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सौर रेडियो तरंगों के रहस्य से उठा पर्दा, भारतीय वैज्ञानिकों ने सुलझाई टाइप-II बर्स्ट की पहेली

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 सौर ज्वालाओं (Solar Flares) से उत्पन्न सौर कोरोना शॉक्स पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने रेडियो तरंगों के ‘फंडामेंटल’ (मूल) और ‘हार्मोनिक’ (ओवरटोन) उत्सर्जन की सापेक्ष तीव्रता में होने वाले अंतर के पीछे के रहस्य को सुलझा लिया है।

यह अध्ययन इस बात की समझ को बेहतर बनाता है कि सौर शॉक्स रेडियो तरंगें कैसे उत्पन्न करते हैं और वे कोरोना में कैसे प्रसारित होती हैं। इससे अंतरिक्ष मौसम (Space Weather) के पूर्वानुमान में भी मदद मिल सकती है।

सौर ज्वालाओं या कोरोनल मास इजेक्शन (CME) से उत्पन्न शॉक्स ‘टाइप-II सोलर रेडियो बर्स्ट’ नामक विशेष प्रकार की रेडियो तरंगें उत्पन्न करते हैं। ये बर्स्ट लगभग 1000 किमी/सेकंड की गति से फैलते हैं और रेडियो तरंगों के रूप में दर्ज किए जाते हैं। ये उच्च आवृत्ति से निम्न आवृत्ति की ओर धीरे-धीरे शिफ्ट होते हैं, क्योंकि शॉक बाहर की ओर बढ़ता है।

आमतौर पर टाइप-II बर्स्ट दो भागों में होते हैं—फंडामेंटल और हार्मोनिक उत्सर्जन। सिद्धांत के अनुसार फंडामेंटल उत्सर्जन अधिक शक्तिशाली होना चाहिए, लेकिन कई बार हार्मोनिक उत्सर्जन अधिक मजबूत पाया गया, जो वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली था।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में एक टीम ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए दुनिया भर में स्थित CALLISTO उपकरणों और गौरिबिदनूर रेडियो वेधशाला के GLOSS स्पेक्ट्रोग्राफ से प्राप्त 58 टाइप-II रेडियो बर्स्ट के डेटा का विश्लेषण किया।

अध्ययन में पाया गया कि सूर्य के 75° से अधिक हेलियोग्राफिक देशांतर वाले सक्रिय क्षेत्रों से उत्पन्न घटनाओं में हार्मोनिक उत्सर्जन अधिक मजबूत होता है, जबकि 75° से कम देशांतर (सौर डिस्क के केंद्र के पास) से उत्पन्न घटनाओं में फंडामेंटल उत्सर्जन अधिक मजबूत होता है। यह अंतर सौर कोरोना में अपवर्तन प्रभाव, उत्सर्जन की दिशा और पृथ्वी से देखने के कोण के कारण होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, 75° से अधिक देशांतर वाले क्षेत्रों से आने वाले फंडामेंटल उत्सर्जन पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाते या कमजोर हो जाते हैं, जबकि हार्मोनिक उत्सर्जन व्यापक कोण में फैलते हैं, इसलिए वे अधिक मजबूत दिखाई देते हैं।

इस शोध के प्रमुख अन्वेषक डॉ. के. ससिकुमार राजा और प्रथम लेखक ऋषिकेश जी. झा ने बताया कि भविष्य में मशीन लर्निंग तकनीकों का उपयोग कर ऐसे विशाल डेटा का और गहराई से अध्ययन किया जाएगा।

यह शोध ‘सोलर फिजिक्स’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है और इससे सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष मौसम की बेहतर समझ विकसित करने में मदद मिलेगी।

अंतर Galactic माध्यम (IGM) से गैलेक्सियों के चारों ओर गैस के मापन पर प्रभाव: RRI अध्ययन

