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वैश्विक बाघ दिवस 2026: केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने प्रकृति से गहरा जुड़ाव और संरक्षण आधारित जीवनशैली अपनाने का किया आह्वान

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नई दिल्ली- केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने आज नई दिल्ली में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा आयोजित वैश्विक बाघ दिवस 2026 समारोह को संबोधित करते हुए प्रकृति के साथ समाज के गहरे जुड़ाव और संरक्षण-आधारित जीवनशैली अपनाने का आह्वान किया। इस अवसर पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, वन्यजीव विशेषज्ञ, अग्रिम पंक्ति के वनकर्मी, विद्यार्थी और विभिन्न हितधारक उपस्थित रहे।

यादव ने कहा कि संरक्षण केवल वन्यजीवों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके साथ संतुलित संबंध स्थापित करना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा, "प्रकृति केवल पर्यटन या मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि उसका सम्मान करना और उससे आत्मिक शांति प्राप्त करना भी जरूरी है।" उन्होंने लोगों से प्रकृति से प्रेरणा लेकर पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित जीवनशैली अपनाने का आग्रह किया।

भारत ने बाघ संरक्षण में हासिल की बड़ी उपलब्धियां

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में बाघों की संख्या बढ़कर 3,682 हो गई है तथा देश में अब 58 टाइगर रिजर्व हैं। उन्होंने बताया कि पिछले 12 वर्षों में हाथी रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, संरक्षित क्षेत्र, सामुदायिक रिजर्व और आर्द्रभूमियों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

एनटीसीए का इको-टूरिज्म पोर्टल लॉन्च

समारोह के दौरान यादव ने एनटीसीए के इको-टूरिज्म वेबपेज का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि यह मंच देश के सभी टाइगर रिजर्व की प्रमाणिक वेबसाइटों को एकीकृत करता है, जिससे सफारी और आवास की बुकिंग संबंधी जानकारी आसानी से उपलब्ध होगी और जिम्मेदार एवं सतत प्रकृति-आधारित पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

वन अधिकारियों से अनुभव साझा करने की अपील

यादव ने कहा कि वनों की कहानियां केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उनमें पारंपरिक ज्ञान, वन्यजीव संरक्षण के प्रति समर्पण और वर्षों का अनुभव भी शामिल होता है। उन्होंने वन अधिकारियों और संरक्षण विशेषज्ञों से अपने अनुभवों को लिखित रूप में साझा करने का आग्रह किया, ताकि वे भविष्य की प्रभावी नीतियां बनाने में सहायक बन सकें।

क्षमता निर्माण और वैश्विक सहयोग पर जोर

उन्होंने वन अधिकारियों और कर्मचारियों के क्षमता निर्माण के लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (IBCA) की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मंच भारत के नेतृत्व में दुनिया भर में ज्ञान साझा करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।

उत्कृष्ट योगदान के लिए एनटीसीए पुरस्कार

बाघ संरक्षण और संरक्षित क्षेत्रों के बेहतर प्रबंधन में उत्कृष्ट कार्य करने वाले वन अधिकारियों और अन्य योगदानकर्ताओं को एनटीसीए पुरस्कार प्रदान किए गए। समारोह में अग्रिम पंक्ति के वनकर्मियों के योगदान को भी विशेष रूप से सम्मानित किया गया।

विद्यार्थियों की रचनात्मक भागीदारी

मंत्री ने 'सेव टाइगर' विषय पर आयोजित पेंटिंग, स्केचिंग, स्लोगन लेखन और मास्क निर्माण प्रतियोगिताओं की प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इसके अलावा, मंत्रालय के पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत देशभर के ईको-क्लबों के माध्यम से विशेषकर टाइगर रिजर्व के आसपास स्थित विद्यालयों में व्यापक जनजागरूकता अभियान भी चलाया गया।

पांच महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विमोचन

समारोह के दौरान बाघ संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़े पांच प्रकाशनों का विमोचन किया गया। इनमें एनटीसीए आउटरीच जर्नल 'स्ट्राइप्स' (जुलाई 2026 अंक), 24 टाइगर रिजर्व की सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट, भारत के टाइगर लैंडस्केप में स्लॉथ भालुओं के आवास उपयुक्तता मूल्यांकन रिपोर्ट, 'टाइगर्स ऑफ द वर्ल्ड' तथा 'द रहमान खेड़ा टाइगर' शामिल हैं।

भारत की प्रतिबद्धता दोहराई

वैश्विक बाघ दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित इस समारोह ने उत्कृष्ट कार्यों के सम्मान, वैज्ञानिक प्रबंधन, क्षमता निर्माण, जिम्मेदार इको-टूरिज्म, ज्ञान साझाकरण और जनभागीदारी के माध्यम से बाघ संरक्षण के प्रति भारत की मजबूत और निरंतर प्रतिबद्धता को दोहराया।

पृष्ठभूमि

करीब एक शताब्दी पहले एशिया में लगभग 1 लाख जंगली बाघ पाए जाते थे, लेकिन आज वे अपने ऐतिहासिक आवास के 8 प्रतिशत से भी कम क्षेत्र में सीमित रह गए हैं। अवैध शिकार, वन्यजीव तस्करी, आवास का विनाश, मानव-वन्यजीव संघर्ष और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने बाघों की संख्या को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए वर्ष 2010 में सेंट पीटर्सबर्ग टाइगर समिट में 13 बाघ-आवास वाले देशों ने ग्लोबल टाइगर रिकवरी प्रोग्राम (GTRP) की शुरुआत की और 29 जुलाई को प्रतिवर्ष वैश्विक बाघ दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य बाघ संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना और बाघों तथा उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

वैश्विक बाघ दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी शुभकामनाएं, बाघ संरक्षण के प्रति दोहराई प्रतिबद्धता

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 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक बाघ दिवस (Global Tiger Day) के अवसर पर सभी वन्यजीव प्रेमियों को शुभकामनाएं दी हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के लोगों के लिए यह गर्व की बात है कि विश्व की लगभग 70 प्रतिशत बाघ आबादी भारत में निवास करती है।

उन्होंने कहा कि भारत के बाघ संरक्षण प्रयास प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की हमारी सदियों पुरानी संस्कृति से प्रेरित हैं और देशवासियों की सामूहिक इच्छाशक्ति से संचालित होते हैं।

मोदी ने विज्ञान-आधारित संरक्षण, जनभागीदारी तथा सतत विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जो बाघ संरक्षण को और अधिक सशक्त बनाते हैं।

प्रधानमंत्री ने बाघों की सुरक्षा में वन कर्मियों, वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों के समर्पण एवं योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए भी प्रतिबद्ध है।

एक्स (X) पर अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री ने कहा:

“वैश्विक बाघ दिवस पर सभी वन्यजीव प्रेमियों को हार्दिक शुभकामनाएं। भारत के लोगों को इस बात पर गर्व है कि विश्व के लगभग 70 प्रतिशत बाघ हमारे देश में हैं। भारत के बाघ संरक्षण के प्रयास प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की हमारी सदियों पुरानी संस्कृति से प्रेरित हैं और हमारे लोगों की सामूहिक इच्छाशक्ति से सशक्त होते हैं। हम विज्ञान-आधारित संरक्षण, जनभागीदारी और सतत विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराते हैं, जो बाघ संरक्षण को और मजबूत बनाते हैं।”

“हमारे वन कर्मियों, वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों के अथक प्रयास तथा समर्पण ने भी बाघ संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी भावना के साथ भारत स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस: बाघ संरक्षण में भारत बना वैश्विक अग्रणी, दुनिया के 70% जंगली बाघ भारत में

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नई दिल्ली- हर वर्ष 29 जुलाई को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस बाघ संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने का अवसर है। भारत के लिए यह दिन विज्ञान आधारित संरक्षण, मजबूत नीतियों और जनभागीदारी के माध्यम से हासिल की गई उल्लेखनीय उपलब्धियों का प्रतीक है। आज दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर बाघ संरक्षण का अग्रणी देश बनकर उभरा है।

भारत में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन-2022 के अनुसार देश में बाघों की संख्या 3,682 पहुंच गई है। वर्ष 2006 के बाद से भारत ने वैज्ञानिक आकलन के आधार पर अपनी बाघ आबादी को दोगुने से अधिक बढ़ाने में सफलता हासिल की है। यह उपलब्धि दीर्घकालिक संरक्षण नीतियों, वैज्ञानिक प्रबंधन और प्रभावी निगरानी का परिणाम है।

