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ISRO की बड़ी कामयाबी: GSLV-F17 ने EOS-05 को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुंचाया

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भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार को GSLV-F17 रॉकेट के जरिए EOS-05 Earth Observation Satellite का सफल प्रक्षेपण किया। यह मिशन भारत की पृथ्वी निगरानी और अत्याधुनिक satellite imaging क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

ISRO के मुताबिक, GSLV-F17 ने EOS-05 को निर्धारित Sub-Geosynchronous Transfer Orbit (Sub-GTO) में सफलतापूर्वक स्थापित किया। EOS-05 को geosynchronous orbit से पृथ्वी की imaging के लिए भारत का पहला satellite बताया गया है।

सुबह 2:55 बजे हुआ लॉन्च

GSLV-F17/EOS-05 मिशन का प्रक्षेपण 4 सितंबर को सुबह 2:55 बजे IST पर श्रीहरिकोटा स्थित Satish Dhawan Space Centre के Second Launch Pad से किया गया। यह GSLV की 19वीं उड़ान है।

लॉन्च के दौरान रॉकेट ने निर्धारित चरणों को पूरा करते हुए EOS-05 को उसकी लक्षित कक्षा तक पहुंचाया। ISRO ने मिशन को सफल घोषित करते हुए कहा कि GSLV-F17 ने अपने मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया है।

क्या है EOS-05

EOS-05 एक अत्याधुनिक Earth Observation Satellite है, जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष से पृथ्वी की निगरानी और imaging क्षमता को बढ़ाना है।

यह satellite geosynchronous orbit से पृथ्वी के बड़े हिस्से का observation करने में सक्षम होगा। इस तरह की क्षमता का इस्तेमाल पृथ्वी की सतह में होने वाले बदलावों की निगरानी, प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन और विभिन्न Earth-observation applications में किया जा सकता है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह मिशन?

EOS-05 की खासियत यह है कि इसे geosynchronous orbit से imaging के लिए तैयार किया गया है। इससे भारत की Earth-observation infrastructure को एक नई क्षमता मिलने की उम्मीद है।

इस तरह के satellite data का उपयोग भविष्य में कृषि, पर्यावरण निगरानी, प्राकृतिक आपदा प्रबंधन, जल संसाधन और strategic applications जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।

हालांकि, satellite की सभी operational और security-related capabilities सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं।

GSLV-F17 की उपलब्धि

GSLV-F17 भारत के Geosynchronous Satellite Launch Vehicle कार्यक्रम का एक और महत्वपूर्ण मिशन है। ISRO की आधिकारिक सूची के अनुसार यह GSLV की 19वीं flight है।

इस मिशन की सफलता भारत की उस क्षमता को भी दर्शाती है जिसमें देश अपने भारी satellites को geosynchronous transfer-type trajectories तक पहुंचाने के लिए GSLV जैसे launch vehicles का इस्तेमाल कर रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने दी ISRO को बधाई

EOS-05 के सफल प्रक्षेपण के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ISRO को बधाई दी। प्रधानमंत्री ने इसे देश के लिए गर्व का क्षण बताते हुए कहा कि GSLV-F17 के जरिए EOS-05 का सफल प्रक्षेपण भारत के space sector की excellence, innovation और बढ़ती क्षमताओं को दर्शाता है।

उन्होंने ISRO और भारतीय उद्योग के बीच बढ़ती साझेदारी को भी भारत के space ecosystem के लिए महत्वपूर्ण बताया।

Bottom Line

GSLV-F17 और EOS-05 मिशन की सफलता भारत के Earth-observation और space technology programme के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस मिशन के जरिए भारत ने geosynchronous orbit से imaging की अपनी क्षमता को आगे बढ़ाया है और देश की satellite-based Earth monitoring capabilities को मजबूत किया है।

ISRO की यह सफलता एक बार फिर दिखाती है कि भारत अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में लगातार अपनी क्षमताओं का विस्तार कर रहा है।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर बड़ा सवाल: रॉकेट लॉन्च लागत में भारत सबसे महंगा?

