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सुखीपाली सिंचाई जलाशय को दस वर्षीय पट्टे पर देने के लिए आवेदन 10 सितंबर तक आमंत्रित

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 महासमुंद : जनपद पंचायत पिथौरा के अधीनस्थ शासकीय सिंचाई जलाशय सुखीपाली को मछली पालन कार्य के लिए 10 वर्षीय पट्टे पर दिए जाने हेतु 10 सितंबर तक आवेदन पत्र आमंत्रित किए गए हैं। मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत पिथौरा ने बताया कि पट्टा आंबटन प्राथमिकता के आधार पर की जाएगी, जिसमें पंजीकृत मत्स्य सहकारी समिति एवं मछुआ समूहों, अनुसूचित जनजाति अधिसूचित क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति वर्ग की पंजीकृत मत्स्य सहकारी समितियों एवं मछुआ समूहों को प्राथमिकता दी जाएगी। 


इसी तरह सामान्य क्षेत्र में धीवर, ढीमर, निषाद, केंवट, कहार, कहरा, मल्लाह आदि के स्व सहायता समूहों को, अनुसूचित जनजाति अधिसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के स्व सहायता समूहों एवं छत्तीसगढ़ राज्य सहायता समूहों को तथा ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित महिला स्व सहायता समूहों को भी प्राथमिकता दी जाएगी। इसी प्रकार ऐसे मछुआ व्यक्ति जिन्हें डिप्लोमा, स्नातक, स्नातकोत्तर मछली पालन का प्रशिक्षण प्राप्त हो। बेरोजगार युवा जो मछली पालन में रुचि रखते हैं, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। ऐसे क्षेत्र जहां वर्ष 1965 या उसके पश्चात् मकान, भूमि आदि डूब में आने के कारण कोई परिवार विस्थापित हो गए हों, उन व्यक्तियों, परिवारों या उनके समूह, समिति को संबंधित जलक्षेत्र में पट्टे पर प्राथमिकता दी जाएगी।

आवेदक द्वारा आवेदन सहित आवश्यक दस्तावेज विज्ञापन प्रकाशन तिथि के 15 दिन के भीतर जनपद पंचायत पिथौरा के कार्यालय में जमा किए जा सकते हैं। इस योजना का उद्देश्य मछली पालन को बढ़ावा देना और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करना है। आवेदन करने के लिए विस्तृत जानकारी के लिए जनपद पंचायत पिथौरा एवं ग्राम पंचायत सुखीपाली के सूचना पटल पर अवलोकन किया जा सकता है।


महासमुंद : मछली पालन के लिए 10 वर्षीय पट्टे पर जलाशय देने के लिए आवेदन 30 अगस्त तक आमंत्रित

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 महासमुंद : जनपद पंचायत पिथौरा के अधीनस्थ शासकीय जलाशय सिरको जलाशय एवं हनुमानडीह सिंचाई जलाशय को मछली पालन कार्य के लिए 10 वर्षीय पट्टे पर दिए जाने हेतु 30 अगस्त 2024 तक आवेदन पत्र आमंत्रित किए गए हैं।


मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत पिथौरा ने बताया कि पट्टा आंबटन प्राथमिकता के आधार पर की जाएगी, जिसमें पंजीकृत मत्स्य सहकारी समिति एवं मछुआ समूहों, अनुसूचित जनजाति अधिसूचित क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति वर्ग की पंजीकृत मत्स्य सहकारी समितियों एवं मछुआ समूहों को प्राथमिकता दी जाएगी।इसी तरह सामान्य क्षेत्र में धीवर, ढीमर, निषाद, केंवट, कहार, कहरा, मल्लाह आदि के स्व सहायता समूहों को, अनुसूचित जनजाति अधिसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के स्व सहायता समूहों एवं छत्तीसगढ़ राज्य सहायता समूहों को तथा ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित महिला स्व सहायता समूहों को भी प्राथमिकता दी जाएगी।

इसी प्रकार ऐसे मछुआ व्यक्ति जिन्हें डिप्लोमा, स्नातक, स्नातकोत्तर मछली पालन का प्रशिक्षण प्राप्त हो। बेरोजगार युवा जो मछली पालन में रुचि रखते हैं, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। ऐसे क्षेत्र जहां वर्ष 1965 या उसके पश्चात् मकान, भूमि आदि डूब में आने के कारण कोई परिवार विस्थापित हो गए हों, उन व्यक्तियों, परिवारों या उनके समूह, समिति को संबंधित जलक्षेत्र में पट्टे पर प्राथमिकता दी जाएगी।

