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संभल मस्जिद सर्वे मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा अपडेट, फैसला सुरक्षित

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नई दिल्ली- संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह याचिका संभल जामा मस्जिद समिति की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसके तहत मस्जिद का सर्वे कराने के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया गया था।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद वर्ष 2024 में दायर एक सिविल मुकदमे से जुड़ा है। हिंदू पक्ष की ओर से दावा किया गया है कि जिस स्थान पर वर्तमान में शाही जामा मस्जिद स्थित है, वहां पहले मंदिर था। इसी दावे के आधार पर स्थानीय अदालत ने मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया था। 

मस्जिद समिति ने इस आदेश को चुनौती देते हुए पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया था। हाई कोर्ट ने मई 2025 में सर्वे के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद मस्जिद समिति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। 

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश सरकार की दलीलें भी सुनी गईं। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। इसका मतलब है कि अदालत बाद की तारीख में अपना फैसला सुनाएगी

मस्जिद समिति की ओर से मामले में Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 से जुड़े कानूनी प्रावधानों का भी हवाला दिया गया है। दूसरी ओर, हिंदू पक्ष ने सर्वे से संबंधित निचली अदालत के आदेश का बचाव किया है। 

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

संभल मस्जिद विवाद धार्मिक स्थलों से जुड़े मुकदमों और 1991 के Places of Worship Act की व्याख्या से जुड़े व्यापक कानूनी सवालों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट के आगामी आदेश से इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया की दिशा स्पष्ट होगी।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है और अब सभी की नजर अदालत के अंतिम आदेश पर है। 


CGPSC भर्ती मामला: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सचिव जीवन किशोर ध्रुव की जमानत पर CBI से मांगा जवाब

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नई दिल्ली/रायपुर- छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) की भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सचिव एवं सेवानिवृत्त IAS अधिकारी जीवन किशोर ध्रुव की जमानत याचिका पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने सोमवार, 21 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए CBI को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का नोटिस जारी किया।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता शामिल थे। ध्रुव ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 5 अगस्त 2026 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें हाईकोर्ट ने उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

2020-2022 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा मामला

यह मामला CGPSC की 2020 से 2022 के बीच की भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। CBI इस मामले की जांच कर रही है। सरकारी प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, CBI ने सितंबर 2025 में CGPSC के तत्कालीन सचिव जीवन किशोर ध्रुव समेत पांच लोगों को कथित भर्ती अनियमितताओं की जांच के दौरान गिरफ्तार किया था।

PIB की 19 सितंबर 2025 की विज्ञप्ति के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए लोगों में तत्कालीन CGPSC सचिव जीवन किशोर ध्रुव, तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक आरती वासनिक तथा कुछ अन्य आरोपी शामिल थे। CBI की जांच कथित तौर पर 2020 और 2021 की परीक्षाओं में चयन प्रक्रिया में अनियमितताओं और कथित पक्षपात से जुड़े आरोपों की पड़ताल कर रही थी।

हाईकोर्ट ने अगस्त में जमानत की थी खारिज

सुप्रीम कोर्ट में जाने से पहले जीवन किशोर ध्रुव को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिली थी। अगस्त 2026 में हाईकोर्ट ने उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र की गोपनीयता और कथित पेपर लीक के प्रभाव को लेकर कड़ी टिप्पणियां की थीं।

हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए ध्रुव ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की। अब सुप्रीम कोर्ट ने CBI का पक्ष जानने के लिए नोटिस जारी किया है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने CBI को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को CBI के जवाब पर अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई करीब चार सप्ताह बाद होने की बात रिपोर्टों में कही गई है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने जमानत मंजूर नहीं की है। अदालत ने केवल CBI से जवाब मांगा है। इसलिए अगली सुनवाई में CBI का पक्ष और उसके बाद अदालत का आदेश इस मामले में महत्वपूर्ण होगा।

दिल्ली PG हादसा: 7 मौतों के मामले में 6 आरोपियों की न्यायिक हिरासत 14 दिन बढ़ी, जांच जारी