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नई दिल्ली- भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय से अपनी कम लागत और “frugal engineering” के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। लेकिन Cambridge University और Politecnico di Torino के शोधकर्ताओं की एक नई peer-reviewed study ने इसी धारणा पर सवाल खड़े किए हैं।

अध्ययन के अनुसार, 2025 में भारत से Low Earth Orbit (LEO) में 1 किलोग्राम payload भेजने की अनुमानित लागत करीब $13,302 प्रति किलोग्राम थी। यह अध्ययन में शामिल प्रमुख space powers में सबसे अधिक है।

भारत की लागत अमेरिका से करीब चार गुना

अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार 2025 में अनुमानित LEO launch cost इस प्रकार थी:

  • भारत — $13,302/kg

  •  यूरोप — $9,897/kg

  •  रूस — $6,682/kg

  •  चीन — $5,809/kg

  •  जापान — $5,287/kg

  •  अमेरिका — $3,225/kg

वैश्विक औसत करीब $3,868/kg था। यानी भारत का अनुमानित per-kilogram cost अमेरिका के मुकाबले लगभग चार गुना था।

भारत की लागत इतनी ज्यादा क्यों?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।

यह आंकड़ा किसी ग्राहक से वसूली जाने वाली सीधी commercial launch price नहीं है। यह शोधकर्ताओं द्वारा निकाला गया औसत cost-per-kilogram estimate है।

शोध के अनुसार भारत में अपेक्षाकृत छोटे payloads और कम launch frequency के कारण एक rocket launch की fixed लागत कम kilograms पर distribute होती है। इससे हर kilogram की अनुमानित लागत बढ़ जाती है।

दूसरी ओर, अमेरिका में बड़े rockets, ज्यादा launch frequency और reusable launch systems ने cost efficiency को काफी बढ़ाया है।

 भारत की “कम लागत वाली Space Power” वाली छवि पर सवाल

भारत की ISRO को लंबे समय से कम लागत में बड़े space missions पूरा करने के लिए सराहा जाता है।

उदाहरण के तौर पर, Cambridge Judge Business School ने भी भारत के Mars Orbiter Mission और Chandrayaan-3 को relatively modest budgets में हासिल किए गए महत्वपूर्ण space achievements के रूप में रेखांकित किया है।

लेकिन नई study एक अलग चीज मापती है:

एक पूरे space mission की कुल लागत नहीं, बल्कि Low Earth Orbit तक 1 kilogram payload पहुंचाने की अनुमानित लागत।

इसलिए दोनों आंकड़ों को सीधे एक-दूसरे के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।

Study कितनी बड़ी थी?

शोधकर्ताओं Alessio Terzi और Francesco Nicoli ने दशकों के rocket-launch data का इस्तेमाल किया। संबंधित research में हजारों launches का database इस्तेमाल किया गया है, ताकि यह समझा जा सके कि समय के साथ launch technology और experience से costs कैसे बदलती हैं।

शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि launch frequency और accumulated experience लागत घटाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

अमेरिका को क्यों मिल रहा है बड़ा फायदा?

अमेरिका के space-launch ecosystem में बड़ी commercial कंपनियां और high-frequency launch operations हैं।

विशेष रूप से SpaceX ने reusable rockets और लगातार launches के जरिए launch economics को बदल दिया है।

Cambridge की एक अन्य 2026 analysis के अनुसार, 2025 में SpaceX का global orbital payload market में करीब 75% हिस्सा था।

इस तरह बड़े पैमाने पर launches होने से infrastructure, technology और operational experience की लागत ज्यादा missions में spread होती है।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

यह study भारत के बढ़ते commercial space sector के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी मानी जा सकती है।

भारत अब सिर्फ सरकारी space missions तक सीमित नहीं रहना चाहता। देश में private launch companies और satellite businesses तेजी से विकसित हो रहे हैं।

ऐसे में वैश्विक launch market में प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारत को:

  •  launch frequency बढ़ानी होगी

  •  ज्यादा payload capacity विकसित करनी होगी

  •  reusable launch technology पर काम बढ़ाना होगा

  •  private-sector participation को मजबूत करना होगा

  •  economies of scale हासिल करनी होंगी

 क्या इसका मतलब है कि ISRO के सभी missions महंगे हैं?

नहीं।

यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि भारत का हर space mission अमेरिका से महंगा है।

Study का आंकड़ा खास तौर पर estimated cost per kilogram to Low Earth Orbit से संबंधित है। यह किसी एक मिशन की कुल लागत या ISRO की पूरी space programme की लागत को नहीं दर्शाता।

क्यों महत्वपूर्ण है यह खबर?