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रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (RRI) के नए अध्ययन में सामने आया कि इंटरगैलेक्टिक मीडियम (IGM) गैलेक्सी के चारों ओर फैले सर्कमगैलेक्टिक मीडियम (CGM) के माप को प्रभावित कर सकता है

गैलेक्सी के चारों ओर परिक्रहीय माध्यम (Circumgalactic Medium) का कलात्मक चित्रण

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (RRI), जो कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का स्वायत्त संस्थान है, के एक नए अध्ययन ने यह खुलासा किया है कि इंटरगैलेक्टिक मीडियम (IGM) की सामग्री गैलेक्सी के चारों ओर फैले डिफ्यूज एनवलप (CGM) के माप को प्रभावित कर सकती है। CGM का सही अनुमान लगाना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गैलेक्सियों के निर्माण और विकास की प्रक्रिया को समझने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

गैलेक्सी की बाहरी परिधि के बाहर एक पतला और भूत-सा हैलो(Halo) फैला होता है, जिसे सर्कमगैलेक्टिक मीडियम (CGM) कहते हैं। CGM में मुख्य रूप से गैस होती है और यह गैलेक्सी को कॉस्मिक वेब से जोड़ता है। CGM का मापन आमतौर पर उच्च आयनित ऑक्सीजन के माध्यम से किया जाता है।

लेकिन माप में समस्या यह है कि CGM और IGM दोनों एक ही लाइन ऑफ साइट में होते हैं, इसलिए ऑब्जर्वेशन के दौरान यह अलग करना मुश्किल होता है कि ऑक्सीजन CGM से है या IGM से। वर्तमान मॉडल्स पूरी ऑब्ज़र्व की गई ऑक्सीजन को CGM से मान लेते हैं।

गैलेक्सियों के चारों ओर आयनीकृत ऑक्सीजन की उपस्थिति का कलात्मक चित्रण और उनके अवलोकन का सिद्धांत

RRI के शोधकर्ताओं ने मॉडलिंग के माध्यम से यह सुझाव दिया है कि CGM में मापी गई गैस का एक बड़ा हिस्सा वास्तव में IGM से आ रहा हो सकता है।

महत्वपूर्ण निष्कर्ष:

  • उच्च द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों (जैसे हमारी मिल्की वे) में CGM आयनित ऑक्सीजन का लगभग 50% योगदान देती है, जबकि शेष 50% IGM से आता है।

  • कम द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों में यह प्रतिशत 30% तक कम हो सकता है।

  • यह अध्ययन दर्शाता है कि CGM के माप में IGM के योगदान को ध्यान में रखना जरूरी है।

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोधकर्ता और हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के सहयोगियों ने इस मॉडल को और व्यापक और यथार्थपरक बनाने पर काम करना शुरू कर दिया है, ताकि CGM और IGM के बीच अंतर को और स्पष्ट किया जा सके।

यह अध्ययन हमें यह समझने में मदद करेगा कि गैलेक्सियों के निर्माण और विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक क्या हैं और उन्हें अधिक सटीक रूप से मापा जा सके।रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (RRI) के नए अध्ययन में सामने आया कि इंटरगैलेक्टिक मीडियम (IGM) गैलेक्सी के चारों ओर फैले सर्कमगैलेक्टिक मीडियम (CGM) के माप को प्रभावित कर सकता है

कम द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों के मामले में अंतर-गैलेक्सीय माध्यम में आयनीकृत ऑक्सीजन की उपस्थिति का कलात्मक चित्रण

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (RRI), जो कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का स्वायत्त संस्थान है, के एक नए अध्ययन ने यह खुलासा किया है कि इंटरगैलेक्टिक मीडियम (IGM) की सामग्री गैलेक्सी के चारों ओर फैले डिफ्यूज एनवलप (CGM) के माप को प्रभावित कर सकती है। CGM का सही अनुमान लगाना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गैलेक्सियों के निर्माण और विकास की प्रक्रिया को समझने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

