Media24Media.com: 101 वर्षों से जीवंत है लाफिनकला की रामलीला परंपरा, बालिकाओं ने निभाई अहम भूमिका

Responsive Ad Slot

Latest

latest


 

101 वर्षों से जीवंत है लाफिनकला की रामलीला परंपरा, बालिकाओं ने निभाई अहम भूमिका

Document Thumbnail

महासमुंद- जिला मुख्यालय से 8 किमी दूर ग्राम लाफिनकला में 101 साल पुरानी रामलीला की परंपरा आज भी जीवंत है। बदलते दौर और मनोरंजन के आधुनिक साधनों के बीच गांव के युवा हर साल दशहरा पर रामलीला का मंचन कर सांस्कृतिक विरासत को सहेज रहे हैं। इस बार  आयोजन बाल समाज के युवाओं ने किया, जिसमें बालिकाओं की भागीदारी विशेष आकर्षण रही।लीला मंडली के सचिव रामजी साहू ने बताया कि समय के साथ पात्र जुटाना कठिन हो गया है, फिर भी परंपरा को टूटने नहीं दिया जा रहा। पहले गांव में 3 से 9 दिनों तक रामलीला-कृष्णलीला के साथ श्रवण कुमार, राजा हरिश्चंद्र, मोरध्वज, चरणदास चोर, मयारू भौजी, सती नाग चंपा जैसे नाटकों का मंचन होता था। बुजुर्ग बताते हैं कि तब मनोरंजन के साधन कम थे, लोग रातभर लीला देखते थे और इससे धर्म, सत्य, त्याग व कर्तव्य की शिक्षा मिलती थी। वहीं गांव शिक्षक गोवर्धन साहू व महेन्द्र पटेल ने कहा कि 101 वर्ष पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाना नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है। इससे धार्मिक संदेश के साथ सामाजिक चेतना भी फैलती है। इस वर्ष पुरुष पात्रों की कमी के कारण बालिकाओं को भी शामिल किया गया, जिन्होंने उत्साह से विभिन्न भूमिकाएं निभाकर आयोजन को सफल बनाया। यह गांव की बदलती सोच का भी प्रतीक बना।

इस परंपरा की नींव स्व. सियाराम साहू, स्व. जीवन साहू, स्व.जगदेव साहू, स्व. उत्तम साहू, स्व. ओनूराम साहू, लीलाराम साहू व सुखेन्द पटेल ने रखी थी। बाद में जगदीश साहू, सुकदेव साहू, अनूप राम साहू व मंगतू साहू ने इसे आगे बढ़ाया।

इस वर्ष आयोजन में रामजी साहू, हरिराम साहू, गोवर्धन साहू, महेंद्र पटेल, जनक राम साहू, संतराम साहू, पंचराम साहू,टीका पटेल, नेतन पटेल, भानू  साहू, अनिल  साहू, विजय साहू,पुरानिक साहू सहित अन्य युवाओं  का विशेष सहयोग रहा। लाफिन कला की रामलीला अब केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।


Advertisement Sushasan Divas Advertisement Mohan Chandrakar Chhattisgarh Tourism Chhattisgarh Tourism
Don't Miss
© Media24Media | All Rights Reserved | Infowt Information Web Technologies.