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1980s AI Photo Trend पर दिल्ली पुलिस की चेतावनी: ‘नॉस्टैल्जिया’ के पीछे छिपा हो सकता है साइबर खतरा

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नई दिल्ली- सोशल मीडिया पर इन दिनों 1980s AI Photo Trend तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। Instagram और X समेत कई प्लेटफॉर्म पर लोग अपनी सामान्य तस्वीरों को AI की मदद से 1980 के दशक के रेट्रो अंदाज में बदलकर शेयर कर रहे हैं। बड़े हेयरस्टाइल, पुराने दौर के कपड़े, विंटेज कैमरा इफेक्ट, फिल्म ग्रेन और स्टूडियो लाइटिंग वाली ये तस्वीरें लोगों को खूब आकर्षित कर रही हैं। 

लेकिन इसी ट्रेंड के बीच दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया यूजर्स को सावधानी बरतने की सलाह दी है। पुलिस का कहना है कि किसी भी अनजान AI टूल या संदिग्ध लिंक पर अपनी निजी तस्वीर अपलोड करना भविष्य में साइबर अपराध का कारण बन सकता है। दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पोस्ट में चेताया कि जो चीज देखने में सिर्फ मनोरंजन या नॉस्टैल्जिया लगती है, वह जोखिम भी पैदा कर सकती है। 

क्या है 1980s AI Photo Trend?

इस ट्रेंड में यूजर अपनी वर्तमान फोटो किसी AI इमेज टूल में अपलोड करता है और एक निर्देश यानी prompt देकर उसे 1980 के दशक के अंदाज में बदलने को कहता है। AI चेहरे की पहचान योग्य विशेषताओं को बनाए रखते हुए कपड़े, हेयरस्टाइल, बैकग्राउंड, रोशनी और तस्वीर की टेक्सचर को पुराने दौर जैसा बना देता है।

यही वजह है कि कुछ ही सेकंड में तैयार होने वाली तस्वीरें बेहद वास्तविक दिखाई देती हैं। इस तकनीक ने फोटो एडिटिंग को आसान बना दिया है और बिना किसी विशेष डिजाइनिंग स्किल के लोग अपनी तस्वीरों को अलग-अलग दौर और स्टाइल में बदल पा रहे हैं।

दिल्ली पुलिस ने क्यों जारी की चेतावनी?

दिल्ली पुलिस ने खास तौर पर अनजान AI टूल्स और random links से सावधान रहने को कहा है। पुलिस के अनुसार, इंटरनेट पर अपलोड की गई तस्वीरों का दुरुपयोग फर्जी प्रोफाइल बनाने, धोखाधड़ी, ब्लैकमेल या अन्य साइबर अपराधों में किया जा सकता है। 

खास खतरा तब बढ़ सकता है जब कोई व्यक्ति बिना जांचे किसी वेबसाइट या सोशल मीडिया लिंक पर क्लिक कर अपनी फोटो अपलोड कर दे। कुछ फर्जी वेबसाइटें लोकप्रिय AI filters या viral photo trends के नाम पर यूजर्स को आकर्षित कर सकती हैं।

सिर्फ चेहरा ही नहीं, तस्वीर के साथ और क्या जा सकता है?

किसी फोटो में केवल चेहरा ही महत्वपूर्ण जानकारी नहीं होता। तस्वीर के बैकग्राउंड में घर का नंबर, वाहन का registration number, सड़क या दुकान का नाम, ऑफिस, स्कूल या अन्य पहचान योग्य स्थान दिखाई दे सकते हैं।

इसके अलावा, मूल फोटो से जुड़ी कुछ तकनीकी जानकारी या metadata भी मौजूद हो सकती है, हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि फोटो किस डिवाइस और प्लेटफॉर्म से ली या अपलोड की गई है। इसलिए हाई-क्वालिटी निजी तस्वीरें किसी भी अनजान सेवा को देना सोच-समझकर ही किया जाना चाहिए।

Fake Profile और Blackmail का खतरा

AI की मदद से किसी व्यक्ति की तस्वीर को बदलना और उसे नए संदर्भ में इस्तेमाल करना पहले की तुलना में आसान हो गया है। दिल्ली पुलिस ने इसी वजह से fake profiles, blackmail और cyber fraud जैसे संभावित खतरों की ओर ध्यान दिलाया है। 

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर AI फोटो टूल असुरक्षित है। पुलिस की चेतावनी मुख्य रूप से अनजान या अविश्वसनीय प्लेटफॉर्म पर निजी तस्वीरें अपलोड करने और संदिग्ध लिंक खोलने के जोखिम को लेकर है। 

 Scam का एक और तरीका—Fake AI Filter Links

साइबर अपराधी लोकप्रिय trends का फायदा उठाकर लोगों को फर्जी लिंक भेज सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी यूजर को “अपनी 1980s फोटो बनाएं” या “viral AI filter” जैसे संदेश के साथ लिंक भेजा जा सकता है।

ऐसे लिंक पर क्लिक करने के बाद यूजर को किसी संदिग्ध वेबसाइट पर ले जाया जा सकता है या कोई अनजान ऐप/APK डाउनलोड करने के लिए कहा जा सकता है। अलग-अलग साइबर सुरक्षा चेतावनियों में ऐसे संदिग्ध लिंक और अनजान फाइलों से बचने की सलाह दी गई है। 

अगर AI Photo Trend आजमाना है तो इन बातों का रखें ध्यान

1. अनजान AI वेबसाइट पर फोटो अपलोड न करें।
किसी भी टूल का इस्तेमाल करने से पहले उसकी विश्वसनीयता और privacy policy जांचें।

2. Random links से AI filter इस्तेमाल न करें।
सोशल मीडिया, WhatsApp या SMS पर आए संदिग्ध लिंक से बचें।

3. फोटो का background साफ रखें।
घर का नंबर, वाहन नंबर, पहचान संबंधी दस्तावेज या अन्य निजी जानकारी दिखाई दे तो उसे crop या blur कर दें।

4. संवेदनशील तस्वीरें कभी अपलोड न करें।
Identity documents, निजी रिकॉर्ड या अत्यधिक निजी तस्वीरों को AI tools में डालने से बचें।

5. दूसरे लोगों की तस्वीर बिना अनुमति के अपलोड न करें।
खासकर बच्चों की तस्वीरों के मामले में अतिरिक्त सावधानी जरूरी है।

6. App या APK डाउनलोड करने से पहले स्रोत जांचें।
किसी viral trend के नाम पर मिलने वाली अनजान file या application को install न करें।

साइबर फ्रॉड हो जाए तो क्या करें?

