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मुख्य न्यायाधीश ने किया राजनांदगांव जिला न्यायालय का विस्तृत निरीक्षण, न्यायिक अधोसंरचना और डिजिटल व्यवस्था का लिया जायजा

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राजनांदगांव- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने शनिवार को राजनांदगांव जिला न्यायालय का विस्तृत निरीक्षण कर न्यायिक कार्यप्रणाली, अधोसंरचना एवं डिजिटल सुविधाओं का जायजा लिया।

निरीक्षण के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक अधिकारियों, जिला अधिवक्ता संघ के पदाधिकारियों एवं सदस्यों तथा न्यायालयीन कर्मचारियों से संवाद कर न्यायिक व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।

अपने प्रवास के दौरान उन्होंने जिला न्यायालय परिसर स्थित विभिन्न न्यायालय कक्षों, सेंट्रल प्रोसेस अनुभाग, सर्वर कक्ष, लीगल एड डिफेंस सिस्टम, अभिलेखागार, मालखाना, लेखा अनुभाग, पुस्तकालय, डिजिटलीकरण एवं स्कैनिंग केंद्र, पीड़ित विश्राम कक्ष तथा ‘किलकारी कक्ष’ सहित अन्य विभागों का निरीक्षण किया और उपलब्ध मूलभूत सुविधाओं की समीक्षा की।

मुख्य न्यायाधीश ने न्यायालयीन कार्यों में कार्यकुशलता, जवाबदेही, अभिलेखों के सुव्यवस्थित रखरखाव तथा न्यायालय परिसर की स्वच्छता बनाए रखने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने न्यायालयों में पेपरलेस कार्यप्रणाली को बढ़ावा देने तथा आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के अधिकाधिक उपयोग के निर्देश देते हुए न्याय व्यवस्था को और अधिक नागरिक-केंद्रित बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

उन्होंने कहा कि न्यायिक अधोसंरचना का आधुनिकीकरण और डिजिटल तकनीकों का प्रभावी उपयोग समय की आवश्यकता है, जिससे आम नागरिकों को त्वरित, पारदर्शी और सुलभ न्याय उपलब्ध कराया जा सके।

उल्लेखनीय है कि मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा पदभार ग्रहण करने के बाद से लगातार प्रदेश के विभिन्न जिला एवं दूरस्थ न्यायालयों का दौरा कर न्यायिक व्यवस्थाओं की जमीनी स्थिति का आकलन कर रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में राज्य की अदालतों में आधुनिकीकरण, डिजिटलीकरण एवं न्यायिक अधोसंरचना के सुदृढ़ीकरण को नई गति मिली है।

निरीक्षण के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने जिला न्यायालय परिसर में मौलश्री के पौधे का रोपण भी किया और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।

इस अवसर पर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल, जॉइंट रजिस्ट्रार-सह-प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी, प्रोटोकॉल अधिकारी, प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, राजनांदगांव, जिले के सभी न्यायिक अधिकारी, जिला अधिवक्ता संघ के पदाधिकारी एवं अधिवक्ता, जिला कलेक्टर, लोक निर्माण विभाग तथा पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और न्यायालयीन कर्मचारी उपस्थित रहे।

श्रीनगर में 17 फरवरी को टेली-लॉ और DISHA योजना पर क्षेत्रीय कार्यक्रम एवं कार्यशाला का आयोजन

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श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर):- न्याय तक समग्र पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से टेली-लॉ (Tele-Law) पहल के तहत DISHA योजना के अंतर्गत एक क्षेत्रीय कार्यक्रम सह कार्यशाला का आयोजन 17 फरवरी 2026 को श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर (SKICC) में किया जाएगा। यह कार्यक्रम दोपहर 12 बजे से शुरू होगा।

यह कार्यशाला भारत सरकार के कानून और न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग (Department of Justice) द्वारा “न्याय तक पहुंच” प्रभाग के तहत आयोजित की जा रही है, जिसका उद्देश्य तकनीक आधारित कानूनी सेवाओं के माध्यम से न्याय तक पहुंच को मजबूत करना है।

150 वर्ष पूरे होने पर ‘वंदे मातरम्’ से होगी शुरुआत

कार्यक्रम की शुरुआत भारत के राष्ट्रीय गीत “वंदे मातरम्” के सामूहिक गायन से होगी, जो राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा है।