भारत में बाघ संरक्षण की आधारशिला प्रोजेक्ट टाइगर, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) तथा टाइगर संरक्षण योजनाओं पर आधारित है। वर्तमान में देश के 18 राज्यों में 58 टाइगर रिजर्व हैं, जो लगभग 84,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।

बाघों की निगरानी के लिए भारत ने अत्याधुनिक तकनीकों को अपनाया है। एम-एसटीआरआईपीईएस (M-STrIPES), कैमरा ट्रैप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित विश्लेषण और CaTRAT जैसी प्रणालियों के माध्यम से बाघों की सटीक गणना और उनके आवास की निगरानी की जा रही है। इससे संरक्षण योजनाओं को और अधिक प्रभावी बनाया गया है।

भारत वैश्विक स्तर पर भी बाघ संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। नेपाल, भूटान, रूस, म्यांमार और अन्य देशों के साथ सहयोग के अलावा भारत इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (IBCA) और ग्लोबल टाइगर फोरम (GTF) जैसी पहलों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संरक्षण प्रयासों को मजबूत कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख संरक्षक हैं। बाघों का संरक्षण जंगलों, नदियों, जैव विविधता और लाखों लोगों की आजीविका की सुरक्षा से भी जुड़ा है। इसी उद्देश्य के साथ भारत विज्ञान आधारित संरक्षण, आधुनिक तकनीक और वैश्विक सहयोग के जरिए बाघों के सुरक्षित भविष्य की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है।

छत्तीसगढ़ को मिलेगी पहली राजकीय तितली: 31 अगस्त तक जनता करेगी ऑनलाइन मतदान, जैव विविधता संरक्षण को मिलेगा बढ़ावा

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रायपुर- छत्तीसगढ़ जल्द ही अपनी पहली राजकीय तितली (State Butterfly) घोषित करने जा रहा है। राज्य सरकार ने इस अनूठी पहल के तहत प्रदेशवासियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ऑनलाइन जनमत संग्रह (Public Voting) शुरू किया है। नागरिक 31 अगस्त तक अपनी पसंद की तितली के पक्ष में मतदान कर सकेंगे।

इस अभियान का उद्देश्य केवल राज्य की राजकीय तितली का चयन करना ही नहीं, बल्कि लोगों में जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और तितलियों के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी है। तितलियां स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र की पहचान मानी जाती हैं और परागण (Pollination) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

वन विभाग का मानना है कि इस पहल से प्रकृति संरक्षण के प्रति लोगों की भागीदारी बढ़ेगी और प्रदेश की समृद्ध प्राकृतिक विरासत को नई पहचान मिलेगी। राज्य सरकार ने सभी नागरिकों, विद्यार्थियों और प्रकृति प्रेमियों से अधिक से अधिक संख्या में मतदान कर इस अभियान का हिस्सा बनने की अपील की है।

राजकीय तितली की घोषणा के बाद यह प्रजाति छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक बनेगी और वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े जनजागरूकता अभियानों में भी विशेष स्थान पाएगी।

आप निम्नलिखित तीन तितलियों में से अपनी पसंदीदा तितली को वोट दे सकते हैं:

1. ऑरेंज ओकलीफ

2. कॉमन बैंडेड पीकॉक

3. स्पॉट स्वॉर्डटेल

🗳️ वोट करने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

https://forms.gle/7Mqa1kBLx4dnFA6b7

आपका एक वोट छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक विरासत को नई पहचान देगा। कृपया स्वयं मतदान करें तथा इस संदेश को अपने परिवार, मित्रों और समूहों में अधिक से अधिक साझा करें।

“आपकी पसंद—छत्तीसगढ़ की राजकीय तितली!” 🦋🌿

विशेष लेख-सीड बॉल अभियान- हरियाली बढ़ाने का सरल और प्रभावी माध्यम

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जनभागीदारी से साकार हो रहा हरित छत्तीसगढ़ का संकल्प

सीड बॉल पर्यावरण को हरा-भरा बनाने और वनीकरण (रिफॉरेस्टेशन) का एक बेहद सरल, किफायती और अत्यधिक प्रभावी माध्यम है। इसमें बीजों को मिट्टी और जैविक खाद के मिश्रण से छोटी-छोटी गोलियों के रूप में सुरक्षित कर दिया जाता है, जिससे वे बिना मेहनत के दुर्गम स्थानों पर भी उग जाते हैं। सीड बॉल- बीज, मिट्टी (मुख्य रूप से चिकनी मिट्टी) और जैविक खाद (गोबर या वर्मीकम्पोस्ट) का एक छोटा और सूखा गोला होता है। बीजों को इस प्राकृतिक आवरण में लपेटकर सुखा लिया जाता है। मानसून की पहली अच्छी बारिश के बाद जब मिट्टी में पर्याप्त नमी हो, तब सीड बॉल्स का उपयोग करना सबसे अच्छा होता है। इन्हें यात्रा करते समय या खाली जगहों पर पैदल चलते हुए मिट्टी पर बिखेर दें। पानी के संपर्क में आते ही ये पौधे के रूप में विकसित होना शुरू हो जाती हैं।

बारिश का मौसम पौधारोपण और वनों के विस्तार के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। इसी उद्देश्य से वन विभाग द्वारा सीड बॉल (बीज गोला) अभियान चलाया जा रहा है। यह अभियान जनभागीदारी के माध्यम से ऐसे क्षेत्रों में हरियाली बढ़ाने का प्रभावी प्रयास है, जहाँ पौधारोपण करना कठिन होता है।

क्या है सीड बॉल?

सीड बॉल मिट्टी, गोबर या जैविक खाद और विभिन्न वृक्षों के बीजों से तैयार किया गया छोटा गोलाकार गोला होता है। इसे जंगलों, पहाड़ियों, खाली भूमि और दुर्गम क्षेत्रों में फेंक दिया जाता है। वर्षा का पानी मिलने पर बीज अंकुरित होकर पौधों का रूप ले लेते हैं।

वन विभाग का हरित अभियान

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सशक्त नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार छत्तीसगढ़ वन विभाग द्वारा एक पेड़ मां के नाम, वन महोत्सव तथा युवा फॉर नेचर जैसे अभियानों के साथ सीड बॉल कार्यक्रम को भी व्यापक स्तर पर संचालित किया जा रहा है। स्कूलों, महाविद्यालयों, स्वयंसेवी संस्थाओं, महिला स्व-सहायता समूहों और स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी से हजारों-लाखों सीड बॉल तैयार कर जंगलों और खाली भूमि में डाली जा रही हैं।

जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका

सीड बॉल में महुआ, इमली, हर्रा, बहेड़ा, जामुन, करंज, नीम, बरगद, पीपल, आम, जामुन, शाल, बीजा, चार, खमार सहित स्थानीय प्रजातियों के बीजों का उपयोग किया जाता है। इससे प्राकृतिक वनों का विस्तार होता है, वन्यजीवों को भोजन और आश्रय मिलता है तथा जैव विविधता का संरक्षण भी सुनिश्चित होता है।

पर्यावरण संरक्षण का सशक्त माध्यम

सीड बॉल अभियान से हरित आवरण बढ़ने के साथ-साथ जल संरक्षण, मिट्टी के क्षरण या कटाव में कमी, कार्बन अवशोषण तथा जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में भी सहायता मिलती है। यह कम लागत में अधिक क्षेत्र को हरित बनाने का प्रभावी उपाय है।

जनभागीदारी से बनेगा हरित भविष्य

वन विभाग का उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि समाज में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता विकसित करना भी है। जब बच्चे, युवा, महिलाएं और ग्रामीण इस अभियान से जुड़ते हैं, तो हर व्यक्ति प्रकृति संरक्षण का सहभागी बनता है।

हर नागरिक निभाए अपनी जिम्मेदारी

यदि प्रत्येक नागरिक वर्षा ऋतु में कुछ सीड बॉल तैयार कर उपयुक्त स्थानों पर डाले या पौधारोपण में भागीदारी करे, तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ का हरित क्षेत्र और अधिक समृद्ध होगा। सीड बॉल अभियान प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी निभाने का एक सरल, सुलभ और प्रभावी माध्यम है।

साही के अवैध शिकार पर वन विभाग का बड़ा एक्शन

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पांच आरोपी गिरफ्तार, भेजे गए जेल

