Media24Media.com: एक घंटे के साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण के लिए शिक्षकों का जान जोखिम में क्यों डाला गया?

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एक घंटे के साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण के लिए शिक्षकों का जान जोखिम में क्यों डाला गया?

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महासमुंद- साइबर सुरक्षा आज के समय में अत्यंत आवश्यक विषय है, लेकिन इसके नाम पर आयोजित किए जा रहे प्रशिक्षण की गुणवत्ता, अवधि और व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। केवल एक घंटे के प्रशिक्षण के लिए जिले के शिक्षकों को जिला मुख्यालय बुलाना, वह भी तेज बारिश के मौसम में, क्या वास्तव में उचित है? क्या महज प्रमाण-पत्र देने से शिक्षक साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक और प्रशिक्षित हो जाएंगे?

साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण की उपयोगिता पर शिक्षक गेंदलाल कोकडिया ने सवाल उठाते हुए कहा कि एक घंटे के प्रशिक्षण के लिए शिक्षकों को दूर-दराज से जिला मुख्यालय बुलाने से शिक्षकों के साथ-साथ विद्यार्थियों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। बरसात के मौसम में लंबी दूरी तय करने के दौरान शिक्षकों की जान-माल की सुरक्षा का जोखिम भी बना रहता है। हाल के दिनों में बारिश के कारण कई स्थानों पर दुर्घटनाओं की घटनाएं सामने आई हैं, ऐसे में गैर-जरूरी आवागमन को कम करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।

कोकडिया का कहना है कि प्रशिक्षण में दी गई साइबर सुरक्षा से संबंधित अधिकांश सामान्य जानकारियां आज शिक्षकों तक टीवी, मोबाइल, समाचार माध्यमों और विभिन्न जागरूकता अभियानों के जरिए पहले से पहुंच रही हैं। यदि वास्तव में शिक्षकों को साइबर अपराधों से बचाव के लिए प्रशिक्षित करना है तो प्रशिक्षण केवल औपचारिकता न होकर व्यावहारिक, संवादात्मक और विस्तृत होना चाहिए।

उनके अनुसार, इस प्रशिक्षण को जिला मुख्यालय पर केवल एक घंटे में आयोजित करने के बजाय संकुल स्तर पर संकुल समन्वयकों के माध्यम से भी कराया जा सकता है। पहले संकुल समन्वयकों को अच्छी तरह प्रशिक्षित किया जाए और उसके बाद वे अपने-अपने संकुल के शिक्षकों को प्रशिक्षण दें। इससे शिक्षकों का यात्रा समय बचेगा, विद्यार्थियों की पढ़ाई कम प्रभावित होगी और प्रशासन का खर्च भी घटेगा।

एक घंटे का प्रशिक्षण कितना प्रभावी?

साइबर अपराध लगातार नए रूप में सामने आ रहे हैं। ऐसे में केवल भाषण सुनाकर या जानकारी देकर साइबर सुरक्षा की समझ विकसित नहीं की जा सकती। प्रशिक्षण में वास्तविक उदाहरण, साइबर ठगी के तरीके, फर्जी कॉल और लिंक की पहचान, बैंकिंग धोखाधड़ी से बचाव, सोशल मीडिया सुरक्षा, पासवर्ड सुरक्षा, डेटा सुरक्षा तथा साइबर अपराध होने अथवा प्रयास किए जाने पर तत्काल क्या कदम उठाए जाएं—इन सभी विषयों पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए।

वन-वे प्रशिक्षण प्रभावी नहीं होते। प्रशिक्षण में शिक्षकों को सवाल पूछने, अपने अनुभव साझा करने, उदाहरणों पर चर्चा करने और समस्याओं का समाधान समझने का अवसर मिलना चाहिए। आपसी संवाद और प्रश्नोत्तर ही किसी प्रशिक्षण को प्रभावी बनाते हैं।

साइबर अपराध रोकने के लिए व्यवस्था में भी बदलाव जरूरी

कोकडिया ने कहा कि केवल जनता को जागरूक करने से साइबर अपराध पूरी तरह नहीं रुकेंगे। साइबर कानूनों को और प्रभावी बनाने के साथ-साथ साइबर अपराध से संबंधित शिकायतों पर पुलिस की त्वरित कार्रवाई भी जरूरी है।

