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भारतीय फार्माकोपिया आयोग को WHO-SEARN का फार्माकोविजिलेंस में क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र और गुणवत्ता के तकनीकी केंद्र का दर्जा

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नई दिल्ली- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) ने 4–5 अगस्त 2026 को नेपाल के काठमांडू में आयोजित दक्षिण-पूर्व एशिया नियामक नेटवर्क (SEARN) की 10वीं वर्षगांठ बैठक में भाग लिया। इस बैठक में दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरणों (NRAs), फार्माकोपिया संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक का उद्देश्य चिकित्सा उत्पादों की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना था।

SEARN विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय (SEARO) द्वारा वर्ष 2016 में स्थापित एक सहयोगात्मक मंच है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों की नियामक प्रणालियों को ज्ञान साझा करने, नियामकीय समन्वय, क्षमता निर्माण तथा सहयोगात्मक तंत्र के माध्यम से सुदृढ़ बनाना है। यह नेटवर्क गुणवत्ता आश्वासन, फार्माकोविजिलेंस, क्लीनिकल ट्रायल निगरानी, नियामकीय तैयारी और चिकित्सा उपकरणों के विनियमन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कार्य करता है।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल में डॉ. वी. कलैसेलवन (सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक), डॉ. जय प्रकाश (वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी), डॉ. रॉबिन कुमार (वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी) तथा अरविंद कुमार शर्मा (वैज्ञानिक अधिकारी) शामिल थे।

बैठक के दौरान IPC ने भारत की मजबूत दवा नियामक प्रणाली तथा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय फार्माकोपिया, इंडियन फार्माकोपिया रेफरेंस सब्स्टेंस (IPRS), इम्प्योरिटी रेफरेंस स्टैंडर्ड्स (IMPRS), फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (PvPI), मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (MvPI), क्षमता निर्माण कार्यक्रमों तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोगात्मक पहलों की जानकारी साझा की।

बैठक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) को WHO-SEARN का फार्माकोविजिलेंस में क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र (Regional Centre of Excellence in Pharmacovigilance) तथा गुणवत्ता के तकनीकी केंद्र (Technical Centre in Quality) के रूप में मान्यता मिलना रही।

यह प्रतिष्ठित मान्यता फार्माकोविजिलेंस प्रणाली को मजबूत करने, दवा गुणवत्ता मानकों को आगे बढ़ाने तथा WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में नियामकीय क्षमता निर्माण में IPC के निरंतर योगदान की पुष्टि करती है। यह सम्मान फार्माकोपिया विज्ञान एवं मानकों के क्षेत्र में IPC की अग्रणी भूमिका तथा सदस्य देशों के बीच सहयोग, ज्ञान साझा करने और मानकों के सामंजस्य को बढ़ावा देने की उसकी प्रतिबद्धता को भी मजबूत करता है।

बैठक के दौरान प्रतिभागियों ने वैज्ञानिक ज्ञान, नियामकीय अनुभवों और दवा नियमन से जुड़ी उभरती चुनौतियों—जैसे गुणवत्ता आश्वासन, दवा सुरक्षा, नियामकीय सहयोग, डिजिटल परिवर्तन और क्षेत्रीय समन्वय—पर विस्तृत चर्चा की।

भारतीय फार्माकोपिया आयोग ने पुनः दोहराया कि वह WHO-SEARN की पहलों का समर्थन जारी रखेगा तथा दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में सुरक्षित, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए नियामकीय उत्कृष्टता और क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।

हांगकांग में अंतरराष्ट्रीय हर्बल फार्माकोपिया पर WHO विशेषज्ञों की बैठक, भारत की सक्रिय भागीदारी

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हांगकांग एसएआर (चीन) में 16 से 18 जून 2026 तक विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा आयोजित इंटरनेशनल हर्बल फार्माकोपिया के विकास पर 5वीं विशेषज्ञ बैठक आयोजित की जा रही है। इस महत्वपूर्ण बैठक में भारत की ओर से आयुष मंत्रालय के अंतर्गत फार्माकोपिया आयोग (PCIM&H) सक्रिय रूप से भाग ले रहा है।

इस बैठक में WHO के सदस्य देशों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ वैश्विक स्तर पर हर्बल औषधियों के मानकों, गुणवत्ता, सुरक्षा और शुद्धता से जुड़े नियमों पर चर्चा कर रहे हैं।

भारत का प्रतिनिधित्व पीसीआईएम एंड एच के निदेशक डॉ. रमण मोहन सिंह विशेषज्ञ सदस्य के रूप में कर रहे हैं। उनके साथ एक तकनीकी टीम भी वर्चुअल माध्यम से इस बैठक में शामिल हो रही है, जिसमें शामिल हैं—

  • डॉ. जयंती ए. (PSO - फार्माकोग्नोसी)

  • डॉ. विजय गुप्ता (PSO - आयुर्वेद)

  • डॉ. अनुपम मौर्य (SO - केमिस्ट्री)

  • डॉ. वी. विजयकुमार (SO - सिद्ध)

  • डॉ. निखिल जिरंकलगिकर (SO - आयुर्वेद)

बैठक के दौरान PCIM&H द्वारा विकसित विभिन्न हर्बल मोनोग्राफ और दस्तावेजों को WHO टीम के साथ मिलकर प्रस्तुत किया जा रहा है, ताकि उनका विस्तृत मूल्यांकन और समीक्षा की जा सके।

यह पहल पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे गुणवत्ता, सुरक्षा और शुद्धता के वैश्विक मानकों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित होगा।

भारत की यह सक्रिय भागीदारी अंतरराष्ट्रीय हर्बल फार्माकोपिया के निर्माण में देश की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है और वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को मजबूत करती है।

आयुष मंत्रालय की उच्च स्तरीय बैठक में ASU चिकित्सा प्रणाली के लिए वैश्विक कोडिंग ढांचे के विकास पर चर्चा

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भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने 25–26 मई 2026 को ऑनलाइन माध्यम से आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (ASU) चिकित्सा प्रणालियों के लिए इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ हेल्थ इंटरवेंशन्स (ICHI) तथा नेशनल हेल्थ इंटरवेंशन कोड्स (NHIC) के विकास पर एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक और परामर्श चर्चा का आयोजन किया।