रायपुर- छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर राज्य सरकार की मुस्तैदी का एक बड़ा असर देखने को मिला है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की मंशा के अनुरूप वन्यजीव संरक्षण को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए वन विभाग ने साही (इंडियन पॉर्कुपाइन) के अवैध शिकार के मामले में एक बड़ी कार्रवाई की है। वन विभाग की टीम ने त्वरित एक्शन लेते हुए पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया है।

आरक्षित वन में हुआ था शिकार, आपस में बांटा मांस

यह पूरी कार्रवाई वनमण्डलाधिकारी मयंक पाण्डेय के मार्गदर्शन एवं उप वनमण्डलाधिकारी गोविंद सिंह के नेतृत्व में वन परिक्षेत्र बागबाहरा की टीम द्वारा की गई।

मिली जानकारी के अनुसार, वन विभाग को रैताल बीट के आरक्षित वन कक्ष क्रमांक-154 में साही के अवैध शिकार की सूचना मिली थी। वन परिक्षेत्र अधिकारी नवीन वर्मा के नेतृत्व में टीम ने तत्काल जांच शुरू की। विवेचना के दौरान ग्राम नवाडीह (खम्हरिया) के पांच ग्रामीणों की संलिप्तता सामने आई। पूछताछ में पता चला कि आरोपियों ने शिकार करने के बाद साही का मांस आपस में बांट लिया था। आरोपियों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है।

कड़ी धाराओं के तहत मामला दर्ज

वन विभाग ने इस मामले में वन अपराध प्रकरण क्रमांक 22666/05 (दिनांक 13 जुलाई 2026) दर्ज किया है। आरोपियों के खिलाफ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 2(16), 9, 39, 50 एवं 51 के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की गई है। गिरफ्तार आरोपियों के नाम में 

गिरधारी गोंड, लोकनाथ गोंड, नागेश्वर गोंड, सियाराम राजपूत और नरसिंह कुमार सहित सभी आरोपियों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया है।

कार्रवाई में इनकी रही अहम भूमिका

इस त्वरित और सफल कार्रवाई में डिप्टी रेंजर नवीन शर्मा, वनरक्षक डीलेश्वरी कंवर, नीलकंठ दीवान, वीरेंद्र दीवान सहित वन विभाग के अन्य स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। स्थानीय वन प्रबंधन समिति नवाडीह (खम्हरिया) के सदस्यों ने भी इस कार्रवाई में विभाग का सक्रिय सहयोग किया।

वन विभाग की अपील

वन विभाग ने आम नागरिकों से अपील की है कि वे वन्यजीवों के संरक्षण में अपनी भागीदारी निभाएं। यदि कहीं भी अवैध शिकार या तस्करी से जुड़ी कोई संदिग्ध गतिविधि दिखाई दे, तो तुरंत इसकी सूचना वन विभाग को दें। विभाग ने साफ किया है कि वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए सघन गश्त और कड़ा निगरानी अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा।


भोरमदेव में इको-टूरिज्म को मिली नई पहचान, उप मुख्यमंत्री ने वन महोत्सव और 6 किमी लंबे इको ट्रेल का किया शुभारंभ

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पर्यटन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई मजबूती- उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा

51 काला आम के पौधों का हुआ रोपण, 50 हजार सीड बॉल और एक लाख पौधों के वितरण अभियान की हुई शुरुआत

बैगा समुदाय के 100 हितग्राहियों को सोलर लालटेन और जैकेट का किया वितरण

हर शनिवार और रविवार होगी इको ट्रेल, नेचर गाइड के साथ सुरक्षित वन भ्रमण की सुविधा

रायपुर- कबीरधाम जिले के भोरमदेव अभ्यारण्य में प्रकृति संरक्षण और इको-टूरिज्म को नई पहचान देते हुए उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने आज जंगल सफारी में वन महोत्सव और भोरमदेव इको ट्रेल का शुभारंभ किया। इस दौरान उप मुख्यमंत्री ने जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, वन विभाग के कर्मचारियों और ग्रामीणों के साथ लगभग 6 किलोमीटर लंबी भोरमदेव इको ट्रेल का भ्रमण कर जंगल की प्राकृतिक सुंदरता, जैव विविधता और रोमांचक वन यात्रा का अनुभव लिया। प्राकृतिक पर्यावरण में की जाने वाली एक जिम्मेदार यात्रा है। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना वहां के प्राकृतिक संसाधनों और वन्यजीवों का संरक्षण करना, और स्थानीय समुदायों को आर्थिक रूप से लाभ पहुँचाना है।

भोरमदेव क्षेत्र अनमोल प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध 

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि भोरमदेव अभ्यारण्य में जंगल सफारी शुरू होने के बाद पर्यटक अब जंगल के अंदर जाकर प्रकृति का करीब से आनंद ले रहे हैं। अब आज से शुरू हुई भोरमदेव इको ट्रेल भी पर्यटकों को घने जंगल, प्राकृतिक सुंदरता और वन्य जीवों के बीच एक नया और यादगार अनुभव देगी। उन्होंने कहा कि प्रकृति ने भोरमदेव क्षेत्र को अनमोल प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध किया है। उन्होंने कहा कि पर्यटन दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाला और सबसे अधिक रोजगार देने वाला क्षेत्र है। भोरमदेव में पर्यटन सुविधाओं के बढ़ने से यहां अधिक पर्यटक आएंगे। इससे होटल, वाहन, खान-पान, हस्तशिल्प और अन्य छोटे-बड़े व्यवसायों को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखना हम सभी की जिम्मेदारी 

उप मुख्यमंत्री शर्मा ने कहा कि पर्यटन बढ़ने से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी बनेंगे। अभी भी कई युवा जंगल सफारी में नेचर गाइड बनकर पर्यटकों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। आने वाले समय में ऐसे अवसर और बढ़ेंगे, जिससे उनकी आय में भी वृद्धि होगी। उन्होंने कहा कि साल भर यहां पर्यटन गतिविधियां तेजी से चलने की संभावना है, जिसका सीधा लाभ क्षेत्र के लोगों को मिलेगा। शर्मा ने कहा कि भोरमदेव का विकास तभी सफल होगा, जब स्थानीय लोग इसे अपनी धरोहर मानकर इसकी सुरक्षा करेंगे। उन्होंने सभी से पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन स्थलों की स्वच्छता बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि इस प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखना और आगे बढ़ाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

स्वदेश दर्शन योजना से बदलेगी भोरमदेव की तस्वीर

उप मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार की स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत भोरमदेव क्षेत्र के समग्र पर्यटन विकास के लिए 146 करोड़ रुपए स्वीकृत हुए हैं। इस राशि से प्रवेश द्वार, शेड, संग्रहालय, आधुनिक पार्क, पार्किंग, मेला स्थल, छेरकी महल, मड़वा महल, रामचूंआ और सरोदा बांध सहित विभिन्न पर्यटन स्थलों का विकास किया जा रहा है। इन परियोजनाओं के पूर्ण होने से भोरमदेव राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित होगा।

6 किलोमीटर लंबी इको ट्रेल में मिलेगा प्रकृति के बीच रोमांच

वन विभाग द्वारा विकसित भोरमदेव इको ट्रेल लगभग 6 किलोमीटर लंबी है, जिसे पूरा करने में करीब 3 से 4 घंटे का समय लगता है। ट्रेल के दौरान पर्यटक प्राकृतिक वन, मनमोहक दृश्य, पक्षियों और तितलियों का अवलोकन, औषधीय वनस्पतियों की जानकारी तथा प्रशिक्षित नेचर गाइड के साथ सुरक्षित वन भ्रमण का आनंद ले सकेंगे।

बैगा समुदाय के हितग्राहियों को किया सोलर लालटेन वितरण

वन महोत्सव के अवसर पर उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने करिया आमा ग्राम में 51 काला आम के पौधों का रोपण कर काला आम उपवन की स्थापना की। इसके साथ ही जिलेभर में 50 हजार सीड बॉल रोपण अभियान का शुभारंभ किया। जिले में एक लाख पौधों के वितरण अभियान की शुरुआत करते हुए ई-रिक्शा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। कार्यक्रम में बैगा समुदाय के 100 हितग्राहियों को सोलर लालटेन और जैकेट भी वितरित की गई। 

