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आईआईसीए के राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत की दिवाला एवं पुनर्गठन व्यवस्था के भविष्य पर मंथन

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नई दिल्ली- भारत के दिवाला एवं पुनर्गठन ढांचे (Insolvency and Restructuring Ecosystem) के एक दशक के अनुभवों और भविष्य की दिशा पर विचार-विमर्श के लिए भारतीय कॉर्पोरेट कार्य संस्थान (IICA) ने एसोसिएशन ऑफ इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल एंटिटीज (AIPE) के सहयोग से राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। प्रधानमंत्री संग्रहालय सभागार, तीन मूर्ति मार्ग, नई दिल्ली में आयोजित इस सम्मेलन का विषय था— “भारत के पुनर्गठन पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्परिभाषित करना: सीख का एक दशक और भविष्य की दिशा”।

सम्मेलन के साथ ही आईआईसीए के प्रमुख शैक्षणिक कार्यक्रम पोस्ट ग्रेजुएट इंसॉल्वेंसी प्रोग्राम (PGIP) के छठे बैच का दीक्षांत समारोह भी आयोजित किया गया, जिसमें 40 विद्यार्थियों को डिग्री एवं प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति अशोक भूषण, अध्यक्ष, राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT), ने दीक्षांत भाषण देते हुए कहा कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) ने पिछले दस वर्षों में उल्लेखनीय विकास किया है। उन्होंने वर्ष 2016 से 2021 तक की अवधि को “स्थापना का युग” तथा वर्तमान समय को “परिष्कार का युग” बताया। उन्होंने कहा कि आईबीसी (संशोधन) अधिनियम, 2026 इस कानून की परिपक्वता और निरंतर विकास का प्रतीक है।

मुख्य वक्ता न्यायमूर्ति अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल, अध्यक्ष, राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT), ने आईबीसी की न्यायिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए समयबद्ध और मूल्य-संवर्धक समाधान सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक एवं संस्थागत समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सीमा-पार दिवालियापन (Cross-Border Insolvency) के लिए UNCITRAL मॉडल कानून को अपनाने की आवश्यकता भी रेखांकित की।

कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय की सचिव दीप्ति गौर मुखर्जी ने अपने विशेष संबोधन में आईबीसी को भारत की वित्तीय और कॉर्पोरेट व्यवस्था में “व्यवहारिक क्रांति” बताया। उन्होंने कहा कि समाधान प्रक्रियाओं के माध्यम से लगभग 4 लाख करोड़ रुपये की वसूली की जा चुकी है, जबकि ऋणदाताओं को परिसमापन मूल्य का लगभग 170 प्रतिशत प्राप्त हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि 32 हजार से अधिक मामलों का समाधान औपचारिक स्वीकृति से पहले ही हो गया, जिससे लगभग 14 लाख करोड़ रुपये के ऋण मूल्य का संरक्षण संभव हुआ।

आईआईसीए के महानिदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि पीजीआईपी कार्यक्रम दिवाला पेशेवरों की नई पीढ़ी तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने बताया कि सात बैचों के माध्यम से अब तक 239 पेशेवरों का एक मजबूत नेटवर्क विकसित हुआ है, जिनमें से कई पंजीकृत दिवाला पेशेवर के रूप में सक्रिय हैं।

दीक्षांत समारोह के दौरान शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए विद्यार्थियों को सम्मानित भी किया गया। आशीष कुमार ने प्रथम स्थान प्राप्त कर 50 हजार रुपये का नकद पुरस्कार जीता, जबकि अरुण कुमार को द्वितीय स्थान के लिए 30 हजार रुपये और के. गीता वैष्णवी को तृतीय स्थान के लिए 20 हजार रुपये का पुरस्कार प्रदान किया गया। ये पुरस्कार AZB एंड पार्टनर्स द्वारा प्रायोजित किए गए थे।