भारत अगले दशक में अपने space economy को तेजी से विस्तार देने की तैयारी कर रहा है। ऐसे समय में global launch market में कम लागत और high-frequency launches भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

इस study का संदेश साफ है:

भारत ने कम लागत वाले space missions में शानदार सफलता हासिल की है, लेकिन commercial orbital launch economics में अभी अमेरिका और अन्य प्रमुख space powers से बड़ी चुनौती बनी हुई है।

 Bottom Line

Cambridge-linked research के अनुसार 2025 में भारत का estimated LEO launch cost $13,302 प्रति किलोग्राम था—major space powers में सबसे ज्यादा।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत का पूरा space programme महंगा है। असल चुनौती launch scale, payload capacity, launch frequency और reusable technology में है।

अगर भारत इन क्षेत्रों में तेजी से सुधार करता है, तो उसकी बढ़ती private space industry आने वाले वर्षों में global launch market में ज्यादा competitive बन सकती है।

आत्मनिर्भर भारत की ऐतिहासिक उड़ान : विक्रम-1 की सफलता पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दी बधाई

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भारत की बढ़ती वैज्ञानिक क्षमता और नवाचार का सशक्त प्रतीक है विक्रम-1 : मुख्यमंत्री साय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित भारत के पहले निजी कक्षीय प्रक्षेपण यान विक्रम-1 के सफल प्रक्षेपण पर प्रसन्नता व्यक्त की है। उन्होंने इसे देश के अंतरिक्ष इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि यशस्वी प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में अंतरिक्ष क्षेत्र में किए गए व्यापक सुधारों और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन की नीतियों के फलस्वरूप आज भारत वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में नई पहचान बना रहा है। विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण इसी परिवर्तनकारी सोच का परिणाम है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्काईरूट एयरोस्पेस की पूरी टीम को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह उपलब्धि भारत को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी।

छत्तीसगढ़ की इकलौती छात्रा, महासमुंद की बेटी का कमाल-इंटरनेशनल मून मिशन' के लिए रागनी साहू का राष्ट्रीय स्तर पर चयन

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रायपुर- महासमुंद जिले सहित पूरे छत्तीसगढ़ के लिए यह एक अत्यंत गर्व और ऐतिहासिक क्षण है। शासकीय आशीबाई गोलछा कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, महासमुंद की होनहार छात्रा रागनी साहू का चयन अंतर्राष्ट्रीय चंद्र मिशन 'शक्तिसैट' (ShaktiSat) के लिए 'नेशनल फाइनलिस्ट' के रूप में हुआ है। इस प्रतिष्ठित वैश्विक अभियान की सूची में जगह बनाने वाली रागनी पूरे छत्तीसगढ़ राज्य से चुनी गईं इकलौती छात्रा हैं।

देशभर से चुनी गईं सिर्फ 20 प्रतिभाएं

इस वैश्विक अभियान के तहत पूरे भारत से कड़े राष्ट्रीय मूल्यांकन और साक्षात्कार (इंटरव्यू) के बाद 'केवल 20 राष्ट्रीय फाइनलिस्ट' का चयन किया गया है, जिसमें रागनी ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए अपना स्थान पक्का किया है। रागनी ने वर्ष 2025 में अपने स्कूल की अटल टिंकरिंग लैब के माध्यम से इस मिशन में पंजीयन कराया था। चयन प्रक्रिया के दौरान उन्होंने लगभग 120 घंटे की ऑनलाइन प्रशिक्षण श्रृंखला के अंतर्गत 21 विस्तृत मॉड्यूल तथा 550 से अधिक स्पेस, सैटेलाइट, विज्ञान, नवाचार (इन्नोवेशन) और इंजीनियरिंग आधारित लेसन सफलतापूर्वक पूरे किए।

108 देशों के छात्र मिलकर बनाएंगे चंद्र उपग्रह

'मिशन शक्तिसैट' एक अंतर्राष्ट्रीय चंद्र सैटेलाइट मिशन है, जिसमें भारत के अलावा अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस सहित विश्व के 108 देशों के छात्र-छात्राएं हिस्सा ले रहे हैं। इस ऐतिहासिक मिशन के अंतर्गत विद्यार्थियों द्वारा दो चंद्र उपग्रह (Moon Satellites) विकसित किए जाएंगे। इनमें से एक उपग्रह चंद्रमा की कक्षा (Orbit) में स्थापित होकर परिक्रमा करेगा। दूसरा रोवर चंद्रमा की सतह (Surface) पर उतरकर वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम देगा।

इसरो (ISRO) द्वारा 11 अक्टूबर को श्रीहरिकोटा से लॉन्चिंग

विद्यार्थियों द्वारा विकसित किए जा रहे इन उपग्रहों का प्रक्षेपण 11 अक्टूबर 2026 (अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस) के अवसर पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से इसरो (ISRO) द्वारा किया जाएगा। इससे पहले, रागनी साहू 22 अगस्त से 31 अगस्त 2026 तक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश) में आयोजित होने वाली 8 दिवसीय नेशनल वर्कशॉप में भाग लेंगी। इस कार्यशाला का औपचारिक शुभारंभ 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के मौके पर होगा। यहाँ रागनी को इसरो व IN-SPACe के वैज्ञानिकों, भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला और वैश्विक अंतरिक्ष विशेषज्ञों से सीधा संवाद और मार्गदर्शन प्राप्त करने का ऐतिहासिक अवसर मिलेगा।