दिल्ली पुलिस ने साइबर अपराध का शिकार होने वाले लोगों को राष्ट्रीय साइबर फ्रॉड हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करने और सरकारी cybercrime reporting system का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। ऐसे मामलों में समय पर शिकायत करना महत्वपूर्ण हो सकता है।

AI का इस्तेमाल करें, लेकिन Digital Safety के साथ

1980s AI Photo Trend यह दिखाता है कि AI अब केवल तकनीकी प्रयोग नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया की रोजमर्रा की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। रचनात्मकता और मनोरंजन के लिए AI का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन किसी भी वायरल ट्रेंड में शामिल होने से पहले यह समझना जरूरी है कि हम किस प्लेटफॉर्म पर क्या डेटा साझा कर रहे हैं।

दिल्ली पुलिस की चेतावनी का मुख्य संदेश यही है कि ट्रेंड कुछ समय के लिए वायरल हो सकता है, लेकिन डिजिटल दुनिया में साझा की गई व्यक्तिगत तस्वीर का नियंत्रण हमेशा पूरी तरह आपके हाथ में नहीं रहता। इसलिए किसी भी AI tool का इस्तेमाल करने से पहले उसकी विश्वसनीयता, privacy settings और data-handling practices को समझना डिजिटल सुरक्षा का अहम हिस्सा है।


जमुई की घटना: सिर्फ एक अपराध नहीं, समाज और सिस्टम के लिए बड़ा सबक

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जमुई, बिहार: बिहार के जमुई में 19 सितंबर की शाम दो नाबालिग छात्रों के साथ कथित बदसलूकी, मारपीट और लड़की के साथ यौन उत्पीड़न का वीडियो सामने आने के बाद पूरे देश में चर्चा तेज हो गई है। घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की, कई आरोपियों की पहचान की और गिरफ्तारियां की गईं। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए बिहार के DGP से कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।

लेकिन यह मामला केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। इसने महिला और बाल सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही, सोशल मीडिया की भूमिका, भीड़ की मानसिकता और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

घटना में क्या हुआ?

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 19 सितंबर की शाम जमुई क्षेत्र में दसवीं कक्षा के एक नाबालिग छात्र और छात्रा को रास्ते में कुछ युवकों ने रोक लिया। दोनों को कथित तौर पर घेरा गया, छात्र के साथ मारपीट की गई और छात्रा के साथ बदसलूकी की गई।

घटना का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर सामने आया। रिपोर्टों के मुताबिक वीडियो में कई लोग मौके पर दिखाई दे रहे हैं और छात्रा लोगों से उसे जाने देने की अपील करती नजर आती है। पुलिस ने वीडियो और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच शुरू की।

पुलिस के अनुसार मामले में POCSO Act और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया गया। जांच के लिए SIT गठित किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

पुलिस कार्रवाई और मुख्य आरोपी पर कार्रवाई

घटना का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी की कार्रवाई तेज की। शुरुआती रिपोर्टों में तीन गिरफ्तारियों की जानकारी सामने आई, जबकि बाद की रिपोर्ट में मुख्य आरोपी समेत पांच आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई।

मुख्य आरोपी नंदन यादव को पकड़ने के दौरान पुलिस के साथ मुठभेड़ की भी रिपोर्ट सामने आई। पुलिस के अनुसार आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने का प्रयास किया और पुलिस पर हमला किया, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी। इस घटनाक्रम की स्वतंत्र कानूनी जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।

घटना के बाद सोशल मीडिया बना दूसरा मुद्दा

इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह भी है कि नाबालिग पीड़िता से संबंधित वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हुआ।

पुलिस ने कथित तौर पर पीड़िता की पहचान उजागर करने वाले लगभग 120 सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

यहां समाज के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश है:

किसी अपराध का वीडियो शेयर करना न्याय दिलाने का तरीका नहीं है।

वीडियो शेयर करने से पीड़ित की पहचान उजागर हो सकती है, मानसिक आघात बढ़ सकता है और उसके परिवार को सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

POCSO Act की धारा 23 बच्चे की पहचान—नाम, पता, फोटो, परिवार, स्कूल या ऐसी किसी जानकारी के प्रकाशन पर रोक लगाती है जिससे बच्चे की पहचान उजागर हो सकती है।

इसलिए ऐसे मामलों में वीडियो को डाउनलोड करके दोबारा पोस्ट करना, WhatsApp ग्रुप में भेजना या सोशल मीडिया पर वायरल करना मदद नहीं, बल्कि पीड़ित की निजता के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

सबसे बड़ा सवाल: अगर वीडियो वायरल नहीं होता तो?

इस घटना से पुलिस की preventive policing और स्थानीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार घटना के समय पुलिस को तत्काल इसकी जानकारी नहीं मिली और वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने पीड़ितों की पहचान कर कार्रवाई शुरू की। पुलिस अधिकारियों ने क्षेत्र में पेट्रोलिंग व्यवस्था की समीक्षा की बात भी कही है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—पीड़ित या परिवार की शिकायत न आना, पुलिस की जिम्मेदारी को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, खासकर जब मामला सार्वजनिक स्थान पर नाबालिगों के साथ कथित गंभीर अपराध से जुड़ा हो।

POCSO Act की धारा 19 के तहत किसी व्यक्ति को किसी POCSO अपराध की जानकारी होने या आशंका होने पर पुलिस/विशेष किशोर पुलिस इकाई को सूचना देना अनिवार्य है। कानून पुलिस को ऐसी सूचना पर बिना अनावश्यक देरी कार्रवाई करने का दायित्व भी देता है।

समाज को इस घटना से क्या सीखना चाहिए?

1. अपराध देखकर चुप रहना समाधान नहीं

अगर कोई व्यक्ति किसी लड़की या बच्चे के साथ सार्वजनिक स्थान पर हिंसा या यौन दुर्व्यवहार होते देखता है, तो उसे सुरक्षित तरीके से पुलिस या आपातकालीन सेवा को सूचना देनी चाहिए।

भीड़ बनाकर तमाशा देखना या वीडियो बनाना समस्या को और गंभीर कर सकता है।

2. पीड़ित को दोष देना बंद करना होगा

किसी लड़की का किसी लड़के के साथ होना, किसी स्थान पर जाना या देर से घर लौटना किसी भी व्यक्ति को उसके साथ दुर्व्यवहार करने का अधिकार नहीं देता।

अपराध की जिम्मेदारी अपराध करने वाले व्यक्ति की होती है।

3. सोशल मीडिया पर संवेदनशीलता जरूरी है

आज मोबाइल कैमरा अपराध का सबूत जुटाने में मदद कर सकता है, लेकिन वही कैमरा पीड़ित की पहचान सार्वजनिक करके उसकी जिंदगी और मुश्किल बना सकता है।

वीडियो पुलिस को दें, सोशल मीडिया को नहीं।

4. युवाओं में कानून और सहमति की समझ जरूरी

स्कूल और कॉलेज स्तर पर बच्चों को केवल परीक्षा की तैयारी नहीं, बल्कि सहमति, व्यक्तिगत सीमाएं, साइबर सुरक्षा, लैंगिक सम्मान और कानूनी जिम्मेदारियों के बारे में भी शिक्षित किया जाना चाहिए।

क्या कानून में बदलाव की जरूरत है?

