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श्रीलंका में पवित्र देवनीमोरी अवशेषों का भव्य प्रदर्शन, भारत–श्रीलंका के आध्यात्मिक संबंध और सुदृढ़

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भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोरी अवशेषों का श्रीलंका में आगमन और उनका सार्वजनिक प्रदर्शन आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण है। यह आयोजन भारत और श्रीलंका के बीच साझा बौद्ध विरासत पर आधारित गहरे और ऐतिहासिक संबंधों को और सुदृढ़ करता है।

पवित्र अवशेष भारतीय वायुसेना के विशेष विमान से श्रीलंका लाए गए, जहाँ उन्हें भारत–श्रीलंका के स्थापित प्रोटोकॉल के अनुरूप पूर्ण राजकीय सम्मान प्रदान किया गया। इस अवसर पर गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल अवशेषों के साथ उपस्थित रहा। प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु, सरकारी अधिकारी और अन्य विशिष्ट गणमान्य व्यक्ति भी शामिल थे।

यह प्रदर्शनी माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अप्रैल 2025 में श्रीलंका की राजकीय यात्रा के दौरान की गई घोषणा के अनुरूप आयोजित की गई है, जो भारत की श्रीलंका के साथ आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को और गहरा करने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने अनुराधापुरा में सेक्रेड सिटी कॉम्प्लेक्स परियोजना के विकास के लिए अनुदान सहायता की भी घोषणा की थी, जो वर्ष 2020 में बौद्ध संबंधों को बढ़ावा देने के लिए घोषित 15 मिलियन अमेरिकी डॉलर के अनुदान के अतिरिक्त है।

पवित्र देवनीमोरी अवशेषों की प्रदर्शनी का उद्घाटन 4 फरवरी 2026 को कोलंबो स्थित प्रतिष्ठित गंगारामया मंदिर में श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके द्वारा किया गया। इस अवसर पर भारतीय पक्ष से गुजरात के राज्यपाल और उपमुख्यमंत्री भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में गंगारामया मंदिर के मुख्य महंत वेनेरेबल डॉ. किरिंदे असाजी थेरो की गरिमामयी उपस्थिति रही।

इस समारोह में श्रीलंका सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री भी शामिल हुए, जिनमें बौद्ध शासन, धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्य मंत्री डॉ. हिनिदुमा सुनील सेनेवी, स्वास्थ्य एवं जनसंचार मंत्री डॉ. नलिंदा जयतिस्सा, तथा सार्वजनिक प्रशासन, प्रांतीय परिषद और स्थानीय सरकार मंत्री प्रो. ए.एच.एम.एच. अबयरत्ना प्रमुख थे।

प्रदर्शनी के अंतर्गत गंगारामया मंदिर परिसर में दो विशेष प्रदर्शनियाँ—“अनअर्थिंग द सेक्रेड पिप्रहवा” और “सेक्रेड रेलिक एंड कल्चरल एंगेजमेंट ऑफ कंटेम्पररी इंडिया”—का भी उद्घाटन किया गया।

पवित्र अवशेषों का पारंपरिक धार्मिक विधियों के साथ स्वागत कर उन्हें गंगारामया मंदिर में स्थापित किया गया। यह प्रदर्शनी 5 फरवरी 2026 से आम जनता के दर्शन के लिए खुली रहेगी, जिससे श्रीलंका सहित विश्वभर के श्रद्धालु भगवान बुद्ध को नमन कर सकेंगे। अवशेषों का आगमन श्रीलंका के 78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हुआ, जिससे इस आयोजन का महत्व और भी बढ़ गया।

उल्लेखनीय है कि यह भारत के बाहर देवनीमोरी अवशेषों का पहला सार्वजनिक दर्शन है। इससे पहले भारत ने वर्ष 2012 में कपिलवस्तु अवशेषों और 2018 में सारनाथ अवशेषों की प्रदर्शनी श्रीलंका में आयोजित की थी।

पवित्र देवनीमोरी अवशेषों की यह प्रदर्शनी भगवान बुद्ध के शाश्वत संदेश—करुणा, शांति और अहिंसा—का जीवंत प्रतीक है और भारत–श्रीलंका के बीच गहरे सभ्यतागत संबंधों को प्रतिबिंबित करते हुए दोनों देशों के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और जन-जन के संपर्क को और मजबूत करती है।