नीति आयोग से सम्बद्ध है मिशन

यह मिशन अटल इनोवेशन मिशन, नीति आयोग से सम्बद्ध है। इस वैश्विक पहल का संचालन 'स्पेस किड्ज इंडिया' की संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. केसन के नेतृत्व में किया जा रहा है, जबकि विंग कमांडर जाया तारे (रिटायर्ड) इस मिशन की भारत की राष्ट्रीय राजदूत हैं।

कलेक्टर और शिक्षा अधिकारियों ने दी बधाई

इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर महासमुंद कलेक्टर विनय कुमार लंगेह ने छात्रा रागनी साहू को बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है। उन्होंने इस सफलता का श्रेय स्कूल के प्राचार्य जी.आर. सिन्हा तथा अटल टिंकरिंग लैब के प्रभारी चंद्रशेखर मिथलेश के सतत मार्गदर्शन को दिया। जिला शिक्षा अधिकारी बी.एल. देवांगन एवं जिला मिशन समन्वयक रेखराज शर्मा ने भी रागनी को इस गौरवपूर्ण उपलब्धि के लिए शुभकामनाएं दी हैं।

अंतरिक्ष सुरक्षा, बीमा और मलबा प्रबंधन को सुदृढ़ कर रहा है भारत

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भारत में अंतरिक्ष गतिविधियों की बढ़ती भूमिका और निजी क्षेत्र की भागीदारी को ध्यान में रखते हुए सरकार अंतरिक्ष सुरक्षा, मलबा प्रबंधन और बीमा ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए लगातार कदम उठा रही है। देश में विभिन्न प्रकार के स्पेस इंश्योरेंस उत्पाद उपलब्ध हैं, जिन्हें भारतीय बीमा कंपनियां वैश्विक बीमाकर्ताओं, री-इंश्योरर्स, अंडरराइटर्स और ब्रोकर्स के सहयोग से प्रदान कर रही हैं। निजी संस्थाओं को उनके द्वारा किए जा रहे अंतरिक्ष अभियानों के अनुरूप उपयुक्त बीमा लेने की स्वतंत्रता दी गई है।

स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस (SSA) के बढ़ते महत्व को स्वीकार करते हुए, अंतरिक्ष संचालन की सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए ISRO System for Safe and Sustainable Space Operations Management (IS4OM) की स्थापना की गई है। यह प्रणाली अंतरिक्ष उड़ानों की सुरक्षा, अंतरिक्ष मलबा न्यूनीकरण और भीड़भाड़ वाले अंतरिक्ष वातावरण में उभरती चुनौतियों से निपटने पर केंद्रित है।

ISRO अपने सभी मिशनों में संयुक्त राष्ट्र की UN-COPUOS और Inter-Agency Space Debris Coordination Committee (IADC) द्वारा अनुशंसित अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष मलबा न्यूनीकरण दिशानिर्देशों का अधिकतम पालन करता है। इसके साथ ही, ISRO अंतरिक्ष गतिविधियों की सुरक्षा और सतत उपयोग से जुड़े वैश्विक दिशा-निर्देशों के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। ISRO, IADC, International Academy of Astronautics (IAA), International Organization for Standardization (ISO), International Astronautical Federation (IAF) और संयुक्त राष्ट्र के Long Term Sustainability Working Group जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों का सक्रिय सदस्य है।

भारतीय अंतरिक्ष नीति में अंतरिक्ष मलबा न्यूनीकरण और SSA क्षमताओं के निर्माण को विशेष महत्व दिया गया है। इसी दिशा में ISRO द्वारा Debris Free Space Mission (DFSM) पहल का नेतृत्व किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक सभी भारतीय अंतरिक्ष अभियानों—सरकारी और गैर-सरकारी—को मलबा मुक्त बनाना है। यह पहल वैश्विक अंतरिक्ष स्थिरता प्रयासों के अनुरूप है और भारत को बाह्य अंतरिक्ष में सुरक्षा, संरक्षा और सततता को प्राथमिकता देने वाले देश के रूप में स्थापित करती है।

