Media24Media.com: #CircularEconomy

Responsive Ad Slot


 

Showing posts with label #CircularEconomy. Show all posts
Showing posts with label #CircularEconomy. Show all posts

नवी मुंबई का टेक्सटाइल रिकवरी मॉडल बना मिसाल, कचरे से रोजगार और पर्यावरण संरक्षण की नई राह नवी मुंबई: नवी मुं

No comments Document Thumbnail

बई नगर निगम (NMMC) ने स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत एक अनूठी पहल करते हुए टेक्सटाइल कचरे को संसाधन में बदलने का सफल मॉडल विकसित किया है। बेलापुर में स्थापित देश की पहली म्युनिसिपल टेक्सटाइल रिकवरी फैसिलिटी (TRF) अब कचरा प्रबंधन, रोजगार सृजन और सर्कुलर इकॉनमी का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरी है।

कचरे से संसाधन की ओर

भारत में हर साल लगभग 7.8 मिलियन टन टेक्सटाइल कचरा उत्पन्न होता है। इस चुनौती से निपटने के लिए NMMC ने एक संगठित प्रणाली विकसित की है, जिसमें कचरे का संग्रह, छंटाई, पुनः उपयोग और रीसाइक्लिंग शामिल है।

शहर के 8 वार्डों में 140 टेक्सटाइल कलेक्शन बिन लगाए गए हैं, जिन्हें बढ़ाकर 250 करने की योजना है, जिससे नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

वैज्ञानिक प्रक्रिया और आधुनिक तकनीक

TRF में एकत्रित कपड़ों को:

  • तौला और टैग किया जाता है

  • अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है (रीयूजेबल, रीसाइक्लेबल आदि)

  • KOSHA स्कैनर से कपड़े की पहचान की जाती है

इसके बाद कपड़ों को साफ कर उन्हें नए उत्पादों में बदला जाता है।

महिलाओं को मिला रोजगार

इस पहल का सबसे बड़ा असर महिलाओं के सशक्तिकरण पर पड़ा है:

  • 300 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण

  • 150+ महिलाएं रोजगार से जुड़ीं

  • मासिक आय: ₹9,000 से ₹15,000

महिलाएं अब बैग, कपड़े, सजावटी सामान जैसे उत्पाद बनाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं।

उल्लेखनीय उपलब्धियां

  • 30 टन टेक्सटाइल कचरा एकत्र

  • 25.5 टन की वैज्ञानिक छंटाई

  • 41,000 से अधिक आइटम प्रोसेस

  • 1.14 लाख परिवारों तक पहुंच

  • 400+ नए उत्पाद विकसित

 जागरूकता और बाजार विस्तार

TRF ने 30 से अधिक प्रदर्शनियों में भाग लेकर:

  • रीसाइक्लिंग के प्रति जागरूकता बढ़ाई

  • महिला कारीगरों को बाजार उपलब्ध कराया

चुनौतियां और समाधान

शुरुआत में:

  • लोगों में जागरूकता की कमी

  • बिन लगाने का विरोध

  • कपड़ों की छंटाई में कठिनाई

लेकिन निरंतर प्रयास और तकनीक के उपयोग से इन समस्याओं को दूर किया गया।

भविष्य की योजना

अब कोपरखैराने में एक स्थायी और बड़े स्तर की TRF स्थापित करने की योजना है, जिससे इस मॉडल को और मजबूत किया जा सके।

निष्कर्ष

नवी मुंबई की यह पहल दिखाती है कि कचरा भी संसाधन बन सकता है। यह मॉडल न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि रोजगार सृजन और सतत विकास की दिशा में भी एक मजबूत कदम है।


राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर सीएसआईआर-सीआरआरआई और एएमएनएस इंडिया के बीच अनुसंधान समझौता

No comments Document Thumbnail

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर सीएसआईआर–केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI) और इस्पात क्षेत्र की प्रमुख कंपनी आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया (AMNS India) के बीच एक अनुसंधान एवं विकास (R&D) समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते का उद्देश्य सड़क निर्माण में आयरन ओअर टेलिंग्स (Iron Ore Tailings) के उपयोग की संभावनाओं का अध्ययन करना है।

इस अवसर पर सीएसआईआर की महानिदेशक और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी ने कहा कि सड़क निर्माण में आयरन ओअर टेलिंग्स का उपयोग “खनन अपशिष्ट से हरित सड़कें (Mine Waste to Green Roads)” बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। उन्होंने बताया कि देश में ओडिशा, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में स्थित विभिन्न आयरन ओअर बेनिफिशिएशन संयंत्रों से हर वर्ष लगभग 18–20 मिलियन टन आयरन ओअर टेलिंग्स उत्पन्न होते हैं। इन टेलिंग्स को आमतौर पर बड़े बांधों में संग्रहित किया जाता है और इन्हें स्लाइम्स भी कहा जाता है, जो पर्यावरण और आर्थिक दृष्टि से चुनौतियां पैदा करते हैं।

इस R&D समझौते का उद्देश्य आयरन ओअर टेलिंग्स के प्रबंधन की समस्या का समाधान करना और सड़क निर्माण में प्राकृतिक एग्रीगेट्स की मांग को कम करना है। इस पहल के अंतर्गत CSIR-CRRI के वैज्ञानिक प्रयोगशाला परीक्षण, सामग्री का विश्लेषण और पेवमेंट डिज़ाइन अध्ययन करेंगे, ताकि सड़क की विभिन्न परतों में आयरन ओअर टेलिंग्स की उपयोगिता का आकलन किया जा सके।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. अरविंद बोधंकर, मुख्य सततता अधिकारी (Chief Sustainability Officer), AMNS इंडिया थे। उन्होंने कहा कि उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) और टिकाऊ अवसंरचना के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह साझेदारी औद्योगिक उप-उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देकर देश के विकास में योगदान देगी।

सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. च. रवि शेखर ने कहा कि संस्थान अगली पीढ़ी की टिकाऊ सड़क प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि AMNS इंडिया के साथ यह सहयोग सड़क निर्माण में आयरन ओअर टेलिंग्स के वैज्ञानिक परीक्षण और फील्ड प्रदर्शन को संभव बनाएगा, जिससे भारत सतत पेवमेंट प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी अग्रणी भूमिका और मजबूत करेगा।

इस पहल का नेतृत्व सीएसआईआर-सीआरआरआई के फ्लेक्सिबल पेवमेंट डिवीजन के प्रमुख श्री सतीश पांडे कर रहे हैं, जो स्टील स्लैग रोड टेक्नोलॉजी के आविष्कारक भी हैं। उन्होंने कहा कि अनुसंधान और प्रयोगशाला विश्लेषण के माध्यम से आयरन ओअर टेलिंग्स को सड़क निर्माण में अच्छी मिट्टी और प्राकृतिक एग्रीगेट्स के विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह के दौरान सतत परिवहन अवसंरचना से संबंधित कई नवीन तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया। इनमें कृषि अपशिष्ट आधारित बायो-बिटुमेन, स्टील स्लैग आधारित ECOFIX त्वरित गड्ढा मरम्मत तकनीक, स्लैग और फ्लाई ऐश आधारित TERASURFACING तकनीक, तथा वेस्ट प्लास्टिक आधारित मॉड्यूलर जियोसेल जैसी तकनीकें शामिल हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य सड़क निर्माण में परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के सिद्धांतों को बढ़ावा देना है।

कार्यक्रम में AMNS इंडिया के वरिष्ठ अधिकारियों, CSIR-CRRI के वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों, नीति-निर्माताओं और सड़क एवं इस्पात क्षेत्र से जुड़े कई हितधारकों ने भाग लिया। इस आयोजन ने भारत में सतत अवसंरचना विकास के लिए विज्ञान आधारित समाधानों के बढ़ते महत्व को रेखांकित किया।

कृषि में सर्कुलर इकोनॉमी: भारत में कृषि कचरे से ऊर्जा और संसाधन बनाने की दिशा में बड़ा कदम

No comments Document Thumbnail

भारत में बढ़ते कृषि और खाद्य अपशिष्ट (वेस्ट) की समस्या पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। देश में हर साल लगभग 35 करोड़ टन कृषि अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जिसमें फसल अवशेष, भूसा, भूसी और खाद्य प्रसंस्करण के उप-उत्पाद शामिल हैं। सही प्रबंधन न होने पर यह अपशिष्ट वायु, जल और मिट्टी प्रदूषण का कारण बनता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के कृषि अवशेषों से 18,000 मेगावाट से अधिक ऊर्जा उत्पादन की क्षमता है। इसके अलावा, इनसे जैविक खाद भी बनाई जा सकती है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है।

सर्कुलर इकोनॉमी: कचरे से संसाधन बनाने की सोच

सर्कुलर इकोनॉमी का उद्देश्य कचरे को संसाधन में बदलना और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को कम करना है। यह मॉडल Reduce, Reuse, Recycle, Refurbish, Recover और Repair के सिद्धांतों पर आधारित है। अनुमान है कि 2050 तक भारत की सर्कुलर इकोनॉमी का बाजार मूल्य 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है और 1 करोड़ नौकरियां पैदा होंगी।

