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वैज्ञानिकों ने विकसित किया दिमाग की तरह काम करने वाला ‘न्यूरोमॉर्फिक सेंसर’, नमी के अनुसार करेगा प्रतिक्रिया

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नई दिल्ली- भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसा अत्याधुनिक ‘न्यूरोमॉर्फिक सेंसर’ विकसित किया है, जो मानव मस्तिष्क की तरह पर्यावरणीय बदलाव—विशेष रूप से नमी (ह्यूमिडिटी)—के प्रति प्रतिक्रिया दे सकता है। यह सेंसर एक ही डिवाइस में जानकारी को महसूस (sensing), प्रोसेस (processing) और संग्रहित (storage) करने में सक्षम है, जिससे पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तुलना में ऊर्जा खपत और डेटा प्रोसेसिंग की जरूरत काफी कम हो सकती है।

आज के समय में बढ़ती ऊर्जा खपत और डेटा प्रोसेसिंग की चुनौतियों के कारण न्यूरोमॉर्फिक इलेक्ट्रॉनिक्स का महत्व तेजी से बढ़ रहा है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एज कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में।

जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR), जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है, के शोधकर्ताओं ने यह अनोखा सेंसर विकसित किया है। यह सेंसर 1D सुप्रामॉलिक्यूलर नैनोफाइबर्स पर आधारित है और एक ही प्लेटफॉर्म पर सेंसिंग तथा ‘सिनैप्स’ जैसी सूचना प्रोसेसिंग को एकीकृत करता है।

इस शोध की प्रेरणा मेंढक—विशेष रूप से क्रिकेट फ्रॉग—के व्यवहार से ली गई है, जो नमी और प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है। इसी तरह यह सेंसर भी नमी के स्तर में बदलाव के अनुसार प्रतिक्रिया देता है और पहले के संकेतों को “याद” भी रख सकता है।

शोधकर्ताओं तेजस्विनी एस. राव और सुकन्या बरुआह ने विशेष नैनोफाइबर्स विकसित कर इस डिवाइस को तैयार किया। इसे एक नियंत्रित नमी वाले वातावरण में परीक्षण किया गया, जहां विभिन्न स्तरों की नमी पर इसके व्यवहार का अध्ययन किया गया। सेंसर ने ‘सिनैप्टिक’ प्रतिक्रियाएं जैसे फेसीलिटेशन, डिप्रेशन और मेटाप्लास्टिसिटी प्रदर्शित कीं, जो मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से मेल खाती हैं।

इस सेंसर की खास बात यह है कि यह नमी के बदलाव को महसूस करने के साथ-साथ उसी समय उसे प्रोसेस और स्टोर भी कर सकता है। यह विशेषता इसे पारंपरिक सेंसर से अलग बनाती है, जहां ये तीनों कार्य अलग-अलग घटकों में होते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, “यह पहली बार है जब किसी न्यूरोमॉर्फिक डिवाइस में नमी को मुख्य संकेत के रूप में इस्तेमाल कर सिनैप्टिक व्यवहार को प्रदर्शित किया गया है।”

भविष्य में यह तकनीक स्मार्ट पर्यावरण निगरानी प्रणालियों, हेल्थकेयर डिवाइसेस, पहनने योग्य सेंसर (wearables) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एज कंप्यूटिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह नवाचार ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण के अनुकूल अगली पीढ़ी की तकनीकों के विकास में भी मददगार साबित होगा।

राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार 2026 के लिए नामांकन शुरू, वैज्ञानिकों को मिलेगा बड़ा सम्मान

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नई दिल्ली- भारत सरकार ने राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार (Rashtriya Vigyan Puraskar - RVP) 2026 के लिए नामांकन आमंत्रित किए हैं। यह प्रतिष्ठित पुरस्कार विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और नवप्रवर्तकों को सम्मानित करने के लिए दिया जाता है।

इन पुरस्कारों का संचालन सीएसआईआर (CSIR) के अंतर्गत RVP सचिवालय द्वारा किया जाता है, जिसकी अध्यक्षता भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार करते हैं।

पुरस्कार की श्रेणियां

RVP-2026 के तहत चार प्रमुख श्रेणियों में पुरस्कार दिए जाएंगे:

  • विज्ञान रत्न (Vigyan Ratna): जीवन भर के उत्कृष्ट योगदान के लिए

  • विज्ञान श्री (Vigyan Shri): विशेष योगदान के लिए

  • विज्ञान युवा-शांति स्वरूप भटनागर (VY-SSB): 45 वर्ष तक के युवा वैज्ञानिकों के लिए

  • विज्ञान टीम (Vigyan Team): 3 या अधिक सदस्यों की टीम को

 किस-किस क्षेत्र में नामांकन?