सरकार देश में अंतरिक्ष गतिविधियों से जुड़े निजी संस्थानों को उनके अभियानों से जुड़े जोखिमों को कवर करने के लिए पर्याप्त और उपयुक्त बीमा लेने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इसी क्रम में, “भारतीय अंतरिक्ष वस्तुओं से उत्पन्न तृतीय पक्ष क्षति के लिए राज्य की देयता से संबंधित नीति ढांचा एवं दिशानिर्देश” का एक मसौदा विभिन्न स्तरों पर परामर्श प्रक्रिया में है। इस मसौदे में, अन्य प्रावधानों के साथ-साथ, प्रक्षेपण संचालकों द्वारा तृतीय पक्ष देयता बीमा बनाए रखने का प्रावधान भी शामिल है, ताकि अंतरराष्ट्रीय संधियों और सम्मेलनों के तहत राज्य की देयता को कवर किया जा सके।

चूंकि अंतरिक्ष गतिविधियां उच्च पूंजी निवेश और जोखिम से जुड़ी होती हैं, इसलिए वैश्विक स्तर पर बीमा और री-बीमा कंपनियों द्वारा जोखिम को आपस में साझा करना एक सामान्य प्रथा है। भारत में भी इसी वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप बीमा तंत्र उपलब्ध है।

यह जानकारी केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।

प्रधानमंत्री मोदी ने हैदराबाद में स्काईरूट के इन्फिनिटी कैंपस का उद्घाटन किया

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हैदराबाद- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भारतीय स्पेस स्टार्टअप स्काईरूट के इन्फिनिटी कैंपस का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत आज अंतरिक्ष क्षेत्र में अभूतपूर्व अवसरों का साक्षी है, और निजी क्षेत्र की भागीदारी से देश का अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से प्रगति कर रहा है।

प्रधानमंत्री ने स्काईरूट के इन्फिनिटी कैंपस को भारत की नई सोच, नवाचार और युवा शक्ति का प्रतीक बताया। उन्होंने संस्थापक पवन कुमार चंदाना और नागा भरत ढाका को युवा अंतरिक्ष उद्यमियों के प्रेरक उदाहरण के रूप में सराहा। उन्होंने कहा कि इन दोनों ने खुद पर विश्वास किया, जोखिम उठाने से नहीं हिचकिचाए, और आज पूरा देश उनके सफलता पर गर्व महसूस कर रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत सीमित संसाधनों से हुई, लेकिन महत्वाकांक्षाओं की कोई सीमा नहीं थी, बताते हुए कहा कि “रॉकेट पार्ट्स को साइकिल पर लेकर ISRO की विश्वसनीय लॉन्च क्षमताओं तक, भारत ने यह साबित किया कि सपनों की ऊँचाई संसाधनों से नहीं, बल्कि संकल्प से तय होती है।” उन्होंने ISRO की भूमिका की भी सराहना करते हुए कहा कि दशकों से यह भारत की अंतरिक्ष यात्रा को नई ऊँचाई पर ले जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि बदलते समय में अंतरिक्ष क्षेत्र का विस्तार स्पष्ट है, क्योंकि यह संचार, कृषि, समुद्री निगरानी, शहरी नियोजन, मौसम पूर्वानुमान और राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार बन गया है। इसी कारण से सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में ऐतिहासिक सुधार लागू किए और निजी नवाचार के लिए इसे खोला। उन्होंने बताया कि IN-SPACe की स्थापना स्टार्टअप और उद्योग को ISRO की सुविधाओं एवं तकनीक तक पहुँच प्रदान करने के लिए की गई।

प्रधानमंत्री ने भारत की जनरेशन-Z युवा शक्ति की सराहना की, जिन्होंने सीमित संसाधनों के साथ भी 300 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्टअप्स को गति दी है। उन्होंने कहा कि यही युवा भारत में निजी अंतरिक्ष क्रांति को जन्म दे रहे हैं, और रॉकेट प्रणालियों, उपग्रह प्लेटफॉर्म्स और कंपोजिट मैटीरियल जैसे क्षेत्रों में नए नवाचार कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि छोटे उपग्रहों की मांग और लॉन्च आवृत्तियाँ दुनिया भर में बढ़ रही हैं, और अंतरिक्ष अब एक रणनीतिक संपत्ति बन गया है। प्रधानमंत्री ने भारत की अंतरिक्ष क्षमता को विश्वसनीय और लागत-प्रभावी बताते हुए कहा कि वैश्विक कंपनियाँ भारत में उपग्रह निर्माण और लॉन्च सेवाओं में निवेश करना चाहती हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी बताया कि भारत अब केवल ऐप्स और सेवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि डीप-टेक, निर्माण और हार्डवेयर नवाचार की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में किए गए ऐतिहासिक कदमों का उदाहरण देते हुए कहा कि यह भारत के तकनीकी भविष्य की नींव मजबूत कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया कि सरकार युवाओं, स्टार्टअप्स, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और उद्यमियों के हर कदम पर उनके साथ है। उन्होंने स्काईरूट टीम को बधाई दी और सभी को प्रेरित किया कि वे 21वीं सदी को भारत की सदी बनाएं, चाहे वह पृथ्वी पर हो या अंतरिक्ष में।

