Media24Media.com: #IndianArtisans

Responsive Ad Slot


 

Showing posts with label #IndianArtisans. Show all posts
Showing posts with label #IndianArtisans. Show all posts

IITF 2025: भारत मंडपम में भारत की आर्थिक विविधता और जमीनी उद्यमिता का भव्य प्रदर्शन

No comments Document Thumbnail

भारत मंडपम परिसर भारत की आर्थिक विविधता का एक जीवंत प्रदर्शन बन गया है, जहाँ पारंपरिक शिल्प, कृषि उद्यम, स्टार्टअप नवाचार और विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय विशेषताएँ एक साथ प्रदर्शित हो रही हैं।

44वां भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला (IITF) 2025, जिसकी थीम एक भारत, श्रेष्ठ भारत है, में 3,500 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए—हर कोई अपने श्रम, विरासत और आकांक्षा की अपनी-अपनी कहानी लेकर।

14 नवंबर 2025 को उद्घाटन किया गया यह चौदह-दिवसीय आयोजन सिर्फ एक व्यापारिक मेला नहीं है, बल्कि एक ऐसा अवसर मंच है जहाँ प्रथम-पीढ़ी के उद्यमी, ग्रामीण कारीगर और घरेलू ब्रांड अपनी मांग परखते हैं, खरीदारों से जुड़ते हैं, साथियों से सीखते हैं और राज्य-स्तरीय सहायता तंत्र तक पहुँचते हैं। कई प्रदर्शकों के लिए IITF राष्ट्रीय बाज़ार में प्रवेश का पहला बड़ा कदम है—एक ऐसा बाज़ार जो आत्मविश्वासी, निरंतर बढ़ता हुआ और आत्मनिर्भर भारत का प्रतिबिंब है।

क्या आप जानते हैं?

भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला (IITF), जो 1980 से हर वर्ष इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन (ITPO) द्वारा आयोजित किया जाता है, MSME, कारीगरों, स्टार्टअप्स और उद्योगों के लिए देश के सबसे महत्वपूर्ण मंचों में से एक है। वर्षों में यह भारत की विनिर्माण क्षमता, नवाचार और विभिन्न क्षेत्रों के पारंपरिक शिल्प का प्रमुख प्रदर्शन स्थल बन गया है।

2024 में, इस मेले में दस लाख से अधिक आगंतुक आए, जिससे यह देश के सबसे लोकप्रिय व्यापार आयोजनों में अपनी स्थिति को और मजबूत करता है।

IITF का आयोजन भारत मंडपम में होता है, जो प्रगति मैदान परिसर में निर्मित आधुनिक सम्मेलन एवं प्रदर्शनी केंद्र है, जिसका उद्घाटन 2023 में किया गया। यह 123 एकड़ में फैला है तथा इसमें 7,000-सीट वाला कन्वेंशन हॉल, सात प्रदर्शनी हॉल और 100,000 वर्ग मीटर से अधिक प्रदर्शनी क्षेत्र शामिल है। ITPO प्रति वर्ष लगभग 90 कार्यक्रम आयोजित करता है, जिससे नई दिल्ली एक प्रमुख वैश्विक प्रदर्शनी गंतव्य बनती जा रही है।

बिहार: एक कारीगर का राष्ट्रीय मंच पर पदार्पण

बिहार मंडप में 45 वर्षीय सृद्धि कुमारी अपने सामने सजी भागलपुरी रेशम और ज़री के काम को संभालती हैं—एक कला जिसे उन्होंने 12 वर्षों में निखारा है। IITF में पहली बार भाग लेते हुए वे महिला-उद्यमिता की यात्रा का प्रतीक बनती हैं। वे गर्व से कहती हैं, “मैं अधिकृत विक्रेता हूँ।”

बिहार सरकार ने महिला-उद्यमिता योजनाओं के तहत उन्हें सहायता दी। उनके अनुसार, “सभी सरकारी औपचारिकताओं में सचिव ने मेरा मार्गदर्शन किया।”
उनका शिल्प बिहार और पश्चिम बंगाल दोनों राज्यों के कौशल का संगम है।

