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भारत और श्रीलंका ने ऊर्जा सहयोग को नई गति देने पर किया मंथन, बिजली क्षेत्र में कई अहम परियोजनाओं की समीक्षा

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नई दिल्ली- भारत और श्रीलंका ने आज नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में बिजली क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग की व्यापक समीक्षा की। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व केंद्रीय विद्युत एवं आवास एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल ने किया, जबकि श्रीलंका की ओर से बंदरगाह एवं नागरिक उड्डयन तथा ऊर्जा मंत्री अनुरा करुणाथिलके ने प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया।

बैठक के दौरान दोनों देशों ने भारत–श्रीलंका एचवीडीसी (HVDC) इंटरकनेक्शन परियोजना और संपूर सौर ऊर्जा परियोजना की प्रगति की समीक्षा की। साथ ही सीमा-पार बिजली व्यापार, नवीकरणीय ऊर्जा, ट्रांसमिशन अवसंरचना और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर भी विस्तृत चर्चा की गई।

दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में परिवर्तन को गति देने के लिए आपसी सहयोग को और विस्तार देने पर सहमति जताई। इस दौरान भारत ने टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB) के माध्यम से सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत ट्रांसमिशन सिस्टम विकसित करने के अपने अनुभव भी साझा किए।

बैठक में मौजूदा द्विपक्षीय तंत्रों के तहत हुई प्रगति की समीक्षा करते हुए दोनों देशों ने सतत विकास और क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए बिजली क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने भारत और श्रीलंका के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। वहीं श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री अनुरा करुणाथिलके ने भारत के निरंतर सहयोग की सराहना करते हुए ऊर्जा क्षेत्र में द्विपक्षीय साझेदारी को और विस्तार देने की इच्छा व्यक्त की।

बैठक में भारत सरकार की ओर से विद्युत मंत्रालय के सचिव पंकज अग्रवाल सहित वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। श्रीलंका के प्रतिनिधिमंडल में भारत में श्रीलंका की उच्चायुक्त महिषिणी कोलोन्ने तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे।

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन: स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर रेल परिवहन की ओर ऐतिहासिक कदम

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17 जुलाई 2026 को दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के निकट जींद और सोनीपत के बीच भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। अब तक यह ट्रेन 1,200 किलोमीटर से अधिक की सफल यात्रा पूरी कर चुकी है और इस दौरान 3,200 लीटर से अधिक डीज़ल की बचत हुई है।

हाइड्रोजन ट्रेन कैसे काम करती है?

हाइड्रोजन ट्रेन में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच होने वाली रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से ट्रेन के भीतर ही बिजली उत्पन्न की जाती है। यही बिजली ट्रेन को संचालित करती है। इस प्रक्रिया में केवल जलवाष्प (Water Vapour) निकलती है, जबकि धुआँ या कार्बन उत्सर्जन बिल्कुल नहीं होता। इस कारण हाइड्रोजन ट्रेन वर्तमान समय की सबसे स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल रेल प्रणालियों में से एक मानी जाती है।

पूर्णतः स्वदेशी तकनीक पर आधारित परियोजना

यह परियोजना भारतीय रेल के नेतृत्व में विकसित एक पूर्णतः स्वदेशी (Indigenous) पहल है। 10 कोचों वाली इस ट्रेन में दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार लगाए गए हैं, जो संयुक्त रूप से 2,400 किलोवाट शक्ति प्रदान करते हैं। ट्रेन में ऊर्जा भंडारण के लिए लिथियम आयरन फॉस्फेट (LiFePO₄) बैटरियाँ तथा हाइड्रोजन सिलेंडरों का उपयोग किया गया है।

भारत की पहली समर्पित हाइड्रोजन भंडारण सुविधा

जींद में भारतीय रेल की पहली समर्पित हाइड्रोजन स्टोरेज सुविधा स्थापित की गई है। इसमें 500 बार तक के दबाव पर ग्रीन हाइड्रोजन का भंडारण किया जाता है तथा 350 बार के दबाव पर ईंधन उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा की कुल भंडारण क्षमता लगभग 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन है।

उच्चतम सुरक्षा मानकों से सुसज्जित

हाइड्रोजन ट्रेन में सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसमें गैस रिसाव, तापमान, आग और धुएँ का पता लगाने के लिए अनेक स्वतंत्र सुरक्षा प्रणालियाँ स्थापित की गई हैं। इसके साथ ही स्वचालित शट-ऑफ सिस्टम, निरंतर वेंटिलेशन, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन तथा सभी आवश्यक तकनीकी परीक्षण एवं प्रमाणीकरण सुनिश्चित किए गए हैं।

जींद–सोनीपत खंड पर सफल संचालन के बाद अब दिल्ली मार्ग पर भी परीक्षण जल्द प्रारंभ किया जाएगा।

हरित भविष्य की ओर भारत का कदम

भारत की हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि स्वदेशी हाइड्रोजन रेल इकोसिस्टम की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह परियोजना शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission) रेल परिवहन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है तथा भविष्य में स्वच्छ, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल रेल सेवाओं के विस्तार का मार्ग प्रशस्त करती है।

यह उपलब्धि भारत को हरित परिवहन (Green Mobility) और स्वच्छ ऊर्जा आधारित रेल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में एक मजबूत आधार प्रदान करती है।

नीति आयोग ने ‘शांति अधिनियम, 2025’ के कार्यान्वयन पर हितधारक परामर्श बैठक आयोजित की

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नीति आयोग ने 10 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के समरसता ऑडिटोरियम में ‘शांति अधिनियम, 2025’ (SHANTI Act, 2025) के कार्यान्वयन पर एक हितधारक परामर्श (Stakeholder Consultation) आयोजित किया। इस बैठक में सरकार, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग जगत के प्रमुख नीति-निर्माताओं, विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों ने भाग लेकर इस ऐतिहासिक अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए परिचालन ढांचे (Operational Framework) पर विचार-विमर्श किया।

बैठक की अध्यक्षता प्रो. अभय करंदीकर, सदस्य, नीति आयोग ने की। इस अवसर पर पंकज अग्रवाल (सचिव, विद्युत मंत्रालय), घनश्याम प्रसाद (अध्यक्ष, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण), गुरदीप सिंह (सीएमडी, एनटीपीसी लिमिटेड), डॉ. अंशु भारद्वाज (कार्यक्रम निदेशक, नीति आयोग), राजनाथ राम (सलाहकार, नीति आयोग), डॉ. गरिमा शर्मा (प्रमुख, एसएसएसडी, परमाणु ऊर्जा विभाग) तथा  हरि कुमार (विशिष्ट वैज्ञानिक एवं निदेशक, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड) सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया।

तकनीकी चर्चाओं को अधिनियम के सफल कार्यान्वयन के लिए तीन प्रमुख स्तंभों में विभाजित किया गया:

1. विधायी एवं नियामकीय ढांचा (Legislative & Regulatory Framework):

इस सत्र में शांति अधिनियम, 2025 के मसौदा नियमों, विनियमों तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से संबंधित प्रावधानों पर चर्चा हुई। साथ ही अधिनियम के तहत वैधानिक अनुपालन (Statutory Compliance) की रूपरेखा प्रस्तुत की गई और इस बात पर विचार किया गया कि घरेलू हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए विदेशी निवेश को कैसे आकर्षित किया जा सकता है।

2. वित्त, बीमा एवं जनधारणा (Finance, Insurance & Public Perception):

हितधारकों ने अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक वित्तीय तंत्र तथा जोखिम-प्रबंधन व्यवस्था पर विचार-विमर्श किया। दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए उपयुक्त बीमा व्यवस्था, जन-जागरूकता बढ़ाने, स्थानीय समुदायों का विश्वास मजबूत करने तथा परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के प्रति व्यापक जन-स्वीकृति विकसित करने की रणनीतियों पर भी चर्चा हुई।