भोरमदेव ईको ट्रेल हर शनिवार और रविवार को होगी आयोजित

भोरमदेव ईको ट्रेल का संचालन करियाआमा गेट स्थित भोरमदेव ईको कैंप से प्रत्येक शनिवार और रविवार को किया जाएगा। वन मंडलाधिकारी निखिल अग्रवाल ने बताया कि अनुभवी नेचर गाइड के साथ प्रतिभागियों को जंगल भ्रमण कराया जाएगा। इस दौरान वे पेड़-पौधों, औषधीय वनस्पतियों, पक्षियों, तितलियों, वन्यजीवों, स्थानीय भोजन, भोरमदेव मंदिर विरासत परिसर के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। ईको ट्रेल में भाग लेने के लिए 1 हजार रुपए प्रति व्यक्ति शुल्क निर्धारित किया गया है। 

कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष विशेषर पटेल, छत्तीसगढ़ कृषक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष सुरेश चंद्रवंशी, पुलिस जवाबदेही प्राधिकरण सदस्य भगत पटेल, जिला पंचायत अध्यक्ष ईश्वरी साहू, जिला पंचायत सदस्य राम कुमार भट्ट, डॉ वीरेन्द्र साहू सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।

मानव–वन्यजीव संघर्ष पर उत्कृष्टता केंद्र (CoE) का उद्घाटन, मानव–वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन को मिलेगा नया आयाम

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केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने आज कोयंबटूर में मानव–वन्यजीव संघर्ष पर उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence - CoE) का उद्घाटन किया। उद्घाटन के पश्चात राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर के वरिष्ठ नीति-निर्माता, वन प्रबंधक, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, तकनीकी विशेषज्ञ और संरक्षण क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल हुए। कार्यक्रम में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह भी उपस्थित रहे।

अपने मुख्य संबोधन में भूपेंद्र यादव ने कहा कि आवास क्षेत्रों के विखंडन, भूमि उपयोग में बदलाव और मानव गतिविधियों के विस्तार के कारण मानव और वन्यजीवों के बीच संपर्क बढ़ रहा है, जिससे मानव–वन्यजीव संघर्ष भारत की प्रमुख संरक्षण और विकास संबंधी चुनौतियों में से एक बन गया है। उन्होंने कहा, "हमें समस्या-केंद्रित नहीं, बल्कि समाधान-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और आधुनिक तकनीकी प्रगति का उपयोग करना चाहिए।"

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सातवीं बैठक में की गई घोषणा के अनुरूप स्थापित यह उत्कृष्टता केंद्र मानव–वन्यजीव संघर्ष के वैज्ञानिक एवं साक्ष्य-आधारित प्रबंधन को सुदृढ़ करने के लिए अनुसंधान, नवाचार, नीति समर्थन, क्षमता निर्माण तथा सर्वोत्तम प्रथाओं के प्रसार का राष्ट्रीय केंद्र बनेगा।

यादव ने कहा कि संस्थान को टाइगर रिजर्व के बाहर बाघों, तेंदुओं और हाथियों से जुड़े मानव–वन्यजीव संघर्षों के प्रबंधन हेतु नीति निर्माण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में मानव–वन्यजीव मुठभेड़ों से निपटने के लिए मिशन मोड में जनजागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। क्षेत्र-विशिष्ट और प्रजाति-विशिष्ट उपाय अपनाकर ऐसे संघर्षों का समाधान किया जा सकता है, जिससे समाज में फैलने वाली घबराहट को कम करने में मदद मिलेगी।

उन्होंने देशभर के वन विभागों से भी अपील की कि वे मानव बस्तियों और फसलों को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए सक्रिय एवं निवारक उपाय अपनाएं। इसके लिए स्थानीय समुदायों के साथ समन्वित और बहु-हितधारक परामर्श आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वन्यजीव संरक्षण में नवीनतम तकनीकों का उपयोग कर नवाचारी सर्वोत्तम प्रथाओं को विकसित और व्यापक रूप से लागू किया जाना चाहिए। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा, "पारिस्थितिकीय स्थिरता के लिए संघर्ष नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और सामंजस्य हमारा मंत्र होना चाहिए।"

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा कि वन्यजीव संरक्षण की सफलता के कारण मानव–वन्यजीव संपर्क बढ़ा है, जो अब संरक्षण के साथ-साथ एक बड़ा सामाजिक-आर्थिक मुद्दा भी बन गया है और आजीविका पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने कहा कि वन्यजीव संरक्षण और देश की सामाजिक-आर्थिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित करते हुए दीर्घकालिक समाधान खोजने की आवश्यकता है।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उत्कृष्टता केंद्र अधिकारियों और समुदायों के क्षमता निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। साथ ही यह उन्नत तकनीकों के माध्यम से डेटा दस्तावेजीकरण तथा वन्यजीव संरक्षण में पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण को बढ़ावा देगा, जिससे मानव और वन्यजीवों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को मजबूती मिलेगी।

उद्घाटन सत्र के दौरान मंत्री ने राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष पोर्टल का भी शुभारंभ किया। यह डिजिटल मंच देशभर में संघर्ष प्रबंधन के लिए डेटा प्रबंधन, ज्ञान साझाकरण और निर्णय समर्थन प्रदान करेगा। इसके साथ ही "भारत में मानव–वन्यजीव संघर्ष की वर्तमान स्थिति: एक अवलोकन" शीर्षक प्रकाशन श्रृंखला के प्रथम संस्करण का भी विमोचन किया गया, जिसमें देश में मानव–वन्यजीव संघर्ष की वर्तमान स्थिति, रुझानों और उभरती चुनौतियों का व्यापक आकलन प्रस्तुत किया गया है।

कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में मानव–वन्यजीव संघर्ष पोर्टल का लाइव प्रदर्शन किया गया तथा विशेषज्ञ प्रस्तुतियों और पैनल चर्चाओं का आयोजन हुआ। चर्चा के प्रमुख विषय रहे:

  • मानव–हाथी संघर्ष

  • मानव–बड़ी बिल्ली (बाघ एवं तेंदुआ) संघर्ष

  • मानव–वन्यजीव संघर्ष न्यूनीकरण में प्रौद्योगिकी और नवाचार

इन विचार-विमर्शों से राष्ट्रीय रणनीतियों को सुदृढ़ करने, तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने, विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय बढ़ाने और मानव–वन्यजीव सह-अस्तित्व को मजबूत करने के लिए ठोस सुझाव प्राप्त होंगे।

मानव–वन्यजीव संघर्ष पर उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना जैव विविधता संरक्षण और मानव जीवन एवं आजीविका की सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए भारत सरकार की विज्ञान-आधारित, प्रौद्योगिकी-सक्षम और समुदाय-केंद्रित प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

कार्यक्रम में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव, वन महानिदेशक एवं विशेष सचिव, अतिरिक्त महानिदेशक (वन्यजीव), भारतीय वन्यजीव संस्थान के निदेशक, मंत्रालय एवं राज्य वन विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, शैक्षणिक संस्थानों और सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

वन्यजीव संरक्षण में बड़ी सफलता,नर चीतल के अवैध शिकार का खुलासा, सात आरोपी गिरफ्तार, न्यायालय ने भेजा जेल

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सरकार की सख्ती से वन्यजीव अपराधों पर लग रहा अंकुश, वन्यजीव संरक्षण को मिल रही मजबूती

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सशक्त नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार वन, वन्यजीव और जैव विविधता के संरक्षण के लिए लगातार प्रभावी कदम उठा रही है। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में वन विभाग और छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम द्वारा अवैध शिकार के विरुद्ध विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। इन अभियानों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। इसी क्रम में कवर्धा परियोजना मंडल ने नर चीतल के अवैध शिकार के मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। सभी आरोपियों को न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने के बाद जेल भेज दिया गया।

मुखबिर की सूचना पर योजनाबद्ध कार्रवाई

वन विकास निगम के बोड़ला परियोजना परिक्षेत्र के भलपहरी बीट स्थित जंगल में शिकारियों ने जाल बिछाकर लगभग तीन वर्ष के नर चीतल का शिकार किया। इसके बाद उसके मांस को पकाकर आपस में बांटने की तैयारी की जा रही थी। मुखबिर से मिली सूचना पर वन विकास निगम की टीम ने तत्काल योजनाबद्ध तरीके से घेराबंदी कर दबिश दी और सभी सात आरोपियों को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।

शिकार में प्रयुक्त सामग्री और चीतल का मांस जब्त

कार्रवाई के दौरान आरोपियों के कब्जे से लगभग 500 ग्राम पका हुआ चीतल का मांस, नायलॉन की रस्सी, तीन कुल्हाड़ियां, स्टील के तार एवं लकड़ी से बने फंदे तथा खून से सना थैला बरामद कर जब्त किया गया। आरोपियों के विरुद्ध वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की विभिन्न धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई की गई।