पृष्ठभूमि:

स्काईरूट का इन्फिनिटी कैंपस लगभग 2,00,000 वर्ग फीट में फैला अत्याधुनिक सुविधा केंद्र है, जहाँ हर महीने एक आर्बिटल रॉकेट का निर्माण किया जा सकता है। स्काईरूट, भारत की प्रमुख निजी अंतरिक्ष कंपनी है, जिसे IIT के पूर्व वैज्ञानिक पवन चंदाना और भरत ढाका ने स्थापित किया है। नवंबर 2022 में, स्काईरूट ने अपना सब-ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-S लॉन्च किया, जिससे यह भारत की पहली निजी कंपनी बनी जिसने रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजा।


भारत को वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में अग्रणी राष्ट्र बनाने की दिशा में कदम: डॉ. जितेन्द्र सिंह

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने आज कहा कि “अंतरिक्ष” भारत को वैश्विक स्तर पर एक अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा।

भारत की अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष भूमिका के विस्तार की ओर इशारा करते हुए, मंत्री ने कहा कि भारत तेजी से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश और भागीदारी के लिए एक प्राथमिक गंतव्य के रूप में उभर रहा है। यह हाल के महीनों में देश का दौरा करने वाले कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों में बढ़ती रुचि से स्पष्ट होता है।

डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र निर्णायक परिवर्तन से गुजर रहा है, जो इस वर्ष के इंडिया इंटरनेशनल स्पेस कॉन्क्लेव (IISC 2025) के विषय — “Expanding Horizons: Innovation, Inclusion & Resilience in the New Space Age” — को प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबिंबित करता है। उद्योग नेताओं, वैश्विक एजेंसियों, राजदूतों और स्टार्ट-अप्स को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा किए गए सुधारों ने एक ऐसा वातावरण तैयार किया है, जहां प्रतिभा, तकनीक और निवेश मिलकर भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का भविष्य आकार दे सकते हैं।

मंत्री ने कहा कि विषय बहुत सोच-समझकर चुना गया है क्योंकि यह भारत की तेजी से विकसित हो रही अंतरिक्ष प्रणाली में नई ऊर्जा को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारत में हमेशा वैज्ञानिक क्षमता रही है, लेकिन निर्णायक बदलाव तब आया जब नीति निर्माताओं ने नवाचार और व्यापक भागीदारी को प्रोत्साहित करने वाला वातावरण तैयार किया। 2019 के बाद किए गए सुधारों में निजी खिलाड़ियों को क्षेत्र में शामिल करना, IN-SPACe को एकल-विंडो नियामक निकाय के रूप में स्थापित करना और 2023 में अंतरिक्ष नीति जारी करना शामिल हैं, जिन्होंने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष परिदृश्य में अपनी भूमिका बढ़ाने में मदद की।

“समावेशन” पहलू पर जोर देते हुए मंत्री ने कहा कि अंतरिक्ष क्षेत्र का उद्घाटन स्टार्ट-अप्स, छात्रों, उद्योग और नागरिकों को उस क्षेत्र में लाया है जो पहले बंद था। हजारों लोग अब रॉकेट लॉन्चिंग व्यक्तिगत रूप से देखते हैं और कुछ वर्षों में 300 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्ट-अप्स उभर चुके हैं। इनमें से कई ने विदेशी निवेश सुरक्षित किया और तेजी से बढ़े, जिससे भारत में लुप्त पड़ी उद्यमी प्रतिभा उजागर हुई।

“नवाचार” की बात करते हुए, डॉ. जितेन्द्र सिंह ने भारत की उपलब्धियों का उल्लेख किया — चंद्रयान का साउथ पोल लैंडिंग, चंद्र जल की खोज, मंगलयान मिशन और एक बार में 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण। उन्होंने कहा कि भारत का सबसे महत्वपूर्ण योगदान अंतरिक्ष तकनीक का शासन और नागरिक कल्याण के लिए अनुप्रयोग रहा है। भारत के लगभग 70% अंतरिक्ष अनुप्रयोग अब जीवन की सुविधा बढ़ाने में मदद कर रहे हैं, जैसे कि अवसंरचना योजना के लिए गती शक्ति, भूमि मानचित्रण के लिए स्वामित्व, उपग्रह-सक्षम आपदा प्रबंधन, दूरदराज क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन और रेलवे सुरक्षा प्रणाली।