3. विनिर्माण, संचालन एवं क्षमता निर्माण (Manufacturing, Operations & Capacity Building):

इस सत्र में अधिनियम के क्रियान्वयन चरण पर विशेष ध्यान दिया गया। घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने, परिचालन तैयारियों को सुनिश्चित करने, कुशल मानव संसाधन विकसित करने, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को अधिक सुदृढ़ बनाने तथा उद्योग के विस्तार के लिए विशेष क्षमता निर्माण कार्यक्रम तैयार करने पर विचार किया गया।

बैठक के दौरान हितधारकों ने इन तीनों प्रमुख विषयों पर अपने महत्वपूर्ण सुझाव और विचार साझा किए। इन सुझावों से ‘शांति अधिनियम, 2025’ के कार्यान्वयन ढांचे को और अधिक प्रभावी, मजबूत एवं व्यावहारिक बनाने में सहायता मिलेगी।

भारत की स्वच्छ परिवहन नीति में हो सकते हैं बड़े बदलाव, E25 योजना की समीक्षा शुरू

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नई दिल्ली- देश में प्रदूषण कम करने और पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार अपनी स्वच्छ परिवहन (Clean Transport) नीति की समीक्षा कर रही है। इसी क्रम में पेट्रोल में 25% एथेनॉल मिश्रण (E25) लागू करने की योजना पर दोबारा विचार किया जा रहा है।

सरकार का लक्ष्य एथेनॉल के अधिक उपयोग से विदेशी तेल पर निर्भरता कम करना, किसानों को लाभ पहुंचाना और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना है। हालांकि विशेषज्ञों और ऑटोमोबाइल उद्योग का मानना है कि सभी वाहन E25 ईंधन के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। इससे कुछ पुराने वाहनों के इंजन, माइलेज और रखरखाव पर असर पड़ सकता है।

इसी वजह से सरकार तकनीकी पहलुओं, वाहन निर्माताओं की तैयारियों और उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत अध्ययन कर रही है। समीक्षा के बाद ही E25 को लागू करने की दिशा में अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

वहीं दूसरी ओर सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को बढ़ावा देने पर भी लगातार काम कर रही है। देशभर में चार्जिंग स्टेशनों का विस्तार, बैटरी तकनीक को बेहतर बनाने और EV अपनाने को आसान बनाने के लिए नई योजनाओं पर काम जारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को स्वच्छ परिवहन के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए एथेनॉल आधारित ईंधन, इलेक्ट्रिक वाहन और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के बीच संतुलित रणनीति अपनानी होगी।

मुख्य बातें

  •  E25 (25% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) योजना की समीक्षा जारी।

  •  पुराने वाहनों की तकनीकी अनुकूलता पर सरकार का विशेष ध्यान।

  •  इलेक्ट्रिक वाहनों और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से बढ़ावा।

  •  लक्ष्य—प्रदूषण कम करना, विदेशी तेल पर निर्भरता घटाना और किसानों की आय बढ़ाना।

प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना से राजनांदगांव का साहू परिवार बना ऊर्जा आत्मनिर्भर

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3-3 किलोवाट के दो सोलर रूफटॉप प्लांट से बिजली बिल हुआ शून्य, अतिरिक्त आय का भी खुला रास्ता

रायपुर- प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना प्रदेश में ऊर्जा आत्मनिर्भरता और हरित ऊर्जा को नई गति दे रही है। राजनांदगांव जिले के ग्राम गठुला का साहू परिवार इस योजना का लाभ लेकर न केवल अपना बिजली बिल शून्य करने में सफल हुआ है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा अपनाने की प्रेरक मिसाल भी बन गया है।

ग्राम गठुला में टीकम होटल का संचालन करने वाले अंकालु राम साहू और उनके पुत्र कुंदन साहू ने अपने घर पर 3-3 किलोवाट क्षमता के दो सोलर रूफटॉप प्लांट स्थापित किए। होटल व्यवसाय के कारण प्रतिमाह 4 से 5 हजार रुपये तक का बिजली बिल आता था, जिसे कम करने के लिए उन्होंने सौर ऊर्जा को अपनाया।

साहू परिवार ने योजना के पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन कर पंजीकृत वेंडर के माध्यम से सोलर प्लांट स्थापित कराया। दोनों प्लांटों की कुल लागत लगभग 4 लाख रुपये रही, जिसमें केंद्र एवं राज्य शासन से कुल 2 लाख 16 हजार रुपये की सब्सिडी सीधे बैंक खाते में प्राप्त हुई। इससे उनकी लागत में उल्लेखनीय कमी आई।

सोलर प्लांट शुरू होने के बाद परिवार का बिजली बिल लगभग शून्य हो गया है। नेट मीटरिंग व्यवस्था के तहत अतिरिक्त उत्पादित बिजली ग्रिड में भेजी जा रही है, जिससे भविष्य में अतिरिक्त आय की भी संभावना बनी है। अब साहू परिवार केवल बिजली का उपभोक्ता नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादक भी बन गया है।

साहू परिवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह योजना आम नागरिकों के लिए आर्थिक बचत, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी माध्यम है।

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत सोलर रूफटॉप प्लांट लगाने पर केंद्र एवं राज्य शासन द्वारा आकर्षक सब्सिडी के साथ राष्ट्रीयकृत बैंकों के माध्यम से रियायती ब्याज दर पर ऋण सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे अधिक से अधिक परिवार स्वच्छ एवं सस्ती ऊर्जा से जुड़ रहे हैं।

विकसित भारत 2047 के लिए भारत को वैश्विक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी हब बनाने पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

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नई दिल्ली- केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने आज नई दिल्ली में 'इलेक्ट्रिक मोबिलिटी : विकसित भारत के लिए भारत को वैश्विक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी हब बनाना' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता मुख्य अतिथि के रूप में की। एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (ASSOCHAM) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में वरिष्ठ नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, ऑटोमोबाइल निर्माताओं, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों तथा अन्य हितधारकों ने भाग लिया। सम्मेलन में भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को तेजी से अपनाने तथा देश को वैश्विक ईवी विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की रणनीति पर व्यापक चर्चा हुई।

सम्मेलन के दौरान नीति की निरंतरता, मजबूत चार्जिंग अवसंरचना, विनिर्माण के स्थानीयकरण, सुदृढ़ बैटरी आपूर्ति श्रृंखला, वित्तीय सहायता तथा तकनीकी नवाचार को इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के विस्तार के लिए आवश्यक बताया गया। प्रतिभागियों ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप भारत को वैश्विक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी हब बनाने के लिए इन क्षेत्रों में समन्वित प्रयासों पर बल दिया।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत का इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर संक्रमण केवल एक तकनीक को दूसरी तकनीक से बदलने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे सतत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की दिशा में कदम है जो विनिर्माण को सशक्त बनाए, हरित रोजगार सृजित करे और प्रधानमंत्री के विकसित भारत 2047 के विजन को साकार करने में योगदान दे।

उन्होंने कहा कि इस परिवर्तन के दौरान सरकार का ध्यान हरित विकास, मजबूत अवसंरचना, पारदर्शी प्रशासन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने वाली सर्कुलर इकोनॉमी पर केंद्रित है।

