्र में मजबूत सुरक्षा संस्कृति और औद्योगिक स्थिरता का निर्माण करता है।


भारत का ऊर्जा और नौवहन क्षेत्र राष्ट्रीय विकास के सशक्त स्तंभ: ‘इंडिया मैरीटाइम वीक 2025’ में बोले केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी

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पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मुंबई में आयोजित ‘रिवाइटलाइजिंग इंडिया’s मैरीटाइम मैन्युफैक्चरिंग कॉन्फ्रेंस’ को संबोधित किया, जो इंडिया मैरीटाइम वीक 2025 का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि भारत की तीव्र आर्थिक वृद्धि ऊर्जा और नौवहन क्षेत्रों की प्रगति से गहराई से जुड़ी हुई है, जो राष्ट्रीय विकास के दो सशक्त स्तंभ हैं।

मंत्री ने बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और वर्तमान में जीडीपी लगभग 4.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के आसपास है। इसमें से लगभग आधा हिस्सा निर्यात, आयात और प्रेषण जैसी बाह्य गतिविधियों से आता है, जो यह दर्शाता है कि भारत की आर्थिक प्रगति में व्यापार — और इसलिए नौवहन — कितना महत्वपूर्ण है।

ऊर्जा क्षेत्र के बारे में बोलते हुए मंत्री पुरी ने कहा कि भारत वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 5.6 मिलियन बैरल कच्चे तेल का उपभोग करता है, जो साढ़े चार साल पहले 5 मिलियन बैरल था। मौजूदा वृद्धि दर पर, देश जल्द ही 6 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच जाएगा। उन्होंने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, आने वाले दो दशकों में वैश्विक ऊर्जा मांग में होने वाली वृद्धि का लगभग 30 प्रतिशत योगदान भारत से होगा, जो पहले 25 प्रतिशत का अनुमान था। यह बढ़ती ऊर्जा आवश्यकता स्वाभाविक रूप से भारत की जहाजरानी की मांग को भी बढ़ाएगी, ताकि तेल, गैस और अन्य ऊर्जा उत्पादों को दुनिया भर में पहुंचाया जा सके।

मंत्री ने जानकारी दी कि 2024–25 के दौरान भारत ने लगभग 300 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए और 65 मिलियन मीट्रिक टन का निर्यात किया। तेल और गैस क्षेत्र भारत के कुल व्यापार के लगभग 28 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, जो बंदरगाहों द्वारा संभाले जाने वाला सबसे बड़ा एकल वस्तु क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि भारत वर्तमान में अपनी 88% कच्चे तेल और 51% गैस की आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए नौवहन उद्योग कितना आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि माल ढुलाई (फ्रेट) की लागत कुल आयात बिल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां (OMCs) अमेरिका से कच्चा तेल लाने में लगभग 5 डॉलर प्रति बैरल और मध्य पूर्व से 1.2 डॉलर प्रति बैरल का भुगतान करती हैं। पिछले पाँच वर्षों में IOCL, BPCL और HPCL जैसी भारतीय सार्वजनिक उपक्रम कंपनियों ने जहाज चार्टर करने पर लगभग 8 बिलियन डॉलर खर्च किए हैं — जो भारतीय स्वामित्व वाले नए टैंकरों के एक बेड़े के निर्माण के बराबर राशि है।

मंत्री पुरी ने बताया कि भारत के व्यापारिक माल का केवल 20 प्रतिशत हिस्सा ही भारतीय ध्वज या भारतीय स्वामित्व वाले जहाजों द्वारा ले जाया जाता है। उन्होंने कहा कि यह भारत के लिए एक चुनौती के साथ-साथ एक अवसर भी है — जहाज निर्माण और स्वामित्व क्षमता बढ़ाने का। सरकार PSU कार्गो मांग को एकत्रित करने, Ship Owning and Leasing (SOL) मॉडल को बढ़ावा देने, Maritime Development Fund के माध्यम से जहाजों के लिए सस्ती वित्त व्यवस्था उपलब्ध कराने और Shipbuilding Financial Assistance Policy 2.0 लागू करने जैसे कदम उठा रही है, जिसमें LNG, एथेन और प्रोडक्ट टैंकरों के लिए अधिक समर्थन दिया जाएगा।

मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 11 वर्षों में भारत के नौवहन क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं। बंदरगाह क्षमता 2014 में 872 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष से बढ़कर 1,681 मिलियन मीट्रिक टन हो गई है, जबकि माल ढुलाई 581 मिलियन टन से बढ़कर लगभग 855 मिलियन टन हो गई है। उन्होंने कहा कि कार्यकुशलता में भी सुधार हुआ है — जहाजों के टर्नअराउंड समय में 48% की कमी और निष्क्रिय समय में 29% की कमी आई है। सागरमाला कार्यक्रम के तहत बंदरगाहों के आधुनिकीकरण और तटीय क्षेत्रों को जोड़ने के लिए 5.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं शुरू की गई हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के कोचीन शिपयार्ड, मझगांव डॉक, जीआरएसई कोलकाता, एचएसएल विशाखापत्तनम और गोवा व गुजरात के निजी शिपयार्ड अब विश्व-स्तरीय जहाज बना रहे हैं। कोचीन शिपयार्ड, एलएंडटी और डेऊ (Daewoo) के बीच LNG और एथेन कैरियर्स के लिए साझेदारी और मित्सुई OSK लाइन्स जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ सहयोग से भारत के शिपयार्डों में उन्नत तकनीक लाई जा रही है।

उन्होंने कहा कि जहाज निर्माण उद्योग को लंबे समय तक चलने वाली योजना और स्थिर आदेशों की आवश्यकता होती है ताकि ढांचा और कुशल जनशक्ति बनी रहे। चूंकि कई वैश्विक शिपयार्ड अगले छह वर्षों तक बुक हैं, भारत को उन्हें निवेश करने और देश में ही जहाज बनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

भविष्य की ओर देखते हुए उन्होंने कहा कि 2047 तक भारत का समुद्री क्षेत्र लगभग ₹8 ट्रिलियन का निवेश आकर्षित करेगा और करीब 1.5 करोड़ रोजगार के अवसर सृजित करेगा। उन्होंने यह भी बताया कि भारत India–Middle East–Europe Economic Corridor और International North–South Transport Corridor जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक व्यापार मार्गों को आकार देने में एक प्रमुख भूमिका निभा रहा है, जो भारतीय बंदरगाहों को यूरोप, मध्य एशिया और अफ्रीका से जोड़ता है।

अपने संबोधन का समापन करते हुए  मंत्री पुरी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपने महासागरों को बाधा नहीं बल्कि विकास और समृद्धि के मार्ग के रूप में देखता है। देश बंदरगाहों का आधुनिकीकरण कर रहा है, अधिक जहाज बना रहा है, हरित नौवहन को बढ़ावा दे रहा है और युवाओं के लिए रोजगार सृजित कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक साझेदारों के साथ मिलकर समुद्री क्षेत्र को विकसित और आत्मनिर्भर भारत के प्रमुख प्रेरक बल के रूप में आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।

कोयला मंत्रालय के नामित प्राधिकारी ने तीन वाणिज्यिक कोयला खदानों के लिए वेस्टिंग आदेश जारी किए

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23 अक्टूबर 2025 को कोयला मंत्रालय के नामित प्राधिकारी ने तीन वाणिज्यिक कोयला खदानों के लिए वेस्टिंग आदेश (Vesting Orders) जारी किए हैं। इन खदानों के लिए कोयला खदान विकास और उत्पादन समझौते (CMDPA) पहले ही 21 अगस्त 2025 को हस्ताक्षरित किए जा चुके थे।

जिन कोयला खदानों के लिए वेस्टिंग आदेश जारी किए गए हैं, वे हैं —

  1. राजगामर डिपसाइड (देवन्हारा)

  2. टंगरडीही नॉर्थ, और

  3. महुागढ़ी

इनमें से दो खदानें आंशिक रूप से खोजी गई (Partially Explored) हैं, जबकि एक खदान पूर्णतः खोजी गई (Fully Explored) है, जिसकी पीक रेटेड क्षमता (PRC) लगभग 1.00 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) है। इन तीनों खदानों के कुल भूवैज्ञानिक भंडार (Geological Reserves) लगभग 1,484.41 मिलियन टन हैं।

इन खदानों से प्रति वर्ष लगभग ₹189.77 करोड़ का राजस्व (Annual Revenue) प्राप्त होने की उम्मीद है और लगभग ₹150 करोड़ का पूंजी निवेश (Capital Investment) आकर्षित होगा। इससे लगभग 1,352 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना है।

इन तीन नए वेस्टिंग आदेशों के साथ, अब तक 130 वाणिज्यिक कोयला खदानों के लिए वेस्टिंग/आवंटन आदेश जारी किए जा चुके हैं, जिनकी कुल पीक रेटेड क्षमता (PRC) लगभग 267.244 MTPA है। इससे प्रतिवर्ष लगभग ₹37,700 करोड़ का राजस्व उत्पन्न होने और लगभग 3,61,301 लोगों को रोजगार (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष) मिलने की संभावना है।

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