कृषि अपशिष्ट के प्रमुख स्रोत

  • फसल अवशेष (स्टबल): जलाने से मिट्टी की उर्वरता घटती है और प्रदूषण बढ़ता है।

  • पशु अपशिष्ट: गोबर और अन्य अपशिष्ट से बायोगैस और जैविक खाद बनाई जा सकती है।

  • पोस्ट-हार्वेस्ट लॉस: भंडारण और परिवहन में खाद्य नुकसान।

  • फूड वेस्ट: घरों और बाजारों में खाद्य बर्बादी, जिससे ग्रीनहाउस गैसें बढ़ती हैं।

सरकारी पहलें: कचरे से संपदा (Waste-to-Wealth)

GOBARdhan योजना

सरकार गोबर, फसल अवशेष और खाद्य अपशिष्ट से कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) और जैविक खाद बनाने को बढ़ावा दे रही है। जनवरी 2026 तक देश के 51.4% जिलों में 979 बायोगैस प्लांट स्थापित हो चुके हैं।

फसल अवशेष प्रबंधन (CRM)

फसल अवशेष जलाने से रोकने के लिए मशीनों और कस्टम हायरिंग सेंटरों की स्थापना की गई है। अब तक 3.24 लाख से अधिक मशीनें किसानों को उपलब्ध कराई गई हैं।

एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (AIF)

भंडारण, कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स के लिए 66,310 करोड़ रुपये के ऋण स्वीकृत किए गए हैं, जिससे कृषि मूल्य श्रृंखला मजबूत हुई है।

एनिमल हसबैंड्री इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (AHIDF)

पशुपालन क्षेत्र में 15,000 करोड़ रुपये का कोष निजी निवेश को बढ़ावा दे रहा है और जैविक खाद व बायोगैस उत्पादन को प्रोत्साहित कर रहा है।

जल शक्ति मिशन और जल पुन: उपयोग

जल शक्ति मंत्रालय घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग को बढ़ावा दे रहा है, जिससे कृषि में पानी की उपलब्धता बढ़ेगी और भूजल पर दबाव कम होगा।

सतत विकास लक्ष्य (SDGs) से जुड़ा सर्कुलर कृषि मॉडल

सर्कुलर कृषि मॉडल SDG-2 (भूख समाप्ति और सतत कृषि) और मिट्टी स्वास्थ्य सुधार से जुड़ा है। कम्पोस्टिंग, बायोचार और बायोमास रीसाइक्लिंग से मिट्टी की उर्वरता और उत्पादन बढ़ता है।

निष्कर्ष

भारत में कृषि में सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में उठाए गए कदम पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों को संतुलित कर रहे हैं। सरकार की योजनाएं कृषि अपशिष्ट को ऊर्जा, जैविक खाद और रोजगार में बदल रही हैं। इससे खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा और ग्रामीण विकास को मजबूती मिलने की उम्मीद है।


लक्ष्य ज़ीरो डंपसाइट: स्वच्छ भारत मिशन के तहत शहरों के कचरा ढेर खत्म करने की भारत की पहल

No comments Document Thumbnail

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भारत डंपसाइट रेमेडिएशन एक्सेलेरेटर प्रोग्राम (DRAP) के माध्यम से “ज़ीरो डंपसाइट” का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

  • अब तक 61% से अधिक लेगेसी वेस्ट का वैज्ञानिक रूप से निपटान किया जा चुका है।

  • शेष कचरे के लगभग 80% वाले 214 उच्च-प्रभावी डंपसाइट्स को प्राथमिकता दी गई है।

  • रेमेडिएटेड कचरे का उपयोग सड़क निर्माण, नीचले इलाकों की भराई, रिसाइक्लिंग और RDF (रिफ्यूज़-डिराइव्ड फ्यूल) के रूप में किया जा रहा है।

  • डंपसाइट हटने से स्वच्छ हवा, सुरक्षित भूजल, आग की घटनाओं में कमी और भूमि का पुनः उपयोग संभव होता है।

परिचय

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने स्वच्छता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शहरी कचरा प्रबंधन और स्वच्छता ढांचे को मजबूत किया गया है। इसी क्रम में अब ध्यान वर्षों से जमा लेगेसी वेस्ट डंपसाइट्स को समाप्त करने पर केंद्रित है।

इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने नवंबर 2025 में डंपसाइट रेमेडिएशन एक्सेलेरेटर प्रोग्राम (DRAP) शुरू किया, जिसका लक्ष्य अक्टूबर 2026 तक “लक्ष्य: ज़ीरो डंपसाइट” हासिल करना है।

लेगेसी डंपसाइट्स: वर्तमान स्थिति

देशभर में लगभग 2,479 डंपसाइट्स चिन्हित की गई हैं, जिनमें करीब 25 करोड़ मीट्रिक टन कचरा जमा है और जो लगभग 15,000 एकड़ भूमि पर फैली हुई हैं।
वर्तमान में 1,428 डंपसाइट्स पर कार्य प्रगति पर है और 62% से अधिक कचरे का निपटान हो चुका है।

साल 2025 में ही 26 राज्यों के 438 शहरों में 459 डंपसाइट्स पूरी तरह रेमेडिएट की गईं।

स्वच्छ भारत से ‘मिशन ज़ीरो’ तक

SBM-Urban 2.0 (2021) के तहत कचरे के स्रोत पर पृथक्करण, वैज्ञानिक प्रोसेसिंग और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा दिया गया। DRAP इसी का अगला चरण है, जो पुराने कचरा ढेर खत्म करने और नए डंपसाइट बनने से रोकने पर केंद्रित है।

DRAP का 5P फ्रेमवर्क

यह कार्यक्रम 5P मॉडल पर आधारित है:

  1. राजनीतिक नेतृत्व (Political Leadership) – वरिष्ठ नेताओं द्वारा डंपसाइट गोद लेना

  2. सार्वजनिक वित्त (Public Finance) – ₹550 प्रति टन तक केंद्रीय वित्तीय सहायता

  3. साझेदारी (Partnerships) – PSU, उद्योग, सीमेंट प्लांट, NGOs के साथ सहयोग

  4. जनभागीदारी (People’s Participation) – स्थानीय समुदाय और सफाई मित्रों की भागीदारी

  5. परियोजना प्रबंधन (Project Management) – तकनीक आधारित निगरानी और जवाबदेही

डंपसाइट से संसाधन तक: बायोमाइनिंग प्रक्रिया

बायोमाइनिंग के जरिए पुराने कचरे को वैज्ञानिक ढंग से अलग-अलग हिस्सों में बदला जाता है:

  • इनर्ट व मिट्टी जैसे पदार्थ – सड़क व भूमि भराई में उपयोग

  • C&D वेस्ट – ईंट, टाइल, पावर ब्लॉक निर्माण

  • RDF – सीमेंट व ऊर्जा संयंत्रों में कोयले के विकल्प के रूप में

  • रीसाइक्लेबल्स – प्लास्टिक, कागज़, धातु

  • बायोडिग्रेडेबल कचरा – खाद और ऊर्जा उत्पादन

  • केवल अप्रयोज्य अवशेष वैज्ञानिक लैंडफिल में

SBM-Urban 2.0 के तहत कचरा प्रोसेसिंग ढांचा

  • 2,900 मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) कार्यरत

  • 2,800 कम्पोस्ट प्लांट

  • 131 बायोमीथनेशन प्लांट

  • 17 वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट

आगे की राह: स्वच्छ शहर, स्वस्थ जीवन

2026 तक ज़ीरो डंपसाइट का लक्ष्य न केवल शहरी पर्यावरण को बेहतर बनाएगा, बल्कि

  • SDG-11 (सतत शहर)

  • SDG-12 (जिम्मेदार उपभोग)

  • SDG-13 (जलवायु कार्रवाई)
    को भी मजबूती देगा।

यह पहल विकसित भारत 2047 के विज़न के अनुरूप स्वच्छ, टिकाऊ और संसाधन-कुशल शहरों के निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम है।


स्वच्छ भारत मिशन-शहरी के तहत लखनऊ ने 100% वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन की उपलब्धि हासिल की

No comments Document Thumbnail

लखनऊ में शिवारी सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट के उद्घाटन के साथ शहरी सततता की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हासिल किया गया है। अब लखनऊ स्वच्छ भारत मिशन-शहरी के तहत 100% वैज्ञानिक रूप से नगर निगम कचरे (Municipal Solid Waste) का प्रोसेसिंग करने वाला उत्तर प्रदेश का पहला शहर बन गया है। यह उपलब्धि लखनऊ को ‘जीरो फ्रेश वेस्ट डंप’ शहर का दर्जा देती है।

लखनऊ: बढ़ती शहरी चुनौतियों का वैज्ञानिक समाधान

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, लगभग 40 लाख निवासियों और 7.5 लाख प्रतिष्ठानों वाला एक तेज़ी से बढ़ता शहरी केंद्र है। इस तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या और विकास के साथ कचरा प्रबंधन, पर्यावरण सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ती जा रही हैं। लखनऊ नगर निगम (LMC) ने इन चुनौतियों का सामना वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन, संसाधन पुनर्प्राप्ति और स्थायी शहरी विकास की रणनीतियों से किया है।