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नई दिल्ली- दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में PG बिल्डिंग गिरने के मामले में अदालत ने छह आरोपियों की न्यायिक हिरासत को 14 दिनों के लिए बढ़ा दिया है। यह पांच मंजिला इमारत 6 सितंबर 2026 को ढह गई थी, जिसमें 7 लोगों की मौत हुई थी।

मामले में गिरफ्तार आरोपियों में बिल्डिंग मालिक हरिराम गुप्ता, उनकी पत्नी उर्मिला गुप्ता, उनके बेटे महेश गुप्ता, PG संचालक सुदांशु और शुभम त्यागी तथा लेबर कॉन्ट्रैक्टर सानोज शामिल हैं। अदालत ने पिछली न्यायिक हिरासत की अवधि समाप्त होने के बाद सभी आरोपियों को पेश किए जाने पर हिरासत आगे बढ़ाने का आदेश दिया।

यह इमारत ‘Hostel Daze’ नाम से लड़कों के PG के रूप में संचालित की जा रही थी और दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास स्थित थी। पुलिस के अनुसार, हादसे के समय इमारत के बेसमेंट में मरम्मत और निर्माण से जुड़े काम चल रहे थे। 

पुलिस हादसे के पीछे इमारत की स्थिति, मरम्मत कार्य और निर्माण से जुड़े लोगों की भूमिका की जांच कर रही है। मामले में बिल्डिंग मालिकों, PG संचालकों और निर्माण/मरम्मत कार्य से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी की जांच की जा रही है। घटना के बाद दिल्ली नगर निगम के कुछ अधिकारियों पर भी कार्रवाई की गई है।

इस हादसे के बाद दिल्ली में PG और हॉस्टल की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं। दिल्ली हाई कोर्ट में इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर अलग से सुनवाई चल रही है। 

मुख्य बात: अदालत ने फिलहाल छह आरोपियों की न्यायिक हिरासत 14 दिन और बढ़ा दी है, जबकि पुलिस हादसे की परिस्थितियों और जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच जारी रखे हुए है। 



छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: मामूली विभागीय सजा पर निलंबन अवधि का पूरा वेतन देने का आदेश

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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय जांच के बाद केवल मामूली विभागीय सजा दी जाती है और उसे सेवा में बहाल कर दिया जाता है, तो निलंबन की अवधि के लिए उसके पूरे वेतन का भुगतान किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निलंबन अपने आप में कोई सजा नहीं है, बल्कि विभागीय जांच पूरी होने तक की एक अस्थायी प्रशासनिक कार्रवाई है। ऐसे में यदि जांच के बाद कर्मचारी के खिलाफ केवल मामूली दंड लगाया गया है, तो निलंबन अवधि के वेतन को रोकना उचित नहीं माना जा सकता।

रायपुर में पदस्थ महिला ASI से जुड़ा था मामला

यह मामला रायपुर में पदस्थ एक महिला सहायक उपनिरीक्षक (ASI) से संबंधित था। विभागीय कार्रवाई के चलते उन्हें कुछ समय के लिए निलंबित किया गया था। बाद में विभागीय जांच पूरी होने के बाद उन्हें सेवा में वापस बहाल कर दिया गया और उनके खिलाफ केवल मामूली विभागीय दंड लगाया गया।

मामले में निलंबन अवधि के दौरान रोके गए वेतन को लेकर विवाद सामने आया। इसी मुद्दे पर न्यायालय के समक्ष मामला पहुंचा, जहां कोर्ट ने कर्मचारी के निलंबन और बाद में दी गई विभागीय सजा के बीच के संबंध को देखते हुए वेतन भुगतान के अधिकार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट के फैसले का मुख्य आधार यह है कि निलंबन को अंतिम दंड नहीं माना जा सकता। यदि विभागीय जांच का परिणाम गंभीर सजा के रूप में सामने नहीं आता और कर्मचारी को मामूली दंड के साथ सेवा में बहाल कर दिया जाता है, तो निलंबन की पूरी अवधि के वेतन को रोकने का पर्याप्त आधार नहीं बनता। ऐसे मामले में कर्मचारी को 100 प्रतिशत वेतन दिए जाने का अधिकार है।

इस फैसले को सरकारी कर्मचारियों से जुड़े सेवा मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह निलंबन अवधि के दौरान वेतन और विभागीय कार्रवाई के बीच संबंध को स्पष्ट करता है।

नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध प्रकाशित न्यायिक समाचार के आधार पर तैयार की गई है; किसी मामले में अंतिम कानूनी प्रभाव संबंधित आदेश/निर्णय के मूल पाठ पर निर्भर करता है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बर्खास्त कर्मचारी को देनी होगी विभागीय जांच की पूरी जानकारी

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RTI के तहत अपनी ही विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज मांगना कर्मचारी का अधिकार, सूचना रोकने की दलील को कोर्ट ने किया खारिज

बिलासपुर- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को उसके खिलाफ हुई विभागीय जांच और बर्खास्तगी का आधार बने दस्तावेज उपलब्ध कराए जा सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारी अपनी ही विभागीय जांच से संबंधित रिकॉर्ड अपने बचाव के लिए मांग रहा हो और उसमें किसी तीसरे व्यक्ति की निजता का सवाल न हो, तो केवल RTI की छूट का हवाला देकर सूचना रोकी नहीं जा सकती।

क्या है पूरा मामला?

मामला जांजगीर स्थित फैमिली कोर्ट में चालक के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी से जुड़ा है। कर्मचारी के खिलाफ कथित कदाचार के आरोपों को लेकर दो विभागीय जांच शुरू की गई थीं। जांच में उसके खिलाफ सात आरोप लगाए गए और बाद में विभागीय कार्रवाई के तहत उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

बर्खास्तगी के बाद कर्मचारी ने अपने खिलाफ हुई विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज और रिकॉर्ड RTI के माध्यम से मांगे। हालांकि, संबंधित अधिकारियों की ओर से सूचना देने से इनकार किया गया और RTI कानून में मौजूद कुछ अपवादों का हवाला दिया गया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अधिकारियों की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि कर्मचारी जिस सूचना की मांग कर रहा है, वह उसकी अपनी विभागीय जांच से संबंधित है और उसके बचाव के लिए उपयोगी हो सकती है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मांगी गई जानकारी में किसी तीसरे पक्ष की निजता प्रभावित नहीं होती है, तो केवल RTI Act की धारा 8(1)(c) या 8(1)(j) का हवाला देकर ऐसी सूचना से इनकार नहीं किया जा सकता।

फैमिली कोर्ट को दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जांजगीर-चांपा फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि पूर्व कर्मचारी को उसकी विभागीय जांच से संबंधित मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं। यह आदेश 31 अगस्त 2026 को पारित किया गया था।

क्यों अहम है यह फैसला?

यह फैसला सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विभागीय जांच का सामना करने वाले कर्मचारी के लिए संबंधित दस्तावेज उसके बचाव का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। हाईकोर्ट के इस फैसले से यह संदेश गया है कि RTI कानून की छूट का इस्तेमाल कर्मचारी को उसकी अपनी विभागीय कार्रवाई से जुड़े रिकॉर्ड से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कोई वैध गोपनीयता या अन्य कानूनी अपवाद लागू न हो।

देशभर में 8 नए हाईकोर्ट चीफ जस्टिस की नियुक्ति, केंद्र सरकार ने जारी की अधिसूचना

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नई दिल्ली- केंद्र सरकार ने देश के विभिन्न हाईकोर्ट में 8 नए मुख्य न्यायाधीशों (Chief Justices) की नियुक्ति को लेकर 5 सितंबर को आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी। इन नियुक्तियों के साथ देश की न्यायपालिका के कई प्रमुख हाईकोर्ट में नेतृत्व स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है।

केंद्र सरकार की अधिसूचना के बाद संबंधित हाईकोर्ट में नए मुख्य न्यायाधीशों के कार्यभार संभालने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इन नियुक्तियों को न्यायिक प्रशासन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ संबंधित हाईकोर्ट में न्यायिक कार्यों के संचालन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश: पूर्व हाईकोर्ट जजों के रिटायरमेंट लाभों पर बनेगी समान राष्ट्रीय नीति

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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाओं में एकरूपता लाने के लिए केंद्र सरकार को समिति गठित करने के लिए एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र की ओर से अतिरिक्त समय मांगे जाने पर यह अनुमति दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि केंद्र तय समय में समिति का गठन नहीं करता है, तो सुप्रीम कोर्ट स्वयं समिति गठित कर सकता है।