गैलेक्सी की बाहरी परिधि के बाहर एक पतला और भूत-सा हало फैला होता है, जिसे सर्कमगैलेक्टिक मीडियम (CGM) कहते हैं। CGM में मुख्य रूप से गैस होती है और यह गैलेक्सी को कॉस्मिक वेब से जोड़ता है। CGM का मापन आमतौर पर उच्च आयनित ऑक्सीजन के माध्यम से किया जाता है।

लेकिन माप में समस्या यह है कि CGM और IGM दोनों एक ही लाइन ऑफ साइट में होते हैं, इसलिए ऑब्जर्वेशन के दौरान यह अलग करना मुश्किल होता है कि ऑक्सीजन CGM से है या IGM से। वर्तमान मॉडल्स पूरी ऑब्ज़र्व की गई ऑक्सीजन को CGM से मान लेते हैं।

RRI के शोधकर्ताओं ने मॉडलिंग के माध्यम से यह सुझाव दिया है कि CGM में मापी गई गैस का एक बड़ा हिस्सा वास्तव में IGM से आ रहा हो सकता है।

महत्वपूर्ण निष्कर्ष:

  • उच्च द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों (जैसे हमारी मिल्की वे) में CGM आयनित ऑक्सीजन का लगभग 50% योगदान देती है, जबकि शेष 50% IGM से आता है।

  • कम द्रव्यमान वाली गैलेक्सियों में यह प्रतिशत 30% तक कम हो सकता है।

  • यह अध्ययन दर्शाता है कि CGM के माप में IGM के योगदान को ध्यान में रखना जरूरी है।

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोधकर्ता और हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के सहयोगियों ने इस मॉडल को और व्यापक और यथार्थपरक बनाने पर काम करना शुरू कर दिया है, ताकि CGM और IGM के बीच अंतर को और स्पष्ट किया जा सके।

यह अध्ययन हमें यह समझने में मदद करेगा कि गैलेक्सियों के निर्माण और विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक क्या हैं और उन्हें अधिक सटीक रूप से मापा जा सके।

युवा तारों के प्रारंभिक जीवन की अस्थिरता का नया अध्ययन: बदलाव और अनपेक्षित चमकें उजागर

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एक नए अध्ययन ने युवा तारों (Young Stellar Objects - YSOs) के प्रारंभिक जीवन की अस्थिरता पर पर्दा उठाया है, जिससे पता चला कि तारों का शुरुआती जीवन पहले सोचे गए से कहीं अधिक उथल-पुथल और परिवर्तनशील होता है।

प्रोटोस्ट्रार के चार विकासात्मक चरणों का योजनात्मक चित्रण (एंड्रिया इसेला के 2006 के शोध प्रबंध से अनुकूलित):

  • क्लास 0: ये तारे घने आवरण (dense envelope) में पूरी तरह से ढके होते हैं, और इनके केंद्र में एक छोटा कोर (core) होता है।

  • क्लास I: कोर का आकार बढ़ता रहता है और एक सपाट परिक्रामी डिस्क (flattened circumstellar disk) बनने लगती है।

  • क्लास II: अधिकांश आसपास की सामग्री गैस और धूल की प्रमुख डिस्क में व्यवस्थित हो जाती है।

  • क्लास III: अंतिम चरण में डिस्क लगभग समाप्त हो जाती है, और तारे का स्पेक्ट्रल एनर्जी वितरण (spectral energy distribution) एक परिपक्व तारे (mature stellar photosphere) जैसा दिखता है।

इस अध्ययन में NASA के Wide-field Infrared Survey Explorer (WISE) और इसके विस्तारित मिशन NEOWISE से एक दशक से अधिक का डेटा शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने अब तक के सबसे बड़े और विस्तृत मध्य-इन्फ्रारेड परिवर्तनशीलता कैटलॉग में 22,000 से अधिक YSOs का विश्लेषण किया।

युवा तारों की विशेषताएँ:

  • YSOs वे तारे हैं जो अपने जीवन के प्रारंभिक चरण में होते हैं और जिनके केंद्र में स्थिर हाइड्रोजन संलयन नहीं होता।

  • ये तारें घने आणविक बादलों (molecular clouds) के संकुचन से बनते हैं।

  • संकुचन विभिन्न घटनाओं जैसे सुपरनोवा विस्फोट, पास के तारे से विकिरण, या अंतर-तारकीय माध्यम में उथल-पुथल से प्रेरित हो सकता है।

    विभिन्न प्रकार के परिवर्तनशील तारों के उदाहरण लाइट कर्व्स (बाएं से दाएं क्रम में) — लीनियर (Linear), वक्र (Curved), आवर्ती/पुनरावृत्त (Periodic), अचानक चमक (Burst), अचानक मंद होना (Drop), और अनियमित (Irregular)

शोध के प्रमुख निष्कर्ष:

  • YSOs के केंद्र में एक प्रोटोटार बनता है, जो चारों ओर घूर्णनशील डिस्क से घिरा होता है।

  • प्रोटोटार का प्रकाश संलयन से नहीं बल्कि गुरुत्वाकर्षण संकुचन और द्रव्यमान संचयन (accretion) से उत्पन्न होता है।

  • समय के साथ, डिस्क से सामग्री प्रोटोटार पर जमा होती रहती है, जिससे अचानक चमक बढ़ना या घटने जैसी घटनाएँ होती हैं।

  • युवा तारों की 36% Class I YSOs में परिवर्तनशीलता देखी गई, जबकि विकसित Class III YSOs में यह केवल 22% थी।

  • रंग परिवर्तन से पता चला कि अधिकांश तारों में चमक बढ़ने पर लालिमा बढ़ती है, जबकि कुछ में नीला होना देखा गया, जो आंतरिक डिस्क संरचना या बढ़ी हुई संचयन क्रियाओं को दर्शाता है।

महत्त्व:

यह कैटलॉग अब तक का सबसे पूर्ण मध्य-इन्फ्रारेड दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो यह समझने में मदद करता है कि तारे कैसे बढ़ते हैं, भोजन लेते हैं और अपने धूल भरे परिवेश को छोड़ते हैं। इस कैटलॉग में 5,800 से अधिक परिवर्तनशील YSOs शामिल हैं।

जैसे-जैसे James Webb Space Telescope (JWST) और 3.6m Devasthal Optical Telescope (DOT) जैसी दूरबीनें इस अध्ययन का अनुसरण करेंगी, शोधकर्ता यह समझ पाएंगे कि हमारे जैसे सूर्य जैसे तारे अंधकार से कैसे उत्पन्न हुए।


सीएसआईआर–इसरो स्पेस मीट 2025: भारत के मानव अंतरिक्ष मिशनों में नई प्रगति

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वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) संयुक्त रूप से 17 नवंबर 2025 को सीएसआईआर–इसरो स्पेस मीट 2025 का आयोजन करेंगे। यह कार्यक्रम बेंगलुरु स्थित होटल रैडिसन ब्लू एट्रिया में आयोजित होगा। इस आयोजन का उद्देश्य भारत की प्रमुख वैज्ञानिक और अंतरिक्ष एजेंसियों के बीच सहयोग को मजबूत करते हुए मानव अंतरिक्ष उड़ान शोध, माइक्रोग्रैविटी अध्ययन और स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी नवाचारों को बढ़ावा देना है, जो भारत की अंतरिक्ष आत्मनिर्भरता की दृष्टि के अनुरूप है।

कार्यक्रम का नेतृत्व डॉ. एन. कलईसेल्वी, सचिव, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR) एवं महानिदेशक, CSIR, और डॉ. वी. नारायणन, सचिव, अंतरिक्ष विभाग एवं अध्यक्ष, इसरो द्वारा किया जाएगा। इस सम्मेलन में लगभग 150–200 प्रतिनिधियों के भाग लेने की अपेक्षा है, जिनमें वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, अंतरिक्ष यात्री तथा विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