World Health Organization के साथ हुए ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) और डोनर एग्रीमेंट के बाद यह पहल पारंपरिक चिकित्सा हस्तक्षेपों को WHO के ICHI फ्रेमवर्क में शामिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (ASU) चिकित्सा हस्तक्षेपों के लिए एक वैश्विक स्तर पर मानकीकृत और वैज्ञानिक रूप से मजबूत कोडिंग शब्दावली विकसित करना है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेटा का आदान-प्रदान, नैदानिक अनुसंधान को बढ़ावा और स्वास्थ्य प्रणालियों की अंतर-संचालनीयता (interoperability) सुनिश्चित की जा सके, साथ ही बीमा एकीकरण में भी सहायता मिले।

इस बैठक की अध्यक्षता आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने की। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित हस्तक्षेप वर्गीकरण पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकृत करने, दस्तावेज़ीकरण को मजबूत करने तथा डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र में अंतर-संचालनीयता बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

उद्घाटन एवं तकनीकी सत्र

उद्घाटन सत्र में Central Council for Research in Ayurvedic Sciences के उपमहानिदेशक डॉ. एन. श्रीकांत ने स्वागत संबोधन दिया। संयुक्त सचिव डॉ. कविता जैन ने अपने प्रारंभिक वक्तव्य में पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को साक्ष्य-आधारित बनाने के लिए मानकीकृत हस्तक्षेप शब्दावली के महत्व पर प्रकाश डाला।

इसके बाद World Health Organization के प्रतिनिधियों, जिनमें डॉ. पवन गोडतवार (WHO-SEARO) और डॉ. गीता कृष्णन (GTMC जामनगर) शामिल थे, ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

चार-स्तरीय (four-level) श्रेणीबद्ध कोडिंग ढांचों पर विस्तृत तकनीकी प्रस्तुतियाँ संबंधित अनुसंधान परिषदों द्वारा दी गईं:

  • आयुर्वेद (NHICA): प्रो. वैद्य रबिनारायण आचार्य, महानिदेशक, CCRAS

  • सिद्ध (NHICS): प्रो. डॉ. एन. जे. मुथुकुमार, महानिदेशक, CCRS

  • यूनानी (NHICUM): डॉ. एन. ज़हीर अहमद, महानिदेशक, CCRUM

Dr. Nenad Kostanjsek सहित World Health Organization की डेटा स्टैंडर्ड्स एवं इन्फॉर्मेटिक्स टीम के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने ASU हस्तक्षेप वर्गीकरण को वैश्विक स्वास्थ्य सूचना मानकों के अनुरूप बनाने हेतु भविष्य की रूपरेखा और तकनीकी आवश्यकताओं पर विचार-विमर्श किया।

दो दिवसीय बैठक में आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी प्रणालियों के लिए अलग-अलग ब्रेकआउट सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें ड्राफ्ट दस्तावेजों की विस्तृत तकनीकी समीक्षा, परीक्षण और विशेषज्ञ परामर्श किया गया। इस बैठक में लगभग 30 वैज्ञानिकों के साथ-साथ Institute of Teaching and Research in Ayurveda, All India Institute of Ayurveda, National Institute of Unani Medicine तथा अन्य प्रमुख आयुष राष्ट्रीय संस्थानों के संकाय सदस्यों ने भाग लिया।

यह अंतिम रूप दिया गया ढांचा जुलाई 2026 में प्रस्तावित WHO-ICHI ASU अल्फा ड्राफ्ट संपादकीय कार्यशाला का आधार बनेगा।

इबोला वायरस को लेकर भारत अलर्ट, फ्रीकी देशों की गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह

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 EBOLA VIRUS : एक बार फिर दुनिया में खतरनाक महामारी का खतरा बढ़ता नजर आ रहा है। अफ्रीका के कई देशों में इबोला वायरस संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी है। इसके बाद भारत सरकार भी सतर्क हो गई है और नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है।


केंद्र सरकार ने भारतीय नागरिकों को कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान की गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दी है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि इन देशों में इबोला संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

सरकार की ओर से जारी एडवाइजरी में कहा गया है कि जो भारतीय नागरिक इन देशों में रह रहे हैं या यात्रा कर रहे हैं, वे स्थानीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करें।

वहीं, अफ्रीका CDC ने भी कांगो और युगांडा में फैल रहे Bundibugyo स्ट्रेन इबोला वायरस को महाद्वीपीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्ट्रेन तेजी से फैल सकता है और फिलहाल इसके लिए कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत में अभी तक Bundibugyo स्ट्रेन इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और सभी स्वास्थ्य एजेंसियों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।

क्या है इबोला वायरस?

इबोला एक गंभीर वायरल बीमारी है, जिसमें तेज बुखार, अत्यधिक कमजोरी, शरीर में दर्द, उल्टी, दस्त और कई मामलों में आंतरिक रक्तस्राव जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। यह संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से फैलता है और गंभीर स्थिति में जानलेवा साबित हो सकता है।

सरकार की अपील

भारत सरकार ने लोगों से अफवाहों से बचने और केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने की अपील की है। साथ ही विदेश यात्रा से पहले स्वास्थ्य संबंधी सलाह और दिशा-निर्देशों की जानकारी लेने को कहा गया है।

भारत में 2वें WHO वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन: स्वास्थ्य, विज्ञान और कल्याण के लिए वैश्विक नेतृत्व

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भारत 2वें WHO वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन (17–19 दिसंबर, 2025) की मेजबानी कर रहा है। सम्मेलन का विषय है, “लोगों और ग्रह के लिए संतुलन की बहाली: स्वास्थ्य और कल्याण का विज्ञान और अभ्यास।” इस अवसर पर WHO पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक पुस्तकालय (TMGL) का भी शुभारंभ करेगा, जो पारंपरिक, पूरक और समग्र चिकित्सा का सबसे बड़ा डिजिटल भंडार है।