प्रधानमंत्री मोदी ने श्रीलंका में पवित्र देवनीमोरी अवशेषों के प्रदर्शन के लिए राष्ट्रपति दिसानायके का आभार जताया

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका के राष्ट्रपति महामहिम अनुरा कुमारा दिसानायके द्वारा कोलंबो स्थित पवित्र गंगारामया मंदिर में पवित्र देवनीमोरी अवशेषों के प्रदर्शन के उद्घाटन के लिए उनका आभार व्यक्त किया है।

प्रधानमंत्री ने स्मरण कराया कि अप्रैल 2025 में श्रीलंका की अपनी यात्रा के दौरान यह निर्णय लिया गया था कि इन पूजनीय बौद्ध अवशेषों को श्रीलंका लाया जाएगा, ताकि वहां के लोगों को उन्हें श्रद्धापूर्वक दर्शन करने का अवसर मिल सके।

मोदी ने कहा कि भारत और श्रीलंका के बीच सदियों पुराने गहरे सभ्यतागत और आध्यात्मिक संबंध हैं, जो साझा सांस्कृतिक विरासत और आपसी आदान–प्रदान से मजबूत हुए हैं। उन्होंने कहा कि पवित्र देवनीमोरी अवशेषों का श्रीलंका आगमन दोनों देशों के बीच इस स्थायी आध्यात्मिक बंधन का सशक्त प्रतीक है।

प्रधानमंत्री ने आशा व्यक्त की कि भगवान बुद्ध का करुणा, शांति और सद्भाव का कालजयी संदेश मानवता को निरंतर मार्गदर्शन देता रहेगा और सीमाओं से परे एकता व आपसी समझ को बढ़ावा देगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर हिंदी, सिंहली और तमिल भाषाओं में अपने संदेश साझा करते हुए इस आयोजन को भारत–श्रीलंका मैत्री और सांस्कृतिक संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण बताया।



नारायणपुर अंचल में अमन शांति, आजीविका और स्थानीय सहभागिता बढ़ाने पर फोकस: मुख्यमंत्री साय

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मुख्यमंत्री विभिन्न कार्यक्रमों में हुए शामिल

रायपुर- दो दिवसीय नारायणपुर प्रवास पर पहुँचे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अबूझमाड़ क्षेत्र में आयोजित पीस हाफ मैराथन के शुभारंभ के साथ-साथ अनेक सामाजिक, खेल और पर्यटन गतिविधियों में शामिल हुए। मुख्यमंत्री ने क्षेत्र में शांति स्थापना, आजीविका संवर्धन और स्थानीय सहभागिता को बढ़ाने के लिए राज्य शासन द्वारा किए जा रहे प्रयासों का अवलोकन किया, उन्हें प्रोत्साहित किया तथा लोगों से संवाद कर सहभागिता और विश्वास को और मजबूत किया।

बाइकर्स को दिखाई हरी झंडी

मुख्यमंत्री साय ने शांत सरोवर के समीप रायपुर के छत्तीसगढ़ राइडिंग क्लब के 40 बाइकर्स को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह बाइकर्स समूह नारायणपुर के सुदूर पर्यटन स्थल कच्चापाल तक की यात्रा करेगा। इस पहल के माध्यम से अबूझमाड़ को जानने, समझने और शांति का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।

शांत सरोवर में नौका विहार

बिजली गाँव के समीप स्थित शांत सरोवर में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने वन मंत्री केदार कश्यप, राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा, सांसद बस्तर महेश कश्यप एवं लघु वनोपज के अध्यक्ष रूपसाय सलाम के साथ नौका विहार का आनंद लिया। स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह विशेष पहल स्थानीय प्रशासन के द्वारा की गई है। 