दरअसल, अलग-अलग राज्यों में सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों को मिलने वाली सुविधाओं में काफी अंतर है। इनमें ड्राइवर, सुरक्षा व्यवस्था और यात्रा के दौरान सरकारी आवास जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसी असमानता को दूर करने के लिए पूरे देश में एक समान नीति तैयार करने की दिशा में यह कदम उठाया गया है। 

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 20 जुलाई 2026 को केंद्र को दो सप्ताह के भीतर समिति गठित करने का निर्देश दिया था। समिति को इस विषय पर अपनी सिफारिशें तैयार करनी हैं।

अब मामले की अगली सुनवाई करीब 10 दिन बाद होने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों के लिए देशभर में सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाओं को लेकर एक समान व्यवस्था बनने का रास्ता साफ हो सकता है।

होम थिएटर ब्लास्ट केस में आरोपी को उम्रकैद, शादी के तोहफे में छिपाया था बम

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प्रेम संबंध के चलते प्रेमिका के पति को रास्ते से हटाने की खौफनाक साजिश, धमाका होते ही मची थी सनसनी

रायपुर- छत्तीसगढ़ के चर्चित होम थिएटर ब्लास्ट केस में अदालत ने आरोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इस सनसनीखेज मामले में आरोपी ने कथित तौर पर अपनी प्रेमिका के पति को रास्ते से हटाने के लिए शादी के तोहफे के रूप में एक ऐसा होम थिएटर भेजा था, जिसमें विस्फोटक छिपाया गया था। दूल्हे ने जब शादी के बाद मिले इस तोहफे को चलाने की कोशिश की, तभी जोरदार धमाका हो गया और उसकी मौत हो गई।

शादी का तोहफा बना मौत का सामान

मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि हत्या की साजिश को अंजाम देने के लिए आरोपी ने सामान्य शादी के तोहफे का सहारा लिया। होम थिएटर के अंदर बम लगाया गया था, ताकि उसे चालू करते ही विस्फोट हो जाए। घटना के बाद पूरे इलाके में हड़कंप मच गया और पुलिस ने मामले की गंभीरता से जांच शुरू की।

प्रेम संबंध से जुड़ी थी साजिश

जांच के दौरान सामने आया कि आरोपी का मृतक की पत्नी से प्रेम संबंध था। शादी के बाद जब महिला का पति उसके रास्ते में आया तो आरोपी ने उसे हटाने की साजिश रची। इसी योजना के तहत शादी में होम थिएटर को तोहफे के तौर पर भेजा गया था।

धमाके ने खोला साजिश का राज

होम थिएटर में विस्फोट के बाद पुलिस ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए और मामले की जांच आगे बढ़ाई। जांच में यह सामने आया कि घटना महज हादसा नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या की साजिश थी। पुलिस की जांच के आधार पर आरोपी तक पहुंच बनाई गई और मामला अदालत तक पहुंचा।

अदालत ने सुनाई उम्रकैद की सजा

मामले में अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। फैसले के बाद इस चर्चित मामले में न्यायिक प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण चरण का समापन हुआ। घटना ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि निजी रिश्तों और प्रतिशोध की भावना किस तरह एक खतरनाक अपराध का रूप ले सकती है।

मामले ने पूरे प्रदेश में मचाई थी सनसनी

शादी के तोहफे में बम रखकर हत्या की साजिश का यह मामला सामने आने के बाद पूरे छत्तीसगढ़ में इसकी चर्चा हुई थी। सामान्य दिखने वाले इलेक्ट्रॉनिक सामान को हत्या के हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने से पुलिस जांच और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठे थे।

अदालत के फैसले के बाद पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद मजबूत हुई है। यह मामला इस बात की भी मिसाल है कि अपराध को अंजाम देने के लिए अपनाई गई कितनी भी शातिर योजना क्यों न हो, जांच एजेंसियों की पड़ताल और कानूनी प्रक्रिया के जरिए अपराधी तक पहुंचा जा सकता है।

CGMSC पर लगा 1 लाख का जुर्माना निरस्त,सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश को पलटा