भारत में आयुष प्रणाली (आयुर्वेद, योग, सिद्ध और यूनानी) की व्यापक पहुँच है, जिसमें 3,844 अस्पताल, 36,848 डिस्पेंसरी, 886 स्नातक और 251 परास्नातक कॉलेज तथा 7.5 लाख से अधिक पंजीकृत चिकित्सक हैं। आयुष मंत्रालय पारंपरिक चिकित्सा को राष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचे में एकीकृत करने, वैज्ञानिक मानकों, गुणवत्ता नियंत्रण और अनुसंधान को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करता है।

सम्मेलन का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा के सुरक्षित, गुणवत्ता-प्रधान और समान रूप से सुलभ अभ्यास को बढ़ावा देना है। यह तीन दिवसीय कार्यक्रम मंत्रिस्तरीय संवाद, तकनीकी सत्र और नवाचार प्रदर्शनियों के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा के वैज्ञानिक, नीतिगत और व्यावहारिक पहलुओं पर केंद्रित रहेगा।

मुख्य पहल:

  • पारंपरिक चिकित्सा के लिए वैज्ञानिक और प्रमाण आधारित शोध को बढ़ावा देना।

  • आयुष सेवाओं का राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली में एकीकरण।

  • डिजिटल नवाचार और पारंपरिक ज्ञान का संरक्षित दस्तावेजीकरण।

  • पारंपरिक चिकित्सा के लिए वैश्विक मानक और नीति निर्माण।

महत्व:

भारत पारंपरिक चिकित्सा के वैश्विक मंच पर नेतृत्व कर रहा है और आयुष प्रणाली के माध्यम से मानव कल्याण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विश्व स्तर पर योगदान दे रहा है।

आयुष मंत्रालय ने WHO ग्लोबल समिट ऑन ट्रेडिशनल मेडिसिन 2025 का कर्टेन रेज़र किया; 100+ देशों की भागीदारी, भारत फिर बनेगा वैश्विक केंद्र

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आयुष मंत्रालय ने आज नई दिल्ली स्थित नेशनल मीडिया सेंटर में द्वितीय WHO ग्लोबल समिट ऑन ट्रेडिशनल मेडिसिन (17–19 दिसंबर 2025, भारत मंडपम) के लिए कर्टेन रेज़र प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की।

जनस्वास्थ्य में पारंपरिक चिकित्सा की वैश्विक भूमिका को सुदृढ़ करेगा समिट: आयुष मंत्री

आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रतापराव जाधव ने गर्व व्यक्त किया कि भारत 2023 में गुजरात में पहली सफल मेजबानी के बाद एक बार फिर इस वैश्विक समिट की मेजबानी कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह समिट पारंपरिक चिकित्सा को मुख्यधारा में लाने का एक महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत की दृष्टि "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः" को साकार करता है।

इस वर्ष समिट की थीम है—

“Restoring Balance: The Science and Practice of Health and Well-being”

इसमें 100 से अधिक देशों के मंत्री, नीति-निर्माता, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, शोधकर्ता, उद्योग प्रतिनिधि व पारंपरिक चिकित्सा विशेषज्ञ भाग लेंगे।

Ashwagandha पर विशेष कार्यक्रम

मंत्री ने बताया कि आयुष मंत्रालय अश्वगंधा पर एक विशेष साइड इवेंट आयोजित करेगा, जिसमें इसके पारंपरिक व आधुनिक उपयोगों, वैज्ञानिक प्रमाणों और वैश्विक प्रभाव पर चर्चा होगी।

भारत की बढ़ती वैश्विक नेतृत्व भूमिका

जाधव ने कहा कि आयुर्वेद, योग–नौचिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी विश्वभर में भरोसेमंद स्वास्थ्य समाधान के रूप में उभर रहे हैं।
जामनगर, गुजरात में WHO ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर की स्थापना इसका प्रमाण है।

WHO की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. पूनम खेतरपाल ने कहा—समिट बनेगा वैश्विक रोडमैप

WHO की वरिष्ठ सलाहकार और SEARO की पूर्व क्षेत्रीय निदेशक, डॉ. पूनम खेतरपाल ने कहा कि यह समिट पारंपरिक, पूरक व स्वदेशी चिकित्सा प्रणालियों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य तंत्र में वैज्ञानिक व संतुलित रूप से जोड़ने के लिए 10-वर्षीय वैश्विक रोडमैप तय करेगा।

उन्होंने कहा कि दुनिया में अरबों लोग आज भी पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर हैं, इसलिए शोध, नवाचार और नियमन को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।

Ashwagandha पर 3-दिवसीय विशेषज्ञ सत्र

17–19 दिसंबर के दौरान आयोजित
“Ashwagandha: From Traditional Wisdom to Global Impact”
सत्र में वैश्विक विशेषज्ञ इसके तनाव-निरोधी, न्यूरो-प्रोटेक्टिव, और इम्यूनो-मॉड्यूलेटरी गुणों पर चर्चा करेंगे।

PM करेंगे समिट के समापन कार्यक्रम में शिरकत

मंत्री ने बताया कि इस ऐतिहासिक समिट के समापन सत्र में भारत के प्रधानमंत्री भी उपस्थित रहेंगे।

उच्च स्तरीय अधिकारियों की उपस्थिति

प्रेस कॉन्फ्रेंस में सचिव (आयुष) वैद्य राजेश कोटेचा, PIB के प्रमुख महानिदेशक धीरेंद्र ओझा, तथा आयुष मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

भारत ने समिट की आधिकारिक काउंटडाउन की शुरुआत की

आज का कर्टेन रेज़र कार्यक्रम 9–10 नवंबर 2025 को आयोजित राजनयिक स्वागत समारोह के बाद आयोजित किया गया, जिसमें WHO–India सहयोग और समिट के वैश्विक महत्व पर चर्चा हुई थी।

कर्टेन रेज़र के साथ ही भारत ने द्वितीय WHO ग्लोबल समिट ऑन ट्रेडिशनल मेडिसिन की उल्टी गिनती शुरू कर दी है, और वैश्विक स्तर पर समग्र, समावेशी एवं सतत स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देने के अपने संकल्प को पुनः सुदृढ़ किया है।