आवेदन करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों में आयु प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, शैक्षिक योग्यता प्रमाण पत्र, मत्स्य पालन प्रशिक्षण प्रमाण पत्र आदि शामिल हैं। आवेदक द्वारा आवेदन सहित आवश्यक दस्तावेज विज्ञापन प्रकाशन तिथि के 15 दिन के भीतर जनपद पंचायत पिथौरा के कार्यालय में जमा किए जा सकते हैं। इस योजना का उद्देश्य मछली पालन को बढ़ावा देना और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करना है।

आवेदन करने के लिए विस्तृत जानकारी जनपद पंचायत पिथौरा एवं ग्राम पंचायत सिरको तथा घोघरा के सूचना पटल पर अवलोकन किया जा सकता है।

हरे बस्तर में हो रही नीली क्रांति, मछली पालन में 500 करोड़ रुपये का टर्न ओवर , कांकेर जिलें के पखांजूर क्षेत्र ने बनाई अलग पहचान

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तीन हजार से अधिक किसान कर रहे हैं मछली पालन,मछली बीज से ही किसानों को होती है 125 करोड़ रूपए की आय , छत्तीसगढ़ में मछली की क्लस्टर खेती की पहचान अब पूरे देश में

रायपुर । बस्तर के हरे-भरे क्षेत्र में नीली क्रांति से अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिला है। प्रदेश के कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा विकासखण्ड के तस्वीर बदलने लगी है। इस विकासखण्ड का पखांजूर क्षेत्र मत्स्य उत्पादन के नाम से देश में अपनी एक नई जगह बना रहा हैं। अब यह क्षेत्र देश में मछली पालन के नक्शे पर जाना पहचाना नाम है। यहां क्लस्टर एप्रोच पर मछली पालन किया जा रहा है। यह संभव हुआ है कि कोयलीबेड़ा विकासखण्ड के पंखाजूर क्षेत्र के किसानों की मेहनत और शासन की योजनाओं के मदद के फलस्वरूप। मुख्यमंत्री  भूपेश बघेल के नेतृत्व में बीते 4 वर्षों में छत्तीसगढ़ हर क्षेत्र में उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा है और पूरे देश में छत्तीसगढ़ की एक नई पहचान स्थापित हो रही है। 

पखांजूर इलाके में मछली पालन से लगभग पांच हजार से अधिक मत्स्य पालक किसान जुड़े हैं। यहां मछली पालन किस वृहद तौर पर किया जा रहा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन किसानों के द्वारा मछली बीज, मछलियों के उत्पादन और परिवहन आदि में औसत वार्षिक टर्न ओवर 500 करोड़ रूपए से अधिक का है। इस क्षेत्र में लगभग 19,700 तालाबों, इनमें लगभग 99 प्रतिशत तालाबों में मछली पालन किया जा रहा है।

 

इस क्षेत्र के किसानों ने अपनी मेहनत और हुनर तथा शासन की योजनाओं के फलस्वरूप इस क्षेत्र में क्रांति ला दी। इन परिवारों ने स्थानीय कृषकों की मदद से मछली पालन के काम को आगे बढ़ाया। अब यह कार्य पखांजूर विकासखण्ड के आसपास के गांवों में फैल चुका है। यहां मछली उत्पादन के साथ-साथ मत्स्य बीज का भी उत्पादन हो रहा है। यहां से महाराष्ट्र, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में मछली बीज की सप्लाई की जाती है। अकेले मछली बीज से ही किसानों को करीब 125 करोड़ रूपए की आय होती है। 

पखांजूर के बड़ेकापसी गांव की कहानी और भी उत्साहवर्धक है, आसपास के 5 गांवों में किसान मछली की सामूहिक खेती कर रहे हैं। इन गांवों में मछली पालन के लिए 1700 तालाब बनाए गए हैं। जिनमें 30 हजार मीट्रिक टन मछली का उत्पादन होता है। गांव के लोग बताते हैं कि अब वे परंपरागत खेती-किसानी का काम छोड़कर लोग अब मछली पालन व्यवसाय की ओर बढ़ रहे हैं, क्योकि कम लागत में अधिक मुनाफे का धंधा है। गांवों के उनके कई खेत अब मछली की खेती के लिए तालाब में बदल गए हैं।