कार्यक्रम के दौरान आईबीसी के दस वर्षों की यात्रा और प्रभाव पर आधारित राष्ट्रीय सम्मेलन स्मारिका का विमोचन किया गया। साथ ही पीजीआईपी विद्यार्थियों के लिए पीएम विद्या लक्ष्मी मेरिट-कम-मीन्स छात्रवृत्ति की घोषणा की गई। इसके अतिरिक्त वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन (ONOS) प्लेटफॉर्म की सुविधा भी आईआईसीए को प्रदान की गई, जिससे शोधकर्ताओं, शिक्षकों और विद्यार्थियों को वैश्विक शैक्षणिक संसाधनों तक सहज पहुंच प्राप्त होगी।

सम्मेलन में दिवाला एवं पुनर्गठन क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं, नियामकों, न्यायिक अधिकारियों, शिक्षाविदों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। विभिन्न तकनीकी सत्रों और पैनल चर्चाओं में सीमा-पार दिवालियापन, ऋणदाता-प्रेरित समाधान प्रक्रिया (CIIRP), संकटग्रस्त परिसंपत्ति बाजार, वैकल्पिक निवेश कोष, मध्यस्थता तंत्र तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सुधारों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई।

सम्मेलन के समापन अवसर पर आईआईसीए के सेंटर फॉर इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी के प्रमुख सुधाकर शुक्ला ने सभी वक्ताओं, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। सम्मेलन ने भारत की दिवाला एवं पुनर्गठन व्यवस्था को और अधिक सशक्त बनाने तथा भविष्य के सुधारों के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करने की सामूहिक प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित किया।

दुर्लभ रोगों के बेहतर प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम: राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन

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स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आज नई दिल्ली में दो दिवसीय राष्ट्रीय दुर्लभ रोग सम्मेलन (National Conference on Rare Diseases) का उद्घाटन किया, जो 5 और 6 मई 2026 को आयोजित किया जा रहा है। यह सम्मेलन देश में दुर्लभ बीमारियों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए स्वास्थ्य सचिव पुन्य सलिला श्रीवास्तव ने कहा कि इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य हितधारकों की चुनौतियों को समझना, नवाचार को बढ़ावा देना और देश में दुर्लभ रोगों के बेहतर प्रबंधन के लिए नए विचार विकसित करना है।

उन्होंने बताया कि दुर्लभ रोगों से निपटने की आवश्यकता को सबसे पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में रेखांकित किया गया था और बाद में 2021 की राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के माध्यम से इसे एक औपचारिक ढांचा प्रदान किया गया।

उन्होंने कहा कि इस नीति के तहत देशभर में उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) स्थापित किए गए हैं, जिनकी संख्या 8 से बढ़कर 15 हो गई है, जिनमें उत्तर-पूर्व भारत के दो केंद्र भी शामिल हैं।

स्वास्थ्य सचिव ने यह भी बताया कि दुर्लभ रोगों के मरीजों के इलाज के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दी गई है। इसके साथ ही जीवनरक्षक दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी में छूट दी गई है, और आगे भी नई दवाओं को इस सूची में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

उन्होंने UMMID पहल और NIDAN केंद्रों के माध्यम से जेनेटिक काउंसलिंग और उपचार सहायता को मजबूत किए जाने की जानकारी दी। अब तक लगभग 1,800 मरीजों को इस नीति के तहत सहायता मिल चुकी है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की भूमिका की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह संस्था दुर्लभ रोगों के लिए स्वदेशी शोध और उपचार विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. राजीव बहल ने कहा कि पिछले तीन दशकों में दुर्लभ रोगों के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। उन्होंने कहा कि आज भारत न केवल निदान बल्कि उपचार और वित्तीय सहायता के क्षेत्र में भी बेहतर स्थिति में है।

डॉ. बहल ने यह भी कहा कि भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुसार दुर्लभ रोगों के लिए स्वदेशी मॉडल विकसित करना चाहिए, जिसमें डिजिटल तकनीक, एआई और जेनेटिक रिसर्च की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

