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कृषि विश्वविद्यालय में अगले तीन दिनों तक बिखरेगी आमों की बहार

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राज्यपाल रमेन डेका 29 मई को  आम महोत्सव का शुभांरभ करेंगे

शुभारंभ समारोह में मुख्यमंत्री, कृषि मंत्री, सांसद एवं विधायक भी होंगे शामिल

रायपुर- इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय परिसर में कल से अगले तीन दिनों तक आमों की बहार रहेगी और समूचा माहौल आममय रहेगा। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर तथा संचालनालय उद्यानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी, छत्तीसगढ़ शासन तथा प्रकृति की ओर सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में 29 से 31 मई, 2026 तक तीन दिवसीय राष्ट्रीय आम महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कृषि महाविद्यालय परिसर में आयोजित राष्ट्रीय आम महोत्सव का शुभांरभ राज्यपाल रमेन डेका कल 29 मई को अपरान्ह 4 बजे करेंगे। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय करेंगे। कृषि मंत्री रामविचार नेताम तथा रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल अति विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे। रायपुर ग्रामीण विधायक मोतीलाल साहू, धरसींवा विधायक अनुज शर्मा, छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम के अध्यक्ष चन्द्रहास चन्द्राकर, छत्तीसगढ़ राज्य कृषक कल्याण परिषद के अध्यक्ष सुरेश चंन्द्रवंशी तथा इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. गिरीश चंदेल विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। राष्ट्रीय आम महोत्सव में आम की 250 से अधिक किस्मों का प्रदर्शन किया जायेगा। यहां आम की उन्नत किस्मों के पौधे तथा फल विक्रय हेतु आमजनों के लिए उपलब्ध रहेंगे।

आम की देशी-विदेशी 250 से अधिक किस्में देखने को मिलेंगी 

राष्ट्रीय आम महोत्सव में 29 से 31 मई, 2026 तक विभिन्न श्रेणियों में प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाएगा जिसमें किसानों द्वारा उत्पादित आम की व्यावसायिक किस्मों के अंतर्गत दशहरी, लंगडा, बाम्बे ग्रीन, चैसा, मालदा, हिमसागर, सुन्दरजा, केसर, अलफान्सो, तोतापरी, नीलम, बैगनफल्ली, पैरी, सिन्दूरी, फज़ली आदि किस्मों की प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। संकर किस्मों की प्रतियोगिता के अंतर्गत मल्लिका, आम्रपाली, पूसा अरूणिमा, अम्बिका, रत्ना, सिंधु, अर्का पुनीत किस्मों को शामिल किया गया है। विशिष्ट किस्मों की प्रतियोगिता के अंतर्गत हाथीझुल, नूरजहां, लड्डु, गुलाब खास किस्मों के उत्पादक भाग ले सकते हैं। एक्जोटिक (आयातित किस्म) की प्रतियोगिता में मियाजाकी, टाॅमी एटकिन्स एवं गोल्डन नगेट्स किस्मों को शमिल किया गया है। 