शिवारी प्लांट: तीसरा ताजा कचरा प्रोसेसिंग प्लांट

लखनऊ ने शिवारी में अपना तीसरा Fresh Waste Processing Plant शुरू किया है। इस प्लांट की क्षमता 700 टन प्रतिदिन है। इस प्लांट के साथ लखनऊ नगर निगम अब 2,100 टन प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले कचरे को वैज्ञानिक रूप से प्रोसेस कर सकता है, जिससे खुले में कचरा डालने की आवश्यकता समाप्त हो गई है।

कचरा प्रबंधन का वैज्ञानिक मॉडल

लखनऊ शहर में प्रतिदिन लगभग 2,000 टन कचरा उत्पन्न होता है। इसे संभालने के लिए LMC और Bhumi Green Energy ने तीनों प्लांट स्थापित किए हैं, जिनकी क्षमता प्रत्येक 700 टन/दिन है। कचरे को ऑर्गेनिक (55%) और इनऑर्गेनिक (45%) भागों में अलग किया जाता है।

  • ऑर्गेनिक कचरा → कम्पोस्ट और बायोगैस

  • इनऑर्गेनिक कचरा → रिसाइकलिंग / RDF (Refuse Derived Fuel)

  • RDF का उपयोग सीमेंट और पेपर उद्योगों में को-प्रोसेसिंग के लिए किया जाता है।

लखनऊ की डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण क्षमता 96.53% तक बढ़ चुकी है, और सोर्स सेग्रिगेशन (कचरा अलग करने) का स्तर 70% से अधिक है।

लगेसी वेस्ट का वैज्ञानिक निपटान

लखनऊ में लगभग 18.5 लाख मीट्रिक टन पुराने कचरे में से 12.86 लाख मीट्रिक टन को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस किया जा चुका है। इससे RDF, C&D waste, bio-soil, coarse fractions जैसे उपयोगी उत्पाद प्राप्त हुए हैं, जिन्हें:

  • रिसाइकलिंग

  • को-प्रोसेसिंग

  • लैंडफिलिंग

  • इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट
    में उपयोग किया गया है।

RDF और अन्य उत्पादों का उपयोग

  • RDF: लगभग 2.27 लाख मीट्रिक टन उद्योगों में भेजा गया

  • Coarse fraction: 4.38 लाख MT

  • Bio-soil: 0.59 लाख MT

  • C&D Waste: 2.35 लाख MT

शिवारी साइट का रूपांतरण

शिवारी साइट पर 25 एकड़ से अधिक भूमि को पुनः विकसित किया गया और इसे एक पूर्ण-कार्यात्मक ताजा कचरा उपचार सुविधा में बदला गया। यहाँ windrow pads, internal roads, sheds, weighbridges सहित सम्पूर्ण कचरा प्रबंधन प्रणाली स्थापित की गई है।

आगे की योजना: Waste-to-Energy (WtE) प्लांट

LMC शिवारी में Waste-to-Energy (WtE) प्लांट स्थापित करने की तैयारी कर रहा है। प्रस्तावित 15 MW WtE प्लांट RDF को बिजली में बदलने में सक्षम होगा। यह प्लांट प्रतिदिन 1,000–1,200 टन RDF का उपयोग करेगा, जिससे RDF को दूर के सीमेंट कारखानों तक ले जाने की लागत और दूरी कम होगी।

लखनऊ का मॉडल: सर्कुलर इकोनॉमी की मिसाल

लखनऊ का कचरा प्रबंधन मॉडल सर्कुलर इकोनॉमी के सिद्धांतों पर आधारित है—
संसाधन पुनर्प्राप्ति, लगेसी वेस्ट न्यूनतम करना, और पुन: उपयोग को बढ़ावा देना। यह मॉडल न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अन्य शहरों के लिए प्रेरणादायक है।


गडकरी ने बायो-बिटुमेन को किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर बताया

No comments Document Thumbnail

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री, नितिन गडकरी ने कृषि अपशिष्ट को एक मूल्यवान राष्ट्रीय संसाधन में परिवर्तित करने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बायो-बिटुमेन भारत को विकसित भारत 2047 की दिशा में ले जाने के लिए एक परिवर्तनकारी कदम है। कृषि अपशिष्ट का उपयोग करके यह फसल जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करता है और सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करता है। 15% मिश्रण के साथ, भारत लगभग ₹4,500 करोड़ विदेशी मुद्रा बचा सकता है और आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है।

CSIR के “फार्म रिसिड्यू से रोड तक: बायो-बिटुमेन via पायरोलिसिस” तकनीकी हस्तांतरण समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा,

“आज भारत की सड़क अवसंरचना में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है, क्योंकि हमारा देश दुनिया में पहला है, जो व्यावसायिक रूप से बायो-बिटुमेन का उत्पादन कर रहा है।”

केंद्रीय मंत्री गडकरी ने CSIR और इसके समर्पित वैज्ञानिकों को बधाई दी और इस अग्रणी उपलब्धि को हासिल करने में लगातार समर्थन देने के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह का धन्यवाद भी किया।

गडकरी ने आगे कहा कि यह नवाचार किसानों को सशक्त बनाएगा, ग्रामीण आजीविका सृजित करेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा। बायो-बिटुमेन, उन्होंने कहा, वास्तव में मोदी सरकार की सतत विकास, आत्मनिर्भरता और पर्यावरणीय जिम्मेदार वृद्धि के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, और एक स्वच्छ और हरित भविष्य की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है।



भारत ने ‘फार्म रिसिड्यू से रोड तक’ बायो-बिटुमेन तकनीक का सफल तकनीकी हस्तांतरण किया, स्वच्छ और हरित हाईवे की दिशा में कदम

No comments Document Thumbnail

“आज का दिन भारत के इतिहास में दर्ज हो जाएगा, क्योंकि देश ‘स्वच्छ, हरित हाईवे’ के युग में प्रवेश कर रहा है, इसके साथ ही CSIR‑सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टिट्यूट (CSIR-CRRI), नई दिल्ली और CSIR‑इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पेट्रोलियम, देहरादून (CSIR-IIP) द्वारा विकसित “Bio-Bitumen via Pyrolysis: फॉर्म रिसिड्यू से सड़क तक” तकनीक का सफलतापूर्वक तकनीकी हस्तांतरण हुआ।”

यह बात आज केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और CSIR उपाध्यक्ष, डॉ. जितेंद्र सिंह ने “Bio-Bitumen via Pyrolysis: फॉर्म रिसिड्यू से सड़क तक” तकनीकी हस्तांतरण समारोह को संबोधित करते हुए कही।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह दिन ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में याद रखा जाएगा। उन्होंने बताया कि भारत के हाईवे अब जीव-आधारित, पुनर्योजी और सर्कुलर इकोनॉमी समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। इस तकनीक से निर्मित सड़कें कम बजट में तैयार होंगी, अधिक टिकाऊ होंगी और पर्यावरणीय प्रदूषण से मुक्त होंगी।

उन्होंने इस पहल को “साइंस, सरकार और समाज का संयुक्त प्रयास” बताया, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विकसित भारत के लिए सुझाए गए Whole-of-Nation दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है।

मंत्री ने कहा कि बायो-बिटुमेन जैसी तकनीकें यह दर्शाती हैं कि वैज्ञानिक अनुसंधान सीधे राष्ट्रीय मिशनों जैसे स्वच्छता, आत्मनिर्भर भारत और आर्थिक स्वावलंबन में योगदान दे सकता है। उन्होंने कहा कि नवाचार को सही ढंग से संप्रेषित किया जाना चाहिए, ताकि इसे सभी हितधारक समझ सकें और अपनाएं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने आगे बताया कि CSIR की 37 प्रयोगशालाओं में कई सफलता की कहानियाँ हैं, और पिछले दशक में विज्ञान को नागरिकों, उद्योगों और राज्यों तक खुला करने पर जोर दिया गया है। उन्होंने बताया कि बायो-बिटुमेन कई चुनौतियों का समाधान एक साथ करता है – खेत की भूसी प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और आयात में कमी। वर्तमान में भारत अपनी बिटुमेन की लगभग 50% आवश्यकता आयात करता है, और बायो-बिटुमेन जैसी तकनीकें आयात पर निर्भरता कम करके घरेलू क्षमताओं को मजबूत करेंगी।

इस कार्यक्रम में फार्म रिसिड्यू के पायरोलिसिस से बायो-बिटुमेन का औद्योगिक स्तर पर तकनीकी हस्तांतरण प्रदर्शित किया गया। प्रक्रिया में धान की कटाई के बाद की भूसी का संग्रह, पैलेटाइजेशन, पायरोलिसिस के माध्यम से बायो-ऑइल का उत्पादन और फिर इसे पारंपरिक बिटुमेन के साथ मिश्रित करना शामिल है। विस्तृत प्रयोगशाला परीक्षणों में यह पाया गया कि पारंपरिक बिटुमेन का 20–30% सुरक्षित रूप से प्रतिस्थापित किया जा सकता है।

