Media24Media.com: नाबालिग पत्नी से शादी की तो भी POCSO से नहीं बच पाएगा पति, HC का बड़ा फैसला

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नाबालिग पत्नी से शादी की तो भी POCSO से नहीं बच पाएगा पति, HC का बड़ा फैसला

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 नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुआ विवाह किसी वयस्क आरोपी को POCSO एक्ट या आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई से स्वतः सुरक्षा नहीं देता। जस्टिस संजीव नरूला ने 23 सितंबर 2026 के आदेश में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया।


अदालत के समक्ष आरोपी की ओर से दलील दी गई थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत यौवनावस्था प्राप्त कर चुकी लड़की का विवाह वैध माना जा सकता है और इसलिए पति-पत्नी के बीच बने संबंधों को आपराधिक कृत्य नहीं माना जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

16 साल 3 महीने की लड़की से शादी का मामला

यह मामला उस समय का है जब लड़की की उम्र 16 साल 3 महीने थी, जबकि युवक की उम्र 28 साल थी। दोनों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी की और साथ रहने लगे। बाद में लड़की गर्भवती हुई।

गर्भावस्था के दौरान लड़की सरकारी अस्पताल पहुंची, जहां उसकी उम्र सामने आने के बाद अस्पताल की ओर से मामले की जानकारी पुलिस को दी गई। इसके बाद युवक के खिलाफ POCSO एक्ट समेत संबंधित आपराधिक धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, लड़की ने जून में मृत बच्चे को जन्म दिया था।

कोर्ट ने कहा- शादी से बच्चे की उम्र नहीं बदल जाती

जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि किसी बच्चे की उम्र विवाह के बाद बदल नहीं जाती। अदालत के अनुसार, यदि घटना के समय लड़की 18 वर्ष से कम उम्र की थी, तो POCSO कानून के तहत वह ‘बच्चे’ की श्रेणी में आती है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्सनल लॉ किसी व्यक्ति को ऐसे आपराधिक कानून से छूट नहीं दे सकता, जिसमें संसद ने ऐसी कोई छूट निर्धारित नहीं की है। अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द करने की मांग ठुकरा दी।

नाबालिग पत्नी ने किया था पति का बचाव

मामले में नाबालिग लड़की ने अपने पति का बचाव भी किया था। उसने अदालत को बताया कि दोनों परिवारों की सहमति से शादी हुई थी और उस पर किसी तरह का दबाव या जबरदस्ती नहीं की गई। उसने पहले आरोपी की जमानत याचिका का भी समर्थन किया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तथ्य को आपराधिक मामले को खत्म करने का आधार नहीं माना। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह होने के कारण 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध को POCSO के दायरे से बाहर किया जा सकता है। कोर्ट ने इसका जवाब नहीं में दिया।

POCSO में 18 साल से कम उम्र का व्यक्ति ‘बच्चा’

POCSO एक्ट के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इसी वैधानिक उम्र-सीमा को आधार बनाया। अदालत ने कहा कि पर्सनल लॉ के तहत विवाह की वैधता का सवाल अलग हो सकता है, लेकिन इससे POCSO और अन्य लागू आपराधिक प्रावधानों के तहत जिम्मेदारी स्वतः समाप्त नहीं होती।

इस फैसले का मुख्य कानूनी निष्कर्ष यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुआ विवाह, यदि पत्नी घटना के समय 18 वर्ष से कम उम्र की थी, तो केवल विवाह की स्थिति के आधार पर POCSO मामले से आपराधिक सुरक्षा नहीं देता।

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