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चरौदा में सीआरपीएफ जवानों और बच्चों ने मिलकर रोपे 250 पौधे, हरियाली बचाओ" का दिया संदेश

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आरंग- पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से अजय कुमार सिंह उप महानिरीक्षक ग्रुप केंद्र भिलाई, रायपुर के दिशा-निर्देश में शुक्रवार को ग्रुप केंद्र भिलाई के सीआरपीएफ जवानों ने शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला चरौदा में वृहत् पौधरोपण अभियान चलाया। इस अभियान में जवानों के साथ स्कूली बच्चों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया।इस दौरान स्कूल परिसर में फलदार, छायादार और औषधीय गुणों वाले कुल 250 पौधे रोपित किए गए। जवानों ने बच्चों को पौधा लगाने का सही तरीका सिखाया और उनकी देखभाल के महत्व के बारे में बताया। रोपण के बाद सभी बच्चों को पौधों की नियमित देखभाल की शपथ भी दिलाई गई।

इस अवसर पर सहायक कमांडेंट भरत भोई ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि "पेड़ ही जीवन हैं। बढ़ते प्रदूषण और गर्मी से बचने के लिए हर नागरिक को साल में कम से कम दो पौधे अवश्य लगाने चाहिए।" उन्होंने बच्चों से आग्रह किया कि वे पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनें और अपने घर-आंगन में भी पौधे लगाएं।ग्राम के सरपंच देवशरण धीवर और एसएमसी अध्यक्ष चेतन पैगम्बर ने सीआरपीएफ की इस पहल की मुक्त कंठ से सराहना की। उन्होंने कहा कि जवानों द्वारा बच्चों के साथ मिलकर किया गया यह कार्य प्रेरणादायक है और इससे गांव में हरियाली बढ़ेगी।

कार्यक्रम का संचालन शिक्षक महेन्द्र कुमार पटेल ने किया। पौधरोपण अभियान में संस्था प्रधान, सीआरपीएफ जवानों, शिक्षकों और बड़ी संख्या में बच्चों व ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कार्यक्रम के अंत में सभी ने मिलकर पर्यावरण बचाने और धरती को हरा-भरा रखने का संकल्प लिया। वहीं विकासखंड शिक्षा अधिकारी दिनेश शर्मा ने चरौदा में बच्चों व शिक्षकों द्वारा लगातार पौधरोपण करने की पहल की सराहना की है।




जशपुर में जल संरक्षण बना जन आंदोलन, नवाचारों से मजबूत हो रहा भू-जल संवर्धन

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सोक पिट, वाटर एब्जॉर्प्शन ट्रेंच, कंटूर ट्रेंच, आजीविका डबरी और नवा तरिया जैसी संरचनाएं बढ़ा रही जल संचयन क्षमता

मनरेगा और जनभागीदारी से जल सुरक्षा की दिशा में जशपुर का अभिनव मॉडल

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन की दिशा में जशपुर जिला एक प्रभावी मॉडल के रूप में उभर रहा है। जिले में मनरेगा तथा जनभागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण एवं भू-जल संवर्धन के लिए विभिन्न नवाचार आधारित संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है, जिससे वर्षा जल संचयन को बढ़ावा मिलने के साथ ग्रामीण आजीविका को भी नई मजबूती मिल रही है। जशपुर जिले में वर्षा जल के अधिकतम संचयन और भू-जल पुनर्भरण के उद्देश्य से घरों, शासकीय संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर बड़ी संख्या में सोक पिट बनाए जा रहे हैं। इन संरचनाओं से उपयोग किए गए जल का पुनर्भरण संभव हो रहा है तथा जलभराव की समस्या में भी कमी आ रही है। पहाड़ी एवं ढलान वाले क्षेत्रों में वाटर एब्जॉर्प्शन ट्रेंच और कंटूर ट्रेंच का निर्माण किया जा रहा है। ये संरचनाएं वर्षा जल के तीव्र बहाव को नियंत्रित कर मिट्टी के कटाव को रोकने के साथ जल को भूमि में समाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इससे भू-जल स्तर में सुधार और पर्यावरणीय संतुलन को भी बढ़ावा मिल रहा है।

ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाने के लिए जिले में आजीविका डबरी निर्माण कार्य तेजी से संचालित किए जा रहे हैं। वर्तमान में 495 आजीविका डबरियां निर्माणाधीन हैं। इन डबरियों में वर्षा जल संग्रहित होने से किसानों को रबी एवं ग्रीष्मकालीन फसलों की सिंचाई सुविधा मिलेगी, वहीं सब्जी उत्पादन, मत्स्य पालन और अन्य आयवर्धक गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा। जल संरक्षण के क्षेत्र में ‘नवा तरिया’ अभियान भी उल्लेखनीय परिणाम दे रहा है। नए तालाबों के निर्माण और पुराने जलाशयों के जीर्णाेद्धार से जल भंडारण क्षमता में वृद्धि हुई है। इसके सकारात्मक प्रभाव कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन गतिविधियों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

जशपुर जिले में 5 प्रतिशत मॉडल को भी प्रभावी रूप से लागू किया जा रहा है। इसके तहत प्रत्येक ग्राम के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के कम से कम 5 प्रतिशत हिस्से को जल संरक्षण संरचनाओं से आच्छादित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस पहल से वर्षा जल संचयन, भू-जल पुनर्भरण और जल उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में व्यापक कार्य किए जा रहे हैं। कलेक्टर रोहित व्यास ने जल संरक्षण कार्यों में सभी विभागों और ग्रामीण समुदायों की सक्रिय भागीदारी पर बल देते हुए कहा है कि जल संरक्षण केवल एक शासकीय कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनभागीदारी से संचालित जन आंदोलन है। सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सकता है। जशपुर जिले में संचालित ये नवाचार आधारित जल संरक्षण प्रयास जल संकट के स्थायी समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं। साथ ही ये पहल कृषि उत्पादन बढ़ाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।


जल संकट के बीच छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले ने पेश किया सामुदायिक जल संरक्षण का अनूठा मॉडल

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जब जल संकट दुनिया के सामने सबसे बड़ी जलवायु चुनौतियों में से एक बनता जा रहा है, ऐसे समय में कोरिया जिले ने यह साबित कर दिया है कि सबसे प्रभावी समाधान बड़े बांधों या भारी मशीनरी से नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी से शुरू होते हैं।

जल संचय जन भागीदारी की भावना के साथ जिले ने एक साधारण लेकिन क्रांतिकारी विचार को अपनाया—
क्या होगा अगर हर किसान अपनी जमीन का केवल 5% हिस्सा पानी के लिए समर्पित कर दे?