जमुई की घटना के आधार पर केवल “सजा और कठोर कर दी जाए” कहना पर्याप्त समाधान नहीं है। भारत में पहले से ही POCSO Act बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए व्यापक कानूनी ढांचा देता है और इसमें अनिवार्य रिपोर्टिंग, विशेष अदालत, बच्चे के अनुकूल प्रक्रिया तथा बंद कमरे में सुनवाई जैसी व्यवस्थाएं हैं।

इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है कि मौजूदा कानून जमीन पर कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से लागू हो रहा है।

फिर भी कुछ क्षेत्रों में सुधार पर विचार किया जा सकता है:

 1. Sensitive areas में mandatory safety audit

स्कूल, कोचिंग सेंटर और छात्र-छात्राओं के नियमित आवागमन वाले सुनसान रास्तों की पुलिस द्वारा नियमित सुरक्षा समीक्षा हो।

 2. POCSO मामलों के लिए तेज response system

नाबालिग से जुड़े गंभीर मामलों में सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस, महिला हेल्पलाइन, बाल संरक्षण इकाई और मेडिकल सहायता के बीच एकीकृत response mechanism मजबूत किया जाए।

3. सोशल मीडिया पर victim-identification रोकने की बेहतर व्यवस्था

प्लेटफॉर्म और पुलिस के बीच ऐसा त्वरित तंत्र होना चाहिए जिससे नाबालिग पीड़ित की पहचान वाले वीडियो को तेजी से हटाया जा सके और मूल uploader/resharer की पहचान की जा सके।

 4. Police accountability को measurable बनाया जाए

सिर्फ घटना के बाद गिरफ्तारी ही सफलता का पैमाना नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाए कि सूचना मिलने के बाद पुलिस ने कितने समय में response दिया, FIR कब दर्ज हुई, पीड़ित को सुरक्षा कब मिली और जांच कितनी जल्दी आगे बढ़ी।

5. Victim support को कानून का केंद्र बनाया जाए

कानूनी कार्रवाई के साथ पीड़ित बच्चे और परिवार को counselling, legal aid, privacy protection और आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराना जरूरी है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस मामले में पीड़ितों की सुरक्षा, कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श की जरूरत पर जोर दिया है।

राजनीति से ऊपर उठकर देखने की जरूरत

ऐसी घटनाओं के बाद मामला अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाता है। अलग-अलग नेताओं ने घटना पर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं दी हैं। लेकिन किसी भी पक्ष के राजनीतिक बयान को घटना की जांच के निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

मुख्य सवाल बहुत सीधा है:

क्या पीड़ित को न्याय मिला? क्या आरोपी कानून के अनुसार दंडित होंगे? और क्या ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए व्यवस्था में ठोस सुधार होगा?

इन सवालों का जवाब जांच और अदालत की प्रक्रिया से आना चाहिए।

निष्कर्ष: जमुई सिर्फ एक खबर नहीं, एक चेतावनी है

जमुई की घटना समाज के सामने कई स्तरों पर एक गंभीर चुनौती रखती है।

एक तरफ अपराध करने वालों की जवाबदेही जरूरी है, दूसरी तरफ पुलिस की preventive व्यवस्था मजबूत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके साथ समाज को यह समझना होगा कि किसी लड़की या बच्चे की गरिमा मनोरंजन, भीड़ के तमाशे या सोशल मीडिया कंटेंट का विषय नहीं है।

कानून मौजूद हैं। POCSO बच्चों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट प्रावधान देता है और BNS में भी महिलाओं तथा यौन अपराधों से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं।

अब असली चुनौती है—इन कानूनों का समय पर, निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से पालन।

किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि अपराधी को कितनी सजा मिली; बल्कि इससे भी होती है कि अपराध होने से पहले व्यवस्था ने कितनी सुरक्षा दी, अपराध के बाद पीड़ित को कितना सहारा मिला और समाज ने पीड़ित के साथ कैसा व्यवहार किया।

जमुई की घटना से सबसे बड़ा सबक यही है—अपराध को रोकना केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, लेकिन अपराध होने पर कानून लागू करना निश्चित रूप से राज्य व्यवस्था की जिम्मेदारी है। समाज की जिम्मेदारी है कि वह तमाशबीन नहीं, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बने।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर Google का बड़ा कदम, भारत में सीधे अधिकारियों को दी जाएगी जानकारी

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नई दिल्ली- बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर Google ने भारत में एक अहम कदम उठाने का प्रस्ताव दिया है। कंपनी ने कहा है कि भारत से जुड़े Child Sexual Abuse Material (CSAM) के मामलों में संबंधित जानकारी सीधे Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) को उपलब्ध कराने की व्यवस्था को लागू करने पर सरकार के साथ बातचीत चल रही है।

अब तक ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग की प्रक्रिया में अमेरिका स्थित National Center for Missing & Exploited Children (NCMEC) की भूमिका रही है। Google के अनुसार, उसके प्लेटफॉर्म पर CSAM की पहचान होने पर सामग्री को हटाया जाता है और संबंधित रिपोर्टिंग प्रक्रिया शुरू की जाती है।

भारत सरकार की ओर से टेक कंपनियों से बच्चों से जुड़े गंभीर मामलों की जानकारी भारतीय कानून-प्रवर्तन एजेंसियों तक तेजी से पहुंचाने पर जोर दिया गया है। इसी क्रम में Google ने I4C के साथ सीधे जानकारी साझा करने के प्रस्ताव की पुष्टि की है।

Google का कहना है कि वह ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री की पहचान, उसे हटाने और उसकी रिपोर्टिंग के लिए लगातार काम कर रहा है। यह कदम भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और ऐसे मामलों में कार्रवाई को लेकर टेक कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के बीच सहयोग को और मजबूत कर सकता है।

CG NEWS : भाई-परिजनों को भेजी युवती की निजी तस्वीर, आरोपी गुजरात से दबोचा गया

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रायपुर। युवती की निजी तस्वीर सोशल मीडिया और वॉट्सऐप के माध्यम से उसके भाई और अन्य परिजनों को भेजने के मामले में टिकरापारा पुलिस ने आरोपी को गुजरात से गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार आरोपी ने तस्वीर भेजने के साथ आपत्तिजनक और गाली-गलौज वाले संदेश भी भेजे थे। आरोपी को न्यायालय में पेश करने के बाद न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है।


तकनीकी जांच के बाद गुजरात से गिरफ्तारी

पुलिस ने मामले में परिमल भाई जयंती भाई कोंकणी (28), निवासी गुजरात को गिरफ्तार किया है। पुलिस टीम ने लगातार तलाश और तकनीकी जांच के आधार पर आरोपी का पता लगाया और उसे गुजरात से गिरफ्तार किया। आरोपी की गिरफ्तारी 13 सितंबर को की गई।

गिरफ्तारी के बाद आरोपी को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे 25 सितंबर तक न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया।

भाई और परिजनों को भेजी निजी तस्वीर

पुलिस के मुताबिक, पीड़िता ने टिकरापारा थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि आरोपी ने उसकी निजी तस्वीर वॉट्सऐप के जरिए उसके भाई और अन्य परिजनों को भेजी। इसके साथ ही उसने आपत्तिजनक और गाली-गलौज वाले संदेश भी भेजे।

शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। जांच के दौरान वॉट्सऐप संदेश, तस्वीरों और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को भी जांच में शामिल किया गया।