राष्ट्रीय आम महोत्सव में आम पर केंद्रित विभिन्न प्रतियोगिताएं होंगी आयोजित

आम महोत्सव में आम की विभिन्न किस्मों की प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही है जिसमें छत्तीसगढ़ एवं देश के विभिन्न राज्यों के आम उत्पादक शामिल होंगे। यहां छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए आम उत्पादक किसान उनके द्वारा उत्पादित आमों की विभिन्न किस्मों का प्रदर्शन करेंगे। इस अवसर पर आम से बने विभिन्न व्यंजनों की प्रतियोगिताएं भी आयोजित हैं। आम की सजावट प्रतियोगिता भी आयोजित की जा रही है जिसमें विद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन विद्यार्थी, महिलाएं तथा अन्य सामान्यजन भी पंजीयन कर भागीदारी कर सकते है। इस महोत्सव में पंजीयन एवं प्रवेश पूर्णतया निःशुल्क है। राष्ट्रीय आम महोत्सव में संस्थागत एवं व्यक्तिगत प्रतियोगी भी सहभागी हो सकते हैं। आम महोत्सव के दौरान आम पर केंद्रित मैंगो क्विज़ मैंगो, फैंसी ड्रेस आदि प्रतियोगिताएं भी अयोजित की जाएगी। इसके अलावा प्रतिदिन सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर आम से निर्मित उत्पादों की प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाएगा जिसमें प्रतिभागी आम से निर्मित उत्पाद - नेक्टर/आर.टी.एस., शर्बत, पना, आम के अचार, आम की चटनी, आम पापड़, आमरस, जैम एवं मिठाई आदि व्यंजनों के साथ प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय आम महोत्सव में प्रतिभागियों हेतु आम आधारित माॅडल एवं बोनसाई, आम आधरित सजावट प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर प्रकृति की ओर सोसायटी की ओर से आम की ग्यारह गुठलियाँ लाने वाले व्यक्तियों को एक उन्नत किस्म के आम का पौधा दिया जाएगा। प्रसिद्ध शेफ आकांक्षा राॅय आम के व्यंजन बनाना भी सिखाएंगी।

आम उत्पादन, प्रसंस्करण तथा समस्या समाधान पर तकनीकी सत्र भी आयोजित होंगेआम उत्पादन, प्रसंस्करण तथा समस्या समाधान पर तकनीकी सत्र भी आयोजित होंगे

आयोजन के प्रथम दिवस 29 मई को प्रातः 9 बजे से 12 बजे तक प्रविष्टियों का पंजीयन किया जाएगा। इसके पश्चात सामान्यजनों के लिए प्रदर्शनी अवलोकनार्थ तीनों दिन सायः 9 बजे तक खुली रहेगी। प्रदर्शनी में आम की विभिन्न किस्मों के फल, आम के विभिन्न उत्पाद एवं आम के पौधे भी विक्रय के लिए उपलब्ध रहेंगे। द्वितीय दिवस 30 मई को आम उगाने वाले कृषकों एवं जिज्ञासुओं के लिए 12 बजे से 4 बजे तक ‘‘आम उत्पादन समस्या एवं समाधान’’ विषय पर तकनीकी मार्गदर्शन एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया है, जिसमें छत्तीसगढ़ में उच्च गुणवत्ता के आम की विभिन्न किस्मों का उत्पादन, आम के विभिन्न उत्पाद एवं उनके विपणन के साथ ही आम उत्पादन हेतु छत्तीसगढ़ शासन की योजनाओं की भी जानकारी प्रदान की जायेगी, जिससे नयी पीढ़ी के लोग आम उत्पादन की ओर आकृष्ट हो सकें । आम उत्पादन को पर्यावरण के संरक्षण के साथ एक स्वास्थ्यवर्धक व्यवसाय के रूप में अपनाने की जानकारी आम लोगों को प्रदान की जा जाएगी। तृतीय दिवस 31 मई को आम उत्पादक कृषकों एवं उद्यमियों की सफलता की कहानी उन्हीं की जुबानी 12 से 4 बजे तक आयोजित होगा। 

राष्ट्रीय आम महोत्सव के अंतिम दिन प्रदर्शनी के अवलोकन के साथ ही प्रतिभागियों के लिए पुरस्कार वितरण एवं सम्मान समारोह का आयोजन भी किया जायेगा। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय फल ‘‘आम’’ जो कि आम जनता का प्रिय फल है उसकी समस्त सामान्य एवं खास किस्मों, विशिष्ट उत्पादों एवं भविष्य में अधिक उत्पादन के लिए रोजगार के साधनों की जानकारी नागरिकों, महिलाओं, विद्यार्थियों, नव उद्यमियों एवं कृषकों को प्रदान करना है। राष्ट्रीय आम महोत्सव के अवसर पर आयोजित प्रतियोगिता में प्रतिभागी न्यूनतम 5 से 10 आम प्रति किस्म के साथ भाग ले सकते हैं। आम से बने विभिन्न व्यंजनों की प्रतियोगिता में न्यूनतम 250 ग्राम आम के उत्पाद के साथ पंजीयन कर इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। इस आयोजन में पंजीयन एवं प्रवेश निःशुल्क है अतः इस अवसर का लाभ प्राप्त करने हेतु सहभागी बनें।