DISHA योजना के विभिन्न आयामों पर चर्चा

कार्यक्रम के दौरान “DISHA योजना के आयाम: सुगम एवं सुलभ न्याय तक पहुंच” सत्र आयोजित किया जाएगा, जिसमें कानूनी साक्षरता बढ़ाने के लिए सामुदायिक आउटरीच कार्यक्रमों, डिजिटल अभियानों और शैक्षणिक संस्थानों व नागरिक समाज संगठनों के साथ साझेदारी जैसे प्रयासों को प्रस्तुत किया जाएगा। खास तौर पर वंचित और कमजोर वर्गों तक सरल और तकनीक आधारित प्लेटफॉर्म के माध्यम से पहुंच बनाने पर जोर दिया जाएगा।

जम्मू-कश्मीर में DISHA योजना की झलक

कार्यक्रम में “DISHA in J&K: एक झलक” सत्र भी होगा, जिसमें केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में कानूनी जागरूकता बढ़ाने और न्याय तक पहुंच सुधारने के लिए किए जा रहे प्रयासों को प्रदर्शित किया जाएगा।

उपलब्धि हासिल करने वालों का सम्मान और ई-कैलेंडर का विमोचन

कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षणों में DISHA योजना से जुड़े उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों और संस्थानों को सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा न्याय विभाग का वार्षिक ई-कैलेंडर भी जारी किया जाएगा, जिसमें वर्ष भर की गतिविधियों और जागरूकता अभियानों का रोडमैप होगा।

केंद्रीय मंत्री और शीर्ष न्यायिक अधिकारियों की उपस्थिति

कार्यक्रम में कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, तथा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री अरुण पाली की गरिमामयी उपस्थिति रहेगी।

करीब 800 प्रतिभागियों की भागीदारी

इस कार्यशाला में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश, हाईकोर्ट रजिस्ट्री के अधिकारी, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारी, बार एसोसिएशन के अधिवक्ता, सरकारी वकील, न्यायिक अधिकारी, कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के वीएलई, विश्वविद्यालयों और विधि महाविद्यालयों के फैकल्टी व छात्र, तथा केंद्र और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे। इसके अलावा कई नागरिक और हितधारक वर्चुअल माध्यम से भी जुड़ेंगे।

न्याय तक पहुंच को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम

यह क्षेत्रीय कार्यशाला देशभर में आयोजित की जा रही श्रृंखला का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य टेली-लॉ और न्याय तक पहुंच कार्यक्रमों की प्रभावशीलता बढ़ाना, राज्य प्रशासन के साथ सहयोग मजबूत करना और अंतिम व्यक्ति तक न्याय सेवा पहुंचाना है। श्रीनगर में यह कार्यक्रम क्षेत्र में न्याय वितरण प्रणाली को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करेगा।


राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस 2025: डिजिटल न्याय के माध्यम से कुशल और त्वरित निपटान

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परिचय

भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस प्रतिवर्ष 24 दिसंबर को मनाया जाता है, ताकि उपभोक्ता अधिकारों और उपभोक्ता संरक्षण के व्यापक ढांचे के महत्व को उजागर किया जा सके। इसी दिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 को राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त हुई थी, जिसने उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा, जानकारी, सुनवाई, शिकायत निवारण और जागरूकता सहित कई अधिकार सुनिश्चित किए। 2025 का विषय है: “डिजिटल न्याय के माध्यम से कुशल और त्वरित निपटान”, जो उपभोक्ता शिकायत निवारण में प्रौद्योगिकी-समर्थित, सुलभ और त्वरित समाधान पर केंद्रित है।

कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएँ

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस 2025 के अवसर पर कई लॉन्च, सम्मान और घोषणाएँ की जाएँगी, जो उपभोक्ता संरक्षण, जागरूकता और संस्थागत क्षमता को मजबूत करेंगी। कार्यक्रम डिजिटल शिकायत निवारण, गुणवत्ता आश्वासन, कानूनी मापदंड और उपभोक्ता जागरूकता में प्रगति को उजागर करेगा।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019

20 जुलाई 2020 को लागू यह अधिनियम 1986 के अधिनियम की जगह लेता है और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा के लिए आधुनिक ढांचा प्रस्तुत करता है। यह अधिनियम उपभोक्ताओं को जानकारीपूर्ण निर्णय लेने, निष्पक्ष लेन-देन सुनिश्चित करने और त्वरित शिकायत निवारण प्रदान करता है।