इस सम्मेलन में विशेषज्ञों ने जेनेटिक तकनीक, सस्ती उपचार रणनीतियों, शोध सहयोग और रोगी-केंद्रित स्वास्थ्य मॉडल पर चर्चा की। मंत्रालय ने सभी हितधारकों के सहयोग से दुर्लभ रोगों से प्रभावित मरीजों को बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता दोहराई।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया

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भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज (19 दिसंबर, 2025) हैदराबाद, तेलंगाना में तेलंगाना लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने सेवाओं और लोक सेवा आयोगों के लिए संविधान का एक पूरा भाग समर्पित किया है। यह इस बात को दर्शाता है कि उन्होंने संघ और राज्यों के लोक सेवा आयोगों की भूमिकाओं और कार्यों को कितनी महत्ता दी है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, तथा स्थिति और अवसर की समानता से जुड़े हमारे संवैधानिक आदर्श लोक सेवा आयोगों के कार्यकरण के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। संविधान की प्रस्तावना, सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता से जुड़ा मौलिक अधिकार तथा जनकल्याण को बढ़ावा देने वाले सामाजिक व्यवस्था की स्थापना हेतु राज्य को मार्गदर्शन देने वाला निदेशक सिद्धांत—ये सभी लोक सेवा आयोगों के लिए मार्गदर्शक पथ हैं। उन्होंने कहा कि लोक सेवा आयोगों को केवल अवसर की समानता के आदर्श से ही नहीं, बल्कि परिणामों की समानता के लक्ष्य की प्राप्ति का भी प्रयास करना चाहिए। आयोग समानता और न्याय को बढ़ावा देने वाले परिवर्तन के वाहक (चेंज-एजेंट) हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि लोक सेवा आयोगों द्वारा चयनित लोक सेवकों से गठित तथाकथित ‘स्थायी कार्यपालिका’ शासन प्रक्रिया में निष्पक्षता, निरंतरता और स्थिरता प्रदान करती है। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर जनोन्मुखी नीतियों के क्रियान्वयन के लिए स्थायी कार्यपालिका में शामिल सिविल सेवकों की ईमानदारी, संवेदनशीलता और दक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि लोक सेवा आयोगों को भर्ती करते समय उम्मीदवारों की ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। ईमानदारी और सत्यनिष्ठा सर्वोपरि हैं और असमझौतापूर्ण (नॉन-नेगोशिएबल) हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि कौशल और दक्षताओं की कमी को प्रशिक्षण और अन्य रणनीतियों से दूर किया जा सकता है, लेकिन सत्यनिष्ठा की कमी ऐसे गंभीर संकट पैदा कर सकती है जिन्हें दूर करना असंभव हो सकता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सिविल सेवक बनने की आकांक्षा रखने वाले युवाओं में हाशिए पर पड़े और कमजोर वर्गों के लिए कार्य करने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे सिविल सेवकों को महिलाओं की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होना चाहिए। लोक सेवा आयोगों द्वारा लैंगिक संवेदनशीलता को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

राष्ट्रपति ने कहा कि दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के साथ-साथ अत्यधिक विविधताओं वाले देश भारत को सभी स्तरों पर सबसे प्रभावी शासन प्रणालियों की आवश्यकता है। देश निकट भविष्य में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखता है। साथ ही, हम 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि लोक सेवा आयोग अपनी जिम्मेदारियों का निरंतर निर्वहन करते रहेंगे और उनके द्वारा चयनित व मार्गदर्शित भविष्य-तैयार सिविल सेवकों की टीम के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।


मानव अधिकार दिवस 2025: डॉ. पी. के. मिश्रा ने मानव गरिमा और समावेशी शासन पर दिया जोर

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प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी. के. मिश्रा ने आज नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ‘राष्ट्रीय सम्मेलन: सभी के लिए दैनिक आवश्यकताएँ – जन सेवाएँ और गरिमा’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। अपने मुख्य वक्तव्य में उन्होंने विश्व मानवाधिकार दिवस के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक देशों—विशेषकर भारत—के लिए यह दिन महत्वपूर्ण है क्योंकि यही वह बिंदु है जहाँ संवैधानिक आदर्श, लोकतांत्रिक संस्थाएँ और सामाजिक मूल्य मिलकर मानव गरिमा की रक्षा करते हैं।

