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‘मेक इन इंडिया’ की बड़ी उपलब्धि: भारत में विकसित बीम कैचर जर्मनी के अंतरराष्ट्रीय मेगा साइंस प्रोजेक्ट FAIR पहुंचा

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नई दिल्ली- भारत की वैज्ञानिक एवं इंजीनियरिंग क्षमता को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली है। भारत में डिजाइन और निर्मित बीम कैचर (Beam Catcher) उपकरण की पहली इकाई जर्मनी के अंतरराष्ट्रीय मेगा साइंस प्रोजेक्ट ‘फैसिलिटी फॉर एंटीप्रोटॉन एंड आयन रिसर्च (FAIR)’ में पहुंच गई है। यह उपकरण अब स्थापना की प्रतीक्षा में है और परियोजना के सुपर फ्रैगमेंट सेपरेटर (Super-FRS) का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा, जो रेडियोधर्मी आयन बीम तैयार करने में अहम भूमिका निभाएगा।

बीम कैचर को सीएसआईआर-केंद्रीय यांत्रिक अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (CSIR-CMERI), दुर्गापुर ने डिजाइन किया है। इसका विकास बोस संस्थान, कोलकाता के मार्गदर्शन में किया गया, जो FAIR परियोजना में भारत की वैज्ञानिक भागीदारी का प्रमुख समन्वयक संस्थान है।

यह उपकरण उच्च-ऊर्जा भारी आयन बीम के अवशेषों को सुरक्षित रूप से अवशोषित करने के लिए बनाया गया है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती अत्यधिक ऊर्जा और तापमान को नियंत्रित करना है। इसके लिए इसमें फाइन-ग्रेन्ड ग्रेफाइट और उच्च-शुद्धता वाले तांबे से बने अवशोषक लगाए गए हैं, जिन्हें पिघलने से बचाने के लिए जल-शीतलन (Water Cooling) प्रणाली से लैस किया गया है। पूरा सिस्टम उच्च वैक्यूम तकनीक, सटीक मोटराइज्ड मूवमेंट और रेडियोधर्मिता से सुरक्षा के लिए विशेष आयरन शील्डिंग से युक्त है।

भारत 4 अक्टूबर 2010 को जर्मनी के विस्बाडेन में समझौते पर हस्ताक्षर कर FAIR परियोजना का संस्थापक सदस्य बना था। जर्मनी के डार्मस्टाट में बन रही यह विश्वस्तरीय कण त्वरक (Particle Accelerator) सुविधा दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परियोजनाओं में से एक मानी जाती है। इसमें भारत का योगदान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) और परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित किया जा रहा है।

FAIR परियोजना में भारत केवल बीम कैचर ही नहीं, बल्कि 58 अल्ट्रा हाई वैक्यूम चैंबर, 932 किलोमीटर विशेष आईटी एवं डायग्नोस्टिक केबल, और 524 अल्ट्रा-स्टेबल पावर कन्वर्टर जैसी महत्वपूर्ण तकनीकी प्रणालियां भी उपलब्ध करा रहा है। इन उपकरणों का निर्माण बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और कानपुर की भारतीय कंपनियों द्वारा किया गया है। इसके अलावा वडोदरा की INOXCVA ने भी क्रायोजेनिक उपकरणों की आपूर्ति कर परियोजना में योगदान दिया है।

FAIR परियोजना के तहत भारतीय वैज्ञानिक न्यूक्लियर स्ट्रक्चर एंड एस्ट्रोफिजिक्स (NuSTAR) तथा कम्प्रेस्ड बैरियोनिक मैटर (CBM) जैसे अत्याधुनिक प्रयोगों के लिए उन्नत डिटेक्टर प्रणालियों का भी विकास कर रहे हैं।

बोस संस्थान के मार्गदर्शन में भारतीय उद्योगों की भागीदारी ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को वैश्विक स्तर पर मजबूती दे रही है। इस परियोजना से भारतीय कंपनियों की तकनीकी क्षमता अंतरराष्ट्रीय मानकों तक पहुंच रही है, जिससे भविष्य में ITER, CERN, TMT, SKA और LIGO जैसी वैश्विक मेगा साइंस परियोजनाओं में भारत की भूमिका और मजबूत होने की उम्मीद है।


केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने BIRAC–RDI फंड के तहत पहली राष्ट्रीय कॉल की घोषणा की, जैव प्रौद्योगिकी नवाचार को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम

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केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज BIRAC–RDI फंड के तहत पहली राष्ट्रीय कॉल की घोषणा की, जो सरकार के ₹1 लाख करोड़ के अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) पहल के तहत उच्च प्रभाव वाली जैव प्रौद्योगिकी नवाचारों को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि यह पहल विज्ञान आधारित विकास के प्रति भारत के दृष्टिकोण में निर्णायक बदलाव को दर्शाती है और यह संकेत देती है कि भारत अब उभरती तकनीकों में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

