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खेत बना आय का केंद्र, नवाचार ने बदली खेती की तस्वीर

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युवा किसान अंकित लकड़ा ने मछली पालन, मुर्गी पालन और बागवानी को जोड़कर तैयार किया एकीकृत कृषि मॉडल

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मिली 8 लाख रुपये की अनुदान सहायता, दो तालाबों में मछली पालन के साथ 1,000 से 1,200 मुर्गियों का कर रहे पालन

रायपुर- खेती में बदलाव केवल नई तकनीक से नहीं, बल्कि नई सोच से भी आता है। जशपुर जिले के ग्राम रतबा के युवा किसान अंकित लकड़ा ने इस बात को अपनी मेहनत और नवाचार से साबित किया है। कभी केवल बारिश के भरोसे धान की खेती करने वाले अंकित ने आज अपने खेत को मछली पालन, मुर्गी पालन, बागवानी और बहुफसली खेती से जोड़कर आय के कई स्रोत तैयार कर लिए हैं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में किसानों को कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों से जोड़कर उनकी आय के अवसर बढ़ाने के लिए संचालित योजनाओं का लाभ अंकित को भी मिला है। योजनाओं से मिली सहायता और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने पारंपरिक खेती को आधुनिक और बहुआयामी कृषि मॉडल में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

धान की खेती से शुरू हुआ सफर, अब खेत में कई गतिविधियां

अंकित लकड़ा बताते हैं कि पहले वे मुख्य रूप से बरसात के मौसम में धान की खेती करते थे। खेती से होने वाली आय को बढ़ाने के लिए उन्होंने कृषि और मत्स्य विभाग से जानकारी ली। इसके बाद उन्होंने अपने खेत में दो तालाब तैयार कराए और मछली पालन शुरू किया।

तालाब बनने के बाद उनके खेत की तस्वीर ही बदल गई। तालाब के पानी का उपयोग गर्मी के मौसम में सिंचाई के लिए होने लगा। इससे वे अब वर्षा ऋतु के अलावा गर्मी में भी खेती कर पा रहे हैं। साथ ही खेत में आम और लीची सहित विभिन्न फलदार पौधे लगाए गए हैं, जिससे आने वाले समय में बागवानी भी उनकी अतिरिक्त आय का माध्यम बनेगी।

एक ही संसाधन से मछली और मुर्गी पालन का नवाचार

अंकित ने अपने दोनों तालाबों के ऊपर मुर्गी पालन के लिए शेड तैयार किया है। शेड की क्षमता करीब 1,000 से 1,200 मुर्गियों की है। उन्होंने मुर्गी पालन और मछली पालन को आपस में जोड़कर संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का तरीका अपनाया है।

मुर्गियों से निकलने वाला अपशिष्ट तालाब में पहुंचकर मछलियों के लिए प्राकृतिक आहार के रूप में उपयोगी होता है। इससे मछली पालन में बाहरी आहार पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिलती है। इस तरह एक ही स्थान पर संचालित दो गतिविधियां एक-दूसरे को सहारा देती हैं और किसान को अतिरिक्त आय के अवसर उपलब्ध कराती हैं।

तालाब की मेड़ पर फलदार पौधे, दोहरा लाभ

अंकित ने तालाब की मेड़ों पर आम सहित अन्य फलदार पौधे भी लगाए हैं। तालाब के पानी से इन पौधों की सिंचाई की जाती है। उनका कहना है कि मेड़ पर पेड़ लगाने से मिट्टी को मजबूती मिलती है और मेड़ के कटाव को रोकने में भी मदद मिलती है। वहीं आम और लीची जैसे फलदार पौधे भविष्य में अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनेंगे।

इस प्रकार अंकित ने खेत के प्रत्येक हिस्से का उपयोग उत्पादन और आय बढ़ाने के लिए किया है। तालाब उनके लिए केवल मछली पालन का साधन नहीं, बल्कि सिंचाई, बागवानी और मुर्गी पालन से जुड़ी गतिविधियों का आधार बन गया है।

8 लाख रुपये की अनुदान सहायता से मिला नवाचार को विस्तार

अंकित को प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मत्स्य पालन के लिए शासकीय सहायता मिली। मत्स्य विभाग से उन्हें करीब 8 लाख रुपये की अनुदान राशि प्राप्त हुई। इसके साथ पॉन्ड लाइनर, पॉलीथिन, बोर, मोटर और मछली आहार जैसी आवश्यक सामग्री की सुविधा भी मिली।

शासकीय योजना से मिली सहायता ने उनके लिए मछली पालन को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने का रास्ता आसान किया। अंकित बताते हैं कि विभागीय अधिकारियों से मिली जानकारी और मार्गदर्शन से उन्हें आधुनिक तरीके से मत्स्य पालन करने में काफी मदद मिली।

बहुफसली खेती से बढ़े आमदनी के अवसर

अंकित अब अपने खेत को केवल एक फसल तक सीमित नहीं रखते। मछली पालन और मुर्गी पालन के साथ वे अलग-अलग मौसम में विभिन्न फसलों की खेती और बागवानी कर रहे हैं। तालाब के पानी की उपलब्धता ने उन्हें गर्मी में भी खेती करने का अवसर दिया है।

इस बहुआयामी मॉडल से उन्हें सालभर अपने खेत से उत्पादन प्राप्त करने और आय के अलग-अलग स्रोत विकसित करने का अवसर मिल रहा है। उनके खेत में कृषि के साथ पशु एवं मत्स्य आधारित गतिविधियों का समन्वय ग्रामीण क्षेत्रों में एकीकृत कृषि प्रणाली की उपयोगिता को भी दर्शाता है।

युवाओं के लिए खेती बना रहे हैं आकर्षक विकल्प

अंकित लकड़ा की कहानी उन ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो खेती को केवल पारंपरिक तरीके से करने के बजाय इसे आधुनिक व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहते हैं। उनका अनुभव बताता है कि उपलब्ध भूमि और पानी जैसे संसाधनों का बेहतर नियोजन, शासकीय योजनाओं की जानकारी और मेहनत के साथ खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।

अंकित की पहल यह संदेश देती है कि खेती में नवाचार, योजनाओं का सही उपयोग और विभिन्न कृषि गतिविधियों का समन्वय किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में प्रभावी कदम साबित हो सकता है। उनका खेत अब सिर्फ फसल उत्पादन की जगह नहीं, बल्कि ग्रामीण उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक मिसाल बन गया है।

वैज्ञानिकों ने अंगूर में बीजरहितता के आनुवंशिक रहस्यों का किया खुलासा

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वैज्ञानिकों ने अंगूर में बीजरहित (Seedless) होने के पीछे छिपे महत्वपूर्ण आनुवंशिक और विकासात्मक तंत्रों का खुलासा किया है। बीजरहित अंगूर, अपने पतले छिलके, मीठे स्वाद और बेहतर बनावट के कारण उपभोक्ताओं और अंगूर उद्योग में अत्यधिक पसंद किए जाते हैं, जिससे यह गुण प्रजनन कार्यक्रमों में अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है।

अंगूर विश्व की प्रमुख बागवानी फसलों में से एक है, जिसका बड़ा हिस्सा ताजे फल या किशमिश जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों के रूप में उपयोग होता है। हालांकि बीजरहित अंगूर की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके पीछे के जैविक तंत्र अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे।

यह शोध पुणे स्थित आघारकर अनुसंधान संस्थान (ARI), जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है, तथा सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के सहयोग से किया गया। इस अध्ययन में पराग (पोलन) की निष्क्रियता से बीजरहित अंगूर बनने की आणविक और जीनोमिक प्रक्रियाओं पर नई जानकारी प्राप्त हुई है, जिससे बेहतर गुणवत्ता और अधिक उत्पादन वाली नई किस्में विकसित करने में मदद मिलेगी।

यह अध्ययन हाल ही में ‘BMC Plant Biology’ में प्रकाशित हुआ है, जिसमें संस्थान द्वारा विकसित उच्च उत्पादक अंगूर किस्म ARI-516 से प्राप्त एक बीजरहित म्यूटेंट का विश्लेषण किया गया।

डॉ. रवींद्र पाटिल के नेतृत्व में शोध टीम ने बीज वाले अंगूर (ARI-516) और उसके बीजरहित म्यूटेंट के बीच तुलनात्मक अध्ययन किया। सूक्ष्म परीक्षण में पाया गया कि बीजरहित म्यूटेंट में पराग कणों का आकार असामान्य था, उनकी जीवित रहने की क्षमता बहुत कम थी और वे अंकुरित नहीं हो पाते थे, जिससे पराग की निष्क्रियता बीजरहितता का मुख्य कारण सामने आई।

