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दुर्लभ रोगों के बेहतर प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम: राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन

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स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आज नई दिल्ली में दो दिवसीय राष्ट्रीय दुर्लभ रोग सम्मेलन (National Conference on Rare Diseases) का उद्घाटन किया, जो 5 और 6 मई 2026 को आयोजित किया जा रहा है। यह सम्मेलन देश में दुर्लभ बीमारियों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए स्वास्थ्य सचिव पुन्य सलिला श्रीवास्तव ने कहा कि इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य हितधारकों की चुनौतियों को समझना, नवाचार को बढ़ावा देना और देश में दुर्लभ रोगों के बेहतर प्रबंधन के लिए नए विचार विकसित करना है।

उन्होंने बताया कि दुर्लभ रोगों से निपटने की आवश्यकता को सबसे पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में रेखांकित किया गया था और बाद में 2021 की राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के माध्यम से इसे एक औपचारिक ढांचा प्रदान किया गया।

उन्होंने कहा कि इस नीति के तहत देशभर में उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) स्थापित किए गए हैं, जिनकी संख्या 8 से बढ़कर 15 हो गई है, जिनमें उत्तर-पूर्व भारत के दो केंद्र भी शामिल हैं।

स्वास्थ्य सचिव ने यह भी बताया कि दुर्लभ रोगों के मरीजों के इलाज के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दी गई है। इसके साथ ही जीवनरक्षक दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी में छूट दी गई है, और आगे भी नई दवाओं को इस सूची में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

उन्होंने UMMID पहल और NIDAN केंद्रों के माध्यम से जेनेटिक काउंसलिंग और उपचार सहायता को मजबूत किए जाने की जानकारी दी। अब तक लगभग 1,800 मरीजों को इस नीति के तहत सहायता मिल चुकी है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की भूमिका की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह संस्था दुर्लभ रोगों के लिए स्वदेशी शोध और उपचार विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. राजीव बहल ने कहा कि पिछले तीन दशकों में दुर्लभ रोगों के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। उन्होंने कहा कि आज भारत न केवल निदान बल्कि उपचार और वित्तीय सहायता के क्षेत्र में भी बेहतर स्थिति में है।

डॉ. बहल ने यह भी कहा कि भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुसार दुर्लभ रोगों के लिए स्वदेशी मॉडल विकसित करना चाहिए, जिसमें डिजिटल तकनीक, एआई और जेनेटिक रिसर्च की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

इस सम्मेलन में विशेषज्ञों ने जेनेटिक तकनीक, सस्ती उपचार रणनीतियों, शोध सहयोग और रोगी-केंद्रित स्वास्थ्य मॉडल पर चर्चा की। मंत्रालय ने सभी हितधारकों के सहयोग से दुर्लभ रोगों से प्रभावित मरीजों को बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता दोहराई।

छोटी अवधि की टीबी दवा योजनाएँ: बेहतर स्वास्थ्य और कम खर्च का समाधान

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भारतीय चिकित्सा अनुसंधान पत्रिका (Indian Journal of Medical Research) में प्रकाशित एक आर्थिक मूल्यांकन अध्ययन से पता चला है कि मल्टीड्रग-रेज़िस्टेंट और रिफैम्पिसिन-रेज़िस्टेंट टीबी (MDR/RR-TB) के लिए छह महीने की छोटी, पूरी तरह मौखिक (all-oral) उपचार योजनाएँ भारत में वर्तमान में उपयोग की जा रही लंबी उपचार योजनाओं की तुलना में अधिक किफायती और बेहतर स्वास्थ्य परिणाम देने वाली हैं।

यह अध्ययन ICMR–नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन ट्यूबरकुलोसिस (ICMR-NIRT) द्वारा किया गया। इसमें बेडाक्विलिन आधारित उपचार योजनाओं—

  • BPaL (बेडाक्विलिन, प्रेटोमैनिड और लाइनज़ोलिड)

  • BPaLM (जिसमें मोक्सीफ्लोक्सासिन भी शामिल है)

की तुलना राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के तहत उपयोग की जा रही मौजूदा छोटी (9–11 महीने) और लंबी (18–20 महीने) उपचार योजनाओं से की गई।

प्रमुख निष्कर्ष:

  • BPaL उपचार योजना अधिक प्रभावी और खर्च बचाने वाली पाई गई।

    • प्रत्येक अतिरिक्त QALY (Quality Adjusted Life Year) के लिए स्वास्थ्य प्रणाली को प्रति मरीज 379 रुपये कम खर्च करना पड़ता है, यानी बेहतर स्वास्थ्य परिणाम कम लागत पर।

  • BPaLM योजना भी अत्यंत किफायती पाई गई।

    • प्रति अतिरिक्त QALY के लिए केवल 37 रुपये अतिरिक्त खर्च आता है।

  • दोनों योजनाओं में कुल स्वास्थ्य खर्च (दवाइयाँ, अस्पताल विज़िट, फॉलो-अप) कम या समान पाया गया।

