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आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बनेगा सिरकट्टी धाम : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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जनसहभागिता से निर्मित भव्य श्रीरामजानकी मंदिर छत्तीसगढ़ की आस्था और एकजुटता का प्रतीक : मुख्यमंत्री साय

श्रीरामजानकी मंदिर के शिखर पर लहराई धर्मध्वजा: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेश की समृद्धि की कामना की

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज गरियाबंद जिले के सिरकट्टी धाम आश्रम स्थित श्रीरामजानकी मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों के सुख, शांति और समृद्धि की कामना की तथा मंदिर के सर्वोच्च शिखर पर धर्मध्वजा की स्थापना की। उन्होंने आश्रम को सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बताते हुए आश्रम परिसर में समरसता भवन के निर्माण के लिए 50 लाख रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा की।

मुख्यमंत्री साय ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण के बाद पूरे देश में जो आध्यात्मिक चेतना का वातावरण निर्मित हुआ है, उसी की अखंड धारा का विस्तार आज सिरकट्टी धाम में धर्मध्वजा स्थापना के रूप में दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि हमारा देश ऋषि-मुनियों, साधु-संतों और आध्यात्मिक परंपराओं की पवित्र भूमि है। हमें धर्म को केवल आस्था के रूप में नहीं, बल्कि कर्तव्य के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ का सौभाग्य है कि प्रभु श्रीराम ने अपने वनवास काल का अधिकांश समय यहीं व्यतीत किया। दंडकारण्य के रूप में विख्यात अबूझमाड़ का विशाल जंगल कभी नक्सल समस्या से प्रभावित क्षेत्र था, जो आज तेजी से नक्सलवाद से मुक्त हो रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा रामलला अयोध्या धाम दर्शन योजना के अंतर्गत अब तक 39 हजार से अधिक श्रद्धालुओं को अयोध्या धाम की निशुल्क तीर्थयात्रा कराई जा चुकी है। मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा दर्शन योजना के अंतर्गत भी अब तक पांच हजार से अधिक श्रद्धालु लाभान्वित हुए हैं।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रदेश के पांच शक्तिपीठों के विकास का कार्य भी निरंतर प्रगति पर है। उन्होंने कहा कि भोरमदेव क्षेत्र के समग्र विकास के लिए स्वदेश दर्शन योजना के तहत 148 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिल चुकी है तथा रतनपुर के विकास के लिए भी प्रस्ताव प्रेषित किया गया है। उन्होंने कहा कि राजिम कल्प-कुंभ का आयोजन भी इस बार भव्य स्वरूप में किया जाएगा।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि श्रीरामजानकी मंदिर का भव्य स्वरूप जनसहभागिता का अनुपम उदाहरण है। लगभग 22 हजार परिवारों के सहयोग से लगभग 9 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह मंदिर बीते 10 वर्षों की तपस्या का परिणाम है। राजस्थान के शिल्पियों द्वारा पारंपरिक शैली में बिना सीमेंट और छड़ के उपयोग के निर्मित इस मंदिर की आयु लगभग एक हजार वर्ष आंकी गई है। उन्होंने मंदिर निर्माण में सहयोग करने वाले सभी दानदाताओं और श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इसे छत्तीसगढ़ की आस्था और एकजुटता का प्रतीक बताया।

कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने धर्मध्वजा रोहण को ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल परंपरागत ध्वजारोहण नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ में धर्म, अध्यात्म और सामाजिक समरसता की स्थापना का प्रतीक है। 

केबिनेट मंत्री गुरु खुशवंत साहेब ने कहा कि हम सभी के लिए सिरकट्टी धाम में धर्मध्वजा की स्थापना देखना अलौकिक अनुभव है। कार्यक्रम में सिरकट्टी आश्रम के महामंडलेश्वर महंत संत गोवर्धन शरण व्यास ने स्वागत उद्बोधन में सिरकट्टी आश्रम की स्थापना और महत्व पर जानकारी दी। 

इस अवसर पर सांसद रूपकुमारी चौधरी, विधायक रोहित साहू, दीपेश साहू, जिला पंचायत अध्यक्ष गौरीशंकर कश्यप, अनेक जनप्रतिनिधि, देश के विभिन्न स्थानों से आए संत-महात्मा और बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित थे।


सड़क सुरक्षा माह के अंतर्गत सड़क सुरक्षा और दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए किए जा रहे जन-जागरूकता कार्यक्रम

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रायपुर- सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय भारत सरकार के दिशा निर्देशों के अनुक्रम में मुख्य सचिव एवं पुलिस महानिदेशक छत्तीसगढ़ शासन के मार्गदर्शन में अंतर्विभागीय लीड एजेंसी सड़क सुरक्षा द्वारा पूरे प्रदेश में सड़क सुरक्षा माह 2026 के तहत प्रतिदिन जन-जागरूकता संबंधी विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। 

प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय एवं परिवहन मंत्री केदार कश्यप की ओर से लीड एजेंसी द्वारा जन जागरूकता संबंधी तैयार पोस्टर एवं फ्लैक्स जारी किया गया। इसी क्रम में उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा प्रदेश के समस्त सरपंचों एवं पंचगणों को पंचायत अंतर्गत सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम हेतु आवश्यक पहल करने के लिए एक अपील जारी किया गया। सड़क सुरक्षा माह के प्रथम दिवस 01 जनवरी 2026 को न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे, माननीय सुप्रीम कोर्ट कमेटी ऑफ रोड सेफ्टी की अध्यक्षता में बेमेतरा में हेलमेट रैली को हरी झण्डी दिखाकर इसका शुभारंभ किया। इसी कड़ी में 03 जनवरी को दुर्ग में संभाग स्तरीय अधिकारियों, संभागायुक्त, पुलिस महानिरीक्षक, सात जिलों के कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, परिवहन, लोक निर्माण, नगरीय प्रशासन, शिक्षा, आबकारी, स्वास्थ्य निर्माण एजेंसियों की बैठक तथा 05 जनवरी को मंत्रालय महानदी भवन में मुख्य सचिव विकासशील की उपस्थिति में संबंधित विभागीय सचिवों की बैठक आयोजित की गई, जिसमें सड़क दुर्घटनाओं को रोकने कार्ययोजना के तहत कार्य करने के निर्देश दिए गए। सड़क दुर्घटनाओं में कमी के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश देने के साथ ही विशेष रूप से सर्वाधिक दुर्घटनाओं वाले जिले रायपुर, बिलासपुर एवं दुर्ग के लिए समन्वित प्रयास से कार्ययोजना बनाया जाकर वर्ष 2026 के दौरान दुर्घटनाओं में कमी लाने के निर्देश दिये गये।

प्रदेश में वर्ष 2025 में गत वर्ष की तुलना में मृत्यु दर में यद्यपि कमी आई है। गत वर्ष की तुलना में यातायात नियमों के उल्लंघन करने वालों के विरूद्ध कार्यवाही में लगभग 45 प्रतिशत अधिक (लगभग 9 लाख प्रकरणों) की जाकर लगभग 39 करोड़ रूपये परिशमन शुल्क संकलित किये गये। साथ ही जन जागरुकता के कार्यों के फलस्वरूप अर्थात् लगभग 3 प्रतिशत मृत्यु दर में कमी परिलक्षित हुई है। प्रदेश के 20 जिलों में मृत्युदर में कमी हुई है। रायपुर सहित अन्य 13 जिलों में मृत्यु दर को कम करने कार्य किए जा रहे हैं। इस वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु दर में न्यूनतम 10 प्रतिशत की कमी सहित दुर्घटना जन्य सड़क खण्डों में यथाशीघ्र सुधारात्मक उपायों एवं आकस्मिक उपचार हेतु त्वरित प्रतिक्रिया हेतु समुचित उपाय का लक्ष्य रखा गया है।