तकनीक का भौतिक, रियोलॉजिकल, रासायनिक और यांत्रिक परीक्षण किया गया, जिसमें रटिंग, क्रैकिंग, नमी से नुकसान और रेसिलिएंट मॉड्यूलस शामिल हैं। मेघालय के जोराबत–शिलांग एक्सप्रेसवे (NH-40) पर पहले ही 100 मीटर का ट्रायल स्ट्रेच सफलतापूर्वक बिछाया जा चुका है। इस तकनीक के लिए पेटेंट दायर किया गया है और कई उद्योगों को वाणिज्यिक कार्यान्वयन के लिए शामिल किया गया है।

मंत्री ने CSIR टीम को बधाई देते हुए बायो-बिटुमेन नवाचार को वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि इससे हर साल 25,000–30,000 करोड़ रुपये के बिटुमेन आयात को प्रतिस्थापित करने की आर्थिक क्षमता है। उन्होंने क्षेत्र-विशेष और संसाधन आधारित अनुसंधान पर भी जोर दिया।

मंत्री ने यह भी साझा किया कि उन्होंने सड़क निर्माण में स्टील स्लैग, वेस्ट प्लास्टिक और बायो-फ्यूल जैसी वैकल्पिक सामग्रियों के उपयोग का अनुभव किया है। उन्होंने कहा कि सिद्ध तकनीक, आर्थिक व्यवहार्यता, कच्चा माल उपलब्धता और बाज़ार योग्यता का सम्मिलन सफल विस्तार के लिए आवश्यक है। उन्होंने राष्ट्रीय हाईवे मानकों में बायो-बिटुमेन के समावेश के लिए पूर्ण संस्थागत समर्थन का आश्वासन दिया।

CSIR के महानिदेशक एवं DSIR सचिव, एन. कलाइसेल्वी ने कहा कि यह भारतीय विज्ञान के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने बताया कि भारत दुनिया का पहला देश बन गया है, जिसने बायो-बिटुमेन तकनीक को उसी वर्ष औद्योगिक और वाणिज्यिक स्तर पर ले जाने में सफलता प्राप्त की।

उन्होंने बताया कि बायोमास का पायरोलिसिस कई मूल्य श्रृंखलाएं उत्पन्न करता है – रोड के लिए बायो-बाइंडर, ऊर्जा-कुशल गैसीय ईंधन, बायो-पेस्टिसाइड फ्रैक्शन और बैटरियों, जल शुद्धिकरण और उन्नत सामग्री के लिए उच्च-ग्रेड कार्बन। यह प्रक्रिया उत्सर्जन-मुक्त, लागत-कुशल और भविष्य-तैयार है। उन्होंने नीति स्तर पर बायो-बिटुमेन के मिश्रण का सुझाव दिया ताकि इसे संपूर्ण भारत में लागू किया जा सके।

समारोह में CSIR-CRRI और CSIR-IIP के वरिष्ठ नेतृत्व, पूर्व निदेशक, वैज्ञानिक, उद्योग भागीदार और मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित थे, जो विज्ञान, सरकार और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी को दर्शाता है। यह तकनीकी हस्तांतरण कार्यक्रम भारत की सतत अवसंरचना, स्वदेशी नवाचार और बायो-आधारित आर्थिक भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूती से स्थापित करता है, और देश को स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर हाईवे की दिशा में अग्रसर करता है।


दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

No comments Document Thumbnail

दूरसंचार विभाग (DoT), संचार मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के सहयोग से नई दिल्ली में “दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देना: नीति और व्यवहार को सक्षम बनाना” शीर्षक से राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला में नीति निर्माता, उद्योग विशेषज्ञ, प्रौद्योगिकी प्रदाता, अकादमिक, अंतरराष्ट्रीय संगठन और मूल्य-श्रृंखला के हितधारक शामिल हुए, जिन्होंने भारत के दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी प्रथाओं को तेज़ी से अपनाने के लिए विचार-विमर्श किया।

कार्यशाला का उद्देश्य विभिन्न हितधारकों के दृष्टिकोण को एकत्रित करना और दूरसंचार मूल्य-श्रृंखला में स्थायित्व और संसाधन दक्षता सुनिश्चित करने के लिए व्यावहारिक उपायों की पहचान करना था। इसमें टिकाऊ उत्पाद डिजाइन, संसाधन की कुशल उपयोगिता, जीवनचक्र प्रबंधन, डिजिटल उपकरण और वित्तपोषण तंत्र पर चर्चा हुई।

प्रारंभिक सत्र की अध्यक्षता डॉ. शिल्पी कर्मकार, परियोजना प्रबंधक, UNDP ने की, जिन्होंने कार्यशाला के उद्देश्य बताए। स्वागत भाषण और सन्दर्भ प्रस्तुत डॉ. आशीष चतुर्वेदी, प्रमुख – ACE, UNDP ने किया। इसके बाद डॉ. अंगेला लुसिज़ी, रेज़िडेंट रिप्रेज़ेंटेटिव, UNDP ने बहु-हितधारक सहयोग के महत्व पर विशेष भाषण दिया।

मुख्य भाषण देते हुए आर. एन. पालाई, सदस्य (प्रौद्योगिकी), डिजिटल कम्युनिकेशंस कमीशन और दूरसंचार विभाग के सचिव (ex-officio) ने कहा कि दूरसंचार में स्थायित्व और सर्कुलैरिटी अब वैकल्पिक नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि भारत का दूरसंचार क्षेत्र देश में कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में केवल 2% योगदान देता है, लेकिन लगभग 1.2 बिलियन उपयोगकर्ताओं तक इसकी पहुँच इसे पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार प्रथाओं को अपनाने की जिम्मेदारी देती है।

पालाई ने सर्कुलर इकोनॉमी को केवल ऊर्जा दक्षता तक सीमित न रखते हुए दूरसंचार उत्पादों और अवसंरचना के पूरे जीवनचक्र में विस्तार देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने ई-कचरा प्रबंधन, राइट-टू-रिपेयर और टिकाऊ डिजाइन जैसे मुद्दों पर ध्यान देने की बात कही।

डॉ. अंगेला लुसिज़ी ने UNDP के योगदान और दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी योजनाओं के निर्माण में सहयोग की जानकारी दी। उन्होंने कार्यशाला को एक समयबद्ध रोडमैप तैयार करने के लिए मंच के रूप में उपयोग करने का आह्वान किया।

कार्यशाला में अरुण अग्रवाल, DDG (सैटेलाइट), DoT ने भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर इकोनॉमी एक्शन प्लान प्रस्तुत किया, जिसमें स्थायी डिजाइन, जीवनचक्र प्रबंधन, ई-कचरा न्यूनीकरण, डिजिटल ट्रैकिंग और पारदर्शी आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करने के सुझाव दिए गए।

तकनीकी सत्रों में दो प्रमुख पैनल चर्चाएँ हुईं:

  1. “सर्कुलैरिटी और स्थायित्व के लिए दूरसंचार आपूर्ति श्रृंखला पर पुनर्विचार” – इस सत्र में नीति हस्तक्षेप, मूल्य-श्रृंखला के महत्वपूर्ण पहलू, स्थायी खरीद और उद्योग की मौजूदा प्रथाओं पर चर्चा हुई।

  2. “सर्कुलर इकोनॉमी की ओर डिजिटल उपकरण” – इसमें डिजिटल प्लेटफार्म, ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसबिलिटी, डेटा एनालिटिक्स, AI और IoT के उपयोग पर जोर दिया गया।

समापन सत्र में सभी प्रतिभागियों ने भारत के दूरसंचार क्षेत्र में सर्कुलर, टिकाऊ और लचीला ढांचा बनाने के लिए साझा प्रतिबद्धता व्यक्त की।

यह कार्यशाला दूरसंचार क्षेत्र में नीति, उद्योग और तकनीकी समाधानों के माध्यम से सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई।

हिमालय में कचरा प्रबंधन: स्वच्छ, टिकाऊ और तकनीक-सक्षम पहाड़ी पहलें

No comments Document Thumbnail

जैसे ही सूरज की पहली किरण हिमालय की चोटियों को छूती है, पहाड़ों में जीवन धीरे-धीरे सक्रिय हो जाता है। हिल टाउन में सफाई कर्मचारी संकरी गलियों से कचरा एकत्र करते हैं। स्कूल परिसरों में छात्र नियमित रूप से कचरे का पृथक्करण करते हैं, और तीर्थस्थलों पर आगंतुक निर्धारित कलेक्शन पॉइंट्स का उपयोग करते हैं। ये रोजमर्रा की गतिविधियाँ हिमालयी क्षेत्रों में संगठित कचरा प्रबंधन की ओर बढ़ते प्रयासों को दर्शाती हैं, जो ऊंचाई, कठिन भूगोल, जलवायु की विविधता और सीमित भूमि उपलब्धता जैसी परिस्थितियों से प्रभावित हैं।