जशपुर की नाशपाती से बढ़ रही किसानों की आमदनी, 3,500 से अधिक कृषक जुड़े फल उत्पादन से

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3500 हेक्टेयर में हो रही नाशपाती की खेती, देश के कई राज्यों में है जशपुर की नाशपाती की मांग

एक एकड़ से किसानों को हो रही 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है। जशपुर जिले के किसान नाशपाती की खेती के माध्यम से उल्लेखनीय आय अर्जित कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। प्राकृतिक रूप से अनुकूल जलवायु और उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन के कारण जशपुर आज राज्य के प्रमुख नाशपाती उत्पादक जिलों में शामिल हो चुका है।

जशपुर जिले में लगभग 3,500 से अधिक किसान करीब 3,500 हेक्टेयर क्षेत्र में नाशपाती की खेती कर रहे हैं। जिले में प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख 75 हजार क्विंटल नाशपाती का उत्पादन हो रहा है। इससे हजारों कृषक परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और जिले की पहचान फल उत्पादन के क्षेत्र में लगातार मजबूत हो रही है।

जशपुर की नाशपाती स्वाद, गुणवत्ता और आकर्षक आकार के कारण देश के विभिन्न राज्यों में विशेष रूप से पसंद की जाती है। जिले के सन्ना, पंडरापाठ, कंवई, महुआ, सोनक्यारी, मनोरा, धवईपाई और गीधा जैसे क्षेत्रों से नाशपाती की खेप दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडिशा सहित अन्य राज्यों में भेजी जाती है। फल को सावधानीपूर्वक कैरेट में पैक कर बाजारों तक पहुंचाया जाता है।

नाशपाती की खेती किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है। एक एकड़ क्षेत्र से किसानों को औसतन 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और किसान आधुनिक उद्यानिकी की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।

उद्यानिकी विभाग तथा नाबार्ड के सहयोग से किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, पौधरोपण, बागवानी प्रबंधन और विपणन संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत नाशपाती क्षेत्र विस्तार योजना संचालित की जा रही है, जिसके माध्यम से किसानों को अनुदान एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल से जशपुर जिले में उद्यानिकी आधारित कृषि को नई दिशा मिली है। नाशपाती की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि जशपुर को राज्य के एक उभरते हुए फल उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित कर रही है।

वैज्ञानिकों ने अंगूर में बीजरहितता के आनुवंशिक रहस्यों का किया खुलासा

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वैज्ञानिकों ने अंगूर में बीजरहित (Seedless) होने के पीछे छिपे महत्वपूर्ण आनुवंशिक और विकासात्मक तंत्रों का खुलासा किया है। बीजरहित अंगूर, अपने पतले छिलके, मीठे स्वाद और बेहतर बनावट के कारण उपभोक्ताओं और अंगूर उद्योग में अत्यधिक पसंद किए जाते हैं, जिससे यह गुण प्रजनन कार्यक्रमों में अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है।

अंगूर विश्व की प्रमुख बागवानी फसलों में से एक है, जिसका बड़ा हिस्सा ताजे फल या किशमिश जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों के रूप में उपयोग होता है। हालांकि बीजरहित अंगूर की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके पीछे के जैविक तंत्र अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे।

यह शोध पुणे स्थित आघारकर अनुसंधान संस्थान (ARI), जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है, तथा सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के सहयोग से किया गया। इस अध्ययन में पराग (पोलन) की निष्क्रियता से बीजरहित अंगूर बनने की आणविक और जीनोमिक प्रक्रियाओं पर नई जानकारी प्राप्त हुई है, जिससे बेहतर गुणवत्ता और अधिक उत्पादन वाली नई किस्में विकसित करने में मदद मिलेगी।