5% मॉडल: छोटी प्रतिबद्धता, बड़ा प्रभाव

आवा पानी झोकी आंदोलन के तहत किसानों ने स्वेच्छा से अपनी कृषि भूमि का 5% हिस्सा छोटे-छोटे रीचार्ज तालाब और सीढ़ीनुमा गड्ढे (टेर्रेस पिट) बनाने के लिए अलग रखा। इन संरचनाओं का उद्देश्य वर्षा जल को सीधे खेतों में ही रोकना और उसे जमीन में समाहित करना है।

इस पहल के उल्लेखनीय परिणाम सामने आए—

  • जो वर्षा जल पहले बहकर निकल जाता था, अब वह मिट्टी और भूजल को रिचार्ज कर रहा है

  • मिट्टी का कटाव काफी कम हुआ है

  • सूखे के दौरान भी फसलों में नमी बनी रहती है

  • भूजल स्तर में स्थिर और निरंतर सुधार हुआ है

यह मॉडल साबित करता है कि सतत जल प्रबंधन के लिए बड़े निवेश या विस्थापन की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सामूहिक इच्छा शक्ति ही सबसे बड़ा संसाधन है।

जनभागीदारी से मिला आंदोलन को बल

इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत समुदाय की सक्रिय भागीदारी रही।

  • महिलाओं ने “नीर नायिका” बनकर घर-घर जागरूकता फैलाने और सोक पिट निर्माण का नेतृत्व किया।

  • युवाओं ने “जल दूत” के रूप में ट्रेंच मैपिंग, नालों की सफाई और नुक्कड़ नाटक तथा वॉल आर्ट के माध्यम से जल संरक्षण का संदेश फैलाया।

  • सामूहिक श्रमदान से जिले में 440 से अधिक पारंपरिक तालाबों को पुनर्जीवित किया गया।

  • Pradhan Mantri Awas Yojana के 500 से अधिक लाभार्थियों ने अपने घरों के पास सोक पिट बनाकर इस अभियान को एक साझा सामाजिक जिम्मेदारी में बदल दिया।

भागीदारी से स्वामित्व की ओर

इस 5% मॉडल की सफलता केवल संरचनाओं में नहीं, बल्कि समुदाय के स्वामित्व की भावना में छिपी है।

  • 1,260 से अधिक किसानों ने अपनी जमीन पर 5% रिचार्ज प्रणाली अपनाई

  • पूरे जिले में 2,000 से अधिक सोक पिट बनाए गए

  • ग्रामीण आवास योजनाओं के लाभार्थियों ने भी स्वेच्छा से अपने घरों के पास सोक पिट बनाए

सामूहिक प्रयास का एक ऐतिहासिक उदाहरण तब देखने को मिला जब समुदायों ने सिर्फ तीन घंटे में 660 सोक पिट का निर्माण कर दिया।

पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ

इस पहल के प्रभाव स्पष्ट और मापनीय रहे—

  • कई गांवों में भूजल स्तर 3 से 4 मीटर तक बढ़ा

  • 17 दूरस्थ आदिवासी बस्तियों में सूख चुके झरने फिर से जीवित हो गए

  • मिट्टी में नमी बढ़ने से कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ

  • आजीविका स्थिर होने से मौसमी पलायन में लगभग 25% कमी आई

इस प्रकार जल सुरक्षा ने आर्थिक सुरक्षा को भी मजबूत किया है।

विज्ञान और जनभागीदारी का संगम

जिला प्रशासन ने माइक्रो-वाटरशेड मैपिंग, हाइड्रोजियोलॉजिकल अध्ययन और तकनीकी मार्गदर्शन के माध्यम से इस पहल को वैज्ञानिक आधार दिया। इससे हर संरचना को अधिकतम जल पुनर्भरण के लिए रणनीतिक रूप से बनाया गया।

जिले के कलेक्टर ने कहा,

“यह पहल केवल संरचनाओं के निर्माण तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य किसानों के भविष्य को सुरक्षित करना, पलायन को कम करना और हर गांव में भरोसेमंद जल उपलब्धता सुनिश्चित करना है।”

पूरे देश के लिए एक प्रेरक मॉडल

कोरिया का 5% मॉडल यह दर्शाता है कि जलवायु अनुकूलन विकेंद्रीकृत, कम लागत वाला और जनभागीदारी आधारित हो सकता है।

सिर्फ 5% भूमि समर्पित करके समुदायों ने अपने पानी के भविष्य को 100% सुरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

कोरिया जिले ने यह साबित कर दिया है कि जब समुदाय जल संरक्षण के लिए एकजुट होते हैं, तो प्राकृतिक संसाधनों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

करमरी में ग्रामीणों द्वारा मानव श्रृंखला बनाकर 'आत्मनिर्भर गांव - विकसित भारत' का दिया संदेश

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आजीविका डबरियों से मछली पालन, सिंचाई सुविधा, दलहन-तिलहन की खेती तथा उद्यानिकी गतिविधियों को मिलेगा बढ़ावा