उन्होंने 1948 के मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 25(1) को उद्धृत किया, जिसमें भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा देखभाल, सामाजिक सुरक्षा और कमजोर परिस्थितियों में सहारा पाने के अधिकार को मूल अधिकार माना गया है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार दिवस केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि “दैनिक जीवन में गरिमा” पर चिंतन का निमंत्रण है। इस वर्ष की थीम “ह्यूमन राइट्स: आवर एवरीडे एसेंशियल्स” नागरिकों के जीवन में सार्वजनिक सेवाओं की निर्णायक भूमिका को दर्शाती है।

भारत की ऐतिहासिक भूमिका और विकसित होते मानवाधिकार

डॉ. मिश्रा ने भारत द्वारा UDHR के निर्माण में निभाई अहम भूमिका का उल्लेख किया, विशेषकर डॉ. हंसा मेहता के योगदान का, जिनके प्रयास से घोषणा में लिखा गया—“all human beings…”, जो लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा कदम था।

उन्होंने कहा कि मानवाधिकार अब केवल नागरिक और राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीकी, डिजिटल और पर्यावरणीय अधिकार भी शामिल हो चुके हैं। आज गरिमा का अर्थ है—स्वतंत्रता के साथ-साथ निजता, स्वच्छ पर्यावरण, गतिशीलता और डिजिटल समावेशन तक पहुँच।

भारतीय सभ्यता में गरिमा का दर्शन

उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में धर्म, न्याय, करूणा, सेवा, अहिंसा, और वसुधैव कुटुंबकम जैसे सिद्धांत सदैव मानव गरिमा के केंद्र में रहे हैं। यही मूल्य हमारे संविधान में प्रतिबिंबित होते हैं—सर्वजन मताधिकार, मौलिक अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसे निर्देशक सिद्धांतों में।

2014 से पहले और बाद का बदलाव

डॉ. मिश्रा ने कहा कि 2014 से पहले भारत में अधिकार-आधारित कानून तो बने, लेकिन सेवा वितरण की कमजोरियों ने उनकी विश्वसनीयता को प्रभावित किया।
2014 के बाद सरकार ने सैचुरेशन एप्रोच अपनाई—“कोई भी पात्र लाभार्थी छूटे नहीं”। इससे देश एक बदलाव से गुजरा—
“कागजी अधिकारों” से “कार्यान्वित अधिकारों” की ओर।

डिजिटल ढाँचे, DBT, और विक्सित भारत संकल्प यात्रा जैसे प्रयासों ने इसे और मजबूत किया। बीते दशक में 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर आए—यह भारत की सबसे बड़ी मानवाधिकार उपलब्धियों में से एक है।

मानव गरिमा को सुनिश्चित करने के चार स्तंभ

1. घर में गरिमा

  • प्रधानमंत्री आवास योजना

  • जल जीवन मिशन

  • स्वच्छ भारत अभियान

  • सौभाग्य योजना

  • उज्ज्वला योजना

इन पहलों ने करोड़ों परिवारों की जीवन-गुणवत्ता बदली।

2. सामाजिक सुरक्षा

  • कोविड में 80 करोड़ लोगों को PMGKAY के तहत मुफ्त राशन

  • आयुष्मान भारत–PMJAY से 42 करोड़ नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा

  • बीमा, पेंशन और नए श्रम कानूनों ने असंगठित क्षेत्र और गिग वर्कर्स को सुरक्षा प्रदान की

  • मानसिक स्वास्थ्य कानून ने कमजोर वर्गों की गरिमा को संरक्षित किया

3. समावेशी आर्थिक विकास

  • JAM Trinity ने DBT में क्रांति लाई

  • 56 करोड़ जन धन खाते

  • PM Mudra और PM SVANidhi से करोड़ों नए उद्यम

  • महिलाओं की प्रगति:

    • स्वयं सहायता समूह

    • “लखपति दीदी”

    • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

    • विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण

4. न्याय और कमजोर समुदायों की सुरक्षा

  • नए आपराधिक कानून

  • फास्ट-ट्रैक कोर्ट

  • POCSO Act

  • दिव्यांगजनों के अधिकार कानून

  • पीएम-जनमन योजना के माध्यम से आदिवासी समुदायों का विकास

  • वैक्सीन मैत्री जैसी पहलें—मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता की मिसाल

सुशासन स्वयं एक मौलिक अधिकार

अंत में डॉ. मिश्रा ने कहा कि सुशासन (Good Governance) भी मूल अधिकार है—

  • दक्षता

  • पारदर्शिता

  • समयबद्ध सेवा

  • शिकायत निवारण

इन्हीं से एक आधुनिक, समावेशी और नागरिक-केंद्रित भारत का निर्माण होगा—जहाँ शहर रहने योग्य और गाँव समृद्ध हों।

उन्होंने उभरती चुनौतियों—जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय न्याय, डेटा संरक्षण, AI की जवाबदेही, एल्गोरिदमिक निष्पक्षता, गिग वर्कर्स की सुरक्षा और डिजिटल निगरानी—पर विशेष ध्यान देने का आह्वान किया।


प्रधानमंत्री मोदी 8 नवंबर को ‘कानूनी सहायता वितरण तंत्र सुदृढ़ करने’ पर राष्ट्रीय सम्मेलन का करेंगे उद्घाटन

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 नवंबर 2025 को लगभग 5 बजे भारत के सर्वोच्च न्यायालय में “कानूनी सहायता वितरण तंत्र सुदृढ़ करने” पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा तैयार समुदाय मध्यस्थता प्रशिक्षण मॉड्यूल का भी शुभारंभ करेंगे। इसके साथ ही प्रधानमंत्री सम्मेलन में उपस्थित सभी प्रतिभागियों को संबोधित भी करेंगे।

दो दिवसीय सम्मेलन, जिसे NALSA द्वारा आयोजित किया गया है, में कानूनी सेवाओं के ढांचे के मुख्य पहलुओं पर विचार-विमर्श किया जाएगा। इनमें कानूनी सहायता बचाव वकील प्रणाली, पैनल वकील, पैरा-लीगल स्वयंसेवक, स्थायी लोक अदालतें, और कानूनी सेवा संस्थानों का वित्तीय प्रबंधन शामिल हैं।

सम्मेलन का उद्देश्य कानूनी सहायता वितरण प्रणाली को और अधिक प्रभावी, पारदर्शी और सुलभ बनाना है, ताकि देश के हर नागरिक को न्याय की समुचित सुविधा मिल सके।


राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), भारत का 32वां स्थापना दिवस समारोह और कैदियों के मानवाधिकार पर राष्ट्रीय सम्मेलन

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), भारत अपने 32वें स्थापना दिवस का समारोह 16 अक्टूबर 2025 को विज्ञान भवन में आयोजित कर रहा है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि, भारत के पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद, उद्घाटन भाषण देंगे। इस कार्यक्रम में NHRC, भारत के अध्यक्ष, न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यम, सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) विद्युत रंजन सारंगी,विजया भारती सायनी, प्रियांक कानूंगो, महासचिव भरत लाल और आयोग के अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित होंगे। स्थापना दिवस समारोह आयोग की यात्रा पर विचार करने और मानवाधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को नवीनीकृत करने का अवसर प्रदान करता है।

इसके साथ ही आयोग ‘कैदियों के मानवाधिकार’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन करेगा। विभिन्न सत्रों में कैदियों के मानवाधिकार और कल्याण से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। इसमें संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों, राजदूतों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, कानूनी विशेषज्ञों, नागरिक समाज और मानवाधिकार रक्षकों के प्रतिनिधि भाग लेंगे।

