Media24Media.com: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी—कोई भी समूह अनिश्चितकाल तक प्रदर्शन स्थल पर कब्जा नहीं कर सकता; हर संगठन को विरोध का समान अधिकार

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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी—कोई भी समूह अनिश्चितकाल तक प्रदर्शन स्थल पर कब्जा नहीं कर सकता; हर संगठन को विरोध का समान अधिकार

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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन और सार्वजनिक स्थलों के इस्तेमाल को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी व्यक्ति, समूह या संगठन को किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा बनाए रखने का अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि देश के प्रत्येक नागरिक और संगठन को शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन एक समूह के लंबे समय तक किसी स्थान पर जमे रहने से दूसरे लोगों के इसी अधिकार पर असर नहीं पड़ना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह टिप्पणी दिल्ली में हालिया प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने कहा कि निर्धारित प्रदर्शन स्थलों का आवंटन एक तय अवधि के लिए होना चाहिए, ताकि किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन, पत्रकार और दूसरे संगठन भी अपनी मांगें उठाने के लिए उन स्थानों का इस्तेमाल कर सकें।

जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों से जुड़ा है मामला

सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और उनसे जुड़ी पुलिस कार्रवाई के बाद दायर याचिकाओं के समूह पर हो रही थी। इन याचिकाओं में प्रदर्शनकारियों की कथित सामूहिक हिरासत, पुलिस की कार्रवाई, इंटरनेट प्रतिबंध, मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने और प्रदर्शन स्थलों तक पहुंच सीमित किए जाने जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।

इसी विवाद के बीच दिल्ली के व्यापारिक संगठनों ने भी अदालत का रुख किया। उनका कहना है कि लंबे समय तक चले प्रदर्शनों से बाजारों और कारोबार पर असर पड़ा तथा दुकानदारों, छोटे व्यापारियों और रोजाना कमाने वाले लोगों की आजीविका प्रभावित हुई।

“एक समूह पूरी जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकता”

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कोई भी समूह यह नहीं कह सकता कि उसने किसी प्रदर्शन स्थल पर कब्जा कर लिया है और अब दूसरे लोग वहां प्रदर्शन नहीं कर सकते। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि एक संगठन लंबे समय तक किसी स्थान पर बैठा रहेगा, तो किसान, मजदूर, पत्रकार और दूसरे संगठनों को अपनी बात रखने के लिए जगह कहां मिलेगी?

अदालत का जोर इस बात पर था कि प्रदर्शन के लिए निर्धारित सार्वजनिक स्थलों का इस्तेमाल अलग-अलग समूहों को निश्चित समयावधि के लिए मिलना चाहिए। यानी किसी संगठन को प्रदर्शन की अनुमति मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसे उस स्थान पर अनिश्चितकाल तक बने रहने का अधिकार मिल गया है।

व्यापारियों ने कारोबार और आजीविका प्रभावित होने की शिकायत की

सुनवाई के दौरान दिल्ली के किराना समिति और अन्य व्यापारिक संगठनों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि लंबे समय तक चले प्रदर्शनों के कारण राजधानी के कई व्यावसायिक इलाकों में कारोबार प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि त्योहारों के मौसम में बाजारों की गतिविधियां बाधित होने से व्यापारियों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

व्यापारिक संगठनों ने अदालत से दिल्ली में अगले दो महीने तक धरना-प्रदर्शन पर रोक लगाने पर विचार करने का आग्रह किया। हालांकि, अदालत ने इस मांग पर तत्काल कोई व्यापक प्रतिबंध लगाने का आदेश नहीं दिया। पीठ ने कहा कि इस विवाद को केवल प्रदर्शन बनाम व्यापार के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि दोनों पक्षों के अधिकार महत्वपूर्ण हैं।

प्रदर्शन का अधिकार और आजीविका का अधिकार—दोनों महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि संविधान शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध जताने का अधिकार देता है। वहीं, नागरिकों को व्यापार करने और अपनी आजीविका कमाने का अधिकार भी प्राप्त है।

अदालत ने विशेष रूप से छोटे दुकानदारों, दैनिक वेतन पर काम करने वाले मजदूरों और अन्य कामगारों की स्थिति का उल्लेख किया। पीठ के अनुसार, प्रदर्शन की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे विरोध करने वालों को अपनी बात रखने का अवसर मिले, लेकिन आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी और आजीविका भी अनावश्यक रूप से प्रभावित न हो।

अदालत ने संकेत दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जिसमें अलग-अलग समूहों को उचित अवसर मिल सके और किसी एक समूह का लंबे समय तक कब्जा न रहे।

जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का मामला भी विचाराधीन

इस सुनवाई में दिल्ली के जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का विवाद भी शामिल है। दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने की अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी मैदान जैसे अन्य स्थानों पर प्रदर्शन की व्यवस्था का मुद्दा उठा।

याचिकाकर्ताओं की ओर से इस फैसले पर सवाल उठाए गए हैं। अदालत यह भी देख रही है कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के पीछे अधिकारियों ने पर्याप्त विचार किया था या नहीं और वैकल्पिक स्थान प्रदर्शनकारियों की जरूरतों को पूरा करते हैं या नहीं।

पुलिस कार्रवाई और निगरानी से जुड़ी शिकायतें भी सुनवाई में शामिल

प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं में पुलिस कार्रवाई को लेकर कई गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं। इनमें प्रदर्शनकारियों की कथित अवैध हिरासत, पुलिस द्वारा मारपीट, बैरिकेडिंग, पत्रकारों और वकीलों को हिरासत में लेने तथा इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध जैसे मुद्दे शामिल हैं।

इसके अलावा प्रदर्शन स्थलों पर फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल और लोगों की निजी जानकारी एकत्र करने को लेकर भी सवाल उठाए गए। अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले में केवल सीसीटीवी कैमरे लगे होने का सवाल नहीं है, बल्कि यह भी देखना होगा कि चेहरों की पहचान और डेटाबेस से मिलान करने वाली तकनीक का इस्तेमाल किस कानूनी आधार पर किया जा रहा है और इससे निजता के अधिकार पर क्या प्रभाव पड़ता है।

पीठ ने इन सभी मुद्दों को अलग-अलग श्रेणियों में सुनने की बात कही, ताकि प्रत्येक मामले पर व्यवस्थित तरीके से विचार किया जा सके।

फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं, सुनवाई जारी

व्यापारिक संगठनों की याचिका पर अदालत ने नोटिस जारी किया और उनसे प्रदर्शन आयोजित करने वाले संगठनों को भी मामले में पक्षकार बनाने को कहा। पीठ का मानना था कि संबंधित संगठनों का पक्ष सुने बिना विवाद के सभी पहलुओं पर निर्णय लेना उचित नहीं होगा। अदालत ने व्यापारियों से नुकसान के आकलन से जुड़े विवरण भी रिकॉर्ड पर रखने को कहा।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकालीन कब्जे को लेकर की गई टिप्पणी सुनवाई के दौरान मौखिक न्यायिक टिप्पणी है। इसे सभी प्रदर्शनों पर रोक लगाने वाला अंतिम फैसला या आदेश नहीं समझा जाना चाहिए। पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शन स्थलों और अन्य संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।

निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का मुख्य संदेश है कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार सभी को है, किसी एक संगठन को सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा बनाए रखने का विशेषाधिकार नहीं मिल सकता। अदालत ने प्रदर्शन की स्वतंत्रता, आम नागरिकों की आजीविका और सार्वजनिक स्थानों के समान इस्तेमाल के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।


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