भारत में नर्सिंग शिक्षा और कार्यबल सुदृढ़ीकरण की दिशा में बड़ा कदम: स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा अनुभव साझा कार्यशाला का आयोजन

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केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने झाइपाइगो (Jhpiego) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सहयोग से “भारत में नर्सिंग पारिस्थितिकी तंत्र में सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने” पर अनुभव साझा कार्यशाला का आयोजन नई दिल्ली में किया।

यह बहुदिवसीय कार्यशाला 12 नवम्बर 2025 से प्रारंभ हुई, जिसमें केंद्र एवं राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, नर्सिंग क्षेत्र के नेता, शिक्षाविद् एवं विकास सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। कार्यशाला का उद्देश्य भारत की नर्सिंग कार्यबल, शिक्षा प्रणाली और सुशासन तंत्र को मजबूत बनाने की रणनीतियों पर विचार-विमर्श करना है।

पहले दिन की प्रमुख बातें

पहले दिन नर्सिंग शिक्षा सुधार और कार्यबल सुदृढ़ीकरण पर व्यापक चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि नर्सिंग शिक्षा की प्रक्रिया, संरचना और परिणामों में सुधार की आवश्यकता है ताकि भविष्य के लिए सक्षम और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नर्सिंग कार्यबल तैयार किया जा सके।

दूसरे दिन की चर्चा

कार्यशाला के दूसरे दिन, राज्यों और संस्थानों द्वारा अपने अनुभव साझा किए गए। प्रस्तुतियों में कौशल आधारित पाठ्यक्रम, क्लिनिकल प्रशिक्षण हेतु सिमुलेशन लैब की स्थापना, मान्यता प्रणाली में राज्य स्तरीय सुधार, सतत् शिक्षा हेतु डिजिटल प्लेटफॉर्म और संगठित नर्सिंग शिक्षा कार्यक्रमों के उदाहरण साझा किए गए।

विचार-विमर्श के दौरान नर्सिंग नेतृत्व, गुणवत्ता आश्वासन प्रणाली और निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी की भूमिका पर भी चर्चा की गई। समूह सत्रों में राज्यों ने अपनी विशिष्ट चुनौतियों और स्थानीय समाधान साझा किए, जिससे सफल मॉडलों की पहचान और उनके विस्तार के लिए ठोस सिफारिशें तैयार की जा सकीं।

अधिकारियों के वक्तव्य

स्वास्थ्य सेवाओं की महानिदेशक डॉ. दीपिका खाखा ने मंत्रालय की समावेशी नीति निर्माण प्रक्रिया की सराहना करते हुए कहा कि केंद्र, राज्य, शिक्षाविदों, नियामक संस्थाओं और भागीदार संगठनों की सहभागिता से नीतियाँ अधिक प्रभावी बनती हैं।

अकांक्षा रंजन, उप सचिव (नर्सिंग एवं डेंटल), स्वास्थ्य मंत्रालय ने “एक दृष्टि, एक एजेंडा: राष्ट्रीय–राज्य सहयोग के माध्यम से नर्सिंग और मिडवाइफरी को सशक्त बनाना” विषय पर बोलते हुए कहा कि केंद्र और राज्य के बीच मजबूत समन्वय ही नीति को जमीनी स्तर पर सफल बनाने की कुंजी है।

डॉ. अमित अरुण शाह, देश निदेशक, झाइपाइगो ने कहा कि कौशल आधारित शिक्षा, नेतृत्व विकास और डिजिटल नवाचार नर्सिंग कार्यबल को उत्तरदायी और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए आवश्यक हैं।

डॉ. खंदैत, उप निदेशक एवं कंट्री लीड, गेट्स फाउंडेशन ने नर्सिंग क्षेत्र में हो रहे सकारात्मक बदलावों की सराहना की और मंत्रालय, राज्यों एवं भागीदारों के सामूहिक प्रयासों को सराहा।

निष्कर्ष

यह कार्यशाला राज्यों और संस्थानों से प्राप्त अनुभवों को एकीकृत कर, सर्वोत्तम प्रथाओं को व्यापक रूप से अपनाने एवं लागू करने के लिए एक सशक्त, सक्षम और सशक्त नर्सिंग कार्यबल निर्माण की दिशा में मार्ग प्रशस्त करेगी।




भारत में नर्सिंग नीति और सुधारों को सशक्त बनाने हेतु तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

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केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और ज्हपाइगो (Jhpiego) के सहयोग से भारत में नर्सिंग नीति प्राथमिकताओं और सर्वोत्तम प्रथाओं पर राष्ट्रीय परामर्श एवं अनुभव साझा करने पर तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला का उद्देश्य नर्सिंग और दाई (मिडवाइफरी) क्षेत्र में नीति संवाद को सशक्त बनाना और सुधारों को आगे बढ़ाना है।

इस परामर्श में नीति-निर्माताओं, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, नियामकों, नर्सिंग शिक्षकों, व्यावसायिक संघों और विकास सहयोगियों सहित देशभर के प्रमुख हितधारकों ने भाग लिया। इसका उद्देश्य चल रही पहलों की समीक्षा करना, नई चुनौतियों की पहचान करना और नर्सिंग प्रशासन, शिक्षा और कार्यबल प्रबंधन को भारत की स्वास्थ्य प्राथमिकताओं और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप मजबूत करने के लिए नवोन्मेषी मॉडल साझा करना था।

इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुन्या सलीला श्रीवास्तव ने कहा कि नर्स और दाइयां भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ हैं। उन्होंने कहा कि आयुष्मान आरोग्य मंदिर और आशा कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर नर्सें सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

उन्होंने बताया कि भारत में हाल के सुधार, जैसे राष्ट्रीय नर्सिंग एवं मिडवाइफरी आयोग (NNMC) की स्थापना, क्षमता-आधारित पाठ्यक्रमों को अपनाना, और नियामक ढांचे का आधुनिकीकरण — नर्सिंग इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