अध्ययन का महत्व:

MDR/RR-TB का इलाज लंबे समय तक चलता है, दुष्प्रभाव होते हैं और लागत भी अधिक होती है। छोटी, पूरी तरह मौखिक उपचार योजनाएँ

  • मरीजों की दवा लेने की नियमितता (adherence) बढ़ा सकती हैं

  • बीमारी और जटिलताओं को कम कर सकती हैं

  • मरीजों को जल्दी सामान्य जीवन में लौटने में मदद कर सकती हैं

  • स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ कम कर सकती हैं

निष्कर्ष:

अध्ययन के अनुसार BPaL आधारित उपचार योजनाएँ लागत बचाने वाली या अत्यधिक किफायती हैं और इन्हें NTEP के तहत कार्यक्रम स्तर पर अपनाया जा सकता है ताकि भारत में दवा-प्रतिरोधी टीबी से लड़ाई मजबूत हो और टीबी उन्मूलन लक्ष्य तेजी से प्राप्त हो सके।

पूरा अध्ययन यहाँ पढ़ा जा सकता है:


भारत में स्ट्रोक उपचार में ऐतिहासिक पहल: आईसीएमआर ने असम को सौंपे मोबाइल स्ट्रोक यूनिट

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भारत में स्ट्रोक मृत्यु और दीर्घकालिक विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक है। स्ट्रोक के मामलों में हर मिनट बेहद अहम होता है—इलाज में देरी होने पर हर मिनट लगभग 1.9 अरब मस्तिष्क कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं। ‘गोल्डन ऑवर’ के भीतर समय पर उपचार से मृत्यु और आजीवन विकलांगता को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, स्ट्रोक उपचार की सबसे बड़ी चुनौती मरीजों का समय पर स्ट्रोक-सुविधायुक्त अस्पताल तक पहुँचना है।

इसी चुनौती का समाधान करते हुए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने असम सरकार को दो मोबाइल स्ट्रोक यूनिट (MSU) सौंपे। यह पहल उस मॉडल में एक बड़ा बदलाव दर्शाती है, जिसमें अब मरीजों को अस्पताल तक पहुँचने के बजाय अस्पताल मरीज तक पहुँच रहा है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के मार्गदर्शन में विकसित यह पहल सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जिसके तहत उन्नत स्वास्थ्य सेवाएँ दूरदराज़, वंचित और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले लोगों—विशेषकर महिलाओं—तक पहुँचाई जा रही हैं।

एमएसयू को असम सरकार को सौंपते हुए, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव एवं ICMR के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने कहा,

“मोबाइल स्ट्रोक यूनिट की शुरुआत जर्मनी में हुई थी और बाद में प्रमुख वैश्विक शहरों में इसका मूल्यांकन किया गया। भारत ने पहली बार ग्रामीण, दूरस्थ और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र में इसका सफल मूल्यांकन किया है। हम दुनिया का दूसरा देश हैं जिसने ग्रामीण तीव्र इस्केमिक स्ट्रोक मरीजों के उपचार के लिए एमएसयू को आपातकालीन सेवाओं के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत किया है।”

असम सरकार की ओर से अनुभव साझा करते हुए, पी. अशोक बाबू, सचिव एवं आयुक्त, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, असम ने कहा कि यह हस्तांतरण राज्य की आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करता है और इस जीवनरक्षक सेवा की निरंतरता को राज्य के स्वामित्व में सुनिश्चित करता है। उन्होंने बताया कि ICMR के साथ सहयोग से तेज़ उपचार, बेहतर समन्वय और बेहतर परिणाम संभव हुए हैं, जो भविष्य में विस्तार के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

मोबाइल स्ट्रोक यूनिट एक चलती-फिरती अस्पताल व्यवस्था है, जिसमें सीटी स्कैन, विशेषज्ञों से टेली-परामर्श, पॉइंट-ऑफ-केयर लैब और क्लॉट-बस्टिंग दवाएँ उपलब्ध हैं। इससे मरीज के घर या उसके निकट ही स्ट्रोक का शीघ्र निदान और उपचार संभव हो पाता है। यह नवाचार विशेष रूप से उन दूरस्थ और कठिन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है, जहाँ अस्पताल तक पहुँचने में कई घंटे लग सकते हैं।

पूर्वोत्तर भारत में स्ट्रोक का बोझ अपेक्षाकृत अधिक है। कठिन भू-भाग, लंबी दूरी और विशेष चिकित्सा सुविधाओं की सीमित उपलब्धता के कारण समय पर उपचार चुनौतीपूर्ण रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए ICMR ने डिब्रूगढ़ के असम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट-नेतृत्व वाला स्ट्रोक यूनिट और तेज़पुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल तथा बैपटिस्ट क्रिश्चियन अस्पताल, तेज़पुर में चिकित्सक-नेतृत्व वाले स्ट्रोक यूनिट स्थापित किए। मोबाइल स्ट्रोक यूनिट को इसी प्री-हॉस्पिटल स्ट्रोक केयर प्रणाली में जोड़ा गया।