शिकायत निवारण के लिए तीन-स्तरीय ढांचा है:

  1. जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम – 50 लाख रुपये तक के दावे।

  2. राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग – 50 लाख से 2 करोड़ रुपये तक।

  3. राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) – 2 करोड़ रुपये से अधिक के मामले।

जुलाई 2025 में 10 राज्यों और NCDRC ने 100% से अधिक निपटान दर दर्ज की, जो तेजी से शिकायत निवारण और दक्षता में सुधार को दर्शाता है।

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA)

CCPA उपभोक्ताओं के सामूहिक हितों की रक्षा के लिए कार्य करता है। इसके कार्य:

  • उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा और प्रवर्तन

  • अनुचित व्यापार प्रथाओं को रोकना

  • विज्ञापनों की निगरानी और गलत जानकारी देने वालों के खिलाफ कार्रवाई

  • असुरक्षित वस्तुओं और सेवाओं को वापस मंगवाना

उपभोक्ता कल्याण निधि

यह निधि उपभोक्ता हितों की सुरक्षा और आंदोलन को मजबूत करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता देती है। 2024-25 में 38.68 करोड़ रुपये जारी किए गए।

e-Jagriti – डिजिटल उपभोक्ता न्याय

1 जनवरी 2025 को लॉन्च, यह प्लेटफॉर्म शिकायत दायर करने, भुगतान करने, वर्चुअल सुनवाई में भाग लेने और मामले की प्रगति देखने की सुविधा देता है।

  • 1.35 लाख से अधिक केस दायर

  • 1.31 लाख से अधिक निपटान

  • NRI सहित 2.81 लाख पंजीकृत उपयोगकर्ता

राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 2.0 (NCH 2.0)

  • AI-सक्षम, बहुभाषी सहायता

  • वार्षिक 12 लाख से अधिक शिकायतें निवारण

  • WhatsApp चैनल से 20% शिकायतें

Jago Grahak Jago पोर्टल और ऐप

  • धोखाधड़ी वाले ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की निगरानी

  • संदिग्ध URL रिपोर्टिंग

भारतीय मानक ब्यूरो (BIS)

  • 22,300 से अधिक भारतीय मानक लागू

  • BIS Care ऐप से सोने-चाँदी के आभूषण की हॉलमार्किंग जांच

नेशनल टेस्ट हाउस (NTH)

  • परीक्षण, प्रमाणन और गुणवत्ता नियंत्रण

  • डिजिटल समाधान और मोबाइल ऐप के माध्यम से संचालन में सुधार

  • 2024-25 में 45,926 नमूनों का परीक्षण, राजस्व 44.45 करोड़ रुपये

कानूनी मापदंड (Legal Metrology) 2025

  • मेडिकल उपकरण और पैक्ड सामान के लेबलिंग नियमों में संशोधन

  • ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर ‘Country of Origin’ फिल्टर अनिवार्य

  • पान मसाला पैकेज पर खुदरा मूल्य दिखाना अनिवार्य

निष्कर्ष

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस 2025 भारत की उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा और बाजार में विश्वास को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे e-Jagriti और NCH 2.0 ने शिकायत निवारण की पहुँच, पारदर्शिता और दक्षता में सुधार किया है। BIS, NTH और कानूनी मापदंड सुधारों ने गुणवत्ता और मानकीकरण को मजबूत किया। ये सभी पहल उपभोक्ता-केंद्रित पारिस्थितिकी तंत्र की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाती हैं।

राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के तहत ईकोर्ट्स मिशन मोड परियोजना (फेज-III) में ₹7,210 करोड़ का कार्यान्वयन जारी

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लोकसभा में आज केंद्रीय कानून और न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने जानकारी दी कि राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के तहत ईकोर्ट्स मिशन मोड परियोजना (फेज-III) ₹7,210 करोड़ की अनुमानित लागत के साथ भारतीय न्यायपालिका में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) को सुदृढ़ करने के लिए कार्यान्वित की जा रही है। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रणाली का डिजिटल रूपांतरण करना, न्यायिक उत्पादकता को गुणात्मक और मात्रात्मक रूप से बढ़ाना, तथा न्याय वितरण प्रणाली को सुलभ, किफायती, विश्वसनीय और पारदर्शी बनाना है।

