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लंबे समय तक मोबाइल के इस्तेमाल से याददाश्त, एकाग्रता और मूड पर नकारात्मक असर पड़ता है-डॉ. युगल

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जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम थकान, तनाव और चिड़चिड़ापन भी बढ़ा देता है

शिशु संस्कार में बच्चों-अभिभावकों को मोबाइल लत से बचाने जागरूकता कार्यक्रम

महासमुंद- आस्था वेलफेयर सोसायटी महासमुंद ने शिशु संस्कार स्कूल महासमुंद के साथ मिलकर कल शनिवार को शाला में मोबाइल नशे के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रम अंतर्गत पोस्टर प्रतियोगिता,पोस्टर प्रदर्शनी समेत मोबाइल के उपयोग को लेकर एक कार्यशाला का आयेजन किया गया जिसमें बच्चों तथा उनके पालकों ने भी हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम मिडिल स्कूल के बच्चों को लिए आयेजित था। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सोहम अस्पताल के डायरेक्टर डॉक्टर युगल चंद्राकर थे। अध्यक्षता स्कूल के संचालक पारस चोपड़ा था। विशेष अतिथि तथा वक्ता के रूप में पुलिस विभाग से चित्रलेखा नवरंगे, समाज कल्याण विभाग से अनिल कोसरिया, पत्रकारों की ओर से उत्तरा विदानी, आस्था संस्था की ओर से तारिणी चंद्राकर व साथी तथा प्राचार्य अवनीश वाणी उपस्थित थे।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। पश्चात कार्यक्रम के अध्यक्ष अतिथि पारस चोपड़ा ने कहा कि बच्चे और पालक दोनों को स्कूल के नियमों का पालन करते हुए बच्चे के उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए। बच्चे में यदि किसी भी तरह की लत देखें तो पालक तत्काल एक्टिव हो जाएं और बच्चे को शांत मन से उस लत से छुटकारे की पहल करें। यदि शिक्षकों के सहयोग की जरूरत पड़े तो स्कूल पहुंचकर शिक्षकों से सहयोग लें। अपने बच्चे को नित्य प्रति स्कूल भेजें और अपने बच्चे के हर एक्टिविटीज पर ध्यान दें।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉक्टर युगल चंद्राकर ने बच्चों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया कि मोबाइल किस तरह हमारे दिमाग पर असर करता है। उन्होंने बताया कि आज के समय में मोबाइल  फोन बच्चों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। स्कूल से घर तक खेलकूद से पढ़ाई तक, सब कुछ अब स्क्रीन के इर्द-गिर्द घूमने लगा है। कहा कि रिसर्च से पता चलता है कि मोबाइल की गलत आदतें बच्चों के दिमाग और ग्रोथ को कमजोर कर रही हैं। उन्होंने सरल भाषा में बताया कि मोबाइल के बुरे प्रभाव कौन-कौन से हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है।

उन्होंने उपस्थित बच्चों और पालकों को बताया कि बच्चों के स्क्रीन टाइम यानी मोबाइल डिवाइस पर बिताया गया समय उनके दिमाग की ग्रोथ, ध्यान, याददाश्त और व्यवहार पर असर डाल सकता है। एक बड़ी समीक्षा में यह पाया गया है कि मोबाइल और डिजिटल तकनीक बच्चों के दिमाग के प्रि.फ्रंटल कॉर्टेक्स हिस्से को प्रभावित करती है, जो एक्जीक्यूटिव फंक्शन्स जैसे कि प्लान बनाना, निर्णय लेना और ध्यान बनाए रखना आदि को कंट्रोल करता है। लगातार मोबाइल फ ोन का इस्तेमाल दिमाग की फोकस क्षमता को कमजोर करता है। ब्लू लाइट नींद की गुणवत्ता बिगाड़ती है और लंबे समय तक इस्तेमाल से याददाश्त, एकाग्रता और मूड पर नकारात्मक असर पड़ता है। जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम थकान, तनाव और चिड़चिड़ापन भी बढ़ा देता है।