इसके परिणाम अत्यंत प्रभावशाली रहे हैं। इस मॉडल से उपचार में लगने वाला समय लगभग 24 घंटे से घटकर करीब 2 घंटे रह गया, मृत्यु दर में एक-तिहाई की कमी आई और विकलांगता में आठ गुना तक कमी दर्ज की गई। वर्ष 2021 से अगस्त 2024 के बीच एमएसयू को 2,300 से अधिक आपातकालीन कॉल प्राप्त हुईं। प्रशिक्षित नर्सों ने 294 संदिग्ध स्ट्रोक मामलों की जाँच की, जिनमें से 90% मरीजों का उपचार सीधे उनके घर से किया गया। 108-आपातकालीन एंबुलेंस सेवा के साथ एकीकरण से इसकी पहुँच 100 किलोमीटर के दायरे तक बढ़ी।

इस अवसर पर केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी तथा ICMR नेतृत्व उपस्थित रहे, जिनमें डॉ. क्रिस्टीना जेड. चोंगथु (सचिव, स्वास्थ्य, तेलंगाना सरकार), डॉ. संघमित्रा पति (अपर महानिदेशक, ICMR), डॉ. अलका शर्मा (अपर महानिदेशक, ICMR), मनीषा सक्सेना (वरिष्ठ उप महानिदेशक–प्रशासन) और डॉ. आर.एस. ढालीवाल (प्रमुख, एनसीडी) शामिल थे।


सीएसआईआर–आईसीएमआर की उच्चस्तरीय बैठक में स्वास्थ्य अनुसंधान सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति

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परिषद् वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान (CSIR) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने आज नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर साइंस सेंटर में एक उच्च-स्तरीय विचार-विमर्श बैठक आयोजित की। बैठक का उद्देश्य दोनों संस्थानों के बीच चल रहे सहयोग को सुदृढ़ करना और भविष्य के लिए एक एकीकृत रोडमैप तैयार करना था।

बैठक की सह-अध्यक्षता सीएसआईआर की महानिदेशक व डीएसआईआर सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी तथा आईसीएमआर के महानिदेशक व स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने की। सीएसआईआर और आईसीएमआर की विभिन्न प्रयोगशालाओं के निदेशकों तथा वरिष्ठ अधिकारियों ने बैठक में भाग लिया।

बैठक के दौरान दोनों संस्थाओं ने कई प्रमुख संयुक्त परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की, जिनमें शामिल हैं—

  • सीएसआईआर द्वारा विकसित अणुओं (molecules) का क्लीनिकल ट्रायल की ओर बढ़ना,

  • आईसीएमआर समर्थित उन्नत अनुसंधान केंद्रों की स्थिति,

  • बड़े पैमाने की चल रही परियोजनाओं की प्रगति।

विशेष रूप से, अनेक रोगजनकों की निगरानी के लिए अपशिष्ट जल (wastewater) विश्लेषण प्रणाली को और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। यह भी सहमति बनी कि इस दिशा में वन हेल्थ मिशन के तहत संयुक्त प्रयासों को मजबूत किया जाएगा।

नई दवाओं और अणुओं के विकास, व्यवस्थित क्लीनिकल ट्रायल, तथा आईसीएमआर की बड़े जानवरों के लिए उपलब्ध विषाक्तता परीक्षण सुविधाओं के उपयोग से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर भी चर्चा हुई।

AcSIR–ICMR पीएचडी कार्यक्रम की समीक्षा करते हुए युवा शोधकर्ताओं के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराने तथा आईसीएमआर की फेलोशिप को सीएसआईआर फेलोशिप के साथ समाहित करने पर भी जोर दिया गया।

बैठक में डॉ. कलैसेल्वी और डॉ. बहल ने कहा कि सीएसआईआर की वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्षमता को आईसीएमआर की सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञता के साथ जोड़ना राष्ट्रीय स्तर पर उच्च प्रभाव वाले परिणाम सुनिश्चित करेगा। दोनों ने समयबद्ध प्रगति, बेहतर समन्वय और तकनीकों के संयुक्त विकास के लिए संरचित तंत्र अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसमें डिजिटल रूप से नियंत्रित मेडिकल इमरजेंसी ड्रोन सेवा जैसे नवीन संयुक्त प्रोजेक्ट पर भी चर्चा हुई।

बैठक का समापन इस प्रतिबद्धता के साथ हुआ कि सीएसआईआर और आईसीएमआर स्वास्थ्य विज्ञान, डायग्नॉस्टिक्स, डिजिटल हेल्थ, पर्यावरणीय स्वास्थ्य निगरानी और अन्य उभरते क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करेंगे तथा संयुक्त परियोजनाओं के विकास और क्रियान्वयन में तेजी लाएंगे।