नामांकन कई क्षेत्रों में आमंत्रित हैं, जैसे:

  • कृषि विज्ञान

  • परमाणु ऊर्जा

  • जैव विज्ञान

  • रसायन विज्ञान

  • रक्षा प्रौद्योगिकी

  • पृथ्वी विज्ञान

  • इंजीनियरिंग

  • पर्यावरण विज्ञान

  • गणित एवं कंप्यूटर विज्ञान

  • चिकित्सा

  • भौतिकी

  • अंतरिक्ष विज्ञान

  • तकनीक एवं नवाचार

आवेदन प्रक्रिया

  • आवेदन ऑनलाइन किए जा सकते हैं

  • पोर्टल: https://awards.gov.in

  • शुरुआत: 28 मार्च 2026

  • अंतिम तिथि: 11 मई 2026

  •  स्व-नामांकन (Self-nomination) भी स्वीकार्य है

सरकार का दृष्टिकोण

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह पुरस्कार भारत में वैज्ञानिक उत्कृष्टता और नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रतीक है। उन्होंने संस्थानों और व्यक्तियों से योग्य उम्मीदवारों को नामांकित करने की अपील की।

यह पहल भारत को ‘विकसित भारत’ और वैश्विक ज्ञान नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


नई दिल्ली में ‘रायसीना साइंस डिप्लोमेसी इनिशिएटिव’ का पहला संस्करण आयोजित

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नई दिल्ली केभारत मंडपम में 5 मार्च 2026 को Raisina Science Diplomacy Initiative (SDI) का पहला संस्करण आयोजित किया गया। इस पहल को भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय और Observer Research Foundation (ORF) ने संयुक्त रूप से रायसीना डायलॉग  के अंतर्गत शुरू किया।

इस सम्मेलन में दुनिया भर के वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, कूटनीतिज्ञों और शोधकर्ताओं सहित लगभग 80 विशेषज्ञों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य बदलते वैश्विक परिदृश्य में विज्ञान कूटनीति (Science Diplomacy) की भूमिका और उभरती प्रौद्योगिकियों से जुड़ी शासन चुनौतियों पर चर्चा करना था।

इस पहल की अध्यक्षता भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद ने की। सह-अध्यक्ष के रूप में पीटर ग्लकमैन (अंतरराष्ट्रीय विज्ञान परिषद के अध्यक्ष), Marilyne Andersen (जिनेवा साइंस एंड डिप्लोमेसी एंटिसिपेटर की महानिदेशक) और Vijay Chauthaiwale (भारतीय जनता पार्टी के विदेश विभाग के प्रभारी) शामिल रहे।

उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने कहा कि आज के वैश्विक परिदृश्य में विज्ञान और प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय विकास, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, वैश्विक सुरक्षा और सामाजिक प्रगति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन गए हैं। समीर सरन, अध्यक्ष, ORF ने कहा कि रायसीना SDI को वैश्विक मंच के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां विज्ञान कूटनीति के समकालीन ढांचे पर चर्चा हो सके।

रणनीतिक स्वायत्तता के दौर में विज्ञान कूटनीति

पहली गोलमेज चर्चा “Science Diplomacy in the Era of Strategic Autonomy” विषय पर आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता Parvinder Maini ने की। चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं और विज्ञान की सहयोगात्मक प्रकृति के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। विशेषज्ञों ने भरोसेमंद वैज्ञानिक नेटवर्क, पारदर्शी शोध प्रणाली और मजबूत बहुपक्षीय ढांचे को सुदृढ़ करने की आवश्यकता बताई।