सघन निगरानी और गश्त से मिल रही सफलता

वन विभाग और वन विकास निगम द्वारा संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित गश्त, सूचना तंत्र को मजबूत करने तथा विशेष निगरानी अभियान चलाने के कारण वन्यजीव अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो रहा है। विभाग की सतर्कता और त्वरित कार्रवाई से अवैध शिकार करने वालों के विरुद्ध लगातार सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है।

वन्यजीव संरक्षण के लिए सरकार की स्पष्ट नीति

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार प्राकृतिक संसाधनों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। वन मंत्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार वन विभाग आधुनिक निगरानी व्यवस्था, नियमित गश्त और प्रभावी सूचना तंत्र के माध्यम से वन्यजीव अपराधों पर अंकुश लगाने का कार्य कर रहा है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि वन्यजीवों का अवैध शिकार करने या प्राकृतिक संपदा को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।  वन मंत्री कश्यप ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि वन्यजीवों के संरक्षण में अपनी भागीदारी निभाएं। यदि कहीं भी अवैध शिकार या वन अपराध की जानकारी मिले तो उसकी सूचना तत्काल वन विभाग को दें, ताकि समय रहते प्रभावी कार्रवाई कर प्रदेश की समृद्ध वन्यजीव संपदा और जैव विविधता का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।

बिहार के मुंगेर का लगभग 700 वर्ष पुराना बरगद वैज्ञानिक रूप से दिनांकित सबसे प्राचीन बरगद घोषित

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बिहार के मुंगेर स्थित लगभग 700 वर्ष पुराने बरगद (Ficus benghalensis) को रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से वैज्ञानिक रूप से दिनांकित दुनिया का सबसे प्राचीन बरगद (Oldest Accurately Dated Banyan Tree) माना गया है। यह पहली बार है जब किसी बरगद के वृक्ष की आयु का निर्धारण लोककथाओं या ऐतिहासिक अभिलेखों के बजाय पूर्णतः वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर किया गया है।

बरगद के वृक्ष अपनी विशाल जड़ों और शाखाओं के जटिल तंत्र के कारण पक्षियों, कीटों और अन्य जीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं। भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भी इनका विशेष महत्व रहा है। अब तक ऐसे प्राचीन वृक्षों की आयु का अनुमान लोककथाओं, स्थानीय मान्यताओं या ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर लगाया जाता था, जो अक्सर सटीक नहीं होता था। उष्णकटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले अधिकांश वृक्षों में स्पष्ट वार्षिक वृक्ष-वृत्त (Growth Rings) नहीं होने के कारण पारंपरिक डेंड्रोक्रोनोलॉजी (वृक्ष-वर्ष निर्धारण) तकनीकें प्रभावी नहीं थीं। इसलिए उच्च सटीकता वाली रेडियोकार्बन डेटिंग जैसी वैकल्पिक वैज्ञानिक पद्धति की आवश्यकता महसूस की गई।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (Birbal Sahni Institute of Palaeosciences), लखनऊ की वैज्ञानिक डॉ. त्रिणा बोस को बिहार वन विभाग ने मुंगेर के इस ऐतिहासिक बरगद की आयु निर्धारित करने का दायित्व सौंपा। उन्होंने उष्णकटिबंधीय वृक्षों के लिए पारंपरिक विधियों की सीमाओं को देखते हुए एक नई वैज्ञानिक पद्धति विकसित करने की पहल की।

डॉ. त्रिणा बोस के नेतृत्व में डॉ. मयंक शेखर और डॉ. अखिलेश के. यादव की शोध टीम ने वृक्ष के द्वितीयक तने तथा प्राचीन प्राथमिक शाखा के केंद्र (Pith) के निकट से लकड़ी के नमूने एकत्र किए। इन नमूनों से पौधों की कोशिका भित्ति के सबसे स्थिर घटक अल्फा-सेलुलोज़ (Alpha-Cellulose) को अलग किया गया।

इसके बाद इन नमूनों की एक्सेलेरेटर मास स्पेक्ट्रोमेट्री (Accelerator Mass Spectrometry–AMS) आधारित उच्च-सटीकता वाली रेडियोकार्बन डेटिंग की गई। प्राप्त परिणामों का नवीनतम IntCal20 कैलिब्रेशन कर्व तथा OxCal सॉफ्टवेयर की सहायता से विश्लेषण कर वृक्ष की आयु लगभग 700 वर्ष निर्धारित की गई।

यह निष्कर्ष उस पूर्व धारणा को भी गलत सिद्ध करता है कि इस बरगद का रोपण ऐतिहासिक 'बड़ा बंगला (Burra Bunglow)' के निर्माण के समय किया गया था। वास्तुशिल्प के आधार पर यह भवन लगभग 300–350 वर्ष पुराना माना जाता है और इसे शासकों एवं आम जनता के संवाद, ग्राम सभाओं तथा सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों के लिए उपयोग किया जाता था।

नए वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि यह लगभग 700 वर्ष पुराना बरगद उस प्राकृतिक वन का अवशेष है, जो कभी इस क्षेत्र में विद्यमान था। अर्थात यह वृक्ष 'बड़ा बंगला' के निर्माण से भी पहले अस्तित्व में था और उसने उसके निर्माण का साक्षी बनने का गौरव प्राप्त किया। इस प्रकार यह अध्ययन क्षेत्र के ऐतिहासिक घटनाक्रम की समयरेखा को नए सिरे से परिभाषित करता है।

यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Quaternary Research में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में विकसित वैज्ञानिक पद्धति के माध्यम से अब विरासत वृक्षों (Heritage Trees) की आयु का सटीक निर्धारण किया जा सकेगा। इससे सरकारों, वन विभागों और संरक्षण एजेंसियों को सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वृक्षों की पहचान और संरक्षण में सहायता मिलेगी।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अन्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के प्राचीन वृक्षों पर भी लागू की जा सकती है। इससे जैव विविधता संरक्षण, प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, पर्यावरण शिक्षा तथा अतीत की जलवायु एवं ऐतिहासिक परिदृश्यों के अध्ययन को नई दिशा मिलेगी।

यह शोध उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के प्राचीन एवं सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण वृक्षों के वैज्ञानिक आयु निर्धारण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो दक्षिण एशिया सहित विश्वभर में प्राकृतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण को सशक्त आधार प्रदान करेगी।


वन विभाग की बड़ी कार्रवाई : दो बाघ की खाल के साथ दो तस्कर गिरफ्तार

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सीमावर्ती क्षेत्र में संयुक्त अभियान की सफलता, न्यायालय ने भेजा न्यायिक हिरासत में’

रायपुर- वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख के निर्देशन में वन्यजीव तस्करी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए वन विभाग की संयुक्त टीम ने दो बाघों की खाल के साथ दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई कांकेर जिले के पश्चिम भानुप्रतापपुर स्थित बांदे परिक्षेत्र में छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र सीमा पर गोपनीय सूचना के आधार पर की गई।

वन विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के निवासी ब्येश्वर और बाबूराव के रूप में हुई है। दोनों आरोपी मोटरसाइकिल से अनुसूची-1 में शामिल संरक्षित वन्यजीव बाघ की दो खालों की अवैध तस्करी कर रहे थे। संयुक्त टीम ने उन्हें रंगे हाथ पकड़ लिया।

इस कार्रवाई में वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) के उत्तरी एवं मध्य क्षेत्र, राज्य उड़नदस्ता दल (छत्तीसगढ़ वन विभाग), एंटी पोचिंग यूनिट (यूएसटीआर) तथा स्थानीय वन अमले ने संयुक्त रूप से अभियान चलाया।

अन्य आरोपियों की तलाश जारी

वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस मामले में अन्य लोगों की संलिप्तता की भी जांच की जा रही है। उनकी पहचान और गिरफ्तारी के लिए लगातार कार्रवाई जारी है तथा जल्द ही उन्हें भी गिरफ्तार किए जाने की संभावना है।

वन्यजीव संरक्षण के प्रति सरकार की सख्ती

छत्तीसगढ़ सरकार वन्यजीव संरक्षण और वन्यजीव की अवैध तस्करी पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए लगातार सख्त कदम उठा रही है। वन विभाग द्वारा विभिन्न एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर नियमित निगरानी और संयुक्त अभियान संचालित किए जा रहे हैं, जिससे वन्यजीवों के संरक्षण को और अधिक मजबूत बनाया जा सके।