यह अध्ययन हाल ही में ‘BMC Plant Biology’ में प्रकाशित हुआ है, जिसमें संस्थान द्वारा विकसित उच्च उत्पादक अंगूर किस्म ARI-516 से प्राप्त एक बीजरहित म्यूटेंट का विश्लेषण किया गया।

डॉ. रवींद्र पाटिल के नेतृत्व में शोध टीम ने बीज वाले अंगूर (ARI-516) और उसके बीजरहित म्यूटेंट के बीच तुलनात्मक अध्ययन किया। सूक्ष्म परीक्षण में पाया गया कि बीजरहित म्यूटेंट में पराग कणों का आकार असामान्य था, उनकी जीवित रहने की क्षमता बहुत कम थी और वे अंकुरित नहीं हो पाते थे, जिससे पराग की निष्क्रियता बीजरहितता का मुख्य कारण सामने आई।

इसके अलावा, मादा प्रजनन संरचनाएं (मैक्रोगैमेटोफाइट्स) भी सामान्य किस्म की तुलना में छोटी पाई गईं, जिससे निषेचन प्रक्रिया बाधित होती है और अंततः बीजरहित फल बनते हैं।

आणविक स्तर पर, वैज्ञानिकों ने ट्रांसक्रिप्टोमिक विश्लेषण (RNA सीक्वेंसिंग) किया, जिससे पता चला कि पराग विकास, कोशिका विभाजन और हार्मोन सिग्नलिंग से जुड़े कई जीन बीजरहित म्यूटेंट में कम सक्रिय थे। साथ ही, जीनोम सीक्वेंसिंग में कई ‘इन्सर्शन-डिलीशन’ (InDel) म्यूटेशन पाए गए, जो पराग निर्माण और उसके कार्य को प्रभावित करते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बीजरहितता ‘पार्थेनोकार्पी’ नामक प्रक्रिया के कारण होती है, जिसमें निषेचन के बिना ही फल का विकास होता है। यह प्रक्रिया पराग निर्माण और प्रजनन में दोष के कारण उत्पन्न होती है।

यह अध्ययन आधुनिक जीनोमिक तकनीकों का उपयोग करते हुए अंगूर में पार्थेनोकार्पिक बीजरहितता को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इससे जुड़े जीनों की पहचान भविष्य में अंगूर की उन्नत बीजरहित किस्मों के विकास में सहायक होगी, जिससे उत्पादन, गुणवत्ता और अनुकूलन क्षमता में सुधार होगा और बागवानी क्षेत्र को लाभ मिलेगा।

उद्यानिकी खेती से बदली किसान की आर्थिक तस्वीर

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धान की तुलना में स्ट्रॉबेरी की खेती में डबल मुनाफा

तकनीकी मार्गदर्शन, शासन की सब्सिडी से घटा खर्च, बढ़ी आमदनी

रायपुर- जिले में शासन की उद्यानिकी प्रोत्साहन योजनाओं से किसान अब परंपरागत खेती की सीमाओं को तोड़कर नई संभावनाओं की ओर आगे बढ़ रहे हैं। अब किसान केवल धान पर निर्भर न रहकर अधिक लाभ देने वाली  फसलों को अपना रहे हैं। किसान लाल बहादुर सिंह बताया कि ढाई एकड़ में स्ट्रॉबेरी की खेती करने में लगभग 2 लाख रुपये की लागत आई है। इससे उन्हें करीब 9 लाख रुपये की आमदनी होने का अनुमान है।

सरगुजा जिले के भगवानपुरखुर्द निवासी किसान लाल बहादुर सिंह ने भी इसी सोच के साथ खेती में नवाचार अपनाया और आज वे एक सशक्त, आत्मनिर्भर एवं उन्नत किसान के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं।

