Media24Media.com: दिल्ली हाई कोर्ट में नेहा बोरा की याचिका पर आज शाम 6 बजे फैसला, ₹10,000 के शांति मुचलके को दी चुनौती

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दिल्ली हाई कोर्ट में नेहा बोरा की याचिका पर आज शाम 6 बजे फैसला, ₹10,000 के शांति मुचलके को दी चुनौती

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दिल्ली हाई कोर्ट में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर आज, शुक्रवार 23 अक्टूबर को शाम 6 बजे फैसला सुनाए जाने का कार्यक्रम है। नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का व्यक्तिगत मुचलका और एक जमानतदार देने को कहा गया था। गुरुवार को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति सुब्रमोनियम प्रसाद ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 16 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, नेहा बोरा उस दिन मंडी हाउस में प्रस्तावित एक सभा में शामिल होने जा रही थीं। सभा का संबंध मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध और ‘लेहरा दो तिरंगा’ कार्यक्रम से बताया गया है।

नेहा बोरा के अनुसार, उनका कार्यक्रम शांतिपूर्ण था। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें मंडी हाउस पहुंचने के कुछ समय बाद हिरासत में लिया गया और बाद में आर.के. पुरम पुलिस स्टेशन ले जाया गया। उन्हें 17 अक्टूबर की सुबह रिहा कर दिया गया।

इसके बाद विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Special Executive Magistrate) की ओर से 17 अक्टूबर को नोटिस जारी किया गया। इसमें जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का व्यक्तिगत मुचलका और एक जमानतदार देने की बात कही गई। नेहा बोरा ने इस नोटिस और उससे जुड़ी कार्यवाही को हाई कोर्ट में चुनौती दी।

नेहा बोरा के पक्ष की दलीलें क्या हैं?

नेहा बोरा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में दलील दी कि संबंधित नोटिस कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता। उनके पक्ष के अनुसार:

  • प्रदर्शन शांतिपूर्ण सभा के उद्देश्य से बुलाया गया था और नेहा बोरा ने हिंसा का आह्वान नहीं किया।

  • नोटिस में शांति भंग होने की आशंका को उचित आधारों के साथ स्थापित नहीं किया गया।

  • अधिकारियों को कार्रवाई करने से पहले उपलब्ध जानकारी की विश्वसनीयता और मामले के तथ्यों का स्वतंत्र आकलन करना चाहिए था।

  • याचिका में नोटिस रद्द करने और अधिकारियों को उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने से रोकने की मांग की गई है।

उनके वकील ने यह भी तर्क दिया कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। ये याचिकाकर्ता के पक्ष की दलीलें हैं; इन्हें अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार का पक्ष

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कार्यवाही का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत संभावित शांति भंग होने की आशंका के आधार पर निवारक कार्रवाई की जा सकती है।

सरकारी पक्ष ने पुलिस रिकॉर्ड, पहले दर्ज मामलों और उस समय की परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा कि अधिकारियों के पास नोटिस जारी करने के आधार थे। सरकारी पक्ष ने याचिका की स्वीकार्यता पर भी सवाल उठाए।

अदालत में किन कानूनी सवालों पर चर्चा हुई?

मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 130 के तहत जारी नोटिस तथा धारा 135(3) के अंतर्गत शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र देने की व्यवस्था पर बहस हुई।

मुख्य सवाल यह है कि क्या उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने का मुचलका मांगने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप थी और क्या संबंधित अधिकारी ने पर्याप्त आधारों का स्वतंत्र आकलन किया था। अदालत ने सुनवाई में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निवारक कार्रवाई के दौरान उचित प्रक्रिया के महत्व पर भी सवाल उठाए।

अब आगे क्या होगा?

हाई कोर्ट ने 22 अक्टूबर को सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखा और 23 अक्टूबर को शाम 6 बजे आदेश सुनाने का समय बताया। आज के आदेश से यह स्पष्ट होगा कि नेहा बोरा की याचिका पर अदालत क्या रुख अपनाती है और चुनौती दिए गए नोटिस के संबंध में क्या निर्देश देती है।


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