तीर-धनुष से साधा लक्ष्य

मुख्यमंत्री साय ने बिंजली में आयोजित कार्यक्रम के दौरान तीरंदाजी के स्थानीय युवा खिलाड़ियों से आत्मीय मुलाकात की और स्वयं तीर-धनुष उठाकर लक्ष्य साधते हुए खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन किया। उन्होंने कहा कि बस्तर अंचल में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। आदिवासी समाज की पारंपरिक दक्षताओं को आधुनिक प्रशिक्षण से जोड़कर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने के लिए राज्य सरकार निरंतर प्रयास कर रही है। शांति, आजीविका और खेलों के विकास में प्रशासन द्वारा समन्वित प्रयास किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार जिला प्रशासन और सुरक्षा बलों के साथ मिलकर क्षेत्र में शांति स्थापना, आजीविका संवर्धन, खेल प्रतिभाओं को मंच देने और विश्वास का वातावरण बनाने के लिए सतत कार्य कर रही है। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री के सचिव राहुल भगत, कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी सुंदरराज पी, कलेक्टर नम्रता जैन, पुलिस अधीक्षक रॉबिन्सन गुरिया, सीईओ आकांक्षा शिक्षा खलखो सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने क्रिसमस समारोह में भाग लिया, शांति, करुणा और राष्ट्रीय एकता के मूल्यों पर दिया जोर

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली में कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) द्वारा आयोजित क्रिसमस समारोह में भाग लिया और क्रिसमस पर्व से पूर्व ईसाई समुदाय को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई दीं।

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि क्रिसमस शांति, करुणा, विनम्रता और मानव सेवा जैसे सार्वभौमिक मूल्यों का उत्सव है। उन्होंने कहा कि प्रभु यीशु मसीह द्वारा दिया गया प्रेम, सद्भाव और नैतिक साहस का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है और यह भारत की आध्यात्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है, जो सह-अस्तित्व, करुणा और मानव गरिमा के सम्मान पर आधारित हैं।

भारत में ईसाई धर्म की दीर्घकालिक उपस्थिति का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि ईसाई समुदाय ने देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और विकासात्मक यात्रा में शांत लेकिन महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सामाजिक सुधार और मानव विकास के क्षेत्रों में ईसाई समुदाय द्वारा किए गए सतत कार्यों की सराहना की, जो देश के दूरदराज़ क्षेत्रों तक पहुंचे हैं, और इसे राष्ट्र निर्माण का अभिन्न अंग बताया।

अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि झारखंड, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें कई ईसाई संगठनों के साथ निकटता से कार्य करने का अवसर मिला। उन्होंने अपने सांसद कार्यकाल के दौरान कोयंबटूर के एक चर्च में हर वर्ष क्रिसमस मनाने और वहां अनुभव किए गए आपसी सद्भाव और समझ की भावना को भी याद किया। साथ ही, उन्होंने तमिलनाडु के ऐतिहासिक व्यक्तित्व कॉन्स्टेंटाइन जोसेफ बेस्की (वीरमामुनिवर) का उल्लेख करते हुए तमिल साहित्य और संस्कृति में उनके योगदान को रेखांकित किया, जो भारत में ईसाई परंपरा के गहरे सांस्कृतिक समावेशन को दर्शाता है।

भारत की बहुलतावादी संस्कृति पर बल देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की एकता समानता में नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और साझा मूल्यों में निहित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश में शांति और सद्भाव का वातावरण है और किसी भी प्रकार के भय की आवश्यकता नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रस्तुत ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की अवधारणा से क्रिसमस की भावना की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार क्रिसमस विभिन्न आस्थाओं के लोगों को आनंद के साथ एकजुट करता है, उसी प्रकार ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ देश की विविधता को संजोते हुए एकता का आह्वान करता है।

उपराष्ट्रपति ने सभी समुदायों से ‘विकसित भारत@2047’ के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर रचनात्मक योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने गरीबी उन्मूलन और साझा समृद्धि की दिशा में मिलकर कार्य करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि विकास सामूहिक प्रयास से ही संभव है।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया वर्ष 1944 से कार्यरत है और इसके द्वारा स्थापित विद्यालयों, महाविद्यालयों, अस्पतालों और परोपकारी संस्थानों का व्यापक नेटवर्क इसे आम नागरिकों के जीवन से गहराई से जोड़ता है।

इस अवसर पर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सी. वी. आनंद बोस, कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया के अध्यक्ष आर्चबिशप एंड्रयूज़ थझथ, भारत में अपोस्टोलिक नुनसियो आर्चबिशप लियोपोल्डो गिरेली सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित थे।

गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहादत दिवस पर अंतरधार्मिक सम्मेलन: उपराष्ट्रपति ने शांति, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवता का दिया संदेश