इसके अलावा, मादा प्रजनन संरचनाएं (मैक्रोगैमेटोफाइट्स) भी सामान्य किस्म की तुलना में छोटी पाई गईं, जिससे निषेचन प्रक्रिया बाधित होती है और अंततः बीजरहित फल बनते हैं।

आणविक स्तर पर, वैज्ञानिकों ने ट्रांसक्रिप्टोमिक विश्लेषण (RNA सीक्वेंसिंग) किया, जिससे पता चला कि पराग विकास, कोशिका विभाजन और हार्मोन सिग्नलिंग से जुड़े कई जीन बीजरहित म्यूटेंट में कम सक्रिय थे। साथ ही, जीनोम सीक्वेंसिंग में कई ‘इन्सर्शन-डिलीशन’ (InDel) म्यूटेशन पाए गए, जो पराग निर्माण और उसके कार्य को प्रभावित करते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बीजरहितता ‘पार्थेनोकार्पी’ नामक प्रक्रिया के कारण होती है, जिसमें निषेचन के बिना ही फल का विकास होता है। यह प्रक्रिया पराग निर्माण और प्रजनन में दोष के कारण उत्पन्न होती है।

यह अध्ययन आधुनिक जीनोमिक तकनीकों का उपयोग करते हुए अंगूर में पार्थेनोकार्पिक बीजरहितता को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इससे जुड़े जीनों की पहचान भविष्य में अंगूर की उन्नत बीजरहित किस्मों के विकास में सहायक होगी, जिससे उत्पादन, गुणवत्ता और अनुकूलन क्षमता में सुधार होगा और बागवानी क्षेत्र को लाभ मिलेगा।

Kisaan School : देश के पहले किसान स्कूल बहेराडीह में गणतंत्र दिवस 26 जनवरी के अवसर पर ध्वजारोहण करेंगे सीताराम वैष्णव

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जांजगीर-चाम्पा- बहेराडीह में स्थित वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल में 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर सीताराम वैष्णव के द्वारा ध्वजारोहण किया जाएगा. वे कोटमीसोनार गांव में स्थित छग के एकमात्र क्रोकोडायल पार्क के केयरटेकर हैं. 

देश के पहले किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव ने बताया कि गणतंत्र दिवस 26 जनवरी के अवसर पर हर साल की तरह ध्वज वंदन किया जाएगा. इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सीताराम वैष्णव होंगे, जो कोटमीसोनार क्रोकोडायल पार्क के केयरटेकर हैं और मगरमच्छों से अपने याराना को लेकर वे छग ही नहीं, देश-दुनिया में प्रसिद्ध हैं और उनकी एक आवाज पर क्रोकोडायल पार्क में मगरमच्छ दौड़े चले आते हैं.

धान से हटकर समृद्धि की राह: जेवरा के किसान दिलीप सिन्हा ने दलहन-तिलहन से कमाए 25 लाख रुपये

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फसल विविधीकरण की प्रेरक कहानी — कम पानी, कम लागत और अधिक लाभ का सफल मॉडल

रायपुर- जिला बेमेतरा के ग्राम जेवरा के प्रगतिशील कृषक दिलीप सिन्हा ने ग्रीष्मकालीन धान की परंपरागत खेती को छोड़कर दलहन-तिलहन फसलों को अपनाकर कृषि क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम की है। वैज्ञानिक खेती, सही फसल चयन और बाजार की समझ के बल पर उन्होंने लगभग 25 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया है।

क्षेत्र में वर्षों से ग्रीष्मकालीन धान की खेती प्रचलित रही है, जिसमें अधिक पानी, बिजली, उर्वरक और श्रम की आवश्यकता होती है। बढ़ती लागत और घटते मुनाफे को देखते हुए सिन्हा ने खेती के स्वरूप में बदलाव का साहसिक निर्णय लिया।

दलहन-तिलहन की ओर कदम

कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में उन्होंने ग्रीष्म ऋतु में धान के स्थान पर मूंग और उड़द (दलहन) तथा सरसों और तिल (तिलहन) की खेती शुरू की। इन फसलों की विशेषता रही — कम पानी में अच्छी पैदावार, कम लागत, रोग-कीट प्रकोप कम और बाजार में बेहतर मूल्य। साथ ही दलहनी फसलों से मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार हुआ।

वैज्ञानिक तकनीकों का प्रभाव

उन्नत किस्मों का चयन, बीज उपचार, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, ड्रिप व स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीक, समय पर निराई-गुड़ाई, फसल सुरक्षा तथा उत्पादन के बाद उचित भंडारण और विपणन ने उनकी सफलता को और मजबूत किया। इन उपायों से जहां लागत में उल्लेखनीय कमी आई, वहीं उत्पादन और आय में भी बड़ा इजाफा हुआ। दिलीप सिन्हा की यह सफलता कहानी दर्शाती है कि फसल विविधीकरण और वैज्ञानिक खेती अपनाकर किसान कम संसाधनों में भी अधिक लाभ कमा सकते हैं। धान के विकल्प के रूप में दलहन-तिलहन की खेती न केवल आर्थिक रूप से फायदेमंद है, बल्कि जल संरक्षण, मिट्टी सुधार और टिकाऊ कृषि की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

किसान स्कूल बहेराडीह में 10 दिसंबर को राज्य स्तरीय भाजी महोत्सव

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जांजगीर-चाम्पा- कृषि विज्ञान केंद्र भारत सरकार के प्राकृतिक क़ृषि गोद ग्राम बहेराडीह में स्थित देश के पहले किसान स्कूल में द्वितीय वर्ष 10 दिसंबर बुधवार को दोपहर 2 बजे राज्य स्तरीय भाजी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. इस आयोजन को लेकर प्रदेश की महिलाओं में जबरदस्त उत्साह का माहौल है. महोत्सव में जिले के कलेक्टर जन्मेजय महोबे समेत पुलिस अधीक्षक विजय कुमार पाण्डेय, जिला पंचायत की अध्यक्ष इंजी. सत्यलता मिरी, सक्ती जिला पंचायत की अध्यक्ष द्रौपदी चंद्रा, छत्तीसगढ़ राज्य खाद्य आयोग की सदस्य ज्योति कश्यप, पामगढ की पूर्व विधायक इंदु बंजारे, जिला पंचायत के सीईओ गोकुल रावटे शामिल होंगे.

वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल बहेराडीह के संचालक दीनदयाल यादव ने बताया कि किसान स्कूल में द्वितीय वर्ष बुधवार 10 दिसंबर को दोपहर 2 बजे राज्य स्तरीय भाजी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव के दौरान विविध प्रकार की भाजियों की जीवंत प्रदर्शनी लगाई जाएगी. महोत्सव को लेकर प्रदेश की महिलाओं और बिहान की दीदियों में जबरदस्त उत्साह का माहौल है.

भाजी दीदियों की होगा सम्मान

किसान स्कूल के संचालक ने बताया कि राज्य स्तरीय भाजी महोत्सव में विविध प्रकार की भाजियों की जीवंत प्रदर्शन करने वाली अर्थात भाजी प्रतियोगिता में भाग लेने वाली महिलाओं, युवतियों को 'भाजी दीदी' के रूप में सम्मानित किया जाएगा, वहीं प्रतियोगिता में पहला, दूसरा, तीसरा स्थान प्राप्त करने वाली महिलाओं को पुरस्कार प्रदान किया जाएगा. साथ ही, 7 महिलाओं को सांत्वना पुरस्कार दिया जाएगा. महोत्सव में शामिल होने वाली प्रदेश की महिलाओं ने विविध प्रकार भाजियों के साथ शामिल होने की तैयारी में हैं. पिछले साल भाजी महोत्सव में जिले के अलावा छः जिले की महिलाएं शामिल हुई थीं.

भाजियों की माला और गुलदस्ता से होगा अतिथियों का स्वागत

किसान स्कूल के सदस्यों ने बताया कि इस बार की भाजी महोत्सव में शामिल होने वाले अतिथियों का स्वागत फूल माला या फूल से बने गुलदस्ता ने नहीं, बल्कि विविध प्रकार की भाजियों के बीजों, पत्तियों तथा तने से निर्मित माला और गुलदस्ता से स्वागत किया जाएगा, वहीं भाजियों से बनाए गए अनेक प्रकार की व्यंजन के स्वाद का आनंद भी महोत्सव में शामिल होने वाले अतिथि लेंगे. इसके साथ ही चेच भाजी और अमारी भाजी के रेशे से तैयार रंग बिरंगी राखियां और कपड़ा मुख्य आकर्षण का केंद्र होगा. महोत्सव में स्कूली छात्र-छात्राएं भी शामिल होंगे.