नेशनल वन हेल्थ मिशन असेम्बली 2025 का दो दिवसीय आयोजन सफलतापूर्वक समाप्त

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नेशनल वन हेल्थ मिशन असेम्बली 2025 का दो दिवसीय आयोजन आज भारत मंडपम में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। दूसरे दिन में विशेष तकनीकी विचार-विमर्श हुए, जिन्होंने मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य के समेकित और लचीले वन हेल्थ इकोसिस्टम के निर्माण के लिए राष्ट्रीय प्रयासों को और मजबूत किया। इस असेंबली में प्रमुख मंत्रालयों, वैज्ञानिक संस्थाओं, विकास सहयोगियों और कार्यान्वयन एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में समन्वित कार्रवाई का महत्व उजागर हुआ।

पहले दिन की मजबूत शुरुआत के बाद, जिसमें सरकार के वरिष्ठ नेतृत्व ने संयुक्त निगरानी और ‘होल-ऑफ-गवर्नमेंट’ सहयोग की प्रतिबद्धता दोहराई, आज के सत्रों ने वैज्ञानिक, संचालनात्मक और कार्यक्रमगत चर्चाओं के माध्यम से उस गति को बनाए रखा। इन संवादों ने साझा प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाया और विभिन्न क्षेत्रों में वन हेल्थ एकीकरण, तत्परता और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमताओं के लिए आधार तैयार किया।

दिन की कार्यवाही का नेतृत्व वरिष्ठ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने किया। डॉ. वी. के. पॉल, सदस्य (स्वास्थ्य), नीति आयोग ने सहयोग, प्रणालीगत तत्परता और मजबूत राष्ट्रीय क्षमताओं के लिए सतत प्रयासों का आह्वान किया। उनके साथ डॉ. राजीव बहल, सचिव, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग और महानिदेशक, ICMR तथा डॉ. राजेश एस. गोखले, सचिव, जैव प्रौद्योगिकी विभाग भी उपस्थित थे, जिन्होंने नवाचार, अनुवादक विज्ञान और एकीकृत निगरानी के महत्व पर जोर दिया। FAO के स्कॉट न्यूमैन और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की संयुक्त सचिव वंदना जैन ने भी बहु-क्षेत्रीय जुड़ाव और वैश्विक सहयोग के महत्व को रेखांकित किया। DRDO, ICAR, THSTI, CEPI, FIND, AYUSH और International Vaccine Institute जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों ने भी विविध वैज्ञानिक और कार्यान्वयन दृष्टिकोण साझा किए।

डॉ. वी. के. पॉल ने असेंबली में कहा, “भारत की वन हेल्थ प्रगति एक मजबूत होल-ऑफ-गवर्नमेंट दृष्टिकोण पर निर्भर करती है, जो स्वस्थ और लचीले भविष्य की दिशा में काम करता है। सामुदायिक भागीदारी इस प्रयास की आधारशिला है। मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान है, जो जनता की समझ को आकार देता है और गलत सूचना को दूर करता है, जबकि हमारी कानून व्यवस्था प्रणाली आपात स्थितियों में महत्वपूर्ण बल-गुणक के रूप में कार्य करती है। इन साझेदारियों को मजबूत करना यह सुनिश्चित करेगा कि समय पर, भरोसेमंद और समन्वित कार्रवाई हो।”

उन्होंने सामुदायिक सहभागिता को रोग का शीघ्र पता लगाने, निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया का आधार बताया और कहा कि ग्रामीण स्तर पर वन हेल्थ तैयारियों का विस्तार होना चाहिए, जहां फ्रंटलाइन कर्मचारी, स्थानीय सरकारें और समुदाय पहली सुरक्षा पंक्ति बनाते हैं। उन्होंने COVID-19 महामारी के दौरान सामुदायिक सक्रियता को भारत की प्रमुख ताकत के रूप में उद्धृत किया और कहा कि यह असेंबली विभिन्न हितधारकों को एक साथ लाकर क्षेत्रों में एकीकृत कार्रवाई को आगे बढ़ाने में सफल रही।

डॉ. राजीव बहल ने कहा, “हमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी और विकास को एकसाथ काम करने की आवश्यकता है। लक्ष्य केवल भविष्य की महामारी के लिए निदान, उपचार और टीकों का निर्माण नहीं है, बल्कि इसे तेजी से करना है। राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन प्लेटफॉर्म विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एक साथ लाकर वर्तमान और भविष्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए एक अधिक चुस्त, तैयार और उत्तरदायी इकोसिस्टम बनाने में मदद कर रहा है।”