कितने लोगों तक पहुंचाई तस्वीर, जांच जारी

आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि उसने युवती की निजी तस्वीर और आपत्तिजनक संदेश कितने लोगों तक भेजे थे। पुलिस आरोपी की मंशा और मामले से जुड़े अन्य डिजिटल साक्ष्यों की भी जांच कर रही है।

मामले में जांच के आधार पर आगे और कार्रवाई की जा सकती है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 54 सरकारी वेबसाइटों पर साइबर हमले का आरोप, NIA ने 5 राज्यों में की छापेमारी

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नई दिल्ली- ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत सरकार की वेबसाइटों को निशाना बनाकर किए गए कथित साइबर हमलों के मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने बड़ी कार्रवाई की है। NIA ने साइबर आतंकवाद से जुड़े गुजरात मामले की जांच के तहत महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, बिहार और दिल्ली में पांच स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया।

जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत सरकार की 54 वेबसाइटों पर कथित रूप से Distributed Denial-of-Service (DDoS) हमले करने का प्रयास किया था। इन वेबसाइटों में महत्वपूर्ण सरकारी डिजिटल संसाधन और Critical Information Infrastructure से जुड़े सिस्टम भी शामिल बताए गए हैं।

पांच राज्यों में एक साथ कार्रवाई

NIA की तलाशी महाराष्ट्र के पुणे स्थित जुन्नर, गुजरात के खेड़ा स्थित नडियाद, तेलंगाना के करीमनगर स्थित रामागुंडम, बिहार के गोपालगंज और दिल्ली में की गई। यह मामला 25 जून 2025 को दर्ज साइबर आतंकवाद के केस से संबंधित है।

तलाशी के दौरान जांच एजेंसी ने लैपटॉप, मोबाइल फोन, पेन ड्राइव समेत कई डिजिटल उपकरण और दस्तावेज जब्त किए हैं। इनसे कथित हैकिंग गतिविधियों से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री मिलने की बात सामने आई है।

दो आरोपी पहले ही गिरफ्तार

इस मामले में दो आरोपियों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। जांच के दौरान तकनीकी विश्लेषण के जरिए ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिन्होंने कथित तौर पर आरोपियों को सहायता या सहयोग प्रदान किया था। इन्हीं कड़ियों को आगे बढ़ाने के लिए विभिन्न स्थानों पर तलाशी और पूछताछ की गई।

DDoS हमला ऐसी साइबर तकनीक है, जिसमें किसी वेबसाइट या सर्वर पर भारी मात्रा में अवैध इंटरनेट ट्रैफिक भेजकर उसकी सामान्य सेवाओं को बाधित करने का प्रयास किया जाता है।

NIA की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब सरकारी डिजिटल ढांचे की सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। मामले की आगे की जांच जारी है।


‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर रिटायर्ड कर्मचारी से 63 लाख की ठगी

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 देवास। मध्य प्रदेश के देवास जिले में साइबर ठगी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। जालसाजों ने एक रिटायर्ड फैक्ट्री कर्मचारी को ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर करीब 63 लाख रुपये ठग लिए। ठगों ने खुद को पुलिस और जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर बुजुर्ग को कई दिनों तक मानसिक दबाव में रखा और उनकी जमा पूंजी अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करा ली।


ठगी का अहसास होने के बाद पीड़ित सुरेश इंग्ले ने पुलिस से शिकायत की। मामले की गंभीरता को देखते हुए देवास पुलिस ने अंतरराज्यीय साइबर गिरोह की तलाश शुरू की। करीब 127 दिनों तक चले ऑपरेशन में 70 पुलिसकर्मियों की 19 टीमों ने देश के 17 राज्यों के 33 जिलों में कार्रवाई की। इस दौरान पुलिस टीमों ने करीब 58,315 किलोमीटर की दूरी तय कर गिरोह से जुड़े आरोपियों और उनके नेटवर्क का पता लगाया।

12 आरोपी गिरफ्तार, 11 जेल भेजे गए

पुलिस ने राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली और बिहार समेत कई राज्यों में दबिश देकर गिरोह के 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया। इनमें से 11 आरोपियों को अदालत के आदेश पर जेल भेज दिया गया है। वहीं, पश्चिम बंगाल निवासी आरोपी कमलकान्ति को पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है। पुलिस को पूछताछ में साइबर ठगी के नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है।

54.84 लाख रुपये बरामद

पुलिस कार्रवाई में ठगी की रकम का बड़ा हिस्सा बरामद किया गया है। आरोपियों के कब्जे और उनके बैंक खातों से पुलिस ने 54 लाख 84 हजार रुपये बरामद किए हैं। पुलिस के मुताबिक, साइबर ठगी के मामलों में रकम की रिकवरी चुनौतीपूर्ण होती है, लेकिन त्वरित कार्रवाई के चलते ठगी गई रकम का बड़ा हिस्सा सुरक्षित किया जा सका।

एसपी ने कहा- कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई व्यवस्था नहीं

देवास के पुलिस अधीक्षक पुनीत गेहलोत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूरे मामले का खुलासा किया। उन्होंने लोगों को साइबर ठगी से सावधान रहने की अपील करते हुए कहा कि कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, सीबीआई या किसी अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर फोन अथवा वीडियो कॉल पर डराता है और पैसों की मांग करता है, तो घबराने के बजाय तत्काल पुलिस से संपर्क करना चाहिए। ऐसी किसी भी संदिग्ध कॉल या ऑनलाइन ठगी की सूचना तुरंत पुलिस या साइबर अपराध से संबंधित आधिकारिक माध्यम पर दें।

 

फेसबुक विज्ञापन में दिग्गजों के फोटो से दिया झांसा, बीएसपी के पूर्व कर्मी से 45 लाख की साइबर ठगी, आरोपी गिरफ्तार

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 भिलाई। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले स्थित भिलाई में साइबर ठगी का एक बड़ा मामला सामने आया है। शातिर ठगों ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और प्रख्यात समाजसेवी सुधा मूर्ति जैसे दिग्गजों के नामों व तस्वीरों का दुरुपयोग कर फर्जी निवेश योजना बनाई और भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी से 45 लाख 18 हजार 998 रुपये की भारी-भरकम राशि ठग ली।


भिलाई नगर थाना पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से 24 वर्षीय आरोपी विशाल नागले को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि इस गिरोह के मुख्य मास्टरमाइंड की सरगर्मी से तलाश जारी है।

फेसबुक एड से शुरू हुआ ठगी का जाल

जानकारी के मुताबिक, पीड़ित जयंत बागची (61 वर्ष) हुडको भिलाई के निवासी हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र से सेवानिवृत्त होने के साथ-साथ पूर्व में भारतीय सेना में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि 10 मार्च 2026 को फेसबुक चला रहे थे, तभी उन्हें ऑनलाइन ट्रेडिंग और निवेश से जुड़ा एक विज्ञापन दिखा। विज्ञापन में देश की नामचीन हस्तियों के चेहरे और नाम का इस्तेमाल किया गया था, जिससे उन्हें इस योजना पर पूरा भरोसा हो गया। इसके बाद उन्होंने विज्ञापन में दिए गए लिंक पर क्लिक कर अपना रजिस्ट्रेशन करा लिया।