विघटनकारी प्रौद्योगिकियों के शासन पर चर्चा

दूसरी गोलमेज चर्चा “Science Diplomacy and Governance of Disruptive Technologies” विषय पर हुई, जिसकी अध्यक्षता Marilyne Andersen ने की। इसमें उभरती तकनीकों के लिए न्यायसंगत और प्रभावी वैश्विक शासन मॉडल विकसित करने, समावेशी नीति-निर्माण और तकनीकी नवाचार को नैतिक तथा सामाजिक मानकों के साथ संतुलित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

इस अवसर पर जाह्नवी फाल्के , निदेशक, साइंस गैलरी बेंगलुरु ने विज्ञान कूटनीति के ऐतिहासिक विकास पर व्याख्यान दिया। वहींस्टीन सोंडरगार्ड नाटो के मुख्य वैज्ञानिक ने उभरती तकनीकों पर नाटो की तकनीकी दूरदृष्टि से जुड़े अनुभव साझा किए।

वैश्विक विमर्श को मिलेगा नया मंच

रायसीना साइंस डिप्लोमेसी इनिशिएटिव से प्राप्त विचार और सुझाव विज्ञान कूटनीति पर वैश्विक विमर्श को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसे वार्षिक मंच के रूप में विकसित करने की योजना है, जहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग, नीति और शासन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी।

प्रो.अजय कुमार सूद ने कहा कि भविष्य में इस पहल को और मजबूत बनाने के लिए दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान देना होगा—
पहला, निजी क्षेत्र की भूमिका को विज्ञान कूटनीति के ढांचे में कैसे शामिल किया जाए; और दूसरा, मौजूदा बहुपक्षीय तंत्रों का उपयोग कर तकनीकी प्रगति के लाभों को समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से कैसे पहुंचाया जाए।

यह पहल विज्ञान, कूटनीति और नीति निर्माण के बीच सहयोग और संवाद को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने BIRAC–RDI फंड के तहत पहली राष्ट्रीय कॉल की घोषणा की, जैव प्रौद्योगिकी नवाचार को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम

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केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज BIRAC–RDI फंड के तहत पहली राष्ट्रीय कॉल की घोषणा की, जो सरकार के ₹1 लाख करोड़ के अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) पहल के तहत उच्च प्रभाव वाली जैव प्रौद्योगिकी नवाचारों को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि यह पहल विज्ञान आधारित विकास के प्रति भारत के दृष्टिकोण में निर्णायक बदलाव को दर्शाती है और यह संकेत देती है कि भारत अब उभरती तकनीकों में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

डॉ. सिंह ने कहा कि पिछले दशक में भारत जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नीति संकोच से नीति तेज़ी की ओर बढ़ा है। उन्होंने बताया कि 2014 में लगभग 50 बायोटेक स्टार्टअप से बढ़कर आज 11,000 से अधिक हो गए हैं, जो इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विस्तार को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी अगली औद्योगिक क्रांति का प्रमुख चालक बनेगी और भारत पहले ही अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी जैसे उभरते क्षेत्रों में प्रवेश कर चुका है।

बीआईआरएसी के प्रबंध निदेशक डॉ. जितेंद्र कुमार ने बताया कि BIRAC–RDI फंड के तहत अगले पांच वर्षों में ₹2,000 करोड़ का निवेश किया जाएगा। भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2012 में 28 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 165.7 अरब डॉलर हो गई है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 300 अरब डॉलर और 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर करना है।

इस फंड के तहत स्टार्टअप, एसएमई और उद्योग भागीदार 31 मार्च 2026 तक आवेदन कर सकते हैं।



जीएसआई की 65वीं केंद्रीय भूवैज्ञानिक कार्यक्रम बोर्ड (CGPB) बैठक 21 जनवरी को नई दिल्ली में आयोजित