एक अन्य कारीगर ने उन्हें IITF में आने के लिए प्रेरित किया था। मार्च 2025 के GI-महोत्सव में उन्होंने दो–तीन महीने की आय के बराबर कमाया था, जिससे इस बार उनकी भागीदारी का आत्मविश्वास बढ़ा।

नालंदा से दिल्ली तक: हर साल लौटने वाला बुनकर

कुछ दूरी पर 49 वर्षीय तरुण पांडे बेहद नाजुक बावनबु्टी साड़ियों को सजाते नज़र आते हैं। यह उनका आठवाँ IITF है।

वे बताते हैं, “IITF से मुझे दो से ढाई महीने की आय के बराबर कमाई होती है। हम अन्य मेलों में भाग नहीं लेते, IITF हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है।”

उनके नियमित ग्राहक उन्हें “नालंदा के बुनकर” के रूप में पहचानते हैं।

किसान से उद्यमी: अवसरों का विस्तार

51 वर्षीय प्रहलाद रामराव बोर्गड और उनकी पत्नी कावेरी, महाराष्ट्र के हिंगोली से आए हैं। वे जैविक दालें, हल्दी, अदरक, अचार और मसाले बेचते हैं।

2012 से जैविक खेती अपनाने के बाद उन्होंने 2015 में ‘सूर्या फार्मर्स’ शुरू किया।

IITF के बारे में उन्होंने ऑनलाइन जाना और महाराष्ट्र सरकार ने आवेदन प्रक्रिया में सहायता की।

उनके अनुसार,

“ऐसे मंच केवल उत्पाद बेचने के लिए नहीं, बल्कि संपर्क बनाने, उपभोक्ता अपेक्षाएँ समझने और पेशेवर तरीके सीखने में मदद करते हैं।”
IITF में उन्हें चार से पाँच महीने की आय के बराबर कमाई होती है।

लातूर की परंपरा: गोधड़ी कला का संरक्षण

महाराष्ट्र मंडप में रुक्मणी गणेशपट सालगे अपनी 15 वर्षीय बेटी के साथ पारंपरिक गोधड़ी क्विल्ट प्रदर्शित करती हैं।

वे बताती हैं, “प्रत्येक गोधड़ी को हाथ से बनाने में चार–पाँच दिन लगते हैं।”
IITF उनके लिए सिर्फ बिक्री का मंच नहीं, बल्कि उस कला को बचाने का अवसर है जो सस्ती मशीन-निर्मित वस्तुओं के कारण जोखिम में है।

झारखंड: 400 आदिवासी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती लाख की चूड़ियाँ

झारखंड—जो 2025 में अपनी स्थापना के 25 वर्ष मना रहा है—इस वर्ष थीम स्टेट है।
यहाँ 49 वर्षीय झबर माल पारंपरिक तकनीकों से बनी लाख की चूड़ियाँ बेचते हैं।
वे कहते हैं,
“मेरे स्थायी ग्राहक हर साल मेरा इंतज़ार करते हैं। मेले के बाद मिलने वाले ऑर्डर ही मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं।”
उनकी कमाई झारखंड की लगभग 400 आदिवासी महिलाओं के आजीविका समूह का समर्थन करती है।

व्यापार मेले: आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र

IITF जैसे मेले सिर्फ तत्काल बिक्री नहीं बढ़ाते—वे छोटे उद्यमियों को दृश्यता देते हैं, दीर्घकालिक खरीदार जोड़ते हैं और बाज़ार के व्यवहार को समझने में मदद करते हैं।
2025 का यह संस्करण विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण को दर्शाता है, जहाँ आर्थिक मजबूती, राजनीतिक स्थिरता और वैश्विक व्यापार साझेदारियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