गिरफ्तार दोनों आरोपियों को न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है। वन विभाग मामले की विस्तृत जांच कर रहा है।


’उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दिखा दुर्लभ जंगली कुत्तों (ढोल) का झुंड’

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’वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में संरक्षण प्रयासों को मिली बड़ी सफलता, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के मजबूत होने का मिला संकेत’

’अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE) 2026 के कैमरा ट्रैप में पहली बार रिकॉर्ड हुआ चार ढोलों का संगठित झुंड’

रायपुर- वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE) 2026 के दौरान उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में लगाए गए कैमरा ट्रैप में चार दुर्लभ भारतीय जंगली कुत्तों (ढोल) का संगठित झुंड रिकॉर्ड हुआ है। वन विभाग ने इसे जंगल के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र और बेहतर वन्यजीव संरक्षण का महत्वपूर्ण संकेत बताया है।

’दुर्लभ वन्यजीव की मौजूदगी से मजबूत हुआ संरक्षण का भरोसा’

ढोल (भारतीय जंगली कुत्ता) देश के सबसे दुर्लभ और संकटग्रस्त मांसाहारी वन्यजीवों में शामिल है। इनकी मौजूदगी यह दर्शाती है कि टाइगर रिजर्व में शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ी है और प्राकृतिक आवास पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हुआ है। इससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलित और स्वस्थ होने का संकेत मिलता है।

’संरक्षण के लिए उठाए गए प्रभावी कदम’

वन मंत्री केदार कश्यप के निर्देश पर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। इनमें वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कर प्राकृतिक स्वरूप में विकसित करना, वन्यजीव अपराधियों और शिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, एंटी-पोचिंग अभियान को मजबूत करना तथा कैमरा ट्रैप और आधुनिक तकनीक से लगातार निगरानी करना शामिल है। इन प्रयासों में स्थानीय ग्रामीणों की भी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई।

’956 हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण से हुई मुक्त’

वन विभाग ने रिजर्व क्षेत्र की लगभग 956 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया। इससे वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास और आवागमन के मार्ग फिर से उपलब्ध हुए। साथ ही 550 से अधिक वन्यजीव अपराधियों और अवैध शिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर वन्यजीव संरक्षण को और मजबूत किया गया।

’ढोल क्यों हैं जंगल के लिए महत्वपूर्ण’

ढोल झुंड में रहने वाले सामाजिक और अनुशासित वन्यजीव हैं। ये चीतल, सांभर और जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जीवों की संख्या को संतुलित रखते हैं, जिससे जंगल का प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। यही कारण है कि इनकी मौजूदगी किसी भी वन क्षेत्र के स्वस्थ और समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है।

’जैव विविधता संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि’

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप संचालक ने बताया कि ढोल के संगठित झुंड का रिकॉर्ड होना यह प्रमाणित करता है कि रिजर्व की खाद्य-श्रृंखला मजबूत हुई है और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित वातावरण विकसित हुआ है। यह उपलब्धि वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में किए गए वैज्ञानिक प्रबंधन, कड़ी सुरक्षा और प्रभावी संरक्षण प्रयासों का परिणाम है।

’वन्यजीव संरक्षण का उभरता मॉडल बन रहा छत्तीसगढ़’

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दुर्लभ वन्यजीवों की बढ़ती मौजूदगी यह दर्शाती है कि छत्तीसगढ़ वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता संवर्धन के क्षेत्र में लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। राज्य सरकार के संरक्षण प्रयासों से यह रिजर्व मध्य भारत में वन्यजीवों के सुरक्षित और समृद्ध आवास के रूप में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है।

हॉर्नबिल सफारी से बढ़ेगा इको-टूरिज्म, जैव विविधता संरक्षण को मिलेगा नया आयाम

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रायपुर- छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख टाइगर रिजर्व में इको-टूरिज्म और पक्षी पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘हॉर्नबिल सफारी’ की शुरुआत की गई है। यह पहल न केवल प्रकृति प्रेमियों और पक्षी पर्यवेक्षकों (बर्ड वॉचर्स) को आकर्षित करेगी, बल्कि वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय आर्थिक विकास को भी नई दिशा देगी।

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, हॉर्नबिल सफारी के माध्यम से पर्यटकों को जंगलों की समृद्ध जैव विविधता और दुर्लभ पक्षी प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास में देखने का अवसर मिलेगा। विशेष रूप से हॉर्नबिल पक्षी, जिसे जंगलों का “प्राकृतिक बीज वाहक” माना जाता है, वन पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यह पहल पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और आजीविका के नए अवसर भी सृजित करेगी। सफारी संचालन, गाइड सेवाओं, आवास, परिवहन और अन्य पर्यटन गतिविधियों से जुड़े लोगों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पक्षी पर्यटन की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए हॉर्नबिल सफारी छत्तीसगढ़ को देश के प्रमुख इको-टूरिज्म स्थलों में शामिल करने में मदद कर सकती है। इसके माध्यम से पर्यटक वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को समझ सकेंगे तथा संरक्षण प्रयासों के प्रति अधिक संवेदनशील बनेंगे।

वन विभाग का कहना है कि इस पहल को पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल तरीके से संचालित किया जाएगा ताकि पर्यटन गतिविधियों का वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास पर न्यूनतम प्रभाव पड़े। अधिकारियों को उम्मीद है कि हॉर्नबिल सफारी राज्य में सतत पर्यटन (Sustainable Tourism) को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।


टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में चीतल का अवैध शिकार, दो आरोपी गिरफ्तार

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रायपुर- छत्तीसगढ़ के एक टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में वन्यजीव शिकार का मामला सामने आया है, जहां वन विभाग की टीम ने चीतल (स्पॉटेड डियर) के अवैध शिकार के आरोप में दो लोगों को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई नियमित गश्त और खुफिया सूचना के आधार पर की गई।

वन अधिकारियों के अनुसार, संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिलने पर विशेष अभियान चलाया गया। तलाशी के दौरान आरोपियों के कब्जे से चीतल का मांस, शिकार में इस्तेमाल किए गए धनुष-तीर तथा अन्य सामग्री बरामद की गई। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि शिकार टाइगर रिजर्व के संरक्षित कोर क्षेत्र में किया गया था, जहां वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान लागू हैं।

वन विभाग ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस अवैध शिकार में अन्य लोग भी शामिल थे या नहीं। अधिकारियों को आशंका है कि यह किसी संगठित शिकार गतिविधि का हिस्सा हो सकता है।

इस घटना को वन्यजीव संरक्षण के लिए गंभीर चुनौती माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीतल जैसे शाकाहारी वन्यजीव जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इनका संरक्षण जैव विविधता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

वन विभाग ने आरोपियों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। दोष सिद्ध होने पर आरोपियों को कड़ी सजा और आर्थिक दंड का सामना करना पड़ सकता है।

अधिकारियों ने स्थानीय लोगों से वन्यजीवों के संरक्षण में सहयोग करने तथा किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत वन विभाग को देने की अपील की है।


कृषि जैव विविधता संरक्षण को नई दिशा, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने विशेषज्ञ समिति का किया पुनर्गठन

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नई दिल्ली- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 13(1) के तहत कृषि जैव विविधता (Agrobiodiversity) पर विशेषज्ञ समिति का एक वर्ष के लिए पुनर्गठन किया है। इस समिति का उद्देश्य कृषि जैव विविधता के संरक्षण, सतत उपयोग तथा एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (ABS) से जुड़े मामलों में विशेषज्ञ मार्गदर्शन प्रदान करना है।

समिति के अध्यक्ष के रूप में पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. पी. एल. गौतम को नियुक्त किया गया है। डॉ. गौतम राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण और पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (PPVFRA) के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। हाल ही में उन्हें कृषि विज्ञान में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है। वहीं PPVFRA के वर्तमान अध्यक्ष समिति के सह-अध्यक्ष (Co-Chair) होंगे।

यह विशेषज्ञ समिति वर्ष 2005 से राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की एक महत्वपूर्ण सलाहकार संस्था रही है और समय-समय पर कृषि आनुवंशिक संसाधनों से जुड़े उभरते मुद्दों के समाधान के लिए इसका पुनर्गठन किया जाता रहा है।