यदि किसी व्यक्ति को ठगने का प्रयास किया जा रहा है, फर्जी कॉल या संदेश के माध्यम से धोखाधड़ी का प्रयास किया जा रहा है, तो ऐसे मामलों को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। केवल पैसा खाते से निकल जाने के बाद ही कार्रवाई करने की बजाय धोखाधड़ी के प्रयास की सूचना पर भी तत्काल कार्रवाई और मार्गदर्शन की व्यवस्था होनी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस एवं संबंधित अधिकारियों को साइबर अपराध के नए तरीकों के बारे में लगातार प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि आम नागरिकों को समय पर सहयोग और सही मार्गदर्शन मिल सके।

टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ाना होगा

आज साइबर अपराधी तकनीक का इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक तरीकों से साइबर अपराधों का मुकाबला करना पर्याप्त नहीं होगा। हमें आधुनिक तकनीक को समझना और उसका प्रभावी उपयोग करना होगा।

ऐसी तकनीकी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है, जिससे संदिग्ध नंबर, फर्जी कॉल और साइबर ठगी के प्रयासों की पहचान जल्द से जल्द हो सके तथा संबंधित एजेंसियों तक सूचना पहुंच सके। साइबर सुरक्षा केवल प्रशिक्षण का विषय नहीं, बल्कि तकनीक, कानून, पुलिस व्यवस्था और जन-जागरूकता—इन सभी के समन्वय का विषय है।

प्रमाण-पत्र नहीं, वास्तविक प्रशिक्षण चाहिए

एक घंटे के प्रशिक्षण के बाद यदि हजारों शिक्षकों के प्रमाण-पत्र तैयार करने में लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, तो यह भी विचारणीय है कि उस खर्च से वास्तविक रूप से कितना साइबर सुरक्षा कौशल विकसित हुआ।

यदि शिक्षक पहले से सामान्य साइबर सुरक्षा जानकारी रखते हैं और प्रशिक्षण केवल प्रमाण-पत्र तक सीमित रह जाता है, तो यह शिक्षकों के साथ भी अन्याय है और सरकारी संसाधनों का भी उचित उपयोग नहीं है।

गेंदलाल कोकडिया ने कहा कि सरकारी प्रशिक्षण केवल औपचारिकता के लिए एक घंटे का नहीं होना चाहिए। यदि प्रशिक्षण आवश्यक है तो उसे पर्याप्त समय देकर प्रभावी तरीके से कराया जाए।

पूरे दिन का प्रशिक्षण हो

साइबर सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कम से कम एक पूरे दिन का व्यावहारिक प्रशिक्षण आयोजित किया जाना चाहिए। इसमें विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण, वास्तविक साइबर ठगी के उदाहरण, प्रश्नोत्तर, साइबर अपराध की शिकायत की प्रक्रिया, डिजिटल सुरक्षा के उपाय और व्यवहारिक अभ्यास शामिल किए जाने चाहिए।

इसके साथ ही शिक्षकों को जिला मुख्यालय बुलाने के बजाय पहले संकुल समन्वयकों को प्रशिक्षित कर संकुल स्तर पर प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए। इससे समय, धन और यात्रा का खर्च बचेगा तथा विद्यार्थियों की पढ़ाई भी कम प्रभावित होगी।

गेंदलाल कोकडिया का कहना है कि साइबर सुरक्षा निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन प्रशिक्षण भी उतना ही गुणवत्तापूर्ण होना चाहिए। महज एक घंटे का प्रशिक्षण और प्रमाण-पत्र बांटना समाधान नहीं है। यदि उद्देश्य वास्तव में शिक्षकों को साइबर सुरक्षा के प्रति सक्षम बनाना है, तो प्रशिक्षण पूरे दिन का, संवादात्मक, व्यावहारिक और स्थानीय स्तर पर आयोजित किया जाना चाहिए।

सवाल यह नहीं है कि साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण जरूरी है या नहीं—सवाल यह है कि प्रशिक्षण ऐसा हो, जिससे वास्तव में शिक्षक और समाज साइबर अपराध से सुरक्षित हो सकें।

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