स्वास्थ्य सचिव ने यह भी कहा कि राज्यों से प्राप्त सर्वोत्तम प्रथाएं (Best Practices) राष्ट्रीय नीति निर्माण के लिए मार्गदर्शक इनपुट के रूप में कार्य करेंगी और अन्य राज्यों को भी इन मॉडलों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए ताकि पूरे देश में नर्सिंग क्षेत्र में सुधार लाया जा सके।

नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) प्रो. वी.के. पॉल ने मंत्रालय और WHO को इस महत्वपूर्ण परामर्श के आयोजन के लिए सराहा। उन्होंने कहा कि भारत की स्वास्थ्य प्रणाली वैश्विक स्तर पर अपनी गुणवत्ता और नर्सिंग कार्यबल की प्रतिबद्धता के कारण सम्मानित है। उन्होंने नर्सिंग को भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ बताते हुए नर्सों के प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार और सेवा के दौरान प्रशिक्षण एवं कौशल संवर्धन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई।

इस अवसर पर भारत में WHO की प्रतिनिधि डॉ. पेडेन ने नर्सिंग और मिडवाइफरी क्षेत्र में भारत की प्रगति की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत आज विश्व के सबसे बड़े नर्सिंग कार्यबल योगदानकर्ताओं में से एक है। उन्होंने बताया कि WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में 2030 तक नर्सों की कमी में अपेक्षित कमी का श्रेय भारत की नीतियों और सुधारों को जाता है।

कार्यशाला में प्रतिभागियों ने नीति प्राथमिकताओं जैसे कार्यबल का समान वितरण, शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता सुनिश्चित करना, नेतृत्व विकास और नर्सिंग पेशेवरों के लिए करियर प्रगति के अवसरों पर विचार-विमर्श किया।

तीन दिवसीय कार्यशाला में तकनीकी सत्र, पैनल चर्चा और राज्यों की प्रस्तुतियाँ होंगी, जिनमें नर्सिंग शिक्षा, कार्यबल योजना और डिजिटल लर्निंग में नवाचारों को प्रदर्शित किया जाएगा। इसका उद्देश्य प्रमाण-आधारित नीतिगत निर्णय लेना और राज्यों के बीच पारस्परिक सीख को प्रोत्साहित करना है, ताकि भारत में एक मजबूत, कुशल और सशक्त नर्सिंग कार्यबल सुनिश्चित किया जा सके।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की “स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स नर्सिंग रिपोर्ट” में वैश्विक नर्सिंग कार्यबल की प्रवृत्तियों और प्राथमिकताओं का विस्तृत विवरण दिया गया है। यह रिपोर्ट यहां देखी जा सकती है:

नई दिल्ली में आयुष मंत्रालय और WHO द्वारा द्वितीय वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन से पूर्व राजदूत स्वागत समारोह का आयोजन

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भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने आज विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सहयोग से नई दिल्ली में राजदूतों के लिए एक विशेष स्वागत समारोह का आयोजन किया। यह आयोजन 17 से 19 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में होने वाले द्वितीय WHO वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन (Global Summit on Traditional Medicine) से पहले एक अग्रदूत कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया गया। इस उच्च स्तरीय बैठक में राजदूतों, उच्चायुक्तों और राजनयिक प्रतिनिधियों को शिखर सम्मेलन की दृष्टि, वैश्विक स्वास्थ्य से उसके संबंध और साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को आगे बढ़ाने के लिए बहुपक्षीय सहयोग के अवसरों के बारे में जानकारी दी गई।

कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव, (स्वतंत्र प्रभार) आयुष मंत्रालय तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री, वैद्य राजेश कोटेचा, सचिव, आयुष मंत्रालय, और राजदूत सिबी जॉर्ज, सचिव (पश्चिम), विदेश मंत्रालय उपस्थित थे। इसके साथ ही WHO और आयुष मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी भाग लिया, जिनमें शामिल थे — डॉ. कैथरीना बोहमे, WHO महानिदेशक की वरिष्ठ सलाहकार एवं WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र (SEARO) की प्रभारी अधिकारी; मोनालिसा दास, संयुक्त सचिव, आयुष मंत्रालय; डॉ. पूनम खेत्रपाल, WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र की क्षेत्रीय निदेशक (एमेरिटस) एवं पारंपरिक चिकित्सा पर WHO महानिदेशक की वरिष्ठ सलाहकार; तथा डॉ. श्यामा कुरुविल्ला, निदेशक, WHO ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर।

मुख्य अतिथि प्रतापराव जाधव ने अपने संबोधन में कहा,

“यह शिखर सम्मेलन दुनिया भर में समान, सुलभ और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों की दिशा में हमारे साझा प्रयासों में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। पारंपरिक चिकित्सा हमारी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक ज्ञान और प्रकृति तथा कल्याण के प्रति मानवता की सामूहिक समझ का भंडार है। विश्व अब पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के समन्वित दृष्टिकोण की नई सराहना कर रहा है। WHO और जामनगर स्थित ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन के साथ मिलकर हम अनुसंधान को सशक्त करने, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाने और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि पारंपरिक चिकित्सा के लाभ सभी तक पहुँचें।”

वैद्य राजेश कोटेचा, सचिव, आयुष मंत्रालय ने सभा की शुरुआत अपने वक्तव्य से की और कहा,

“इस वर्ष के शिखर सम्मेलन का विषय ‘Restoring Balance: The Science and Practice of Health and Wellbeing’ (संतुलन की पुनर्स्थापना: स्वास्थ्य और कल्याण का विज्ञान और व्यवहार) हमारी समग्र स्वास्थ्य दृष्टि और पारंपरिक चिकित्सा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। भारत WHO और वैश्विक साझेदारों के सहयोग से मानकों को सुदृढ़ करने, अनुसंधान को आगे बढ़ाने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कार्य कर रहा है। हमें विश्वास है कि यह वैश्विक संवाद सार्थक अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करेगा।”

डॉ. पूनम खेत्रपाल, WHO की क्षेत्रीय निदेशक (एमेरिटस) और पारंपरिक चिकित्सा पर WHO महानिदेशक की वरिष्ठ सलाहकार ने विशेष संबोधन में कहा,