पखांजूर क्षेत्र में क्लस्टर एप्रोच में मछली पालन की यह तकनीक किसानों में लगातार लोकप्रिय होते जा रही है। इन गांवों में लगभग 12 हजार 500 हेक्टेयर का जल क्षेत्र मछली पालन के लिए उपलब्ध है। इसके अलावा यहां 27 हेचरी, 45 प्राक्षेत्र, 1623 पोखर, 1132 हेचरी संवर्धन पोखर उपलब्ध हैं। यहां 72 करोड़ मछली बीज का उत्पादन हो रहा है। इनमें से 64 करोड़ मछली बीज देश के विभिन्न राज्यों को भेजा जाता है।

पखांजूर क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से मछली पालन करने से यहां लगभग 51000 मीट्रिक टन मत्स्य उत्पादन हो रहा है। यहां प्रति हेक्टेयर जल क्षेत्र मत्स्य उत्पादन 8000 में 12000 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन लिया जा रहा है। इसके अलावा यहां 8 करोड़ पगेसियस मत्स्य बीज का उत्पादन भी हो रहा है। पगेसियस मत्स्य बीज केज कल्चर के जरिए मत्स्य पालन के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में भेजा जाता है।

शासन की विभिन्न योजनाओं से मछली पालन ने पकड़ी रफ्तार


उल्लेखनीय है कि राज्य शासन एवं केंद्र शासन द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं जैसे राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और नीली क्रांति, मत्स्य पालन प्रसार योजना से किसानों को बड़ी मदद मिली और मार्गदर्शन भी मिला, जिससे पखांजूर क्षेत्र में मत्स्य पालन के व्यवसाय को रफ्तार मिली। इस कार्य अभी 5 हजार से अधिक मत्स्य कृषक सीधे जुड़े है। किसान बताते है कि नीली क्रांति योजना से मछुवारों को बहुत लाभ हुआ। तकनीकी सहायता के साथ उन्नत तकनीक से मछली पालन के लिए ऋण अनुदान मिलने से मछली पालन का व्यवसाय अब यहां वृहद् आकार ले चुका है।
 

मछली पालन को कृषि का दर्जा 


छत्तीसगढ़ शासन के मछली पालन विभाग द्वारा मत्स्य पालक किसानों को केजकल्चर बायोफ्लोक जैसा अत्याधुनिक तकनीक के जरिए मछली पालन के लिए ऋण अनुदान उपलब्ध कराने के साथ ही तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जा रहा है। मत्स्य पालन को राज्य में खेती का दर्जा भी दिया गया है। इससे किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण, कृषि के समान ही रियायती दर पर विद्युत एवं अन्य सुविधाएं मिल रही हैं। कृषि का दर्जा मिलने से किसानों में उत्साह है। 

मछली उत्पादन में छठवें पर और मछली बीज उत्पादन में पांचवें स्थान पर है छत्तीसगढ़


गौरतलब है कि मछली उत्पादन में छत्तीसगढ़ देश के अग्रणी राज्यों में शुमार है। मछली बीज उत्पादन में पांचवें और मछली उत्पादन में छत्तीसगढ़ का स्थान देश में छठवां है। पिछले चार वर्षों में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के माध्यम से 09 चाइनीज हेचरी तथा 364.92 हेक्टेयर में संवर्धन क्षेत्र निर्मित किया गया है। मत्स्य बीज उत्पादन में 20 प्रतिशत बढ़कर 302 करोड़ स्टेर्ण्डड फ्राई इसी प्रकार मत्स्य उत्पादन 29 प्रतिशत बढ़कर 5.91 लाख टन हो गया है। मछली पालन के लिए 4200 केज जलाशयों में स्थापित किए गए है और मत्स्य कृषकों की भूमि पर 2410 हेक्टेयर में तालाब विकसित किए गए। इसके अलावा 6 फीड मील स्थापित किए गए हैं।

अनुसूचित जनजाति 32 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 13 और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण

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रायपुर। छत्तीसगढ़ में आरक्षण को लेकर राज्य सरकार आगामी एक और दो दिसंबर को होने वाले विधानसभा के विशेष सत्र में संशोधन विधेयक पेश करेगी। इस संशोधन विधेयक के प्रारूप को आज मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अध्यक्षता में रायपुर में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी दी गई। इस संशोधन विधेयक में अनुसूचित जनजाति के लिए बत्तीस प्रतिशत, अनुसूचित जाति के लिए तेरह और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव किया गया है। 