रायपुर- आदिवासी बहुल एवं कृषि आधारित आजीविका वाले जिले मोहला मानपुर अम्बागढ़ चौकी की ग्राम पंचायत करमरी में सोमवार को वीबी जी राम जी (विकसित भारत गारंटी फ़ॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन-  ग्रामीण) के अंतर्गत जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम ग्रामीणों द्वारा मानव श्रृंखला बनाकर 'आत्मनिर्भर गांव - विकसित भारत' का संदेश दिया गया। इस दौरान योजना के प्रति उत्साह और सामुदायिक सहभागिता स्पष्ट रूप से देखने को मिली।    

कार्यक्रम के अंतर्गत कन्वर्जेंस आधारित आजीविका डबरी जैसे कृषि, मछली तालाब निर्माण कार्यों का अवलोकन किया गया। ये कार्य कृषि विभाग, उद्यानिकी विभाग, सीआरईडीए एवं वन विभाग के आपसी समन्वय से तैयार कार्ययोजना के अनुसार संचालित किए जा रहे हैं। इन आजीविका डबरियों से मछली पालन, सिंचाई सुविधा, दलहन-तिलहन की खेती तथा उद्यानिकी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। इससे आदिवासी एवं सीमांत किसानों को स्थायी आजीविका, खाद्य सुरक्षा और अतिरिक्त आय के अवसर उपलब्ध होंगे।

इस अवसर पर जिला पंचायत अध्यक्ष नम्रता सिंह ने ग्रामीणों को वीबी-जीराम जी योजना के उद्देश्यों, स्थानीय रोजगार सृजन और कन्वर्जेंस मॉडल की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ग्राम स्तर पर सक्रिय सहभागिता, पारदर्शिता और सामुदायिक स्वामित्व के बिना किसी भी योजना की सफलता संभव नहीं है, वीबी-जी राम जी इन मूल सिद्धांतों पर आधारित है।

कार्यक्रम के दौरान हितग्राही विनोद कुमार एवं दलपत साई मेहरू राम को मछली जाल का वितरण किया गया। इससे मछली पालन गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलेगा और ग्रामीणों में स्वरोजगार के प्रति उत्साह बढ़ेगा। हितग्राहियों ने बताया कि योजना से प्राप्त सहयोग के माध्यम से वे मछली पालन के साथ-साथ दलहन-तिलहन की खेती भी करेंगे, जिससे उनकी आय में निरंतर वृद्धि होगी और परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ बनेगी।ग्रामीणों ने वीबी-जीराम जी योजना को आदिवासी बहुल, कृषि-आधारित जिले के लिए सर्वांगीण विकास और      

आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया। गांव आत्मनिर्भर होंगे, तभी भारत विकसित बनेगा के संकल्प के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया। 

कार्यक्रम में जिल पंचायत सीईओ भारती चंद्राकर,जनप्रतिनिधि दिलीप वर्मा, पंचायत प्रतिनिधिगण, विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने सोशल मीडिया एक्स पर की प्रशंसा

करमरी के इस कार्यक्रम की प्रशंसा केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पोस्ट द्वारा करते हुए कार्यक्रम के फोटोग्राफ्स और वीडियो को भी शेयर किया गया है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद फ्लावर शो की सराहना की, रचनात्मकता और जन-भागीदारी को बताया प्रेरणादायी

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 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद फ्लावर शो की सराहना करते हुए इसे रचनात्मकता, सततता और जन-भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि यह आयोजन शहर की जीवंत भावना और प्रकृति के प्रति उसके गहरे प्रेम को सुंदरता से प्रदर्शित करता है।

फ्लावर शो के महत्व को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह कार्यक्रम वर्षों के साथ अपने स्वरूप, भव्यता और कल्पनाशीलता में निरंतर विस्तार करता गया है और आज यह अहमदाबाद की सांस्कृतिक समृद्धि तथा पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक बन चुका है।

गुजरात के मुख्यमंत्री द्वारा सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर किए गए एक पोस्ट के जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा:

“अहमदाबाद का फ्लावर शो हर किसी का मन मोह लेने वाला है! यह क्रिएटिविटी के साथ-साथ जन भागीदारी का अद्भुत उदाहरण है। इससे शहर की जीवंत भावना के साथ ही प्रकृति से उसका लगाव भी खूबसूरती से प्रदर्शित हो रहा है। यहां यह देखना भी उत्साह से भर देता है कि कैसे इस फ्लावर शो की भव्यता और कल्पनाशीलता हर साल निरंतर बढ़ती जा रही है। इस फ्लावर शो की कुछ आकर्षक तस्वीरें…”

प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी अहमदाबाद फ्लावर शो की बढ़ती लोकप्रियता, रचनात्मक प्रस्तुति और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता को रेखांकित करती है।





आईबी शताब्दी व्याख्यान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संबोधन: ‘जन-केंद्रित राष्ट्रीय सुरक्षा से विकसित भारत का निर्माण’

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भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आज (23 दिसंबर 2025) नई दिल्ली में “People-Centric National Security: Community Participation in Building Viksit Bharat” (जन-केंद्रित राष्ट्रीय सुरक्षा: विकसित भारत के निर्माण में सामुदायिक सहभागिता) विषय पर आयोजित आईबी शताब्दी एंडॉवमेंट व्याख्यान को संबोधित किया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि यह गर्व का विषय है कि स्वतंत्रता के बाद से ही इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) भारत के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा देश की एकता और अखंडता की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि इस व्याख्यान का विषय देश के लिए तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। आईबी सहित सभी संबंधित संस्थानों को यह जागरूकता फैलानी चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। सजग नागरिक राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सरकारी प्रयासों को मजबूत सहयोग प्रदान कर सकते हैं। जब नागरिक समुदाय के रूप में संगठित होते हैं, तो वे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सरकार की पहलों को प्रभावी समर्थन दे सकते हैं। संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है, जिनमें से कई राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक आयामों से जुड़े हैं। छात्र, शिक्षक, मीडिया, आवासीय कल्याण संघ, नागरिक समाज संगठन तथा अन्य अनेक समुदाय इन कर्तव्यों के प्रचार-प्रसार में भूमिका निभा सकते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि सामुदायिक सहभागिता राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ बनाती है। अनेक उदाहरण हैं, जब सजग नागरिकों ने समय पर सूचना देकर सुरक्षा संकट को टालने में पेशेवर बलों की मदद की है। राष्ट्रीय सुरक्षा की विस्तारित परिभाषा और रणनीति में जनता को केंद्र में रखा जाना चाहिए। नागरिकों को केवल मूक दर्शक नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने आसपास और उससे आगे के क्षेत्रों की सुरक्षा में सक्रिय भागीदार बनना चाहिए। ‘जन भागीदारी’ जन-केंद्रित सुरक्षा की आधारशिला है।