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नई दिल्ली- भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली में आयोजित अंतरधार्मिक  सम्मेलन (इंटरफेथ कॉन्क्लेव) को संबोधित करते हुए कहा कि यह आयोजन शांति, मानवाधिकारों और धार्मिक सद्भाव के लिए एक वैश्विक आह्वान है। यह सम्मेलन गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहादत दिवस के अवसर पर आयोजित किया गया।

उपराष्ट्रपति ने बताया कि उन्होंने हाल ही में गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब जाकर गुरु तेग बहादुर जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी को नैतिक साहस का प्रकाशस्तंभ बताते हुए कहा कि उनका जीवन और बलिदान संपूर्ण मानवता की धरोहर है।

धार्मिक स्वतंत्रता का ऐतिहासिक प्रतीक

उपराष्ट्रपति ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान धार्मिक स्वतंत्रता के इतिहास में एक अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने किसी राजनीतिक सत्ता या किसी एक मत की श्रेष्ठता के लिए नहीं, बल्कि व्यक्ति की अंतरात्मा के अनुसार जीवन जीने और उपासना करने के अधिकार की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। असहिष्णुता के दौर में उन्होंने पीड़ितों के लिए ढाल बनकर खड़े होने का साहस दिखाया।

‘हिंद दी चादर’ का वैश्विक संदेश

राधाकृष्णन ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी ने विश्व को सिखाया कि करुणा से प्रेरित साहस समाज को बदल सकता है और अन्याय के सामने मौन रहना सच्चे धर्म के अनुकूल नहीं है। इन्हीं शाश्वत मूल्यों के कारण उन्हें केवल सिख गुरु ही नहीं, बल्कि सर्वोच्च बलिदान और नैतिक साहस के सार्वभौमिक प्रतीक के रूप में सम्मानित किया जाता है और उन्हें ‘हिंद दी चादर’ की उपाधि प्राप्त है।

भारत की शक्ति: विविधता में एकता

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता में एकता है। प्राचीन काल से ही भारत ने विभिन्न आस्थाओं, दर्शनों और संस्कृतियों का स्वागत किया है, जिसे संविधान निर्माताओं ने विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता के मूल अधिकारों के माध्यम से सुदृढ़ किया।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के आह्वान का उल्लेख करते हुए इसे भारत की सभ्यतागत आत्मा से जुड़ा दृष्टिकोण बताया और विकसित भारत @2047 के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।

वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका

समकालीन वैश्विक चुनौतियों पर बोलते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने G20 की अध्यक्षता के दौरान “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना को “One Earth, One Family, One Future” के रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने मिशन LiFE के माध्यम से जलवायु परिवर्तन और कोविड-19 के दौरान “वैक्सीन मैत्री” पहल के तहत 100 से अधिक देशों को निःशुल्क टीके उपलब्ध कराने में भारत की मानवीय भूमिका को भी रेखांकित किया।

उन्होंने तमिल सूक्ति “याधुम ऊरे, यावरुम केलिर” का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की सभ्यतागत चेतना आज भी वैश्विक सद्भाव को प्रेरित कर रही है।

आज भी प्रासंगिक है गुरु तेग बहादुर जी का संदेश

उपराष्ट्रपति ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान भारत की आत्मा से गहराई से जुड़ा है—एक ऐसा राष्ट्र जहां एकता एकरूपता से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और समझ से बनती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में भी गुरु तेग बहादुर जी का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि शांति बल से नहीं, बल्कि न्याय, करुणा और मानवीय गरिमा के सम्मान से स्थापित होती है।

सम्मेलन में प्रमुख हस्तियों की उपस्थिति

यह अंतरधार्मिक सम्मेलन डॉ. विक्रमजीत सिंह सहनी, राज्यसभा सांसद एवं अध्यक्ष, ग्लोबल इंटरफेथ हार्मनी फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया गया। सम्मेलन में जैन आचार्य लोकेश मुनि, नामधारी सतगुरु उदय सिंह, मोहन रूपा दास (इस्कॉन मंदिर, दिल्ली), हाजी सैयद सलमान चिश्ती (अजमेर दरगाह शरीफ), रेव. फादर मोनोडीप डेनियल, सरदार तरलोचन सिंह सहित अनेक प्रतिष्ठित धार्मिक एवं आध्यात्मिक नेता उपस्थित रहे।


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने लखनऊ में ब्रह्माकुमारीज़ की वार्षिक थीम ‘विश्व एकता और विश्वास के लिए ध्यान’ का शुभारंभ किया