साथ ही शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश से संबंधित आरक्षण संशोधन विधेयक के प्रस्ताव का भी अनुमोदन किया गया। वहीं, राज्य मंत्रिमंडल के अन्य फैसले के तहत जिला खनिज न्यास में उपलब्ध राशि के बीस प्रतिशत हिस्से को सामान्य क्षेत्र में और चालीस प्रतिशत भाग को अधिसूचित क्षेत्र में खर्च करने के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। वहीं, चालू वित्त वर्ष के द्वितीय अनुपूरक अनुमान से संबंधित छत्तीसगढ़ विनियोग विधेयक को भी बैठक में मंजूरी दी गई। इसे विधानसभा के अगले सत्र में पेश किया जाएगा।

राज्य मंत्रिपरिषद ने आज नवीन मछली पालन नीति को भी मंजूरी दी। इसके अनुसार अब मछली पालन के लिए तालाब या जलाशय की नीलामी नहीं होगी, बल्कि इन्हें मछुवारा समूहों को दस वर्ष के लिए पट्टे पर दिया जाएगा। इसी तरह, कैबिनेट के एक अन्य फैसले के मुताबिक राज्य वनोपज संघ और निजी निवेशकों के बीच हुए समझौते के आधार पर स्थापित वनोपज संबंधी उद्योगों के उत्पाद को चालीस प्रतिशत की छूट के साथ खरीदा जाएगा। छत्तीसगढ़ हर्बल ब्रांड के अंतर्गत खरीदे जाने वाले इन उत्पादों को वन विभाग की इकाई ‘‘संजीवनी’’ और अन्य माध्यमों से बेचा जाएगा।

छत्तीसगढ़ की नवीन मछली पालन नीति केबिनेट में मंजूर

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रायपुर। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में आज छत्तीसगढ़ राज्य की नवीन मछली पालन नीति में मछुआरा के हितों को ध्यान में रखते हुए संशोधन को मंजूरी दी गई। मछुआ समुदाय के लोगों की मांग और उनके हितों को संरक्षित करने के उद्देश्य से नवीन मछली पालन नीति में तालाब और जलाशयों को मछली पालन के लिए नीलामी करने के बजाय लीज पर देने के साथ ही वंशानुगत-परंपरागत मछुआ समुदाय के लोगों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया गया है। तालाबों एवं सिंचाई जलाशयों के जलक्षेत्र आबंटन सीमा में 50 फीसद की कमी कर ज्यादा से ज्यादा मछुआरों को रोजी-रोजगार से जोड़ने का प्रावधान किया गया है। प्रति सदस्य के मान से आबंटित जलक्षेत्र सीमा शर्त घटाने से लाभान्वित मत्स्य पालकों की संख्या दोगुनी हो जाएगी।



संशोधित नवीन मछली पालन नीति के अनुसार मछली पालन के लिए तालाबों एवं सिंचाई जलाशयों की अब नीलामी नहीं की जाएगी, बल्कि 10 साल के पट्टे पर दिए जाएंगे। तालाब और जलाशय के आबंटन में सामान्य क्षेत्र में ढ़ीमर, निषाद, केंवट, कहार, कहरा, मल्लाह के मछुआ समूह एवं मत्स्य सहकारी समिति को तथा अनुसूचित जनजाति अधिसूचित क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति वर्ग के मछुआ समूह एवं मत्स्य सहकारी समिति को प्राथमिकता दी जाएगी। मछुआ से तात्पर्य उस व्यक्ति से है, जो अपनी अजीविका का अर्जन मछली पालन, मछली पकड़ने या मछली बीज उत्पादन का कार्य करता हो, के तहत वंशानुगत-परंपरागत धीवर (ढ़ीमर), निषाद (केंवट), कहार, कहरा, मल्लाह को प्राथमिकता दिया जाना प्रस्तावित है।

इसी तरह मछुआ समूह एवं मत्स्य सहकारी समिति अथवा मछुआ व्यक्ति को ग्रामीण तालाब के मामले में अधिकतम एक हेक्टेयर के स्थान पर आधा हेक्टेयर जलक्षेत्र तथा सिंचाई जलाशय के मामले में चार हेक्टेयर के स्थान पर दो हेक्टेयर जलक्षेत्र प्रति सदस्य/प्रति व्यक्ति के मान से आबंटित किया जाएगा। मछली पालन के लिए गठित समितियों का ऑडिट अभी तक सिर्फ सहकारिता विभाग द्वारा किया जाता था। अब संशोधित नवीन मछली पालन नीति में सहकारिता एवं मछली पालन विभाग की संयुक्त टीम ऑडिट की जिम्मेदारी दी गई है।