धान से उद्यानिकी की ओर किया सफल बदलाव

कृषक लाल बहादुर सिंह ने बताया कि वर्षों से धान की खेती करने के बाद भी अपेक्षाकृत सीमित लाभ ही मिल पाता था। लागत बढ़ने और मौसम पर निर्भरता के कारण मुनाफा कम हो जाता था। इसी बीच उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने उन्हें स्ट्रॉबेरी जैसी उच्च मूल्य वाली फसल की जानकारी दी और इसके फायदे समझाए। इससे उन्हें अपनी खेती में बदलाव करने की प्रेरणा मिली।

छोटे क्षेत्र से शुरुआत, बड़े रकबे तक विस्तार

उन्होंने बताया कि स्ट्रॉबेरी की खेती की शुरुआत उन्होंने मात्र 50 डिसमिल क्षेत्र से की थी। लाभ मिलने पर अगले वर्ष एक एकड़ में खेती की और फिर तीसरे व चौथे वर्ष इसे बढ़ाकर ढाई एकड़ तक कर दिया। वर्तमान में वे ढाई एकड़ क्षेत्र में स्ट्रॉबेरी की सफल खेती कर रहे हैं, जिससे उन्हें अच्छी आमदनी प्राप्त हो रही है।

स्ट्रॉबेरी की खेती में लागत कम अधिक मुनाफा

कृषक सिंह ने बताया कि ढाई एकड़ में स्ट्रॉबेरी की खेती करने में लगभग 2 लाख रुपये की लागत आई है। इससे उन्हें करीब 9 लाख रुपये की आमदनी होने का अनुमान है। लागत निकालने के बाद लगभग 7 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है। उन्होंने बताया कि यही ढाई एकड़ यदि धान की खेती में लगाया जाता, तो लगभग 90 क्विंटल उत्पादन होता, जिससे शासकीय उपार्जन केन्द्र में बेचने पर करीब 3 लाख रुपये की आमदनी होती। धान की खेती में लगभग 1 लाख रुपये की लागत आने के बाद शुद्ध लाभ मात्र 2 लाख रुपये के आसपास ही रहता।

उद्यानिकी में सब्सिडी से घटा खर्च, बढ़ा लाभ

किसान लाल बहादुर सिंह ने बताया कि उद्यानिकी विभाग की इस योजना के अंतर्गत पौध, खाद और बीज की राशि डीबीटी के माध्यम से वापस कर दी जाती है। उन्हें लगभग 80 से 85 हजार रुपये तक की सब्सिडी प्राप्त होगी। विभाग द्वारा समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जाता है, जिससे खेती और अधिक सफल हो रही है।

अधिकारियों का मार्गदर्शन बना सफलता की कुंजी

लाल बहादुर सिंह ने बताया कि वे पौधे स्वयं मंगवाते हैं और उद्यानिकी विभाग द्वारा निर्धारित मापदंडों के अनुसार खेती करते हैं। विभागीय अधिकारियों द्वारा खेत का निरीक्षण कर आवश्यक सलाह दी जाती है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में सुधार होता है और बाजार में अच्छी कीमत मिल जाती है।

अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बने लाल बहादुर सिंह

लाल बहादुर सिंह ने कहा कि शासन की उद्यानिकी योजना से अन्य किसान भी लाभ ले सकते हैं। धान जैसी पारंपरिक फसलों के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों को अपनाकर किसान अपनी आमदनी कई गुना बढ़ा सकते हैं। आज वे स्वयं उद्यानिकी खेती से सशक्त और आत्मनिर्भर बने हैं तथा अन्य किसानों को भी इस दिशा में प्रेरित कर रहे हैं।

उद्यानिकी प्रोत्साहन के लिए शासन का जताया आभार

किसान लाल बहादुर सिंह ने उद्यानिकी खेती को प्रोत्साहित करने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शासन की योजनाओं से प्रदेश का किसान आज सशक्त, आत्मनिर्भर और उन्नत कृषक बन रहा है।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना ने दी नई दिशा, कम लागत में लाखों की आय का रास्ता खुला

