Media24Media.com: बशीर बद्र साहब की यादें और महासमुंद से जुड़ा आत्मीय साहित्यिक सफर: एक भावपूर्ण संस्मरण

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बशीर बद्र साहब की यादें और महासमुंद से जुड़ा आत्मीय साहित्यिक सफर: एक भावपूर्ण संस्मरण

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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।

--बशीर बद्र

महासमुंद से बशीर बद्र साहब की बहुत सी यादें जुड़ी हुई है। एक कार्यक्रम  के सिलसिले में वे रायपुर आए हुए थे और रायपुर में शायर शौक जालंधरी के मेहमान थे। मैं प्रसिद्ध  व्यंग्यकार लतीफ़ घोंघी के साथ  आकाशवाणी की एक रिकार्डिंग में  गया हुआ था तब बशीर बद्र साहब के रायपुर में होने की खबर मिली  तो हमने तय किया कि किसी भी हालत में उन्हें महासमुंद लेकर चलना है।शौक जालंधरी साहब ने बहुत सी अड़चनें लगाईं लेकिन हम बशीर बद्र साहब से मिलने और उन्हें महासमुंद लाने में कामयाब रहे। दूसरे दिन जनपद पंचायत  के सभागार में एक आत्मीय गोष्ठी में बद्र साहब ने अपनी बहुत सी रचनाएं सुनाई। उनके साथ शौक जालंधरी और शाद भंडारवी भी आए थे। महासमुंद का प्रतिनिधित्व करते हुए उनके सामने शरद श्रीवास्तव और मुझे भी अपनी  रचनाएं पढ़ने का मौका मिला। महासमुंद  के आत्मीय वातावरण से वे बहुत प्रभावित हुए थे। मेरे एक शे'र कल शहर जब बंद था तो बाप से परिचय हुआ , वर्ना सोए में गया और जागते लौटा नहीं  पर उन्होंने खुलकर  मेरी सराहना की थी इसके 34साल बाद जब 2021-22 मेरा पहला स्वतंत्र ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ तो उनकी सराहना के कारण ही मैंने  संग्रह का शीर्षक बाप से परिचय हुआ रखा जिसका जिक्र मैंने संग्रह की भूमिका में भी किया है।

दूसरे सत्र में एक संगीत गोष्ठी ग़ज़ल गायिका साधना रहाटगांवकर के निवास में हुई जिसमें उन्होंने बशीर बद्र साहब की ही रचनाओं को स्वरबद्ध किया हुआ था। अपनी रचनाओं की सांगितिक  प्रस्तुति सुनते हुए बशीर बद्र साहब भावुक होकर रो पड़े थे। विदा होते  हुए उन्होंने वादा किया कि अब वे जब भी छत्तीसगढ़ आयेंगे तो महासमुंद ज़रूर आयेंगे,यह मेरे लिए घर जैसा ही हो गया है। दरअसल उन दिनों वे मेरठ में अपने घर जला दिए जाने की घटना से काफी विचलित थे तथा कुछ समय पहले ही भोपाल शिफ्ट हुए थे। महासमुंद में लतीफ़ घोंघी,ईश्वर शर्मा,साधना रहाटगांवकर,हुकुम शर्मा ,मनोहर शर्मा,व्ही जी रहाटगांवकर,एनबी लोणारे देवी चंद श्रीश्रीमाल  ,शरद श्रीवास्तव  जैसे साहित्य,संगीत और पत्रकारिता के बड़े-बड़े  लोगों को महासमुंद  कला संगम के बैनर तले अनेक उत्कृष्ट आयोजन की जानकारी और घरेलू माहौल में लगातार कार्यक्रम की सूचना ने उन्हें चकित भी किया और भावुक भी। सौभाग्य से दो-तीन साल बाद मेरी उनसे मुलाकात भोपाल में उनके निवास में भी हुई। महासमुंद से अपने रिश्तों को उन्होंने याद रखा हुआ था। मेरे जैसे छोटे साहित्यकार को भी उन्होंने पूरा सम्मान देते हुए स्वयं शरबत बनाकर पिलाया। अपना एक संग्रह उपहार स्वरूप दिया और मिडिल ईस्ट में एक मुशायरे में मिली हुई एक शाल भी लाकर दिखाई जिसमें सोने के तारों से उनका ही एक शे'र बहुत सफाई से काढ़ा गया था। दो -तीन साल बाद एक बार फिर  वे डॉ  रमेश के बुलावे पर नीरज जी के साथ महासमुंद आए। इस समय भी उन्होंने महासमुंद से जुड़ी अपनी यादों को हमारे साथ साझा किया। कुछ वर्षों बाद दुर्भाग्य हूं वे स्मृति लोप के शिकार हो गए जिससे बहुत चाहने के बाद भी हम उन्हें महासमुंद नहीं ला पाए लेकिन अपनी शानदार ग़ज़लों, यादगार अश'आर और अनूठी प्रस्तुति के कारण बद्र साहब हमारी यादों में हमेशा बने रहेंगे। उनका ही एक शे'र है-

मुसाफ़िर  हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी,

किसी मोड़ पर फिर मुलाकात  होगी।

अपनी ग़ज़लों और यादगार अश'आर में बशीर बद्र साहब हमेशा जिन्दा रहेंगे और निश्चित ही हर मोड़ पर और बार-बार उनकी रचनाओं के कारण उनसे मुलाकात होती रहेगी। उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि।

अशोक शर्मा

शायर, साहित्यकार महासमुंद

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