त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था अंतर्गत शून्य से 10 हेक्टेयर औसत जलक्षेत्र के तालाब एवं सिंचाई जलाशय को 10 वर्ष के लिए पट्टे पर आबंटित करने का अधिकार ग्राम पंचायत का होगा। जनपद पंचायत 10 हेक्टेयर से अधिक एवं 100 हेक्टेयर तक, जिला पंचायत 100 हेक्टेयर से अधिक एवं 200 हेक्टेयर औसत जलक्षेत्र तक, मछली पालन विभाग द्वारा 200 हेक्टेयर से अधिक एवं 1000 हेक्टेयर औसत जलक्षेत्र के जलाशय, बैराज को मछुआ समूह एवं मत्स्य सहकारी समिति को पट्टे पर देगा। नगरीय निकाय अंतर्गत आने वाले समस्त जलक्षेत्र नगरीय निकाय के अधीन होंगे, जिसे शासन की नीति के अनुसार 10 वर्ष के लिए लीज पर आबंटित किया जाएगा। 

मछली पालन में लागत कम और मुनाफा ज्यादा, स्व-सहायता समूह की बदल रही जिंदगी

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छत्तीसगढ़ राज्य में किसानों की आय बढ़ाने के लिए राज्य सरकार द्वारा पशुपालन के साथ-साथ मछली पालन को बढ़ाने देने कई योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है। दन्तेवाड़ा जिले में मछली पालन से किसानों के लिए आर्थिक लाभ का सबब साबित हो रहा है। मछली पालन के प्रति किसानों का मोह भी तेजी से बढ़ा हैं। जिले के मछली पालन कराना काफी लाभदायक सिद्ध हो रहा है। मछली पालन के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार उत्पन्न कराना स्थानीय लोगों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने में दन्तेवाड़ा जिला अपनी पहचान बना रहा है। 

इसी प्रकार जल से आजीविका के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने हेतु जिले के चयनित ग्राम पंचायत कोरलापाल के ग्राम नागफनी में निर्मित 1.0 हेक्टेयर का पंचायती तालाब में नाग देवता स्व-सहायता समूह के द्वारा मछली पालन का कार्य किया जा रहा है। 

लगभग 1 लाख रूपये की आमदनी

समूह के सदस्य पूर्व मे मजदूरी कर आय प्राप्त करते थे, जिसमें कलेक्टर महोदय के मार्गदर्शन में विभाग द्वारा जिला खनिज न्यास निधि से मछली बीज और परिपूरक आहार प्रदाय कर तकनीकी मार्गदर्शन से समूह के द्वारा 500 किलोग्राम मत्स्य उत्पादन कर विक्रय से लगभग 1 लाख रूपये की आमदनी अब तक हुई है।

मछली पालन से अश्वनी को हुआ 3 लाख का मुनाफा

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मछली पालन विभाग द्वारा विभिन्न हितग्राही मूलक योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है। मौसमी तालाबों मे मत्स्य बीज संवर्धन योजना के अंतर्गत लोगों की आय में बढ़ोतरी की जा रही है। ऐसे ही बेमेतरा के ग्राम गांगपुर के मत्स्य कृषक अश्वनी कुर्रे ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत मछली पालन कर 3 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा प्राप्त किया। अश्वनी ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में मजदूरों की कमी से खेती बाड़ी में बहुत दिक्कत होने लगा था। अच्छा फसल भी नहीं हो रहा था। 


उन्होंने कहा कि मछली पालन से आमदनी दोगुनी कैसे होगी के संबंध में खुद के जमीन में बैंक ऋण अथवा स्वयं के व्यय से तालाब निर्माण कर मछली पालन की विधियों और योजनाओं से विभागीय अधिकारियों द्वारा अवगत कराया। साथ ही तालाब के मेंढ़ में फलोद्यान कर अतिरिक्त लाभ लेने का तरकीब सुझाया गया। अधिकारियों द्वारा संबंधित की जमीन का अवलोकन किया गया पास में नहर और छोटी नाला से पानी पर्याप्त मात्रा में उपयोग के लिए लिया जा सकता है, जो मछली पालन के लिए उपयुक्त पाए जाने पर चयनित किया गया। संबंधित को मछली पालन के लिए भारतीय स्टेट बैंक, छिरहा से कुल 3.50 लाख का ऋण दिलाया गया। जिसमें 40 प्रतिशत और 1.40 लाख अनुदान के रूप में प्रदान किया गया। 