समाज कल्याण विभाग से अनिल कोसरिया ने बताया कि बच्चों को मोबाइल से जो नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई कतई संभव नहीं है। सबसे जरूरी बच्चों को मोबाइल की लत से छुटकारा है। अब हालात क्फी बिगड़ चुका है ऐसे में हमें खासकर पालकों को बच्चे तमाम गतिविधियों पर नजर रखते हुए उनके साथ स्नेह से पेश आने की जरूरत है।

स्कूल के प्राचार्य अवनीश वाणी ने बच्चों को बताया कि मोबाइल भस्मासुर है। वह जिस किसी के हाथ में आता है, वह अपना आपा खो देता है। उन्होंने शिवजी और भस्मासुर वाली अध्याय को जोडक़र बच्चों के बीच प्रस्तुत करते कहा कि मोबाइल देखना गलत नहीं है. उसे आदत में शामिल करना गलत है। जब वह हमारी आदत में शामिल हो जाता है तो हमारा नींद, चैन सब कुछ छीन लेता है और यहांत क हम आत्महत्या तक की बात सोच लेते हैं। उन्होंने गाजियाबाद में तीन बहनों की आत्महत्या का जिक्र करते हुए कहा कि जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं होता। आपके हाथ में रहने वाले मोबाइल फोन आपसे स्मार्ट कभी नहीं हो सकता। हमारा हर बच्चा मोबाइल से कहीं अधिक स्मार्ट है लेकिन दु:खद यह है कि बच्चा खुद के बजाय मोबाइल को स्मार्ट समझकर उससे दोस्ती कर लेता है। वह आपका दोस्त नहीं है। वह सिर्फ भस्मासुर है।  

पुलिस विभाग से चित्रलेखा नवरंगे ने बच्चों को बताया कि किस तरह बच्चे मोबाइल के आदी होकर छोटे-बड़े अपराध कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब तो शराब, जुआ, सिगरेट से अधिक मोबाइल के चलते गैरकानूनी काम हो रहा है। जिले के कई बच्चे मोबाइल के लत में फंसकर ही गैर कानूनी काम कर रहे ह। लिहाजा पुलिस विभाग ने स्कूलों में जाकर बच्चों को अन्य नशे की तरह मोबाइल के नशे से छुटकारे के लिए भी जागरुकता कार्यक्रम चला रही है।

समाजसेवी तारिणी चंद्राकर ने कहा कि अब समय आ गया है कि बच्चों के  ळिए खास पहल किया जाए। बच्चों के बच्चों को माता पिता साथ मिले, यह उनका अधिकार है। जब बच्चे अकेले महसूस करते हैं तो तरह-तरह के लत की ओर झुकाव हो जाता है। जो बड़े बुजुर्ग है, वे भी तब ही बच्चों पर ध्यान देना शुरू करते हैं जब उनका बच्चा किसी न किसी नशे तरह की लत में धंस चुका होता है। ऐसे में बच्चों का असामाजिक होना स्वाभाविक है। जिस समाज में मां बाप भाई बहन समाज के लोग होते हैं, वे ही खुद बच्चों पर ध्यान नहीं देते और बच्चे के संतुलन खो जाने पर उसे असामजिक कहते हैं।

पत्रकार उत्तरा विदानी ने कहा कि पालकों ने खुद ही बच्चों को समय देना छोड़ दिया है और चाहते हैं कि उनका बच्चा आगे जाकर समाज और परिवार का नाम रौशन करे। जबकि हर पालक को अपने बच्चे का बेस्ट दोस्त बन जाना चाहिए। पालक स्कूल के भरोसे अपने बच्चे को छोडक़र खुद ही मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। बच्चा अकलेपन से ऊबकर मोबाइल से दोस्ती कर लेता है। उसका बुझा हुआ दिमाग मोबाइल से दोस्ती कर लेता है और जो दशा है वह साफ है। हर बच्चा अपने मां बाप और गुरुजनों से सीखता है। गुरू तो श्रृष्टि के शुरुआत से ही समाज निर्माण का कर्तव्य निभा रहा है लेकिन समय बजल चुका है। मोबाइल के प्रवेश के बाद पालकों ने लगभग अपनी जिम्मेदारी खत्म कर दी है। ऐसे में सिर्फ गुरुओं से ही श्रेष्ठ समाज की कल्पना बेईमानी है। पालकों को अपने बच्चे के साथ बच्चा बनना पड़ेगा। सच मानिये कि अपने बच्चे से बढिय़ा दोस्त कोई नहीं हो सकता।