32 वर्षों की यात्रा (12 अक्टूबर 1993 से) के दौरान, NHRC ने नीति सुधार, जन-केंद्रित शासन और कानून प्रवर्तन, जांच और कल्याण योजनाओं/कार्यक्रमों में नियमित निगरानी के माध्यम से न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का काम किया है। आयोग पुलिस जवाबदेही, जेल सुधार और आरोपियों एवं पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा को बढ़ावा देता है। यह केंद्रीय और राज्य सरकारों, पैरास्टेटल संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, एनजीओ और मानवाधिकार रक्षकों के साथ मिलकर मानवाधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन में योगदान देता है।

अब तक आयोग ने 31 सलाहकार निर्देश (Advisories) जारी किए हैं, जिनमें बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM), विधवाओं के अधिकार, भिखारी वर्ग के अधिकार, भोजन का अधिकार, स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य के अधिकार, अनौपचारिक श्रमिकों के अधिकार, मृतकों की गरिमा का सम्मान, ट्रक चालकों के अधिकार, पर्यावरण प्रदूषण और गिरावट, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के कल्याण, कैदियों द्वारा आत्म-हानि और आत्महत्या के प्रयास को कम करने के उपाय, नेत्र संबंधी चोटों को रोकने के उपाय शामिल हैं। इसके अलावा, आयोग ने हान्सन रोग से पीड़ित व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव करने वाले 97 कानूनों में संशोधन की सिफारिश भी की।

पिछले 32 वर्षों में, आयोग ने 23,79,043 मामले देखे, जिनमें से 2,981 सुओ मोटु (suo motu) मामले थे। इस दौरान, आयोग ने 8,924 मामलों में ₹263 करोड़ से अधिक का मौद्रिक राहत प्रदान करने की सिफारिश की। पिछले एक वर्ष (1 अक्टूबर 2024 से 30 सितंबर 2025) के दौरान, आयोग ने 73,849 शिकायतें और 108 सुो मोटु मामले निपटाए, 63 साइट जांचें कीं, 38,063 मामले निपटाए और 210 मामलों में पीड़ितों को ₹9 करोड़ से अधिक की राहत की सिफारिश की।

विशेष प्रतिनिधि और विशेष पर्यवेक्षक (Special Rapporteurs & Monitors) आयोग को विभिन्न क्षेत्रों में मानवाधिकार स्थिति का मूल्यांकन करने में मदद करते हैं। वे आश्रय गृहों, जेलों और पर्यवेक्षण गृहों का दौरा करते हैं और आयोग को अपनी रिपोर्ट प्रदान करते हैं।

आयोग ने राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थानों (NHRIs) के लिए क्षमता निर्माण, शोध अध्ययन, सहयोगात्मक कार्यशालाओं, ओपन हाउस चर्चा, इंटर्नशिप कार्यक्रम, संवेदीकरण और प्रशिक्षण जैसे अनेक कार्यक्रम आयोजित किए हैं। पिछले वर्ष आयोग ने 33 सहयोगात्मक कार्यशालाएं, 4 मूट कोर्ट प्रतियोगिताएं, 6 ऑनलाइन शॉर्ट टर्म इंटर्नशिप (OSTIs) और कॉलेज/विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए ऑन-साइट इंटर्नशिप आयोजित की। OSTIs ने दूरदराज के क्षेत्रों के छात्रों को मानवाधिकार के दूत बनने का प्रशिक्षण दिया।

आयोग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय रूप से मानवाधिकारों की रक्षा और संवर्धन में योगदान दे रहा है, जिसमें एशिया पैसिफिक फोरम, GANHRI, और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद शामिल हैं।

आयोग ने मानवाधिकारों की जागरूकता बढ़ाने के लिए फोटोग्राफी और लघु फिल्म प्रतियोगिताएं, सार्वजनिक प्रकाशन, और HRCNet पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन शिकायत प्रणाली जैसी पहलें की हैं। पिछले वर्ष, मानवाधिकारों पर लघु फिल्म प्रतियोगिता में 303 प्रविष्टियां प्राप्त हुईं। आयोग ने चार नए प्रकाशन भी जारी किए।

स्थापना दिवस समारोह और राष्ट्रीय सम्मेलन का लाइव प्रसारण YouTube और Webcast पर उपलब्ध होगा।

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