3 लाख का शुद्ध मुनाफा

साल 2015-16 में तालाब निर्माण पूर्ण होने के बाद अधिकारियों के मार्गदर्शन में पानी भरकर उन्नत किस्म की बढ़ने वाली मछली ग्रासकार्प, रोहा, कतला, मृगल, पंकाश और रूपचंदा सहित हाईब्रिड तेलपिया भी डाला गया। विभाग द्वारा मिलने वाला प्रोटीन फिड (तैरने वाली आहार) दिया गया था। साथ में यह बताया गया कि ग्रासकार्प, रूपचंदा आदि मछली, साग सब्जी का वेस्ट का उपयोग चारे के रूप में करती है। किसान द्वारा तालाब के मेढ़ में पपीते और साग-सब्जी लगाने का अवगत कराया गया, जिससे अतिरिक्त लाभ हो सके। इस तरह किसान को प्रथम वर्ष 30 क्विंटल मछली 10-12 महीने में प्राप्त हुआ, किसान द्वारा मछलियों को 115-120 रू. प्रति किलो से स्थानीय मछुवारों को विक्रय कर रू. 3 लाख का फायदा शुद्ध रूप से प्राप्त हुआ।

मजदूरी खर्च के रूप में अतिरिक्त आमदनी प्राप्त 

किसान को पपीता और साग-सब्जी से अन्य मजदूरी खर्च के रूप में अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हुआ। इस प्रकार किसान मछली पालन कर अपनी आय को दोगुनी से भी ज्यादा कर लिया। किसान द्वारा आगामी साल में 0.60 हे. का स्वयं के व्यय से तालाब बनाया गया। अब वह 50-60 क्विंटल मछली उत्पादन कर रहा है। किसान द्वारा अपना बैंक का कर्ज अदा कर लिया गया। अपने रहने का मकान भी पक्का बना लिया। साथ ही शेष बचे जमीन में तालाब बनाने प्रगतिरत है।

मछली पालन से जुड़े मत्स्य पालक कृषकों और मछुआरों को मिलेंगी कई तरह की सुविधाएं

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कैबिनेट द्वारा बीते 20 जुलाई को राज्य में मछली पालन को कृषि का दर्जा देने का फैसला सराहनीय है। सरकार के इस फैसले से मछुआरों को मत्स्य पालन के लिए किसानों के समान ब्याज रहित ऋण सुविधा मिलने के साथ ही जलकर और विद्युत शुल्क में भी छूट का लाभ मिलेगा। इससे मछली पालन को बढ़ावा मिलने के साथ ही इससे जुड़े कवर्धा जिले के हजार लोगों की स्थिति में सकारात्मक बदलाव आएगा।


कवर्धा जिले में छत्तीसगढ़ सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के प्रांरभिक तौर पर प्रक्रिया शुरू हो गई है। कलेक्टर रमेश कुमार शर्मा ने आज यहां समय सीमा की बैठक मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई योजना की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि यह योजना राज्य सरकार की प्राथमिकता वाली योजना है। इस योजना से जिले के मछली पालन से जुड़े हजारों परिवारों को इससे लाभ मिल सकता है। उन्होंने मछली पालन विभाग के अधिकारी को विकासखंडवार मछली पालन से जुड़े हितग्राहियों का चिन्हांकित करने के निर्देश दिए हैं।

सहायक संचालक ने दी जानकारी

मछली पालन विकास के सहायक संचालक हरगोविंद मेहरा ने बैठक में बताया कि राज्य शासन द्वारा मछली पालन को कृषि के समान विद्युत दर, सिंचाई दर और संस्थागत ऋण सहायता प्रदान करने का फैसला लिया गया है। मछली पालन के लिए मत्स्य पालकों, मत्स्य समूह और समितियों को निशुल्क सिंचाई जल-आपूर्ति के साथ विद्युत दर में अनुदान और अल्पकालीन ऋण पर ब्याज अनुदान देय होगा। इस संबंध में विभाग से विस्तृत दिशा-निर्देश जारी होने के बाद हितग्राहियों का चयन किया जाएगा। हालांकि इस योजना का प्रांरभिक क्रियान्वयन शुरू कर दी गई है। 

मछली पालन के क्षेत्र में लगातार बढ़ोतरी 

हितग्राहियों को चिन्हांकित किया जा रहा है, ताकि मछली पालन से जुड़े सभी किसानों को इस योजना का लाभ दिया जा सकें। वर्तमान में मछली पालन से जुडे 16 हितग्राहियों को चिन्हाकित किया गया है। जिसमें ग्राम पोड़ी, मगरदा, पांडताराई, कोसमंदा, भानपुर, मजगांव, लासाटोला, दौजरी, सिंघनपुरी जंगल, सिंघनपुरी गो, पैलपार, ग्राम हरदी, और बोटेसुर के मछली पालन किसान शामिल है। बता दें कि छत्तीसगढ़ राज्य में बीते ढाई सालों में छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों से मछली पालन के क्षेत्र में लगातार बढ़ोतरी हुई है। 