रजिस्ट्रेशन फीस के नाम पर ऐंठे 18 हजार

रजिस्ट्रेशन के तुरंत बाद कृतिका नाम की एक महिला ने उनसे संपर्क किया और खुद को कंपनी का प्रतिनिधि बताया। उसने वरिष्ठ नागरिक होने का हवाला देते हुए रजिस्ट्रेशन फीस के नाम पर 18,998 रुपये ऑनलाइन जमा करवा लिए। इसके बाद सिद्धार्थ विपुल नामक शख्स ने खुद को उनका 'अकाउंट मैनेजर' बताकर ऑनलाइन ट्रेडिंग में निवेश की प्रक्रिया शुरू कराई। आरोपियों ने पीड़ित का विश्वास जीतने के लिए दावा किया कि उनकी कंपनी का नेटवर्क ब्रिटेन, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में फैला हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय युद्ध का हवाला देकर कराया मोटा निवेश

पीड़ित से किस्तों में लाखों रुपये जमा कराए गए। 17 मार्च को 1 लाख रुपये, जबकि 24 और 25 मार्च को 5-5 लाख रुपये ट्रांसफर करवाए गए। 26 मार्च को करण तनेजा नामक एक अन्य शख्स से बातचीत कराई गई, जिसने ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच जारी तनाव व युद्ध का हवाला दिया। उसने दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी, इसलिए इसमें निवेश पर बड़ा मुनाफा होगा।

इसके बाद आरोपियों ने मार्जिन बढ़ाने, सोने-तेल में ट्रेडिंग और टैक्स चुकाने जैसे अलग-अलग बहानों से कुल मिलाकर 45.18 लाख रुपये से अधिक ऐंठ लिए। जब पीड़ित ने अपने पैसे निकालने चाहे, तो आरोपियों ने संपर्क तोड़ दिया।

पुलिस की कार्रवाई जारी

ठगी का अहसास होने पर पीड़ित ने भिलाई नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई। साइबर सेल की मदद से पुलिस ने मध्य प्रदेश के बैतूल से आरोपी विशाल नागले को धर दबोचा। पुलिस अब आरोपी के बैंक खातों, कॉल डिटेल्स और गिरोह के अन्य मुख्य सरगनाओं की पड़ताल में जुटी हुई है।

साइबर ठगी पर केंद्र सरकार का बड़ा एक्शन: 3,718 फर्जी ऐप्स ब्लॉक, 15.75 लाख से ज्यादा SIM और 5.77 लाख IMEI पर कार्रवाई

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नई दिल्ली- देश में बढ़ते साइबर अपराध और डिजिटल ठगी के खिलाफ केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने साइबर फ्रॉड से जुड़े 3,718 फर्जी और संदिग्ध मोबाइल ऐप्स को ब्लॉक कर दिया है। इसके साथ ही देशभर में 15.75 लाख से अधिक संदिग्ध SIM कार्ड और 5.77 लाख मोबाइल डिवाइस के IMEI नंबर भी ब्लॉक किए गए हैं।

सरकार की इस कार्रवाई का उद्देश्य साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे डिजिटल नेटवर्क को कमजोर करना और आम लोगों को ऑनलाइन ठगी से बचाना है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इन कदमों के जरिए ₹11,158 करोड़ से अधिक की संभावित साइबर ठगी को रोकने में मदद मिली है।

3,718 संदिग्ध ऐप्स पर लगा प्रतिबंध

डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर अपराधी भी ठगी के नए-नए तरीके अपना रहे हैं। फर्जी लोन ऐप, निवेश के नाम पर ठगी, फर्जी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म और अन्य संदिग्ध ऐप्स के माध्यम से लोगों से पैसे ऐंठने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

इन्हीं शिकायतों और विभिन्न पुलिस रिपोर्टों के आधार पर केंद्र सरकार ने 3,718 फर्जी या संदिग्ध मोबाइल ऐप्स को ब्लॉक किया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन ऐप्स को साइबर अपराध से जुड़े इनपुट और शिकायतों के आधार पर कार्रवाई के दायरे में लाया गया।

15.75 लाख से ज्यादा SIM कार्ड ब्लॉक

साइबर अपराधियों के लिए मोबाइल नंबर एक महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं। फर्जी पहचान या गलत दस्तावेजों के आधार पर जारी SIM कार्ड का इस्तेमाल OTP फ्रॉड, बैंकिंग ठगी, फर्जी कॉल और अन्य साइबर अपराधों में किया जा सकता है।

सरकार ने ऐसे संदिग्ध मोबाइल कनेक्शनों पर भी बड़ी कार्रवाई की है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 15.75 लाख से अधिक SIM कार्ड ब्लॉक किए गए हैं। इससे साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे मोबाइल नंबरों के नेटवर्क को रोकने में मदद मिलने की उम्मीद है।

5.77 लाख IMEI नंबर भी किए गए ब्लॉक

सिर्फ SIM कार्ड पर कार्रवाई करने के साथ सरकार ने मोबाइल डिवाइस के स्तर पर भी कदम उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक 5.77 लाख IMEI नंबरों को ब्लॉक किया गया है।

IMEI यानी International Mobile Equipment Identity एक विशिष्ट नंबर होता है, जो मोबाइल डिवाइस की पहचान में मदद करता है। किसी डिवाइस का IMEI ब्लॉक होने के बाद उस डिवाइस को मोबाइल नेटवर्क पर इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है।

इस तरह सरकार ने साइबर अपराध के खिलाफ ऐप, SIM और मोबाइल डिवाइस—तीनों स्तरों पर कार्रवाई की है।

₹11,158 करोड़ से ज्यादा की संभावित ठगी रोकी गई

सरकार की इस कार्रवाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका आर्थिक प्रभाव है। रिपोर्टों के अनुसार, विभिन्न साइबर सुरक्षा उपायों और कार्रवाई के चलते ₹11,158 करोड़ से अधिक की संभावित ठगी को रोका जा सका।

यह आंकड़ा बताता है कि साइबर अपराध अब केवल व्यक्तिगत स्तर की समस्या नहीं है, बल्कि यह देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था और वित्तीय सुरक्षा के लिए भी बड़ी चुनौती बन चुका है।

साइबर अपराधियों के डिजिटल नेटवर्क पर शिकंजा

साइबर ठगी करने वाले अपराधी अक्सर एक साथ कई डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं। फर्जी मोबाइल नंबर से कॉल करना, संदिग्ध ऐप डाउनलोड करवाना, लिंक भेजना, OTP हासिल करना और बैंक खातों से रकम निकालना जैसे तरीके साइबर फ्रॉड में इस्तेमाल किए जाते हैं।

ऐसे में केवल किसी एक नंबर या ऐप को ब्लॉक करना पर्याप्त नहीं होता। सरकार द्वारा SIM कार्ड और IMEI नंबरों पर भी कार्रवाई किए जाने से अपराधियों के पूरे डिजिटल नेटवर्क को बाधित करने की कोशिश की जा रही है।

‘मनी रिस्टोरेशन मॉड्यूल’ से पीड़ितों को राहत की कोशिश

साइबर ठगी के मामलों में कार्रवाई के साथ-साथ ठगी गई रकम को वापस दिलाने पर भी सरकार का ध्यान है। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2026 से ‘मनी रिस्टोरेशन मॉड्यूल’ शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य साइबर ठगी के पीड़ितों की रकम की रिकवरी में मदद करना है।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साइबर फ्रॉड के बाद पीड़ित के लिए केवल अपराधी को पकड़ना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि ठगी गई राशि को वापस पाना भी बड़ी चुनौती होती है।

आम लोगों के लिए क्या है संदेश?

