Media24Media.com: चरागाहों के संरक्षण और पशुपालक समुदायों के कल्याण पर भारत का जोर

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चरागाहों के संरक्षण और पशुपालक समुदायों के कल्याण पर भारत का जोर

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भारत ने चरागाहों (Rangelands) की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर देते हुए कहा है कि ये पशुपालक समुदायों की आजीविका बनाए रखने, जैव-विविधता के संरक्षण तथा जल और कार्बन चक्रों के नियमन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। भारत ने चरागाहों के पुनर्स्थापन के लिए विज्ञान आधारित दृष्टिकोण, सुरक्षित भूमि-अधिकार और समुदायों की भागीदारी पर आधारित प्रयासों का आह्वान किया है।

संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) के 17वें कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (CoP17) में “चरागाहों का पुनर्स्थापन और पशुपालक समुदायों का कल्याण” विषय पर आयोजित मंत्रिस्तरीय संवाद को संबोधित करते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने वैज्ञानिक योजना और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से घासभूमियों और चरागाहों के पुनर्स्थापन में भारत के अनुभव को साझा किया।

पशुपालकों की केंद्रीय भूमिका पर जोर देते हुए यादव ने कहा, “सफल पुनर्स्थापन की शुरुआत पशुपालकों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि संरक्षक मानने से होती है।” उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर ऐसा पुनर्स्थापन किया जा सकता है जो पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सामाजिक रूप से समावेशी हो।

उन्होंने बताया कि भारत के चरागाह विभिन्न प्रकार के भू-दृश्यों में फैले हुए हैं—हिमालयी चरागाहों और मध्य भारत की सवाना घासभूमियों से लेकर शुष्क थार, कच्छ क्षेत्रों और दक्षिणी शोला क्षेत्रों तक। ये क्षेत्र देश के विशाल पशुधन और मानव आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मंत्री ने यह भी बताया कि उपग्रह आधारित मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस घासभूमियों के मानचित्रण और पुनर्स्थापन की योजना बनाने के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं। वहीं, चराई के अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता स्थानीय समुदायों की भूमिका को मजबूत करती है और उन्हें प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन में अधिक अधिकार देती है।

भारत की पारंपरिक सामुदायिक संरक्षण प्रणालियों का उदाहरण देते हुए यादव ने राजस्थान के ओरण (Orans) का उल्लेख किया। ये पवित्र वन क्षेत्र हैं, जिन्हें स्थानीय समुदाय सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व के कारण लंबे समय से संरक्षित करते आए हैं। उन्होंने बताया कि देशभर में लगभग 25,000 ऐसे सामुदायिक रूप से संरक्षित पवित्र वन क्षेत्र हैं, जो लगभग 6 लाख हेक्टेयर भूमि में फैले हैं। ये क्षेत्र सामुदायिक संरक्षण का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और साथ ही पशुपालकों के भूमि अधिकारों को सुरक्षित करने तथा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे महत्वपूर्ण वन्यजीवों के आवासों के संरक्षण में योगदान देते हैं। मंत्री के अनुसार, इनमें से कई पवित्र वन क्षेत्र कानूनी प्रावधानों के तहत भी संरक्षित हैं।

यादव ने खुले वनों और घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्रों के पुनर्स्थापन के लिए भारत के प्रयासों को भी रेखांकित किया। इनमें चीता पुनर्स्थापन कार्यक्रम और गुजरात के बन्नी घासभूमि जैसे क्षेत्रों में इसके संभावित विस्तार की योजना शामिल है।

उन्होंने कहा कि गहरी जड़ वाली घासें मिट्टी में कार्बन के भंडारण में योगदान देती हैं, पानी के भूमि में प्रवेश को बढ़ाती हैं और भूजल पुनर्भरण में सहायता करती हैं। भारत में लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर स्थायी चरागाह और चराई भूमि इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

यादव ने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा कि भारत का दृष्टिकोण भूदृश्य प्रबंधन, जलग्रहण क्षेत्र विकास, टिकाऊ चराई, चारा विकास और आजीविका सहायता को एकीकृत करता है, जिसमें समुदायों की भागीदारी को केंद्र में रखा गया है।

उन्होंने कहा कि विकासशील देश जब भूमि क्षरण तटस्थता (Land Degradation Neutrality) के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तब वित्त, प्रौद्योगिकी और ज्ञान तक बेहतर पहुंच आवश्यक है। उन्होंने कहा:

“भारत चरागाहों के पुनर्स्थापन के लिए समर्पित और सुलभ वित्तीय सहायता का स्वागत करता है और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से अपने अनुभव और समाधान साझा करने के लिए तैयार है।”

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