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भारत की राष्ट्रपति, द्रौपदी मुर्मु ने 28 नवंबर 2025 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में ब्रह्माकुमारीज़ संगठन की वर्ष 2025-26 की वार्षिक थीम ‘विश्व एकता और विश्वास के लिए ध्यान’ का शुभारंभ किया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि आधुनिक समय में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर मानव समाज ने अभूतपूर्व प्रगति की है। आज सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल परिवर्तन और अंतरिक्ष अनुसंधान का युग है। इन क्रांतिकारी परिवर्तनों ने मानव जीवन को पहले से कहीं अधिक सुविधाजनक, सुलभ और संसाधन-संपन्न बनाया है।

उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य अधिक शिक्षित और तकनीकी रूप से सक्षम है तथा उन्नति के अनेक अवसर उपलब्ध हैं। लेकिन तकनीकी विकास के साथ-साथ समाज में तनाव, मानसिक असुरक्षा, अविश्वास और अकेलापन भी बढ़ रहा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि हम आगे बढ़ने के साथ-साथ आत्मचिंतन की भी यात्रा शुरू करें।

राष्ट्रपति ने कहा कि जब हम एक क्षण रुककर स्वयं से संवाद करते हैं, तब महसूस होता है कि शांति और आनंद का स्रोत बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर है। आध्यात्मिक चेतना जागृत होने पर प्रेम, भाईचारा, करुणा और एकता स्वाभाविक रूप से जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।

उन्होंने कहा कि शांत और स्थिर मन समाज में शांति के बीज बोता है और वहीं से विश्व शांति और एकता की नींव मजबूत होती है। मजबूत आत्मबल वैश्विक एकता की अवधारणा को साकार करने का मूल आधार है।

राष्ट्रपति ने ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा विश्व शांति, मानव मूल्यों, महिला सशक्तिकरण, आध्यात्मिक जागरण, शिक्षा और ध्यान के क्षेत्रों में किए जा रहे प्रेरणादायक कार्यों की सराहना की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह संस्था आगे भी एक बेहतर, शांतिपूर्ण और विश्वासपूर्ण विश्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी।



श्री सत्य साई बाबा की जन्म शताब्दी पर उपराष्ट्रपति का संबोधन: प्रेम, सेवा और मानवीय मूल्यों को अपनाने का आह्वान

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन आज आंध्र प्रदेश के पुट्टपर्थी स्थित श्री सत्य साई हिल व्यू स्टेडियम में आयोजित श्री सत्य साई बाबा की जन्म शताब्दी समारोह में शामिल हुए।

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने श्री सत्य साई बाबा को “ईश्वर के महान दूत—शांति, प्रेम और निःस्वार्थ सेवा के प्रतीक” के रूप में वर्णित किया। उन्होंने कहा कि बाबा का संदेश और मिशन जाति, धर्म, वर्ग और राष्ट्रीयता की सभी सीमाओं से परे है।

उन्होंने बाबा की शिक्षाओं—“Love All, Serve All” और “Help Ever, Hurt Never”—को मानवता के लिए कालजयी मार्गदर्शन बताया।

तिरुवल्लुवर के कुरल का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि श्री सत्य साई बाबा ने अपने संपूर्ण जीवन को मानवता की सेवा और प्रेम के लिए समर्पित कर इस सत्य को चरितार्थ किया।

उन्होंने बताया कि बाबा की शिक्षाएँ सत्य, धर्म, शांति, प्रेम, और अहिंसा जैसे मूल्यों पर आधारित हैं, जो आज की अशांत और अनिश्चितताओं से भरी दुनिया में और भी अधिक प्रासंगिक हैं।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में भी सत्य, कर्तव्य, सहानुभूति और नैतिक जिम्मेदारी जैसे गुणों का पालन अनिवार्य है—जिन्हें बाबा ने सदैव अपनाया और प्रचारित किया।