 मछुआरों को क्रेडिट कार्ड की सुविधा

राज्य में ढाई सालों में मत्स्य बीज उत्पादन के मामले में 13 प्रतिशत और मत्स्य उत्पादन में 9 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। कृषि का दर्जा मिलने से मत्स्य पालन के क्षेत्र में राज्य अब और तेजी से आगे बढ़ेगा, यह संभावना प्रबल हो गई है। छत्तीसगढ़ राज्य में मत्स्य पालन के लिए अभी मछुआरों को एक प्रतिशत ब्याज पर एक लाख तक और 3 प्रतिशत ब्याज पर अधिकतम 3 लाख रुपए तक ऋण मिलता था। इस क्षेत्र को कृषि का दर्जा मिलने से अब मत्स्य पालन से जुड़े लोग सहकारी समितियों से अब अपनी जरूरत के मुताबिक शून्य प्रतिशत ब्याज पर सहजता से ऋण प्राप्त कर सकेंगे। किसानों की तरह अब मत्स्य पालकों और मछुआरों को क्रेडिट कार्ड की सुविधा मिलेगी।

छत्तीसगढ़ में मछली पालन को मिला कृषि का दर्जा, मछुआरों को मिलेंगी कई तरह की सहूलियत

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कैबिनेट में मछली पालन को कृषि का दर्जा देने का फैसला सराहनीय है। सरकार के इस फैसले से मछुआरों को मत्स्य पालन के लिए किसानों के समान ब्याज रहित ऋण सुविधा मिलने के साथ ही जलकर और विद्युत शुल्क में भी छूट का लाभ मिलेगा। इससे राज्य में मछली पालन को बढ़ावा मिलने के साथ ही इससे जुड़े 2 लाख 20 हजार लोगों की स्थिति में सकारात्मक बदलाव आएगा। छत्तीसगढ़ राज्य में बीते ढाई सालों में छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों से मछली पालन के क्षेत्र में बढ़ोतरी हुई है। राज्य में ढाई सालों में मत्स्य बीज उत्पादन के मामले में 13 प्रतिशत और मत्स्य उत्पादन में 9 प्रतिशत की उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की है। कृषि का दर्जा मिलने से मत्स्य पालन के क्षेत्र में राज्य अब और तेजी से आगे बढ़ेगा। यह संभावना प्रबल हो गई है। 




छत्तीसगढ़ राज्य में मत्स्य पालन के लिए अभी मछुआरों को एक प्रतिशत ब्याज पर एक लाख तक और 3 प्रतिशत ब्याज पर अधिकतम 3 लाख रुपए तक ऋण मिलता था। इस क्षेत्र को कृषि का दर्जा मिलने से अब मत्स्य पालन से जुड़े लोग सहकारी समितियों से अब अपनी जरूरत के अनुसार शून्य प्रतिशत ब्याज पर सहजता से ऋण प्राप्त कर सकेंगे। किसानों की तरह अब मत्स्य पालकों और मछुआरों को क्रेडिट कार्ड की सुविधा मिलेगी। राज्य में मछली पालन के लिए 30 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई बांधों और जलाशयों से नहर के माध्यम से जलापूर्ति आवश्यकता पड़ती थी, जिसके लिए मत्स्य किसानों और मछुआरों को प्रति 10 हजार घन फीट पानी के बदले 4 रूपए का शुल्क अदा करना पड़ता था, जो अब उन्हें फ्री में मिलेगा।



मत्स्य पालक किसानों और मछुआरों को प्रति यूनिट 4.40 रुपए की दर से विद्युत शुल्क भी अदा नहीं करना होगा। सरकार के इस फैसले से मत्स्य उत्पादन की लागत में प्रति किलो लगभग 10 रुपए की कमी आएगी, जिसका सीधा लाभ मत्स्य पालन व्यवसाय से जुड़े लोगों को मिलेगा। इससे उनकी आमदनी में इजाफा होगा और उनकी माली हालत बेहतर होगी। राज्य में मत्स्य कृषकों मछुआरों को सरकार द्वारा दी जा रही सहूलियतों का ही यह परिणाम  है कि छत्तीसगढ़ राज्य मत्स्य बीज उत्पादन और मत्स्य उत्पादन में देश में छठवें स्थान पर है। मछली पालन को कृषि का दर्जा मिलने से राज्य 6 वें पायदान से ऊपर की ओर अग्रसर होगा और मत्स्य पालन के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बनेगा। इसकी उम्मीद बढ़ गई है। राज्य में वर्तमान में 93 हजार 698 जलाशय और तालाब विद्यमान हैं, जिनका जल क्षेत्र एक लाख 92 हजार हेक्टेयर है। इसमें से 81 हजार 616 जलाशयों और तालाबों का एक लाख 81 हजार 200 हेक्टेयर जल क्षेत्र मछली पालन के अंतर्गत है, जो कुल उपलब्ध जल क्षेत्र का 94 प्रतिशत है।