इस दौरान बच्चों के लिए पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता भी हुई जिसमें प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ स्थान प्राप्त बच्चों को सोहम हास्पीटल तथा आस्था वेलफेयर संस्था की ओर से पुरस्कार दिया गया। कार्यक्रम का संचालन तारिणी चंद्राकर भावना बजाज ने किया। इस अवसर पर आस्था संस्था से निरंजना, अर्चना, जय शोभा शर्मा, तुषार चंद्राकर तथा स्कूल स्टाफ मौजूद थे।

महिला मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा: भारत सरकार की बहुआयामी पहल

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“जन स्वास्थ्य और स्वच्छता; अस्पताल और डिस्पेंसरी’’ भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में शामिल है, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य भी आता है। इसलिए, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, अस्पतालों, सामुदायिक देखभाल और पुनर्वास की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की है।

फिर भी, भारत सरकार राज्य सरकारों का समर्थन करती है और एक व्यापक, बहु-आयामी और समन्वित दृष्टिकोण अपनाती है, जो अधिकार आधारित मानसिक स्वास्थ्य देखभाल, टेली-मेंटल हेल्थ सेवा, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श, कार्यस्थल सुरक्षा उपाय, लिंग-संवेदनशील कानून प्रवर्तन इंटरफेस और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण कार्यक्रमों को जोड़ती है। इन पहलों का उद्देश्य महिलाओं में तनाव को रोकना, कम करना और प्रबंधित करना है।

मुख्य पहल और कार्यक्रम:

  1. केन्द्रीय मार्गदर्शन और प्रशिक्षण:

    • केंद्रीय कर्मचारियों के लिए डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल एंड ट्रेनिंग (DoPT) के तहत यौन उत्पीड़न रोकथाम, लिंग-संवेदनशीलता, लचीले कार्य समय और आंतरिक शिकायत तंत्र के दिशा-निर्देश।

  2. आपातकालीन सहायता और सुरक्षा:

    • महिला हेल्पलाइन (181), बाल हेल्पलाइन (1098), और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली ERSS-112।

    • ज़ीरो FIR और ई-FIR जैसी सुविधा।

  3. कानूनी और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा:

    • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017: आत्महत्या के प्रयास को अपराधमुक्त करना, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों का पंजीकरण और निगरानी।

    • राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) और जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP) के तहत 767 जिलों में सेवाएँ।

    • 1.81 लाख प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप-स्वास्थ्य केंद्रों को आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में अपग्रेड किया गया।

    • टेली-मेंटल हेल्थ कार्यक्रम Tele-MANAS: 53 सेल्स, 20 भाषाओं में सेवा, 29.82 लाख कॉल्स।

  4. महिला सुरक्षा और सहायता:

    • मिशन शक्ति के तहत One Stop Centres (OSC): 864 OSCs, 12.67 लाख महिलाओं को सहायता।

    • महिला हेल्प डेस्क: 14,649 पुलिस स्टेशनों में, महिला अधिकारियों द्वारा संचालित।

    • SHe-Box पोर्टल: कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों के लिए केंद्रीय मंच।

  5. सुरक्षित कार्यस्थल और रोजगार:

    • चार श्रम संहिता (वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल सुरक्षा और स्वास्थ्य) लागू।

    • समान कार्य के लिए समान वेतन, रात की शिफ्ट और खतरनाक काम में महिलाओं की अनुमति सुरक्षित वातावरण के तहत।

    • कार्यदिवस 8 घंटे और 48 घंटे प्रति सप्ताह, ओवरटाइम स्वीकृति और दोगुना वेतन।

    • निःशुल्क वार्षिक स्वास्थ्य जांच।

  6. सामाजिक-सामर्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण:

    • कौशल भारत, उद्यमिता और जीविका कार्यक्रम।

    • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, वित्तीय समावेशन, माइक्रोक्रेडिट और स्वयं-सहायता समूह।