जैसे ही शाम को पवेलियन रोशन होते हैं, प्रत्येक स्टॉल के पीछे की कहानी भारत के उद्यमशीलता परिदृश्य की विविधता को उजागर करती है।
सृद्धि, तरुण, प्रहलाद, रुक्मणी और झबर जैसे कारीगरों के लिए IITF वह स्थान है जहाँ परंपरा उद्यम से मिलती है, स्थानीय कौशल राष्ट्रीय पहचान पाता है, और छोटे व्यवसाय आगे बढ़ने के लिए आवश्यक गति पाते हैं।

IITF का 44वां संस्करण साबित करता है कि भारत की आर्थिक प्रगति केवल बड़े उद्योगों से नहीं, बल्कि छोटे उद्यमियों की मेहनत, रचनात्मकता और संकल्प से भी आकार लेती है।


भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला: ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत झलक

No comments Document Thumbnail

भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला: ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत झलक

भारत मंडपम में आयोजित भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला (IITF) देश के सबसे बड़े और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध आयोजनों में से एक है। 44 वर्षों की अपनी गौरवशाली विरासत के साथ, इस वर्ष का थीम ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ भारत की विविधता में एकता, आर्थिक आत्मविश्वास और रचनात्मक ऊर्जा को एक ही मंच पर प्रस्तुत करता है। यहाँ साझेदार राज्य, फोकस राज्य, मंत्रालय, वैश्विक प्रतिभागी, MSMEs, कारीगर और स्टार्ट-अप मिलकर एक ऐसा समावेशी वातावरण बनाते हैं, जहां परंपरा, नवाचार और उद्यमिता एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

भारत की सांस्कृतिक विराटता का जीवंत अनुभव

एक आगंतुक के दृष्टिकोण से IITF मानो भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और हस्तशिल्प विरासत की यात्रा है। हर राज्य का मंडप अपनी खास पहचान लिए खड़ा है —

  • झारखंड के हस्तकरघा और जनजातीय कला,

  • उत्तर प्रदेश की बारीक धातुकारी,

  • राजस्थान की रंगीन ब्लॉक-प्रिंट परंपरा,

  • दर्पण-काम, टेराकोटा, जनजातीय आभूषण, बाँस और जूट शिल्प,

  • हाथ से काढ़े गए वस्त्र —

सब कुछ एक ही छत के नीचे दृष्टिगोचर होता है।

यहाँ ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का संदेश लोक-नृत्य, लोक-संगीत, शिल्प कार्यशालाओं और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से हर कोने में गूंजता है।

कला, समुदाय और व्यवसाय को जोड़ता एक मंच

एक प्रदर्शक की नज़र से IITF सिर्फ एक वार्षिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन भर की मेहनत, पारिवारिक परंपराओं और सामुदायिक पहचान का प्रदर्शन है।

कारीगरों की आवाज़:

पैतकर कला – झारखंड

कलाकार बताते हैं कि मेला उनके सदियों पुराने स्क्रॉल-पेंटिंग शिल्प को जीवंत रखने में मदद करता है।

मधुबनी कला – बिहार

वे कहते हैं कि IITF उन्हें ऐसे दर्शकों से मिलाता है जो उनके प्रतीकों और सूक्ष्म चित्रण को समझते हैं।

कच्छ के पारंपरिक घंटानिर्माता – गुजरात

पहले मवेशियों के लिए बनी घंटियाँ आज संगीत वाद्य और सजावटी सामग्रियों में बदल गई हैं।
“यह मेला हमें अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से मिलने का अवसर देता है,” वे साझा करते हैं।

राजस्थान के जूत्ती शिल्पकार

मशीन-निर्मित फुटवियर के दौर में यह मंच उनके श्रमसाध्य शिल्प को जीवित रखता है।

पीढ़ियों से चली आ रही कला की मिसालें

डॉ. जी. दसरथ चारी – पारंपरिक लकड़ी नक्काशी, आंध्र प्रदेश

सदियों पुरानी मंदिर-कला शैली को जीवित रखते हुए वे कहते हैं—
“तकनीक वही है, चाहे पारंपरिक पैनल बनाएं या आधुनिक उपयोगी वस्तुएँ। IITF हमें ऐसा मंच देता है जहां लोग कला की गहराई को समझते हैं।”