डॉ. राजेश एस. गोखले ने कहा, “COVID-19 ने हमारे तकनीकी भविष्य की नाजुकता और वैश्विक परस्पर निर्भरता को उजागर किया। अब स्पष्ट है कि जैविक, कृत्रिम और प्राकृतिक बुद्धिमत्ता का त्रिकोण सभी भविष्य की तकनीकों को पुनर्परिभाषित करेगा। इनका संगम एक ऐसा नवाचार और गति उत्पन्न करेगा जिसकी कल्पना आज करना कठिन है। इस क्षमता का लाभ उठाना भारत के वन हेल्थ और जैव विज्ञान क्षमताओं को मजबूत करने में केंद्रीय होगा।”

चिकित्सा प्रतिक्रियाओं पर चर्चा के दौरान, प्रमुख राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों के विशेषज्ञों ने भविष्य के खतरे के प्रति तेजी से प्रतिक्रिया देने वाले टीकों, निदान और उपचार के विकास की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने चुस्त अनुसंधान प्लेटफार्मों के निर्माण, आपातकालीन उपयोग के लिए नियामक प्रणालियों को मजबूत करने और वैज्ञानिक एजेंसियों, उद्योग और वैश्विक साझेदारों के बीच सहयोग बढ़ाने पर बल दिया। राज्य सरकारों ने निगरानी प्रणाली, अंतर-विभागीय समन्वय और क्षेत्र स्तर पर संचालन की तैयारियों के कार्यान्वयन अनुभव साझा किए।

क्षमता निर्माण और सामुदायिक भागीदारी पर विचार-विमर्श में यह भी रेखांकित किया गया कि एक मजबूत वन हेल्थ सिस्टम कुशल मानव संसाधन, भरोसेमंद संस्थान और सशक्त समुदायों पर निर्भर करता है। वन्यजीव स्वास्थ्य, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण, सामुदायिक आधारित अनुसंधान और स्वास्थ्य प्रणाली विकास के विशेषज्ञों ने बहु-स्तरीय प्रशिक्षण संरचनाओं, पेशेवर शिक्षा में वन हेल्थ का समावेश और सतत सामुदायिक साझेदारी की आवश्यकता पर जोर दिया। राज्य सरकारों ने स्थानीय सामुदायिक भागीदारी रणनीतियों और अनुकूलित समाधानों का महत्व भी साझा किया।

दिन का आयोजन भारत की बढ़ती वन हेल्थ क्षमताओं को प्रदर्शित करने वाली प्रदर्शनी के साथ समाप्त हुआ। संस्थानों ने निगरानी, जैव सुरक्षा, डिजिटल प्लेटफार्म, प्रयोगशाला नेटवर्क और सहयोगात्मक अनुसंधान प्रयासों में नवाचारों को दिखाया। नेशनल वन हेल्थ हैकथॉन के लिए एक सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया, जिसमें तकनीक-आधारित और सामुदायिक-केंद्रित समाधान प्रस्तुत किए गए।

विचार-विमर्श का समापन इस साझा समझ के साथ हुआ कि वन हेल्थ भारत के विकासशील भविष्य की दृष्टि को साकार करने के लिए आवश्यक है। वैज्ञानिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने, विभिन्न क्षेत्रों के सहयोग को सक्षम करने और प्रणाली के सभी स्तरों पर तैयारियों को मजबूत करने के माध्यम से, भारत एक सुरक्षित और लचीले भविष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है।


भारत बनेगा वैश्विक स्वास्थ्य अनुसंधान का अग्रणी केंद्र: केन्द्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया सिंह पटेल

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नई दिल्ली-केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया सिंह पटेल ने आज द्वितीय डीएचआर-आईसीएमआर हेल्थ रिसर्च एक्सीलेंस समिट 2025 में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधन किया। इस अवसर पर नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वी. के. पॉल भी उपस्थित रहे।

अपने संबोधन में मंत्री पटेल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत का स्वास्थ्य अनुसंधान पारितंत्र अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुआ है। उन्होंने कहा, “पिछले एक दशक में भारत ने स्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख भूमिका निभाई है। मेडटेक मित्रा, रोटावैक वैक्सीन और कोविड-19 टीकों जैसी पहलें भारत की वैज्ञानिक क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रमाण हैं।”

राज्य मंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विज्ञान और अनुसंधान के लाभ देश के हर नागरिक तक पहुँचें। उन्होंने कहा कि भारत मेडटेक और बायोमेडिकल नवाचार में आत्मनिर्भर बन रहा है और अब केवल अनुसंधान ही नहीं कर रहा बल्कि समाधान भी दे रहा है।

मंत्री पटेल ने साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के महत्व पर बल देते हुए कहा कि गुणवत्तापूर्ण क्लिनिकल गाइडलाइन्स और मानक देश के प्रत्येक स्वास्थ्यकर्मी तक पहुँचने चाहिए ताकि सस्ती और समान स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित की जा सकें।

उन्होंने कहा कि भारत का स्वास्थ्य तंत्र एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है और वैज्ञानिक समुदाय को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित प्रिसीजन हेल्थकेयर और जीनोमिक्स जैसी उन्नत तकनीकों के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने सभी शोधकर्ताओं और पुरस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए कहा, “भारत को न केवल वैश्विक विज्ञान में योगदान देना है बल्कि उसका नेतृत्व भी करना है।”