प्रदेश में सड़क सुरक्षा माह 2026 के दौरान जन-जागरुकता के लिये यातायात पुलिस द्वारा प्रतिदिन पृथक-पृथक गतिविधियों के माध्यम से कार्य किए जा रहे हैं। इसी अनुक्रम में वाहन चालकों एवं यात्रीगणों को बिना हेलमेट, बिना सीट बेल्ट, मोबाइल में बात करते हुए या नशे का सेवन कर तथा तेज गति से वाहन चलाने वालों को समझाईश देकर यातायात के नियमों का पालन करने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है। साथ ही यातायात नियमों के पालन करने वालों को सम्मानित करने का कार्य भी किया जा रहा है।

डॉ. मनसुख मंडाविया ने गोवा में दो दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन का वर्चुअल उद्घाटन किया, श्रम संहिताओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर

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केंद्रीय श्रम एवं रोजगार और युवा मामले एवं खेल मंत्री, डॉ. मनसुख मंडाविया, ने 7 जनवरी 2026 को गोवा में दो दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन का वर्चुअल उद्घाटन किया।

यह सम्मेलन छह क्षेत्रीय सम्मेलनों की श्रृंखला में पहला है, जिन्हें श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित किया जाएगा। इन सम्मेलनों का उद्देश्य चार श्रम संहिताओं के सुचारू क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC), कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PMVBRY) से संबंधित मुद्दों पर विचार-विमर्श करना है।

केंद्रीय मंत्री डॉ. मंडाविया ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने राज्यों की सराहना की, जिन्होंने चार श्रम संहिताओं के प्रावधानों के अनुरूप अपने मौजूदा श्रम कानूनों में संशोधन करने का उत्साहपूर्वक प्रयास किया। यह सुधार 21 नवंबर 2025 से लागू हुए हैं और इसमें वार्षिक स्वास्थ्य जांच, जोखिमपूर्ण गतिविधियों में लगे श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, नियुक्ति पत्र जारी करना अनिवार्य, और ग्रेच्युटी की पात्रता अवधि घटाकर एक वर्ष करना जैसी प्रगतिशील प्रावधान शामिल हैं। मंत्री ने कहा कि आगे केंद्र और राज्य सहनशील समन्वय के माध्यम से कोड्स का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करेंगे, जिससे श्रमिकों के कल्याण और लाभ में समानता और निष्पक्षता बढ़ेगी। इन श्रम सुधारों को अंतरराष्ट्रीय मीडिया जैसे Global Times और The Economist से भी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है।

सम्मेलन में सचिव, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, वंदना गुरनानी ने बताया कि चार श्रम संहिताओं का उद्देश्य 29 मौजूदा श्रम कानूनों को समेकित और सरल बनाकर श्रमिक कल्याण को मजबूत करना है। इन संहिताओं में वेब-आधारित निरीक्षण प्रणाली और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा कवरेज जैसे कई प्रगतिशील उपाय शामिल हैं। केंद्रीय सरकार ने 30 दिसंबर 2025 को ड्राफ्ट नियमों को पूर्व-प्रकाशित किया है, जबकि नियमों की आवश्यकता न होने वाले प्रावधान 21 नवंबर 2025 से लागू हैं। उन्होंने राज्यों से कहा कि वे अपने संबंधित नियमों को शीघ्र अधिसूचित करें और इसके लिए कानून विभाग की सलाह लें।

सरलीकृत क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए, मंत्रालय ने FAQs हैंडबुक जारी की, V.V. गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान (VVGNLI) के माध्यम से क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू किए, ड्राफ्ट निरीक्षण योजना साझा की और डिजिटल हस्तक्षेपों के लिए श्रम सुविधा और समाधान पोर्टल्स पर API इंटीग्रेशन किया। राज्यों को PMVBRY के तहत आउटरीच, दुकानों और प्रतिष्ठानों अधिनियमों के साथ ओवरलैप, और ESIC कवरेज के विस्तार का लाभ उठाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है, जिसमें गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों, संविदा और आउटसोर्सेड श्रमिकों को शामिल करना भी शामिल है।

सम्मेलन नियमों और विनियमों पर विचार-विमर्श, अंतराल और असमानताओं की पहचान, सांविधिक अधिसूचनाओं का त्वरित प्रावधान, बोर्डों और फंडों के गठन और संबंधित संस्थागत तंत्रों पर चर्चा के लिए मंच के रूप में कार्य करेगा। इसमें चार श्रम संहिताओं के तहत योजनाओं, आईटी सिस्टम और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के कार्यान्वयन, क्षेत्रीय स्तर के अधिकारियों की क्षमता निर्माण और राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों तथा अन्य हितधारकों के बीच जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

सम्मेलन में मंत्रालय और राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे और सक्रिय भागीदारी की।


DGMS ने 125वां स्थापना दिवस मनाया, खान मजदूरों की सुरक्षा और कल्याण में समर्पित सेवा का जश्न

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श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के तहत डायरेक्टरेट जनरल ऑफ माइनस सेफ्टी (DGMS) ने आज धनबाद, झारखंड में अपने मुख्यालय में 125वां स्थापना दिवस मनाया, जो देशभर में खान मजदूरों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण सुनिश्चित करने में एक सदी से अधिक समर्पित सेवा का प्रतीक है। इस अवसर पर श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री, शोभा करंडलाजे मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। DGMS के महानिदेशक उज्ज्वल ताह, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की संयुक्त सचिव दीपिका कच्छल, DGMS के वरिष्ठ अधिकारी, मंत्रालय के अधिकारी, खनन उद्योग के प्रतिनिधि और विभिन्न हितधारक भी समारोह में उपस्थित थे।

समारोह को संबोधित करते हुए, श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री शोभा करंडलाजे ने कहा कि DGMS की 125 वर्षीय यात्रा अधिकारियों और खान मजदूरों की समर्पित सेवा और बलिदानों का प्रतीक है। उन्होंने उन सभी का योगदान स्वीकार किया जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में काम किया। मंत्री ने यह भी कहा कि आज खनन गतिविधियाँ सीधे भारत की विकास कहानी से जुड़ी हैं। उन्होंने खान मजदूरों के साहस और समर्पण को श्रद्धांजलि दी, जिनकी बहादुरी और जीवन जोखिम के बावजूद सेवा ने खनन को संभव बनाया और राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया।

मंत्री ने दोहराया कि कर्मचारियों की सुरक्षा मंत्रालय की सर्वोच्च प्राथमिकता है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “फर्स्ट सेफ्टी” दृष्टिकोण के अनुरूप है। उन्होंने DGMS की भूमिका पर बल दिया, जो सभी खनन संचालन में समान सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करता है। साथ ही उन्होंने केंद्र-राज्य समन्वय और DGMS के क्षेत्रीय कार्यालयों की सशक्त भागीदारी को प्रभावी सुरक्षा प्रवर्तन के लिए आवश्यक बताया।

श्रम सुधारों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए, करंडलाजे ने कहा कि चार श्रम संहिताएँ, जिन्होंने 29 कानूनों का समेकन और प्रतिस्थापन किया, विकसित भारत निर्माण और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तैयार की गई हैं, जिसमें संविदा श्रमिक भी शामिल हैं। उन्होंने DGMS से कहा कि वे संहिताओं के प्रति जागरूकता बढ़ाएं और खनन सुरक्षा को बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग करें। मंत्री ने DGMS को सुरक्षित और सतत खनन के लिए मजबूत करने हेतु मंत्रालय का पूर्ण समर्थन सुनिश्चित किया।

मंत्री ने प्रदर्शनी, पुरालेख अनुभाग और मॉडल गैलरी का भ्रमण किया, जिसमें भारत में खान सुरक्षा प्रथाओं की समृद्ध विरासत और विकास को प्रदर्शित किया गया। समारोह के हिस्से के रूप में, उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों ने वृक्षारोपण अभियान में भाग लिया, जो DGMS की पर्यावरणीय सततता प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

