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जंतर-मंतर छात्र प्रदर्शन: यौन उत्पीड़न की शिकायतों की प्राथमिकता से जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट का पैनल

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नई दिल्ली- दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण निर्देश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन शिकायतों की जांच के लिए अलग से नई कार्यवाही शुरू करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इस पूरे मामले की जांच के लिए पहले ही हाई-पावर्ड एन्क्वायरी कमेटी (HPEC) गठित की जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने समिति को महिला प्रदर्शनकारियों की यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायतों की प्राथमिकता के आधार पर जांच करने और जल्द से जल्द अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।

20 जुलाई के प्रदर्शन से जुड़ा है मामला

यह मामला 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर हुए NEET संबंधी छात्र प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसा को लेकर कई आरोप सामने आए थे। इनमें महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार, छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न के आरोप भी शामिल हैं।

इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही एक पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड एन्क्वायरी कमेटी गठित की थी। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। समिति को पुलिस कार्रवाई, कथित अत्यधिक बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों की ओर से लगाए गए आरोपों तथा पुलिस के खिलाफ प्रत्यारोपों की जांच का दायित्व दिया गया है।

यौन उत्पीड़न की शिकायतों को प्राथमिकता

सोमवार को सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए कथित यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने का अनुरोध किया। उन्होंने यह भी मांग रखी कि पीड़ित महिलाएं अपनी शिकायत सीधे किसी स्वतंत्र अधिकारी या न्यायिक अधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकें।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश में इन शिकायतों को विशेष रूप से प्राथमिकता देने का निर्देश दिया जा चुका है। समिति को इन मामलों की जल्द जांच कर अंतरिम रिपोर्ट तत्काल प्रस्तुत करने को कहा गया है।

शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था पर भी चर्चा

सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठाया गया कि कथित पीड़ित महिलाएं अपनी शिकायतें समिति तक किस प्रकार पहुंचाएंगी। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि समिति के अध्यक्ष को नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार दिया गया है। नोडल अधिकारियों की नियुक्ति के बाद शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाएगा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य शिकायतकर्ताओं को एक स्पष्ट और सुलभ माध्यम उपलब्ध कराना है, ताकि वे बिना किसी अतिरिक्त बाधा के अपनी शिकायत समिति के सामने रख सकें।

पांच सदस्यीय समिति करेगी व्यापक जांच

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित HPEC केवल यौन उत्पीड़न के आरोपों तक सीमित नहीं है। समिति को छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई और हिंसा से जुड़े अन्य आरोपों की भी जांच करनी है।

समिति का उद्देश्य पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र और निष्पक्ष समीक्षा करना है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि प्रदर्शन के दौरान क्या हुआ, पुलिस कार्रवाई किस स्तर तक उचित थी और लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।

सुप्रीम कोर्ट का संदेश—शिकायतों की गंभीरता से जांच जरूरी

सुप्रीम कोर्ट के सोमवार के निर्देशों से यह स्पष्ट हुआ कि महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को जांच प्रक्रिया में अलग से और गंभीरता के साथ देखा जाएगा। अदालत ने समिति को इन शिकायतों को प्राथमिकता देने के साथ-साथ जल्द अंतरिम रिपोर्ट देने को कहा है।

फिलहाल अदालत ने अलग से नई जांच प्रक्रिया शुरू करने के बजाय मौजूदा हाई-पावर्ड कमेटी के माध्यम से मामले की जांच को आगे बढ़ाने का रास्ता अपनाया है। अब समिति की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि प्रदर्शन के दौरान वास्तव में क्या घटनाएं हुईं और आरोपों पर आगे क्या कार्रवाई आवश्यक होगी।

क्या होगा आगे?

अब सभी की नजर हाई-पावर्ड एन्क्वायरी कमेटी की जांच और उसकी अंतरिम रिपोर्ट पर है। समिति द्वारा शिकायतों की जांच, संबंधित पक्षों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण के बाद आगे की तस्वीर साफ होगी।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश छात्र प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं की सुरक्षा, पुलिस कार्रवाई में जवाबदेही और शिकायतों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश: पूर्व हाईकोर्ट जजों के रिटायरमेंट लाभों पर बनेगी समान राष्ट्रीय नीति

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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाओं में एकरूपता लाने के लिए केंद्र सरकार को समिति गठित करने के लिए एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र की ओर से अतिरिक्त समय मांगे जाने पर यह अनुमति दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि केंद्र तय समय में समिति का गठन नहीं करता है, तो सुप्रीम कोर्ट स्वयं समिति गठित कर सकता है।

दरअसल, अलग-अलग राज्यों में सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों को मिलने वाली सुविधाओं में काफी अंतर है। इनमें ड्राइवर, सुरक्षा व्यवस्था और यात्रा के दौरान सरकारी आवास जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसी असमानता को दूर करने के लिए पूरे देश में एक समान नीति तैयार करने की दिशा में यह कदम उठाया गया है। 

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 20 जुलाई 2026 को केंद्र को दो सप्ताह के भीतर समिति गठित करने का निर्देश दिया था। समिति को इस विषय पर अपनी सिफारिशें तैयार करनी हैं।

अब मामले की अगली सुनवाई करीब 10 दिन बाद होने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों के लिए देशभर में सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाओं को लेकर एक समान व्यवस्था बनने का रास्ता साफ हो सकता है।