इन सभी पहलों को राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर लागू किया जाता है, जो स्वास्थ्य सेवा वितरण के मुख्य एजेंट हैं। केंद्र सरकार नीति मार्गदर्शन, क्षमता निर्माण, तकनीकी दिशा-निर्देश, वित्तीय सहायता, अंतर-मंत्रालय समन्वय और निगरानी के माध्यम से समर्थन देती है।

इन उपायों का उद्देश्य महिलाओं में तनाव को रोकना और कम करना, समय पर मानसिक स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करना, हिंसा और उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करना और महिलाओं की गरिमा, लचीलापन और कल्याण को बढ़ावा देना है।

सूचना स्रोत: मंत्री राज्य महिला एवं बाल विकास, सवित्री ठाकुर, लोकसभा में आज दिए गए उत्तर के अनुसार।

मानसिक स्वास्थ्य: एक समग्र दृष्टिकोण – भारत में पहल, चुनौतियाँ और प्रगति

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मानसिक स्वास्थ्य केवल खुश या अच्छे मूड में रहने का नाम नहीं है — यह हमारे मानसिक-भावनात्मक, सामाजिक, संज्ञानात्मक और शारीरिक क्षमताओं का सम्मिलन है। जीवन की चुनौतियों का सामना करना और उसे पूरी तरह जी पाना तभी संभव है जब हम अपने मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य मानव अधिकारों का एक बुनियादी हिस्सा है और यह व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। कोविड-19 महामारी ने वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को और अधिक उजागर किया है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य

WHO के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ दुनिया भर में विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक हैं। 2021 में अनुमानित 1.1 अरब लोग किसी न किसी मानसिक विकार से ग्रसित थे। भारत में लगभग हर 100 में से 11 लोग मानसिक स्वास्थ्य विकारों से प्रभावित हैं।

‘सतत विकास लक्ष्यों (SDGs)’ के लक्ष्य 3 में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज और मानसिक स्वास्थ्य के संवर्धन का विशेष उल्लेख है। अवसाद और चिंता विकार विशेष रूप से युवाओं (15-29 वर्ष) में प्रमुख रूप से देखे जाते हैं।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015–16) के अनुसार:

  • 10.6% भारतीय वयस्क किसी न किसी मानसिक विकार से पीड़ित हैं।

  • 15% आबादी को मानसिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

  • मानसिक विकार शहरी क्षेत्रों (13.5%) में ग्रामीण क्षेत्रों (6.9%) की तुलना में अधिक हैं।

  • महिलाएँ (20%) पुरुषों (10%) की तुलना में अधिक प्रभावित होती हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB, 2023) के अनुसार, भारत में 2023 में 1,71,418 आत्महत्याएँ दर्ज की गईं, जिनमें 72.8% पुरुष और 27.2% महिलाएँ थीं।

उपचार अंतर (Treatment Gap)

2015–16 के NIMHANS सर्वेक्षण ने दिखाया कि 70% से 92% मानसिक रोगियों को उचित उपचार नहीं मिल पाता — इसका मुख्य कारण है जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और विशेषज्ञों की कमी।
WHO के अनुसार, प्रति 1 लाख जनसंख्या पर कम से कम 3 मनोचिकित्सक होने चाहिए, जबकि भारत में केवल 0.75 मनोचिकित्सक प्रति 1 लाख हैं।

मानसिक स्वास्थ्य का प्रभाव

शारीरिक प्रभाव: अवसाद से ग्रसित लोगों में हृदय रोग का जोखिम 72% तक बढ़ जाता है (Lancet Psychiatry, 2025)।
आर्थिक प्रभाव: अवसाद और चिंता वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल लगभग 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की उत्पादकता हानि पहुँचाते हैं।
सामाजिक प्रभाव: सामाजिक अलगाव, संबंधों में तनाव, और भेदभाव के कारण मानसिक स्वास्थ्य और अधिक बिगड़ता है।