राष्ट्रपति ने कहा कि नागरिक पुलिस और आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों को जनता की सेवा की भावना के साथ कार्य करना चाहिए। यही सेवा भावना लोगों के बीच विश्वास पैदा करेगी, जो जन-केंद्रित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के विकास के लिए अनिवार्य है, जिसमें सामुदायिक सहभागिता एक प्रमुख तत्व होगी।

उन्होंने कहा कि भारत को बहु-आयामी सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सीमा क्षेत्रों में तनाव, आतंकवाद और उग्रवाद, विद्रोह और साम्प्रदायिक कट्टरता पारंपरिक सुरक्षा चिंताएँ रही हैं। हाल के वर्षों में साइबर अपराध एक गंभीर सुरक्षा खतरे के रूप में उभरे हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि देश के किसी भी हिस्से में सुरक्षा की कमी का आर्थिक प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है। सुरक्षा आर्थिक निवेश और विकास के प्रमुख कारकों में से एक है। ‘सुरक्षित भारत’ का निर्माण ‘समृद्ध भारत’ के लिए आवश्यक है।

राष्ट्रपति ने कहा कि वामपंथी उग्रवाद लगभग समाप्ति की ओर है। उन्होंने बताया कि आंतरिक सुरक्षा से जुड़े बलों और एजेंसियों की गहन कार्रवाई इसके पीछे प्रमुख कारण रही है। साथ ही, समुदायों का विश्वास जीतने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया गया। जनजातीय और दूरदराज के क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक समावेशन को बढ़ावा देना उग्रवादी और विद्रोही समूहों द्वारा लोगों के शोषण के खिलाफ प्रभावी सिद्ध हुआ है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सोशल मीडिया ने सूचना और संचार की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। इसमें सृजन और विनाश—दोनों की क्षमता है। गलत सूचना से लोगों की रक्षा करना एक बड़ी चुनौती है, जिसे निरंतर और प्रभावी ढंग से किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय हित में तथ्य-आधारित विमर्श प्रस्तुत करने वाले सक्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं का एक समुदाय तैयार करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे जटिल चुनौतियाँ गैर-पारंपरिक और डिजिटल प्रकृति की हैं, जिनमें से अधिकांश अत्याधुनिक तकनीकों से उत्पन्न होती हैं। ऐसे में तकनीकी रूप से सक्षम समुदायों का विकास आवश्यक है। डिजिटल धोखाधड़ी की बढ़ती समस्या के लिए घर, संस्थान और समुदाय—तीनों स्तरों पर सतर्कता जरूरी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म नागरिकों को फिशिंग, डिजिटल धोखाधड़ी और ऑनलाइन उत्पीड़न की रिपोर्ट करने में सक्षम बना सकते हैं और संबंधित एजेंसियों को रियल-टाइम डेटा उपलब्ध करा सकते हैं। इस डेटा के विश्लेषण से पूर्वानुमानात्मक पुलिसिंग मॉडल विकसित किए जा सकते हैं। सजग और सक्षम नागरिक समुदाय न केवल साइबर अपराधों के प्रति कम संवेदनशील होंगे, बल्कि इनके खिलाफ एक सुरक्षा कवच के रूप में भी कार्य करेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि यदि नागरिक कल्याण और जन सहभागिता को रणनीति के केंद्र में रखा जाए, तो नागरिक प्रभावी खुफिया और सुरक्षा स्रोत बन सकते हैं। जन भागीदारी से प्रेरित यह परिवर्तन 21वीं सदी की जटिल और बहुआयामी सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में सहायक होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सार्वजनिक सहभागिता के माध्यम से हम सभी मिलकर एक सजग, शांतिपूर्ण, सुरक्षित और समृद्ध भारत के निर्माण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ेंगे।

'मोर गांव, मोर पानी' महाअभियान के तहत विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित

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गौरेला पेंड्रा मरवाही- जिला प्रसाशन, फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी और नवनिर्माण चेतना मंच के संयुक्त तत्वधान में जिला पंचायत के नर्मदा सभा कक्ष में शुक्रवार को “मोर गांव, मोर पानी” महाअभियान के तहत विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह प्रशिक्षण सामुदायिक वन संसाधन अधिकार प्राप्त ग्राम सभाओं—भाडी, देवरीखुर्द, तिलोरा, पथर्रा एवं झिरनापोड़ी के सदस्यों, मेट, सचिव, रोजगार सहायक तथा पंचायत प्रतिनिधियों के लिए आयोजित किया गया। प्रशिक्षक नरेन्द्र यादव ने बताया कि इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य गाँव में जल उपलब्धता बढ़ाने के विभिन्न उपायों की जानकारी देना एवं उस जल के माध्यम से आजीविका संवर्धन, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण तथा सामुदायिक एवं व्यक्तिगत लाभों को समझाना था।