भारतीय न्यायपालिका में AI का विस्तार: eCourts प्रोजेक्ट के तहत आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग

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e-Committee, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, eCourts प्रोजेक्ट के तहत विकसित सॉफ्टवेयर अनुप्रयोगों में आधुनिक तकनीकों जैसे Artificial Intelligence (AI) तथा इसके उप-क्षेत्र Machine Learning (ML), Optical Character Recognition (OCR) और Natural Language Processing (NLP) का उपयोग किया जा रहा है। AI का एकीकरण अनुवाद, पूर्वानुमान और विश्लेषण, प्रशासनिक दक्षता में सुधार, स्वचालित फाइलिंग, बुद्धिमान शेड्यूलिंग, केस सूचना प्रणाली को बेहतर बनाने तथा चैटबॉट्स के माध्यम से वादकारियों से संवाद जैसे क्षेत्रों में किया जा रहा है।

AI आधारित न्यायिक उपकरण और नवाचार

1. Legal Research Analysis Assistant (LegRAA)

AI आधारित एक सॉफ्टवेयर टूल LegRAA राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डिवीजन और NIC, पुणे के Centre of Excellence (eCourts) द्वारा, eCommittee, सुप्रीम कोर्ट के मार्गदर्शन में विकसित किया गया है। यह टूल न्यायाधीशों को कानूनी शोध, दस्तावेज़ विश्लेषण और न्यायिक निर्णय समर्थन में सहायता देता है।

2. Digital Courts 2.1

  • न्यायिक अधिकारियों को एकीकृत जजमेंट डेटाबेस तक पहुँच

  • दस्तावेज़ प्रबंधन और एनोटेशन

  • स्वचालित ड्राफ्टिंग टेम्पलेट

  • JustIS ऐप से कनेक्टिविटी

  • ASR–SHRUTI (वॉइस-टू-टेक्स्ट)

  • PANINI (अनुवाद सुविधा)
    यह न्यायाधीशों को आदेश और निर्णय के उद्घोषण में सहायता करता है।

3. सुप्रीम कोर्ट–IIT मद्रास सहयोग

सुप्रीम कोर्ट ने IIT मद्रास के साथ मिलकर AI और ML आधारित उपकरण विकसित किए हैं जो:

  • ई-फाइलिंग सॉफ्टवेयर में खामियों की पहचान

  • मेटाडेटा निष्कर्षण

  • केस मैनेजमेंट सिस्टम (ICMIS) से एकीकरण

इन प्रोटोटाइप का उपयोग 200 Advocates-on-Record को दिया गया है।

4. SUPACE

Supreme Court Portal Assistance in Court Efficiency (SUPACE) AI आधारित एक टूल है जो अभी प्रायोगिक चरण में है। इसका उद्देश्य:

  • मामलों के तथ्यात्मक विवरण को समझना

  • बुद्धिमान रूप से नज़ीरों (precedents) की खोज

  • मामलों की पहचान को सरल बनाना

AI आधारित समाधानों का वर्तमान दायरा

AI आधारित समाधान फिलहाल नियंत्रित पायलट चरण में हैं ताकि:

  • जिम्मेदार उपयोग

  • सुरक्षित तकनीकी एकीकरण

  • व्यवहारिक और प्रभावी तैनाती
    सुनिश्चित की जा सके।
    इनका संचालन संबंधित उच्च न्यायालयों के कार्य संचालन नियमों और नीतियों के अनुसार होगा।

AI कमेटी और भविष्य की तकनीक

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक क्षेत्र में AI के उपयोग को समझने और लागू करने हेतु एक AI कमेटी का गठन किया है।
eCourts प्रोजेक्ट चरण-III (2023–24 से 4 वर्ष की अवधि) में Future Technological Advancement (AI, Blockchain आदि) के लिए ₹53.57 करोड़ का प्रावधान है।

AI को निम्न क्षेत्रों में एकीकृत किया जाएगा:

  • न्यायिक प्रशासनिक दक्षता में सुधार

  • मामले लंबित होने का पूर्वानुमान

  • न्यायालय प्रक्रियाओं का स्वचालन

  • न्यायालय संचालन का सुव्यवस्थित करना

AI आधारित उपकरणों और प्लेटफॉर्मों को पूरे देश की न्यायपालिका में उपयोग के लिए तैयार किया गया है।

यह जानकारी आज राज्यसभा में कानून एवं न्याय मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री तथा संसदीय कार्य मंत्रालय के राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा प्रदान की गई।

राष्ट्रपति भवन में भव्य समारोह: न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने ली भारत के नए प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ

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नई दिल्ली — राष्ट्रपति भवन के प्रतिष्ठित गणतंत्र मंडप में आज सुबह 10 बजे आयोजित एक गरिमामय समारोह में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) के रूप में शपथ ग्रहण की।

राष्ट्रपति ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। समारोह में केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रीगण, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, संवैधानिक पदाधिकारी तथा कई विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत के शपथ ग्रहण के साथ ही देश की न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर एक अनुभवी, संवेदनशील और दूरदर्शी न्यायाधीश की नियुक्ति हुई है। संवैधानिक कानून, जनहित मामलों और न्यायिक सुधारों में उनके व्यापक योगदान को देशभर में सराहा जाता है।

इस अवसर ने भारत की न्याय व्यवस्था में एक नए अध्याय की शुरुआत की, जो न्याय, पारदर्शिता और संविधान की सर्वोच्चता के प्रति समर्पण को और मजबूत करता है।


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