देबाकी परीडा – ढोकरा कला, ओडिशा

ढोकरा उनके जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान है।
“हर डिजाइन हमारी कहानी कहता है,” वे मुस्कुराकर कहती हैं।

धीरज – बांस और बेंत शिल्प, असम

“हमारे गाँव के अनेक परिवार इस शिल्प पर निर्भर हैं। मेला हमें पहचान और सम्मान दिलाता है,” वे बताते हैं।

मधुरी सिंह – पारंपरिक मिट्टी और जूट की गुड़िया, बिहार

महामारी के दौरान शुरू की गई उनकी कला आज कई महिलाओं को आजीविका दे रही है।
“मैं गुड़िया में भारत की परंपराएँ और त्योहारों की झलक डालती हूँ,” वे कहती हैं।

IITF: भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति का संगम

IITF में ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना बड़े घोषणाओं में नहीं, बल्कि कारीगरों के हाथों में बसती है—

  • जहाँ मधुबनी की रेखाएँ ढोकरा की चमक से मिलती हैं,

  • जहाँ कच्छ की घंटियों की धुन असम की बांस-कला की सौम्यता से जुड़ती है,

  • और जहाँ पीढ़ियों की स्मृतियाँ और तकनीकें एक साझा राष्ट्रीय कहानी बन जाती हैं।

यह मेला हमें याद दिलाता है कि भारत की शक्ति उसकी विविधता के सहज मेल में है। यहाँ हर कारीगर अपने गाँव की मिट्टी और परंपरा लेकर आता है और उन्हें एक ऐसे मंच पर रखता है जहाँ वे सिर्फ कला नहीं, बल्कि भारत की आत्मा बन जाते हैं।

राष्ट्र के कारीगर: भारत का हृदय, भारत की पहचान

IITF यह प्रमाणित करता है कि जब विविध परंपराएँ एक साथ खड़ी होती हैं, तो भारत सिर्फ विशाल नहीं —
सुंदर, सामूहिक और अद्भुत रूप से एकजुट दिखाई देता है।

एक भारत श्रेष्ठ भारत: IITF में संस्कृति, कारोबार और कारीगरों का अनोखा मिलन

No comments Document Thumbnail

परिचय

दशकों से ट्रेड फेयर यह दिखाते आए हैं कि जब लोग, उत्पाद और विचार एक साथ आते हैं, तो बाजार कैसे विकसित होते हैं। इस वर्ष का इंडिया इंटरनेशनल ट्रेड फेयर इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए “एक भारत श्रेष्ठ भारत” थीम के साथ आयोजित हो रहा है। अपने 44वें संस्करण में यह मेला 3,500 से अधिक प्रतिभागियों, 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तथा 11 देशों के प्रदर्शकों को एक साथ लाकर भारत मंडपम को संस्कृतियों और वाणिज्य का संगम बना देता है।

बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे पार्टनर स्टेट्स, तथा झारखंड बतौर फोकस स्टेट, सिर्फ वस्तुएं ही नहीं, बल्कि अपने राज्यों की आर्थिक आकांक्षाओं को भी प्रस्तुत कर रहे हैं।

सरकारी विभागों, पीएसयू, एमएसएमई, स्टार्टअप्स, अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शकों और शिल्पकार समूहों को एक ही छत के नीचे लाकर यह मेला छोटे उत्पादकों, पारंपरिक कारीगरों और नई पीढ़ी के उद्यमियों के लिए भारत का सबसे प्रभावी मंच बन चुका है।

“मैंने इतना बड़ा ट्रेड फेयर कभी नहीं देखा”

एक गलियारे में मिस्र (Egypt) के इस्लाम कमाल अपने मार्बल शिल्प पर रुकने वाले आगंतुकों को देखते हैं। उनका परिवार पिछले 25 वर्षों से यहां आता रहा है—इतना लंबा समय कि उनका व्यापार इस मेले के बदलावों का प्रतिरूप बन गया है।

