Media24Media.com: भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर बड़ा सवाल: रॉकेट लॉन्च लागत में भारत सबसे महंगा?

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भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर बड़ा सवाल: रॉकेट लॉन्च लागत में भारत सबसे महंगा?

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नई दिल्ली- भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय से अपनी कम लागत और “frugal engineering” के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। लेकिन Cambridge University और Politecnico di Torino के शोधकर्ताओं की एक नई peer-reviewed study ने इसी धारणा पर सवाल खड़े किए हैं।

अध्ययन के अनुसार, 2025 में भारत से Low Earth Orbit (LEO) में 1 किलोग्राम payload भेजने की अनुमानित लागत करीब $13,302 प्रति किलोग्राम थी। यह अध्ययन में शामिल प्रमुख space powers में सबसे अधिक है।

भारत की लागत अमेरिका से करीब चार गुना

अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार 2025 में अनुमानित LEO launch cost इस प्रकार थी:

  • भारत — $13,302/kg

  •  यूरोप — $9,897/kg

  •  रूस — $6,682/kg

  •  चीन — $5,809/kg

  •  जापान — $5,287/kg

  •  अमेरिका — $3,225/kg

वैश्विक औसत करीब $3,868/kg था। यानी भारत का अनुमानित per-kilogram cost अमेरिका के मुकाबले लगभग चार गुना था।

भारत की लागत इतनी ज्यादा क्यों?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।

यह आंकड़ा किसी ग्राहक से वसूली जाने वाली सीधी commercial launch price नहीं है। यह शोधकर्ताओं द्वारा निकाला गया औसत cost-per-kilogram estimate है।

शोध के अनुसार भारत में अपेक्षाकृत छोटे payloads और कम launch frequency के कारण एक rocket launch की fixed लागत कम kilograms पर distribute होती है। इससे हर kilogram की अनुमानित लागत बढ़ जाती है।

दूसरी ओर, अमेरिका में बड़े rockets, ज्यादा launch frequency और reusable launch systems ने cost efficiency को काफी बढ़ाया है।

 भारत की “कम लागत वाली Space Power” वाली छवि पर सवाल

भारत की ISRO को लंबे समय से कम लागत में बड़े space missions पूरा करने के लिए सराहा जाता है।

उदाहरण के तौर पर, Cambridge Judge Business School ने भी भारत के Mars Orbiter Mission और Chandrayaan-3 को relatively modest budgets में हासिल किए गए महत्वपूर्ण space achievements के रूप में रेखांकित किया है।

लेकिन नई study एक अलग चीज मापती है:

एक पूरे space mission की कुल लागत नहीं, बल्कि Low Earth Orbit तक 1 kilogram payload पहुंचाने की अनुमानित लागत।

इसलिए दोनों आंकड़ों को सीधे एक-दूसरे के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।

Study कितनी बड़ी थी?

शोधकर्ताओं Alessio Terzi और Francesco Nicoli ने दशकों के rocket-launch data का इस्तेमाल किया। संबंधित research में हजारों launches का database इस्तेमाल किया गया है, ताकि यह समझा जा सके कि समय के साथ launch technology और experience से costs कैसे बदलती हैं।

शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि launch frequency और accumulated experience लागत घटाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

अमेरिका को क्यों मिल रहा है बड़ा फायदा?

अमेरिका के space-launch ecosystem में बड़ी commercial कंपनियां और high-frequency launch operations हैं।

विशेष रूप से SpaceX ने reusable rockets और लगातार launches के जरिए launch economics को बदल दिया है।

Cambridge की एक अन्य 2026 analysis के अनुसार, 2025 में SpaceX का global orbital payload market में करीब 75% हिस्सा था।

इस तरह बड़े पैमाने पर launches होने से infrastructure, technology और operational experience की लागत ज्यादा missions में spread होती है।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

यह study भारत के बढ़ते commercial space sector के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी मानी जा सकती है।

भारत अब सिर्फ सरकारी space missions तक सीमित नहीं रहना चाहता। देश में private launch companies और satellite businesses तेजी से विकसित हो रहे हैं।

ऐसे में वैश्विक launch market में प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारत को:

  •  launch frequency बढ़ानी होगी

  •  ज्यादा payload capacity विकसित करनी होगी

  •  reusable launch technology पर काम बढ़ाना होगा

  •  private-sector participation को मजबूत करना होगा

  •  economies of scale हासिल करनी होंगी

 क्या इसका मतलब है कि ISRO के सभी missions महंगे हैं?

नहीं।

यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि भारत का हर space mission अमेरिका से महंगा है।

Study का आंकड़ा खास तौर पर estimated cost per kilogram to Low Earth Orbit से संबंधित है। यह किसी एक मिशन की कुल लागत या ISRO की पूरी space programme की लागत को नहीं दर्शाता।

क्यों महत्वपूर्ण है यह खबर?

भारत अगले दशक में अपने space economy को तेजी से विस्तार देने की तैयारी कर रहा है। ऐसे समय में global launch market में कम लागत और high-frequency launches भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

इस study का संदेश साफ है:

भारत ने कम लागत वाले space missions में शानदार सफलता हासिल की है, लेकिन commercial orbital launch economics में अभी अमेरिका और अन्य प्रमुख space powers से बड़ी चुनौती बनी हुई है।

 Bottom Line

Cambridge-linked research के अनुसार 2025 में भारत का estimated LEO launch cost $13,302 प्रति किलोग्राम था—major space powers में सबसे ज्यादा।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत का पूरा space programme महंगा है। असल चुनौती launch scale, payload capacity, launch frequency और reusable technology में है।

अगर भारत इन क्षेत्रों में तेजी से सुधार करता है, तो उसकी बढ़ती private space industry आने वाले वर्षों में global launch market में ज्यादा competitive बन सकती है।

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