सामाजिक कलंक और आत्महत्या जोखिम

मानसिक रोगों से जुड़ा कलंक (stigma) इलाज में सबसे बड़ी बाधा है। WHO (2025) के अनुसार, हर साल 7 लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं। मानसिक रोगियों में आत्महत्या का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में 16 गुना अधिक होता है।

युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य संकट

WHO के अनुसार, आधे से अधिक मानसिक विकार 14 वर्ष की आयु तक और 75% 24 वर्ष की आयु तक शुरू हो जाते हैं। किशोरावस्था में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ शैक्षणिक प्रदर्शन, नशे की प्रवृत्ति और आत्म-हानि से जुड़ी होती हैं।

कोविड-19 और मानसिक स्वास्थ्य

महामारी के दौरान चिंता, अवसाद, और अकेलेपन के मामलों में तेजी आई। WHO ने पाया कि महामारी के बाद चिंता विकारों में 25% वृद्धि हुई।

भारत सरकार की पहलें

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) – 1982

  • उद्देश्य: मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली में एकीकृत करना।

  • 1996 में जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP) के रूप में विस्तारित किया गया — अब यह 767 जिलों को कवर करता है।

राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (NSPS) – 2022

  • लक्ष्य: 2030 तक आत्महत्या दर में 10% की कमी लाना।

  • प्रमुख उपाय: स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य जांच, हेल्पलाइन, और जागरूकता अभियान।

आयुष्मान भारत और मानसिक स्वास्थ्य

  • 1.75 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई गई हैं।

  • PM-JAY योजना के तहत मानसिक रोगों के लिए प्रति परिवार ₹5 लाख तक का बीमा कवरेज।

  • टेली-मानस (Tele-MANAS) के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की टेलीफोनिक पहुँच।

टेली-मानस हेल्पलाइन: 14416 / 1800-891-4416

  • अक्टूबर 2025 तक 28 लाख से अधिक कॉल्स हैंडल की गईं।

  • WHO ने इसे एक नवोन्मेषी और प्रभावी मॉडल के रूप में मान्यता दी है।

वैश्विक नीतिगत पहलें

WHO की "Comprehensive Mental Health Action Plan 2013–2030" का उद्देश्य है —

  • समुदाय-आधारित देखभाल को बढ़ावा देना

  • मानसिक स्वास्थ्य को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) में एकीकृत करना

  • सामाजिक परिवेश में सुधार और डिजिटल समाधान का उपयोग

आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25 की सिफारिशें

  • विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को सशक्त बनाना

  • कार्यस्थलों पर तनाव और थकान से निपटने के लिए नीतियाँ लागू करना

  • Tele-MANAS और AI-आधारित समाधान को बढ़ावा देना

निष्कर्ष

मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास का मुद्दा है। भारत ने Tele-MANAS, NMHP, और Ayushman Bharat जैसी पहलों के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति की है।
फिर भी, जागरूकता बढ़ाना, विशेषज्ञों का प्रशिक्षण, और सामाजिक कलंक को समाप्त करना जरूरी है ताकि हर भारतीय को सुलभ, समावेशी और गरिमामय मानसिक स्वास्थ्य सेवा मिल सके।


राष्ट्रीय होम्योपैथी अनुसंधान संस्थान, कोट्टायम में दो दिवसीय राष्ट्रीय होम्योपैथी सम्मेलन आयोजित

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कोट्टायम- राष्ट्रीय होम्योपैथी अनुसंधान संस्थान मानसिक स्वास्थ्य (NHRIMH), कोट्टायम, जो कि केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (CCRH), आयुष मंत्रालय के अंतर्गत एक शीर्ष संस्थान है, ने विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2025 के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय होम्योपैथी सम्मेलन का आयोजन किया। 

सम्मेलन का केंद्रीय विषय था:‘सेवाओं तक पहुँच–आपदाओं और आपात स्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य’।

सम्मेलन में देशभर से होम्योपैथी और मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रमुख विशेषज्ञ, शोधकर्ता और चिकित्सक शामिल हुए। इसमें विशेष रूप से मनोवैज्ञानिक आपात स्थितियों में होम्योपैथी की बढ़ती भूमिका, नवाचार आधारित अनुसंधान और समग्र मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के तरीकों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