सरकार की कार्रवाई के बावजूद साइबर ठगी से बचने के लिए आम नागरिकों को भी सतर्क रहना जरूरी है। किसी अनजान व्यक्ति को OTP, PIN, पासवर्ड या बैंकिंग जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए। संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने या अनजान ऐप डाउनलोड करने से भी बचना चाहिए।

निवेश, लोन, नौकरी, KYC अपडेट या किसी सरकारी योजना के नाम पर आने वाले संदिग्ध संदेशों और कॉल की पहले पुष्टि करना जरूरी है।

सरकार की कार्रवाई के प्रमुख आंकड़े

                     कार्रवाईसंख्या
  • ब्लॉक किए गए फर्जी/संदिग्ध ऐप्स
  • 3,718
  • ब्लॉक किए गए SIM कार्ड
  • 15.75 लाख+
  • ब्लॉक किए गए IMEI नंबर
  • 5.77 लाख
  • संभावित साइबर ठगी से बचाई गई राशि
  • ₹11,158 करोड़+

निष्कर्ष

डिजिटल लेन-देन और ऑनलाइन सेवाओं के बढ़ते इस्तेमाल के बीच साइबर अपराध भी तेजी से चुनौती बन रहा है। ऐसे समय में केंद्र सरकार द्वारा 3,718 ऐप्स, 15.75 लाख से अधिक SIM कार्ड और 5.77 लाख IMEI नंबरों पर कार्रवाई साइबर अपराध के डिजिटल ढांचे पर बड़े स्तर की कार्रवाई को दर्शाती है।

अब चुनौती यह है कि साइबर अपराधियों के नए तरीकों पर लगातार नजर रखी जाए और आम लोगों को भी डिजिटल सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाए। सरकार की कार्रवाई के साथ नागरिकों की सतर्कता ही ऑनलाइन ठगी के खिलाफ सबसे मजबूत सुरक्षा बन सकती है।

मैट्रिमोनियल साइट के जरिए दोस्ती, शादी और नौकरी का झांसा देकर 13 लाख ऐंठे; आरोपी दंपती गिरफ्तार

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 बिलासपुर : ऑनलाइन मैट्रिमोनियल साइट के जरिए महिलाओं को झांसा देकर लाखों रुपये और जेवर ठगने वाले एक दंपती को तोरवा पुलिस ने दिल्ली-हरियाणा सीमा से गिरफ्तार किया है। आरोपी खुद को अविवाहित बताकर महिलाओं से संपर्क करता था और बाद में शादी व नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी को अंजाम देता था।


मामले का खुलासा करते हुए पुलिस ने बताया कि कोरबा निवासी एक पीड़िता ने 9 मार्च को तोरवा थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। पीड़िता के अनुसार, 'शादी डॉट कॉम' के माध्यम से उसकी पहचान आरोपी पवन कुमार यादव (34) से हुई थी। पवन ने खुद को कुंवारा बताकर पीड़िता को शादी का भरोसा दिलाया और शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद सरकारी नौकरी लगवाने का झांसा देकर महिला से नगदी और सोने-चांदी के जेवर सहित कुल 12 से 13 लाख रुपये ऐंठ लिए।

फरार आरोपी पर था 5 हजार का इनाम

अपराध दर्ज होने के बाद आरोपी पवन यादव फरार हो गया। पुलिस ने पामगढ़ और सरकंडा स्थित उसके संभावित ठिकानों पर छापेमारी की, लेकिन उसका मोबाइल लगातार बंद आ रहा था। आरोपी की लगातार फरारी को देखते हुए पुलिस प्रशासन द्वारा उस पर 5,000 रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

पत्नी के बैंक खाते से मिला हरियाणा का सुराग

जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी के मोबाइल नंबर और बैंक खातों का विश्लेषण किया। जांच में पाया गया कि पवन के अधिकतर बैंक खाते बंद थे, लेकिन उसकी पत्नी नवीता यादव (30) के खाते में लेन-देन जारी था। बैंक ट्रांजेक्शन की लोकेशन ट्रेस करने पर बल्लभगढ़ (हरियाणा) से पैसे निकाले जाने की जानकारी मिली। तकनीकी साक्ष्यों और च्वाइस सेंटर से मिले इनपुट के आधार पर पुलिस टीम ने दबिश देकर दोनों पति-पत्नी को बल्लभगढ़ से धर दबोचा।

बीएनएस (BNS) की धाराओं के तहत कार्रवाई

तोरवा पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69, 318(4) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया है। आरोपियों को बिलासपुर लाकर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है। पुलिस अब ठगी गई रकम व जेवरों की बरामदगी के साथ यह भी जांच कर रही है कि इस गिरोह ने अन्य कितनी महिलाओं को अपना शिकार बनाया है।

CG NEWS : शादी से इनकार पर युवती की आपत्तिजनक तस्वीरें वायरल करने वाला प्रेमी गिरफ्तार

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 तखतपुर (बिलासपुर) : शादी का प्रस्ताव ठुकराने से नाराज युवक द्वारा अपनी पूर्व प्रेमिका की निजी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करने का गंभीर मामला सामने आया है। पीड़िता की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए तखतपुर थाना पुलिस ने आरोपी को कर्नाटक के बेंगलुरु से गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहाँ से उसे जेल भेज दिया गया है।


वीडियो कॉल का किया दुरुपयोग

पुलिस के अनुसार, आरोपी सुनील चतुर्वेदी का युवती के साथ प्रेम संबंध था। हाल ही में जब युवती ने शादी करने से इनकार कर दिया, तो आरोपी ने रंजिश रखते हुए पूर्व में वीडियो कॉल के दौरान ली गई आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर अपलोड कर दिए। घटना के बाद आरोपी फरार हो गया था।

साइबर सेल की मदद से मिली लोकेशन

तस्वीरें वायरल होने के बाद पीड़िता ने तखतपुर थाने में मामले की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आईटी एक्ट (IT Act) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की। थाना प्रभारी अवनीश पासवान के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यीय पुलिस टीम ने साइबर सेल की मदद से आरोपी की लोकेशन ट्रैक की, जो कर्नाटक के बेंगलुरु में मिली।