समारोह में फ्रांस के कौंसुल जनरल (बेंगलुरु), DRDO, ISRO, IISc, भारतीय वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारी, तथा ESA, JAXA और फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी CNES के विशेषज्ञ भी उपस्थित रहेंगे।

सम्मेलन के प्रमुख फोकस क्षेत्र

यह स्पेस मीट CSIR के बहुविषयक अनुसंधान को ISRO की मिशन-केंद्रित तकनीकी आवश्यकताओं के साथ एकीकृत करने पर केंद्रित होगा। मुख्य विषयों में शामिल होंगे:

  • मानव अंतरिक्ष उड़ान शरीर विज्ञान

  • बायोमेडिकल इंस्ट्रुमेंटेशन

  • सामग्री विज्ञान एवं माइक्रोग्रैविटी में जीवन विज्ञान

  • अंतरिक्ष यान रखरखाव और संचालन के लिए उन्नत प्रणालियाँ

  • अंतरिक्ष में पौधों की वृद्धि, स्पेस फूड, माइक्रोफ्लूडिक्स

  • सिरेमिक मैटामटेरियल्स और माइक्रोबियल करप्शन प्रिवेंशन

भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष यात्रियों के अनुभव साझा होंगे

कार्यक्रम में भारतीय अंतरिक्ष यात्री विंग कमांडर राकेश शर्मा (सेवानिवृत्त) और ग्रुप कैप्टन प्रसन्नथ बी. नायर अपने अनुभव साझा करेंगे। इसके अलावा, यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) के अंतरिक्ष यात्री और नासा स्पेस शटल मिशनों के अनुभवी जीन-फ्रांस्वा क्लेर्वॉय का विशेष वीडियो संदेश भी प्रदर्शित किया जाएगा।

ESA, JAXA, CNES और फ्रांसीसी अनुसंधान संस्थानों के विशेषज्ञ स्पेस फिजियोलॉजी, बायोइंजीनियरिंग और मानवीय उद्देश्यों के लिए अंतरिक्ष आधारित तकनीकों पर अपने विचार साझा करेंगे।

CSIR–NAL मुख्य आयोजक संस्थान

बेंगलुरु स्थित CSIR–नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज (NAL) इस कार्यक्रम का नोडल आयोजक है। NAL ने एयरोस्पेस, रक्षा और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है—

  • एयरोडायनमिक्स

  • स्ट्रक्चरल डिजाइन

  • एयरोस्पेस मटेरियल्स

  • फ्लाइट टेस्टिंग

  • हल्के कंपोज़िट मटेरियल्स

  • उन्नत एयरफ़्रेम संरचनाएँ और सिमुलेशन प्रणालियाँ

इन सभी क्षमताओं ने ISRO और DRDO को स्वदेशी तकनीक के विकास में अत्यंत सहयोग दिया है।

भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

सीएसआईआर–इसरो स्पेस मीट 2025 का उद्देश्य वैज्ञानिक संस्थानों के बीच मजबूत अनुसंधान संपर्क बनाना और ऐसा इकोसिस्टम तैयार करना है जो स्पेस मेडिसिन, ह्यूमन फैक्टर्स इंजीनियरिंग और जन-कल्याणकारी अंतरिक्ष तकनीकों को बढ़ावा दे सके। इस आयोजन में मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशनों के लिए भविष्य की संयुक्त रूपरेखा और नए शोध एवं विकास क्षेत्रों की पहचान पर विशेष चर्चा होगी।

यह कार्यक्रम भारत की वैज्ञानिक नवाचार क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई ऊँचाई पर ले जाने वाला सिद्ध होगा। यह विकसित भारत @2047 के उस व्यापक लक्ष्य को भी प्रतिबिंबित करता है जिसमें भारत का विज्ञान और प्रौद्योगिकी वैश्विक प्रगति में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

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