कार्यक्रम में ग्राम सभा सदस्यों, सामुदायिक प्रबंधन समिति, मेट, सचिव, रोजगार सहायक तथा पंचायत प्रतिनिधियों को बताया गया कि मनरेगा एक मांग-आधारित कार्यक्रम है। इसलिए ग्राम सभा में ऐसे सामुदायिक कार्यों की पहचान कर उन्हें कार्ययोजना में शामिल करना आवश्यक है, जिससे संसाधनों का बेहतर प्रबंधन हो सके और जंगल तथा गाँव की समृद्धि बढ़े। प्रतिभागियों को चोटी से घाटी सिद्धांत सरल भाषा में समझाया गया। बताया गया कि यदि भू-जल स्तर बढ़ाना है और मिट्टी कटाव रोकना है, तो पहाड़ी की चोटी से घाटी की ओर योजनाबद्ध तरीके से कार्य चयन करना आवश्यक है, तथा उसी सिद्धांत के अनुरूप ग्राम सभा द्वारा मनरेगा कार्ययोजना में उपयुक्त संरचनाओं की मांग रखना जरूरी है।

प्रतिभागियों को सीएलएआरटी का प्रशिक्षण भी दिया गया। यह  एक जीआईएस आधारित टूल है, जो क्षेत्र के भू-जल और सतही जल की भौगोलिक विशेषताओं का विश्लेषण कर बताता है, कि कहाँ रिचार्ज संरचनाएँ और कहाँ सतही जल संग्रहण के उपाय उपयुक्त होंगे। यह टूल ग्रामवासियों के लिए सरल है और उन्हें स्वयं योजना तथा डिज़ाइन तैयार करने में सक्षम बनाता है। इससे अधिकारियों को मनरेगा अनुमोदन प्रक्रिया तेज करने और योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने में भी सहायता मिलती है। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम स्थानीय समुदाय को अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं सतत प्रबंधन की दिशा में सशक्त बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो रहा है। प्रशिक्षण में नव निर्माण चेतना मंच से चन्द्र प्रताप सिंह, फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी से रामेश्वरी पूरी एवं रंजित पूरी उपस्थित थे।

हिमालय में कचरा प्रबंधन: स्वच्छ, टिकाऊ और तकनीक-सक्षम पहाड़ी पहलें

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जैसे ही सूरज की पहली किरण हिमालय की चोटियों को छूती है, पहाड़ों में जीवन धीरे-धीरे सक्रिय हो जाता है। हिल टाउन में सफाई कर्मचारी संकरी गलियों से कचरा एकत्र करते हैं। स्कूल परिसरों में छात्र नियमित रूप से कचरे का पृथक्करण करते हैं, और तीर्थस्थलों पर आगंतुक निर्धारित कलेक्शन पॉइंट्स का उपयोग करते हैं। ये रोजमर्रा की गतिविधियाँ हिमालयी क्षेत्रों में संगठित कचरा प्रबंधन की ओर बढ़ते प्रयासों को दर्शाती हैं, जो ऊंचाई, कठिन भूगोल, जलवायु की विविधता और सीमित भूमि उपलब्धता जैसी परिस्थितियों से प्रभावित हैं।

मौसमी पर्यटन और तीर्थयात्रा गतिविधियाँ इन कार्यों की मांग बढ़ाती हैं, जिसके लिए स्थानीय अनुकूल और विकेंद्रीकृत समाधान आवश्यक हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, सभी स्तरों की सरकारों ने स्वच्छ भारत मिशन–अर्बन 2.0 के तहत स्रोत से पृथक्करण, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन और सक्रिय नागरिक एवं संस्थागत भागीदारी पर जोर देते हुए कचरा प्रबंधन प्रयासों को सुदृढ़ किया है।

केदारनाथ में डिजिटल रिफंड सिस्टम से प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण

उत्तराखंड के प्रमुख तीर्थस्थल केदारनाथ में हजारों श्रद्धालुओं के आगमन के दौरान प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण होता है। इस समस्या के समाधान के लिए मई 2022 में राज्य सरकार ने Recykal के सहयोग से डिजिटल डिपॉजिट रिफंड सिस्टम (DRS) शुरू किया।

  • प्लास्टिक की बोतलों और मल्टीलेयर प्लास्टिक (MLPs) आइटम्स पर यूनीक सीरियलाइज्ड आइडेंटिफिकेशन (USI) QR कोड जारी किए जाते हैं, जिसके लिए ₹10 का refundable deposit लिया जाता है।

  • श्रद्धालु उपयोग किए गए आइटम्स को निर्दिष्ट बिंदुओं या गोरिकुंड और केदारनाथ मंदिर में लगे दो रिवर्स वेंडिंग मशीनों (RVMs) पर लौटाते हैं। जमा राशि UPI के माध्यम से वापस की जाती है।

  • एकत्रित प्लास्टिक कचरे को मटेरियल रिकवरी फैसिलिटीज (MRF) में भेजकर रिसाइक्लिंग किया जाता है।

परिणाम:

  • अन्य चारधाम में DRS लागू: गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ

  • 20 लाख से अधिक बोतलें रीसायकल हुईं

  • 66 MT CO₂ उत्सर्जन कम हुआ

  • 110+ रोजगार सृजित हुए

ग्रीन कैंपस फ्रेमवर्क: जम्मू-कश्मीर के संस्थान

जम्मू-कश्मीर में स्वच्छता और सतत विकास की आदतें धीरे-धीरे संस्थागत जीवन का हिस्सा बन रही हैं। स्कूल, कार्यालय, अस्पताल और सार्वजनिक स्थानों पर कचरे को अलग करना और पुन: उपयोगी विकल्प अपनाना आम प्रथा बन गया है।

  • हाउसिंग और अर्बन डेवलपमेंट विभाग के नेतृत्व में 1,093 परिसरों को संरचित प्रमाणन प्रक्रिया में शामिल किया गया।

  • प्रक्रिया में पहचान, तैयारी और घोषणा की तीन चरणों पर जोर दिया गया, जिसमें कचरे का पृथक्करण, ऑन-साइट कंपोस्टिंग और सिंगल-यूज प्लास्टिक में कमी शामिल थी।

