Media24Media.com: गरबा में भागीदारी को लेकर छत्तीसगढ़ में सियासी बहस तेज, वक्फ बोर्ड की अपील के बाद राजनीतिक बयानबाजी

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गरबा में भागीदारी को लेकर छत्तीसगढ़ में सियासी बहस तेज, वक्फ बोर्ड की अपील के बाद राजनीतिक बयानबाजी

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रायपुर- शारदीय नवरात्रि के दौरान छत्तीसगढ़ में गरबा और डांडिया आयोजनों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। विवाद मुख्य रूप से गरबा आयोजनों में मुस्लिम युवाओं की भागीदारी, प्रवेश की अनुमति, धार्मिक परंपराओं के पालन और आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सामने आया है।

छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने मुस्लिम युवाओं से अपील की है कि यदि वे गरबा आयोजन में शामिल होते हैं तो आयोजन की धार्मिक परंपराओं और आस्था का सम्मान करें तथा आयोजन समिति से अनुमति लेकर ही प्रवेश करें। उनके बयान के अनुसार, गरबा को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम के बजाय धार्मिक आस्था से जुड़ा आयोजन मानते हुए उसकी परंपराओं का पालन किया जाना चाहिए।

वहीं, इस मुद्दे पर राज्य की राजनीति में भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने डॉ. सलीम राज के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि गरबा मां की आराधना से जुड़ा आयोजन है और जिन लोगों की इसमें आस्था नहीं है, उन्हें पंडाल में नहीं जाना चाहिए।

गरबा आयोजनों में प्रवेश और सुरक्षा को लेकर बजरंग दल की ओर से भी प्रशासन के समक्ष अलग-अलग मांगें रखे जाने की रिपोर्ट है। संगठन ने आयोजनों में प्रवेश व्यवस्था, पहचान और सुरक्षा से संबंधित दिशा-निर्देशों की मांग की है। इस वजह से रायपुर समेत प्रदेश के अन्य हिस्सों में गरबा आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम न रहकर धार्मिक परंपरा, सुरक्षा और सामाजिक भागीदारी से जुड़े मुद्दों की चर्चा का केंद्र बन गए हैं।

इस बहस का दूसरा पक्ष भी सामने आया है। सितंबर में रायपुर दौरे के दौरान केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने गरबा और डांडिया आयोजनों में मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक लगाने की मांगों का विरोध किया था। उन्होंने संविधान में सभी धर्मों को समान अधिकार मिलने और अलग-अलग समुदायों के लोगों के एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होने की बात कही थी।

इस तरह छत्तीसगढ़ में गरबा को लेकर मौजूदा बहस के केंद्र में दो अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई दे रहे हैं। एक पक्ष गरबा की धार्मिक प्रकृति और परंपराओं के सम्मान पर जोर दे रहा है, जबकि दूसरा पक्ष धार्मिक आयोजनों में विभिन्न समुदायों की भागीदारी और संवैधानिक समानता का मुद्दा उठा रहा है। फिलहाल यह बहस राजनीतिक बयानों और सामाजिक प्रतिक्रियाओं के स्तर पर जारी है।

गौरतलब है कि गरबा आयोजनों में प्रवेश के नियम अंततः संबंधित आयोजन समितियों और स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था पर भी निर्भर करते हैं। अलग-अलग आयोजनों के नियम एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं है। इसलिए किसी एक संगठन या व्यक्ति के बयान को पूरे प्रदेश में लागू नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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