कार्यक्रम के दौरान DGMS की ऐतिहासिक उपलब्धियों, नियामक ढांचे और खनन सुरक्षा में तकनीकी प्रगति को दर्शाने वाली लघु फिल्म भी दिखाई गई। इस अवसर पर राज्य मंत्री ने DGMS का नया लोगो जारी किया, जो पुराने लोगो का प्रतिस्थापन है। इसके साथ ही DGMS थीम सॉन्ग और संगठन की यात्रा तथा योगदान को दर्शाने वाली डिजिटल कॉफी टेबल बुक भी जारी की गई। साथ ही खनन सुरक्षा में सर्वोत्तम प्रथाओं का डिजिटल संकलन/सौवेनियर भी प्रदर्शित किया गया।

एक महत्वपूर्ण पहल के तहत, रेस्क्यू टीम के सदस्यों को उनके साहस और आपातकालीन स्थितियों में खान मजदूरों की सुरक्षा में योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

DGMS, जिसकी स्थापना 1902 में हुई थी, भारत में खनन सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों के नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और खान मजदूरों की भलाई तथा खनन उद्योग के सतत विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।


गडकरी ने बायो-बिटुमेन को किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर बताया

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केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री, नितिन गडकरी ने कृषि अपशिष्ट को एक मूल्यवान राष्ट्रीय संसाधन में परिवर्तित करने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बायो-बिटुमेन भारत को विकसित भारत 2047 की दिशा में ले जाने के लिए एक परिवर्तनकारी कदम है। कृषि अपशिष्ट का उपयोग करके यह फसल जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करता है और सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करता है। 15% मिश्रण के साथ, भारत लगभग ₹4,500 करोड़ विदेशी मुद्रा बचा सकता है और आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है।

CSIR के “फार्म रिसिड्यू से रोड तक: बायो-बिटुमेन via पायरोलिसिस” तकनीकी हस्तांतरण समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा,

“आज भारत की सड़क अवसंरचना में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है, क्योंकि हमारा देश दुनिया में पहला है, जो व्यावसायिक रूप से बायो-बिटुमेन का उत्पादन कर रहा है।”

केंद्रीय मंत्री गडकरी ने CSIR और इसके समर्पित वैज्ञानिकों को बधाई दी और इस अग्रणी उपलब्धि को हासिल करने में लगातार समर्थन देने के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह का धन्यवाद भी किया।

गडकरी ने आगे कहा कि यह नवाचार किसानों को सशक्त बनाएगा, ग्रामीण आजीविका सृजित करेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा। बायो-बिटुमेन, उन्होंने कहा, वास्तव में मोदी सरकार की सतत विकास, आत्मनिर्भरता और पर्यावरणीय जिम्मेदार वृद्धि के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, और एक स्वच्छ और हरित भविष्य की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है।



ग्रामीण विकास मंत्रालय और डाक विभाग ने वित्तीय सेवाओं और बाजार पहुँच के लिए MoU पर हस्ताक्षर किए

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सुदूर ग्रामीण विकास में समावेशी और सतत वृद्धि को तेजी देने के महत्वपूर्ण कदम के रूप में, ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) और डाक विभाग ने आज ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय सेवाओं, लॉजिस्टिक्स और बाजार तक पहुँच को बढ़ाने के लिए सम्मिलन संस्थागत करने हेतु सहयोग समझौता (MoU) पर हस्ताक्षर किए। यह साझेदारी संघीय बजट 2025 के दृष्टिकोण को मूर्त रूप देती है, जिसमें भारत पोस्ट को ग्रामीण आर्थिक परिवर्तन के प्रमुख चालक के रूप में पुनःस्थापित करने पर जोर दिया गया है।

MoU पर 7 जनवरी 2026 को हस्ताक्षर किए गए, जिनमें माननीय केंद्रीय ग्रामीण विकास और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री,शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय संचार एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री, ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया की उपस्थिति रही। इस अवसर पर केंद्रीय ग्रामीण विकास और संचार राज्य मंत्री डॉ. चंद्रशेखर पेम्मासानी, कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर, तथा कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी भी उपस्थित थे। केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री कमलेश पासवान ने वर्चुअली भाग लिया। दोनों विभागों के वरिष्ठ अधिकारी भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

इस अवसर पर शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार Whole-of-Government दृष्टिकोण के तहत समन्वित प्रयासों से साझा राष्ट्रीय उद्देश्यों की दिशा में कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि यह प्रयास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व दृष्टि और समग्र विकास का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह दृष्टिकोण केवल अवसंरचना तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर आजीविका सृजन, गरिमा और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि मंत्रालयों और सशक्त ग्रामीण समुदायों के समन्वित प्रयासों से देश विकसित और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में निरंतर अग्रसर है।

अपने संबोधन में ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया ने कहा कि भारत पोस्ट पेमेंट्स बैंक (IPPB) ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाओं की अंतिम-मील डिलीवरी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने बताया कि सभी संबंधित संस्थानों को प्रशिक्षण, इलेक्ट्रॉनिक टैबलेट्स, पॉइंट-ऑफ़-सेल मशीन और प्रमाणन प्रदान किया जाएगा, जिससे वे विभिन्न वित्तीय सेवाओं और उत्पादों को सीधे घर-घर पहुंचा सकेंगे। इसमें डाकघर बचत योजनाएँ, सुकन्या समृद्धि योजना, नकद हस्तांतरण सेवाएँ सहित अन्य कई वित्तीय उत्पाद शामिल होंगे।

यह साझेदारी दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के ग्रामीण स्तर के संस्थागत नेटवर्क और भारत पोस्ट, IPPB और डाक सेवकों के व्यापक नेटवर्क को जोड़ती है। इस सम्मिलन से स्व-सहायता समूह (SHGs), महिला उद्यमियों, ग्रामीण उद्यमों और MSMEs को एकीकृत वित्तीय और लॉजिस्टिक सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएंगी।

MoU के तहत:

  • DAY-NRLM ग्रामीण SHG परिवारों में भारत पोस्ट के बचत, जमा, बीमा और पेंशन उत्पादों को अपनाने को बढ़ावा देगा।

  • मिशन SHG महिलाओं को Business Correspondents (BC Sakhis) के रूप में पहचानकर उनका प्रशिक्षण, प्रमाणन और तैनाती सुनिश्चित करेगा।

  • भारत पोस्ट, IPPB के माध्यम से अंतःसंपर्क समर्थन प्रदान करेगा, जिसमें ऑनबोर्डिंग, तकनीकी मॉनिटरिंग डैशबोर्ड, और कस्टमाइज्ड बीमा समाधान शामिल हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय सेवाओं तक अंतिम-मील पहुँच और गहरी होगी।

साझेदारी महिला-नेतृत्व वाले SHG उद्यमों के लिए नए बाजार अवसर भी खोलेगी, उन्हें भारत पोस्ट की लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम से जोड़ा जाएगा। मिशन SHG और फेडरेशन-स्तरीय उद्यमों की पहचान और क्षमता निर्माण में सहायता करेगा, जबकि भारत पोस्ट लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग और निर्यात सुविधा सेवाएँ प्रदान करेगा। इसके साथ ही SHG उत्पादों के प्रचार के लिए भारत पोस्ट नेटवर्क का उपयोग किया जाएगा।

इस MoU से वित्तीय समावेशन में वृद्धि, बाजार तक पहुँच में सुधार और ग्रामीण महिलाओं एवं उद्यमियों के लिए सतत आजीविका के अवसर पैदा होंगे, जो समावेशी विकास और विकसित भारत के दृष्टिकोण में योगदान देंगे।


भारत ने ‘फार्म रिसिड्यू से रोड तक’ बायो-बिटुमेन तकनीक का सफल तकनीकी हस्तांतरण किया, स्वच्छ और हरित हाईवे की दिशा में कदम

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“आज का दिन भारत के इतिहास में दर्ज हो जाएगा, क्योंकि देश ‘स्वच्छ, हरित हाईवे’ के युग में प्रवेश कर रहा है, इसके साथ ही CSIR‑सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टिट्यूट (CSIR-CRRI), नई दिल्ली और CSIR‑इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पेट्रोलियम, देहरादून (CSIR-IIP) द्वारा विकसित “Bio-Bitumen via Pyrolysis: फॉर्म रिसिड्यू से सड़क तक” तकनीक का सफलतापूर्वक तकनीकी हस्तांतरण हुआ।”