“पारंपरिक चिकित्सा ‘Health for All’ (सभी के लिए स्वास्थ्य) के लक्ष्य को प्राप्त करने का अभिन्न हिस्सा है। 170 सदस्य देशों द्वारा इसके उपयोग की रिपोर्ट और वैश्विक ढांचे के सुदृढ़ होने से यह क्षेत्र पहले से कहीं अधिक सशक्त हुआ है। जामनगर में स्थित ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर और ट्रेडिशनल मेडिसिन ग्लोबल लाइब्रेरी साक्ष्य-आधारित, लोगों-केंद्रित और समग्र स्वास्थ्य सेवा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।”

राजदूत सिबी जॉर्ज, सचिव (पश्चिम), विदेश मंत्रालय ने कहा,

“यह आयोजन पारंपरिक चिकित्सा की समय-परखी उपचार पद्धतियों को आधुनिक वैज्ञानिक समझ के साथ एकीकृत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ‘Restoring Wellbeing and Balance’ की साझा दृष्टि वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में शामिल करने की बढ़ती मान्यता को दर्शाती है। आयुष मंत्रालय ने अनुसंधान, फार्माकोविजिलेंस और अंतरराष्ट्रीय सहयोगों, विशेष रूप से WHO ग्लोबल सेंटर, जामनगर के माध्यम से इन प्रणालियों को सशक्त किया है।”

डॉ. श्यामा कुरुविल्ला, निदेशक, WHO ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर ने आगामी शिखर सम्मेलन के वैश्विक परिप्रेक्ष्य और प्राथमिकताओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा,

“यह शिखर सम्मेलन पारंपरिक चिकित्सा के विज्ञान और व्यवहार पर आधारित होकर लोगों और ग्रह के लिए संतुलन बहाल करने की वैश्विक आंदोलन को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखता है। यह आयोजन Global Traditional Medicine Strategy 2025–2034 (विश्व स्वास्थ्य सभा 78) के मार्गदर्शन में आयोजित होगा और नवीनतम अनुसंधान, साक्ष्य और नवाचारों को उजागर करेगा।”

इसके बाद मोनालिसा दास, संयुक्त सचिव, आयुष मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में होने वाले सम्मेलन के प्रतिभागियों, विषयगत सत्रों, मुख्य घोषणाओं और साझेदारियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम का समापन डॉ. कैथरीना बोहमे, WHO महानिदेशक की वरिष्ठ सलाहकार और WHO SEARO की प्रभारी अधिकारी द्वारा किया गया। उन्होंने कहा,

“पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक स्वास्थ्य के केंद्र में है—यह ‘Health for All’ की दृष्टि को साकार करने की कुंजी है। हम देशों से मंत्री-स्तरीय भागीदारी को बढ़ावा देने का आह्वान करते हैं। जैसे-जैसे हम शिखर सम्मेलन की ओर बढ़ रहे हैं, आइए हम सुलभ, सस्ती, समावेशी और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य प्रणालियों के निर्माण के प्रति अपनी साझा प्रतिबद्धता को दोहराएं।”

यह राजनयिक स्वागत समारोह साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को आगे बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सशक्त करने और एक ऐसे वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र के निर्माण के प्रति सामूहिक संकल्प का प्रतीक रहा जिसमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान एक साथ मिलकर कार्य करें।

आयुष मंत्रालय ने सभी देशों से अनुरोध किया कि वे दिसंबर 2025 में होने वाले द्वितीय WHO वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें।


मानसिक स्वास्थ्य: एक समग्र दृष्टिकोण – भारत में पहल, चुनौतियाँ और प्रगति

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मानसिक स्वास्थ्य केवल खुश या अच्छे मूड में रहने का नाम नहीं है — यह हमारे मानसिक-भावनात्मक, सामाजिक, संज्ञानात्मक और शारीरिक क्षमताओं का सम्मिलन है। जीवन की चुनौतियों का सामना करना और उसे पूरी तरह जी पाना तभी संभव है जब हम अपने मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य मानव अधिकारों का एक बुनियादी हिस्सा है और यह व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। कोविड-19 महामारी ने वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को और अधिक उजागर किया है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य

WHO के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ दुनिया भर में विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक हैं। 2021 में अनुमानित 1.1 अरब लोग किसी न किसी मानसिक विकार से ग्रसित थे। भारत में लगभग हर 100 में से 11 लोग मानसिक स्वास्थ्य विकारों से प्रभावित हैं।

‘सतत विकास लक्ष्यों (SDGs)’ के लक्ष्य 3 में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज और मानसिक स्वास्थ्य के संवर्धन का विशेष उल्लेख है। अवसाद और चिंता विकार विशेष रूप से युवाओं (15-29 वर्ष) में प्रमुख रूप से देखे जाते हैं।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015–16) के अनुसार:

  • 10.6% भारतीय वयस्क किसी न किसी मानसिक विकार से पीड़ित हैं।

  • 15% आबादी को मानसिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

  • मानसिक विकार शहरी क्षेत्रों (13.5%) में ग्रामीण क्षेत्रों (6.9%) की तुलना में अधिक हैं।

  • महिलाएँ (20%) पुरुषों (10%) की तुलना में अधिक प्रभावित होती हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB, 2023) के अनुसार, भारत में 2023 में 1,71,418 आत्महत्याएँ दर्ज की गईं, जिनमें 72.8% पुरुष और 27.2% महिलाएँ थीं।

उपचार अंतर (Treatment Gap)

2015–16 के NIMHANS सर्वेक्षण ने दिखाया कि 70% से 92% मानसिक रोगियों को उचित उपचार नहीं मिल पाता — इसका मुख्य कारण है जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और विशेषज्ञों की कमी।
WHO के अनुसार, प्रति 1 लाख जनसंख्या पर कम से कम 3 मनोचिकित्सक होने चाहिए, जबकि भारत में केवल 0.75 मनोचिकित्सक प्रति 1 लाख हैं।