मौसमी पर्यटन और तीर्थयात्रा गतिविधियाँ इन कार्यों की मांग बढ़ाती हैं, जिसके लिए स्थानीय अनुकूल और विकेंद्रीकृत समाधान आवश्यक हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, सभी स्तरों की सरकारों ने स्वच्छ भारत मिशन–अर्बन 2.0 के तहत स्रोत से पृथक्करण, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन और सक्रिय नागरिक एवं संस्थागत भागीदारी पर जोर देते हुए कचरा प्रबंधन प्रयासों को सुदृढ़ किया है।

केदारनाथ में डिजिटल रिफंड सिस्टम से प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण

उत्तराखंड के प्रमुख तीर्थस्थल केदारनाथ में हजारों श्रद्धालुओं के आगमन के दौरान प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण होता है। इस समस्या के समाधान के लिए मई 2022 में राज्य सरकार ने Recykal के सहयोग से डिजिटल डिपॉजिट रिफंड सिस्टम (DRS) शुरू किया।

  • प्लास्टिक की बोतलों और मल्टीलेयर प्लास्टिक (MLPs) आइटम्स पर यूनीक सीरियलाइज्ड आइडेंटिफिकेशन (USI) QR कोड जारी किए जाते हैं, जिसके लिए ₹10 का refundable deposit लिया जाता है।

  • श्रद्धालु उपयोग किए गए आइटम्स को निर्दिष्ट बिंदुओं या गोरिकुंड और केदारनाथ मंदिर में लगे दो रिवर्स वेंडिंग मशीनों (RVMs) पर लौटाते हैं। जमा राशि UPI के माध्यम से वापस की जाती है।

  • एकत्रित प्लास्टिक कचरे को मटेरियल रिकवरी फैसिलिटीज (MRF) में भेजकर रिसाइक्लिंग किया जाता है।

परिणाम:

  • अन्य चारधाम में DRS लागू: गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ

  • 20 लाख से अधिक बोतलें रीसायकल हुईं

  • 66 MT CO₂ उत्सर्जन कम हुआ

  • 110+ रोजगार सृजित हुए

ग्रीन कैंपस फ्रेमवर्क: जम्मू-कश्मीर के संस्थान

जम्मू-कश्मीर में स्वच्छता और सतत विकास की आदतें धीरे-धीरे संस्थागत जीवन का हिस्सा बन रही हैं। स्कूल, कार्यालय, अस्पताल और सार्वजनिक स्थानों पर कचरे को अलग करना और पुन: उपयोगी विकल्प अपनाना आम प्रथा बन गया है।

  • हाउसिंग और अर्बन डेवलपमेंट विभाग के नेतृत्व में 1,093 परिसरों को संरचित प्रमाणन प्रक्रिया में शामिल किया गया।

  • प्रक्रिया में पहचान, तैयारी और घोषणा की तीन चरणों पर जोर दिया गया, जिसमें कचरे का पृथक्करण, ऑन-साइट कंपोस्टिंग और सिंगल-यूज प्लास्टिक में कमी शामिल थी।

  • छात्र, कर्मचारी और आगंतुक पुन: उपयोगी विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित हुए।

प्रभाव:

  • बेहतर सैनिटेशन सुविधाएं

  • 'Waste to Art' और ग्रीन कॉर्नर जैसी रचनात्मक पहलें

  • अनंतनाग पहला शहरी निकाय, जिसने सभी परिसरों को ग्रीन घोषित किया

धर्मशाला: नवाचार और सहयोग के माध्यम से कचरा प्रबंधन

हिमाचल प्रदेश की धर्मशाला नगर निगम ने 2021 से कचरा प्रबंधन को मजबूत किया।

  • क्लीन बिजनेस प्रोग्राम: व्यवसायों को प्रशिक्षण और प्रमाणन प्रदान करता है।

  • मॉडल वार्ड प्रोग्राम: समुदाय स्तर पर पृथक्करण और स्वच्छता सुधार।

  • Waste Under Arrest: जिला सुधार गृह में कैदी कचरा प्रबंधन में भाग लेते हैं और व्यावहारिक कौशल प्राप्त करते हैं।

प्रभाव:

  • 25% कचरा पृथक्करण में वृद्धि

  • 30% सड़क कचरा में कमी

  • 40% लैंडफिल कचरा में कमी

  • MRF के माध्यम से रिसाइक्लिंग में मजबूती

लेह में तकनीक और नवाचार

उच्च ऊंचाई और दूरस्थ इलाके में कचरा प्रबंधन के लिए लेह में सोलर-पावर्ड सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट पहल 2020 में शुरू हुई।

  • दैनिक 30 टन तक कचरे का प्रसंस्करण

  • 100% स्रोत से पृथक्करण और 90% सामग्री पुनःप्राप्ति लक्ष्य

  • रिसाइक्लिंग, कंपोस्टिंग और पुन: उपयोग

  • कमाई से परिचालन लागत पूरी होती है

विशेषता:

  • सर्कुलर इकोनॉमी दृष्टिकोण

  • दूरस्थ, उच्च ऊंचाई वाली जगह में संचालन

  • नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग

  • स्थानीय उत्पादों में पुनःप्रयोग

हिमालय की महिलाएं: SHG द्वारा सतत समाधान

बागेश्वर, उत्तराखंड में महिलाओं के नेतृत्व वाली पहल ने 2017–18 में राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM) के तहत कचरा प्रबंधन को मजबूत किया।

  • Sakhi Autonomous Cooperative Society ने 11 वार्ड्स में डोर-टू-डोर कलेक्शन संभाली

  • संकरी और ढलान वाली गलियों में कचरा ले जाया जाता है

  • सदस्यों की संख्या बढ़कर 47 हुई, दो सदस्य पर्यवेक्षक बने

  • दैनिक ₹100 आय के साथ वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित

  • स्वच्छ सर्वेक्षण 2019 और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स से मान्यता

निष्कर्ष

हिमालयी राज्यों में ये पहलें एक ऐसी भविष्य की ओर इशारा करती हैं, जहां कचरा प्रबंधन प्रणालियाँ भारत के विकास लक्ष्यों के अनुरूप विकसित होती हैं। समुदाय की भागीदारी, संस्थागत जिम्मेदारी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीक का उपयोग करके, ये राज्य स्वच्छ भारत मिशन–अर्बन 2.0 के तहत संसाधन दक्षता, सर्कुलर इकोनॉमी और नागरिक नेतृत्व वाली पहल को सुदृढ़ कर रहे हैं।


NITI Aayog और HUL ने भारत में सर्कुलर इकॉनमी के लिए स्टार्टअप एक्सेलेरेशन प्रोग्राम लॉन्च किया

No comments Document Thumbnail

निति आयोग की अटल इनोवेशन मिशन (AIM) और हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) ने भारत में सर्कुलर इकॉनमी को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर का स्टार्टअप एक्सेलेरेशन प्रोग्राम लॉन्च किया

यह पहल, HUL के प्रमुख प्रोजेक्ट सर्कुलर भारत के अंतर्गत, अगले तीन वर्षों में 50 उच्च-क्षमता वाले सर्कुलर इकॉनमी स्टार्टअप्स को पहचानने और समर्थन देने के लिए आयोजित की जाएगी। यह प्रोग्राम विशेष रूप से उन स्टार्टअप्स को प्राथमिकता देगा जो प्लास्टिक सर्कुलैरिटी में नवाचार कर रहे हैं, जैसे कि प्लास्टिक रीसाइक्लिंग, रीयूज़ और रिफिल मॉडल, और अगली पीढ़ी की पैकेजिंग सामग्री। प्लास्टिक के अलावा, यह प्रोग्राम उन स्टार्टअप्स का भी समर्थन करेगा जो टेक्सटाइल, ई-वेस्ट जैसी अन्य पोस्ट-कंज्यूमर वेस्ट स्ट्रीम में मटेरियल रिकवरी के समाधान विकसित कर रहे हैं।

प्रोग्राम में चयनित स्टार्टअप्स को बिजनेस लीडर्स, नीति विशेषज्ञों और निवेशकों से क्यूरेटेड मेंटरशिप मिलेगी। चयनित स्टार्टअप्स को अनुदान (ग्रांट) और पायलट अवसर भी प्रदान किए जा सकते हैं ताकि बाजार में उनके समाधानों का मूल्यांकन हो सके। यह साझेदारी AIM और NITI Aayog की नीति और नवाचार पोषण विशेषज्ञता, HUL के व्यापक उद्योग नेटवर्क और Xynteo की रणनीतिक विशेषज्ञता को जोड़कर भारत में सर्कुलर इकॉनमी के लिए तेजी से समाधान विकसित करने का अवसर देती है।

HUL के कार्यकारी निदेशक और चीफ पिपल, ट्रांसफॉर्मेशन और सस्टेनेबिलिटी ऑफिसर, BP बिद्दाप्पा ने कहा:

“NITI Aayog और HUL के बीच यह साझेदारी भारत में प्लास्टिक के लिए सर्कुलर इकॉनमी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह हमारे दृढ़ विश्वास को दर्शाता है कि जो भारत के लिए अच्छा है, वह HUL के लिए भी अच्छा है। सरकार की ताकत, उद्योग विशेषज्ञता और उद्यमिता की ऊर्जा को मिलाकर हम अगली पीढ़ी के सस्टेनेबिलिटी स्टार्टअप्स को सशक्त बनाना और व्यावहारिक समाधानों को तेजी से स्केल करना चाहते हैं।”

AIM, NITI Aayog के मिशन डायरेक्टर डॉ. दीपक बगला ने कहा:

“यह सहयोग उस दृष्टि और मूलभूत विचार पर आधारित है जिसे माननीय प्रधानमंत्री ने व्यक्त किया है, कि ‘हमारे लिए सतत विकास केवल नारा नहीं बल्कि एक प्रतिबद्धता है।’

उन स्टार्टअप्स को सशक्त बनाकर जो भारत में संसाधनों के उपयोग और मूल्यांकन को फिर से परिभाषित कर रहे हैं, हम ऐसे समाधान उत्पन्न कर रहे हैं जो कचरे को कम कर सकते हैं, रीसाइक्लिंग को नए रूप में पेश कर सकते हैं और कल की ग्रीन इंडस्ट्रीज़ का निर्माण कर सकते हैं।”

हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड के बारे में

HUL भारत की सबसे बड़ी फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनियों में से एक है, जिसके उत्पाद देश के लगभग 9 में से 10 घरों तक पहुँचते हैं। HUL हर दिन एक बेहतर भविष्य बनाने का प्रयास करता है।

अटल इनोवेशन मिशन (AIM), NITI Aayog के बारे में

AIM, NITI Aayog भारत सरकार की प्रमुख पहल है जो देश में नवाचार और उद्यमिता की संस्कृति को बढ़ावा देती है। यह ATL, AIC, ACIC जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों के माध्यम से नवाचार को प्रोत्साहित करता है।

फुटवियर उद्योग में बढ़ती आत्मनिर्भरता: राष्ट्रपति मुर्मु ने FDDI दीक्षांत समारोह में नवाचार, निर्यात और उद्यमिता पर दिया जोर

No comments Document Thumbnail

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि आज भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और वैश्विक आर्थिक मंच पर अपनी भूमिका को और विस्तार देने में सक्षम बन रहा है। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग ने ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत फुटवियर सेक्टर को ‘चैंपियन सेक्टर’ का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए बेहतर पारिस्थितिकी तंत्र और प्रोत्साहन प्रदान कर रही है।

राष्ट्रपति ने बताया कि भारत फुटवियर उत्पादन और खपत में विश्व में दूसरे स्थान पर है। वित्त वर्ष 2024–25 के दौरान भारत का फुटवियर निर्यात 2500 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक रहा, जबकि आयात लगभग 680 मिलियन डॉलर रहा। उन्होंने कहा कि भारत का फुटवियर निर्यात आयात से लगभग चार गुना अधिक है, जो दर्शाता है कि भारत विश्व के प्रमुख फुटवियर निर्यातकों में से एक है। उन्होंने कहा कि निर्यात को और बढ़ाने के लिए फुटवियर उद्योग का विस्तार आवश्यक है। इससे छात्रों के लिए उद्यमी बनने, रोजगार सृजन करने या प्रतिष्ठानों में रोजगार पाने के अधिक अवसर बनेंगे।

राष्ट्रपति ने FDDI और यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थैम्पटन के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) पर प्रसन्नता जताई। उन्होंने कहा कि यह भारत और यूके के बीच मुक्त व्यापार समझौते के तहत सहयोग के एक और आयाम को मजबूत करता है। उन्होंने उल्लेख किया कि यह MoU सतत सामग्री और सर्कुलर इकोनॉमी प्रथाओं पर विशेष जोर देता है, जो दोनों देशों की पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि फुटवियर डिजाइन का क्षेत्र अनेक महत्वपूर्ण आयामों से जुड़ा है। उन्होंने स्नातक हो रहे छात्रों को सलाह दी कि वे व्यापक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ें और अपने कार्य के माध्यम से समाज और राष्ट्र के बहुआयामी विकास में योगदान दें। उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि वे अपने डिजाइन के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य और सुविधा में सुधार लाएं; रोजगार सृजन में योगदान दें; विकास यात्रा में पिछड़े लोगों को आर्थिक अवसरों से जोड़ें; निर्यात को बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करें; गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के माध्यम से भारत के ब्रांड एंबेसडर बनें; और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के राष्ट्रीय लक्ष्य में महत्वपूर्ण योगदान दें।


प्लास्टिक रीसाइक्लिंग और सर्कुलर इकोनॉमी पर देहरादून में सम्मेलन आयोजित

No comments Document Thumbnail

रसायन और पेट्रोकेमिकल विभाग (DCPC) ने आज देहरादून में फेडरेशन ऑफ़ इंडियन चेम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) और सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (CIPET) के सहयोग से पेट्रोकेमिकल और प्लास्टिक्स सेक्टर में रीसाइक्लिंग, प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट और सर्कुलर इकोनॉमी पर एक सम्मेलन आयोजित किया।

इस सम्मेलन का उद्देश्य विभिन्न हितधारकों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना और भारत के पेट्रोकेमिकल और प्लास्टिक उद्योग के लिए एक स्थायी और सर्कुलर रोडमैप विकसित करना था। यह पहल पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार विकास के राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप है।

मुख्य भाषण में, रसायन और पेट्रोकेमिकल विभाग की सचिव, निवेदिता शुक्ला वर्मा ने प्रमुख सरकारी पहलों को उजागर किया, जिनमें कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) फ्रेमवर्क, नेशनल मिशन फॉर ग्रीन इंडिया, BioE3 पॉलिसी, मजबूत एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) मानदंड, प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट नियम और नीति आयोग का वेस्ट टू वेल्थ प्रोग्राम शामिल हैं।

निवेदिता शुक्ला वर्मा ने क्लीनर टेक्नोलॉजीज को बढ़ावा देने और उद्योग–अकादमी संबंधों को मजबूत करने में CIPET और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेट्रोलियम (IIP) जैसी संस्थाओं की भूमिका पर बल दिया। उन्होंने सर्कुलर मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज के तेजी से अपनाने, नवाचार-आधारित रीसाइक्लिंग तकनीकों और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया ताकि सेक्टर का भविष्य हरित और प्रतिस्पर्धी बन सके।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए, FICCI पेट्रोकेमिकल्स एंड प्लास्टिक्स कमेटी के चेयर, प्रभ दास ने कचरा संग्रह और रीसाइक्लिंग मैकेनिज्म को मजबूत करने का महत्व बताया। ऑल इंडिया प्लास्टिक्स मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन (AIPMA) के अध्यक्ष, अरविंद मेहता ने जिम्मेदार उपभोक्ता व्यवहार को प्रोत्साहित करने के लिए जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया और भारत से प्लास्टिक निर्यात की बढ़ती संभावनाओं को रेखांकित किया।

बीसीजी के पार्टनर,  नितेश शर्मा ने प्रभावी EPR कार्यान्वयन के माध्यम से भारत की वैश्विक सर्कुलैरिटी मानकों में प्रगति पर प्रकाश डाला, जबकि DCPC के संयुक्त सचिव (पेट्रोकेमिकल्स), दीपक मिश्रा ने नवाचार और उद्योग साझेदारियों के माध्यम से सर्कुलर पेट्रोकेमिकल मार्गों को तेज करने और संसाधन पुनर्प्राप्ति को बढ़ाने के उपाय साझा किए।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में FICCI लेडीज़ ऑर्गनाइजेशन, उत्तराखंड की चेयरपर्सन, डॉ. गीता खन्ना और उद्योग के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे।

यह सम्मेलन नीति निर्माता, उद्योग के नेता और अकादमी के बीच सार्थक संवाद के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है, और भारत के पेट्रोकेमिकल और प्लास्टिक सेक्टर के लिए स्थायी और सर्कुलर इकोनॉमी बनाने में सामूहिक जिम्मेदारी की पुष्टि करता है।

DPIIT ने विशेष अभियान 5.0 सफलतापूर्वक संपन्न किया, स्वच्छता और कार्यक्षमता में 100% लक्ष्य प्राप्त

No comments Document Thumbnail

नई दिल्ली-भारत सरकार के उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) और इसकी संबद्ध संस्थाओं ने विशेष अभियान 5.0 को सफलतापूर्वक संपन्न किया, जिसे प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) के समग्र मार्गदर्शन में लागू किया गया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य स्वच्छता के सिद्धांतों को संस्थागत बनाना और सभी कार्यालयों में लंबित मामलों का समय पर निपटान सुनिश्चित करना था।