डॉ. वी. के. पॉल ने अपने संबोधन में कहा कि भारत में वर्तमान में स्वस्थ आयु प्रत्याशा (Healthy Life Expectancy) 60 वर्ष है और विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण के अनुरूप इसे 75 वर्ष से अधिक करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने डीएचआर और आईसीएमआर से आग्रह किया कि वे एनसीडी, हाइपरटेंशन, ट्रॉमा केयर जैसी प्राथमिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर विशेष ध्यान दें।

उन्होंने आईसीएमआर को विश्व की शीर्ष तीन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थाओं में शामिल करने, आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और फ्रंटियर टेक्नोलॉजी (AI, Robotics) को स्वास्थ्य समाधान में अपनाने का आह्वान किया।

इस अवसर पर कई प्रमुख पहलें लॉन्च की गईं —

  • मेडटेक मित्रा के इनोवेटर्स गाइडबुक फॉर इन-विट्रो डायग्नोस्टिक (IVD) मेडिकल डिवाइसेज

  • 11 नई स्वदेशी तकनीकों का तीन कंपनियों को ट्रांसफर, जिनमें निपाह, मंकीपॉक्स, कोविड-19, टीबी और डेंगू जैसे संक्रमणों की पहचान करने वाली अत्याधुनिक जांच तकनीकें शामिल हैं।

  • मानक उपचार कार्यप्रवाह (Standard Treatment Workflows) का नया, उपयोगकर्ता-अनुकूल डिजिटल संस्करण।

  • सहायक प्रौद्योगिकी (Assistive Technology) दिशानिर्देश और किट, जिसमें ICMR और IIT दिल्ली द्वारा विकसित एक्शन रिसर्च आर्म टेस्ट (ARAT) किट शामिल है, जो स्ट्रोक या न्यूरोलॉजिकल चोटों के बाद हाथ की कार्यक्षमता का आकलन करने में उपयोगी है।

  • राष्ट्रीय आवश्यक सहायक उत्पाद सूची (NLEAP) के लिए ICMR-BIS द्वारा विकसित मानक लॉन्च किए गए।

  • आईसीएमआर पेंशनर्स पोर्टल का शुभारंभ, जो पेंशनभोगियों के लिए एक एकीकृत डिजिटल मंच प्रदान करेगा।

समारोह में डीएचआर के सचिव एवं आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल, संयुक्त सचिव अनु नागर, वरिष्ठ उप महानिदेशक (प्रशासन) श्रीमती मनीषा सक्सेना और स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।



“आयुर्वेद के माध्यम से यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य: पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय” — भुवनेश्वर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

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साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को आगे बढ़ाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आयुष मंत्रालय अपने अनुसंधान संगठन केंद्रीय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) और उसके केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI), भुवनेश्वर, के माध्यम से, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और उसके क्षेत्रीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केंद्र (RMRC), भुवनेश्वर के सहयोग से, “आयुर्वेद के माध्यम से यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य : पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 25 से 26 अक्टूबर 2025 तक भुवनेश्वर में करने जा रहा है।

इस संगोष्ठी का विषय “यकृत सुरक्षा, जीवित रक्षा” (Yakrut Suraksha, Jiveeta Raksha) है, जो यकृत और पित्तीय स्वास्थ्य के क्षेत्र में आयुर्वेद और आधुनिक जैव-चिकित्सा विज्ञान के बीच सहयोगात्मक अनुसंधान को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रो. रबिनारायण आचार्य ने कहा कि “आयुर्वेदिक विज्ञान यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो रोकथाम, संतुलन और सतत स्वास्थ्य सेवा पर बल देता है। सहयोगात्मक अनुसंधान के माध्यम से हम आयुर्वेद के सिद्धांतों और औषधियों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कर रहे हैं। इस तरह के प्रयास न केवल आयुर्वेद की वैश्विक विश्वसनीयता को मजबूत करते हैं, बल्कि साक्ष्य-आधारित समाधानों के लिए नए मार्ग भी खोलते हैं।”

आईसीएमआर की अतिरिक्त महानिदेशक और आरएमआरसी भुवनेश्वर की निदेशक डॉ. संगमित्रा पाटी ने कहा कि “यकृत-पित्तीय विकार जटिल स्वास्थ्य चुनौतियाँ हैं, जिनके समाधान के लिए अंतःविषय अनुसंधान आवश्यक है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के बीच सहयोग रोगों की बेहतर समझ, सुरक्षित उपचार और रोगी देखभाल के नए अवसर प्रदान करता है।”

दो दिवसीय इस संगोष्ठी में पाँच प्रमुख विषयों पर चर्चा होगी, जिसमें यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य पर सहयोगात्मक अनुसंधान को बढ़ावा देने पर विशेष बल रहेगा।