 मंत्री यादव ने बताया कि सरकार ने पर्यावरणीय स्वीकृतियों को सरल बनाने, PARIVESH पोर्टल के माध्यम से अनुमोदन प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण, अनुपालन आवश्यकताओं के युक्तिकरण तथा पर्यावरणीय सुरक्षा से समझौता किए बिना कारोबार सुगमता को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। इन सुधारों से निवेश को गति मिलने के साथ जिम्मेदार विकास को भी बढ़ावा मिल रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत को पारंपरिक 'लेना–बनाना–फेंकना' (Take-Make-Dispose) मॉडल से आगे बढ़कर पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और संसाधनों के सतत प्रबंधन पर आधारित सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में अग्रसर होना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को मजबूत चार्जिंग नेटवर्क, उन्नत विनिर्माण के स्थानीयकरण, महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति, बैटरी रीसाइक्लिंग और संसाधन दक्षता के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

केंद्रीय मंत्री ने उद्योग, नीति-निर्माताओं और अनुसंधान संस्थानों से मिलकर नवाचार आधारित पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने का आह्वान किया, जिससे भारत स्वच्छ परिवहन और हरित विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बन सके। उन्होंने कहा, "पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ना होगा। सामूहिक प्रयासों के माध्यम से भारत सतत विनिर्माण, हरित मोबिलिटी और जलवायु-अनुकूल विकास में वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर सकता है।"

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में ASSOCHAM के अध्यक्ष एवं यूएनओ मिंडा के चेयरमैन निर्मल के. मिंडा, ASSOCHAM राष्ट्रीय ग्रीन मोबिलिटी परिषद के अध्यक्ष एवं जेबीएम समूह के वाइस चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक निशांत आर्य, तथा ASSOCHAM के महासचिव सौरभ सान्याल भी उपस्थित रहे।

ब्रिक्स 2026 की अध्यक्षता में भारत ग्लोबल साउथ को देगा ऊर्जा सुरक्षा का नेतृत्व: प्रधानमंत्री मोदी

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर द्वारा लिखे गए एक लेख को साझा करते हुए कहा कि ब्रिक्स (BRICS) 2026 की अध्यक्षता के दौरान भारत का लक्ष्य ग्लोबल साउथ को सुरक्षित, लचीले, न्यायसंगत और सतत वैश्विक ऊर्जा भविष्य के केंद्र में स्थापित करना है।

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स (X) पर कहा कि भारत का मानना है कि मजबूत और टिकाऊ ऊर्जा प्रणाली केवल प्रभावी घरेलू नीतियों से ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मजबूत वैश्विक साझेदारी से भी निर्मित होती है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अपने लेख में स्पष्ट किया है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और वैश्विक सहयोग के माध्यम से विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत की ब्रिक्स 2026 अध्यक्षता के दौरान ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग, नवाचार और सतत विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ ग्लोबल साउथ की आवाज़ को वैश्विक मंच पर और अधिक प्रभावी बनाने पर विशेष जोर दिया जाएगा।

सरकार का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारी भविष्य की वैश्विक चुनौतियों से निपटने और सभी देशों के लिए सुरक्षित एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

भारत में ग्रीन यूरिया उत्पादन की दिशा में बड़ा कदम, उर्वरक विभाग ने आयोजित की प्री-ईओआई बैठक

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सतत कृषि, कार्बन न्यूट्रैलिटी और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उर्वरक विभाग (Department of Fertilizers - DoF) ने भारत में ग्रीन यूरिया संयंत्रों की स्थापना के लिए प्री-एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (Pre-EOI) की उच्चस्तरीय बैठक का सफल आयोजन किया। यह बैठक प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (PDIL), नोएडा में आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता उर्वरक विभाग के संयुक्त सचिव एवं PDIL के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. के.के. पाठक ने की।

इस सप्ताह की शुरुआत में उर्वरक विभाग ने भारत में ग्रीन यूरिया संयंत्र स्थापित करने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया था। प्री-ईओआई बैठक में NTPC, सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI), ग्रीन अमोनिया एवं यूरिया प्रौद्योगिकी प्रदाता, प्रमुख उर्वरक कंपनियां, इलेक्ट्रोलाइजर निर्माता, ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया क्षेत्र की कंपनियां सहित सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के अनेक हितधारकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन भाग लिया। बड़ी संख्या में भागीदारी इस महत्वाकांक्षी पहल को साकार करने की व्यापक रुचि को दर्शाती है।

प्रमुख नीतिगत और परिचालन बिंदु

1. विभिन्न मंत्रालयों का समन्वित सहयोग

ग्रीन यूरिया उत्पादन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए कई मंत्रालयों की वित्तीय सहायता सुनिश्चित की गई है।

  • नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ग्रीन ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करने के लिए 19,744 करोड़ रुपये उपलब्ध कराएगा।

  • उर्वरक विभाग (DoF) ग्रीन अमोनिया को देश की उर्वरक उत्पादन प्रणाली में शामिल करने के लिए आवश्यक नीतिगत एवं संस्थागत ढांचा तैयार करेगा।

2. निर्माताओं के लिए सब्सिडी व्यवस्था

ग्रीन अमोनिया का उत्पादन फिलहाल पारंपरिक ग्रे अमोनिया की तुलना में महंगा है। इसे प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार विशेष सब्सिडी व्यवस्था लागू करेगी।

  • SECI ग्रीन अमोनिया उत्पादकों से खरीदकर उर्वरक कंपनियों को ग्रे अमोनिया के बाजार मूल्य पर उपलब्ध कराएगा।

  • उर्वरक विभाग दोनों कीमतों के बीच का अंतर वहन करेगा, जिससे उर्वरक कंपनियों पर अतिरिक्त लागत का बोझ नहीं पड़ेगा।

3. उत्पादकों को वित्तीय प्रोत्साहन

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के तहत ग्रीन अमोनिया उत्पादकों को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता दी जाएगी।

  • प्रतिवर्ष 7.24 लाख मीट्रिक टन ग्रीन अमोनिया की खरीद का लक्ष्य।

  • SECI द्वारा पारदर्शी ई-रिवर्स नीलामी के माध्यम से आवंटन।

  • नए ग्रीनफील्ड और निर्माणाधीन परियोजनाओं को सहायता।

  • व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने के बाद नकद प्रोत्साहन।

  • 10 वर्षों के लिए दीर्घकालिक खरीद समझौते (GAPA/GASA) के माध्यम से बाजार की सुनिश्चितता।

पुडिमाडका पायलट परियोजना बनी मॉडल

बैठक में आंध्र प्रदेश के पुडिमाडका स्थित 150 टन प्रतिदिन क्षमता वाले ग्रीन यूरिया पायलट प्लांट पर भी चर्चा हुई। NTPC की अनुसंधान इकाई NETRA द्वारा विकसित यह संयंत्र कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCUS) तथा वॉटर इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक का उपयोग करता है। यह परियोजना कार्बोनेटेड फ्लाई ऐश, फूड-ग्रेड उत्पादों और सिंथेटिक ईंधन जैसे उपयोगों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

ग्रीन यूरिया उत्पादन के लिए भारत की रणनीति

भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत ग्रीन हाइड्रोजन के माध्यम से ग्रीन अमोनिया उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, ग्रीन यूरिया के निर्माण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की भी आवश्यकता होती है।

इसके लिए तापीय बिजलीघर, सीमेंट और इस्पात संयंत्रों से प्राप्त कैप्चर की गई CO₂ का उपयोग किया जाएगा।

  • 12.7 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले एक विश्वस्तरीय यूरिया संयंत्र को हर वर्ष लगभग 10 लाख मीट्रिक टन CO₂ की आवश्यकता होगी।

  • भारत वर्तमान में हर वर्ष लगभग 1 करोड़ मीट्रिक टन यूरिया आयात करता है।

  • देश के कई मौजूदा यूरिया संयंत्र 30 वर्ष से अधिक पुराने हो चुके हैं, इसलिए नई उत्पादन क्षमता विकसित करना आवश्यक है।

ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को मिलेगा बल

नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर, ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया उत्पादन को एकीकृत करने वाली परियोजनाएं भारत की ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों को मजबूत करेंगी।

NTPC जैसी संस्थाएं, जिनके पास बिजली उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और उर्वरक क्षेत्र का अनुभव है, इन परियोजनाओं के नेतृत्व के लिए उपयुक्त मानी जा रही हैं।

सरकार ने निवेशकों से राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और विकसित हो रहे कार्बन कैप्चर ढांचे का लाभ उठाकर एकीकृत ग्रीन यूरिया परियोजनाएं विकसित करने का आह्वान किया है।

यह पहल भारत को स्वच्छ ऊर्जा आधारित उर्वरक उत्पादन, तकनीकी आत्मनिर्भरता, कार्बन उत्सर्जन में कमी और सतत कृषि की दिशा में एक नई पहचान दिलाने की क्षमता रखती है।

कोयला मंत्रालय के रोडशो में कोयला गैसीफिकेशन को लेकर बड़े निवेश और ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर जोर

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नई दिल्ली- कोयला मंत्रालय ने नई दिल्ली में “सरफेस कोल/लिग्नाइट गैसीफिकेशन परियोजनाओं के संवर्धन” योजना पर एक सफल रोडशो का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों, उद्योग जगत के नेताओं, तकनीकी प्रदाताओं, निवेशकों और वित्तीय संस्थानों की बड़ी भागीदारी देखी गई।

कार्यक्रम में केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि राज्य मंत्री सतिश चंद्र दुबे  विशिष्ट अतिथि रहे। साथ ही मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

कोयला गैसीफिकेशन को बताया रणनीतिक मिशन

केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने अपने संबोधन में कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारत आत्मनिर्भर और भविष्य-उन्मुख ऊर्जा प्रणाली की ओर तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि कोयला गैसीफिकेशन केवल एक ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक राष्ट्रीय मिशन है।

उन्होंने बताया कि सरकार ने इस क्षेत्र के लिए ₹8,500 करोड़ की प्रोत्साहन योजना शुरू की है और हाल ही में ₹37,500 करोड़ की अतिरिक्त वित्तीय सहायता को मंजूरी दी गई है। इससे लगभग ₹2.5 लाख करोड़ तक के निवेश आकर्षित होने की उम्मीद है।

आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर

मंत्री ने कहा कि कोयला गैसीफिकेशन से भारत की LNG, मेथनॉल, अमोनिया और उर्वरकों जैसे महत्वपूर्ण उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम होगी। इससे किसानों, उद्योगों और उपभोक्ताओं को वैश्विक मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा मिलेगी।

उन्होंने कहा कि यह तकनीक उर्वरक, पेट्रोकेमिकल्स, हाइड्रोजन और उन्नत निर्माण जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा करेगी और देश को स्वच्छ कोयला तकनीक में वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जाएगी।

रोजगार और औद्योगिक विकास को बढ़ावा

राज्य मंत्री सतिश चंद्र दुबे ने कहा कि यह योजना देश की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगी। उन्होंने बताया कि यह पहल विशेष रूप से कोयला-समृद्ध और पिछड़े क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करेगी और औद्योगिक विकास को गति देगी।

भारत को वैश्विक ऊर्जा हब बनाने की दिशा

कोयला सचिव विक्रम देव दत्त ने कहा कि भारत अपने प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम और समझदारीपूर्ण उपयोग कर रहा है। उन्होंने कहा कि कोयला गैसीफिकेशन के जरिए भारत सिंथेटिक गैस, अमोनिया, यूरिया, हाइड्रोजन और स्टील उत्पादन जैसे क्षेत्रों में आयात निर्भरता को कम कर सकता है।

उन्होंने यह भी बताया कि यह योजना लगभग 25 परियोजनाओं के माध्यम से करीब 50,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित कर सकती है।

भविष्य की ऊर्जा रणनीति पर फोकस

कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव और भू-राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए भारत को अपनी घरेलू क्षमताओं को मजबूत करना आवश्यक है। रोडशो में उद्योग जगत और निवेशकों के साथ तकनीकी, वित्तीय और नीति संबंधी मुद्दों पर विस्तृत चर्चा भी हुई।

मंत्रालय ने कहा कि कोयला गैसीफिकेशन को “आत्मनिर्भर भारत” और “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में विकसित किया जाएगा।


भारत में स्वदेशी टाइप-IV CNG कंपोजिट सिलेंडर निर्माण सुविधा स्थापित करने हेतु TDB और NTF Energy Solutions के बीच समझौता

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भारत सरकार के स्वच्छ ऊर्जा गतिशीलता को बढ़ावा देने, कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने तथा आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत स्वदेशी विनिर्माण को सशक्त करने के दृष्टिकोण के अनुरूप, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार ने दिल्ली स्थित M/s NTF Energy Solutions Private Limited के साथ “टाइप-IV CNG सिलेंडर के व्यावसायीकरण हेतु विनिर्माण सुविधा की स्थापना” नामक परियोजना के लिए एक समझौता किया है।

इस परियोजना का उद्देश्य उन्नत विनिर्माण सुविधा स्थापित करना है, जिसके माध्यम से अत्याधुनिक फिलामेंट वाइंडिंग, ब्लो मोल्डिंग और उच्च-दबाव परीक्षण तकनीकों का उपयोग कर स्वदेशी रूप से विकसित टाइप-IV कंपोजिट CNG सिलेंडरों का उत्पादन और व्यावसायीकरण किया जाएगा। यह पहल स्वच्छ परिवहन और उभरते ऊर्जा अनुप्रयोगों के लिए उन्नत गैस भंडारण प्रणालियों में भारत की घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

टाइप-IV कंपोजिट सिलेंडर पारंपरिक इस्पात सिलेंडरों का अगली पीढ़ी का विकल्प हैं, जो लगभग 75% तक वजन में कमी प्रदान करते हैं, जिससे वाहन की दक्षता बढ़ती है और कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आती है। इन सिलेंडरों में जंग-रोधी पॉलिमर लाइनर, अनुकूलित CFRP ले-अप और उन्नत मैकेनिकल लॉकिंग सिस्टम का उपयोग किया गया है, जो सुरक्षा, टिकाऊपन तथा रिसाव, कंपन और दबाव चक्रों के प्रति प्रतिरोध को बढ़ाते हैं। इनका डिज़ाइन 600 बार से अधिक बर्स्ट प्रेशर प्राप्त करता है, जो नियामक मानकों से काफी अधिक है और संचालन सुरक्षा को मजबूत बनाता है।

यह तकनीक NTF Energy Solutions Pvt. Ltd. द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित की गई है और इसे भारत के तेजी से बढ़ते CNG मोबिलिटी इकोसिस्टम को समर्थन देने के लिए डिजाइन किया गया है। यह परियोजना सरकार के स्वच्छ परिवहन, स्वच्छ ईंधन और उन्नत मोबिलिटी घटकों के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के व्यापक लक्ष्य के अनुरूप है।

प्रस्तावित सुविधा स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल और उन्नत विनिर्माण प्रक्रियाओं का उपयोग कर उच्च-दबाव कंपोजिट सिलेंडरों के लिए एक लागत-प्रतिस्पर्धी और भविष्य-उन्मुख उत्पादन प्रणाली विकसित करेगी। यह परियोजना आयात प्रतिस्थापन, तकनीकी आत्मनिर्भरता और देश में एक मजबूत स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगी।