छत्तीसगढ़ की 36 प्रमुख भाजियों की दिखेगी झलक

1, मेथी भाजी,

2, गोंदली भाजी,

3, मुराई भाजी,

4, चरौटा भाजी,

5, मुढ़ी भाजी,

6, अमारी भाजी,

7, नोनिया भाजी,

8, पीपर भाजी,

9, पोई भाजी,

10, कांदा भाजी,

11, गोभी भाजी,

12, पालक भाजी,

13, रोपा भाजी,

14, चना भाजी,

15, गाँव भाजी,

16, करेला भाजी,

17,करमता भाजी,

18, लाल भाजी,

19, कोइलार भाजी,

20, केना भाजी,

21, अकरी भाजी,

22, सुनसुनिया भाजी,

23, मखना भाजी,

24, भथुआ भाजी,

25, मुस्केनी भाजी,

26, बोहार भाजी,

27, चौलाई भाजी,

28, खेढ़ा भाजी,

29, कुरमा भाजी,

30, कोचाई भाजी,

31, गुर्रु भाजी,

32, सरसों भाजी,

33, तिवरा भाजी,

34, बर्रे भाजी,

35, चेच भाजी,

36, मुनगा भाजी

भाजियों के पेटेंट के लिए प्रयासरत हैं संचालक दीनदयाल यादव

पिछले दिसम्बर 2016 से किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव ने छत्तीसगढ़ की 36 भाजियों के साथ ही अन्य फल, फूल पौधों की पेटेंट कराने के लिए स्थानीय प्रशासन व राज्य सरकार के सहयोग से भारत सरकार के केंद्रीय क़ृषि कल्याण मंत्रालय दिल्ली को प्रस्तुत किया है, जिसमें जंगली पीला गेंदा समेत बेल और जामुन का वर्ष 2047 तक पेंटेंट मिल चुका है. शेष अन्य फल, फूल और पौधों के पेंटेंट प्रदान की प्रक्रिया निरंतर देश के अलग-अलग राज्यों के वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही है.

छग ही नहीं, देश भर में किसान स्कूल ने बनाई बड़ी पहचान 

वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल बहेराडीह के नवाचार को सराहना मिल रही है. छग के अलावा देश के अलग-अलग राज्यों से भ्रमण के लिए यहां पहुंच चुके हैं, वहीं 6 देशों से किसान यहां के नवाचार को देख चुके हैं. देश के पहले किसान स्कूल को अनोखे तरीके से किसानों द्वारा संचालित किया जा रहा है, जहां 18 विषयों में किसानों को निःशुल्क जानकारी व ट्रेनिंग दी जाती है. किसान स्कूल में 'धरोहर' बनाया गया है, जो आकर्षण का केंद्र है, जहां पुरानी चीजों को संग्रहित कर संग्रहालय का रूप दिया जा रहा है. किसान स्कूल के इस अनोखे प्रयास को देखकर अब तक सभी लोगों ने तारीफ की है और स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं के शैक्षणिक भ्रमण के लिए किसान स्कूल ने बड़ी पहचान बना ली है.

EIMA Agrimach India 2025 संपन्न: ग्रीन फ्यूल आधारित कृषि मशीनरी पर मिला वैश्विक जोर

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नई दिल्ली— FICCI और इटली की कृषि उद्योग संस्था FederUnacoma द्वारा, भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सहयोग से आयोजित ‘EIMA Agrimach India 2025’ का तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और प्रदर्शनी आज सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। समापन समारोह में भविष्य की कृषि मशीनरी को ग्रीन फ्यूल आधारित तकनीकों की ओर मोड़ने का आह्वान किया गया।

भव्य आयोजन में किसानों और उद्योग जगत की बड़ी भागीदारी

दिल्ली के पूसा (IARI ग्राउंड) में 27–29 नवंबर तक आयोजित इस कार्यक्रम में—

  • 20,000 से अधिक किसान — मुख्य रूप से यूपी, पंजाब, हरियाणा और ओडिशा से

  • 4,000+ डीलर और डिस्ट्रीब्यूटर्स

  • 180+ देशी-विदेशी कंपनियां

  • 100+ विदेशी खरीदार (अल्जीरिया, नेपाल, श्रीलंका, केन्या, ओमान, मलेशिया, मोरक्को, नाइजीरिया, वियतनाम, जापान आदि देशों से)
    ने भाग लिया।

इटली इस आयोजन का पार्टनर देश रहा, जबकि नीदरलैंड, जापान, अमेरिका और पोलैंड ने भी अपनी प्रमुख उपस्थिति दर्ज कराई।

ग्रीन फ्यूल आधारित मशीनरी पर जोर

उद्घाटन सत्र में डॉ. देवेश चतुर्वेदी, सचिव, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने कहा कि भारतीय कृषि के विजन 2047 को पूरा करने के लिए उद्योग को ग्रीन फ्यूल—इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर और CBG आधारित मशीनों पर काम तेज करना होगा।

उन्होंने कहा:

“मशीनें इलेक्ट्रिक या ग्रामीण CBG प्लांट से प्राप्त बायोगैस पर चल सकें—यह दिशा आने वाले 5–10 वर्षों में आवश्यक है। इससे किसानों की रखरखाव व संचालन लागत भी घटेगी।”

महिला किसानों के लिए जेंडर-फ्रेंडली उपकरणों की मांग

2026 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष’ घोषित किए जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि—

  • जेंडर बजटिंग का अर्थ केवल मशीनरी का मालिकाना हक देना नहीं है

  • बल्कि ऐसी मशीनें विकसित करना आवश्यक है जो महिला किसानों की मेहनत व शारीरिक बोझ को वास्तविक रूप से कम करें

भारत–इटली कृषि सहयोग को मिलेगा बढ़ावा

इटली के भारत में राजदूत एंटोनियो बार्तोली ने जल्द ही दूतावास में कृषि अटैची नियुक्त किए जाने की संभावना जताई, जिससे दोनों देशों के कृषि सहयोग को गति मिलेगी।

"कृषि को सेवा के रूप में विकसित करने की जरूरत"

EIMA Agrimach India के आयोजन समिति अध्यक्ष टी. आर. केसवन ने कहा कि कई महंगे उपकरण, जैसे सीडर, किसानों के लिए खरीदना मुश्किल है, इसलिए—

“कृषि मशीनरी को सेवा (Agriculture as a Service) के रूप में उपलब्ध कराना भविष्य का मॉडल बन सकता है।”

भारत–इटली कृषि बाजार का उज्ज्वल भविष्य

FederUnacoma की DG सिमोना रापास्टेला ने बताया कि—

  • 2023 में भारत का कृषि मशीनरी बाजार 13.7 बिलियन USD का था

  • 2033 तक इसके 31.6 बिलियन USD तक बढ़ने का अनुमान है

  • वार्षिक वृद्धि दर लगभग 9%

कृषि उत्पादकता बढ़ाने पर जोर

FICCI कृषि समिति के सह-अध्यक्ष सुबरतो गीड ने कहा—

“भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए उत्पादकता बढ़ाना अनिवार्य है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण बीज, आधुनिक तकनीक और मशीनीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।”

 FICCI–PwC रिपोर्ट हुई जारी

कार्यक्रम में ‘Farm Mechanisation: The Path Towards a Future-Ready India’ रिपोर्ट भी जारी की गई।

अगला आयोजन इटली में

कार्यक्रम के 10वें संस्करण का आयोजन अगले वर्ष इटली में किया जाएगा।

यदि आप चाहें, तो मैं इसका संक्षिप्त संस्करण, सोशल मीडिया पोस्ट, या हैशटैग सेट भी तैयार कर देता हूँ।

खेती से कमाई, अब आधुनिकता की ओर बढ़ते कदम

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मेहनत से मिली नई उड़ान: किसान प्रदीप पटेल अब खरीदेंगे अपना ट्रैक्टर

रायपुर-सारंगढ़–बिलाईगढ़ जिले के ग्राम गंधराचुवा के युवा एवं मेहनतकश किसान प्रदीप पटेल ने इस खरीफ सीजन में अपनी उपज बेचकर अपने एक बड़े सपने को सच करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

धान खरीदी केन्द्र कनकबीरा में प्रदीप ने करीब 2 एकड़ भूमि से प्राप्त 51.60 क्विंटल धान राज्य सरकार को बेचा है। प्रति क्विंटल 3100 रुपये के समर्थन मूल्य से वे बेहद खुश हैं। उन्होंने बताया कि धान बिक्री से प्राप्त राशि में अपनी जमा पूंजी जोड़कर वे ट्रैक्टर खरीदने का सपना पूरा करेंगे—जो उनके कृषि कार्यों को और भी सरल, तेज़ और आधुनिक बनाएगा।