मंत्री ने कहा कि यह दृष्टिकोण “सहनशीलता” को भी मजबूत करता है, जो कॉन्क्लेव के विषय का एक और मूल तत्व है, क्योंकि उपग्रह-आधारित सेवाएं अब आपदा प्रतिक्रिया, कृषि, मौसम पूर्वानुमान और देशभर में कनेक्टिविटी का समर्थन करती हैं। भारत इन क्षमताओं का विस्तार पड़ोसी देशों — भूटान, मालदीव, श्रीलंका, नेपाल और म्यांमार — में भी कर रहा है।

मंत्री ने कहा कि जापान, इटली और कई अन्य देशों के प्रतिनिधिमंडलों द्वारा दिखाई गई आत्मविश्वास भारत को अंतरिक्ष साझेदारी के लिए एक प्राथमिक वैश्विक गंतव्य के रूप में स्थापित करता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्रेय दिया कि उन्होंने अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में लंबे समय से चली आ रही बाधाओं को दूर किया और भारत के वैश्विक विस्तार के लिए आवश्यक नीति वातावरण बनाया।

IISC 2025 ने मंत्रालयों, उद्योग, अंतरिक्ष एजेंसियों, निवेशकों, स्टार्ट-अप्स और अकादमिक संस्थानों को एक मंच पर लाया। डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि इन विचार-विमर्शों से भारत की अभिनव, समावेशी और सहनशील अंतरिक्ष प्रणाली बनाने की कोशिशों को और मजबूती मिलेगी। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के पांच गुना बढ़ने की संभावना के साथ, भारत वैश्विक अंतरिक्ष परिदृश्य में एक मजबूत स्थिति सुरक्षित करने के लिए तैयार है।

सीएसआईआर–इसरो स्पेस मीट 2025: भारत के मानव अंतरिक्ष मिशनों में नई प्रगति

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वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) संयुक्त रूप से 17 नवंबर 2025 को सीएसआईआर–इसरो स्पेस मीट 2025 का आयोजन करेंगे। यह कार्यक्रम बेंगलुरु स्थित होटल रैडिसन ब्लू एट्रिया में आयोजित होगा। इस आयोजन का उद्देश्य भारत की प्रमुख वैज्ञानिक और अंतरिक्ष एजेंसियों के बीच सहयोग को मजबूत करते हुए मानव अंतरिक्ष उड़ान शोध, माइक्रोग्रैविटी अध्ययन और स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी नवाचारों को बढ़ावा देना है, जो भारत की अंतरिक्ष आत्मनिर्भरता की दृष्टि के अनुरूप है।

कार्यक्रम का नेतृत्व डॉ. एन. कलईसेल्वी, सचिव, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR) एवं महानिदेशक, CSIR, और डॉ. वी. नारायणन, सचिव, अंतरिक्ष विभाग एवं अध्यक्ष, इसरो द्वारा किया जाएगा। इस सम्मेलन में लगभग 150–200 प्रतिनिधियों के भाग लेने की अपेक्षा है, जिनमें वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, अंतरिक्ष यात्री तथा विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

समारोह में फ्रांस के कौंसुल जनरल (बेंगलुरु), DRDO, ISRO, IISc, भारतीय वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारी, तथा ESA, JAXA और फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी CNES के विशेषज्ञ भी उपस्थित रहेंगे।

सम्मेलन के प्रमुख फोकस क्षेत्र

यह स्पेस मीट CSIR के बहुविषयक अनुसंधान को ISRO की मिशन-केंद्रित तकनीकी आवश्यकताओं के साथ एकीकृत करने पर केंद्रित होगा। मुख्य विषयों में शामिल होंगे:

  • मानव अंतरिक्ष उड़ान शरीर विज्ञान

  • बायोमेडिकल इंस्ट्रुमेंटेशन

  • सामग्री विज्ञान एवं माइक्रोग्रैविटी में जीवन विज्ञान

  • अंतरिक्ष यान रखरखाव और संचालन के लिए उन्नत प्रणालियाँ

  • अंतरिक्ष में पौधों की वृद्धि, स्पेस फूड, माइक्रोफ्लूडिक्स

  • सिरेमिक मैटामटेरियल्स और माइक्रोबियल करप्शन प्रिवेंशन

भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष यात्रियों के अनुभव साझा होंगे