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नई दिल्ली- खनिज मंत्रालय के अंतर्गत भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण भारत (GSI) 21 जनवरी 2026 को नई दिल्ली के ICAR, पुसा स्थित ए. पी. शिंदे सिम्पोजियम हॉल में 65वीं केंद्रीय भूवैज्ञानिक कार्यक्रम बोर्ड (CGPB) की बैठक का आयोजन करेगा। यह महत्वपूर्ण बैठक केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों, उद्योग, अकादमिक संस्थानों और खनन क्षेत्रों के प्रमुख हितधारकों को एक साथ लाकर भूवैज्ञानिक प्रगति, खनिज अन्वेषण रणनीतियों और स्वच्छ ऊर्जा, भू-जोखिम तथा सतत विकास से संबंधित चुनौतियों के समाधान पर चर्चा करने का अवसर प्रदान करेगी।


CGPB का उद्देश्य और महत्व

केंद्रीय भूवैज्ञानिक कार्यक्रम बोर्ड (CGPB) भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण भारत (GSI), खनिज मंत्रालय का एक महत्वपूर्ण मंच है, जहां GSI के वार्षिक फील्ड सीजन प्रोग्राम (FSP) पर चर्चा की जाती है और कार्यों के दोहराव को रोकने के उपाय किए जाते हैं। CGPB के सदस्य और अन्य हितधारक जैसे राज्य सरकारें, केंद्रीय/राज्य खनिज अन्वेषण एजेंसियां, PSU और निजी उद्यमी GSI के साथ सहयोगात्मक कार्यों के लिए प्रस्ताव रखते हैं। भारत सरकार द्वारा निर्धारित प्राथमिकताओं और प्रस्तुत प्रस्तावों की महत्वता व तात्कालिकता के आधार पर आगामी वित्तीय वर्ष के लिए GSI के सर्वेक्षण, मानचित्रण, अन्वेषण, अनुसंधान एवं विकास, सामाजिक परियोजनाओं तथा प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का वार्षिक कार्यक्रम अंतिम रूप दिया जाता है।

65वीं CGPB बैठक का नेतृत्व और सहभागिता

65वीं CGPB बैठक की अध्यक्षता खनिज मंत्रालय के सचिव पीयूष गोयल करेंगे, जबकि GSI के महानिदेशक असित साहा और खनिज मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव संजय लोइया की गरिमामयी उपस्थिति में बैठक आयोजित होगी। बैठक में खनिज मंत्रालय, GSI, राज्य भूवैज्ञानिक विभागों, PSU और निजी अन्वेषण/खनन कंपनियों के वरिष्ठ प्रतिनिधि भी उपस्थित रहेंगे।

बैठक में चर्चा के प्रमुख विषय

बैठक में देश के खनिज क्षेत्र द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों पर विचार किया जाएगा, जिनमें प्रमुख हैं:

  • लिथियम, REEs, ग्रेफाइट, PGE, वैनाडियम, स्कैंडियम, सीज़ियम आदि जैसे महत्वपूर्ण खनिजों का अन्वेषण, जो ऊर्जा संक्रमण और आत्मनिर्भर भारत की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़े हैं।

  • AI/ML आधारित डेटा एकीकरण, भू-भौतिक सर्वेक्षण, हाइपरस्पेक्ट्रल रिमोट सेंसिंग, डीप ड्रिलिंग और मिनरल सिस्टम अध्ययन जैसे आधुनिक अन्वेषण उपकरणों को अपनाना।

  • महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों के लिए प्री-प्रतिस्पर्धात्मक डेटा साझा करने और सहयोगात्मक अन्वेषण मॉडल, ताकि राष्ट्रीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो, कार्यों का दोहराव कम हो और अन्वेषण से नीलामी-योग्य ब्लॉक्स तक की प्रक्रिया तेज हो।

  • हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों में भू-भूस्खलन खतरा जोनिंग और ढलान स्थिरता अध्ययन, ताकि आपदा जोखिम में कमी लाई जा सके।

बैठक में GSI का वार्षिक कार्यक्रम FS 2026-27 भी प्रस्तुत किया जाएगा, जिसमें पृथ्वी-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में 1,068 परियोजनाएं शामिल हैं, जिनमें प्रमुख जोर खनिज अन्वेषण पर है। यह कार्यक्रम नवाचार और सततता पर केंद्रित है, जिसमें महत्वपूर्ण खनिजों, कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन अध्ययन, अपतटीय अन्वेषण और सार्वजनिक भलाई से जुड़ी भू-विज्ञान को प्राथमिकता दी गई है। बैठक में GSI की प्रमुख प्रकाशनों का विमोचन और रणनीतिक एवं महत्वपूर्ण खनिज अन्वेषण के क्षेत्र में GSI की गतिविधियों का प्रदर्शन करने वाली प्रदर्शनी भी आयोजित होगी।

राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़ाव

CGPB बैठक राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक प्राथमिकताओं को वैश्विक सततता लक्ष्यों के साथ संरेखित करने, नवाचार और संसाधन सुरक्षा के भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए सहयोगात्मक और समन्वयात्मक मंच के रूप में कार्य करेगी।

राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागरीय अनुसंधान केंद्र (NCPOR) ने मनाया अंटार्कटिका दिवस, गोवा के राज्यपाल ने किया विशेष डाक टिकट का विमोचन

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अंटार्कटिका दिवस के अवसर पर आज (1 दिसंबर 2025) गोवा के वास्को-द-गामा स्थित राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागरीय अनुसंधान केंद्र (NCPOR) में विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर गोवा के माननीय राज्यपाल पुसापति अशोक गजपति राजू मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

राज्यपाल ने कहा कि NCPOR भारत की ध्रुवीय एवं महासागरीय खोजों का प्रमुख केंद्र बन चुका है, जिसने पिछले 25 वर्षों में दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भारत की वैज्ञानिक क्षमता को स्थापित किया है।

NCPOR की सिल्वर जुबली पर विशेष डाक टिकट जारी

कार्यक्रम में राज्यपाल ने NCPOR की स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष स्मारक डाक टिकट जारी किया। उन्होंने कहा कि यह टिकट भारत सरकार के डाक विभाग द्वारा NCPOR के उल्लेखनीय योगदान का सम्मान है।

अंटार्कटिका का वैश्विक महत्व

राज्यपाल ने कहा—

  • अंटार्कटिका में दुनिया के 70% ताजे पानी का भंडार है।

  • यदि यह पूरी तरह पिघल जाए, तो वैश्विक समुद्र-स्तर में व्यापक वृद्धि हो सकती है।

  • भारत जैसे 1.4 अरब की आबादी वाले देश के लिए इन परिवर्तनों को समझना और उनसे निपटने की तैयारी करना अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने यह भी कहा कि मोदी सरकार द्वारा स्वीकृत नई अनुसंधान स्टेशन ‘मैत्री-II’ और स्वदेशी बर्फ श्रेणी अनुसंधान पोत देश की वैज्ञानिक प्रगति के प्रतीक हैं।

NCPOR के प्रमुख उपलब्धियाँ

NCPOR ने ध्रुवीय क्षेत्रों में भारत के वैज्ञानिक अभियानों का नेतृत्व किया है। संस्थान ने निम्नस्थायी भारतीय अनुसंधान केंद्र स्थापित किए हैं—

  • अंटार्कटिका: दक्षिण गंगोत्री, मैत्री, भारती

  • आर्कटिक: हिमाद्रि

  • हिमालय: हिमांश

भारत सरकार के निरंतर समर्थन पर प्रशंसा

NCPOR के निदेशक डॉ. थम्बन मेलोथ ने अपने संबोधन में कहा कि भारत सरकार हमेशा वैज्ञानिक अभियानों के प्रति प्रतिबद्ध रही है और हालिया स्वीकृतियाँ इसका प्रमाण हैं।

डाक विभाग की भूमिका

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि अमिताभ सिंह, मुख्य डाक महानिदेशक (महाराष्ट्र सर्कल), ने कहा कि यह स्मारक टिकट NCPOR की 25 वर्ष की यात्रा को सम्मानित करने का माध्यम है।



उत्तराखंड में आपदा पूर्वानुमान होगा और सशक्त: डॉ. जितेंद्र सिंह ने किए तीन नए वेदर रडारों की घोषणा

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केंद्र सरकार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री, तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने घोषणा की कि उत्तराखंड में सुरकंडा देवी, मुक्तेश्वर और लैंसडौन में पहले ही तीन वेदर रडार लगाए जा चुके हैं और जल्द ही हरिद्वार, पंतनगर और औली में तीन और रडार स्थापित किए जाएंगे। इससे राज्य की रियल-टाइम मौसम पूर्वानुमान क्षमता और मजबूत होगी।