प्रदीप पटेल ने कहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदी का निर्णय किसानों के लिए बड़ी राहत है। साथ ही उन्होंने टोकन सिस्टम की भी प्रशंसा की। पहले जहाँ टोकन लेने के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ती थी, वहीं अब ऑनलाइन ‘तुंहर टोकन’ सुविधा से किसान अपने मोबाइल में ही टोकन काट पा रहे हैं।

धान खरीदी केन्द्र में पेयजल, गुणवत्तापूर्ण बारदाना और समय पर व्यवस्था मिलने से किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हो रही है—यह बात भी प्रदीप ने खुशी जताते हुए कही।

प्रदीप पटेल की यह सफलता कहानी बताती है कि सरकारी योजनाएँ, तकनीकी सुविधाएँ और किसान की मेहनत मिलकर कैसे जीवन में प्रगति की नई राहें खोलती हैं।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का पंजाब दौरा: पराली प्रबंधन के रंसीह कलां मॉडल की सराहना

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री, शिवराज सिंह चौहान, आज एक दिवसीय पंजाब दौरे पर हैं। इस दौरान केंद्रीय मंत्री ने मोगा के रंसीह कलां गांव में किसानों, ग्रामीणों और अन्य हितधारकों से मुलाकात की और पिछले छह वर्षों से पराली न जलाने तथा उत्कृष्ट पराली प्रबंधन के लिए उनकी सराहना की। इस उपलब्धि पर उन्होंने सभी को बधाई भी दी।

मुख्य कार्यक्रम से पहले मीडिया से बातचीत करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पराली जलाने की घटनाओं ने पूरे देश को चिंतित किया हुआ था। उन्होंने कहा कि भले ही पराली जलाने से खेत साफ हो जाते हैं, लेकिन इससे लाभदायक कीट नष्ट हो जाते हैं और गंभीर प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है।

उन्होंने कहा, “मैं आज पंजाब को बधाई देने और यहां के पराली प्रबंधन के मॉडल को पूरे देश तक ले जाने आया हूं। पंजाब में इस वर्ष पराली जलाने की घटनाओं में 83 प्रतिशत की कमी आई है। पहले लगभग 83,000 घटनाएँ होती थीं जो अब घटकर करीब 5,000 रह गई हैं।”

केंद्रीय कृषि मंत्री ने आगे कहा, “किसान भाई-बहन पूछते हैं कि अगर पराली न जलाएं तो विकल्प क्या है? गेहूं और अन्य फसलों की बुवाई के लिए खेत कैसे तैयार हों? रंसीह कलां ने इसका जवाब प्रस्तुत किया है। पिछले छह वर्षों से यहां पराली नहीं जलाई गई। किसान पराली को सीधे खेत में मिलाते हैं और डाइरेक्ट सीडिंग करते हैं।”

मुख्य कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मंत्री चौहान ने कहा कि कुछ दिन पहले उन्होंने रंसीह कलां गांव के बारे में पढ़ा था। यहां पराली को बोझ नहीं, बल्कि वरदान बनाया गया है। यह गांव लेने के बजाय देने में विश्वास रखने वाला आदर्श गांव है। उन्होंने कहा कि कृषि मंत्री होने के नाते किसान और खेतों में जाकर सीधे संवाद करना आवश्यक है, तभी किसान हित में सही कार्य किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि पराली जलाने के बाद खेतों में पानी लगाना पड़ता है और फिर बुवाई के लिए भूमि तैयार करनी पड़ती है। लेकिन रंसीह कलां की पद्धति के अनुसार, हैप्पी सीडर से कटाई कर पराली को मिट्टी में मिलाकर बिना पानी लगाए ही डाइरेक्ट सीडिंग की जा सकती है। इससे पानी और डीज़ल दोनों की बचत होती है। पराली में मौजूद पोटाश मिट्टी को पोषक बनाता है, नमी बची रहती है और खरपतवार भी कम होते हैं। इससे मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ता है और खाद की आवश्यकता भी कम होती है। सरपंच ने उन्हें बताया कि पहले डेढ़ बोरी डीएपी लगती थी, अब एक बोरी से काम चल जाता है। इसी तरह तीन बोरी यूरिया की जगह दो बोरी पर्याप्त है — यह लागत बचत का स्पष्ट प्रमाण है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उन्होंने खेतों का निरीक्षण भी किया और पाया कि पराली को मिट्टी में मिलाने से फसल की गुणवत्ता या उपज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उपज लगभग 20–22 क्विंटल प्रति एकड़ रहती है।

उन्होंने बताया कि यह पद्धति सिर्फ गेहूं ही नहीं, बल्कि आलू की खेती में भी लाभकारी है। किसानों ने बताया कि पहले आलू के खेतों में पोटाश डालना पड़ता था, परंतु अब पराली में मौजूद जिंक और पोटाश से ही जरूरत पूरी हो जाती है। इससे आलू आकार में बड़े, बेहतर गुणवत्ता वाले और कम लागत में तैयार हो रहे हैं।

उन्होंने सरसों के खेत का भी निरीक्षण किया और वहां भी लाभ देखे। कम खाद और कम पानी में अधिक उत्पादन की संभावना है।

रंसीह कलां को उन्होंने एक ‘स्कूल’ बताया जहाँ से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। सरपंच के नेतृत्व में पराली प्रबंधन के अलावा पानी की बचत, वर्षा जल संचयन, प्लास्टिक प्रबंधन, झील, पार्क और पुस्तकालय जैसे कई कार्य उत्कृष्ट रूप से किए गए हैं। नशा विरोधी अभियान भी प्रशंसनीय है। भूमिगत नालियों के कारण डेंगू और मलेरिया की समस्या नहीं है। केंद्रीय मंत्री ने सरपंच प्रीत इंदरपाल सिंह मिंटू की सराहना करते हुए कहा कि उनका कार्य गर्व करने योग्य है।

उन्होंने कहा कि वे रंसीह कलां की धरती से देश के किसानों को संदेश देना चाहते हैं कि इस मॉडल को अपनाकर पराली प्रबंधन किया जाए। इससे प्रदूषण कम होगा और भूमि अधिक उपजाऊ बनेगी।

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि वे चुनिंदा किसानों से मिलकर सुझाव लेंगे और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कृषि परिवर्तन के लिए पाँच वर्षीय योजनाएँ तैयार करेंगे। इसके लिए 22–23 दिसंबर को एक विचार-विमर्श बैठक प्रस्तावित है। ग्रामीण विकास पर भी ऐसे प्रयास होंगे।

उन्होंने छोटे किसानों के लिए मशीनरी उपलब्ध कराने के प्रस्तावों पर भी चर्चा की और आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट को निर्देश दिया कि कस्टम हायरिंग सेंटर को आधुनिक मशीनीकरण केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। हर किसान मशीन खरीद नहीं सकता, इसलिए समूह आधारित किराये पर मशीन उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनाई जाएगी।

चौहान ने ‘दालों में आत्मनिर्भरता मिशन’ पर भी चर्चा की और कहा कि जहां दालें उगाई जाएँगी वहां दाल मिलों के लिए सब्सिडी दी जाएगी। सरकार गेहूं और धान की तरह मसूर, अरहर, उड़द और चना भी एमएसपी पर खरीदेगी और किसानों को उनके परिश्रम का हर पैसा मिलेगा।

अंत में उन्होंने कहा कि पंजाब ज्ञान की धरती है। यहाँ आकर सीखने का मन करता है। पंजाब ने देश को कृषि में बहुत कुछ सिखाया है। वे यहाँ आकर प्रसन्न हैं और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में पंजाब के विकास के लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे।

खाद्य खुराक 2025, गांधीनगर में जी20 सफलताओं का प्रदर्शन कर रहा है एपीडा

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भारत की लॉजिस्टिक्स लागत GDP के 7.97% तक घटी

IPRS 3.0, जिसे एशियाई विकास बैंक के साथ विकसित किया गया है, औद्योगिक पार्कों को स्थिरता, हरित बुनियादी ढाँचा, कनेक्टिविटी, डिजिटल तत्परता और कौशल विकास के आधार पर रेटिंग देता है।
SMILE कार्यक्रम के तहत 8 राज्यों के 8 पायलट शहरों में लॉजिस्टिक्स योजनाएँ शुरू की गई हैं, ताकि मौजूदा लॉजिस्टिक्स अवसंरचना का आकलन किया जा सके और दक्षता बढ़ाते हुए लागत कम की जा सके।

भारत की लॉजिस्टिक्स कहानी का नया अध्याय

भारत का लॉजिस्टिक्स क्षेत्र एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है और खुद को तेज, स्मार्ट और वैश्विक प्रतिस्पर्धी प्रणाली में बदल रहा है। एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म जो माल ढुलाई को सरल बनाते हैं, आधुनिक अवसंरचना जो देश के हर हिस्से को जोड़ती है — इन सबके माध्यम से अगली पीढ़ी का लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम तेजी से आकार ले रहा है। लक्षित नीति सुधारों, संस्थागत पुनर्गठन और तकनीक-आधारित समाधानों के साथ सरकार लॉजिस्टिक्स को भारत की आर्थिक वृद्धि और वैश्विक व्यापार स्थिति का प्रमुख इंजन बना रही है।