यह बात आज केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और CSIR उपाध्यक्ष, डॉ. जितेंद्र सिंह ने “Bio-Bitumen via Pyrolysis: फॉर्म रिसिड्यू से सड़क तक” तकनीकी हस्तांतरण समारोह को संबोधित करते हुए कही।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह दिन ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में याद रखा जाएगा। उन्होंने बताया कि भारत के हाईवे अब जीव-आधारित, पुनर्योजी और सर्कुलर इकोनॉमी समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। इस तकनीक से निर्मित सड़कें कम बजट में तैयार होंगी, अधिक टिकाऊ होंगी और पर्यावरणीय प्रदूषण से मुक्त होंगी।

उन्होंने इस पहल को “साइंस, सरकार और समाज का संयुक्त प्रयास” बताया, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विकसित भारत के लिए सुझाए गए Whole-of-Nation दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है।

मंत्री ने कहा कि बायो-बिटुमेन जैसी तकनीकें यह दर्शाती हैं कि वैज्ञानिक अनुसंधान सीधे राष्ट्रीय मिशनों जैसे स्वच्छता, आत्मनिर्भर भारत और आर्थिक स्वावलंबन में योगदान दे सकता है। उन्होंने कहा कि नवाचार को सही ढंग से संप्रेषित किया जाना चाहिए, ताकि इसे सभी हितधारक समझ सकें और अपनाएं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने आगे बताया कि CSIR की 37 प्रयोगशालाओं में कई सफलता की कहानियाँ हैं, और पिछले दशक में विज्ञान को नागरिकों, उद्योगों और राज्यों तक खुला करने पर जोर दिया गया है। उन्होंने बताया कि बायो-बिटुमेन कई चुनौतियों का समाधान एक साथ करता है – खेत की भूसी प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और आयात में कमी। वर्तमान में भारत अपनी बिटुमेन की लगभग 50% आवश्यकता आयात करता है, और बायो-बिटुमेन जैसी तकनीकें आयात पर निर्भरता कम करके घरेलू क्षमताओं को मजबूत करेंगी।

इस कार्यक्रम में फार्म रिसिड्यू के पायरोलिसिस से बायो-बिटुमेन का औद्योगिक स्तर पर तकनीकी हस्तांतरण प्रदर्शित किया गया। प्रक्रिया में धान की कटाई के बाद की भूसी का संग्रह, पैलेटाइजेशन, पायरोलिसिस के माध्यम से बायो-ऑइल का उत्पादन और फिर इसे पारंपरिक बिटुमेन के साथ मिश्रित करना शामिल है। विस्तृत प्रयोगशाला परीक्षणों में यह पाया गया कि पारंपरिक बिटुमेन का 20–30% सुरक्षित रूप से प्रतिस्थापित किया जा सकता है।

तकनीक का भौतिक, रियोलॉजिकल, रासायनिक और यांत्रिक परीक्षण किया गया, जिसमें रटिंग, क्रैकिंग, नमी से नुकसान और रेसिलिएंट मॉड्यूलस शामिल हैं। मेघालय के जोराबत–शिलांग एक्सप्रेसवे (NH-40) पर पहले ही 100 मीटर का ट्रायल स्ट्रेच सफलतापूर्वक बिछाया जा चुका है। इस तकनीक के लिए पेटेंट दायर किया गया है और कई उद्योगों को वाणिज्यिक कार्यान्वयन के लिए शामिल किया गया है।

मंत्री ने CSIR टीम को बधाई देते हुए बायो-बिटुमेन नवाचार को वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि इससे हर साल 25,000–30,000 करोड़ रुपये के बिटुमेन आयात को प्रतिस्थापित करने की आर्थिक क्षमता है। उन्होंने क्षेत्र-विशेष और संसाधन आधारित अनुसंधान पर भी जोर दिया।

मंत्री ने यह भी साझा किया कि उन्होंने सड़क निर्माण में स्टील स्लैग, वेस्ट प्लास्टिक और बायो-फ्यूल जैसी वैकल्पिक सामग्रियों के उपयोग का अनुभव किया है। उन्होंने कहा कि सिद्ध तकनीक, आर्थिक व्यवहार्यता, कच्चा माल उपलब्धता और बाज़ार योग्यता का सम्मिलन सफल विस्तार के लिए आवश्यक है। उन्होंने राष्ट्रीय हाईवे मानकों में बायो-बिटुमेन के समावेश के लिए पूर्ण संस्थागत समर्थन का आश्वासन दिया।

CSIR के महानिदेशक एवं DSIR सचिव, एन. कलाइसेल्वी ने कहा कि यह भारतीय विज्ञान के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने बताया कि भारत दुनिया का पहला देश बन गया है, जिसने बायो-बिटुमेन तकनीक को उसी वर्ष औद्योगिक और वाणिज्यिक स्तर पर ले जाने में सफलता प्राप्त की।

उन्होंने बताया कि बायोमास का पायरोलिसिस कई मूल्य श्रृंखलाएं उत्पन्न करता है – रोड के लिए बायो-बाइंडर, ऊर्जा-कुशल गैसीय ईंधन, बायो-पेस्टिसाइड फ्रैक्शन और बैटरियों, जल शुद्धिकरण और उन्नत सामग्री के लिए उच्च-ग्रेड कार्बन। यह प्रक्रिया उत्सर्जन-मुक्त, लागत-कुशल और भविष्य-तैयार है। उन्होंने नीति स्तर पर बायो-बिटुमेन के मिश्रण का सुझाव दिया ताकि इसे संपूर्ण भारत में लागू किया जा सके।

समारोह में CSIR-CRRI और CSIR-IIP के वरिष्ठ नेतृत्व, पूर्व निदेशक, वैज्ञानिक, उद्योग भागीदार और मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित थे, जो विज्ञान, सरकार और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी को दर्शाता है। यह तकनीकी हस्तांतरण कार्यक्रम भारत की सतत अवसंरचना, स्वदेशी नवाचार और बायो-आधारित आर्थिक भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूती से स्थापित करता है, और देश को स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर हाईवे की दिशा में अग्रसर करता है।


SAI ने नई दिल्ली में कॉम्बैट स्पोर्ट्स कोचों के लिए चार दिवसीय स्पोर्ट्स साइंस कार्यशाला का शुभारंभ किया

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भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) ने नई दिल्ली स्थित अपने स्पोर्ट्स साइंस डिविजन में कॉम्बैट स्पोर्ट्स कोचों के लिए चार दिवसीय स्पोर्ट्स साइंस कार्यशाला का शुभारंभ किया।

इस कार्यशाला में बॉक्सिंग, कुश्ती और जूडो सहित प्रमुख कॉम्बैट स्पोर्ट्स क्षेत्रों के SAI कोच भाग ले रहे हैं। इसका उद्देश्य दैनिक कोचिंग प्रथाओं में खेल विज्ञान (Sports Science) का समावेश मजबूत करना है।

यह कार्यशाला इमर्सिव और प्रायोगिक (hands-on) कार्यक्रम के रूप में डिजाइन की गई है और इसमें प्रशिक्षण पद्धतियों में वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुप्रयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया है, विशेष रूप से कॉम्बैट स्पोर्ट्स के लिए शक्ति और कंडीशनिंग मॉडलों पर।

कोचों को फंक्शनल स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, प्लायोमेट्रिक्स, पीरियडाइज्ड रेजिस्टेंस ट्रेनिंग प्रोग्राम और व्यायाम फिजियोलॉजी के मूल सिद्धांत, जो उच्च स्तरीय प्रदर्शन के लिए आवश्यक हैं, में प्रशिक्षित किया जा रहा है।

