Media24Media.com: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी खबर: साइबर अपराध को बताया ‘डिजिटल डकैती’, म्यूल बैंक खातों के मामले में सख्त रुख

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सुप्रीम कोर्ट की बड़ी खबर: साइबर अपराध को बताया ‘डिजिटल डकैती’, म्यूल बैंक खातों के मामले में सख्त रुख

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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी और तथाकथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ के जरिए लोगों को ठगने वाले गिरोहों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साइबर अपराध को “डिजिटल डकैती” बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

28 अक्टूबर को अदालत ने दो लोगों की उस याचिका पर राहत देने से इनकार कर दिया, जिसमें उनके खिलाफ देश के 12 राज्यों में चल रहे 35 साइबर अपराध मामलों को एक जगह जोड़ने की मांग की गई थी। आरोप था कि उनकी कंपनी के बैंक खाते का इस्तेमाल साइबर धोखाधड़ी से प्राप्त रकम जमा करने के लिए किया गया। 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने संगठित साइबर अपराध और वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाकर की जाने वाली ठगी पर गंभीर चिंता जताई। पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपियों की सुविधा के लिए अलग-अलग राज्यों में चल रही जांच और मुकदमों को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं की मांग स्वीकार नहीं की। इसके बाद उन्होंने अपनी याचिका वापस ले ली। 

क्या है पूरा मामला?

इस मामले में गौरब कुमार साहा और निधि भंडारी के खिलाफ 12 राज्यों में साइबर अपराध से संबंधित 35 मामले लंबित बताए गए हैं।

आरोप है कि उनकी कंपनी के बैंक खाते का इस्तेमाल विभिन्न साइबर अपराधों से जुड़ी रकम प्राप्त करने के लिए किया गया था। ऐसे बैंक खाते को आम तौर पर म्यूल अकाउंट (Mule Account) कहा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका के जरिए इन मामलों को एक ही स्थान पर एक साथ चलाने की मांग की गई थी। अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इससे अलग-अलग राज्यों में चल रही जांच और पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती थी।

81 साल के बुजुर्ग से ₹1.90 करोड़ की ठगी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने केरल के एर्नाकुलम में रहने वाले 81 वर्षीय बुजुर्ग का मामला उठाया।

अदालत के समक्ष रखे गए विवरण के अनुसार, बुजुर्ग से कथित तौर पर ₹1.90 करोड़ की साइबर ठगी की गई थी। ठगी की रकम आरोपी पक्ष से जुड़े म्यूल खाते में जमा होने की बात कही गई।

इस घटना का उल्लेख करते हुए अदालत ने सवाल उठाया कि साइबर अपराध के शिकार बुजुर्गों को न्याय पाने के लिए इतनी परेशानी क्यों उठानी पड़े।

इस उदाहरण ने यह स्पष्ट किया कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में केवल पैसे की हेराफेरी ही नहीं, बल्कि पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाना भी महत्वपूर्ण है। 

क्या होता है म्यूल बैंक अकाउंट?

म्यूल अकाउंट ऐसा बैंक खाता होता है, जिसका इस्तेमाल धोखाधड़ी से प्राप्त धन को लेने, एक खाते से दूसरे खाते में भेजने या उसकी असली उत्पत्ति छिपाने के लिए किया जाता है।

साइबर अपराधी इसके लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं:

  • कमीशन का लालच: किसी व्यक्ति को अपने बैंक खाते में रकम प्राप्त करने और आगे भेजने के बदले पैसे देने की पेशकश करना।
  • नौकरी या बिजनेस का झांसा: फर्जी नौकरी या व्यवसाय के नाम पर बैंक खाते का इस्तेमाल करना।
  • खाताधारक को गुमराह करना: खाते में आने वाले पैसे के वास्तविक स्रोत की जानकारी छिपाना।
  • फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल: कंपनी के बैंक खातों के जरिए संदिग्ध लेनदेन करना।

क्या होता है डिजिटल अरेस्ट स्कैम?

डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का एक तरीका है, जिसमें ठग खुद को पुलिस अधिकारी, CBI, ED या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं।

आमतौर पर ठगी इस तरह होती है:

  1. पीड़ित को फोन या वीडियो कॉल किया जाता है।
  2. उसे बताया जाता है कि उसका नाम किसी आपराधिक मामले में आया है।
  3. गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई या परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी जाती है।
  4. पीड़ित को वीडियो कॉल पर लगातार जुड़े रहने या किसी से बात न करने के लिए कहा जाता है।
  5. जांच के नाम पर बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाया जाता है।

इसके बाद ठगी की रकम अलग-अलग बैंक खातों के जरिए आगे भेजी जा सकती है।

याद रखें: पुलिस या कोई दूसरी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को इस तरह बंधक बनाकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। ऐसी मांग गंभीर धोखाधड़ी का संकेत है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आम लोगों पर क्या असर होगा?

इस मामले में अदालत का रुख तीन महत्वपूर्ण बातें सामने लाता है:

पहली—पीड़ितों के हितों को प्राथमिकता: किसी आरोपी की सुविधा के लिए पीड़ितों और जांच एजेंसियों को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए।

दूसरी—अलग-अलग राज्यों में जांच जारी रहेगी: 35 मामलों को एक स्थान पर समेकित करने की मांग स्वीकार नहीं की गई। संबंधित मामलों की जांच और कानूनी कार्यवाही अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में आगे बढ़ सकती है।

तीसरी—साइबर अपराध के खिलाफ सख्त संदेश: अदालत की टिप्पणियां संगठित साइबर ठगी और वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने वाले गिरोहों के प्रति गंभीर चिंता दर्शाती हैं। हालांकि, किसी आरोपी की व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही होगा। 

साइबर ठगी होने पर क्या करें?

अगर आपके या आपके परिवार के साथ ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी होती है, तो ये कदम उठाएं:

  • तुरंत 1930 पर कॉल करें। यह भारत की राष्ट्रीय साइबर वित्तीय धोखाधड़ी हेल्पलाइन है।
  • आधिकारिक पोर्टल National Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत दर्ज करें।
  • अपने बैंक को तुरंत सूचित करके संदिग्ध लेनदेन रोकने का अनुरोध करें।
  • बैंक ट्रांजैक्शन की रसीद, फोन नंबर, संदेश और अन्य सबूत सुरक्षित रखें।
  • किसी भी अनजान व्यक्ति को OTP, PIN या बैंक खाते की गोपनीय जानकारी न दें।
  • अपने खाते में किसी अनजान व्यक्ति की रकम लेकर उसे आगे ट्रांसफर न करें।

समय पर शिकायत करने से रकम को आगे जाने से रोकने की संभावना बढ़ सकती है, हालांकि पैसे की वापसी की गारंटी नहीं होती।

खबर का निष्कर्ष

28 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने साइबर अपराध को ‘डिजिटल डकैती’ बताते हुए कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने दो याचिकाकर्ताओं के खिलाफ 12 राज्यों में लंबित 35 साइबर अपराध मामलों को एक जगह समेकित करने की मांग स्वीकार नहीं की। सुनवाई के दौरान ₹1.90 करोड़ की कथित ठगी के शिकार 81 वर्षीय बुजुर्ग का मामला भी उठाया गया।

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