संरचनात्मक बदलावों की श्रृंखला इस बात को बदल रही है कि देशभर में लॉजिस्टिक्स की योजना कैसे बनाई जाती है, उसे कैसे लागू किया जाता है और कैसे बढ़ाया जाता है।
ULIP (Unified Logistics Interface Platform) जैसे प्लेटफ़ॉर्म विभागों के बीच डेटा को एकीकृत कर रहे हैं, जबकि LDB (Logistics Data Bank) 2.0 लाखों कंटेनरों की वास्तविक समय निगरानी प्रदान करता है।
हर HSN कोड को उसकी संबंधित लाइन मंत्रालय से जोड़ा गया है, जिससे जवाबदेही और नीति निर्माण दोनों मजबूत हुए हैं।

SMILE कार्यक्रम के तहत शहर एवं राज्य स्तर की लॉजिस्टिक्स योजनाएँ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप लाई जा रही हैं।
पिछले वर्ष अंतर्देशीय जलमार्गों के माध्यम से 145.84 मिलियन टन कार्गो का रिकॉर्ड परिवहन हुआ। रेल जाम को समर्पित मालवाहक गलियारों से कम किया जा रहा है। औद्योगिक क्षेत्रों में NICDC के प्लग-एंड-प्ले पार्क निवेशकों को तैयार अवसंरचना प्रदान कर रहे हैं।

जमीनी स्तर पर, GST और ई-वे बिल जैसी सुधारों ने अंतरराज्यीय परिवहन से दशकों पुरानी रुकावटों को दूर किया है।
इन हस्तक्षेपों का उद्देश्य स्पष्ट है— लॉजिस्टिक्स लागत कम करना, दक्षता बढ़ाना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की स्थिति को मजबूत करना।

गंगा के मैदान में मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स

भारत गंगा के मैदान में एकीकृत मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित कर रहा है, जो सड़क, रेल और जलमार्गों को जोड़कर परिवहन को तेज, सस्ता और हरित बना रहा है।

ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (EDFC), एक उच्च गति रेल माल लाइन, ने वैगन टर्नअराउंड समय को 15–16 दिनों से घटाकर 2–3 दिन कर दिया है और ट्रांजिट समय को 60+ घंटे से घटाकर 35–38 घंटे कर दिया है।
प्रयागराज में केंद्रीय नियंत्रण केंद्र के माध्यम से माल संचालन संचालित किए जा रहे हैं।
EDFC का वाराणसी में गंगा जलमार्ग से जुड़ना निर्माताओं को हल्दिया जैसे पूर्वी बंदरगाहों तक कार्गो पहुंचाने में अधिक सुविधा दे रहा है।

वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स सुविधाओं का तेजी से विकास रोजगार सृजन, बेहतर इनवेंटरी प्रबंधन और समयबद्ध उत्पादन एवं निर्यात में सहायता कर रहा है।
इन परियोजनाओं में विश्व बैंक द्वारा $1.96 बिलियन (EDFC और रेल लॉजिस्टिक्स) और $375 मिलियन (गंगा जलमार्ग) का निवेश शामिल है।

लॉजिस्टिक्स पहले से अधिक क्यों महत्वपूर्ण

भारत की विकास यात्रा अब कुशल लॉजिस्टिक्स पर अधिक निर्भर है।
नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी और पीएम गतिशक्ति ने इस परिवर्तन को तेज किया है। परंतु रणनीति को सटीकता की आवश्यकता होती है — और वह शुरू होती है लॉजिस्टिक्स लागत के वास्तविक आंकड़ों से।

पहली बार—
DPIIT और NCAER की व्यापक वैज्ञानिक रिपोर्ट ने भारत की लॉजिस्टिक्स लागत को GDP के 7.97% पर रखा है।

यह अध्ययन 3,500+ उद्योग हितधारकों के प्राथमिक डेटा और MOSPI, RBI, GSTN जैसे स्रोतों के द्वितीयक डेटा पर आधारित है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष:

  • लॉजिस्टिक्स लागत: ₹24.01 लाख करोड़

  • नॉन-सर्विसेज आउटपुट के मुकाबले: 9.09%

रिपोर्ट दर्शाती है कि छोटी कंपनियों पर लॉजिस्टिक्स लागत का बोझ अधिक है।
अध्ययन विभिन्न परिवहन मोड्स के लिए प्रति टन-किमी लागत भी प्रदान करता है।

यह स्पष्ट करता है कि लगभग 600 किमी की यात्रा में पहले और अंतिम 50 किमी में सुधार से कुल लागत काफी घट सकती है।
इससे अंतिम-मील संपर्क और मल्टीमॉडल इंटीग्रेशन का महत्व बढ़ जाता है।

नया इंटरैक्टिव डैशबोर्ड नीति-निर्माताओं और उद्योग दोनों को वास्तविक समय विश्लेषण और बेहतर निर्णय लेने में सक्षम बनाएगा।

2025: भारत की सप्लाई चेन को सुपरचार्ज करना

2025 में कई नई पहलें शुरू की गईं—
मापांकन, स्थानीय योजना, अवसंरचना और डेटा एकीकरण को मजबूत करने के लिए।

1. PM GatiShakti — एकीकृत योजना को गति

इस वर्ष निम्न प्रमुख लॉन्च किए गए:

  • सभी 112 आकांक्षी जिलों के लिए जिला मास्टर प्लान

  • PM GatiShakti – Offshore (समुद्री परियोजनाओं के लिए भू-स्थानिक डेटा एकीकरण)

  • PM GatiShakti Public: 230 datasets का सार्वजनिक उपयोग

  • National Master Plan Dashboard और Data Uploading System

  • Compendium Volume-3

  • LEAPS 2025 — लॉजिस्टिक्स नवाचार और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए DPIIT पहल

2. SMILE — शहर स्तर पर लॉजिस्टिक्स योजना

ADB के सहयोग से विकसित SMILE कार्यक्रम
राज्य और शहर स्तर पर लॉजिस्टिक्स को सुव्यवस्थित करता है।

8 राज्यों के 8 पायलट शहरों में—

  • ट्रंक रूट्स

  • आर्थिक गलियारे

  • लॉजिस्टिक्स गेटवे

  • शहरी माल ढुलाई

  • वेयरहाउस क्लस्टर

  • लास्ट-माइल कॉरिडोर

को एकीकृत ढंग से योजना में शामिल किया जा रहा है।

उद्देश्य:
तेज, सस्ता, स्वच्छ और संगठित शहरी लॉजिस्टिक्स प्रणाली।

3. LEADS 2025 — राज्यों की लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस रैंकिंग

LEADS अब धारणा-आधारित और वस्तुनिष्ठ दोनों प्रकार के डेटा को जोड़कर राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों का मूल्यांकन करता है।
API-आधारित टूल्स वास्तविक समय में सड़क गति, यात्रा समय और प्रतीक्षा समय को ट्रैक करते हैं।

4. LDB 2.0 — बाजारों को गति देने वाली दृश्यता

ULIP के साथ एकीकृत LDB 2.0:

  • वास्तविक समय कंटेनर ट्रैकिंग

  • रोड, रेल, समुद्र और हाई-सीज ट्रैकिंग

  • लाइव कंटेनर देरी हीटमैप

  • कंटेनर नंबर, वाहन नंबर, रेलवे FNR से ट्रैकिंग

5. IPRS 3.0 — औद्योगिक पार्कों की रैंकिंग

IPRS 3.0 पार्कों को तीन श्रेणियों में रैंक करता है:
Leader, Challenger, Aspirer

20 प्लग-एंड-प्ले पार्क NICDC के तहत विकसित हो रहे हैं।

6. HSN कोड गाइडबुक

12,167 HSN कोड्स को 31 मंत्रालयों से मैप किया गया है, जिससे उद्योग और सरकार दोनों के लिए स्पष्टता बढ़ी है।

निष्कर्ष

लॉजिस्टिक्स अब परदे के पीछे का तंत्र नहीं है —
भारत इसे अपनी प्रतिस्पर्धात्मक ताकत में बदल रहा है।

PM GatiShakti Public/Offshore, SMILE, LEAPS 2025, LEADS 2025, IPRS 3.0, LDB 2.0 जैसी पहलों के साथ भारत अपने लॉजिस्टिक्स को लागत केंद्र से वैश्विक प्रतिस्पर्धा की शक्ति में बदल रहा है।