इस अवसर पर TDB के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा, “उन्नत टाइप-IV कंपोजिट सिलेंडरों का विकास और व्यावसायीकरण भारत के स्वच्छ गतिशीलता ढांचे और स्वदेशी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। NTF Energy Solutions को TDB का समर्थन सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके तहत वह सतत परिवहन, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत में योगदान देने वाली अगली पीढ़ी की तकनीकों को सक्षम बना रही है।”

NTF Energy Solutions Pvt. Ltd. के प्रबंध निदेशक नवीन जैन और निदेशक नमन जैन ने TDB के समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया और कहा कि यह सहायता स्वदेशी हल्के कंपोजिट सिलेंडर तकनीकों के व्यावसायीकरण को तेज करेगी, जिससे कंपनी भारत के स्वच्छ और अधिक दक्ष गतिशीलता समाधान की दिशा में संक्रमण में योगदान दे सकेगी।

कोयला गैसीफिकेशन मिशन में बड़ी उपलब्धि

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कोयला मंत्रालय ने भारत के कोयला गैसीफिकेशन मिशन को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। ₹8,500 करोड़ की वित्तीय प्रोत्साहन योजना (Financial Incentive Scheme) के तहत राउंड-II की कैटेगरी-III में लेटर ऑफ अवॉर्ड (LoA) जारी किया गया है।

इस अवसर पर  संजय कुमार झा अतिरिक्त सचिव (कोयला मंत्रालय) ने कार्तिकेय वायुनंदना प्राइवेट लिमिटेड को महाराष्ट्र के गडचिरोली में कोल-टू-एसेटिक एसिड प्लांट स्थापित करने के लिए LoA सौंपा।

प्रोजेक्ट की मुख्य बातें:

  • 💰 कुल निवेश: ₹793 करोड़

  • 🏭 उत्पादन: एसेटिक एसिड

  • ⚙️ क्षमता: 75,900 टन प्रति वर्ष (TPA)

  • 📍 स्थान: गडचिरोली, महाराष्ट्र

यह परियोजना घरेलू कोयले के वैल्यू-एडेड उपयोग की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

योजना की प्रगति

  • पहले राउंड में 7 परियोजनाएं पहले से कार्यान्वयन में हैं।

  • राउंड-II के तहत कैटेगरी-II और III में निवेश को बढ़ावा देने के लिए RFP आमंत्रित किए गए हैं।

कैटेगरी-III के तहत:

  • प्रति प्रोजेक्ट ₹100 करोड़ तक या

  • कुल लागत (Capex) का 15% (जो कम हो) तक वित्तीय सहायता दी जाती है।

क्या होगा फायदा?

  • घरेलू केमिकल उत्पादन को बढ़ावा

  • आयात पर निर्भरता में कमी

  • आत्मनिर्भर भारत को मजबूती

  • स्वच्छ और कुशल कोयला उपयोग से टिकाऊ औद्योगिक विकास

यह पहल भारत में सस्टेनेबल इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम बनाने और कोयले के बेहतर उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

रूस के बाद भारत बनेगा फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करने वाला दूसरा देश: डॉ. जितेंद्र सिंह

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केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि रूस के बाद भारत दुनिया का दूसरा देश होगा जो व्यावसायिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करेगा। “स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स” विषय पर सांसदों और विधायकों की कार्यशाला को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि भारत ने तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का विकास कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, जिसने 6 अप्रैल 2026 को पहली बार क्रिटिकलिटी प्राप्त की।

यह रिएक्टर Indira Gandhi Centre for Atomic Research (IGCAR) द्वारा विकसित और BHAVINI द्वारा निर्मित है। यह भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत को दर्शाता है। इसमें यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड ईंधन का उपयोग होता है, जो जितना ईंधन खर्च करता है उससे अधिक उत्पन्न करता है। इस उपलब्धि के साथ भारत अपने विशाल थोरियम भंडार के उपयोग की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता तरुण चुघ ने की। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह उपलब्धि भारत को परमाणु रणनीति के तीसरे चरण में थोरियम के उपयोग की दिशा में ले जाती है। पूरी तरह संचालन में आने के बाद भारत, रूस के बाद, व्यावसायिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर चलाने वाला दूसरा देश बन जाएगा।

वर्तमान में केवल रूस ही व्यावसायिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित कर रहा है, जबकि भारत अपने रिएक्टर के कमीशनिंग के उन्नत चरण में है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, जर्मनी और चीन जैसे कई देशों ने पहले प्रयोगात्मक फास्ट रिएक्टर विकसित किए थे, लेकिन इनमें से अधिकांश कार्यक्रम अब बंद हो चुके हैं।

मंत्री ने कहा कि प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की स्थापना भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो परमाणु ईंधन के अधिक कुशल उपयोग को सक्षम बनाता है और थोरियम के उपयोग का मार्ग प्रशस्त करता है।

उन्होंने यह भी कहा कि फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तकनीक में केवल कुछ ही देशों ने प्रगति की है, जिससे भारत को वैश्विक स्तर पर एक विशेष स्थान मिलता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने जोर देकर कहा कि परमाणु ऊर्जा भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और दीर्घकालिक स्थिरता लक्ष्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, खासकर 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने में।

उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को भविष्य में निरंतर और विश्वसनीय स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता होगी, जहां परमाणु ऊर्जा अपरिहार्य होगी।

मंत्री ने स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs), नीतिगत समर्थन और SHANTI एक्ट जैसी पहलों के महत्व पर भी प्रकाश डाला, जो निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देंगे। “न्यूक्लियर मिशन” के तहत 20,000 करोड़ रुपये के निवेश के साथ 2033 तक 5 SMRs स्थापित करने की योजना है।

उन्होंने कहा कि SMRs उद्योगों, घनी आबादी वाले क्षेत्रों, दूरदराज के इलाकों और ग्रिड से दूर क्षेत्रों में बिजली उत्पादन के लिए उपयोगी होंगे।

अंत में, उन्होंने कहा कि परमाणु, नवीकरणीय और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का संतुलित मिश्रण 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

भूटान दौरे पर पहुंचे केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल, ऊर्जा सहयोग को मिलेगी नई गति

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नई दिल्ली/थिम्फू- केंद्रीय ऊर्जा तथा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल चार दिवसीय भूटान दौरे पर आज पहुंचे। उनका यह दौरा भारत-भूटान के बीच मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों को और गहराई देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

भारत और भूटान के बीच लंबे समय से आपसी विश्वास, समझ और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग पर आधारित उत्कृष्ट संबंध रहे हैं। यह दौरा विशेष रूप से ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

दौरे के दौरान मनोहर लाल ने भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे से मुलाकात की। इस बैठक में दोनों नेताओं ने स्वच्छ ऊर्जा और सतत विकास के क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

इसके अलावा, उन्होंने भूटान सरकार के ऊर्जा एवं प्राकृतिक संसाधन मंत्री ल्योंपो जेम त्शेरिंग के साथ भी बैठक की। इस दौरान जलविद्युत क्षेत्र में चल रहे सहयोग को मजबूत करने, नवीकरणीय ऊर्जा के नए अवसरों और क्षेत्रीय बिजली व्यापार को बढ़ावा देने पर चर्चा हुई।

ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के दायरे को विस्तारित करते हुए, भारत और भूटान ने एक सशक्त द्विपक्षीय संस्थागत ढांचा स्थापित किया है। यह तंत्र दोनों देशों के बीच चल रही और भविष्य की परियोजनाओं की नियमित समीक्षा और समन्वय सुनिश्चित करेगा। सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में गैर-जल ऊर्जा, सीमा-पार ट्रांसमिशन, परियोजना वित्तपोषण, क्षमता निर्माण और संस्थागत साझेदारी शामिल हैं।