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रायपुर- छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन (CGMSC) की कार्य शैली और नियम आधारित टेंडर प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी है। अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस फैसले को  रद्द कर दिया है, जिसमें CGMSC पर 1 लाख का जुर्माना (हर्जाना) लगाया गया था। इस फैसले से साफ हो गया है कि कंपनी की टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह साफ-सुथरी और नियमों के हिसाब से थी।

पूरा मामला यह था कि टेंडर से जुड़े एक मामले में एक ठेकेदार ने हाईकोर्ट में शिकायत की थी, जिसके बाद हाईकोर्ट ने CGMSC पर 1 लाख का जुर्माना लगा दिया था। इसके खिलाफ CGMSC सुप्रीम कोर्ट गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई में पाया कि निगम की तरफ से कोई गलती नहीं हुई थी।

अदालत ने माना कि ठेकेदार ने फॉर्म में जो अपनी ऑफिशियल ईमेल आईडी दी थी, उसी पर समय रहते सारी जरूरी जानकारियां और मैसेज भेजे गए थे। ठेकेदार ने खुद तय समय में जवाब नहीं दिया, इसलिए नियमों के तहत ही उसे टेंडर से बाहर किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पूरे मामले में CGMSC का काम बिल्कुल सही था और उस पर लगा 1 लाख का जुर्माना ग़लत है। इस फैसले से साबित हो गया है कि CGMSC अपने सभी टेंडर और खरीदारी में पूरी ईमानदारी और नियमों का पालन करता है। निगम ने कहा है कि वह आगे भी राज्य की स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए ऐसे ही पूरी ईमानदारी के साथ काम करता रहेगा।

छत्तीसगढ़ में हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, CBI करेगी जांच; परिजनों को ₹25 लाख अंतरिम मुआवजे का आदेश

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नई दिल्ली/छत्तीसगढ़- छत्तीसगढ़ में 34 वर्षीय व्यक्ति की कथित हिरासत में हुई मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा हस्तक्षेप करते हुए जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने का आदेश दिया। सर्वोच्च अदालत ने मामले में राज्य पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि मौत के बाद FIR दर्ज करने में करीब दो साल की देरी हुई। कोर्ट ने मृतक के परिवार को राहत देते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को ₹25 लाख का अंतरिम मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है।

क्या है पूरा मामला?

मामला छत्तीसगढ़ में एक 34 वर्षीय व्यक्ति की पुलिस हिरासत के दौरान हुई मौत से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने व्यक्ति को 18 जनवरी 2024 को उसकी किराना दुकान के बाहर कथित रूप से शराब बिक्री के आरोप में हिरासत में लिया था। इसके बाद उसकी मौत हो गई। मामले में मृतक के परिवार की ओर से हिरासत के दौरान उसके साथ हिंसा किए जाने के आरोप लगाए गए थे।

मामले की गंभीरता को देखते हुए पहले हाई कोर्ट में भी सुनवाई हुई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, हाई कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि मृतक परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था और उसकी मौत असामान्य परिस्थितियों में हुई थी। राज्य की ओर से इन निष्कर्षों पर विवाद नहीं किया गया।

FIR दर्ज करने में दो साल की देरी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सबसे गंभीर सवाल FIR दर्ज करने में हुई देरी को लेकर उठाया। अदालत ने इस बात पर सवाल किया कि हिरासत में मौत जैसी गंभीर घटना के बावजूद राज्य पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करने में लगभग दो साल का समय क्यों लिया।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने पुलिस कार्रवाई और जांच की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने इसी पृष्ठभूमि में मामले की जांच राज्य पुलिस से हटाकर CBI को सौंपने का फैसला किया।

CBI अब करेगी पूरे मामले की जांच

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब मामले की जांच CBI करेगी। रिपोर्टों के अनुसार, CBI को नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर जांच आगे बढ़ाने और वरिष्ठ अधिकारी के माध्यम से जांच कराने का निर्देश दिया गया है।

मामले की प्रगति पर CBI को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रिपोर्ट भी प्रस्तुत करनी होगी। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में अगली महत्वपूर्ण रिपोर्टिंग/सुनवाई 13 अक्टूबर को होनी है।