इस अभियान के दौरान, DPIIT के अंतर्गत भारतीय रबर मटेरियल रिसर्च इंस्टिट्यूट (IRMRI) ने “Waste to Wealth” पहल को लागू किया। इस पहल में पुराने रबर स्क्रैप का उपयोग करके एक सड़क खंड और एक्सेस रोड का निर्माण किया गया। क्रम्ब रबर सीमेंट कंक्रीट (CRCC), जो सीमेंट कंक्रीट में 10–15% अपशिष्ट रबर कण मिलाकर तैयार किया गया, का उपयोग किया गया। इस नवाचारी मिश्रण ने सड़क की स्थायित्व और टिकाऊपन बढ़ाया और टायर निपटान की चुनौती का समाधान किया। सड़क के प्रदर्शन की मजबूती, लोच और टिकाऊपन वैज्ञानिक रूप से निगरानी की गई। यह पर्यावरण-हितैषी दृष्टिकोण सतत अवसंरचना के लिए दोहराने योग्य मॉडल प्रस्तुत करता है और अभियान की नवाचार और सर्कुलर अर्थव्यवस्था में प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

DPIIT ने अपने स्वच्छता लक्ष्यों में 100 प्रतिशत सफलता प्राप्त की, देशभर में 70 स्थानों पर फैले 500 स्वच्छता लक्ष्य इकाइयों (CTUs) पर अभियान चलाया। हर चिन्हित स्थल को सफलतापूर्वक कवर किया गया, जिससे विभाग की साफ-सुथरे और कुशल कार्यस्थलों के प्रति प्रतिबद्धता उजागर हुई।

स्वच्छता अभियान के अतिरिक्त, DPIIT ने अन्य महत्वपूर्ण मापदंडों में भी उल्लेखनीय प्रगति की। विभाग ने 1,572 भौतिक फाइलों की समीक्षा की (लक्ष्य का 100%), और 1,119 फाइलें हटा दीं, जिससे 11,235 वर्ग फुट कार्यालय स्थान मुक्त हुआ और ₹17,69,569 की आय स्क्रैप निपटान से प्राप्त हुई। सार्वजनिक शिकायत निवारण, अपील, ई-फाइल और भौतिक फाइलों की समीक्षा, और स्वच्छता अभियानों के मापदंडों में DPIIT ने लगभग 100% लक्ष्य पूर्णता हासिल की, जो जवाबदेही और प्रभावी रिकॉर्ड प्रबंधन पर विभाग की निरंतर प्राथमिकता को दर्शाता है। इसके साथ ही, कर्मचारियों की सुविधा और उत्पादकता बढ़ाने के लिए कार्यालय पर्यावरण में सुधार पर भी ध्यान केंद्रित किया गया।

अभियान 2 से 31 अक्टूबर 2025 तक आयोजित किया गया, जबकि 15 से 30 सितंबर 2025 तक इसकी तैयारी की गई थी। इस अवधि के दौरान DPIIT के प्रयासों ने स्वच्छता, व्यवस्थित रिकॉर्ड प्रबंधन और लंबित मामलों के त्वरित निपटान के प्रति जागरूकता बढ़ाई। लक्ष्यों की लगभग पूर्णता सुनिश्चित करके, DPIIT ने सरकारी कार्य में कुशलता, जवाबदेही और स्वच्छता की संस्कृति को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।

‘रिपेरेबिलिटी इंडेक्स के माध्यम से उपभोक्ता सशक्तिकरण’ पर लोगो डिजाइन प्रतियोगिता का शुभारंभ

No comments Document Thumbnail

मरम्मत के मिशन में जनसहभागिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, उपभोक्ता मामले विभाग ने MyGov और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के उपभोक्ता विधि अध्यक्ष (Chair on Consumer Law) के सहयोग से ‘रिपेरेबिलिटी इंडेक्स के माध्यम से उपभोक्ता सशक्तिकरण’ विषय पर लोगो डिजाइन प्रतियोगिता प्रारंभ की है। इस पहल का उद्देश्य नागरिकों से रचनात्मक विचार प्राप्त करना और इस मिशन में व्यापक सार्वजनिक भागीदारी सुनिश्चित करना है।

पहले, उपभोक्ता मामले विभाग ने उपभोक्ताओं को सशक्त बनाने और ई-कचरे को कम करने के लिए ‘राइट टू रिपेयर थ्रू रिपेरेबिलिटी इंडेक्स फ्रेमवर्क’ विकसित किया था, जिससे उपभोक्ताओं को पारदर्शी और सूचित उत्पाद चयन में सहायता मिल सके। यह ढांचा उपभोक्ताओं को नए उत्पाद खरीदने के बजाय अपने उत्पादों की मरम्मत उचित लागत पर कराने का अवसर प्रदान करेगा।

इस लोगो के उद्देश्य:

  1. किसी उत्पाद की रिपेरेबिलिटी इंडेक्स रेटिंग को स्पष्ट रूप से दर्शाना।

  2. “राइट टू रिपेयर” और “सर्कुलर इकोनॉमी” के मूल सिद्धांतों का प्रतीक बनना।

  3. उपभोक्ताओं द्वारा आसानी से पहचाने जाने योग्य एक प्रमाणन चिह्न के रूप में कार्य करना।

यह प्रस्तावित लोगो भारत के सर्कुलर इकोनॉमी की ओर संक्रमण का दृश्य प्रतीक होगा, जो जिम्मेदार उपभोग और उपभोक्ता सशक्तिकरण को बढ़ावा देगा।

रिपेरेबिलिटी इंडेक्स फ्रेमवर्क के प्रारंभिक फोकस क्षेत्र हैं — कृषि उपकरण, मोबाइल फोन एवं टैबलेट, उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं, ऑटोमोबाइल एवं ऑटोमोबाइल उपकरण। उपभोक्ता मामले विभाग ने उपभोक्ता अधिकारों को सुदृढ़ करने, सतत उपभोग को प्रोत्साहित करने और सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करने के लिए बहु-आयामी रणनीति अपनाई है। यह उपभोक्ताओं के धन की बचत करेगा और उपकरणों की आयु, रखरखाव, पुन: उपयोग, अपग्रेड, पुनर्चक्रण एवं अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार के माध्यम से सर्कुलर इकोनॉमी के उद्देश्यों को आगे बढ़ाएगा।

इस पहल का उद्देश्य उपभोक्ताओं को उनके खरीदे गए उत्पादों पर वास्तविक “स्वामित्व” प्रदान करना और व्यापार एवं मरम्मत पारिस्थितिकियों को LiFE (Lifestyle for Environment) आंदोलन के “सतर्क एवं सोच-समझकर उपयोग” के आह्वान के अनुरूप बनाना है। इन उद्देश्यों को क्रियान्वित करने हेतु “राइट टू रिपेयर पोर्टल इंडिया” 24 दिसंबर 2022 को राष्ट्रीय उपभोक्ता अधिकार दिवस के अवसर पर प्रारंभ किया गया था। यह पोर्टल उपभोक्ताओं, निर्माताओं और तृतीय पक्ष मरम्मतकर्ताओं के लिए एकीकृत डिजिटल मंच के रूप में कार्य करता है।

जब यह ढांचा लागू होगा, तो यह निर्धारित मुख्य मानकों पर आधारित होगा, जिनके आधार पर उत्पादों की मरम्मत-सुलभता का आकलन, रेटिंग और तुलना की जाएगी। इस पहल को दृश्य रूप में प्रस्तुत करने और जनता के बीच पहचान एवं विश्वास बढ़ाने के लिए यह लोगो डिजाइन प्रतियोगिता शुरू की गई है।

प्रतियोगिता की प्रमुख जानकारी:

  • प्रतियोगिता में भारत के सभी नागरिक (1 नवंबर 2025 तक 16 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले) भाग ले सकते हैं।

  • प्रतिभागियों को मौलिक (original) लोगो डिजाइन प्रस्तुत करना होगा, साथ में एक संक्षिप्त अवधारणा नोट (concept note) भी देना होगा जिसमें डिजाइन विचार और विषय से उसका संबंध स्पष्ट किया गया हो।

  • प्रविष्टियाँ निर्धारित प्रारूप में MyGov पोर्टल (Empowering consumers through Repairability Index | MyGov.in) पर 30 नवंबर 2025 (रात 11:45 बजे IST) तक अपलोड की जानी चाहिए।

  • विजेता प्रविष्टि को ₹25,000/- का नकद पुरस्कार दिया जाएगा और चयनित लोगो को रिपेरेबिलिटी इंडेक्स फ्रेमवर्क का आधिकारिक प्रतीक (emblem) के रूप में अपनाया जा सकता है।

उपभोक्ता मामले विभाग पूरे देश के रचनात्मक नागरिकों, डिजाइनरों, छात्रों और नवप्रवर्तकों को इस राष्ट्रीय प्रयास में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करता है, ताकि भारत के जिम्मेदार उपभोग और सतत जीवन शैली की दिशा में हो रहे परिवर्तन को एक सशक्त दृश्य पहचान दी जा सके।

पृष्ठभूमि:

जुलाई 2022 में विभाग ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था ताकि “राइट टू रिपेयर” के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया जा सके। इसी के अंतर्गत 24 दिसंबर 2022 को “राइट टू रिपेयर पोर्टल इंडिया” का शुभारंभ किया गया।