इस अवसर पर दोनों देशों के बीच दो महत्वपूर्ण समझौते भी हुए—

  1. पुनात्सांगछू-II जलविद्युत परियोजना का टैरिफ प्रोटोकॉल:

    1020 मेगावाट की इस परियोजना का संयुक्त उद्घाटन 11 नवंबर 2025 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक द्वारा किया गया था। 19 सितंबर 2025 से इस परियोजना से अतिरिक्त बिजली का भारत को निर्यात शुरू हो चुका है।

  2. रिएक्टिव एनर्जी अकाउंटिंग की कार्यप्रणाली:

    यह तकनीकी ढांचा ग्रिड स्थिरता बढ़ाने, बिजली विनिमय की दक्षता सुधारने और दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार को सुगम बनाने में मदद करेगा।

इस दौरे के दौरान हुई चर्चाएं और समझौते भारत-भूटान संबंधों को नई दिशा देने के साथ-साथ दोनों देशों की समृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

स्वदेशी तकनीक की जीत: भारत का PFBR रिएक्टर हुआ सफल

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भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में, 500 मेगावाट (MWe) प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने 6 अप्रैल 2026 को रात 08:25 बजे सफलतापूर्वक पहली क्रिटिकलिटी (नियंत्रित विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया की शुरुआत) हासिल की। यह देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और स्वदेशी परमाणु तकनीक को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह उपलब्धि डॉ. अजीत कुमार मोहंती (सचिव, परमाणु ऊर्जा विभाग एवं अध्यक्ष, परमाणु ऊर्जा आयोग), श्रीकुमार जी. पिल्लई (निदेशक, IGCAR), अल्लू अनंत (CMD-इन-चार्ज, BHAVINI) और  के.वी. सुरेश कुमार (पूर्व CMD, BHAVINI) की उपस्थिति में हासिल की गई। यह सभी मानकों को पूरा करने के बाद संभव हुआ, जिन्हें परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) ने कठोर सुरक्षा समीक्षा के बाद मंजूरी दी थी।

PFBR का डिजाइन और तकनीकी विकास पूरी तरह से इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) द्वारा किया गया, जो परमाणु ऊर्जा विभाग का एक अनुसंधान केंद्र है। इसका निर्माण और संचालन भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) द्वारा किया गया।

फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत की दीर्घकालिक परमाणु रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पारंपरिक रिएक्टरों के विपरीत, PFBR में यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग होता है। इसके कोर के चारों ओर यूरेनियम-238 की परत होती है, जो तेज न्यूट्रॉन की मदद से प्लूटोनियम-239 में परिवर्तित हो जाती है। इससे रिएक्टर जितना ईंधन उपयोग करता है, उससे अधिक उत्पन्न करने में सक्षम होता है।

इस रिएक्टर को भविष्य में थोरियम-232 के उपयोग के लिए भी डिजाइन किया गया है, जो परिवर्तित होकर यूरेनियम-233 बनेगा और भारत के परमाणु कार्यक्रम के तीसरे चरण को ऊर्जा प्रदान करेगा।

यह क्षमता देश के सीमित यूरेनियम संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करती है और भविष्य में थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन का मार्ग प्रशस्त करती है।

पहली क्रिटिकलिटी हासिल करने के साथ ही भारत अपने तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को साकार करने के और करीब पहुंच गया है। फास्ट ब्रीडर तकनीक वर्तमान रिएक्टरों और भविष्य के थोरियम आधारित रिएक्टरों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती है।

यह उपलब्धि भारत की स्वदेशी डिजाइन, इंजीनियरिंग और निर्माण क्षमता को दर्शाती है। इस रिएक्टर में उन्नत सुरक्षा प्रणाली, उच्च तापमान तरल सोडियम कूलिंग तकनीक और क्लोज्ड फ्यूल साइकिल का उपयोग किया गया है, जिससे परमाणु सामग्री का पुनर्चक्रण संभव होता है और अपशिष्ट कम होता है।

यह परियोजना वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और उद्योग सहयोगियों के समर्पण का परिणाम है, जिन्होंने स्वदेशी तकनीकों और उपकरणों के माध्यम से इसका निर्माण किया। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में देश की बढ़ती तकनीकी क्षमता को भी दर्शाता है।

ऊर्जा उत्पादन के अलावा, यह कार्यक्रम परमाणु ईंधन चक्र, उन्नत सामग्री, रिएक्टर भौतिकी और बड़े पैमाने की इंजीनियरिंग में देश की रणनीतिक क्षमता को मजबूत करता है।

जैसे-जैसे भारत स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विश्वसनीय, कम-कार्बन और उच्च दक्षता वाली ऊर्जा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

पहली क्रिटिकलिटी की यह उपलब्धि न केवल एक तकनीकी मील का पत्थर है, बल्कि “विकसित भारत” के लिए एक सतत और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य की दिशा में बड़ा कदम भी है।


भारत-यूके सहयोग से EV चार्जिंग में बड़ी पहल, उन्नत तकनीक से बनेगा स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर

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नई दिल्ली: भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड (TDB) ने Scharge Pvt Limited के साथ “Powering EV Charging Innovation” परियोजना के लिए समझौता किया है। यह परियोजना भारत-यूके संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम के तहत चलाई जा रही है, जिसमें ब्रिटेन की Albright Product Design Limited भी भागीदार है।

⚡ EV चार्जिंग में नई तकनीक

इस परियोजना का उद्देश्य इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के लिए अगली पीढ़ी की चार्जिंग प्रणाली विकसित करना है, खासकर:

  • कमर्शियल फ्लीट

  • डिपो ऑपरेशन्स

के लिए।

इसमें Scharge द्वारा विकसित स्मार्ट चार्ज कंट्रोलर और यूके पार्टनर की पेटेंटेड ऑटोमैटेड केबल मैनेजमेंट सिस्टम को जोड़ा जाएगा।

🚗 क्या है खास?

नई तकनीक में:

  • मोटराइज्ड ओवरहेड केबल मैनेजमेंट सिस्टम

  • कम मैन्युअल काम

  • केबल की कम टूट-फूट

  • बेहतर सुरक्षा और सुविधा

जैसी विशेषताएं शामिल हैं।

यह सिस्टम मौजूदा AC Type-2 EV चार्जर्स के साथ भी काम करेगा।

🏭 डिपो में काम होगा आसान

इस समाधान से:

  • चार्जिंग समय कम होगा

  • उपकरण सुरक्षित रहेंगे

  • कार्य प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होगी

साथ ही केबल डैमेज और अन्य जोखिमों को भी कम किया जा सकेगा।

स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा

Scharge Pvt Limited इस परियोजना के जरिए:

  • भारत में EV तकनीक को मजबूत करेगा

  • स्मार्ट चार्जिंग सिस्टम विकसित करेगा

  • टिकाऊ और बड़े स्तर पर उपयोगी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करेगा

क्या बोले अधिकारी?