"विश्व आपदा प्रबंधन सम्मेलन" को संबोधित करते हुए पृथ्वी विज्ञान मंत्री ने कहा कि उत्तराखंड अपने भौगोलिक स्वरूप, हिमालयी पारिस्थितिकी और प्राकृतिक अनुभवों के कारण वैश्विक आपदा-रोधक चर्चा के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है।

सम्मेलन में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, सांसद नरेश बंसल, एनडीएमए के सदस्य अग्रवाल, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सचिव नितीश कुमार झा, ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रो. कमल घनसाला, डीजी दुर्गेश पंत, एसडीएमए उपाध्यक्ष रोहिला सहित विशेषज्ञ, शिक्षक एवं छात्र उपस्थित थे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि उत्तराखंड की 25 वर्षों की यात्रा ने राज्य को आपदा प्रतिक्रिया और प्रशासन में विशिष्ट पहचान दी है। उन्होंने सिलक्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन को याद किया, जिसे दो वर्ष पूर्व सफलतापूर्वक पूरा किया गया था और जिसे वैश्विक आपदा प्रबंधन में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जाएगा।

उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में उत्तराखंड में हाइड्रो-मीटियोरोलॉजिकल आपदाओं में तेजी से वृद्धि हुई है। 2013 की केदारनाथ आपदा और 2021 की चमोली घटना इसके प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से पीछे हटते ग्लेशियर, जीएलओएफ का बढ़ता जोखिम, हिमालयी पहाड़ों की नाजुकता, वनों की कटाई और प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं।

मंत्री ने जानकारी दी कि पिछले दस वर्षों में केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में मौसम और आपदा-निगरानी बुनियादी ढांचे को बड़ी मात्रा में बढ़ाया है। राज्य में 33 मौसम वेधशालाएँ, रेडियो-सोंडे और रेडियो-विंड सिस्टम्स, 142 स्वचालित मौसम स्टेशन, 107 वर्षामापक यंत्र, जिला व ब्लॉक स्तर के मॉनिटरिंग सिस्टम तथा किसानों के लिए ऐप-आधारित चेतावनी प्रणाली विकसित की गई है।

उन्होंने बताया कि तीन वेदर रडार पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं और तीन और जल्द स्थापित होंगे, जिससे पूर्वानुमान पद्धति और अधिक सटीक होगी।

डॉ. सिंह ने कहा कि अचानक होने वाले क्लाउडबर्स्ट की परिस्थितियों को समझने के लिए भारत ने एक विशेष हिमालयी जलवायु अध्ययन कार्यक्रम शुरू किया है। उन्होंने बताया कि "नाउकास्ट" प्रणाली—जो तीन घंटे पहले की भविष्यवाणी देती है—अब उत्तराखंड में भी व्यापक रूप से लागू की जा रही है।

उन्होंने एनडीएमए, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा विकसित उन्नत जंगल-आग मौसम सेवाओं का उल्लेख किया और इसे "पूरा-सरकार" और "पूरा-विज्ञान" मॉडल बताया।

कुछ क्षेत्रों में आईएमडी चेतावनियों की अनुपालना न होने पर उन्होंने चिंता व्यक्त की। उन्होंने जम्मू-कश्मीर की एक घटना का उल्लेख किया जहाँ एक नए आईएएस अधिकारी ने आईएमडी रेड अलर्ट के बाद तुरंत हाईवे बंद कर बड़ी त्रासदी को टाल दिया।

उन्होंने कहा कि एनडीएमए, पर्यावरण मंत्रालय और शहरी विकास निकायों के भूमि उपयोग नियमों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। नदी तटों और नई हाईवे के पास अवैध खनन को उन्होंने बेहद खतरनाक मानवजनित खतरा बताया।