कार्यक्रम में भारतीय अंतरिक्ष यात्री विंग कमांडर राकेश शर्मा (सेवानिवृत्त) और ग्रुप कैप्टन प्रसन्नथ बी. नायर अपने अनुभव साझा करेंगे। इसके अलावा, यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) के अंतरिक्ष यात्री और नासा स्पेस शटल मिशनों के अनुभवी जीन-फ्रांस्वा क्लेर्वॉय का विशेष वीडियो संदेश भी प्रदर्शित किया जाएगा।

ESA, JAXA, CNES और फ्रांसीसी अनुसंधान संस्थानों के विशेषज्ञ स्पेस फिजियोलॉजी, बायोइंजीनियरिंग और मानवीय उद्देश्यों के लिए अंतरिक्ष आधारित तकनीकों पर अपने विचार साझा करेंगे।

CSIR–NAL मुख्य आयोजक संस्थान

बेंगलुरु स्थित CSIR–नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज (NAL) इस कार्यक्रम का नोडल आयोजक है। NAL ने एयरोस्पेस, रक्षा और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है—

  • एयरोडायनमिक्स

  • स्ट्रक्चरल डिजाइन

  • एयरोस्पेस मटेरियल्स

  • फ्लाइट टेस्टिंग

  • हल्के कंपोज़िट मटेरियल्स

  • उन्नत एयरफ़्रेम संरचनाएँ और सिमुलेशन प्रणालियाँ

इन सभी क्षमताओं ने ISRO और DRDO को स्वदेशी तकनीक के विकास में अत्यंत सहयोग दिया है।

भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

सीएसआईआर–इसरो स्पेस मीट 2025 का उद्देश्य वैज्ञानिक संस्थानों के बीच मजबूत अनुसंधान संपर्क बनाना और ऐसा इकोसिस्टम तैयार करना है जो स्पेस मेडिसिन, ह्यूमन फैक्टर्स इंजीनियरिंग और जन-कल्याणकारी अंतरिक्ष तकनीकों को बढ़ावा दे सके। इस आयोजन में मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशनों के लिए भविष्य की संयुक्त रूपरेखा और नए शोध एवं विकास क्षेत्रों की पहचान पर विशेष चर्चा होगी।

यह कार्यक्रम भारत की वैज्ञानिक नवाचार क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई ऊँचाई पर ले जाने वाला सिद्ध होगा। यह विकसित भारत @2047 के उस व्यापक लक्ष्य को भी प्रतिबिंबित करता है जिसमें भारत का विज्ञान और प्रौद्योगिकी वैश्विक प्रगति में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

भारतीय नौसेना के लिए ISRO आज प्रक्षेपित करेगा सबसे उन्नत संचार उपग्रह GSAT-7R (CMS-03)

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) आज, 02 नवंबर 2025 को भारतीय नौसेना के लिए संचार उपग्रह GSAT-7R (CMS-03) का प्रक्षेपण करने जा रहा है। यह अब तक भारतीय नौसेना के लिए सबसे उन्नत संचार उपग्रह होगा। यह उपग्रह नौसेना की अंतरिक्ष-आधारित संचार और समुद्री क्षेत्र की निगरानी क्षमताओं को और मजबूत करेगा।

स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित किया गया यह उपग्रह श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया जाएगा। लगभग 4,400 किलोग्राम वज़न वाला यह भारत का अब तक का सबसे भारी संचार उपग्रह है। इसमें कई अत्याधुनिक स्वदेशी तकनीकी घटक शामिल हैं, जो विशेष रूप से भारतीय नौसेना की परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकसित किए गए हैं।

GSAT-7R भारतीय महासागर क्षेत्र में मजबूत दूरसंचार कवरेज प्रदान करेगा। इसके पेलोड में ऐसे ट्रांसपोंडर शामिल हैं जो कई संचार बैंड्स पर वॉयस, डेटा और वीडियो लिंक का समर्थन करने में सक्षम हैं। यह उपग्रह उच्च क्षमता वाली बैंडविड्थ के साथ कनेक्टिविटी को बढ़ाएगा, जिससे नौसेना के जहाजों, विमानों, पनडुब्बियों और समुद्री संचालन केंद्रों के बीच निर्बाध और सुरक्षित संचार स्थापित हो सकेगा।

जटिल सुरक्षा चुनौतियों के इस दौर में, GSAT-7R भारत की आत्मनिर्भरता (Aatmanirbharta) के माध्यम से उन्नत तकनीक का उपयोग कर राष्ट्र के समुद्री हितों की रक्षा के प्रति भारतीय नौसेना के संकल्प को दर्शाता है।

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