TDB के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा कि भारत-यूके जैसे सहयोगी कार्यक्रम नई और उपयोगी तकनीकों के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। EV चार्जिंग में नवाचार, देश में इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाने के लिए जरूरी है।

निष्कर्ष

यह परियोजना भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को नई गति देगी। उन्नत तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए देश में सुरक्षित, स्मार्ट और भविष्य के लिए तैयार EV चार्जिंग सिस्टम विकसित किया जाएगा।

शहरी क्षेत्रों में PNG विस्तार को मिलेगा गति, 50 लाख नए कनेक्शन देने का लक्ष्य

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नई दिल्ली- विज्ञान भवन में आज शहरी क्षेत्रों में पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) सेवाओं के विस्तार और आवश्यक सेवाओं की निरंतर आपूर्ति पर एक उच्चस्तरीय राउंडटेबल समीक्षा बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में केंद्र और राज्यों के कई वरिष्ठ मंत्री, अधिकारी, नगर निकायों के प्रतिनिधि तथा गैस कंपनियों के प्रमुख शामिल हुए।

बैठक में आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय और उपभोक्ता मामले मंत्रालय के केंद्रीय मंत्रियों ने भाग लिया। इसके अलावा विभिन्न राज्यों के मंत्री और अधिकारी भी उपस्थित रहे, जबकि कुछ राज्यों ने वर्चुअली हिस्सा लिया।

बैठक में बताया गया कि शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए PNG नेटवर्क का विस्तार जरूरी है। पेट्रोलियम मंत्रालय की प्रस्तुति में PNG को LPG के मुकाबले अधिक सुरक्षित, सस्ता और पर्यावरण अनुकूल बताया गया। हालांकि, राइट ऑफ वे (RoW) मंजूरी, नगर निगम की अनुमति और ऊंचे शुल्क जैसी समस्याएं इसके विस्तार में बाधा बन रही हैं।

केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने शहरों को आर्थिक विकास का इंजन बताते हुए PNG विस्तार को मिशन मोड में लागू करने पर जोर दिया। उन्होंने सिंगल विंडो क्लीयरेंस, बेहतर शहरी योजना और अंतिम छोर (last-mile) तक कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई। साथ ही 50 लाख नए PNG कनेक्शन देने का लक्ष्य भी रखा गया।

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य का जिक्र करते हुए PNG इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर जोर दिया, जबकि उपभोक्ता मंत्री प्रह्लाद जोशी ने आवश्यक सेवाओं की निर्बाध आपूर्ति, अफवाहों पर रोक और ईंधन की कालाबाजारी रोकने की आवश्यकता बताई।

बैठक में राज्यों ने सुझाव दिया कि RoW शुल्क को कम या अस्थायी रूप से माफ किया जाए और मंजूरी प्रक्रिया को सरल व समयबद्ध बनाया जाए। साथ ही LPG से PNG में चरणबद्ध बदलाव के लिए जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।

बैठक के अंत में यह सहमति बनी कि PNG नेटवर्क विस्तार को तेज करने के लिए ठोस कार्ययोजना, बेहतर समन्वय और नियमित निगरानी व्यवस्था लागू की जाएगी, जिससे शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।



स्वच्छ ऊर्जा में बड़ी सफलता: नए पॉलिमर से ऊर्जा भंडारण और हाइड्रोजन उत्पादन में क्रांतिकारी प्रगति

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ऊर्जा भंडारण और स्वच्छ ईंधन (हाइड्रोजन) उत्पादन के क्षेत्र में एक बड़ी प्रगति करते हुए वैज्ञानिकों ने नए, आसानी से संश्लेषित और अत्यधिक प्रभावी पॉलिमरिक पदार्थ विकसित किए हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

Zn(DAB) और Cd(DAB) नामक ये समन्वय पॉलिमर (coordination polymers) विशेष रूप से डिजाइन की गई संरचनाएं हैं, जिनमें जिंक (Zn²⁺) या कैडमियम (Cd²⁺) धातु आयन और 3,3'-डायमिनोबेंजिडीन (DAB) नामक कार्बनिक अणु मिलकर मजबूत परतदार ढांचा बनाते हैं। इन्हें सरल, कमरे के तापमान पर और बिना जटिल उपकरणों के बड़े पैमाने पर तैयार किया जा सकता है, जिससे ये औद्योगिक उपयोग के लिए उपयुक्त बनते हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (CeNS) और बेंगलुरु स्थित क्राइस्ट विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम ने इन पदार्थों का परीक्षण किया और स्वच्छ ऊर्जा के दो प्रमुख क्षेत्रों—ऊर्जा भंडारण और हाइड्रोजन उत्पादन—में उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त किए।

प्रयोगशाला परीक्षणों में Zn(DAB) ने 2091.4 F g⁻¹ और Cd(DAB) ने 1341.6 F g⁻¹ की ऊर्जा भंडारण क्षमता दिखाई। व्यावहारिक उपकरणों (सुपरकैपेसिटर) में भी Zn(DAB) ने 785.3 F g⁻¹ और Cd(DAB) ने 428.5 F g⁻¹ का प्रदर्शन किया। साथ ही, ये सामग्री 5000 चार्ज-डिस्चार्ज चक्रों के बाद भी अपनी क्षमता बनाए रखने में सक्षम रही, जो उनकी टिकाऊपन को दर्शाता है।

इसके अलावा, ये पदार्थ पानी को विभाजित कर स्वच्छ हाइड्रोजन ईंधन उत्पादन में भी सक्षम हैं। Zn(DAB) के लिए 263 mV और Cd(DAB) के लिए 209 mV की कम ऊर्जा आवश्यकता (ओवरपोटेंशियल) इन्हें अत्यधिक प्रभावी बनाती है, जिससे भविष्य में हरित हाइड्रोजन उत्पादन अधिक सस्ता और कुशल हो सकता है।

ऊर्जा भंडारण और हाइड्रोजन उत्पादन—दोनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण ये सामग्री स्वच्छ ऊर्जा समाधानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं। यह नवाचार शोध और वास्तविक उपयोग के बीच की दूरी को कम करने में सहायक होगा।

यह शोध ACS Omega और Catalysis Science & Technology जैसे प्रतिष्ठित जर्नलों में प्रकाशित हुआ है, जो समन्वय पॉलिमरों को अगली पीढ़ी के स्वच्छ ऊर्जा पदार्थों के रूप में स्थापित करता है।

रेयर अर्थ और लिथियम में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता भारत

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भारत ने दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबकों (Rare Earth Permanent Magnets) के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने और लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की खोज को तेज करने के प्रयासों को तेज कर दिया है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि 2030 तक उत्पादन क्षमता को 5,000 टन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

प्रश्नकाल के दौरान मंत्री ने बताया कि वर्तमान में देश में दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबकों की मांग लगभग 4,000 टन है, जो 2030 तक बढ़कर लगभग 8,000 टन होने का अनुमान है। इससे घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

मंत्री ने जानकारी दी कि नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (NdFeB) स्थायी चुंबकों पर एक पायलट परियोजना शुरू की गई है, जबकि विशाखापत्तनम में समेरियम-कोबाल्ट मैग्नेट प्लांट शुरू हो चुका है, जिसकी शुरुआती उत्पादन क्षमता 500 टन प्रति वर्ष है। इसे अगले चरण में 2,000 टन और 2030 तक 5,000 टन तक बढ़ाया जाएगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार विभिन्न मंत्रालयों के साथ समन्वय कर Whole-of-Government Approach के तहत महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और विकास को तेज कर रही है।

राजस्थान के डेगाना में लिथियम भंडार के बारे में पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने बताया कि प्रारंभिक सर्वेक्षण कार्य शुरू हो चुका है और जल्द ही आगे की खोज प्रक्रिया शुरू की जाएगी। साथ ही, जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में भी लिथियम की खोज जारी है।

उन्होंने बताया कि लिथियम और दुर्लभ मृदा तत्व इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, एयरोस्पेस और अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में अहम भूमिका निभाएंगे।

मंत्री ने यह भी बताया कि हाल के नीतिगत बदलावों, जैसे एटॉमिक एनर्जी (संशोधन) ढांचा, के तहत निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दिया गया है, हालांकि यूरेनियम जैसे रणनीतिक संसाधनों के लिए सुरक्षा उपाय बनाए रखे गए हैं।