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 ग्राफ्टेड बैंगन से बदली खेती की तस्वीर - खरसिया के किसान मुरलीधर साहू 

आधुनिक तकनीक व उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन से 80 क्विंटल से बढ़कर 170 क्विंटल तक पहुँची उपज

रायपुर- ग्राफ्टेड बैंगन एक ऐसा पौधा है जो दो अलग-अलग पौधों के हिस्सों को जोड़कर बनाया जाता है, एक मजबूत जड़ वाला पौधा (रूटस्टॉक) और एक उच्च गुणवत्ता वाला फल देने वाला पौधा (स्कायन)। इस तकनीक से बैंगन की पैदावार बढ़ती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है, और मिट्टी से जुड़ी समस्याएं कम होती हैं।

रायगढ़ जिले के विकासखण्ड खरसिया के ग्राम करूमौहा के किसान मुरलीधर साहू आज आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। कभी परंपरागत धान की खेती करने वाले  मुरलीधर साहू को लागत अधिक और लाभ कम होने के कारण खेती में संतुष्टि नहीं थी। इसी बीच उन्होंने उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से संपर्क कर उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया। यही मार्गदर्शन उनके कृषि जीवन में बड़ा बदलाव साबित हुआ।

कम लागत में उत्पादन में बड़ा इजाफा

उद्यानिकी विभाग द्वारा समय-समय पर दी गई तकनीकी सलाह, प्रशिक्षण एवं प्रेरणा से उनका रूझान पारंपरिक खेती से बदलकर उद्यानिकी फसलों की ओर बढ़ा। विभाग की अनुशंसा पर उन्होंने अपनी एक हेक्टेयर भूमि में ग्राफ्टेड बैंगन फसल का रोपण किया। जैविक खाद और जैविक दवाओं के प्रयोग से लागत भी कम रही और उत्पादन क्षमता में बड़ा इजाफा देखने को मिला।

  आधुनिक तकनीक से तीन गुना लाभ 

राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के तहत उन्हें 20 हजार रुपए का अनुदान भी मिला। इससे आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था हुई और खेती की दिशा व दशा दोनों बदली। पहले जहां उपज 80 से 85 क्विटंल उत्पादन होता था वहीं आधुनिक तकनीक अपनाने के बाद उपज बढ़कर 150 से 70 क्विंटल तक पहुँच गई। बाजार भाव अच्छा मिलने पर कुल आय 4.5 लाख रुपए और कुल लाभ लगभग 3 लाख रुपए तक पहुँच गया, जो पहले की तुलना में तीन गुना है।

जैविक पद्धति और कम लागत में अधिक उत्पादन

मुरलीधर साहू की सफलता को देखकर आसपास के ग्रामीण एवं वनांचल क्षेत्रों के किसान भी उद्यानिकी फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। आधुनिक कृषि तकनीक, जैविक पद्धति और कम लागत में अधिक उत्पादन का संदेश दूर-दूर तक फैल रहा है। उनकी यह सफलता कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, आधुनिक तकनीक और योजनाओं का लाभ लेकर किसान आज आर्थिक रूप से मजबूती की दिशा में बड़े कदम उठा सकते हैं।

एक हेक्टेयर से बनी मिसाल”, ग्राफ्टेड बैंगन ने बदली आर्थिक स्थिति

खरसिया के किसान मुरलीधर साहू ने एक हेक्टेयर में ग्राफ्टेड बैंगन की आधुनिक खेती अपनाकर उत्पादन को लगभग दोगुना कर दिया। जैविक विधियों, विभागीय मार्गदर्शन और बागवानी मिशन से प्राप्त अनुदान के सहारे उन्हें इस सीजन में करीब 3 लाख रुपये का शुद्ध लाभ हुआ। इस उपलब्धि ने क्षेत्र के किसानों में नई ऊर्जा और उम्मीद जगाई है।