डॉ. सिंह ने कहा कि पिछले दशक में भारत जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नीति संकोच से नीति तेज़ी की ओर बढ़ा है। उन्होंने बताया कि 2014 में लगभग 50 बायोटेक स्टार्टअप से बढ़कर आज 11,000 से अधिक हो गए हैं, जो इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विस्तार को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी अगली औद्योगिक क्रांति का प्रमुख चालक बनेगी और भारत पहले ही अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी जैसे उभरते क्षेत्रों में प्रवेश कर चुका है।

बीआईआरएसी के प्रबंध निदेशक डॉ. जितेंद्र कुमार ने बताया कि BIRAC–RDI फंड के तहत अगले पांच वर्षों में ₹2,000 करोड़ का निवेश किया जाएगा। भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2012 में 28 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 165.7 अरब डॉलर हो गई है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 300 अरब डॉलर और 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर करना है।

इस फंड के तहत स्टार्टअप, एसएमई और उद्योग भागीदार 31 मार्च 2026 तक आवेदन कर सकते हैं।



“भारत टैक्सी” बनी देश की पहली सहकारी राइड-हेलिंग सेवा, ड्राइवर होंगे मालिक और भागीदार

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नई दिल्ली- सहकारिता मंत्रालय ने सहकारी संस्थाओं को रोजगार सृजन, सामाजिक सुरक्षा और जमीनी स्तर पर आर्थिक भागीदारी का सशक्त माध्यम बनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। इसी दिशा में “भारत टैक्सी” को मोबिलिटी सेक्टर में एक परिवर्तनकारी पहल के रूप में शुरू किया गया है।

“भारत टैक्सी” भारत का पहला सहकारी नेतृत्व वाला राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म है, जिसमें ड्राइवरों (जिन्हें सारथी कहा जाता है) को स्वामित्व, शासन और मूल्य सृजन के केंद्र में रखा गया है। यह मॉडल निवेश-आधारित एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म के बजाय एक स्वदेशी और टिकाऊ विकल्प प्रदान करता है।

शून्य कमीशन मॉडल पर आधारित

भारत टैक्सी को 6 जून 2025 को सहकारिता क्षेत्र में कार्यरत 8 राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसायटी एक्ट, 2002 के तहत पंजीकृत किया गया। यह प्लेटफॉर्म शून्य कमीशन मॉडल पर काम करता है, जिसमें लाभ सीधे ड्राइवरों को वितरित किया जाता है।

कहां-कहां चल रही सेवा

फिलहाल भारत टैक्सी सेवा दिल्ली NCR (दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा) और गुजरात के अहमदाबाद, राजकोट, सोमनाथ और द्वारका में संचालित है।

  • 9.9 लाख से अधिक पंजीकृत ग्राहक

  • 3 लाख से ज्यादा पंजीकृत ड्राइवर

  • 2.9 लाख से अधिक राइड्स पूरी

2029 तक चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में सेवा शुरू करने की योजना है।

कोई प्लेटफॉर्म फीस नहीं

फिलहाल यात्रियों और ड्राइवरों से कोई सुविधा शुल्क, प्लेटफॉर्म फीस या कमीशन नहीं लिया जा रहा है। हालांकि, एयरपोर्ट प्रीपेड बूथ पर संचालन खर्च के लिए 7% सेवा शुल्क लगाया जाता है।

ड्राइवरों के लिए सामाजिक सुरक्षा

भारत टैक्सी ड्राइवरों के लिए स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, रिटायरमेंट बचत और ड्राइवर सपोर्ट सिस्टम जैसी सुविधाओं को प्राथमिकता देता है। दिल्ली में 7 स्थानों पर सहायता केंद्र संचालित किए जा रहे हैं।
ड्राइवरों को अन्य प्लेटफॉर्म पर काम करने की भी स्वतंत्रता है।

महिला सशक्तिकरण पहल

“बाइक दीदी” पहल के तहत 150 से अधिक महिला ड्राइवरों को प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है, जिससे महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिल रहा है।

भविष्य की योजना

भारत टैक्सी सभी राज्यों और शहरों में विस्तार, हर राज्य में सहायता केंद्र, ड्राइवर सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ एकीकृत मोबिलिटी इकोसिस्टम बनाने की योजना पर काम कर रही है।

यह जानकारी केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में लिखित उत्तर में दी।