उन्होंने कहा कि तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और केरल में रेयर अर्थ कॉरिडोर स्थापित किए जा रहे हैं, जिससे घरेलू प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन को बढ़ावा मिलेगा।

मंत्री के अनुसार, रेयर अर्थ तत्व समुद्री तटीय रेत और चट्टानी संरचनाओं दोनों में पाए जाते हैं, जिनकी खोज के लिए अलग-अलग तकनीकों की आवश्यकता होती है। राजस्थान, गुजरात और झारखंड जैसे राज्यों में चट्टानी खनिज भंडार मौजूद हैं, जिनकी खोज अपेक्षाकृत जटिल है।

पर्यावरण संबंधी चिंताओं पर उन्होंने स्पष्ट किया कि खनन से जुड़े सुरक्षा उपाय खनन मंत्रालय और संबंधित नियमों के तहत आते हैं, साथ ही अवैध खनन पर रोक लगाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत आयात पर निर्भरता कम करने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने के लक्ष्य के साथ महत्वपूर्ण खनिज क्षेत्र में अपनी स्थिति को लगातार मजबूत कर रहा है, जो भविष्य के औद्योगिक और तकनीकी विकास के लिए आवश्यक है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूर किया भारत का नया जलवायु लक्ष्य (NDC 2031-35)

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भारत की जलवायु कार्रवाई को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2031 से 2035 की अवधि के लिए भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) को मंजूरी दे दी है। यह निर्णय UNFCCC और पेरिस समझौते के तहत भारत की प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है तथा सतत विकास और जलवायु न्याय के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दोहराता है।

2031-35 के लिए भारत का NDC “विकसित भारत” के दृष्टिकोण से प्रेरित है, जो केवल 2047 का लक्ष्य नहीं, बल्कि आज से ही एक समृद्ध और जलवायु-सक्षम भारत के निर्माण का संकल्प है। भारत के ये नए जलवायु लक्ष्य पूर्व प्रतिबद्धताओं पर आधारित हैं, जिनमें से कई को समय से पहले ही पूरा कर लिया गया है। ये पांच गुणात्मक लक्ष्य सतत जीवनशैली को बढ़ावा देने, जलवायु-लचीले विकास को प्रोत्साहित करने और समाज के सभी वर्गों के लिए न्यायसंगत परिवर्तन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से निर्धारित किए गए हैं।

प्रारंभिक उपलब्धि से उच्च लक्ष्य तक

भारत ने 2015 में अपने पहले NDC के तहत 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 33–35% कमी और 40% गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा था, जिसे क्रमशः 11 वर्ष और 9 वर्ष पहले ही हासिल कर लिया गया। 2005 से 2020 के बीच उत्सर्जन तीव्रता में 36% की कमी आई है, जिसे अब 2035 तक 47% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।

गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य भी पहले ही 52.57% (फरवरी 2026) तक पहुंचकर हासिल किया जा चुका है, जिसे अब 2035 तक 60% तक बढ़ाने का लक्ष्य है। इसके अलावा, वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से कार्बन सिंक को 3.5–4.0 अरब टन CO₂ समतुल्य तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

स्वच्छ ऊर्जा और हरित विकास

भारत बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार, बैटरी स्टोरेज, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर, स्वच्छ विनिर्माण और टिकाऊ बुनियादी ढांचे के माध्यम से जलवायु रणनीति को लागू कर रहा है। प्रमुख योजनाओं में ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, पीएम सूर्य घर योजना, PLI योजना, पीएम-कुसुम, CCUS और परमाणु ऊर्जा शामिल हैं।

भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA), CDRI, ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस और Lead-IT जैसी पहल के माध्यम से सहयोग बढ़ा रहा है।

जलवायु अनुकूलन पर जोर

भारत केवल उत्सर्जन घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अनुकूलन (Adaptation) पर भी विशेष ध्यान दे रहा है। इसमें तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा, मैंग्रोव पुनर्स्थापन, चक्रवात चेतावनी प्रणाली, हिमालयी क्षेत्रों में जैव विविधता संरक्षण, हीट एक्शन प्लान और सामुदायिक आपदा प्रबंधन शामिल हैं।

जन-केंद्रित दृष्टिकोण

भारत की जलवायु नीति “LiFE – Lifestyle for Environment” पर आधारित है, जो सतत जीवनशैली को जन आंदोलन बना रही है। ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसी पहल भी जनभागीदारी को बढ़ावा देती है।

NDC (2031-35) की रूपरेखा

इस NDC को तैयार करते समय ग्लोबल स्टॉकटेक, CBDR-RC सिद्धांत और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को ध्यान में रखा गया है। नीति आयोग के तहत विभिन्न मंत्रालयों, विशेषज्ञों और संगठनों से व्यापक परामर्श किया गया, जिससे यह सुनिश्चित किया गया कि लक्ष्य महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ व्यवहारिक भी हों।

निष्कर्ष

भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएं युवाओं और महिलाओं के लिए नए अवसर पैदा करेंगी और देश को हरित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर करेंगी। यह निर्णय भारत को कम-कार्बन और जलवायु-सक्षम भविष्य की दिशा में एक वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करता है।

परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा: आयात पर शून्य कस्टम ड्यूटी

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परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आवश्यक वस्तुओं के आयात पर शून्य सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) लागू करने से देश में परमाणु ऊर्जा के विकास की गति तेज होने की उम्मीद है। साथ ही, इससे परियोजनाओं की कुल लागत और प्रति यूनिट बिजली की लागत में कमी आएगी, जिससे ऐसे प्रोजेक्ट अधिक व्यवहार्य बनेंगे, विशेष रूप से वे जिनमें विदेशी सहयोग और आयात की अधिक भागीदारी होती है।

लोकसभा में रमेश अवस्थी और रवि किशन द्वारा पूछे गए एक अतारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी दी।

मंत्री ने बताया कि वर्ष 2035 तक परमाणु ईंधन और रिएक्टर घटकों पर सीमा शुल्क में छूट से परियोजना लागत और बिजली उत्पादन लागत दोनों में कमी आएगी, जिससे परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार होगा।

700 मेगावाट के दस नए स्वीकृत प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) इकाइयों के लिए घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के संबंध में मंत्री ने बताया कि न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) ने कई कदम उठाए हैं। इनमें निरंतरता बनाए रखने के लिए थोक ऑर्डर देना, आवश्यक सहयोग के साथ विक्रेता आधार का विस्तार करना, आयात के स्थान पर स्वदेशी उपकरणों को बढ़ावा देना, कुछ उपकरणों को श्रेणी-1 स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के लिए आरक्षित करना तथा MSME को प्रोत्साहित करने और उन्हें निविदाओं में प्राथमिकता देने के लिए विक्रेता मीट आयोजित करना शामिल है।

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में अनुसंधान एवं विकास के लिए बढ़ी हुई फंडिंग के बारे में मंत्री ने कहा कि इसका उपयोग आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से बहु-विषयक प्रौद्योगिकी विकास में किया जा रहा है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में नए अनुसंधान रिएक्टरों का विकास, विशेष रूप से कैंसर उपचार के लिए आइसोटोप उत्पादन सुविधाएं, उन्नत रिएक्टर तकनीक जैसे स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) और हाइड्रोजन उत्पादन, एक्सेलेरेटर तकनीक, लेजर आधारित अनुप्रयोग तथा उन्नत सामग्री और विनिर्माण तकनीक शामिल हैं।

मंत्री ने आगे बताया कि वर्तमान में तटीय राज्यों में प्रस्तावित परमाणु पार्कों के निर्माण और लॉजिस्टिक्स को प्रधानमंत्री गति शक्ति ढांचे के साथ जोड़ने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

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