  • छात्र, कर्मचारी और आगंतुक पुन: उपयोगी विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित हुए।

प्रभाव:

  • बेहतर सैनिटेशन सुविधाएं

  • 'Waste to Art' और ग्रीन कॉर्नर जैसी रचनात्मक पहलें

  • अनंतनाग पहला शहरी निकाय, जिसने सभी परिसरों को ग्रीन घोषित किया

धर्मशाला: नवाचार और सहयोग के माध्यम से कचरा प्रबंधन

हिमाचल प्रदेश की धर्मशाला नगर निगम ने 2021 से कचरा प्रबंधन को मजबूत किया।

  • क्लीन बिजनेस प्रोग्राम: व्यवसायों को प्रशिक्षण और प्रमाणन प्रदान करता है।

  • मॉडल वार्ड प्रोग्राम: समुदाय स्तर पर पृथक्करण और स्वच्छता सुधार।

  • Waste Under Arrest: जिला सुधार गृह में कैदी कचरा प्रबंधन में भाग लेते हैं और व्यावहारिक कौशल प्राप्त करते हैं।

प्रभाव:

  • 25% कचरा पृथक्करण में वृद्धि

  • 30% सड़क कचरा में कमी

  • 40% लैंडफिल कचरा में कमी

  • MRF के माध्यम से रिसाइक्लिंग में मजबूती

लेह में तकनीक और नवाचार

उच्च ऊंचाई और दूरस्थ इलाके में कचरा प्रबंधन के लिए लेह में सोलर-पावर्ड सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट पहल 2020 में शुरू हुई।

  • दैनिक 30 टन तक कचरे का प्रसंस्करण

  • 100% स्रोत से पृथक्करण और 90% सामग्री पुनःप्राप्ति लक्ष्य

  • रिसाइक्लिंग, कंपोस्टिंग और पुन: उपयोग

  • कमाई से परिचालन लागत पूरी होती है

विशेषता:

  • सर्कुलर इकोनॉमी दृष्टिकोण

  • दूरस्थ, उच्च ऊंचाई वाली जगह में संचालन

  • नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग

  • स्थानीय उत्पादों में पुनःप्रयोग

हिमालय की महिलाएं: SHG द्वारा सतत समाधान

बागेश्वर, उत्तराखंड में महिलाओं के नेतृत्व वाली पहल ने 2017–18 में राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM) के तहत कचरा प्रबंधन को मजबूत किया।

  • Sakhi Autonomous Cooperative Society ने 11 वार्ड्स में डोर-टू-डोर कलेक्शन संभाली

  • संकरी और ढलान वाली गलियों में कचरा ले जाया जाता है

  • सदस्यों की संख्या बढ़कर 47 हुई, दो सदस्य पर्यवेक्षक बने

  • दैनिक ₹100 आय के साथ वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित

  • स्वच्छ सर्वेक्षण 2019 और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स से मान्यता

निष्कर्ष

हिमालयी राज्यों में ये पहलें एक ऐसी भविष्य की ओर इशारा करती हैं, जहां कचरा प्रबंधन प्रणालियाँ भारत के विकास लक्ष्यों के अनुरूप विकसित होती हैं। समुदाय की भागीदारी, संस्थागत जिम्मेदारी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीक का उपयोग करके, ये राज्य स्वच्छ भारत मिशन–अर्बन 2.0 के तहत संसाधन दक्षता, सर्कुलर इकोनॉमी और नागरिक नेतृत्व वाली पहल को सुदृढ़ कर रहे हैं।


सुजलम भारत समिट 2025: जल सुरक्षा और सतत प्रबंधन के लिए दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन नई दिल्ली में शुरू

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नई दिल्ली- केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा आयोजित “Vision for Sujalam Bharat” समिट 2025 आज भारत मंडपम, नई दिल्ली में शुरू हुआ। यह दो दिवसीय समिट 28–29 नवंबर तक जारी रहेगा। समिट में केंद्रीय मंत्रालयों, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि, तकनीकी विशेषज्ञ, पंचायत सदस्य, एनजीओ, स्वयं सहायता समूह (SHG) और राष्ट्रीय जल पुरस्कार एवं जल संचय जन भागीदारी पुरस्कार विजेताओं ने भाग लिया। उद्घाटन का आरंभ पारंपरिक ‘जल कलश’ समारोह से किया गया।

समिट को संबोधित करते हुए केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप, यह समिट जल प्रबंधन, स्वच्छता और सतत प्रथाओं को मजबूत करने के लिए क्षेत्रीय अनुभव और समुदाय की भागीदारी को राष्ट्रीय नीति निर्माण में शामिल करने का एक मंच है। उन्होंने बताया कि भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 18% हिस्सा है, जबकि ताजे पानी के स्रोत केवल 4% हैं। शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, भूमि उपयोग में परिवर्तन और जलवायु अस्थिरता जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए समुदाय आधारित जल संरक्षण संरचनाएँ आवश्यक हैं।

उन्होंने जल शक्ति अभियान (JSA) और जल संचय जन भागीदारी (JSJB) के तहत बड़े पैमाने पर जल संरक्षण और पुनर्भरण प्रयासों की जानकारी दी। साथ ही नामामी गंगे कार्यक्रम, जल जीवन मिशन (JJM) और स्वच्छ भारत मिशन (SBM) के माध्यम से पीने के पानी और स्वच्छता की सुविधाओं में सुधार की जा रही है।

उद्घाटन सत्र में जल संचय जन भागीदारी 1.0 पुस्तक और बराक नदी बेसिन के पारिस्थितिक मूल्यांकन रिपोर्ट का विमोचन किया गया। इसके अलावा गंगा पल्स पब्लिक पोर्टल का भी उद्घाटन किया गया, जो जनता को नदी स्वास्थ्य की वास्तविक समय की जानकारी प्रदान करेगा।