वे कहते हैं,

“इस क्षेत्र में लगातार वृद्धि हुई है। हमें हमेशा अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है, और अब मांग पहले से कहीं ज्यादा है।”

इस्लाम के अनुसार, भारत मंडपम “दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड फेयर” है, जहां उन्हें हर साल अधिक समर्थन और अधिक ग्राहक मिलते हैं। उनका अनुभव उन कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों से मेल खाता है जो इसलिए लौटते हैं क्योंकि भारत अब खुद एक भरोसेमंद बाजार बन गया है।

एक बाजार जो दूसरा घर बन गया

तुर्की के उलास की कहानी इससे भी गहरी है।
“हम लगभग 24–25 साल से भारत आ रहे हैं,” वे बताते हैं।
“पहले हम दूसरे देशों में भी मेलों में जाते थे, लेकिन अब हम सिर्फ भारत में ही प्रदर्शनी लगाते हैं।”

वे हर साल लगभग छह महीने भारत में बिताते हैं, ऐसे रिश्ते बनाते हुए जो मेले की अवधि से कहीं आगे तक चलते हैं।

“हमारे ग्राहक हर साल वापस आते हैं,” वे मुस्कुराते हुए कहते हैं।
“यही हमें प्रेरित करता है।”

जब परंपरा बन जाती है रोज़गार

एक अन्य मंडप में कोल्हापुरी चप्पलों का स्टॉल लोगों से भरा है।

सचिन सातपुते के लिए, यह मेला सिर्फ बाज़ार नहीं है; यह एक ऐसा मंच है, जहां परंपरा को सम्मान और खरीदार दोनों मिलते हैं।

वे कहते हैं,
“ऐसे आयोजन हमारे मार्केटिंग और ब्रांडिंग में बहुत मदद करते हैं।”

उनके लिए यह 15 दिनों का आयोजन छह महीनों की कमाई लेकर आता है।

जब स्टॉक मेले के खत्म होने से पहले ही बिक जाए

कुछ कहानियां पैमाने की होती हैं—तेजी से बिकते स्टॉक और खाली शेल्फ की।

महाराष्ट्र की शोभा कहती हैं,
“यह हमारा दूसरा मौका है ट्रेड फेयर में। पिछले साल हमने 2–3 क्विंटल माल बेचा था, और हमारा स्टॉक मेले के खत्म होने से 2–3 दिन पहले ही खत्म हो गया था।”

उनका अनुभव छोटे उत्पादकों के लिए भरोसा देता है, जो पहचान और पहुंच की तलाश में रहते हैं।

एक्सपोर्ट करने वाले भी ढूंढते हैं घरेलू बाजार

मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) के मोहम्मद फाज़िल सामान्यतः अपने मेटल हैंडीक्राफ्ट्स यूरोप और अमेरिका में निर्यात करते हैं।

लेकिन इस बार वे भारत मंडपम में एक नए उद्देश्य से आए हैं:
“हम घरेलू बाजार में ज्यादा एक्सपोजर चाहते हैं।”

उनके लिए यह मेला ब्रांडिंग, पैठ और नए खरीदारों का परीक्षण स्थल है।

जब मेला कारीगरों के सपनों को सहारा देता है

उत्त्तर प्रदेश के नेशनल अवॉर्डी इकराम हुसैन कहते हैं,
“यह मेरा दूसरा मौका है मेले में, और यह मेरे लिए बेहद लाभदायक रहा है।”

उनके लिए यह आयोजन 15 दिनों में तीन महीने के बराबर बिक्री लेकर आता है।

वे कहते हैं,
“यहां मिली संभावनाओं ने मुझे अपना व्यवसाय बढ़ाने में बहुत मदद की है।”

उनकी कहानी बताती है कि ऐसे प्लेटफ़ॉर्म कारीगरों के सपनों को नई उड़ान देते हैं।

रिश्ते जो मेले के बाद भी चलते रहते हैं

थाईलैंड की किम पिछले 12 वर्षों से यहां आ रही हैं।
“मैं जिन ग्राहकों से यहां मिलती हूं, वे आमतौर पर अगले साल फिर लौटते हैं,” वे कहती हैं।