उपराष्ट्रपति ने श्री सत्य साई सेंट्रल ट्रस्ट के विशाल सामाजिक योगदान की सराहना की और कहा कि उसके स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सामाजिक कल्याण कार्यक्रम अनगिनत लोगों के जीवन को स्पर्श कर रहे हैं।
उन्होंने ट्रस्ट की मोबाइल रूरल हेल्थ सर्विसेज को दूरदराज़ क्षेत्रों के लिए “जीवनदायी सेवा” बताया और ट्रस्ट के शिक्षण संस्थानों की नि:शुल्क, मूल्य-आधारित, विश्वस्तरीय शिक्षा प्रदान करने की बड़ी भूमिका का उल्लेख किया।
उन्होंने यह भी याद किया कि किस प्रकार श्री सत्य साई बाबा ने तेलुगु गंगा नहर के पुनर्जीवन में अहम भूमिका निभाई, जिससे चेन्नई में पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित हुई—और जिसे तमिलनाडु की जनता सदैव स्मरण रखेगी।
उन्होंने कहा कि बाबा की सेवाएँ यह प्रमाण हैं कि प्रेम जब सेवा का रूप ले लेता है, तो समाज को परिवर्तित कर सकता है।

इस पावन अवसर पर उपराष्ट्रपति ने सभी भक्तों और नागरिकों से बाबा की विरासत को कर्म के माध्यम से आगे बढ़ाने का आह्वान किया—ज़रूरतमंदों की सहायता कर, परिवारों, समाज और राष्ट्र में शांति एवं सद्भाव को बढ़ाकर।

अंत में, उन्होंने संपूर्ण साई समुदाय को शुभकामनाएँ दीं और सार्वभौमिक प्रार्थना—“सर्व लोकाः सुखिनो भवन्तु”—के साथ अपना संबोधन समाप्त किया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि “सबसे महान पूजा सेवा है, और सबसे महान अर्पण प्रेम।”

समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति ने छात्रों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रम भी देखा।

इस अवसर पर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, त्रिपुरा के राज्यपाल एन. इंद्र सेना रेड्डी, तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी, आंध्र प्रदेश सरकार के मंत्री नारा लोकेश, तमिलनाडु सरकार के मंत्री शेखर बाबू, सत्य साई सेंट्रल ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी आर. जे. रत्नाकर, श्री सत्य साई सेवा संगठन के अखिल भारतीय अध्यक्ष निमिष पंड्या, श्री सत्य साई उच्चतर शिक्षा संस्थान के कुलपति श्री के. चक्रवर्ती सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।



भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों पर श्रद्धांजलि: भारत-भूटान आध्यात्मिक और सांस्कृतिक बंधन मजबूत

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थिम्पू में ताशीचोडज़ॉन्ग के भव्य कुएनरेय में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों पर हजारों भक्तों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। ये अवशेष भारत से लाए गए हैं और वर्तमान में भूटान की प्रमुख बौद्धिक केंद्रों में से एक में प्रतिष्ठित हैं।

भारत के वरिष्ठ भिक्षुओं की उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल द्वारा लाए गए इन पवित्र अवशेषों का उद्देश्य स्थानीय भक्तों को आशीर्वाद देना और भूटान की बौद्ध आबादी के लिए विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित करना है।

शुरू से ही सुबह के समय, मठ में भक्तों की निरंतर भीड़ देखी गई, और बाहर लंबी कतार देशवासियों की गहरी आध्यात्मिक भक्ति और श्रद्धा को दर्शाती है।

यह अवशेष भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली से 8 नवंबर 2025 को भूटान में “सद्भावना उपहार” के रूप में लाए गए हैं और ये 18 नवंबर 2025 तक ताशीचोडज़ॉन्ग के भव्य कुएनरेय में प्रतिष्ठित रहेंगे, इसके बाद इन्हें भारत में पुनः विधिपूर्वक लौटाया जाएगा।

इस आयोजन का समायोजन भूटान के चौथे राजा, जिग्मे सिंगे वांगचुक के 70वें जन्मजयंत वर्ष को समर्पित है, जिनके दूरदर्शी नेतृत्व में भूटान में लोकतंत्र की स्थापना हुई और देश की वैश्विक बौद्ध पहचान मजबूत हुई।

यह पवित्र अवशेष प्रदर्शनी भारत के संस्कृति मंत्रालय, अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध महासंघ (IBC) और राष्ट्रीय संग्रहालय के सहयोग से आयोजित की गई है और 8 से 18 नवंबर 2025 तक थिम्पू में आयोजित है।

प्रदर्शनी में तीन थीमैटिक प्रदर्शनियां शामिल हैं:

  1. गुरु पद्मसंभव: भारत में जीवन और पवित्र स्थलों की यात्रा

  2. शक्यवंश की पवित्र विरासत: बुद्ध अवशेषों का उत्खनन और महत्व

  3. बुद्ध का जीवन और शिक्षाएं

भारत की भागीदारी इस ऐतिहासिक प्रदर्शनी में दो राष्ट्रों के साझा बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को उजागर करती है और भारत-भूटान मित्रता को और गहरा करती है।


उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने श्रवणबेलगोला में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी की शताब्दी स्मृति समारोह में की शिरकत

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में परमपूज्य आचार्य श्री 108 शांतिसागर महाराज जी की पुण्य स्मृति में आयोजित समारोह में भाग लिया। यह आयोजन आचार्य श्री के 1925 में महामस्तकाभिषेक समारोह हेतु इस पवित्र स्थल पर आगमन की शताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी की प्रतिमा का अनावरण भी किया।

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी के दिगंबर परंपरा के पुनर्जागरण में किए गए योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री का जीवन अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद जैसे जैन सिद्धांतों का सजीव उदाहरण है, जो आज भी आत्मिक शांति और सामाजिक सद्भाव के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं।

उन्होंने कहा कि भौतिकवाद और अस्थिरता से भरे इस युग में आचार्य श्री का जीवन हमें यह संदेश देता है कि सच्ची स्वतंत्रता भोग में नहीं, बल्कि संयम में है; और सच्चा सुख बाहरी संपत्ति में नहीं, बल्कि आंतरिक शांति में निहित है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस शताब्दी समारोह के माध्यम से श्रवणबेलगोला स्थित दिगंबर जैन मठ ने न केवल एक महान संत की स्मृति का सम्मान किया है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आध्यात्मिक ज्योति को पुनः प्रज्वलित किया है। उन्होंने कहा कि अनावृत की गई प्रतिमा सादगी, पवित्रता और करुणा की शक्ति की स्मृति दिलाने वाला प्रतीक बनकर खड़ी रहेगी।

उपराष्ट्रपति ने आशा व्यक्त की कि आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी का संदेश समस्त भारतीयों को धर्म, सहिष्णुता और शांति के मार्ग पर अग्रसर करता रहेगा।

उन्होंने श्रवणबेलगोला के दो हजार वर्ष पुराने गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए भगवान बाहुबली की 57 फुट ऊँची एकाश्म मूर्ति को आध्यात्मिक श्रद्धा और कला कौशल का शाश्वत प्रतीक बताया।

राधाकृष्णन ने सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा आचार्य भद्रबाहु की प्रेरणा से श्रवणबेलगोला में संन्यास लेने के ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख किया और कहा कि यह घटना दर्शाती है कि सांसारिक उपलब्धियों के शिखर पर पहुँचने के बाद भी व्यक्ति को अंततः आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश करनी चाहिए।

उन्होंने भारत सरकार द्वारा प्राकृत भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने और जैन पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण हेतु “ज्ञान भारतम मिशन” शुरू करने की सराहना की। उन्होंने तमिलनाडु और जैन धर्म के गहरे ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन धर्म ने संगम कालीन और पश्चात् संगम कालीन तमिल साहित्य जैसे शिलप्पदिकारम में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

उपराष्ट्रपति ने श्रवणबेलगोला दिगंबर जैन महास्थान मठ के वर्तमान प्रमुख अभिनव चारुकीर्ति भट्टारक स्वामीजी की भी सराहना की, जो आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी की परंपरा को स्वास्थ्य, शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों जैसे प्राकृत रिसर्च इंस्टीट्यूट के माध्यम से आगे बढ़ा रहे हैं।

उपराष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि श्रवणबेलगोला भारत की आध्यात्मिक धरोहर का उज्ज्वल रत्न बना रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को धर्म, सहिष्णुता और शांति के मार्ग पर प्रेरित करता रहेगा।

इस अवसर पर कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत, केंद्रीय भारी उद्योग और इस्पात मंत्री एच. डी. कुमारस्वामी, कर्नाटक के राजस्व मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा, योजना और सांख्यिकी मंत्री डी. सुधाकर, हासन से सांसद श्रेयस एम. पटेल, श्रवणबेलगोला दिगंबर जैन महास्थान मठ के संतगण और अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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