उद्घाटन सत्र में देशभर के गणमान्य व्यक्तियों और विशेषज्ञों ने भाग लिया। डॉ. सुभाष कौशिक, महानिदेशक, CCRH, नई दिल्ली, ने वर्चुअल संबोधन में कहा कि होम्योपैथी को पोस्ट-डिजास्टर पुनर्वास और लचीलापन बढ़ाने के कार्यक्रमों में समाहित करना आवश्यक है, और यह वैज्ञानिक शोध पर आधारित होना चाहिए।

चेतन कुमार मीना, IAS, कलेक्टर कोट्टायम ने मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम में भाग लिया। उन्होंने NHRIMH के समग्र मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में योगदान की सराहना की और कहा कि होम्योपैथी को आपदा प्रतिक्रिया रणनीतियों में शामिल करना मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करेगा।

डॉ. देबदत्त नायक, सहायक निदेशक (H) एवं संस्थान प्रभारी, ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने सम्मेलन के वैश्विक महत्व और आपदाओं एवं आपात स्थितियों में सुलभ मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता पर जोर दिया।

डॉ. आर. सितार्थन, प्राचार्य, NHRIMH, ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत कर सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजन टीम को सफलता में योगदान देने के लिए आभार व्यक्त किया।

पहले दिन के वैज्ञानिक सत्रों में निम्नलिखित विषयों पर चर्चा हुई:

  • आपदा मानसिक स्वास्थ्य: अनुभव और उभरते रुझान

  • हाइड्रोलॉजिकल आपदाओं में मानसिक स्वास्थ्य संकट: वायनाड, केरल में समुदाय आधारित प्रबंधन

  • आपदा प्रबंधन में होम्योपैथिक दृष्टिकोण

  • संकट स्थितियों में लचीलापन

  • N-of-1 ट्रायल्स और होम्योपैथी में ट्रांसलेशनल नेटवर्क

  • ADHD में भावनात्मक असंतुलन और होम्योपैथिक उपचार

दूसरे दिन के सत्रों में चर्चा हुई:

  • मानसिक स्वास्थ्य अनुसंधान में पद्धतिगत ढाँचे

  • नैदानिक और प्रयोगशाला आधारित मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन

  • आघात और मानसिक आपात स्थितियों में मानव प्रतिक्रिया

  • PTSD, ADHD, ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, साइकॉटिक डिसऑर्डर्स, और मादक पदार्थ वापसी पर केस-आधारित अध्ययन

  • तीव्र मानसिक लक्षणों के प्रबंधन में व्यक्तिगत होम्योपैथिक उपचार पर प्रस्तुति

NHRIMH के स्नातकोत्तर प्रशिक्षुओं ने बाइपोलर डिसऑर्डर, इंटरनेट एडिक्शन, सिज़ोफ्रेनिया, मेजर डिप्रेशन, OCD, शराब और गांजा उपयोग विकार, ऑटिज़्म, पार्किंसंस रोग सहित विभिन्न मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों पर शोध प्रस्तुत किया।

अन्य प्रमुख प्रतिभागियों में डॉ. के.सी. मुरलीधरन, सहायक निदेशक (H), CCRH, नई दिल्ली, ने समुदाय आधारित मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में होम्योपैथी की बढ़ती भूमिका और अंतर्विषय सहयोग की आवश्यकता पर विशेष संबोधन दिया। डॉ. सी.टी. अरविंद कुमार, महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, कोट्टायम के कुलपति, ने सम्मेलन का उद्घाटन किया और संकट एवं आपातकालीन परिस्थितियों में समग्र और व्यक्ति-केंद्रित मानसिक स्वास्थ्य समर्थन प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

दो दिवसीय सम्मेलन का समापन सफलतापूर्वक हुआ। प्रतिभागियों ने अकादमिक संवाद में भाग लेने और आपातकालीन मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में होम्योपैथी की संभावनाओं को जानने के अवसर की सराहना की।

सम्मेलन ने साक्ष्य-आधारित, समग्र और सुलभ मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता को दोहराया और मानसिक स्वास्थ्य एवं आपदा प्रबंधन में होम्योपैथी की सहायक भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।


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