डॉ. सिंह ने हिमालयी क्षेत्रों की आर्थिक क्षमता बढ़ाने की दिशा में कृषि-स्टार्टअप्स और सीएसआईआर आधारित वैल्यू-एडिशन मॉडलों की चर्चा की। जम्मू-कश्मीर के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे कई तकनीकी और प्रबंधन स्नातक निजी नौकरियाँ छोड़कर इन उद्यमों से जुड़े हैं। उन्होंने इसी मॉडल को उत्तराखंड में भी दोहराने की अपील की।

भारत की वैश्विक आपदा-रोधक क्षमता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अब पड़ोसी देशों को तकनीकी सहायता भी प्रदान कर रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के COP-26 में घोषित 2070 नेट ज़ीरो लक्ष्य की भी चर्चा की।

अंत में, उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और आयोजनकर्ताओं को विश्व आपदा प्रबंधन सम्मेलन आयोजित करने के लिए बधाई दी और कहा कि इससे वैश्विक स्तर पर आपदा-नियंत्रण, जलवायु अनुकूलन और लचीले विकास की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।


सीएसआईआर–आईसीएमआर की उच्चस्तरीय बैठक में स्वास्थ्य अनुसंधान सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति

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परिषद् वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान (CSIR) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने आज नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर साइंस सेंटर में एक उच्च-स्तरीय विचार-विमर्श बैठक आयोजित की। बैठक का उद्देश्य दोनों संस्थानों के बीच चल रहे सहयोग को सुदृढ़ करना और भविष्य के लिए एक एकीकृत रोडमैप तैयार करना था।

बैठक की सह-अध्यक्षता सीएसआईआर की महानिदेशक व डीएसआईआर सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी तथा आईसीएमआर के महानिदेशक व स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने की। सीएसआईआर और आईसीएमआर की विभिन्न प्रयोगशालाओं के निदेशकों तथा वरिष्ठ अधिकारियों ने बैठक में भाग लिया।

बैठक के दौरान दोनों संस्थाओं ने कई प्रमुख संयुक्त परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की, जिनमें शामिल हैं—

  • सीएसआईआर द्वारा विकसित अणुओं (molecules) का क्लीनिकल ट्रायल की ओर बढ़ना,

  • आईसीएमआर समर्थित उन्नत अनुसंधान केंद्रों की स्थिति,

  • बड़े पैमाने की चल रही परियोजनाओं की प्रगति।

विशेष रूप से, अनेक रोगजनकों की निगरानी के लिए अपशिष्ट जल (wastewater) विश्लेषण प्रणाली को और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। यह भी सहमति बनी कि इस दिशा में वन हेल्थ मिशन के तहत संयुक्त प्रयासों को मजबूत किया जाएगा।

नई दवाओं और अणुओं के विकास, व्यवस्थित क्लीनिकल ट्रायल, तथा आईसीएमआर की बड़े जानवरों के लिए उपलब्ध विषाक्तता परीक्षण सुविधाओं के उपयोग से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर भी चर्चा हुई।

AcSIR–ICMR पीएचडी कार्यक्रम की समीक्षा करते हुए युवा शोधकर्ताओं के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराने तथा आईसीएमआर की फेलोशिप को सीएसआईआर फेलोशिप के साथ समाहित करने पर भी जोर दिया गया।

बैठक में डॉ. कलैसेल्वी और डॉ. बहल ने कहा कि सीएसआईआर की वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्षमता को आईसीएमआर की सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञता के साथ जोड़ना राष्ट्रीय स्तर पर उच्च प्रभाव वाले परिणाम सुनिश्चित करेगा। दोनों ने समयबद्ध प्रगति, बेहतर समन्वय और तकनीकों के संयुक्त विकास के लिए संरचित तंत्र अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसमें डिजिटल रूप से नियंत्रित मेडिकल इमरजेंसी ड्रोन सेवा जैसे नवीन संयुक्त प्रोजेक्ट पर भी चर्चा हुई।

बैठक का समापन इस प्रतिबद्धता के साथ हुआ कि सीएसआईआर और आईसीएमआर स्वास्थ्य विज्ञान, डायग्नॉस्टिक्स, डिजिटल हेल्थ, पर्यावरणीय स्वास्थ्य निगरानी और अन्य उभरते क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करेंगे तथा संयुक्त परियोजनाओं के विकास और क्रियान्वयन में तेजी लाएंगे।

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