  • पहले दिन आयुर्वेदिक आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, पंचकर्म और डिटॉक्सिफिकेशन थैरेपी जैसे समग्र निवारक और उपचारात्मक दृष्टिकोणों पर विचार-विमर्श होगा। साथ ही NAFLD, हेपेटाइटिस और लिवर सिरोसिस के रोग-विशिष्ट प्रबंधन पर भी सत्र आयोजित किए जाएंगे।

  • दूसरे दिन वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित एकीकृत दृष्टिकोण, औषधीय अनुसंधान, और आधुनिक अस्पताल प्रणालियों के साथ आयुर्वेद के समन्वय पर चर्चा होगी।

संगोष्ठी में 58 वैज्ञानिक प्रस्तुतियाँ (22 मौखिक और 36 पोस्टर) शामिल होंगी, जिनमें नैदानिक परिणाम और अनुसंधान के व्यावहारिक पहलुओं को रेखांकित किया जाएगा।

कार्यक्रम में एक विशेष सत्र “हेपेटोबिलियरी विकारों में जनजातीय चिकित्सा” पर भी आयोजित किया जाएगा, जिसमें ओडिशा के विभिन्न हिस्सों से आए 20 जनजातीय वैद्य पारंपरिक उपचार पद्धतियाँ साझा करेंगे।

यह सहयोगात्मक पहल सीसीआरएएस और आईसीएमआर के बीच अंतःविषय अनुसंधान और साक्ष्य-आधारित परिणामों को बढ़ावा देने की दिशा में आयुष मंत्रालय की वैज्ञानिक प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।

आयुष मंत्रालय के अधीन सीसीआरएएस द्वारा लिवर स्वास्थ्य के लिए विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों पर वैज्ञानिक अनुसंधान किया जा रहा है, जैसे पिक्रोराइज़ा कुरोआ (कुटकी) और आयुष-PTK पर पूर्व-नैदानिक अध्ययन, जो यकृत-संरक्षण में प्रभावी पाए गए हैं। सीएसआईआर-सीडीआरआई लखनऊ के साथ संयुक्त अनुसंधान एटीटी-प्रेरित यकृत विषाक्तता पर भी केंद्रित है। इसके अतिरिक्त, आयोग्यवर्धिनी वटी और पिप्पल्यासव पर बहुकेन्द्रित नैदानिक अध्ययन ने MASLD के प्रबंधन में आशाजनक परिणाम दिए हैं।

संगोष्ठी में देश के प्रमुख विशेषज्ञ और वैज्ञानिक शामिल होंगे, जिनमें एआईआईएमएस भुवनेश्वर के कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ प्रो. (डॉ.) अशुतोष बिस्वास, केआईआईएमएस भुवनेश्वर के प्रो-चांसलर प्रो. सुब्रत कुमार आचार्य, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स नई दिल्ली के कार्यकारी निदेशक, तथा सीएआरआई भुवनेश्वर की प्रभारी सहायक निदेशक डॉ. सरदा ओटा शामिल हैं।

यह संगोष्ठी आयुर्वेद के माध्यम से यकृत-पित्तीय स्वास्थ्य पर वैज्ञानिक विमर्श को नई दिशा देगी और पारंपरिक चिकित्सा व आधुनिक विज्ञान के समन्वय से भारत को वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने में मदद करेगी।

प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में आयुष मंत्रालय का राष्ट्रीय आयुष मिशन व राज्यों में क्षमता निर्माण पर शिखर सम्मेलन

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 नई दिल्ली- आयुष मंत्रालय 3 और 4 सितंबर, 2025 को राष्ट्रीय आयुष मिशन और राज्यों में क्षमता निर्माण” विषय पर दो दिवसीय विभागीय शिखर सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है। यह सम्मेलन नई दिल्ली स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद (AIIA), सरिता विहार में होगा। सम्मेलन की अध्यक्षता प्रतापराव जाधव, केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), आयुष मंत्रालय एवं राज्य मंत्री, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय करेंगे।

इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकारियों से प्राप्त स्टेट-स्पेसिफिक नोट्स और फ़ीडबैक नोट्स पर विस्तृत चर्चा के लिए एक मंच प्रदान करना है, जिनमें जमीनी स्तर से प्राप्त इनपुट भी शामिल हैं। इस तरह की सहभागितापूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य राष्ट्रीय आयुष मिशन (NAM) को और मज़बूत बनाना एवं रणनीतिक रूप से विस्तार करना है। यह प्रमुख कार्यक्रम आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी प्रणालियों को एकीकृत कर समग्र स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देता है।

यह आगामी शिखर सम्मेलन वर्ष 2025 में आयोजित प्रधानमंत्री द्वारा बल दिए गए छह विषयगत शिखर सम्मेलनों की अंतिम कड़ी है, जिन पर चौथे मुख्य सचिव सम्मेलन में चर्चा की गई थी। ये शिखर सम्मेलन वर्षभर आयोजित किए गए, जिनमें केंद्र सरकार और सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकारी शामिल हुए। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श को बढ़ावा देना और जूनियर अधिकारियों तक की भागीदारी सुनिश्चित करना था, ताकि क्षमता निर्माण को मज़बूत किया जा सके।