केंद्रीय मंत्री ने SAMRIDHI-MCAD के माध्यम से वैज्ञानिक और प्रेशर आधारित सिंचाई प्रणालियों द्वारा जल प्रबंधन में सुधार और JSA:CTR 2025 के तहत 22.5 लाख जल संरक्षण कार्यों और 42 लाख से अधिक वृक्षारोपण गतिविधियों की उपलब्धि साझा की।

समिट के मुख्य विषय निम्नलिखित हैं:

  1. नदियों और स्रोतों का पुनर्जीवन – निरंतर और स्वच्छ धारा सुनिश्चित करना।

  2. पीने के पानी की स्थिरता – सुरक्षित और पर्याप्त पानी की व्यवस्था।

  3. जल प्रबंधन के लिए तकनीक – डिजिटल उपकरण, एआई आधारित निगरानी और माइक्रो-इरिगेशन।

  4. जल संरक्षण और पुनर्भरण – समुदाय आधारित भूजल प्रबंधन और परंपरागत प्रणालियों का पुनरुद्धार।

  5. ग्रे वाटर प्रबंधन और पुन: उपयोग – घरेलू, औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों में जल का पुन: उपयोग।

  6. सामुदायिक एवं संस्थागत भागीदारी – व्यवहार परिवर्तन और दीर्घकालीन जल सुरक्षा के लिए समुदाय का सशक्तिकरण।

दो दिवसीय समिट में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ तकनीकी विशेषज्ञ, पंचायत सदस्य और पुरस्कार विजेताओं ने भाग लिया। प्रतिभागियों की सिफारिशों के आधार पर मंत्रालय आगामी कार्यान्वयन चरण के लिए संरचित और व्यावहारिक मार्गदर्शन तैयार करेगा।

समापन में केंद्रीय मंत्री ने कहा:

“सुझलम भारत केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय प्रयास है, जो जल-सुरक्षित, स्वस्थ और सशक्त समुदाय बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस समिट के माध्यम से हम प्रधानमंत्री के विजन के अनुरूप एक जल-समृद्ध, सतत और समृद्ध भारत के निर्माण की दिशा में काम करेंगे।”


देशभर के सिनेमा घरों में आज से दिखाई जाएगी “जन योजना अभियान – सबकी योजना, सबका विकास” पर दो मिनट की जनजागरूकता फिल्म

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आज, 24 अक्टूबर 2025 से लेकर 6 नवंबर 2025 तक, देशभर के सिनेमा घरों में “जन योजना अभियान – सबकी योजना, सबका विकास” पर आधारित दो मिनट की सार्वजनिक जागरूकता (PSA) फिल्म प्रदर्शित की जाएगी। यह पहल प्रधानमंत्री के जनभागीदारी और सरकारी योजनाओं के संतृप्तिकरण के दृष्टिकोण के अनुरूप है। इस अभियान का उद्देश्य आगामी वित्तीय वर्ष 2026–27 के लिए पंचायत विकास योजनाओं के निर्माण में जन-जागरूकता और लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करना है।

यह फिल्म यह संदेश देती है कि प्रत्येक नागरिक स्थानीय स्तर पर विकास की दिशा तय करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह फिल्म सिनेमा घरों में फिल्म शुरू होने से पहले और इंटरवल के अंतिम पाँच मिनटों के दौरान प्रदर्शित की जाएगी। इसे सार्वजनिक सेवा जागरूकता फिल्मों के प्रदर्शन के दिशा-निर्देशों के अनुसार दिखाया जाएगा, उन राज्यों को छोड़कर जहाँ वर्तमान में आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू है।

जन योजना अभियान (People’s Plan Campaign - PPC) 2025–26 को 2 अक्टूबर 2025 को देशभर के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शुरू किया गया था। इस अभियान के माध्यम से पंचायतों को साक्ष्य-आधारित और समावेशी पंचायत विकास योजनाएँ (Panchayat Development Plans) तैयार करने में सक्षम बनाया जा रहा है, जो स्थानीय प्राथमिकताओं के साथ-साथ राष्ट्रीय लक्ष्यों से भी मेल खाती हैं। ये योजनाएँ विशेष ग्राम सभाओं के माध्यम से तैयार की जाती हैं।

2018 में शुरू हुआ जन योजना अभियान – सबकी योजना, सबका विकास, अब एक प्रमुख पहल (flagship initiative) के रूप में विकसित हो चुका है। इसने ग्राम स्तर पर लोकतंत्र को सशक्त करने, भागीदारीपूर्ण योजना प्रक्रिया को संस्थागत रूप देने, और स्वशासन की नींव को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है।

ई-ग्रामस्वराज पोर्टल के अनुसार, 2019–20 से अब तक 18.13 लाख से अधिक पंचायत विकास योजनाएँ — जिनमें ग्राम पंचायत विकास योजनाएँ (GPDPs), ब्लॉक पंचायत विकास योजनाएँ (BPDPs) और जिला पंचायत विकास योजनाएँ (DPDPs) शामिल हैं — अपलोड की जा चुकी हैं। इनमें से 2.52 लाख योजनाएँ वर्तमान 2025–26 चक्र के अंतर्गत अपलोड की गई हैं।

इस सार्वजनिक जागरूकता फिल्म के माध्यम से, ग्रामीण विकास मंत्रालय का उद्देश्य नागरिकों की पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के साथ संलग्नता को और गहरा करना तथा उन्हें स्थानीय शासन और ग्रामीण विकास में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना है।

🎥 लघु फिल्म देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

नीति आयोग ने हिमालयी क्षेत्रों में हर मौसम में नल से जल आपूर्ति पर आयोजित किया मंथन सत्र, संकलन किया जारी

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नई दिल्ली- नीति आयोग ने आज हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में हर मौसम में नल से जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक मंथन सत्र (Brainstorming Session) का आयोजन किया और इस विषय पर एक संकलन (Compendium) जारी किया।