विकास इंजन से वैश्विक नेतृत्व की ओर यात्रा शुरू हो चुकी है।


एनआईएफटीईएम ने दिया मोटे अनाज से बेकरी उत्पाद निर्माण का जशपुर में प्रशिक्षण

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पोषण तत्वों  के साथ ही रोजगार के अवसरों की दी जानकारी

रायपुर- एनआईएफ़टीईएम के छात्रों ने मोटे अनाज में पाए जाने वाले फ़ाइबर, मिनरल्स, एंटीऑक्सीडेंट्स के महत्व के साथ ही इनके नियमित उपयोग से होने वाले स्वास्थ्य लाभों पर विस्तार से जानकारी दी। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागी महिलाओं को मोटे अनाज आधारित उत्पादों से होने वाली आमदनी और बाज़ार संभावनाओं के बारे में भी बताया गया।

प्रशिक्षण में स्व-सहायता समूह की 25 महिलाओं की रही सहभागिता

हरियाणा के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ूड टेक्नोलॉजी, एंटरप्रेन्योरशिप एंड मैनेजमेंट द्वारा महुआ पर स्थापित सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस में विगत दिवस मोटे अनाज के पोषण तत्वों और इनके उपयोग से बेकरी उत्पाद बनाने संबंधी हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग आयोजित की गई। इस प्रशिक्षण में स्व सहायता समूह की 25 महिलाओं ने सहभागिता की।

मोटे अनाज का उपयोग बढ़ाकर  पोषण स्तर में करना है वृद्धि

कार्यक्रम का उद्देश्य नान खटाई, न्यूट्रीबार, कुकीज़ जैसे बेकरी आइटम्स में मोटे अनाज का उपयोग बढ़ाकर इनके पोषण स्तर में वृद्धि करना और ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार करना है। यह प्रशिक्षण जिला प्रशासन के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। 

स्थानीय समुदायों को खाद्य प्रसंस्करण आधारित उद्यमिता से है जोड़ना 

जशपुर में एनआईएफ़टीईएम टीम वैल्यू-एडेड फ़ूड प्रोडक्ट्स के उत्पादन के साथ-साथ पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग के लिए तकनीकी सहायता प्रदान कर रही है। यह पूरी पहल स्थानीय समुदायों को खाद्य प्रसंस्करण आधारित उद्यमिता से जोड़ने के उद्देश्य से चलाए जा रहे ग्राम अंगीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत की जा रही है। इस कार्यक्रम का नेतृत्व प्रो. प्रसन्ना कुमार जी.वी. और अभिमन्यु गौर कर रहे हैं, जबकि यह कार्यक्रम एनआईएफ़टीईएम के डायरेक्टर डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय के निर्देशन में संचालित हो रहा है। कार्यक्रम के संचालन और विभिन्न गतिविधियों के समन्वय में मिशन मैनेजर विजय शरण प्रसाद और जय जंगल एफपीसी जशपुर के डायरेक्टर समर्थ जैन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

चेच और अमारी भाजी के रेशे से बने नवाचार उत्पादों ने छात्रों को किया प्रभावित

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जांजगीर-चाम्पा- जय भारत इंग्लिश मिडियम स्कूल बलौदा के छात्रों और शिक्षकों ने बहेराडीह गांव में स्थित देश के पहले किसान स्कूल बहेराडीह का भ्रमण किया, जहां पर वे पहली बार चेच भाजी और अमारी भाजी के रेशे से बनाई गई रंग-बिरंगी राखियां और कपड़े को देखकर खूब प्रभावित हुए.

जय भारत इंग्लिश मिडियम स्कूल बलौदा की शिक्षका रूबी दास, आरती विश्वकर्मा और शरद राजपूत ने बताया कि जिले के जैविक क़ृषि ग्राम बहेराडीह में स्थित वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल का अपने स्कूली छात्र-छात्राओं के साथ भ्रमण किया, जहां पर किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव, केंद्रीय रेशम बोर्ड, तसर अनुसन्धान केंद्र, वस्त्र मंत्रालय भारत सरकार के सलाहकार रामाधार देवांगन, पार्वती देवांगन, पशु सखी पुष्पा यादव व उनकी टीम द्वारा बनाई गई चेच भाजी व अमारी भाजी के रेशे से रंग बिरंगी राखियां, कपड़ा को देखकर खूब प्रभावित हुए, वहीं किसान स्कूल परिसर में प्राकृतिक खेती तकनीक का बारीकी से अवलोकन किया। स्कूल के छात्र वीर प्रताप सोनी ईशान श्रीवास, शिवम सिंह और हरि गुप्ता ने बताया कि उन्होंने छत्तीसगढ़ की 36 भाजी एक साथ कभी नहीं देखा था, मगर यहां पर 56 प्रकार की भाजियों का संरक्षण और संवर्धन पहली बार देखा। छात्र हेमंत भार्गव, कुश अग्रवाल, प्रशांत गोयल और गौरी अग्रवाल ने बताया कि छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों के किसानों के सहयोग से विलुप्त चीजों का बड़े पैमाने पर संरक्षित सामग्री की संग्रहालय जो कि अपने आप में सराहनीय है, जिसे धरोहर का स्वरूप दिया गया है। छात्र सिमरन अग्रवाल माहि सोनी, सोना बैनर्जी तनीषा साहू और आशिता खान ने बताया कि यहां पर क़ृषि क्षेत्र में कई प्रकार की नवाचार का काम हो रही है, जिसमें केला, अलसी, भिंडी, चेच भाजी तथा अमारी भाजी के रेशे से रंग बिरंगी आकर्षक राखियों समेत कपड़ा बनाने के साथ वर्मीवाश बनाने का काम हो रहा है।



Kisaan School : रायगढ़ जिले के किसानों को जिंदल ने कराया किसान स्कूल का भ्रमण, छत्तीसगढ़ की 36 भाजियों को देख गदगद हुए किसान

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जांजगीर-चाम्पा- रायगढ़ जिले के अलग-अलग एफपीओ के 35 प्रगतिशील किसानों को जिंन्दल पॉवर प्लांट ने बहेराडीह में स्थित देश के पहले किसान स्कूल का भ्रमण कराया, जहां किसानों ने यहां पर वर्ष 2012 से छत्तीसगढ़ की 36 भाजियों पर किए जा रहे अनुसन्धान को देखकर खूब प्रभावित हुए, वहीं घर की छत पर विकसित किए गए टेरिस गार्डन को देख किसान स्कूल के क़ृषि क्षेत्र में किए जा रहे नवाचार की खूब सराहना की.

जिंदल फाउंडेशन तमनार रायगढ़ के सुरेश कुमार डड़सेना ने बताया कि जिंदल द्वारा रायगढ़ जिले में किसानों का एफपीओ बनाया गया है और एफपीओ से जुड़े किसानों को क़ृषि क्षेत्र सहायता, प्रशिक्षण और भ्रमण कराया जाता है. इसी कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल बहेराडीह का भ्रमण कराया गया, जहां पर किसानों ने पहली बार छत्तीसगढ़ की 36 भाजियों के देशी बीजों, भाजियों और उसके अवशेष से बनी रंग बिरंगी राखी, कपड़ा को देख खूब प्रभावित हुए. भ्रमण के दौरान यहां के किसानों के द्वारा उगाई गई 6 फीट ऊंचाई की धनिया को देख खूब प्रभावित हुए. किसानों ने पशुपालन, गोमूत्र इकाई, गोबर गैस प्लांट, वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, केंचुआ पालन इकाई, अंजोला इकाई, नाडेप इकाई, वर्मी कम्पोस्ट इकाई, अक्षय चक्र क़ृषि बाड़ी मॉडल, केले समेत भिंडी, चेच भाजी, अमारी भाजी व अलसी के रेशे से निर्मित कपड़ा तथा विलुप्त चीजों को बड़े पैमाने पर सहेजकर रखे गए संग्रहालय एवं देशी बीजों के संरक्षण केंद्र का अवलोकन किया. यहां पशु सखी पुष्पा यादव ने डेयरी पशुपालन और वर्मीवाश के बारे में एफपीओ के किसानों को जानकारी दी.

भ्रमण में सुरेन्द्र कुमार साहू, गोपी पटेल, प्रहलाद सिदार, लक्ष्मी राठिया, गनपति राठिया, गुड्डी राठिया, सुकमती राठिया, मालती राठिया, दुर्गेश राठिया, कृष्णा निषाद, संतु राम सिदार, रविशंकर पटेल, सारंगधर राठिया, घुराऊ राम राठिया, कार्तिक राम, भोजराम साहू, सालिराम राठिया, गुरु कुमार राठिया राकेश कुमार,विद्यावती केरकेटा, तमा यादव और अन्य किसान प्रमुख रूप से शामिल रहे.