न्यायिक रिमांड पर भेजा गया जेल

पुलिस टीम ने बेंगलुरु में दबिश देकर आरोपी सुनील चतुर्वेदी को हिरासत में लिया और तखतपुर लाया। आरोपी को स्थानीय अदालत में पेश किया गया, जहाँ से न्यायालय के आदेश पर उसे न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है। पुलिस मामले की आगे की कानूनी कार्रवाई कर रही है।

CG NEWS : कम कीमत में सोना दिलाने के नाम पर 90 लाख की ठगी, महिला समेत 3 आरोपी गिरफ्तार

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 सक्ती : साइबर और ऑनलाइन ठगी के मामलों पर शिकंजा कसते हुए सक्ती पुलिस ने 90 लाख रुपये की धोखाधड़ी के एक बड़े मामले का भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने इस गिरोह की मुख्य सूत्रधार एक महिला सहित कुल तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। आरोपी एक नामी प्राइवेट फाइनेंस कंपनी का कर्मचारी होने का फायदा उठाकर भोले-भाले लोगों को अपना शिकार बनाते थे।


कम दाम में सोना दिलाने का जाल

पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, मुख्य आरोपी महिला रेखा राठौर अपने परिचितों को बैंक तथा फाइनेंस कंपनियों में गिरवी रखे गए (जब्तशुदा) सोने को नीलामी से काफी कम कीमत में दिलवाने का झांसा देती थी। इसी झांसे में आकर सक्ती के वार्ड निवासी मूलचंद राठौर आरोपियों के जाल में फंस गए। पीड़ितों को भरोसे में लेकर आरोपियों ने किस्तों में कुल 90 लाख रुपये अलग-अलग खातों और माध्यमों से ट्रांसफर करवा लिए।

विश्वास टूटने पर खुला राज

लंबा समय बीत जाने के बाद भी जब सोना नहीं मिला और आरोपी टालमटोल करने लगे, तब पीड़ित मूलचंद को अपने साथ हुई ठगी का अहसास हुआ। इसके बाद पीड़ित ने तुरंत सक्ती थाने पहुंचकर आपबीती सुनाई और लिखित शिकायत दर्ज कराई।

त्वरित कार्रवाई में सलाखों के पीछे पहुंचे आरोपी

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल अपराध दर्ज कर जांच शुरू की। पुलिस टीम ने दबिश देकर आरोपी महिला रेखा राठौर तथा उसके दो सहयोगियों—अफरोज खान एवं सुभाष साहू को धर दबोचा। आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी (IPC/BNS की संबंधित धाराओं) के तहत मामला दर्ज कर अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है। पुलिस अब गिरोह के बैंक खातों और अन्य संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की पड़ताल कर रही है।

CG NEWS : साथी का मोबाइल चुराकर ₹4.87 लाख उड़ाने वाला आरक्षक गिरफ्तार

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 जांजगीर-चांपा। साइबर थाना पुलिस ने ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी के एक सनसनीखेज मामले का खुलासा करते हुए 11वीं बटालियन धनरास में पदस्थ एक आरक्षक को गिरफ्तार किया है। आरोपी ने अपने ही साथी का मोबाइल फोन चोरी कर उसमें उपलब्ध व्यक्तिगत विवरणों का दुरुपयोग करते हुए नया यूपीआई आईडी बनाया और बैंक खाते से करीब ₹4.87 लाख की अनधिकृत निकासी कर ली। पुलिस के अनुसार, आरोपी ऑनलाइन गेम खेलने का आदी था और उसने पूरी रकम गेमिंग ऐप में उड़ा दी।


बैरक से चोरी हुआ था मोबाइल

पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, ग्राम चांदो (जिला बलरामपुर-रामानुजगंज) निवासी आरक्षक सुधीर कुमार सिंह (41), जो 11वीं बटालियन में कार्यरत हैं, ने साइबर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पीड़ित ने बताया कि 23 अप्रैल 2026 की रात उन्होंने अपना वीवो Y21 मोबाइल बैरक में चार्जिंग पर लगाया था। अगले दिन ड्यूटी पर जाने से पहले मोबाइल गायब मिला।

संदेही आरक्षक से पूछताछ में खुला राज

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए साइबर थाना पुलिस ने तकनीकी जांच शुरू की। जांच के दौरान 11वीं बटालियन में ही पदस्थ आरक्षक सुनील कुमार यादव की गतिविधियों पर संदेह हुआ। घटना के बाद से आरोपी का परिसर से गायब होना पुलिस का शक गहरा गया। पुलिस ने जब घेराबंदी कर उससे कड़ाई से पूछताछ की, तो उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

फर्जी UPI आईडी से निकाली रकम

जांच में सामने आया कि आरोपी ने चोरी किए गए मोबाइल से पीड़ित के व्यक्तिगत विवरणों का उपयोग करके एक नई यूपीआई आईडी बनाई। इसके बाद अलग-अलग किस्तों में कुल ₹4,87,911 अपने खाते व गेमिंग वॉलेट में ट्रांसफर कर लिए। पूछताछ में उसने बताया कि यह पूरी राशि उसने ऑनलाइन गेम खेलने के दौरान गंवा दी।

न्यायिक रिमांड पर भेजा गया आरोपी

पुलिस ने आरोपी के पास से घटना में प्रयुक्त मोबाइल और तकनीकी साक्ष्य जब्त किए हैं। मेमोरेंडम कथन के आधार पर पुलिस ने आरोपी आरक्षक सुनील कुमार यादव के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 303(2) तथा सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 66-C और 66-D के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तार किया और न्यायालय में पेश कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया।

आपत्तिजनक ऑनलाइन कंटेंट पर शिकंजा, प्रणित मोरे समेत कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज

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मुंबई- महाराष्ट्र साइबर पुलिस ने सोशल मीडिया पर कथित रूप से अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को लेकर स्टैंड-अप कॉमेडियन प्रणित मोरे, डॉ. सेजल पवार, हिमांशु जांगरा और अन्य संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। अधिकारियों के अनुसार, वायरल वीडियो क्लिप्स और ऑनलाइन प्रसारित कंटेंट की जांच के बाद यह कार्रवाई की गई।

महाराष्ट्र साइबर द्वारा दर्ज एफआईआर में आरोप है कि संबंधित व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत और प्रसारित सामग्री में अश्लील, आपत्तिजनक तथा सामाजिक संवेदनशीलता को प्रभावित करने वाले तत्व पाए गए। मामला नोडल साइबर पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया है और जांच एजेंसियां डिजिटल साक्ष्यों की विस्तृत पड़ताल कर रही हैं।

जांच के दौरान कुछ वायरल क्लिप्स को लेकर सार्वजनिक स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से प्रसारित सामग्री के कानूनी पहलुओं की जांच की जा रही है और मामले में शामिल अन्य व्यक्तियों की भूमिका भी खंगाली जा रही है।

इस बीच महाराष्ट्र साइबर ने प्रणित मोरे, हिमांशु जांगरा और डॉ. सेजल पवार को पूछताछ के लिए तलब किया है। अधिकारियों के मुताबिक जांच जारी है और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि विवादित स्टैंड-अप शो और उससे जुड़े वायरल वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बने हुए हैं। महाराष्ट्र साइबर का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कानून का उल्लंघन करने वाली सामग्री के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।