मानसिक स्वास्थ्य का प्रभाव

शारीरिक प्रभाव: अवसाद से ग्रसित लोगों में हृदय रोग का जोखिम 72% तक बढ़ जाता है (Lancet Psychiatry, 2025)।
आर्थिक प्रभाव: अवसाद और चिंता वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल लगभग 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की उत्पादकता हानि पहुँचाते हैं।
सामाजिक प्रभाव: सामाजिक अलगाव, संबंधों में तनाव, और भेदभाव के कारण मानसिक स्वास्थ्य और अधिक बिगड़ता है।

सामाजिक कलंक और आत्महत्या जोखिम

मानसिक रोगों से जुड़ा कलंक (stigma) इलाज में सबसे बड़ी बाधा है। WHO (2025) के अनुसार, हर साल 7 लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं। मानसिक रोगियों में आत्महत्या का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में 16 गुना अधिक होता है।

युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य संकट

WHO के अनुसार, आधे से अधिक मानसिक विकार 14 वर्ष की आयु तक और 75% 24 वर्ष की आयु तक शुरू हो जाते हैं। किशोरावस्था में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ शैक्षणिक प्रदर्शन, नशे की प्रवृत्ति और आत्म-हानि से जुड़ी होती हैं।

कोविड-19 और मानसिक स्वास्थ्य

महामारी के दौरान चिंता, अवसाद, और अकेलेपन के मामलों में तेजी आई। WHO ने पाया कि महामारी के बाद चिंता विकारों में 25% वृद्धि हुई।

भारत सरकार की पहलें

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) – 1982

  • उद्देश्य: मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली में एकीकृत करना।

  • 1996 में जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP) के रूप में विस्तारित किया गया — अब यह 767 जिलों को कवर करता है।

राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (NSPS) – 2022

  • लक्ष्य: 2030 तक आत्महत्या दर में 10% की कमी लाना।

  • प्रमुख उपाय: स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य जांच, हेल्पलाइन, और जागरूकता अभियान।

आयुष्मान भारत और मानसिक स्वास्थ्य

  • 1.75 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई गई हैं।

  • PM-JAY योजना के तहत मानसिक रोगों के लिए प्रति परिवार ₹5 लाख तक का बीमा कवरेज।

  • टेली-मानस (Tele-MANAS) के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की टेलीफोनिक पहुँच।

टेली-मानस हेल्पलाइन: 14416 / 1800-891-4416

  • अक्टूबर 2025 तक 28 लाख से अधिक कॉल्स हैंडल की गईं।

  • WHO ने इसे एक नवोन्मेषी और प्रभावी मॉडल के रूप में मान्यता दी है।

वैश्विक नीतिगत पहलें

WHO की "Comprehensive Mental Health Action Plan 2013–2030" का उद्देश्य है —

  • समुदाय-आधारित देखभाल को बढ़ावा देना

  • मानसिक स्वास्थ्य को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) में एकीकृत करना

  • सामाजिक परिवेश में सुधार और डिजिटल समाधान का उपयोग

आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25 की सिफारिशें

  • विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को सशक्त बनाना

  • कार्यस्थलों पर तनाव और थकान से निपटने के लिए नीतियाँ लागू करना

  • Tele-MANAS और AI-आधारित समाधान को बढ़ावा देना

निष्कर्ष

मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास का मुद्दा है। भारत ने Tele-MANAS, NMHP, और Ayushman Bharat जैसी पहलों के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति की है।
फिर भी, जागरूकता बढ़ाना, विशेषज्ञों का प्रशिक्षण, और सामाजिक कलंक को समाप्त करना जरूरी है ताकि हर भारतीय को सुलभ, समावेशी और गरिमामय मानसिक स्वास्थ्य सेवा मिल सके।


भारत ने WHO–IRCH की 16वीं वार्षिक बैठक में हर्बल औषधियों के वैश्विक नियामक सहयोग में अपनी अग्रणी भूमिका को सुदृढ़ किया

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विश्व स्वास्थ्य संगठन – अंतरराष्ट्रीय हर्बल औषधियों के लिए नियामक सहयोग (WHO–IRCH) की 16वीं वार्षिक बैठक 14 से 16 अक्टूबर 2025 तक जकार्ता, इंडोनेशिया में आयोजित की जा रही है। इस बैठक में WHO सदस्य देशों और पर्यवेक्षक संगठनों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं, जो हर्बल औषधियों की सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रभावशीलता के क्षेत्रों में नियामक ढांचे के सामंजस्य और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।

भारत इस बैठक में आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के सलाहकार (आयुर्वेद) डॉ. रघु अरक्कल के नेतृत्व में उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के माध्यम से भाग ले रहा है। प्रतिनिधिमंडल में आयुष के उप महानिदेशक (प्रभारी) एवं भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी फार्माकोपिया आयोग (PCIM&H) के निदेशक डॉ. रमन मोहन सिंह और राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. महेश दाधीच शामिल हैं। प्रतिनिधिमंडल की सक्रिय भागीदारी वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे में पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के नियामक सामंजस्य और एकीकरण को आगे बढ़ाने में भारत की अग्रणी भूमिका को रेखांकित करती है।

13 अक्टूबर 2025 को भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इंडोनेशिया में भारत के राजदूत महामहिम संदीप चक्रवर्ती से मुलाकात की। बैठक में प्रतिनिधिमंडल ने WHO–IRCH वार्षिक बैठक में भारत की भागीदारी के बारे में जानकारी दी और पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत करने के अवसरों पर चर्चा की। बैठक के दौरान भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी फार्माकोपिया आयोग (PCIM&H), आयुष मंत्रालय और इंडोनेशियाई फूड एंड ड्रग अथॉरिटी (FDA) के बीच 26 जनवरी 2025 को हस्ताक्षरित “पारंपरिक चिकित्सा गुणवत्ता आश्वासन के क्षेत्र में सहयोग” संबंधी समझौता ज्ञापन (MoU) के प्रभावी कार्यान्वयन पर भी चर्चा की गई। यह समझौता क्षमता निर्माण, तकनीकी विशेषज्ञता के आदान-प्रदान और गुणवत्ता आश्वासन प्रथाओं के सामंजस्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया है। राजदूत चक्रवर्ती ने जकार्ता स्थित भारतीय दूतावास द्वारा इस समझौते के प्रभावी कार्यान्वयन में सक्रिय सहयोग का आश्वासन दिया।