मार्च 2024 में, विभाग ने चार प्रमुख क्षेत्रों — ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं, मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स, और कृषि उपकरण — की कंपनियों के साथ एक बैठक आयोजित की ताकि उन्हें पोर्टल पर शामिल किया जा सके। बैठक में सीमित स्पेयर पार्ट्स उपलब्धता, मरम्मत मैनुअल की अनुपलब्धता और उच्च मरम्मत लागत जैसे मुद्दों को उपभोक्ता अधिकारों के लिए प्रमुख बाधाओं के रूप में रेखांकित किया गया।

जुलाई 2024 में, ऑटोमोबाइल संघों और साझेदार कंपनियों के साथ विशेष बैठक आयोजित की गई जिसमें मरम्मत मैनुअल और वीडियो को सभी के लिए सुलभ बनाने, तृतीय पक्ष मरम्मतकर्ताओं को सक्षम करने और ऑटोमोटिव उत्पादों के लिए रिपेरेबिलिटी इंडेक्स विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

अगस्त 2024 में, मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में “राइट टू रिपेयर” पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई, जिसका उद्देश्य उद्योग हितधारकों के बीच रिपेरेबिलिटी इंडेक्स के प्रमुख मापदंडों पर सहमति बनाना था ताकि उत्पादों की आयु बढ़ाई जा सके, मरम्मत जानकारी तक पहुंच को बढ़ावा दिया जा सके और उपभोक्ताओं को अपने उपकरणों को पुन: उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

इसके बाद, समिति ने 3 मई 2025 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें स्मार्टफोन और टैबलेट को रिपेरेबिलिटी इंडेक्स फ्रेमवर्क के तहत शामिल किए जाने वाले पहले उत्पाद श्रेणी के रूप में अनुशंसित किया गया। समिति ने “प्राथमिक पुर्जे” जैसे बैटरी, डिस्प्ले असेंबली, बैक कवर असेंबली, कैमरे, चार्जिंग पोर्ट, बटन, माइक्रोफोन, स्पीकर, हिंज/फोल्डिंग मैकेनिज्म और ऑडियो कनेक्टर को चिन्हित किया।

रिपेरेबिलिटी इंडेक्स (RI) का मूल्यांकन छह प्रमुख मानकों पर किया जाएगा:

  1. डिसअसेंबली की गहराई,

  2. मरम्मत जानकारी की उपलब्धता,

  3. स्पेयर पार्ट्स की समय पर उपलब्धता,

  4. सॉफ़्टवेयर अपडेट,

  5. टूल्स और

  6. फास्टनर्स (प्रकार एवं उपलब्धता)।

इस योजना के तहत, मूल उपकरण निर्माता (OEMs) मानकीकृत स्कोरिंग मानदंड के आधार पर RI को स्वयं घोषित करेंगे और इसे बिक्री बिंदु, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तथा पैकेजिंग पर QR कोड के माध्यम से प्रदर्शित करेंगे ताकि उपभोक्ता सूचित निर्णय ले सकें।

खनन मंत्रालय ने ₹1,500 करोड़ की ‘क्रिटिकल मिनरल रिसाइक्लिंग प्रोत्साहन योजना’ के दिशा-निर्देश जारी किए

No comments Document Thumbnail

नई दिल्ली – केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 03.09.2025 को क्रिटिकल मिनरल रिसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए ₹1,500 करोड़ की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी देने के बाद, खनन मंत्रालय ने 02.10.2025 को योजना के कार्यान्वयन हेतु विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

दिशा-निर्देश योजना की प्रक्रियाओं को स्पष्ट करते हैं, जिनमें रिसाइक्लिंग सिस्टम के लिए अनुमानित व्यय, प्रोत्साहन आवंटन की पद्धति, आवेदन, मूल्यांकन और भुगतान प्रक्रियाएँ, संस्थागत तंत्र और प्रदर्शन समीक्षा शामिल हैं। ये दिशा-निर्देश उद्योग और अन्य संबंधित हितधारकों के साथ विस्तृत परामर्श के बाद अंतिम रूप दिए गए हैं।

यह योजना राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसका उद्देश्य देश में द्वितीयक स्रोतों से क्रिटिकल मिनरल्स के पृथक्करण और उत्पादन के लिए रिसाइक्लिंग क्षमता विकसित करना है। पात्र फीडस्टॉक स्रोत हैं: ई-कचरा, प्रयुक्त लिथियम-आयन बैटरी (LiB) और अन्य स्क्रैप सामग्री।

यह योजना नई इकाइयों में निवेश के साथ-साथ मौजूदा इकाइयों की क्षमता विस्तार / आधुनिकीकरण और विविधीकरण पर लागू होगी। प्रोत्साहन केवल उस मूल्य श्रृंखला के लिए होगा जो क्रिटिकल मिनरल्स के वास्तविक निष्कर्षण में शामिल है।

योजना 02.10.2025 से आवेदन के लिए खुली है और आवेदन की अवधि छह (6) महीने यानी 01.04.2026 तक है। योजना दिशा-निर्देश और आवेदन लिंक खनन मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।


भारत–यूके टेक्निकल टेक्सटाइल्स साझेदारी : नवाचार, स्थिरता और नए अवसर

No comments Document Thumbnail

भारत के वस्त्र मंत्रालय की सचिव नीलम शमी राव के नेतृत्व में एक उच्च-स्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने यूनाइटेड किंगडम के मैनचेस्टर में आयोजित टेक्निकल टेक्सटाइल्स रोडशो में भारत की तकनीकी वस्त्र क्षेत्र में बढ़ती ताक़त का प्रदर्शन किया। इस प्रतिनिधिमंडल में मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी और मानव-निर्मित फाइबर, तकनीकी वस्त्र तथा अन्य प्रमुख क्षेत्रों के प्रतिनिधि, जिनमें TEXPROCIL भी शामिल था, मौजूद रहे। इसने भारत की मजबूत क्षमता और नवाचार-आधारित, टिकाऊ विकास के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

सचिव का संबोधन — नवाचार, स्थिरता और CETA

मुख्य संबोधन में नीलम शमी राव ने कहा कि तकनीकी वस्त्र भारत के सबसे तेज़ी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक हैं, जिन्हें अनुसंधान एवं विकास, उन्नत विनिर्माण और परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) की प्रथाओं से गति मिल रही है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (NTTM) के अंतर्गत भारत सतत विकास, ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग और अपशिष्ट कम करने पर केंद्रित है, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में दीर्घकालिक मजबूती मिलेगी।

उन्होंने कहा कि भारत–यूके Comprehensive Economic and Trade Agreement (CETA) एक “विन–विन फ्रेमवर्क” है — यूके को सुरक्षित और सतत स्रोत तथा तकनीकी साझेदारी का अवसर मिलेगा, जबकि भारत को बेहतर बाज़ार पहुंच, शुल्क में कटौती, मानकों की आपसी मान्यता और निवेशकों का विश्वास प्राप्त होगा। उन्होंने यूके के रिटेलर्स और औद्योगिक उपयोगकर्ताओं से भारत की किफायती और नवाचार-आधारित इकोसिस्टम के साथ मिलकर लचीली और सतत आपूर्ति श्रृंखलाएँ (supply chains) बनाने का आग्रह किया।

रणनीतिक सहभागिता

प्रतिनिधिमंडल ने मैनचेस्टर मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी के मैनचेस्टर फ़ैशन इंस्टीट्यूट और ग्राफीन इंजीनियरिंग इनोवेशन सेंटर का दौरा किया, ताकि उन्नत सामग्री, सतत तकनीकी वस्त्र और परिपत्र फैशन मॉडल्स में सहयोग की संभावनाओं की खोज की जा सके।

भारत का तकनीकी वस्त्र निर्यात झलक (वित्त वर्ष 2024–25)

  • वैश्विक निर्यात: 2.92 बिलियन अमेरिकी डॉलर

  • प्रमुख श्रेणियाँ: पैकटेक (37.5%), इंडुटेक (28%)

  • यूके को निर्यात: 136 मिलियन अमेरिकी डॉलर (4.7% हिस्सा)

आगे की राह

यह दौरा भारत और यूके के बीच व्यापार के अधिक अवसर, संयुक्त उपक्रम, निवेश और तकनीकी साझेदारी को प्रोत्साहित करने की उम्मीद जगाता है। पीएम मित्रा मेगा टेक्सटाइल पार्क्स, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना और NTTM जैसी प्रमुख योजनाएँ विश्वस्तरीय अवसंरचना और अनुकूल कारोबारी माहौल तैयार कर रही हैं। CETA के अंतर्गत मिलने वाले बाज़ार पहुंच लाभों के साथ भारत 2030 तक अपने वस्त्र निर्यात को दोगुना करने की दिशा में अग्रसर है, और एक पारस्परिक रूप से लाभकारी, सतत और भविष्य-उन्मुख भारत–यूके वस्त्र व्यापार साझेदारी को मज़बूत कर रहा है।


Don't Miss
© Media24Media | All Rights Reserved | Infowt Information Web Technologies.