साइबर धोखाधड़ी और वित्तीय अपराधों से निपटने के लिए FIU-IND और I4C के बीच समझौता

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नई दिल्ली- भारत में साइबर धोखाधड़ी और वित्तीय अपराधों के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट-इंडिया (FIU-IND) और इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने सूचना साझा करने और समन्वय बढ़ाने के लिए एक व्यापक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

इस समझौते पर FIU-IND के निदेशक अमित मोहन गोविल और I4C के मुख्य कार्यकारी अधिकारी  राजेश कुमार ने हस्ताक्षर किए। यह समझौता साइबर धोखाधड़ी और वित्तीय अपराधों से निपटने में दोनों एजेंसियों के बीच सहयोग और खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान के नए दौर की शुरुआत का प्रतीक है।

यह पहल ऐसे समय में की गई है जब भारत का डिजिटल भुगतान तंत्र तेजी से विकसित हुआ है, जिसके साथ नागरिकों को साइबर अपराधों से सुरक्षित रखने की आवश्यकता भी बढ़ गई है। यह MoU दोनों एजेंसियों को परिचालन संबंधी जानकारी विकसित करने, जांच एजेंसियों को सहयोग देने, वित्तीय अपराधों की रोकथाम, डिजिटल लेनदेन की सुरक्षा और संपत्ति की रिकवरी में मदद करेगा।

समझौते का उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर धोखाधड़ी पहचान प्रणाली को मजबूत करने के लिए प्रभावी फीडबैक तंत्र स्थापित करना है। साथ ही, वित्तीय संस्थानों के लिए दिशा-निर्देश और ‘रेड फ्लैग’ संकेतकों का विकास और प्रसार भी किया जाएगा, जिससे साइबर धोखाधड़ी की रोकथाम को और सुदृढ़ किया जा सके।

यह कदम साइबर अपराधों के खिलाफ ‘पूरे सरकार’ (Whole of Government) दृष्टिकोण को अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

FIU-IND के बारे में:

फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट-इंडिया देश की केंद्रीय एजेंसी है, जो संदिग्ध वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारी प्राप्त, विश्लेषित और साझा करती है तथा मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ कार्रवाई का समन्वय करती है।

I4C के बारे में:

इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) गृह मंत्रालय के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण इकाई है, जो कानून प्रवर्तन एजेंसियों को साइबर अपराध से निपटने के लिए एक समन्वित ढांचा और प्लेटफॉर्म प्रदान करती है। I4C ने नेशनल साइबरक्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP), साइबर-पुलिस और सस्पेक्ट रजिस्ट्री जैसे प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं, जो विभिन्न एजेंसियों, बैंकों और वित्तीय संस्थानों के बीच रियल-टाइम जानकारी साझा करने में सहायक हैं।

केंद्र और राज्यों की संयुक्त पहल: साइबर अपराध से निपटने के लिए देशभर में साइबर पुलिस स्टेशनों का तेज़ विस्तार

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‘पुलिस’ और ‘लोक व्यवस्था’ भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार राज्य सूची के विषय हैं। इसलिए अपराधों की रोकथाम, पता लगाना, जाँच और अभियोजन, तथा साइबर अपराधों से निपटने के लिए साइबर क्राइम पुलिस स्टेशनों की स्थापना का दायित्व मुख्य रूप से राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों (LEAs) का है। केंद्र सरकार राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को सलाह जारी करके और विभिन्न योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता प्रदान कर उनकी क्षमता-वृद्धि में सहयोग करती है।

पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPR&D) अपनी रिपोर्ट “Data on Police Organizations” में साइबर सेल और साइबर क्राइम पुलिस स्टेशनों का वार्षिक डाटा प्रकाशित करता है। नवीनतम रिपोर्ट वर्ष 2024 की है। पिछले पाँच वर्षों में राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में कुल साइबर क्राइम पुलिस स्टेशनों की संख्या 169 (2020) से बढ़कर 459 (2024) हो गई है। विस्तृत विवरण परिशिष्ट में दिया गया है।

साइबर अपराधों से निपटने के लिए केंद्र सरकार की प्रमुख पहलें

1. भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की स्थापना

गृह मंत्रालय ने देश में सभी प्रकार के साइबर अपराधों से समग्र और समन्वित तरीके से निपटने के लिए I4C की स्थापना की है।

2. राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP)

  • वेबसाइट: cybercrime.gov.in

  • सभी प्रकार के साइबर अपराध, विशेषकर महिलाओं और बच्चों से संबंधित अपराधों की ऑनलाइन रिपोर्टिंग हेतु बनाया गया है।

  • यहाँ दर्ज शिकायतों पर आगे की कार्रवाई संबंधित राज्य/केंद्रशासित प्रदेश की एजेंसियाँ करती हैं।

3. नागरिक वित्तीय साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली (CFCFRMS)

  • वर्ष 2021 में शुरू की गई।

  • वित्तीय धोखाधड़ी की त्वरित रिपोर्टिंग और फंड्स को फ्रीज कराने में मदद करती है।

  • इसके लिए हेल्पलाइन 1930 संचालित की गई है।

4. साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर (CFMC)

  • I4C में स्थापित अत्याधुनिक केंद्र।

  • इसमें विभिन्न बैंकों, पेमेंट एग्रीगेटरों, टेलीकॉम, आईटी इंटरमीडियरीज और राज्यों की LEAs के प्रतिनिधि मिलकर कार्य करते हैं।

5. संयुक्त साइबर समन्वय टीमें (JCCTs)

मेवात, जामताड़ा, अहमदाबाद, हैदराबाद, चंडीगढ़, विशाखापट्टनम और गुवाहाटी — इन सात क्षेत्रों में साइबर अपराध हॉटस्पॉट्स को ध्यान में रखते हुए JCCTs स्थापित की गई हैं।

6. ‘समन्वय’ प्लेटफ़ॉर्म

  • यह MIS, डेटा रिपॉजिटरी और समन्वय मंच है।

  • राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के लिए साइबर अपराध डेटा, विश्लेषण और इंटरस्टेट लिंक तैयार करता है।

  • इसके माध्यम से अब तक 16,840 आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित हुई है और 1,05,129 साइबर जाँच सहायता अनुरोध पूरे किए गए हैं।

7. राज्यों में S4C/R4C केंद्र

  • राज्यों को I4C की तर्ज पर S4C/R4C स्थापित करने का अनुरोध किया गया है।

  • अब तक बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में S4C स्थापित हो चुके हैं।

परिशिष्ट: राज्य/केंद्रशासित प्रदेश अनुसार साइबर क्राइम पुलिस स्टेशनों की संख्या (2020–2024)

कुल संख्या: 169 (2020) → 459 (2024)
(डेटा: BPR&D — Data on Police Organizations, 2020–2024)

यह जानकारी गृह राज्य मंत्री बंडी संजय कुमार ने लोकसभा में लिखित उत्तर के रूप में दी।


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