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तमिलनाडु के कोंडगई झील से प्राप्त 4,500 वर्षों का विस्तृत जलवायु अभिलेख

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एक नए अध्ययन में तमिलनाडु के शिवगंगा ज़िले के बाहरी क्षेत्र में स्थित कोंडगई अंतर्देशीय झील के नीचे से प्रायद्वीपीय भारत के अब तक के सबसे विस्तृत जलवायु अभिलेखों में से एक का पता चला है।

शोध पत्र का ग्राफिकल सार

स्थलीय तमिलनाडु में पूर्वोत्तर मानसून के प्रति संवेदनशील होने के बावजूद, अब तक अच्छी तरह दिनांकित बहु-प्रॉक्सी झील अभिलेख लगभग नहीं के बराबर थे। कीलाड़ी के समीप स्थित कोंडगई झील—जो संगम काल की एक उन्नत नगरीय सभ्यता के प्रमाणों के लिए प्रसिद्ध एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है और जिसकी तिथि संभवतः ईसा पूर्व छठी शताब्दी या उससे भी पहले की मानी जाती है—तमिल इतिहास को कई शताब्दियों पीछे ले जाती है। शोधकर्ताओं ने यह पहचाना कि प्राचीन बसाहट क्षेत्रों में स्थित यह झील अतीत के मानसून परिवर्तन, पारिस्थितिकी तंत्र की प्रतिक्रियाओं और मानव बसावट के साथ उनके संबंधों को समझने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करती है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान, लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) के शोधकर्ताओं ने झील से एक मीटर से कुछ अधिक गहराई तक का अवसाद (सेडिमेंट) प्रोफ़ाइल निकाला और 32 निकटवर्ती नमूने एकत्र किए, जिनमें से प्रत्येक समय के एक अलग चरण का प्रतिनिधित्व करता है। स्थिर समस्थानिक विश्लेषण, पराग अध्ययन, कण-आकार मापन और रेडियोकार्बन डेटिंग जैसी उन्नत तकनीकों के संयोजन का उपयोग कर उन्होंने असाधारण सटीकता के साथ अतीत की वर्षा, वनस्पति, झील के जल-स्तर और बाढ़ घटनाओं का पुनर्निर्माण किया।

जर्नल Holocene में प्रकाशित इस अध्ययन में, अंतर्देशीय तमिलनाडु से प्राप्त लेट होलोसीन काल की जलवायु और झील-पारिस्थितिकी तंत्र गतिकी का पहला उच्च-रिज़ॉल्यूशन बहु-प्रॉक्सी पुनर्निर्माण प्रस्तुत किया गया है। इसमें पिछले लगभग 4,500 वर्षों के दौरान तीन प्रमुख जलवायु चरणों की पहचान की गई—4.2 हजार वर्ष पूर्व का शुष्क (अरीड) चरण, 3.2 हजार वर्ष पूर्व का शुष्क चरण, और रोमन उष्ण काल—और इनके मानसून परिवर्तनशीलता, झील की जल-प्रणाली तथा मानव गतिविधियों से प्रत्यक्ष संबंधों को स्थापित किया गया है।

4,500 वर्षों के मानसूनी व्यवहार के पुनर्निर्माण के माध्यम से यह अध्ययन एक दीर्घकालिक जलवायु आधाररेखा प्रदान करता है, जो क्षेत्रीय जलवायु पूर्वानुमान को सुदृढ़ बनाती है तथा भविष्य में सूखा, अत्यधिक वर्षा या बाढ़ जैसी घटनाओं के पूर्वानुमान में सहायक है। तमिलनाडु जैसे जलवायु-संवेदनशील क्षेत्र के लिए यह ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मानसून पूर्वानुमान मॉडलों को बेहतर बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह निष्कर्ष शिवगंगा और मदुरै जैसे सूखा-प्रवण जिलों में जल संसाधन प्रबंधन को भी प्रत्यक्ष रूप से समर्थन देते हैं। अतीत के झील-स्तर उतार-चढ़ाव, अवसाद प्रवाह और जल-वैज्ञानिक परिवर्तनों की जानकारी सतत जलाशय पुनर्स्थापन, भूजल पुनर्भरण योजना, तालाबों के पुनर्वास तथा जलवायु-स्मार्ट कृषि जल उपयोग को दिशा देती है। यह उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो मानसून-आधारित जल प्रणालियों पर निर्भर हैं।

प्राचीन बाढ़ निक्षेपों, स्थलीय अवसाद प्रवाह और भूमि अस्थिरता के चरणों की पहचान कर यह अध्ययन जोखिम मानचित्रण और आपदा-तैयारी में योगदान देता है। वैगई नदी बेसिन में बाढ़-संवेदनशील क्षेत्रों, नदी-मार्ग परिवर्तन और भूमि क्षरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान के लिए प्राधिकरण इन संकेतों का उपयोग कर सकते हैं।

(क) कोंडगई झील (KLD), तमिलनाडु का अध्ययन मानचित्र, जिसमें भूमि उपयोग और भूमि आवरण के साथ प्रोफ़ाइल स्थान दर्शाया गया है।
(ख) 1901 से 2020 ईस्वी तक कोंडगई ज़िले में औसत मासिक वर्षा (KNMI क्लाइमेटिक एक्सप्लोरर से प्राप्त)।
(ग) गूगल अर्थ छवि जिसमें अध्ययन स्थल, प्राचीन नदी-मार्ग (पेलियोचैनल) और वैगई नदी बेसिन की ऑक्स-बो झीलें दर्शाई गई हैं।
(घ) KK’ के साथ क्रॉस-सेक्शन, जहाँ T0 सक्रिय नदी-मार्ग और T1 नदी-चिन्ह तथा वैगई नदी के पेलियोचैनलों का स्थान दर्शाता है।
(ङ) कोंडगई दफ़न स्थल।

यह शोध पुरातत्व और सांस्कृतिक धरोहर के क्षेत्र में भी अत्यंत लाभकारी है। कीलाड़ी बसाहट के निकट स्थित कोंडगई झील का पर्यावरणीय इतिहास यह समझने में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है कि प्राचीन समाजों ने जलवायु परिवर्तनशीलता, जल-कमी और पारिस्थितिक दबावों के प्रति कैसे अनुकूलन किया। इससे पुरातात्विक व्याख्या, संरक्षण रणनीतियों और क्षेत्रीय विरासत नियोजन को मजबूती मिलती है।

पारिस्थितिक दृष्टिकोण से, यह अध्ययन जलीय उत्पादकता, ऑक्सीजन स्थितियों और जैविक पदार्थ स्रोतों में दीर्घकालिक परिवर्तनों का दस्तावेज़ीकरण कर आर्द्रभूमि और झील पुनर्स्थापन के लिए एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। इससे साक्ष्य-आधारित संरक्षण और जैव विविधता रणनीतियों के निर्माण में सहायता मिलती है।

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