समिति ने अब तक कृषि जैव विविधता से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर सुझाव दिए हैं। इनमें खाद्य एवं कृषि के लिए पौध आनुवंशिक संसाधनों पर अंतरराष्ट्रीय संधि (ITPGRFA), बीजों और पशु भ्रूणों के निर्यात से जुड़े लाभ-साझेदारी मुद्दे, पारंपरिक पौध प्रजनन गतिविधियां तथा जैविक संसाधनों से जुड़े अनुसंधान परियोजनाओं के लिए स्वीकृति प्रक्रियाएं शामिल हैं।

नई समिति में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), राष्ट्रीय पौध, पशु एवं मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन, नाल्सार विधि विश्वविद्यालय और अन्य प्रमुख अनुसंधान एवं शैक्षणिक संस्थानों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।

समिति कृषि क्षेत्र में जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा देने, टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने, देशी फसलों एवं पशुधन नस्लों के संरक्षण तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोगी अनुसंधान से जुड़े दिशा-निर्देशों की समीक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्य करेगी।

सरकार का मानना है कि यह कदम कृषि जैव विविधता के संरक्षण, आनुवंशिक संसाधनों एवं पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा तथा जलवायु-अनुकूल और टिकाऊ कृषि प्रणाली को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

इसके साथ ही समिति भारत के राष्ट्रीय जैव विविधता कार्ययोजना (NBSAP) लक्ष्यों तथा संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG-2: शून्य भूख, SDG-13: जलवायु कार्रवाई और SDG-15: भूमि पर जीवन) को प्राप्त करने में भी सहयोग करेगी।

मजुली द्वीप पर 4,000 वर्षों के जलवायु और वनस्पति इतिहास का खुलासा

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मजुली द्वीप पर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने लगभग 4,000 वर्षों के जलवायु, वनस्पति और बाढ़ संबंधी इतिहास का पुनर्निर्माण किया है। यह द्वीप विश्व का सबसे बड़ा आबाद नदी द्वीप है और कई जनजातियों तथा नव-वैष्णव संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है।



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अध्ययन की प्रमुख बातें

  • यह शोध Birbal Sahni Institute of Palaeosciences (BSIP) के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया।

  • वैज्ञानिकों ने मजुली के सकाली आर्द्रभूमि (Sakali Wetland) से 150 सेमी गहरे अवसाद (Sediment Core) एकत्र किए।

  • परागकण (Pollen) और अवसाद कणों (Grain-size) के विश्लेषण के माध्यम से द्वीप के पर्यावरणीय इतिहास का अध्ययन किया गया।

  • अध्ययन ने 4040 से 500 वर्ष पूर्व तक की जलवायु और वनस्पति में हुए परिवर्तनों का आकलन किया।

प्रमुख निष्कर्ष

1. प्रारंभिक गर्म और आर्द्र काल (4040–2260 वर्ष पूर्व)

  • घने जंगलों का विस्तार था।

  • क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा और अनुकूल जलवायु मौजूद थी।

  • 4.2 हजार वर्ष पूर्व के वैश्विक शुष्क जलवायु संकट के दौरान भी पारिस्थितिकी तंत्र अपेक्षाकृत स्थिर रहा।

2. मानसून और बाढ़ में उतार-चढ़ाव

  • समय के साथ मानसूनी गतिविधियों और बाढ़ के पैटर्न में बदलाव देखने को मिला।

  • 1100–500 वर्ष पूर्व का काल अपेक्षाकृत अधिक नम रहा, जो वैश्विक Medieval Climatic Anomaly से मेल खाता है।

3. पिछले 500 वर्षों में बदलाव

  • तापमान और वर्षा में कमी दर्ज की गई।

  • यह परिवर्तन वैश्विक Little Ice Age अवधि के अनुरूप पाया गया।

  • मानव गतिविधियों का प्रभाव बढ़ा और प्राकृतिक वनस्पति का विस्तार घटा।

नदी और बाढ़ संबंधी निष्कर्ष

  • अध्ययन में पाया गया कि ब्रह्मपुत्र नदी तथा उसकी सहायक नदियों की प्रवाह प्रक्रियाओं ने मजुली के भू-आकृतिक विकास को प्रभावित किया।

  • अवसाद विश्लेषण से पता चला कि समय के साथ नदी तंत्र अधिक अस्थिर और ऊर्जावान हुआ।

  • इससे बाढ़, कटाव और भूमि क्षरण की तीव्रता बढ़ी।

अध्ययन का महत्व

  • बाढ़ और नदी कटाव से प्रभावित समुदायों के लिए बेहतर अनुकूलन (Adaptation) रणनीतियाँ तैयार करने में सहायता।

  • आर्द्रभूमि संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और सतत भूमि उपयोग योजना के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

  • ब्रह्मपुत्र बेसिन में आपदा प्रबंधन और नदी प्रबंधन नीतियों को मजबूत बनाने में मदद करेगा।

शोध दल

इस अध्ययन का नेतृत्व आर्या पांडेय और डॉ. स्वाति त्रिपाठी ने किया। इसमें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय  सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों ने सहयोग किया।


बारनवापारा के देवपुर जंगल में दिखी दुर्लभ विशाल भारतीय गिलहरी,वन मंत्री केदार कश्यप ने दी बधाई

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जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों को मिली बड़ी सफलता

रायपुर- छत्तीसगढ़ के बारनवापारा क्षेत्र ने एक बार फिर अपनी समृद्ध जैव विविधता से प्रदेश का गौरव बढ़ाया है। बलौदाबाजार वनमंडल के अंतर्गत देवपुर जंगल में आयोजित देवपुर समर कैंप 2026 के दौरान दुर्लभ विशाल भारतीय गिलहरी (जायंट मालाबार स्क्विरल) दिखाई दी। इस दुर्लभ वन्यजीव के दिखने से वन विभाग, प्रकृति प्रेमियों और वैज्ञानिकों में उत्साह है।

वन मंत्री केदार कश्यप ने इस उपलब्धि पर वन विभाग की टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह छत्तीसगढ़ सरकार की वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन की योजनाओं का सकारात्मक परिणाम है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार जंगलों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए लगातार प्रभावी कदम उठा रही है, जिससे दुर्लभ प्रजातियों के लिए सुरक्षित आवास विकसित हो रहे हैं।

देवपुर समर कैंप में दिखी दुर्लभ प्रजाति

बलौदाबाजार वनमंडल द्वारा 16 मई से 22 मई 2026 तक देवपुर समर कैंप का आयोजन किया गया था। कैंप के पहले दिन 16 मई को आयोजित बर्डिंग ट्रेल के दौरान इस दुर्लभ गिलहरी को देखा गया। इसकी पहचान प्रकृति प्रेमी एवं साइबर रिस्क एक्सपर्ट हेमंत वर्मा ने की।

विशाल भारतीय गिलहरी की खासियत

विशाल भारतीय गिलहरी, जिसका वैज्ञानिक नाम रेटूफा इंडिका  (Ratufa indica) है, भारत की सबसे बड़ी वृक्षवासी गिलहरियों में से एक है। इसकी पूंछ सहित लंबाई लगभग तीन फीट तक होती है। इसके शरीर पर गहरे लाल, भूरे, काले और क्रीम रंगों का सुंदर मिश्रण होता है। यह अपना अधिकांश जीवन पेड़ों पर ही बिताती है और एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक लंबी छलांग लगाने में सक्षम होती है।

कानूनी संरक्षण प्राप्त दुर्लभ प्रजाति

यह प्रजाति वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची-2 के तहत संरक्षित है। इसका शिकार या व्यापार करना कानूनन अपराध है। स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत है। वनमंडलाधिकारी धम्मशील गणवीर ने कहा कि बारनवापारा अभ्यारण्य और आसपास का वन क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध है। देवपुर जंगल में इस दुर्लभ गिलहरी का दिखना इस बात का प्रमाण है कि यहां का वन पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ और सुरक्षित है।

बच्चों में बढ़ी प्रकृति संरक्षण की जागरूकता

वनमंडलाधिकारी धम्मशील गणवीर ने बताया कि देवपुर समर कैंप का आयोजन किया गया जिसमें शामिल बच्चों और युवाओं के लिए यह अनुभव बेहद खास रहा। वन विभाग का मानना है कि ऐसे दुर्लभ वन्यजीवों के दर्शन से नई पीढ़ी में प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ती है। यह आयोजन राज्य सरकार की पर्यावरण संरक्षण और जन-जागरूकता आधारित योजनाओं को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।


उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण की मिसाल, मानव-वन्यजीव संघर्ष में आई बड़ी कमी