ब्रिगेडियर (डॉ.) बिभु कल्याण नायक, निदेशक-संयुक्त प्रमुख, स्पोर्ट्स साइंस डिविजन, SAI ने कहा,
“माननीय केंद्रीय खेल मंत्री डॉ. मनसुख मंडाविया और सचिव (खेल) ने लगातार जोर दिया है कि कोचों को खेल विज्ञान में प्रशिक्षित किया जाए ताकि ये सिद्धांत दैनिक प्रशिक्षण में लागू हों। ऐसे फोकस्ड engagements, जिन्हें स्पोर्ट्स साइंटिस्ट्स द्वारा समर्थन मिलता है, भारत के पदक संभावनाओं में सकारात्मक योगदान देंगे। हमारी दृष्टि एथलीट-केंद्रित, कोच-नेतृत्व और स्पोर्ट्स साइंस द्वारा समर्थित है।”

कार्यशाला में कॉम्बैट स्पोर्ट्स में आम चोटों, विशेषकर कंधे संबंधी चोटों, की रोकथाम और प्रबंधन पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इसमें साक्ष्य-आधारित वॉर्म-अप प्रोटोकॉल, स्ट्रेंथ और स्टेबिलिटी ट्रेनिंग और वैज्ञानिक लोड-मैनेजमेंट रणनीतियाँ शामिल हैं।

कार्यशाला में स्पोर्ट्स न्यूट्रिशन, रिकवरी साइंस, एंटी-डोपिंग जागरूकता और एप्लाइड स्पोर्ट्स साइकोलॉजी पर समर्पित मॉड्यूल भी शामिल हैं, जो दीर्घकालिक एथलीट प्रदर्शन और करियर लम्बाई के लिए समग्र दृष्टिकोण को मजबूत करते हैं।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. (डॉ.) दीपक जोशी, निदेशक, स्पोर्ट्स इंजरी सेंटर (SIC), वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एवं सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली ने कहा कि स्पोर्ट्स साइंस, स्पोर्ट्स मेडिसिन और चोट प्रबंधन का समन्वित समावेश एक एथलीट के करियर की दिशा बदल सकता है।

उन्होंने कहा,

“यह सहयोग भारत की खेल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए वरदान साबित होगा। SAI द्वारा संदर्भित एथलीटों को प्राथमिक उपचार, निरंतर क्लिनिकल प्रबंधन और प्रशिक्षण एवं प्रतियोगिता में सहज वापसी का मार्ग मिलेगा।”

इस सहयोग को आगे बढ़ाते हुए, SAI और SIC के बीच स्मारक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाने की योजना है, जिसे माननीय युवा मामले और खेल मंत्री की प्राथमिक स्वीकृति मिली है।

इस प्रस्तावित ढांचे के तहत, SIC उन्नत खेल चिकित्सा और सर्जिकल हस्तक्षेप संभालेगा, जबकि SAI एप्लाइड स्पोर्ट्स साइंस, पुनर्वास और रिटर्न-टू-प्ले प्रोटोकॉल का प्रबंधन करेगा। इससे भारतीय एथलीटों को प्राथमिक देखभाल और सुरक्षित प्रतियोगिता में वापसी सुनिश्चित होगी।


मुख्यमंत्री निवास में 8 जनवरी गुरुवार को होगा जनदर्शन

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रायपुर- मुख्यमंत्री निवास कार्यालय रायपुर में 8 जनवरी गुरुवार को दोपहर 12 बजे से जनदर्शन का आयोजन किया जाएगा। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय इस अवसर पर प्रदेशवासियों से सीधे संवाद करेंगे और उनकी समस्याओं का निराकरण करेंगे। मुख्यमंत्री साय ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि जनदर्शन में प्राप्त प्रत्येक आवेदन का त्वरित और संवेदनशील निराकरण सुनिश्चित किया जाए, ताकि लोगों को समयबद्ध समाधान मिल सके।


धुन के पक्के प्रदीप ने अपनी जिद से बदली किस्मत की तस्वीर

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प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना बनी आत्मनिर्भरता की राह

रायपुर- धुन के पक्के लोग अपने संकल्प और परिश्रम से न केवल स्वयं का जीवन संवारते हैं, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा बनते हैं। वैशाली नगर, राजनांदगांव निवासी प्रदीप कुमार रामराव देशपांडे ने अपने दृढ़ इरादों से यह सिद्ध कर दिखाया है कि सही योजना और मेहनत के सहारे आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव रखी जा सकती है।

योजना के तहत 10 लाख रूपए तक सब्सिडी

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) भारत सरकार की एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जो खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के छोटे उद्यमियों (सूक्ष्म उद्यमों) को सशक्त बनाने, उन्हें औपचारिक बनाने और बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई है, जिसके तहत नए और मौजूदा उद्यमों को ऋण-आधारित सब्सिडी (35 प्रतिशत तक, अधिकतम 10 लाख रुपये), ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता, सामान्य बुनियादी ढांचा और प्रशिक्षण जैसी मदद मिलती है, जिससे वे आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल के तहत प्रतिस्पर्धा कर सकें और आय बढ़ा सकें। 

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना बनी आत्मनिर्भरता की राह 

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के अंतर्गत प्रदीप कुमार रामराव देशपांडे ने अपना उद्योग प्रारंभ कर स्वरोजगार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया। इस योजना ने उन्हें न केवल आर्थिक सहायता प्रदान की, बल्कि नवाचार और उद्यमिता के लिए आवश्यक मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराया।

लघुवनोपज आधारित उद्योग से मिली आर्थिक मजबूती 

प्रदेश में उपलब्ध लघुवनोपज की व्यापक संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्होंने चिरौंजी, हर्रा एवं बहेरा पर आधारित प्रोसेसिंग उद्योग की स्थापना की। इस उद्योग के लिए मशीन एवं शेड निर्माण हेतु कुल 5 लाख 50 हजार रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ, जिसमें से प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के तहत 2 लाख 13 हजार 500 रुपये का अनुदान प्राप्त हुआ।

महिला स्वसहायता समूह को मिला स्थायी रोजगार 

उद्योग की स्थापना के साथ ही देशपांडे ने कौरिनभाठा स्थित संस्कारधानी महिला कृषक अभिरुचि स्वसहायता समूह की महिलाओं को रोजगार से जोड़ा। इससे महिलाओं को नियमित आय का साधन मिला और वे आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुईं, जिससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में भी सकारात्मक परिवर्तन आया।

आधुनिक मशीनों से बढ़ी उत्पादन और मूल्य संवर्धन क्षमता 

योजना से प्राप्त राशि का उपयोग कर उन्होंने आईटीआई मुंबई से चिरौंजी डिकॉल्डीकेटर मशीन क्रय की। इस मशीन के माध्यम से चिरौंजी का छिलका अलग कर गिरी निकाली जाती है, वहीं छिलकों से चारकोल का निर्माण किया जा रहा है। इसके साथ ही चिरौंजी, हर्रा एवं बहेरा की गिरी से तेल निष्कर्षण तथा हर्रा-बहेरा डिकॉल्डीकेटर मशीन द्वारा छाल पृथक्करण का कार्य भी किया जा रहा है।

सोलर ऊर्जा से संचालित प्रोसेसिंग यूनिट 

ग्रामीण एवं वनीय क्षेत्रों में विद्युत आपूर्ति की असुविधा को ध्यान में रखते हुए देशपांडे ने अपने प्रोसेसिंग यूनिट को सोलर प्लांट से संचालित किया है। सोलर ऊर्जा के उपयोग से बिजली बिल शून्य हो गया है और उत्पादन कार्य में निरंतरता बनी हुई है, जिससे लागत में भी उल्लेखनीय कमी आई है।

चार राज्यों तक विस्तारित कारोबार, सालाना 4 लाख की आय 

चिरौंजी, हर्रा और बहेरा उत्पादों की बाजार में निरंतर मांग के चलते उनका व्यवसाय अब छत्तीसगढ़ के साथ-साथ महाराष्ट्र, झारखंड और ओडिशा तक विस्तारित हो चुका है। इस व्यवसाय से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 4 लाख रुपये की आय प्राप्त हो रही है, जिससे उनका जीवनस्तर बेहतर हुआ है।