बैठक के उद्घाटन सत्र में डॉ. रघु अरक्कल ने भारत में हर्बल औषधियों की स्थिति पर एक प्रस्तुति दी, जिसमें उन्होंने आयुष मंत्रालय की हालिया पहल, नीतिगत प्रगति और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को रेखांकित किया। उन्होंने पारंपरिक औषधियों के नियामक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और इस क्षेत्र में वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत की निरंतर प्रतिबद्धता पर जोर दिया।

बैठक की एक प्रमुख विशेषता WHO–IRCH कार्यशालाओं की कार्यवाही का विमोचन था — “हर्बल औषधियों की सुरक्षा और विनियमन” (कार्य समूह-1) तथा “हर्बल औषधियों की प्रभावकारिता और उपयोग” (कार्य समूह-3)। यह कार्यशाला विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आयुष मंत्रालय एवं PCIM&H के सहयोग से 6 से 8 अगस्त 2025 के दौरान गाजियाबाद, भारत में आयोजित की गई थी।

जकार्ता में आयोजित इस तीन दिवसीय बैठक ने WHO–IRCH सदस्य देशों की सामूहिक प्रतिबद्धता को दोहराया है कि वे विश्व स्तर पर हर्बल औषधियों के सुरक्षित, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करेंगे। पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में नीतिगत और नियामक सहयोग को आकार देने में भारत लगातार एक प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभर रहा है।

WHO ने चेतावनी जारी की: भारत में जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मौत, तीन ब्रांड खतरनाक

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 नई दिल्ली। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारत के कई राज्यों में प्रतिबंधित तीन ब्रांड के जहरीले कफ सिरप के बारे में स्वास्थ्य परामर्श जारी किया है। WHO ने अधिकारियों से आग्रह किया है कि इन सिरप में से किसी के मिलने पर तुरंत एजेंसी को सूचित किया जाए। चेतावनी में विशेष रूप से कोल्ड्रिफ का जिक्र किया गया है, जिसे लेने से मध्य प्रदेश और राजस्थान में बच्चों की मौत हुई है।


कौन-कौन सी सिरप और कंपनियां शामिल हैं?

WHO के अनुसार, प्रभावित सिरप हैं:

  • कोल्ड्रिफ — श्रीसन फार्मास्युटिकल्स
  • रेस्पिफ्रेश टीआर — रेडनेक्स फार्मास्युटिकल्स
  • रिलाइफ — शेप फार्मा

ये सिरप संभावित रूप से जानलेवा बीमारी का कारण बन सकते हैं।

बच्चों की मौत और स्वास्थ्य प्राधिकरण की रिपोर्ट

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने बताया कि पिछले हफ्ते 5 साल से कम उम्र के 17 बच्चों की ये सिरप पीने से मौत हो गई। CDSCO ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई दूषित दवा भारत से निर्यात नहीं की गई और अवैध निर्यात का कोई सबूत नहीं है।

सिरप में पाया गया जहरीला रसायन

परीक्षणों में पाया गया कि इन सिरप में डायथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) की मात्रा थी। यह एक खतरनाक जहरीला रसायन है, जिसका सेवन गंभीर विषाक्तता और जानलेवा बीमारी का कारण बन सकता है। मध्य प्रदेश के औषधि नियंत्रक डीके मौर्य ने बताया कि कोल्ड्रिफ में 48% से अधिक DEG पाया गया, जबकि स्वीकार्य सीमा केवल 0.1% है।

कोल्ड्रिफ सिरप बनाने वाली कंपनी पर कार्रवाई

कई राज्यों ने कोल्ड्रिफ सिरप पर प्रतिबंध लगा दिया है। तमिलनाडु सरकार ने श्रीसन फार्मास्युटिकल्स का मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस रद्द कर दिया है और कंपनी को बंद करने का आदेश दिया गया है।

कंपनी के मालिक जी. रंगनाथन को मध्य प्रदेश के विशेष जांच दल ने गिरफ्तार किया था। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम के तहत श्रीसन फार्मास्युटिकल्स और उसके अधिकारियों के परिसरों पर छापेमारी भी की है।

आयुष मंत्रालय और WHO द्वारा पारंपरिक चिकित्सा पर द्वितीय वैश्विक शिखर सम्मेलन का आयोजन

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आयुष मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के बीच समझौता — नई दिल्ली में होगा पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन

आयुष मंत्रालय ने आज विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत दोनों संस्थान संयुक्त रूप से पारंपरिक चिकित्सा पर द्वितीय WHO वैश्विक शिखर सम्मेलन का आयोजन करेंगे। इस शिखर सम्मेलन की थीम होगी — “मानव और पृथ्वी के लिए संतुलन की पुनर्स्थापना: कल्याण का विज्ञान और व्यवहार”।

यह सम्मेलन 17 से 19 दिसम्बर 2025 तक नई दिल्ली में आयोजित होगा।

समझौते पर हस्ताक्षर का आयोजन आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)प्रतापराव जाधव तथा आयुष मंत्रालय के सचिव की उपस्थिति में हुआ। यह अवसर द्वितीय शिखर सम्मेलन की योजना समूह की बैठक के दौरान आया, जिसका उद्देश्य आगामी सम्मेलन की तैयारियों और प्रगति की समीक्षा करना था।

यह वैश्विक शिखर सम्मेलन पारंपरिक चिकित्सा की भूमिका को वैश्विक स्वास्थ्य और सतत विकास में आगे बढ़ाने हेतु एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में कार्य करेगा। इसमें विश्वभर के विशेषज्ञ, नीति-निर्माता और विभिन्न हितधारक भाग लेंगे।

आयुष मंत्रालय और WHO ने मिलकर यह पुनः पुष्टि की कि वे प्रमाण-आधारित पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो मानवता और पृथ्वी—दोनों के कल्याण में योगदान करती हैं।


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