इस दृष्टिकोण के अनुरूप, नीति आयोग ने छह विषयगत क्षेत्रों की पहचान की थी। इनमें छठा और अंतिम विषय “राष्ट्रीय आयुष मिशन और राज्यों में क्षमता निर्माण” चुना गया, जिसके लिए आयुष मंत्रालय को नोडल मंत्रालय नियुक्त किया गया तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सहयोग दिया।

नीति आयोग के निर्देशानुसार आयुष मंत्रालय ने सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के लिए ओरिएंटेशन सत्र आयोजित किए और 6 मई, 2025 को अवधारणा पत्र (Concept Note) साझा किया। फोकस्ड डायलॉग के लिए छह विषयगत उप-समूह गठित किए गए हैं, जिनमें प्रत्येक में 6–7 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं। ये उप-समूह निम्नलिखित विषयों और नोडल राज्यों के साथ बनाए गए हैं:

1]वित्तीय प्रबंधन, निगरानी एवं मूल्यांकन, परियोजना प्रबंधन

*राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश: राजस्थान, मिज़ोरम, मेघालय, चंडीगढ़, पश्चिम बंगाल, लक्षद्वीप

*नोडल राज्य: राजस्थान एवं मिज़ोरम

2]संगठनात्मक संरचना की समीक्षा, मानव संसाधन सुदृढ़ीकरण एवं क्षमता निर्माण

*राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश: मध्य प्रदेश, सिक्किम, गोवा, बिहार, दिल्ली, नागालैंड

*नोडल राज्य: मध्य प्रदेश एवं सिक्किम

3]आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ आयुष का एकीकरण, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम भी शामिल

*राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश: छत्तीसगढ़, जम्मू एवं कश्मीर, हरियाणा, ओडिशा, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश

*नोडल राज्य: छत्तीसगढ़ एवं अरुणाचल प्रदेश

4]आयुष संस्थानों के अंतर्गत गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ: अवसंरचना, IPHS आयुष मानक, स्वास्थ्य सेवा

*राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश: उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, अंडमान एवं निकोबार द्वीप, त्रिपुरा, मणिपुर

*नोडल राज्य: उत्तर प्रदेश एवं हिमाचल प्रदेश

5]आयुष औषधियों की गुणवत्ता आश्वासन एवं खरीद प्रणाली, ब्रांडिंग और पैकेजिंग

*राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश: कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, झारखंड, पुडुचेरी, असम

*नोडल राज्य: कर्नाटक एवं असम

5]विभिन्न क्षेत्रों में आईटी-सक्षम डिजिटल सेवाएँ

*राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश: आंध्र प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, दमन एवं दीव, केरल

*नोडल राज्य: केरल एवं महाराष्ट्र

सम्मेलन में देशभर से वरिष्ठ अधिकारी जैसे अतिरिक्त मुख्य सचिव, प्रधान सचिव, सचिव, महानिदेशक, मिशन निदेशक और आयुष आयुक्त शामिल होंगे। साथ ही आयुर्वेद, शोध, स्वास्थ्य नीति और डिजिटल गवर्नेंस के क्षेत्र के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ एवं पैनलिस्ट भी सत्रों को समृद्ध करेंगे। इनमें डॉ. वी. के. पॉल (सदस्य, नीति आयोग), जे. एल. एन. शास्त्री (आयुर्वेद विद्वान), डॉ. वी. एम. कटोच (पूर्व महानिदेशक, ICMR), प्रो. भूषण पाटवर्धन और कई अन्य शामिल हैं।

इन विषयों और राज्य/केंद्रशासित प्रदेश समूहों की रूपरेखा बड़ी सावधानी से तय की गई है, जो वित्तीय प्रबंधन और संगठनात्मक सुधार से लेकर गुणवत्ता आश्वासन और आईटी-समर्थित सेवाओं तक के क्षेत्रों को कवर करती है। प्रत्येक उप-विषय का संचालन दो नोडल राज्यों द्वारा किया जाएगा ताकि केंद्रित और प्रभावी विमर्श सुनिश्चित हो सके।

यह विभागीय शिखर सम्मेलन भारत सरकार की इस प्रतिबद्धता को पुनः रेखांकित करता है कि आयुष प्रणालियों को देश की स्वास्थ्य देखभाल संरचना का अभिन्न अंग बनाया जाए, जिससे सेवाओं की पहुँच, गुणवत्ता और दक्षता में वृद्धि हो सके। यह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के स्तर पर क्षमता निर्माण के महत्व को भी रेखांकित करता है, ताकि राष्ट्रीय आयुष मिशन की पूरी क्षमता को साकार किया जा सके।


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