सिक्किम में कृषि शिक्षा को बढ़ावा: केंद्रीय मंत्री ने बागवानी कॉलेज भवनों का उद्घाटन

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केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल के अंतर्गत सिक्किम के बर्मीओक स्थित बागवानी महाविद्यालय की प्रशासनिक एवं शैक्षणिक इमारतों का उद्घाटन आज केंद्रीय कृषि, किसान कल्याण एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्चुअल माध्यम से किया। इस अवसर पर वार्षिक क्षेत्रीय कार्यशाला का भी आयोजन हुआ। कार्यक्रम में सिक्किम के राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी, सिक्किम के कृषि मंत्री पुरन कुमार गुरूंग, कुलपति डॉ. अनुपम मिश्रा एवं अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

शिवराज चौहान ने कहा कि यद्यपि वे आज शारीरिक रूप से सिक्किम में उपस्थित नहीं हैं, किंतु उनकी आत्मा बर्मीओक के नव-निर्मित भवनों में सभी के साथ है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार की ओर से केंद्रीय राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी कार्यक्रम में व्यक्तिगत रूप से सम्मिलित हुए।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लगभग ₹52 करोड़ की लागत से निर्मित यह नई इमारतें सिक्किम के युवाओं को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएँ प्रदान करेंगी। सिक्किम को प्राकृतिक सौंदर्य एवं अनोखी जलवायु वाला अद्भुत राज्य बताते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ की भूमि एवोकाडो, कीवी, बड़ी इलायची, आर्किड और अदरक, हल्दी, टमाटर, पत्ता गोभी जैसी सब्जियों की अपार संभावनाएँ रखती है।

उन्होंने कहा कि मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, बांस और औषधीय पौधों जैसी गैर-पारंपरिक खेती को प्रोत्साहित करके सिक्किम ने बागवानी गतिविधियों में विविधता लाई है। सिक्किम को एक पूर्णत: जैविक राज्य बताते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ के किसान रासायनिक उर्वरकों से दूर रहते हुए शुद्ध उत्पादन केवल सिक्किम ही नहीं बल्कि पूरे देश को उपलब्ध कराते हैं। इसके लिए उन्होंने सिक्किम के किसानों को नमन किया।

शिवराज चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय कृषि तीव्र गति से प्रगति कर रही है और प्रधानमंत्री ने पर्वतीय राज्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। उन्होंने आश्वासन दिया कि भारत सरकार सिक्किम में कृषि को बढ़ावा देने में कोई कमी नहीं छोड़ेगी। उन्होंने कहा कि देश में जैविक खेती का विस्तार समय की आवश्यकता है।

केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री मोदी के कृषि संवर्धन हेतु छह सूत्रीय कार्यक्रम को स्पष्ट किया: उत्पादन बढ़ाना, खेती की लागत कम करना, उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करना, नुकसान की भरपाई करना और कृषि का विविधीकरण। उन्होंने कहा कि फ्लोरीकल्चर, बांस और बागवानी किसानों की आय बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे कई बीमारियाँ उत्पन्न हुई हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

कृषि के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए शिवराज चौहान ने उनसे आग्रह किया कि शिक्षा पूर्ण करने के बाद भी वे कृषि से जुड़े रहें – चाहे स्वयं खेती करें, कृषि-आधारित स्टार्टअप शुरू करें या कृषि में नई तकनीक एवं नवाचार लाएँ। उन्होंने कहा कि कृषि में अपार संभावनाएँ हैं और आज भी यह भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है तथा किसान इसकी आत्मा हैं। उन्होंने बताया कि देश की लगभग 46% जनसंख्या कृषि में संलग्न है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. मंगी लाल जाट ने भी कार्यक्रम में कृषि भवन, नई दिल्ली से वर्चुअल माध्यम से भाग लिया।

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