प्राकृतिक खेती का मॉडल है किसान स्कूल

सरकार ने भले ही राष्ट्रीय प्राकृतिक मिशन की शुरुआत अभी की है, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल बहेराडीह में सालों से प्राकृतिक खेती के मॉडल को विकसित किया जा चुका है. किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव ने अब तक प्राकृतिक खेती को लेकर भारत के विभिन्न राज्यों और जिले के हजारों किसानों तथा बिहान की क़ृषि सखी, पशु सखी, महिला स्व सहायता समूहों के महिलाओं तथा क़ृषि विभाग के आत्मा अंतर्गत प्रत्येक पंचायतों में कार्यरत कृषक मित्रो को सरकार की ओर से विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रशिक्षण दे चुके हैं. इस समय छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में अलग-अलग बैंको द्वारा संचालित ग्रामीण स्व रोजगार प्रशिक्षण संस्थान तथा लाईवलीहुड कॉलेज में प्रशिक्षण दिया जा रहा है



धान खरीदी में सुगमता हेतु ‘तुहर टोकन मोबाइल एप’ प्रारंभ — किसानों को मिलेगी घर बैठे टोकन सुविधा, समितियों में लंबी कतारों से मिलेगी मुक्ति

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रायपुर- किसानों को धान विक्रय हेतु सुगम एवं बेहतर व्यवस्था प्रदाय किये जाने हेतु खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग द्वारा खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में ‘तुहर टोकन मोबाइल एप’ प्रारंभ किया गया है। इस एप के माध्यम से किसानों को घर बैठे धान विक्रय हेतु टोकन की व्यवस्था उपलब्ध होगी, जिससे समितियों में लंबी कतारों से मुक्ति मिलेगी।

यह मोबाइल ऐप गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है। इस ऐप में किसानों को सर्वप्रथम आधार आधारित ओटीपी के माध्यम से पंजीयन करना होगा। किसान प्रतिदिन सुबह 8.00 बजे से इस ऐप के माध्यम से टोकन हेतु आवेदन कर सकेंगे।

खाद्य सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले ने जानकारी दी कि धान खरीदी प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुविधा को ध्यान में रखते हुए, सीमांत कृषक (2 एकड़ या 2 एकड़ से कम भूमि) को अधिकतम 1 टोकन, लघु कृषक ( 2 से 10 एकड़ तक) को अधिकतम 2 टोकन तथा दीर्घ कृषक (10 एकड़ से अधिक) को अधिकतम 3 टोकन प्रदान किये जायेंगे।

नया टोकन बनाने हेतु समय-सीमा रविवार से शुक्रवार तक (प्रातः 8.00 बजे से सायं 5.00 बजे तक) निर्धारित की गई है। जारी टोकन आगामी 07 खरीदी दिवसों के लिए मान्य रहेंगे।

धान खरीदी केन्द्र की प्रतिदिन की खरीदी सीमा का 70 प्रतिशत हिस्सा मोबाइल एप के माध्यम से टोकन हेतु आरक्षित रहेगा। इस 70 प्रतिशत में से लघु एवं सीमांत कृषक हेतु 80 प्रतिशत तथा दीर्घ कृषक हेतु 20 प्रतिशत का आरक्षण किया गया है।

उदाहरण स्वरूप यदि किसी उपार्जन केन्द्र की प्रतिदिन की खरीदी सीमा 1000 क्विंटल है, तो मोबाइल ऐप हेतु आरक्षित 700 क्विंटल में से 560 क्विंटल लघु एवं सीमांत कृषकों हेतु तथा 140 क्विंटल दीर्घ कृषकों हेतु आरक्षित रहेगा।

शेष 30 प्रतिशत टोकन सोसाइटी स्तर पर भी किसानों हेतु उपलब्ध रहेंगे, जिससे सभी वर्ग के किसानों को धान विक्रय हेतु सहज और सुगम व्यवस्था प्राप्त हो सके।

खाद्य विभाग द्वारा विकसित ‘तुहर टोकन मोबाइल एप’ राज्य के किसानों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से सशक्त बनाते हुए खरीदी व्यवस्था में पारदर्शिता, समान अवसर और समय की बचत सुनिश्चित करेगा।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूसा परिसर में राष्ट्रीय बीज निगम की अत्याधुनिक बीज प्रसंस्करण इकाई का किया उद्घाटन, ‘सीड मैनेजमेंट 2.0’ और ऑनलाइन बीज बुकिंग प्लेटफॉर्म भी किया लॉन्च

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज नई दिल्ली स्थित पूसा परिसर में राष्ट्रीय बीज निगम (NSC) की अत्याधुनिक सब्जी एवं पुष्प बीज प्रसंस्करण और पैकेजिंग इकाई का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने बरेली, धारवाड़, हासन, सूरतगढ़ और रायचूर में स्थित पांच NSC बीज प्रसंस्करण संयंत्रों का भी वर्चुअल उद्घाटन किया।

पूसा, नई दिल्ली स्थित बीज भवन में स्थापित सब्जी बीज प्रसंस्करण इकाई की क्षमता 1 टन प्रति घंटा है, जबकि अन्य पांच संयंत्रों की क्षमता 4 टन प्रति घंटा प्रत्येक है। ये सभी संयंत्र उन्नत तकनीक से सुसज्जित हैं, जिससे देशभर के किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी और बीज उत्पादन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा।

कार्यक्रम के दौरान शिवराज चौहान ने “सीड मैनेजमेंट 2.0” प्रणाली और किसानों के लिए एक ऑनलाइन बीज बुकिंग प्लेटफॉर्म का भी शुभारंभ किया। इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से अब किसान अपनी बीज आवश्यकताओं की बुकिंग ऑनलाइन कर सकेंगे, जिससे पारदर्शिता और सुगमता बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि छोटे और सीमांत किसानों तक गुणवत्तापूर्ण बीज पहुंचाना अत्यंत आवश्यक है।

शिवराज चौहान ने कहा कि नई सुविधाओं के माध्यम से किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज आसानी से उपलब्ध होंगे, जिससे कृषि उत्पादकता में वृद्धि होगी। उन्होंने बताया कि हाल ही में आयोजित “विकसित कृषि संकल्प अभियान” के दौरान सबसे अधिक शिकायतें नकली और निम्न गुणवत्ता वाले बीजों को लेकर प्राप्त हुईं। इसलिए गुणवत्तापूर्ण बीजों की आपूर्ति सुनिश्चित करना अनिवार्य है और इसमें NSC की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकार इस दिशा में कड़े कदम उठा रही है।

केंद्रीय मंत्री ने NSC टीम की सराहना करते हुए कहा कि यह पहल आत्मनिर्भर कृषि प्रणाली की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय बीज निगम का कार्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि देश के अन्न भंडार को समृद्ध करना भी है।”

उन्होंने निगम से आग्रह किया कि वह क्षेत्रीय भाषाओं में नवाचारों को बढ़ावा दे ताकि किसानों तक सेवाएं अधिक सुलभ हो सकें और निजी कंपनियों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके। उन्होंने कहा, “निजी क्षेत्र की अपनी भूमिका है, लेकिन सार्वजनिक निगमों का भी विशेष महत्व है। राज्य बीज विकास निगमों के कामकाज में भी सुधार की आवश्यकता है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए NSC को स्पष्ट रोडमैप के साथ काम करना चाहिए।”

कार्यक्रम में कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी, NSC की CMD और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव मनिंदर कौर द्विवेदी, संयुक्त सचिव अजीत कुमार साहू, तथा कृषि मंत्रालय और NSC के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

राष्ट्रीय बीज निगम लिमिटेड एक शेड्यूल ‘बी’ – मिनी रत्न श्रेणी-I कंपनी है, जो भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व में है। वर्ष 1963 में स्थापना के बाद से NSC देशभर के किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।


एग्रीस्टैक पोर्टल बनेगा किसानों की डिजिटल पहचान, धान खरीदी सहित अन्य योजनाओं के लाभ हेतु 31 अक्टूबर तक पंजीयन अनिवार्य

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रायपुर-राज्य शासन द्वारा किसानों के हित में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। अब सभी किसानों को शासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए एग्रीस्टैक पोर्टल पर पंजीयन कराना अनिवार्य किया गया है। सहायक आयुक्त सहकारिता ने बताया कि एग्रीस्टैक पोर्टल पर पंजीयन की अंतिम तिथि 31 अक्टूबर निर्धारित की गई है, जो किसान पंजीयन से छूटे हों, वे शीघ्र ही अपना पंजीयन करा सकते हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए एक डिजिटल इकोसिस्टम है, जिसे भारतीय सरकार ने विकसित किया है। जिसका उद्देश्य किसानों के लिए एक संपूर्ण डेटाबेस बनाना है, जिसमें उनकी पहचान, भूमि रिकॉर्ड, आय, ऋण, फसल की जानकारी और बीमा इतिहास के बारे में जानकारी शामिल है। एग्रीस्टैक पोर्टल पर पंजीयन कराने से किसानों को धान खरीदी सहित शासन की अन्य योजनाओं का लाभ मिलेगा।