इस सत्र में जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, हिमालयी राज्य लद्दाख और हिमाचल प्रदेश, आईआईटी मंडी जैसे शैक्षणिक संस्थानों तथा विभिन्न राज्यों में कार्यरत जमीनी संगठनों के विशेषज्ञों ने भाग लिया।

सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने जल सुरक्षा को सुदृढ़ करने और समुदायों की आजीविका में सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव साझा किए। चर्चाओं में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि केंद्र और राज्य सरकारों के हस्तक्षेपों में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। इससे संपत्तियों पर समुदाय की स्वामित्व भावना बढ़ेगी और जल संसाधनों की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

विशेषज्ञों ने भूगोल, कठोर मौसम, कार्यान्वयन की चुनौतियाँ, तकनीक के उपयोग और डेटा विश्लेषण जैसी बाधाओं से निपटने के उपायों पर भी चर्चा की। उन्होंने सतत कृषि मॉडल, कृषि-वनीकरण (Agro-Forestry), झरनों का पुनर्जीवन, ड्रिप आधारित जल आपूर्ति प्रणालियाँ और नवीन अभियांत्रिकी सामग्री के उपयोग जैसी पहलें अपनाने की सिफारिश की।

सत्र में यह भी बताया गया कि स्थानीय समुदायों की क्षमता निर्माण (Capacity Building) से उनकी सतत भागीदारी सुनिश्चित हुई है। साथ ही, समुदाय के सदस्यों के कौशल की औपचारिक मान्यता (Formal Skill Recognition) की आवश्यकता पर बल दिया गया ताकि उन्हें बेहतर रोजगार और आजीविका के अवसर प्राप्त हो सकें।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि झरनों पर एक “Centre of Excellence” स्थापित किया जाए, जिससे सभी हितधारक एक मंच पर आकर झरनों के पुनर्जीवन और दीर्घकालिक स्थायित्व के लिए मिलकर कार्य कर सकें।

जारी किया गया संकलन (Compendium) हिमालयी राज्यों के नवाचारों, सफल अनुभवों और केस स्टडीज़ को प्रस्तुत करता है, जो दर्शाता है कि प्रौद्योगिकी, सामुदायिक भागीदारी और नीतिगत एकीकरण के माध्यम से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी सतत जल आपूर्ति संभव है।


कानूनी मामलों के विभाग ने ‘स्वच्छता ही सेवा – 2025’ में सक्रिय भागीदारी दिखाई

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अधिकारियों, कर्मचारियों और सफाईमित्रों ने मिलकर मुख्य सचिवालय और सार्वजनिक स्थलों की सफाई की, रंगोलियाँ और निबंध प्रतियोगिता आयोजित की गई

दिल्ली– शास्त्री भवन और इसके समवर्ती कार्यालयों में कानूनी मामलों के विभाग (DLA), न्याय मंत्रालय ने 17 सितंबर से 2 अक्टूबर तक ‘स्वच्छता ही सेवा – 2025’ अभियान का सफल आयोजन किया। इस दौरान अधिकारियों, कर्मचारियों और सफाईमित्रों ने मिलकर कार्यालयों, सार्वजनिक स्थलों और स्वच्छता लक्षित इकाइयों की सफाई की।

25 सितंबर को आयोजित “एक दिन, एक घंटा, एक साथ” अभियान में केंद्रीय विधि सचिव डॉ. अंजु राठी राणा ने अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ स्वेच्छा श्रमदान किया। मुख्य सचिवालय में ई-वेस्त्र की सफाई, स्वच्छता शपथ, रंगोलियों और निबंध प्रतियोगिताओं के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया गया। सफाईमित्रों का सम्मान और स्वास्थ्य जांच शिविर भी आयोजित किए गए।

इस पहल ने यह संदेश दिया कि स्वच्छता केवल श्रम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और उत्सव भी है। विभाग ने यह भी रेखांकित किया कि स्वच्छता का अभ्यास केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन का अंग होना चाहिए, जिससे आत्मनिर्भर और विकसित भारत का सपना साकार हो।



ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ‘स्वच्छता ही सेवा – 2025’ अभियान में दिखाई सक्रिय भागीदारी

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नई दिल्ली– ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2025 तक देशव्यापी ‘स्वच्छता ही सेवा – 2025’ अभियान में सक्रिय भागीदारी की। यह अभियान DDWS और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के सहयोग से आयोजित किया गया।

मंत्रालय ने 22 सितंबर को कर्तव्य भवन-3, नई दिल्ली में शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया, जिसमें अधिकारियों और कर्मचारियों ने स्वच्छता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई और प्रतिवर्ष 100 घंटे स्वच्छता गतिविधियों को समर्पित करने का संकल्प लिया।

25 सितंबर को मंत्रालय ने एक दिवसीय जनश्रम (Mass Cleanliness Drive) आयोजित किया, जिसमें अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय नागरिकों ने सामूहिक प्रयास के तहत स्वच्छता का संदेश फैलाया। 26 सितंबर को उन्नति कॉन्फ्रेंस हॉल, कृषि भवन में ‘स्वच्छोत्सव’ चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें बच्चों और युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

अभियान के तहत मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अमृत सरोवर स्थलों पर गतिविधियाँ आयोजित करने और स्वयंसेवी वृक्षारोपण (5 लाख पौधे) के लिए प्रोत्साहित किया। वृक्षारोपण स्थलों को MeriLIFE पोर्टल पर जियो-टैग और मैप किया गया।

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इन पहलों के माध्यम से स्वच्छ भारत मिशन और महात्मा गांधी के स्वच्छ और प्रगतिशील भारत के दृष्टिकोण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, और देश में स्वच्छता, जिम्मेदार नागरिकता और सामुदायिक भागीदारी की संस्कृति को बढ़ावा देने का संदेश दिया।




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