भारतीय विज्ञान सम्मेलन 2025: डॉ. जितेंद्र सिंह बोले—भारत ने परंपरा और आधुनिक तकनीक के बीच सफल सेतु स्थापित किया

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तिरुपति स्थित राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित भारतीय विज्ञान सम्मेलन 2025 के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय से संबद्ध मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत ने परंपरा और आधुनिकता के बीच सफल सेतु स्थापित किया है। उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी मूल सभ्यतागत मूल्यों को संरक्षित रखते हुए अत्याधुनिक तकनीकों को अपनाया है, जिसका अंतिम उद्देश्य आम नागरिक के जीवन को सुगम बनाना है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते एक दशक में भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरा है। यह परिवर्तन शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के निर्णायक नीतिगत समर्थन के कारण संभव हो सका है।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 के बाद से विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को अभूतपूर्व नीतिगत प्राथमिकता और बजटीय सहयोग मिला है। लंबे समय से चली आ रही बाधाओं को दूर किया गया, जिससे भारत की वैज्ञानिक क्षमता को नई दिशा मिली। उन्होंने कहा कि देश में प्रतिभाओं की कभी कमी नहीं थी, लेकिन अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव था, जिसे अब निर्णायक रूप से संबोधित किया गया है।

भारत के नवाचार परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए मंत्री ने कहा कि 2014 में जहां स्टार्टअप्स की संख्या 300–400 के आसपास थी, वहीं आज यह संख्या लगभग 2 लाख तक पहुंच गई है, जिससे भारत दुनिया के शीर्ष तीन स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल हो गया है। उन्होंने बताया कि ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भारत की रैंक 81 से सुधरकर 38 हो गई है और पेटेंट दाखिल करने में भारत विश्व में छठे स्थान पर है, जिनमें से आधे से अधिक पेटेंट भारतीय नागरिकों द्वारा दायर किए जा रहे हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने अंतरिक्ष और सामरिक प्रौद्योगिकियों में भारत की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि चंद्र मिशनों के माध्यम से चंद्रमा पर जल की पुष्टि और दक्षिणी ध्रुव के निकट सफल लैंडिंग ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने कहा कि स्वदेशी रक्षा विनिर्माण में भी भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है और रक्षा निर्यात बढ़कर ₹23,662 करोड़ तक पहुंच गया है, जिससे भारत के रक्षा उत्पाद लगभग 100 देशों तक पहुंच रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हाल के वैश्विक घटनाक्रमों के दौरान भारत की स्वदेशी मिसाइल और रक्षा तकनीकों ने अपनी विश्वसनीयता और क्षमता सिद्ध की है, जिससे अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ी है। यह उपलब्धियां पिछले एक दशक में परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और उन्नत अनुसंधान में किए गए सतत निवेश का परिणाम हैं।

स्वास्थ्य क्षेत्र पर बोलते हुए मंत्री ने कहा कि भारत आज निवारक स्वास्थ्य सेवाओं और किफायती चिकित्सा समाधानों में वैश्विक अग्रणी बन चुका है। कोविड-19 वैक्सीन के विकास और वैश्विक आपूर्ति से लेकर अरबों डॉलर के चिकित्सा उपकरणों और इम्प्लांट्स के निर्यात तक, भारत की स्वास्थ्य नवाचार प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसा और मान्यता मिली है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह भी बताया कि वैज्ञानिक शोध और प्रकाशनों के क्षेत्र में भारत अब विश्व में चौथे स्थान पर है, जबकि साइटेशन प्रभाव में भारत तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है, जो शोध की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में प्रगति को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि आज भारत में विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि स्मार्ट सिटी, टेलीमेडिसिन, सैटेलाइट संचार, जियो-टैगिंग और डिजिटल गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों के माध्यम से आम जनजीवन को आसान बना रहा है। अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, डीप ओशन मिशन, हिमालयी अनुसंधान और अरोमा मिशन जैसे राष्ट्रीय मिशन आर्थिक विकास और युवाओं के उद्यमिता के लिए नए अवसर खोल रहे हैं।

मंत्री ने यह भी घोषणा की कि बीते एक दशक में विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रमों का बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है, ताकि वैज्ञानिक शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हो सके और प्रत्येक नागरिक वर्ष 2047 तक विकसित भारत की यात्रा में सहभागी बन सके।

इस उद्घाटन सत्र में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, वरिष्ठ वैज्ञानिक, शिक्षाविद और देशभर के वैज्ञानिक संस्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
भारतीय विज्ञान सम्मेलन 2025 का आयोजन 26 से 29 दिसंबर तक तिरुपति में किया जा रहा है, जिसमें भारत के विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के भविष्य के रोडमैप पर व्यापक मंथन किया जाएगा।

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