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 उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता सामने आई है। यहां फायर वॉचर्स और वाटर वॉचर्स की प्रभावी तैनाती के चलते मानव और वन्यजीवों के बीच होने वाले संघर्ष में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।

वन विभाग द्वारा लागू की गई इस रणनीति के तहत जंगलों में निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया गया है, जिससे वन्यजीवों की गतिविधियों पर सतत नजर रखी जा रही है। साथ ही, जल स्रोतों के संरक्षण और प्रबंधन से जानवरों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित बनाया गया है, जिससे उनके आबादी क्षेत्रों में भटकने की घटनाएं कम हुई हैं।

इस पहल का सकारात्मक परिणाम यह रहा कि पिछले तीन वर्षों में इस क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया है। यह न केवल वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों के लिए भी राहत की बात है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल अन्य वन क्षेत्रों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है, जहां इस तरह के उपाय अपनाकर मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

छत्तीसगढ़ का बरनवापारा अभयारण्य बना विलुप्ति के कगार पर पहुंचे काले हिरणों के पुनर्जीवन का मजबूत उदाहरण

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स्थानीय विलुप्ति से लेकर लगभग 200 की संख्या तक पहुँचे काले हिरण : ‘मन की बात’ में मिली राष्ट्रीय पहचान

रायपुर- यह छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के आज के प्रसारण में छत्तीसगढ़ के काले हिरण के संरक्षण प्रयासों का उल्लेख करते हुए  सराहना की। इसने न केवल छत्तीसगढ़ की पहचान को सुदृढ़ किया है, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे लोगों का मनोबल भी बढ़ाया है। इस उल्लेख से राज्य की पर्यावरणीय पहल राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से सामने आई हैं और बारनवापारा अभयारण्य को नई पहचान मिली है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राजधानी रायपुर के भाटागांव स्थित विनायक सिटी में 'मन की बात' कार्यक्रम की 133वी कड़ी के श्रवण के बाद यह बात कही।

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में स्थित, लगभग 245 वर्ग किलोमीटर में फैला बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य आज वन्यजीव संरक्षण की एक महत्वपूर्ण सफलता के रूप में उभरा है।

एक समय ऐसा था जब यह अभयारण्य अपने प्रमुख वन्यजीव - काले हिरण - से लगभग खाली हो चुका था। लेकिन अब यही क्षेत्र करीब 200 काले हिरणों (ब्लैकबक) का सुरक्षित आवास बन गया है। यह उपलब्धि योजनाबद्ध प्रयास, वैज्ञानिक प्रबंधन और निरंतर निगरानी का परिणाम है।

बारनवापारा के खुले घास के मैदानों में काले हिरणों (Antilope cervicapra) की सक्रिय मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि लंबे समय बाद भी किसी प्रजाति को उसके प्राकृतिक परिवेश में पुनर्स्थापित किया जा सकता है। जो क्षेत्र कभी सूना हो गया था, वह अब पुनर्जीवन की एक सशक्त कहानी प्रस्तुत कर रहा है।

छत्तीसगढ़ में इस उपलब्धि तक पहुंचने की प्रक्रिया लंबी और चुनौतीपूर्ण रही है। 1970 के दशक के बाद अतिक्रमण और प्राकृतिक आवास के नुकसान के कारण काले हिरण इस क्षेत्र से लगभग समाप्त हो गए थे और करीब पांच दशकों तक यहां स्थानीय रूप से विलुप्त रहे।

अप्रैल 2018 में आयोजित राज्य वन्यजीव बोर्ड की नौवीं बैठक में पुनर्स्थापन योजना को स्वीकृति मिलने के बाद स्थिति में बदलाव आया। इसके बाद एक सुविचारित योजना के तहत काले हिरणों को फिर से बसाने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसी प्रयास के परिणामस्वरूप उनकी संख्या बढ़कर लगभग 200 तक पहुंची और इस सफलता को रविवार को प्रधानमंत्री श्री मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी उल्लेखित किया गया।

संरक्षण के शुरुआती चरण में कई चुनौतियां सामने आईं। वन अधिकारियों के अनुसार, निमोनिया के कारण लगभग आठ काले हिरणों की मृत्यु हुई, जिसके बाद प्रबंधन प्रणाली में सुधार किए गए। बाड़ों में मजबूत सतह के लिए रेत की परत बिछाई गई, जलभराव रोकने के लिए उचित निकासी व्यवस्था विकसित की गई, अपशिष्ट प्रबंधन को बेहतर बनाया गया और एक समर्पित पशु चिकित्सक की नियुक्ति की गई।

इन सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप काले हिरणों की आबादी पहले स्थिर हुई और फिर धीरे-धीरे बढ़ने लगी। बेहतर पोषण, नियमित निगरानी और अनुकूल वातावरण के कारण आज इनकी संख्या लगभग 200 तक पहुंच चुकी है। यह इस बात का संकेत है कि ये अपने नए परिवेश में सफलतापूर्वक अनुकूलित हो चुके हैं और भविष्य में इन्हें खुले जंगल में छोड़ने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण आधार तैयार करता है।

काले हिरण के बारे में:

काला हिरण (ब्लैकबक) भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला एक संकटग्रस्त मृग है। नर काले हिरण का रंग गहरा भूरा से काला होता है, उसके लंबे सर्पिलाकार सींग होते हैं और शरीर का निचला भाग सफेद होता है। मादा काले हिरण हल्के भूरे रंग की होती हैं और सामान्यतः उनके सींग नहीं होते। यह प्रजाति खुले घास के मैदानों में पाई जाती है और दिन के समय सक्रिय रहती है। इसका मुख्य आहार घास और छोटे पौधे होते हैं। इनकी ऊंचाई लगभग 74 से 84 सेंटीमीटर होती है। नर का वजन 20 से 57 किलोग्राम के बीच और मादाओं का 20 से 33 किलोग्राम तक होता है। नर काले हिरण की सर्पिलाकार सींगें, जो लगभग 75 सेंटीमीटर तक लंबी हो सकती हैं, इन्हें आसानी से पहचानने योग्य बनाती हैं।

नागोया प्रोटोकॉल के तहत IRCC जारी करने में भारत बना वैश्विक अग्रणी

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भारत ने नागोया प्रोटोकॉल (Access and Benefit-sharing - ABS) के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अनुपालन प्रमाणपत्र (IRCCs) जारी करने में वैश्विक स्तर पर प्रथम स्थान हासिल किया है। विश्वभर में जारी कुल 6,311 प्रमाणपत्रों में से भारत ने 3,561 IRCCs जारी किए हैं, जो कुल का 56 प्रतिशत से अधिक है।

ABS क्लियरिंग-हाउस के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 142 पंजीकृत देशों में से केवल 34 देशों ने अब तक IRCCs जारी किए हैं। इस सूची में भारत के बाद फ्रांस (964), स्पेन (320), अर्जेंटीना (257), पनामा (156) और केन्या (144) का स्थान है। यह उपलब्धि जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान के न्यायसंगत एवं पारदर्शी उपयोग के प्रति भारत की मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

नागोया प्रोटोकॉल के तहत, किसी देश द्वारा आनुवंशिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान तक पहुंच देने पर IRCC जारी करना आवश्यक होता है। ये प्रमाणपत्र इस बात का आधिकारिक प्रमाण होते हैं कि संसाधनों के उपयोग के लिए पूर्व सूचित सहमति (Prior Informed Consent) प्राप्त की गई है और उपयोगकर्ता एवं प्रदाता के बीच पारस्परिक रूप से सहमत शर्तें तय की गई हैं। इनकी जानकारी ABS क्लियरिंग-हाउस में दर्ज की जाती है।

IRCCs का उपयोग अनुसंधान, नवाचार और व्यावसायिक उपयोग तक जैविक संसाधनों के उपयोग की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि लाभों का उचित और न्यायपूर्ण वितरण किया जाए।

भारत की यह उपलब्धि जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत प्रभावी ABS ढांचे के कार्यान्वयन का परिणाम है, जिसे राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड/केंद्र शासित प्रदेश परिषदों और स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों के माध्यम से लागू किया जा रहा है। सुव्यवस्थित प्रक्रियाओं और मजबूत संस्थागत तंत्र ने आवेदन प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाया है।

यह उपलब्धि वैश्विक जैव विविधता शासन में भारत की सक्रिय भूमिका को दर्शाती है और जैविक संसाधनों के न्यायसंगत एवं समान लाभ-साझाकरण को बढ़ावा देने के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को मजबूत करती है।

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