वन संरक्षण, आजीविका और जागरूकता का समन्वय

इस पहल से वनीय क्षेत्रों में लघुवनोपज के संग्रहण, पौध संरक्षण एवं सतत आजीविका के प्रति जागरूकता बढ़ी है। स्वसहायता समूह की महिलाओं को रोजगार मिलने से वे आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं।

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के प्रति व्यक्त किया आभार 

प्रदीप कुमार रामराव देशपांडे ने कहा कि प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना स्वरोजगार को बढ़ावा देने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रही है। उन्होंने इस योजना के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया।


विशेष लेख-सशक्त मानसिकता से आत्मनिर्भरता की ओर- पोषण निर्माण में अहम भूमिका निभा रही हैं सूरजपुर की महिलाएं

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रायपुर- आर्थिक रूप से सशक्तिकरण की नींव सशक्त मानसिकता पर आधारित होती है। दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास व्यक्ति को सफलता की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। सूरजपुर जिले की स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने इस सोच को व्यवहार में उतारते हुए आत्मनिर्भरता की एक सशक्त मिसाल प्रस्तुत की है। ये महिलाएं न केवल स्वयं सशक्त बन रही हैं, बल्कि जिले की महिलाओं एवं बच्चों को पोषण उपलब्ध कराने के अभियान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

पोषण और महिलाओं का सशक्तिकरण दोनों होता है

पोषण आहार (रेडी-टू-ईट या RTE) निर्माण संयंत्र सरकार द्वारा संचालित ऐसी इकाइयाँ हैं, जो आंगनवाड़ियों और अन्य योजनाओं के तहत बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरी बालिकाओं के लिए पौष्टिक, पहले से तैयार भोजन बनाती हैं, जिसे महिला स्व-सहायता समूहों (SHGs) द्वारा चलाया जाता है, जिससे पोषण और महिलाओं का सशक्तिकरण दोनों होता है, जिसमें गेहूं, दालें, और दूध जैसे घटक शामिल होते हैं, जो प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। 

स्वादिष्ट एवं पौष्टिक नमकीन दलिया तथा मीठा शक्ति आहार का निर्माण 

जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं एवं बच्चों को गुणवत्तापूर्ण पोषण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तत्काल उपभोग हेतु तैयार पोषण आहार (रेडी टू ईट) निर्माण संयंत्र का शुभारंभ किया गया है। इन संयंत्रों में स्वादिष्ट एवं पौष्टिक नमकीन दलिया तथा मीठा शक्ति आहार का निर्माण किया जा रहा है, जो विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘डी’, थायमिन, राइबोफ्लेविन, नियासिन, पाइरीडॉक्सिन, फोलिक अम्ल, कोबालामिन, लोह तत्व (आयरन), कैल्शियम एवं जिंक जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर है।

तीनों संयंत्रों में 32 महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से पोषण आहार निर्माण कार्य में संलग्न

जिले प्रशासन द्वारा जिले में कुल 07 पोषण आहार निर्माण संयंत्र स्थापित किए गए है। यहां वर्तमान में भैयाथान, प्रतापपुर एवं सूरजपुर विकासखंड में तीन संयंत्रों का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है। इन तीनों संयंत्रों में 32 महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से पोषण आहार निर्माण कार्य में संलग्न हैं। निर्मित पोषण आहार आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों को निःशुल्क प्रदान किया जा रहा है। इस प्रकार स्व-सहायता समूहों की महिलाएं मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुदृढ़ीकरण में अप्रत्यक्ष किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण बात है कि पोषण आहार के निर्माण के साथ-साथ उसके वितरण की भी जिम्मेदारी भी महिला स्व-सहायता समूहों को सौंपी गई है।

भैयाथान विकासखंड में 15 स्व-सहायता समूह

सूरजपुर विकासखंड में 15 स्व-सहायता समूह तथा प्रतापपुर विकासखंड में 13 स्व-सहायता समूह सक्रिय रूप से वितरण कार्य में अपनी भूमिका निभा रही है। इन समूहों के माध्यम से कुल 430 महिलाएं आंगनबाड़ी केंद्रों तक पोषण आहार वितरण कार्य में सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। इस योजना से महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। मानसिक रूप से सशक्त ये महिलाएं अब घरेलू कार्यों के साथ-साथ आजीविका से जुड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। यह पहल न केवल निश्चित रूप से जिले में पोषण स्तर सुधारने में सहायक सिद्ध होगी, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत कर रही है।


जल शक्ति मंत्रालय ने ग्रामीण भारत में फेकल स्लज प्रबंधन पर राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के साथ वर्चुअल बातचीत आयोजित की

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जल शक्ति मंत्रालय ने 6 जनवरी 2026 को विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जिलों के साथ फेकल स्लज प्रबंधन (FSM) के विभिन्न मॉडल पर वर्चुअल बातचीत का आयोजन किया। यह पहल स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत लागू FSM पहलों के अनुभव साझा करने और ज्ञान आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई।

इस बातचीत की अध्यक्षता माननीय केंद्रीय जल शक्ति मंत्री, C. R. पाटिल ने की। इसके साथ ही राज्य मंत्री, V. सोमन्ना, पेयजल और स्वच्छता विभाग के सचिव अशोक के.के. मीना, और संयुक्त सचिव एवं SBM(G) मिशन निदेशक,ऐश्वर्या सिंह भी इस बातचीत में शामिल हुए। विभिन्न राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के जिला कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ, स्व-सहायता समूह (SHG) सदस्य, पंचायत सदस्य, राज्य मिशन निदेशक और संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारी भी वर्चुअली जुड़े।

इस बातचीत का उद्देश्य देशभर के सफल और स्केलेबल FSM मॉडल साझा करना, राज्यों/जिलों में क्रॉस-लर्निंग को बढ़ावा देना और सुरक्षित स्वच्छता प्रणालियों के महत्व को उजागर करना था। इसमें ध्यान सिर्फ शौचालय निर्माण तक सीमित न रहते हुए पूरे स्वच्छता मूल्य श्रृंखला पर केंद्रित था।

प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए:

  • गुजरात, सिक्किम, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, लद्दाख और त्रिपुरा के प्रतिनिधियों ने विभिन्न मॉडल प्रस्तुत किए।

  • इन मॉडलों में इन-सिटू ट्रीटमेंट मॉडल, सामुदायिक समाधान, SHG और पंचायत के माध्यम से FSTP का संचालन और रखरखाव, तथा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच FSM संबंध शामिल थे।

  • सुरक्षित संग्रहण, परिवहन, उपचार और पुन: उपयोग की गतिविधियों पर चर्चा हुई।

  • कई मॉडलों ने समुदाय स्तर पर रोजगार सृजन के अवसर भी प्रदान किए।

एक उल्लेखनीय उदाहरण ओडिशा के खोर्दा जिले से आया, जहाँ ट्रांसजेंडर-नेतृत्व वाली SHG अपने FSTP का संचालन और रखरखाव कर रही है। यह पहल दिखाती है कि स्वच्छता सेवा वितरण समान और सतत हो सकती है, साथ ही ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए गरिमापूर्ण रोजगार अवसर भी सृजित कर सकती है।

अन्य प्रमुख FSM मॉडल में शामिल हैं:

  • गुजरात के डांग जिले में दूरदराज़ के आदिवासी क्षेत्रों में ट्विन-पिट शौचालयों का बड़े पैमाने पर उपयोग।

  • सिक्किम के मंगान जिले में सिंगल-पिट से ट्विन-पिट शौचालयों का रिट्रोफिटिंग, जिससे दूर-दराज़ और पहाड़ी क्षेत्रों में FSM अनुपालन सुनिश्चित हो।

  • मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के कालिबिल्लोद ग्राम पंचायत में भारत का पहला ग्रामीण FSTP, जहाँ उपचारित जल में मछली पालन और MRF के माध्यम से वित्तीय संसाधन जुटाए जा रहे हैं।

  • कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में क्लस्टर-आधारित FSTP मॉडल, जिसमें SHG का संचालन और रखरखाव में सक्रिय योगदान।