पंगेशिएस और तिलापिया प्रजाति का पालन


मत्स्य बीज उत्पादन के मामले में छत्तीसगढ़ राज्य न सिर्फ आत्मनिर्भर है, बल्कि यहां से मत्स्य बीज की आपूर्ति पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश ओडिशा और बिहार को होती है। छत्तीसगढ़ राज्य में वर्तमान में 288 करोड़ मत्स्य बीज फ्राई और 5.77 लाख मैट्रिक टन मछली का उत्पादन हर साल होता है। राज्य की मत्स्य उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 3.682 मीट्रिक टन है, जो राष्ट्रीय उत्पादकता 3.250 मीट्रिक टन से लगभग 0.432 मीट्रिक टन अधिक है। 


छत्तीसगढ़ राज्य में मत्स्य उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए अब केज कल्चर को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। राज्य में अब तक 2386 केज स्थापित किए जा चुके हैं। कोरबा जिले के हसदेव बांगो जलाशय में 1000 केज की स्थापना की जा रही है। इस तकनीकी में जलाशयों में 6 बाई 4 बाई 4 मीटर में केज स्थापित कर तीव्र बढ़वार वाली मछली जैसे पंगेशिएस और तिलापिया प्रजाति का पालन किया जाता है, जिससे प्रति केज 3 मीट्रिक टन से ज्यादा मत्स्य उत्पादन होता है।


 6.60 लाख रुपए की अनुदान 


लैंडलॉक  प्रदेश होने के कारण राज्य के मत्स्य किसानों और मछुआ समूहों द्वारा स्वयं की भूमि पर बड़ी संख्या में तालाबों का निर्माण कराकर मत्स्य पालन करना, मत्स्य क्षेत्र के  विस्तार का अच्छा संकेत है। बीते ढाई सालों में सरकार की मदद से लगभग एक हजार नवीन तालाबों का निर्माण मत्स्य पालन के उद्देश्य से हुआ है। सरकार इसके लिए सामान्य वर्ग के मत्स्य कृषकों को अधिकतम 4.40 लाख रुपए और अनुसूचित जाति जनजाति और महिला वर्ग के हितग्राहियों को 6.60 लाख रुपए की अनुदान सहायता तालाब निर्माण और मत्स्य आहार के लिए देती है।



छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मत्स्य पालन क्षेत्र को संवर्धित करने के उद्देश्य से मछुआरों को मछुआ दुर्घटना बीमा का कवरेज भी प्रदान करती है। बीमित मत्स्य कृषक की मृत्यु पर 5 लाख रूपए की दावा राशि का भुगतान किया जाता है। बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होने पर 25 हजार रुपये तक के इलाज की सुविधा का प्रावधान है। 


मछली पालन के लिए पट्टे देने की सिफारिश 


मछुआ सहकारी समितियों को मत्स्य पालन के लिए जाल, मत्स्य बीज और आहार के लिए 3 सालों में 3 लाख रुपए तक की सहायता दी जाती है। बायोफ्लॉक तकनीकी से मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए मत्स्य कृषकों को 7.50 लाख रुपए की इकाई लागत पर 40 प्रतिशत की अनुदान सहायता दिए जाने का प्रावधान है।  राज्य में मत्स्य पालन को बढ़ावा देने और मत्स्य कृषकों मछुआरों को सहूलियत देने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा नवीन मछली पालन नीति तैयार की जा रही है। इसके लिए कृषि और जल संसाधन मंत्री  रविंद्र चौबे की अध्यक्षता में गठित समिति ने मछुआरों को उत्पादकता बोनस दिए जाने, ऐसे एनीकट जिनका क्षेत्रफल 20 हेक्टेयर तक है, उसे स्थानीय मछुआरों के निशुल्क मत्स्याखेट के लिए सुरक्षित रखने और मछुआ जाति के लोगों की सहकारी समिति को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर जलाशयों को मछली पालन के लिए पट्टे पर देने की सिफारिश की है।

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