CBI जांच का उद्देश्य हिरासत में मौत से जुड़े पूरे घटनाक्रम, पुलिस की भूमिका, हिरासत के दौरान कथित हिंसा तथा FIR दर्ज करने में हुई देरी जैसे पहलुओं की निष्पक्ष जांच करना होगा।

परिवार को ₹25 लाख की अंतरिम राहत

सुप्रीम कोर्ट ने मृतक के परिवार को आर्थिक राहत देते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को ₹25 लाख का अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फिलहाल अंतरिम राहत है और मामले की सुनवाई के दौरान अंतिम मुआवजे की राशि पर आगे निर्णय लिया जा सकता है।

यह राहत विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत के समक्ष यह बात सामने आई कि मृतक परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था। उसकी मृत्यु के बाद परिवार को आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

हिरासत में मौत के मामलों में जवाबदेही का सवाल

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिस हिरासत में नागरिकों के अधिकारों और राज्य की जवाबदेही से जुड़े व्यापक सवालों को भी सामने लाता है।

किसी व्यक्ति की हिरासत के दौरान मौत होने पर जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होना बेहद जरूरी है। ऐसे मामलों में परिवार को समय पर न्याय मिलना और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना कानून के शासन में जनता के विश्वास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस मामले में FIR दर्ज करने में हुई कथित लंबी देरी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गंभीरता से लिया जाना भी इसी जवाबदेही के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

अब आगे क्या होगा?

CBI अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार मामले की जांच आगे बढ़ाएगी। जांच में हिरासत से जुड़े रिकॉर्ड, पुलिस की कार्रवाई, मेडिकल एवं अन्य उपलब्ध साक्ष्यों तथा उस दौरान हुई घटनाओं की जांच की जा सकती है।

जांच पूरी होने के बाद सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि हिरासत के दौरान वास्तव में क्या हुआ और किन परिस्थितियों में व्यक्ति की मौत हुई। यदि जांच में किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की आपराधिक भूमिका सामने आती है, तो उसके आधार पर आगे कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रमुख बिंदु

  • 34 वर्षीय व्यक्ति की कथित हिरासत में मौत के मामले की जांच अब CBI करेगी।

  • राज्य पुलिस द्वारा FIR दर्ज करने में करीब दो साल की देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए।

  • छत्तीसगढ़ सरकार को मृतक के परिवार को ₹25 लाख अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश।

  • अंतिम मुआवजे की राशि पर बाद में निर्णय लिया जा सकता है।

  • CBI को मामले की निष्पक्ष जांच कर आगे की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।

  • मामले की जांच अब राज्य पुलिस के बजाय केंद्रीय एजेंसी की निगरानी में आगे बढ़ेगी।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ के इस हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट का CBI जांच का आदेश और ₹25 लाख अंतरिम मुआवजे का निर्देश पीड़ित परिवार के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक राहत है। साथ ही, FIR दर्ज करने में हुई देरी पर अदालत की नाराजगी पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

अब सभी की नजर CBI की जांच पर रहेगी। जांच से सामने आने वाले तथ्य यह तय करने में अहम होंगे कि हिरासत में हुई मौत के लिए जिम्मेदारी किसकी थी और क्या इस मामले में किसी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जरूरत है।

जेलों में बढ़ती मौतों पर हाईकोर्ट सख्त, प्रशासन से मांगा जवाब

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रायपुर- छत्तीसगढ़ में जेलों के भीतर हो रही मौतों को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। एक वर्ष के भीतर राज्य की विभिन्न जेलों में 33 कैदियों की मौत होने के मामले को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने चिंता जताई है।

सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि कई मामलों में अब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार नहीं हुई है या लंबित पड़ी है, जिससे मौत के कारणों पर सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर लापरवाही मानते हुए संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी व्यक्त की।

हाईकोर्ट ने जेल विभाग के महानिदेशक (DG) और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कैदियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्रशासन की है, और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि सभी लंबित पोस्टमार्टम रिपोर्ट को जल्द से जल्द पूरा किया जाए और प्रत्येक मौत की विस्तृत जांच रिपोर्ट पेश की जाए। साथ ही, भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए हैं।

इस मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों और रिपोर्ट की समीक्षा करेगा।

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