  • लद्दाख के लेह जिले में एकोसैन टॉयलेट्स का निर्माण चरम ठंड, रेगिस्तानी और उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में।

  • त्रिपुरा के गोमती जिले में मोबाइल बायो-टॉयलेट्स का संचालन और रखरखाव SHG द्वारा किया जा रहा है, जो सार्वजनिक आयोजनों और मेलों के लिए उपयोगी है।

बातचीत में समुदाय के सदस्य भी शामिल थे, जिन्होंने सीधे अपने अनुभव साझा किए। प्रतिभागियों को स्थानीय भाषाओं में संवाद करने का अवसर दिया गया, जिससे अनुभव साझा करने में सहजता और उत्साह बढ़ा।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री C. R. पाटिल ने प्रतिभागियों की सराहना करते हुए कहा कि ये नवाचारपूर्ण मॉडल न केवल स्वच्छ भारत में योगदान करते हैं, बल्कि आय और रोजगार के अवसर भी सृजित करते हैं। उन्होंने कहा कि इन पहलों को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लागू किया गया, जो दिखाता है कि चुनौतियाँ स्थायी समाधान को प्रेरित करती हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि FSM ग्रामीण स्वच्छता का महत्वपूर्ण घटक है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छ वातावरण के लिए आवश्यक है, साथ ही संपूर्ण स्वच्छता सुनिश्चित करता है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि समुदाय की भागीदारी, SHG, पंचायत और अन्य हितधारकों की संलग्नता, और संदर्भ-विशेष, आवश्यकता आधारित और उपयुक्त तकनीकों को अपनाना FSM समाधानों को व्यवहार्य, समावेशी और दीर्घकालिक बनाने के लिए आवश्यक है। उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, स्वच्छता के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ा है और गांधीजी के स्वच्छता और जन सहभागिता के संदेश को देश के हर कोने तक पहुँचाया है।

जल शक्ति मंत्रालय ने पुनः अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की कि वह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा ग्रामीण भारत में FSM के तहत किए जा रहे कार्यों को सुदृढ़ करने, तकनीकी सहायता, क्षमता निर्माण और नवाचार, समुदाय-नेतृत्व वाले एवं समावेशी मॉडलों के प्रचार-प्रसार के माध्यम से समर्थन करता रहेगा।


भारत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य में 50,000 NQAS प्रमाणित सुविधाओं का मील का पत्थर पार किया

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भारत सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हासिल किया है। 31 दिसंबर 2025 तक, पूरे भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 50,373 सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (NQAS) के तहत प्रमाणित हो चुकी हैं। यह मानक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) द्वारा स्थापित एक समग्र गुणवत्ता ढांचा है।

यह उपलब्धि भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए गर्व का क्षण है, क्योंकि देश ने NQAS प्रमाणन में 50,000 की संख्या पार कर ली है, और सरकार की गुणवत्ता, सुरक्षा और रोगी-केंद्रित देखभाल के प्रति अडिग प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। यह सभी नागरिकों, विशेषकर गरीब, कमजोर और हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए उच्च-गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

NQAS की यात्रा 2015 में केवल 10 प्रमाणित स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ शुरू हुई थी, जो प्रारंभ में जिला अस्पतालों पर केंद्रित थी ताकि सुरक्षित, रोगी-केंद्रित और गुणवत्ता-निश्चित सेवाएं सुनिश्चित की जा सकें। समय के साथ, यह ढांचा उप-जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), आयुष्मान आरोग्य मंदिर–PHC, AAM–UPHC और AAM–Sub Health Centre तक विस्तारित हुआ, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य के सभी स्तरों में गुणवत्ता आश्वासन सुनिश्चित किया जा सके। वर्चुअल असेसमेंट्स के परिचय ने भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में गुणवत्ता कवरेज को तेजी से बढ़ाया।

प्रमाणित सुविधाओं की संख्या दिसंबर 2023 में 6,506 से बढ़कर दिसंबर 2024 में 22,786 और दिसंबर 2025 में 50,373 हो गई—यह एक साल में असाधारण विस्तार को दर्शाता है। इसमें 48,663 आयुष्मान आरोग्य मंदिर (SHC, PHC, UPHC) और 1,710 माध्यमिक देखभाल सुविधाएं (CHC, SDH, DH) शामिल हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के सभी स्तरों में गुणवत्ता की संस्थागत उपस्थिति को दर्शाता है।

भारत की सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) की दिशा, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 द्वारा निर्देशित है, का उद्देश्य गुणवत्ता, किफायती स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बिना वित्तीय बोझ के सुनिश्चित करना है। NQAS के इस तेज़ विस्तार में निरंतर क्षमता निर्माण, डिजिटल नवाचार, मूल्यांकनकर्ताओं की संख्या में वृद्धि और सतत गुणवत्ता सुधार प्रणाली जैसी बहुपक्षीय रणनीतियों को अपनाया गया।

50,000 NQAS प्रमाणन पार करना भारत की सामूहिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है कि देश एक सुदृढ़, आत्मनिर्भर और उच्च गुणवत्ता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का निर्माण कर रहा है। यह उपलब्धि आत्मनिर्भर भारत की भावना और “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” के मार्गदर्शक सिद्धांतों को दर्शाती है, और यह पुष्टि करती है कि गुणवत्ता स्वास्थ्य देखभाल भारत के विकास का केंद्र है।

भारत सरकार NQAS प्रमाणन को बनाए रखने और और अधिक विस्तारित करने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि गुणवत्ता सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की एक अंतर्निहित और स्थायी विशेषता बन जाए। इसी दिशा में, देश ने मार्च 2026 तक कम से कम 50% सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का NQAS प्रमाणन हासिल करने का अंतरिम लक्ष्य निर्धारित किया है, जो बड़े पैमाने पर गुणवत्ता, सुरक्षा और रोगी-केंद्रित देखभाल को संस्थागत रूप देने की सरकार की प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है।


राजस्थान क्षेत्रीय एआई प्रभाव सम्मेलन 2026 आयोजित, शासन और नवाचार में एआई की भूमिका पर हुआ मंथन

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राजस्थान क्षेत्रीय एआई प्रभाव सम्मेलन मंगलवार, 06 जनवरी 2026 को आयोजित किया गया, जिसमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर के नेतृत्व, नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के नेताओं, स्टार्टअप्स और शिक्षाविदों ने भाग लिया। सम्मेलन में शासन, अवसंरचना, नवाचार और कार्यबल विकास में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की परिवर्तनकारी भूमिका पर विचार-विमर्श किया गया। यह सम्मेलन 15 से 20 फरवरी 2026 के बीच आयोजित होने वाले इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट की पूर्वपीठिका के रूप में आयोजित किया गया।

सम्मेलन में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव (वर्चुअल माध्यम से), केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद, तथा राजस्थान सरकार के आईटी एवं संचार मंत्री कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ सहित MeitY और राजस्थान सरकार के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। उनकी सहभागिता ने राजस्थान को भारत की एआई-आधारित विकास यात्रा में एक प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में स्थापित करने हेतु केंद्र–राज्य सहयोग की मजबूती को रेखांकित किया।

सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा,

“जिस स्तर का परिवर्तन औद्योगिक क्रांति, बिजली, कंप्यूटर, सेमीकंडक्टर, इंटरनेट और मोबाइल प्रौद्योगिकी से आया था, वही परिवर्तन अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से देखने को मिलेगा। प्रधानमंत्री का स्पष्ट लक्ष्य प्रौद्योगिकी का लोकतंत्रीकरण करना है, ताकि एआई-संचालित बुद्धिमत्ता कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि हर व्यक्ति, हर परिवार और हर उद्यम तक पहुँचे। इसी दिशा में आज एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई है, जिसके तहत 10 लाख युवाओं को एआई कौशल में प्रशिक्षित किया जाएगा, ताकि भारत का युवा वर्ग इस नए तकनीकी युग के लिए पूरी तरह तैयार हो सके।”

