Media24Media.com: वैज्ञानिकों ने अंगूर में बीजरहितता के आनुवंशिक रहस्यों का किया खुलासा

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वैज्ञानिकों ने अंगूर में बीजरहितता के आनुवंशिक रहस्यों का किया खुलासा

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वैज्ञानिकों ने अंगूर में बीजरहित (Seedless) होने के पीछे छिपे महत्वपूर्ण आनुवंशिक और विकासात्मक तंत्रों का खुलासा किया है। बीजरहित अंगूर, अपने पतले छिलके, मीठे स्वाद और बेहतर बनावट के कारण उपभोक्ताओं और अंगूर उद्योग में अत्यधिक पसंद किए जाते हैं, जिससे यह गुण प्रजनन कार्यक्रमों में अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है।

अंगूर विश्व की प्रमुख बागवानी फसलों में से एक है, जिसका बड़ा हिस्सा ताजे फल या किशमिश जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों के रूप में उपयोग होता है। हालांकि बीजरहित अंगूर की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके पीछे के जैविक तंत्र अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे।

यह शोध पुणे स्थित आघारकर अनुसंधान संस्थान (ARI), जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है, तथा सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के सहयोग से किया गया। इस अध्ययन में पराग (पोलन) की निष्क्रियता से बीजरहित अंगूर बनने की आणविक और जीनोमिक प्रक्रियाओं पर नई जानकारी प्राप्त हुई है, जिससे बेहतर गुणवत्ता और अधिक उत्पादन वाली नई किस्में विकसित करने में मदद मिलेगी।

यह अध्ययन हाल ही में ‘BMC Plant Biology’ में प्रकाशित हुआ है, जिसमें संस्थान द्वारा विकसित उच्च उत्पादक अंगूर किस्म ARI-516 से प्राप्त एक बीजरहित म्यूटेंट का विश्लेषण किया गया।

डॉ. रवींद्र पाटिल के नेतृत्व में शोध टीम ने बीज वाले अंगूर (ARI-516) और उसके बीजरहित म्यूटेंट के बीच तुलनात्मक अध्ययन किया। सूक्ष्म परीक्षण में पाया गया कि बीजरहित म्यूटेंट में पराग कणों का आकार असामान्य था, उनकी जीवित रहने की क्षमता बहुत कम थी और वे अंकुरित नहीं हो पाते थे, जिससे पराग की निष्क्रियता बीजरहितता का मुख्य कारण सामने आई।

इसके अलावा, मादा प्रजनन संरचनाएं (मैक्रोगैमेटोफाइट्स) भी सामान्य किस्म की तुलना में छोटी पाई गईं, जिससे निषेचन प्रक्रिया बाधित होती है और अंततः बीजरहित फल बनते हैं।

आणविक स्तर पर, वैज्ञानिकों ने ट्रांसक्रिप्टोमिक विश्लेषण (RNA सीक्वेंसिंग) किया, जिससे पता चला कि पराग विकास, कोशिका विभाजन और हार्मोन सिग्नलिंग से जुड़े कई जीन बीजरहित म्यूटेंट में कम सक्रिय थे। साथ ही, जीनोम सीक्वेंसिंग में कई ‘इन्सर्शन-डिलीशन’ (InDel) म्यूटेशन पाए गए, जो पराग निर्माण और उसके कार्य को प्रभावित करते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बीजरहितता ‘पार्थेनोकार्पी’ नामक प्रक्रिया के कारण होती है, जिसमें निषेचन के बिना ही फल का विकास होता है। यह प्रक्रिया पराग निर्माण और प्रजनन में दोष के कारण उत्पन्न होती है।

यह अध्ययन आधुनिक जीनोमिक तकनीकों का उपयोग करते हुए अंगूर में पार्थेनोकार्पिक बीजरहितता को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इससे जुड़े जीनों की पहचान भविष्य में अंगूर की उन्नत बीजरहित किस्मों के विकास में सहायक होगी, जिससे उत्पादन, गुणवत्ता और अनुकूलन क्षमता में सुधार होगा और बागवानी क्षेत्र को लाभ मिलेगा।

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