उन्हें मेले के बाद भी कई थोक के ऑर्डर मिलते हैं—जिससे साबित होता है कि यहां बने रिश्ते लंबे समय तक टिकते हैं।

जब व्यापार एक समुदाय बन जाता है

मेले में थोड़ा अधिक समय बिताएं और एक पैटर्न स्पष्ट दिखने लगता है—चाहे वह मिस्र का मार्बल हो, थाईलैंड के आभूषण, महाराष्ट्र का चमड़ा या उत्तर प्रदेश की धातु कारीगरी—हर प्रदर्शक विकास, पहचान, जुड़ाव और बढ़ती आय की बात करता है, जो 14-दिन के इस आयोजन से कहीं आगे तक असर छोड़ती है।

ऐसे ट्रेड फेयर केवल बिक्री नहीं बढ़ाते—
वे इकोसिस्टम बनाते हैं, जहां:

  • कारीगरों को पहचान मिलती है

  • निर्यातक घरेलू बाजार खोजते हैं

  • छोटे उत्पादक अपने ग्राहकों को बार-बार लौटते हुए देखते हैं

भारत मंडपम जैसे मंच यह दिखाते हैं कि जब परंपरा, उद्यमिता और वैश्विक जुड़ाव एक साथ आते हैं, तो व्यापार एक उत्सव बन जाता है।


“Weaving India Together” राष्ट्रीय सम्मेलन में बोले शिवराज सिंह चौहान – पूर्वोत्तर के कारीगर भारत की सांस्कृतिक धरोहर के संवाहक

No comments Document Thumbnail

नई दिल्ली- राजधानी दिल्ली के सी. सुब्रमण्यम ऑडिटोरियम, NASC कॉम्प्लेक्स में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन “Weaving India Together” में देशभर से आए बुनकरों और कारीगरों ने अपनी कला, अनुभव और चुनौतियों को साझा किया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्वोत्तर भारत से आए बुनकरों और कारीगरों से संवाद किया और उनकी समृद्ध कला, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और बुनकरों व कारीगरों की मेहनत से देश की पहचान और भी सशक्त होती है।

“वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” पर जोर

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश “वोकल फॉर लोकल” के मंत्र के साथ आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक हस्तशिल्प को आधुनिक बाजारों से जोड़ने की दिशा में सरकार कई कदम उठा रही है, जिससे ग्रामीण कारीगरों को आर्थिक सशक्तिकरण और रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।

नीति निर्माताओं और कारीगरों का संवाद

इस अवसर पर उपस्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक एवं DARE सचिव डॉ. मांगी लाल जाट, तथा ICAR के कृषि प्रसार के उप महानिदेशक डॉ. राजबीर सिंह ने भी कारीगरों से बातचीत की और उनके अनुभव सुने।
कार्यक्रम ने कारीगरों को अपने अनुभव, चुनौतियाँ और आकांक्षाएँ साझा करने का मंच दिया, वहीं अधिकारियों और विशेषज्ञों ने पारंपरिक कला और आधुनिक तकनीक को एकजुट करने के उपायों पर चर्चा की।

इम्फाल विश्वविद्यालय के प्रयासों की सराहना

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल के प्रयासों की भी सराहना की गई, जिसने बुनाई परंपराओं को बढ़ावा देने, कारीगरों को प्रशिक्षण देने और सामुदायिक हस्तशिल्प के माध्यम से आर्थिक अवसर सृजित करने में अहम भूमिका निभाई है।

 कारीगरों के माध्यम से “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” का संदेश

सम्मेलन ने “वीविंग इंडिया टुगेदर” के माध्यम से यह संदेश दिया कि भारत की विविधता उसकी ताकत है — और देश के कारीगर इस विविधता को एक सूत्र में पिरोने का कार्य कर रहे हैं।



Don't Miss
© Media24Media | All Rights Reserved | Infowt Information Web Technologies.