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने कहा,

“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृढ़ विश्वास है कि प्रौद्योगिकी का लोकतंत्रीकरण होना चाहिए। इसी दृष्टि से सरकार ने इंडिया एआई मिशन के तहत ₹10,000 करोड़ के निवेश की प्रतिबद्धता की है, ताकि कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में एआई का उपयोग किया जा सके। इसका उद्देश्य नागरिकों की आय बढ़ाना, जीवन सुगमता में सुधार करना और जिम्मेदार व समावेशी एआई के माध्यम से देश की समग्र उत्पादकता को बढ़ावा देना है।”

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने कहा,

“आज राजस्थान ई-गवर्नेंस और समावेशन से आगे बढ़ते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग में अग्रणी बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा रहा है। एआई हमारे देश की यात्रा का अगला बड़ा चरण है। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए हमने एआई और एमएल नीति लागू की है। यह नीति एआई प्रणालियों को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाएगी। एआई और मशीन लर्निंग के माध्यम से सार्वजनिक सेवा वितरण को तेज़, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बनाया जा सकता है, जिससे प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी और नवाचार-आधारित आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।”

सम्मेलन का एक प्रमुख आकर्षण राष्ट्रीय और राज्य स्तर की कई एआई पहलों की घोषणा और शुभारंभ रहा, जिसने एआई-आधारित नवाचार और शासन के केंद्र के रूप में राजस्थान की भूमिका को और सुदृढ़ किया। इनमें प्रमुख पहलें निम्नलिखित हैं:

  • YUVA AI for All – राष्ट्रीय एआई साक्षरता कार्यक्रम, भारत सरकार की प्रमुख पहल, जिसे MeitY के अंतर्गत IndiaAI Mission द्वारा संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य छात्रों और युवाओं में एआई की आधारभूत समझ विकसित करना है। राष्ट्रीय युवा दिवस (12 जनवरी) के अवसर पर यह अभियान लाखों शिक्षार्थियों को AI 101 पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए प्रेरित करेगा, जो विकसित भारत और समावेशी एआई अपनाने के दृष्टिकोण से जुड़ा है।

  • राजस्थान एआई/एमएल नीति 2026 का शुभारंभ, जिसका उद्देश्य शासन को मजबूत करना, आर्थिक विकास को गति देना, अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देना तथा उच्च-मूल्य रोजगार सृजित करना है। इसके साथ ही राजस्थान एआई पोर्टल भी लॉन्च किया गया।

  • iStart लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (LMS) का शुभारंभ, जो राज्य में कौशल विकास, उद्यमिता और नवाचार को समर्थन देगा।

  • राजस्थान AVGC-XR पोर्टल, जो एनीमेशन, वीएफएक्स, गेमिंग, कॉमिक्स और एक्सटेंडेड रियलिटी पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करेगा। इस अवसर पर भारत और राजस्थान की एआई दृष्टि को प्रदर्शित करने वाला एक एआई-थीम आधारित वीडियो भी जारी किया गया।

  • संस्थागत सहयोग को मजबूत करने के लिए गूगल, आईआईटी दिल्ली, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय जोधपुर और स्किल डेवलपमेंट नेटवर्क (वाधवानी फाउंडेशन) के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए, जिससे एआई अनुसंधान, कौशल विकास, नैतिक ढांचे और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिलेगा।

एक उच्चस्तरीय रणनीतिक सत्र में MeitY के अतिरिक्त सचिव, IndiaAI Mission के सीईओ एवं एनआईसी के महानिदेशक अभिषेक सिंह और एनवीडिया के दक्षिण एशिया प्रबंध निदेशक विशाल धूपर के बीच संवाद हुआ, जिसका संचालन प्राइमस पार्टनर्स के प्रबंध निदेशक समीर जैन ने किया। इस चर्चा में एआई अवसंरचना के लोकतंत्रीकरण, सार्वजनिक–निजी सहयोग, बड़े पैमाने पर नवाचार और वैश्विक एआई सेफ्टी कॉमन्स के निर्माण पर भारत की रणनीति पर विचार किया गया।

MeitY की वैज्ञानिक ‘जी’ एवं IndiaAI Mission की सीओओ कविता भाटिया ने IndiaAI Mission का अवलोकन प्रस्तुत किया और India AI Impact Summit 2026 की प्राथमिकताओं एवं दृष्टि को साझा किया।

सम्मेलन में “वैश्विक एआई, राष्ट्रीय एआई और क्षेत्रीय एआई पर परिप्रेक्ष्य” विषय पर एक सत्र भी आयोजित किया गया, जिसे आईआईटी जोधपुर के प्रोफेसर अविनाश शर्मा ने संबोधित किया। उन्होंने बताया कि क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान किस प्रकार वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक और संदर्भ-संवेदनशील एआई समाधानों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसके साथ ही समानांतर विषयगत सत्रों में शासन, अवसंरचना, नवाचार, नैतिकता और रोजगार जैसे क्षेत्रों में एआई के व्यावहारिक अनुप्रयोगों पर चर्चा की गई।

राजस्थान क्षेत्रीय एआई प्रभाव सम्मेलन ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 की दिशा में एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय पड़ाव के रूप में कार्य किया और सार्वजनिक हित, समावेशी विकास तथा सतत प्रगति के लिए एआई के उपयोग के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ किया।

भारतीय नौसेना का प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए दीर्घ दूरी प्रशिक्षण तैनाती पर रवाना

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भारतीय नौसेना के प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (First Training Squadron – 1TS) के जहाज — आईएनएस तिर, शार्दुल, सुजाता और आईसीजीएस सारथी — 110वें एकीकृत अधिकारी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम (Integrated Officers’ Training Course – IOTC) के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के अंतर्गत दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए दीर्घ दूरी प्रशिक्षण तैनाती (Long Range Training Deployment – LRTD) पर प्रस्थान करेंगे।

इस तैनाती के तहत स्क्वाड्रन सिंगापुर, इंडोनेशिया और थाईलैंड में बंदरगाह यात्राएं करेगा। इस तैनाती का उद्देश्य अधिकारी प्रशिक्षुओं को व्यापक परिचालन और अंतर-सांस्कृतिक अनुभव प्रदान करना है, साथ ही भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ तथा मुक्त, खुले और समावेशी हिंद महासागर क्षेत्र की परिकल्पना के अनुरूप दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ भारत की सतत समुद्री सहभागिता को सुदृढ़ करना है।

इन बंदरगाह यात्राओं के दौरान मेजबान नौसेनाओं और समुद्री एजेंसियों के साथ विभिन्न पेशेवर संवाद, प्रशिक्षण अभ्यास और सहयोगात्मक गतिविधियाँ आयोजित की जाएंगी। इनमें संरचित प्रशिक्षण आदान-प्रदान, क्रॉस-डेक विज़िट, विषय विशेषज्ञों के साथ संवाद और संयुक्त समुद्री साझेदारी अभ्यास शामिल होंगे।

इन गतिविधियों का उद्देश्य आपसी संचालनात्मक समन्वय (इंटरऑपरेबिलिटी), पारस्परिक विश्वास और समझ को और अधिक मजबूत करना है, साथ ही समुद्र में श्रेष्ठ प्रथाओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।

110वें एकीकृत अधिकारी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में छह अंतरराष्ट्रीय अधिकारी प्रशिक्षु भी शामिल हैं, जो मित्र देशों के कार्मिकों के क्षमता निर्माण और व्यावसायिक प्रशिक्षण के प्रति भारतीय नौसेना की सतत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

इसके अतिरिक्त, इस तैनाती के लिए भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना के कार्मिक भी जहाजों पर सवार हैं, जिससे तीनों सेनाओं के बीच संयुक्तता और आपसी समन्वय को और अधिक मजबूती मिलेगी।

यह दीर्घ दूरी प्रशिक्षण तैनाती प्रशिक्षण उत्कृष्टता पर भारतीय नौसेना के विशेष जोर को रेखांकित करती है, साथ ही क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा के लिए समुद्री कूटनीति, सद्भावना और सहयोगात्मक दृष्टिकोण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।



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