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भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला: ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत झलक

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भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला: ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत झलक

भारत मंडपम में आयोजित भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला (IITF) देश के सबसे बड़े और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध आयोजनों में से एक है। 44 वर्षों की अपनी गौरवशाली विरासत के साथ, इस वर्ष का थीम ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ भारत की विविधता में एकता, आर्थिक आत्मविश्वास और रचनात्मक ऊर्जा को एक ही मंच पर प्रस्तुत करता है। यहाँ साझेदार राज्य, फोकस राज्य, मंत्रालय, वैश्विक प्रतिभागी, MSMEs, कारीगर और स्टार्ट-अप मिलकर एक ऐसा समावेशी वातावरण बनाते हैं, जहां परंपरा, नवाचार और उद्यमिता एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

भारत की सांस्कृतिक विराटता का जीवंत अनुभव

एक आगंतुक के दृष्टिकोण से IITF मानो भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और हस्तशिल्प विरासत की यात्रा है। हर राज्य का मंडप अपनी खास पहचान लिए खड़ा है —

  • झारखंड के हस्तकरघा और जनजातीय कला,

  • उत्तर प्रदेश की बारीक धातुकारी,

  • राजस्थान की रंगीन ब्लॉक-प्रिंट परंपरा,

  • दर्पण-काम, टेराकोटा, जनजातीय आभूषण, बाँस और जूट शिल्प,

  • हाथ से काढ़े गए वस्त्र —

सब कुछ एक ही छत के नीचे दृष्टिगोचर होता है।

यहाँ ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का संदेश लोक-नृत्य, लोक-संगीत, शिल्प कार्यशालाओं और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से हर कोने में गूंजता है।

कला, समुदाय और व्यवसाय को जोड़ता एक मंच

एक प्रदर्शक की नज़र से IITF सिर्फ एक वार्षिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन भर की मेहनत, पारिवारिक परंपराओं और सामुदायिक पहचान का प्रदर्शन है।

कारीगरों की आवाज़:

पैतकर कला – झारखंड

कलाकार बताते हैं कि मेला उनके सदियों पुराने स्क्रॉल-पेंटिंग शिल्प को जीवंत रखने में मदद करता है।

मधुबनी कला – बिहार

वे कहते हैं कि IITF उन्हें ऐसे दर्शकों से मिलाता है जो उनके प्रतीकों और सूक्ष्म चित्रण को समझते हैं।

कच्छ के पारंपरिक घंटानिर्माता – गुजरात

पहले मवेशियों के लिए बनी घंटियाँ आज संगीत वाद्य और सजावटी सामग्रियों में बदल गई हैं।
“यह मेला हमें अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से मिलने का अवसर देता है,” वे साझा करते हैं।

राजस्थान के जूत्ती शिल्पकार

मशीन-निर्मित फुटवियर के दौर में यह मंच उनके श्रमसाध्य शिल्प को जीवित रखता है।

पीढ़ियों से चली आ रही कला की मिसालें

डॉ. जी. दसरथ चारी – पारंपरिक लकड़ी नक्काशी, आंध्र प्रदेश

सदियों पुरानी मंदिर-कला शैली को जीवित रखते हुए वे कहते हैं—
“तकनीक वही है, चाहे पारंपरिक पैनल बनाएं या आधुनिक उपयोगी वस्तुएँ। IITF हमें ऐसा मंच देता है जहां लोग कला की गहराई को समझते हैं।”

देबाकी परीडा – ढोकरा कला, ओडिशा

ढोकरा उनके जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान है।
“हर डिजाइन हमारी कहानी कहता है,” वे मुस्कुराकर कहती हैं।

धीरज – बांस और बेंत शिल्प, असम

“हमारे गाँव के अनेक परिवार इस शिल्प पर निर्भर हैं। मेला हमें पहचान और सम्मान दिलाता है,” वे बताते हैं।

मधुरी सिंह – पारंपरिक मिट्टी और जूट की गुड़िया, बिहार

महामारी के दौरान शुरू की गई उनकी कला आज कई महिलाओं को आजीविका दे रही है।
“मैं गुड़िया में भारत की परंपराएँ और त्योहारों की झलक डालती हूँ,” वे कहती हैं।

IITF: भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति का संगम

IITF में ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना बड़े घोषणाओं में नहीं, बल्कि कारीगरों के हाथों में बसती है—

  • जहाँ मधुबनी की रेखाएँ ढोकरा की चमक से मिलती हैं,

  • जहाँ कच्छ की घंटियों की धुन असम की बांस-कला की सौम्यता से जुड़ती है,

  • और जहाँ पीढ़ियों की स्मृतियाँ और तकनीकें एक साझा राष्ट्रीय कहानी बन जाती हैं।

यह मेला हमें याद दिलाता है कि भारत की शक्ति उसकी विविधता के सहज मेल में है। यहाँ हर कारीगर अपने गाँव की मिट्टी और परंपरा लेकर आता है और उन्हें एक ऐसे मंच पर रखता है जहाँ वे सिर्फ कला नहीं, बल्कि भारत की आत्मा बन जाते हैं।

राष्ट्र के कारीगर: भारत का हृदय, भारत की पहचान

IITF यह प्रमाणित करता है कि जब विविध परंपराएँ एक साथ खड़ी होती हैं, तो भारत सिर्फ विशाल नहीं —
सुंदर, सामूहिक और अद्भुत रूप से एकजुट दिखाई देता है।

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