एग्रीस्टैक पोर्टल पर पंजीयन के फायदे

एग्रीस्टैक पोर्टल पर किसान आईडी बनवाने से किसानों को धान खरीदी, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, किसान क्रेडिट कार्ड, उर्वरक अनुदान, प्रधानमंत्री किसान सिंचाई योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, कृषि मशीनीकरण योजना एवं मुख्यमंत्री किसान सहायता योजना जैसी अनेक केंद्र एवं राज्य शासन की योजनाओं का लाभ सीधे प्राप्त होगा। कलेक्टर कुन्दन कुमार ने जिले के सभी किसानों से अपील की है, कि वे शीघ्रता से एग्रीस्टैक पोर्टल में पंजीयन कराएँ, ताकि किसी भी योजना का लाभ लेने में उन्हें कठिनाई न हो। उन्होंने बताया कि किसान स्वयं मोबाइल ऐप से ऑनलाइन पंजीयन कर सकते हैं। साथ ही, स्थानीय सीएससी सेंटर, सेवा सहकारी समिति एवं पटवारी कार्यालयों के माध्यम से भी निःशुल्क पंजीयन की सुविधा उपलब्ध है। साथ ही https://cgfr.agristack.gov.in/पर भी पंजीयन किया जा सकता है। 


टमाटर की उन्नत खेती से किसानों को हो रहा शुद्ध लाभ, राष्ट्रीय बागवानी मिशन से मिली मदद

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रायपुर- राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत किसानों और कृषि से जुड़े स्टार्टअप्स को वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। इस योजना के तहत फल, सब्जी, फूल, मसाले, औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती के लिए सब्सिडी दी जाती है। इसी योजना का लाभ उठाते हुए जशपुर जिले के मनोरा विकासखण्ड के ग्राम पंचायत टेम्पू के किसान सुनील भगत ने टमाटर की खेती की और कुल लागत घटाने के बाद शुद्ध लाभ अर्जित किया।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे किसानों को उन्नत खेती की जानकारी दें और उन्हें विभिन्न केन्द्रीय और राज्य सरकार की योजनाओं से लाभान्वित करें ताकि वे आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें। इसी दिशा में, सुनील भगत ने देशी किस्म ‘जीके टमाटर’ की खेती की, जिसमें प्रति एकड़ 9 टन उत्पादन हुआ। उन्होंने इसे लगभग ₹85,500 में बेचा, जिससे उन्हें ₹55,500 का शुद्ध लाभ हुआ। किसान अब ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग जैसी उन्नत तकनीक अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

अन्य किसानों पर प्रभाव

खेती की प्रक्रिया को आधुनिक बनाकर राष्ट्रीय बागवानी मिशन का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना है। इसके लिए अत्याधुनिक तकनीक, जैविक उर्वरक, पर्यावरण-अनुकूल कीटनाशक और अन्य उपकरणों का उपयोग करना आवश्यक है, जो किसानों को उत्पादन बढ़ाने में सक्षम बनाते हैं। किसान समूह कृषि उत्पादों की खरीद, बाजार से संपर्क स्थापित करना, इनपुट की आपूर्ति और प्रशिक्षण एवं जानकारी प्रदान करने में सक्रिय हैं। टेम्पू और आसपास के गांवों के किसान सुनील भगत की सफलता से प्रेरित होकर उन्नत खेती करना शुरू कर चुके हैं और विभागीय योजनाओं से लगातार जुड़कर अधिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।


ICAR में गन्ना अनुसंधान के लिए विशेष टीम गठित, किसानों की आय और उत्पादन बढ़ाने पर जोर

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कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत गन्ना अनुसंधान के लिए एक विशेष टीम गठित की जाएगी। यह टीम गन्ना नीति पर भी कार्य करेगी। मंत्री जी ने यह घोषणा ग्रामीण वॉइस और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज़ द्वारा ICAR के सहयोग से आयोजित गन्ना अर्थव्यवस्था पर राष्ट्रीय चर्चा में की।

चौहान ने कहा कि गन्ने की किस्म 238 में शर्करा की मात्रा अच्छी है, लेकिन यह रेड रॉट रोग के प्रति संवेदनशील है। उन्होंने एक साथ वैकल्पिक किस्मों के विकास की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि नई किस्मों के साथ अक्सर नई बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है, और रोग नियंत्रण एक बड़ी चुनौती है।

उन्होंने बताया कि मोनो-क्रॉपिंग (एक ही फसल बार-बार उगाना) से कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जैसे पोषण तत्त्वों की कमी और नाइट्रोजन फिक्सेशन में सीमाएँ। इसकी जगह इंटरक्रॉपिंग (मिश्रित खेती) पर विचार करना जरूरी है।

चौहान ने कहा—

"हमें उत्पादन और मशीनीकरण बढ़ाने, लागत घटाने और रिकवरी सुधारने पर ध्यान देना होगा। पानी का उपयोग गंभीर चिंता का विषय है। ‘प्रति बूंद, अधिक फसल’ के सिद्धांत पर हमें पानी की खपत कम करने की रणनीति बनानी होगी। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि ड्रिप इरीगेशन की लागत किसानों पर भारी पड़ती है।"

उन्होंने बायो-प्रोडक्ट्स पर भी बल दिया। उनका कहना था कि जहाँ एथनॉल और मोलासेस का उपयोग अच्छी तरह से हो रहा है, वहीं किसानों की आय बढ़ाने के लिए नए मूल्यवर्धित उत्पाद विकसित करने होंगे। साथ ही, प्राकृतिक खेती से खाद पर निर्भरता कम की जा सकती है।

गन्ना मूल्य शृंखला की समस्याओं पर बोलते हुए चौहान ने माना कि किसानों की भुगतान में देरी की शिकायतें वाजिब हैं। मिलों की भी कठिनाइयाँ हैं, लेकिन देर से भुगतान का सबसे अधिक नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है। उन्होंने श्रमिकों की कमी पर भी ध्यान दिलाया और कहा कि गन्ना कटाई को कम श्रम-प्रधान बनाने के लिए प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और मशीनीकरण में नवाचार की जरूरत है।

"मैं ICAR से आग्रह करता हूँ कि गन्ना अनुसंधान के लिए अलग टीम बनाए, जो व्यावहारिक मुद्दों पर काम करे। अनुसंधान का लाभ किसानों और उद्योग दोनों को मिलना चाहिए। जो शोध किसानों के काम न आए, उसका कोई अर्थ नहीं," उन्होंने कहा।

सेमिनार में ICAR के महानिदेशक एवं DARE सचिव डॉ. एम.एल. जात ने अनुसंधान के चार प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की—

  1. अनुसंधान की प्राथमिकताएँ तय करना

  2. अनुसंधान को आगे बढ़ाने में विकासात्मक चुनौतियाँ

  3. उद्योग से जुड़ी समस्याओं का समाधान

  4. इस क्षेत्र को सहयोग देने के लिए नीतिगत सुझाव

डॉ. जात ने कहा कि गन्ने में पानी और खाद की खपत बहुत अधिक होती है। पानी की कमी दूर करने के लिए कई अध्ययन हुए हैं और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में माइक्रो-इरिगेशन पद्धतियाँ आशाजनक साबित हुई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि खाद का उपयोग वर्तमान में अप्रभावी है और उसकी दक्षता बढ़ाना आवश्यक है।

उन्होंने फसल विविधीकरण पर जोर देते हुए कहा कि दलहन और तिलहन को गन्ने के साथ मिलाने से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की आय और स्थिरता भी मजबूत होगी।

ICAR के डॉ. देवेंद्र कुमार यादव (उप महानिदेशक, फसल विज्ञान) ने बताया कि किस्म 238 किसानों द्वारा खूब अपनाई गई, लेकिन इससे मोनो-क्रॉपिंग को बढ़ावा मिला। उन्होंने कहा कि वैकल्पिक किस्में उपलब्ध हैं, लेकिन नई किस्मों को अपनाने में समय लगता है क्योंकि हर किस्म को रोग, कीट प्रतिरोध और पैदावार की निगरानी के लिए तीन साल का परीक्षण करना होता है। उनके अनुसार अधिकांश फसलों में यील्ड गैप का विश्लेषण करना बहुत जरूरी है।

डॉ. राजबीर सिंह (उप महानिदेशक, विस्तार, ICAR) ने सेमिनार के एक सत्र की अध्यक्षता की।



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