फेज-III के तहत “Future Technological Advancements (AI, Blockchain आदि)” के लिए ₹53.57 करोड़ आवंटित किए गए हैं, ताकि आधुनिक तकनीकों को सुव्यवस्थित और सहज उपयोगकर्ता अनुभव के लिए एकीकृत किया जा सके। इसके अंतर्गत, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने न्यायिक क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग का अध्ययन करने के लिए AI कमिटी का गठन किया है। हालांकि, न्यायिक प्रक्रियाओं में AI उपकरणों को अपनाने के लिए कोई औपचारिक नीति या दिशानिर्देश अभी तक जारी नहीं हैं, क्योंकि AI आधारित समाधान नियंत्रित पायलट चरण में हैं और केवल परियोजना DPR (फेज-III) में अनुमोदित क्षेत्रों में ही उपयोग किए जा रहे हैं।

न्यायपालिका यह भी समझती है कि न्यायिक प्रक्रियाओं में AI के एकीकरण से एल्गोरिथमिक पक्षपात, भाषा एवं अनुवाद की समस्याएँ, डेटा गोपनीयता और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ, और AI-निर्मित आउटपुट के मैनुअल सत्यापन जैसी चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट ई-कमिटी ने छह उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और तकनीकी विशेषज्ञों की एक उप-समिति का गठन किया है, जो डेटा और गोपनीयता सुरक्षा के लिए सुरक्षित कनेक्टिविटी और प्रमाणीकरण तंत्र, डिजिटल अवसंरचना और सेवा वितरण प्रणालियों का मूल्यांकन करेगी।

AI आधारित एक सॉफ्टवेयर टूल ‘Legal Research Analysis Assistant (LegRAA)’ विकसित किया गया है, जो न्यायाधीशों को कानूनी शोध और दस्तावेज़ विश्लेषण में सहायता करता है। इसके अलावा, Digital Courts 2.1 नामक उन्नत प्लेटफॉर्म विकसित किया गया है, जो न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों को केस से संबंधित जानकारी और कार्यों का एकल विंडो प्रबंधन प्रदान करता है। इस प्लेटफॉर्म में AI-सक्षम वॉइस-टू-टेक्स्ट (ASR-SHRUTI) और अनुवाद (PANINI) कार्यक्षमता शामिल है, जो आदेश और निर्णय लिखने में न्यायाधीशों की मदद करती है।

वर्तमान में AI आधारित समाधानों के पायलट चरण में सुप्रीम कोर्ट ई-कमिटी ने कोई सिस्टमिक पक्षपात, अनचाहा कंटेंट या अन्य समस्याएँ नहीं पाई हैं।

यह पहल भारतीय न्यायपालिका में तकनीकी नवाचार और डिजिटल सक्षम न्याय वितरण को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

भारत ने स्पेन में 10वें OECD ग्लोबल राउंडटेबल में न्याय व्यवस्था में डिजिटल नवाचार और समावेशी सुधारों का प्रदर्शन किया

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उपराष्ट्रपति (स्वतंत्र प्रभार) कानून और न्याय मंत्री, अर्जुन राम मेघवाल ने स्पेन के मैड्रिड में आयोजित 10वें OECD ग्लोबल राउंडटेबल ऑन इक्वल एक्सेस टू जस्टिस में भाग लिया। इस राउंडटेबल का मुख्य विषय था “डेटा-ड्रिवन और रिसिलिएंट जस्टिस सिस्टम्स फॉर शेयरड प्रॉस्पेरिटी”।

इस राउंडटेबल में न्याय मंत्री, वरिष्ठ न्यायिक प्रशासक, वैश्विक नेता, नीति निर्माता और विशेषज्ञ शामिल हुए, जिनका उद्देश्य न्याय संस्थानों को तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया, आर्थिक अनिश्चितता और नागरिक अपेक्षाओं के बीच भरोसेमंद और उत्तरदायी बनाना था।

मेघवाल ने अपने संबोधन में भारत की न्याय व्यवस्था में लोग-केंद्रित, तकनीक-सक्षम और समावेशी सुधारों की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 39A का हवाला देते हुए कहा कि भारत का संविधान न्याय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि को बनाए रखता है, जो सभी के लिए समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता सुनिश्चित करता है।

उन्होंने डॉ. बी. आर. अंबेडकर के उद्धरण के माध्यम से न्याय की सार्वभौमिकता और समानता पर जोर दिया। मंत्री ने बताया कि भारत की न्याय सुधार पहल का उद्देश्य न्याय को केवल सुलभ ही नहीं बल्कि संवेदनशील और हर नागरिक की जरूरतों के अनुसार उत्तरदायी बनाना है।

ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट:

मेघवाल ने भारत के ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट का विवरण दिया, जो विश्व के सबसे बड़े डिजिटल न्याय सुधारों में से एक है। इसका तीसरा चरण (2023–2027) चल रहा है, जिसमें एआई, मशीन लर्निंग और नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग जैसी तकनीकों का उपयोग कर स्मार्ट, पेपरलेस और इंटीग्रेटेड कोर्ट्स स्थापित किए जा रहे हैं। अब तक 560 करोड़ से अधिक न्यायिक रिकॉर्ड डिजिटाइज किए जा चुके हैं और 3.86 करोड़ से अधिक सुनवाई वर्चुअली हो चुकी हैं।

COVID-19 महामारी के दौरान लगभग 43 मिलियन वर्चुअल सुनवाइयां आयोजित की गईं। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में लाइव स्ट्रीमिंग, AI और NLP आधारित टूल्स से न्यायिक पारदर्शिता को बढ़ावा मिला। इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) पुलिस, अभियोजन, जेल और फोरेंसिक से डिजिटल रूप से जुड़कर त्वरित और प्रमाण-आधारित निर्णय लेने में मदद कर रहा है।

DISHA और Tele-Law:

मंत्री ने भारत की प्रमुख पहल DISHA (Designing Innovative Solutions for Holistic Access to Justice) और Tele-Law का विवरण भी दिया। इन पहलों के तहत 1.1 करोड़ से अधिक नागरिकों को 22 भारतीय भाषाओं में मुफ्त कानूनी सलाह दी गई। Nyaya Setu और Vidhi Baithaks जैसी पहलें भी न्याय तक पहुँच सुनिश्चित कर रही हैं।

AI और न्याय प्रणाली:

उन्होंने बताया कि भारत में न्याय प्रणाली में AI का उपयोग मानव-नियंत्रित, नैतिक और गोपनीयता-संवेदनशील है। SUVAS (सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ़्टवेयर), SUPACE (सुप्रीम कोर्ट पोर्टल असिस्टेंस) और AI आधारित केस मैनेजमेंट सिस्टम्स के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया में गति, सटीकता और पहुंच बढ़ रही है।

वैश्विक सहयोग:

मेघवाल ने याद दिलाया कि भारत ने 2023 में "1st Regional Conference on Access to Legal Aid" की मेजबानी की थी, जिसमें 51 देशों के 191 प्रतिभागियों ने भाग लिया। भारत ने OECD और अन्य देशों के साथ नैतिक AI शासन, डेटा इंटरऑपरेबिलिटी और डिजिटल समावेशन पर सहयोग की प्रतिबद्धता दोहराई।

भारत की प्रतिनिधि टीम में लॉ सेक्रेटरी डॉ. अंजू राठी राणा भी शामिल थीं।

मेघवाल ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” के आदर्श के तहत सभी देशों से सहयोग, विश्वास और समान न्याय के लिए वैश्विक समझौते बनाने का आह्वान किया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने CAT में लंबित मामलों के त्वरित निपटान और तकनीकी सुधारों पर जोर दिया

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केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) को सेवा-संबंधी मामलों में निपटान तेज करने पर जोर, तकनीकी और आधुनिक प्रबंधन पर ध्यान देने का आह्वान

केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और पीएमओ, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन विभाग राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज सभी संबंधित पक्षों से आग्रह किया कि वे यह सुनिश्चित करें कि केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) अपने मूल उद्देश्य के अनुरूप उच्च न्यायालयों में सेवा-संबंधी मामलों की लंबित संख्या को कम करने का काम पूरा करे। उन्होंने उच्च न्यायालयों में अनावश्यक अपीलों से बचने के उपाय खोजने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि CAT का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कर्मचारियों को न्याय त्वरित और अंतिम स्तर पर उपलब्ध हो, जिससे न्यायिक प्रक्रियाओं में सुगमता आए।

भारत मंडपम में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के 10वें अखिल भारतीय सम्मेलन में बोलते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने न्यायपालिका के सदस्यों से स्वयं आगे आने और CAT में कार्यभार लेने का आग्रह किया, “न्याय प्रशासन के हित में और राष्ट्र की सेवा में।” उन्होंने कहा कि ऐसी भूमिकाओं को स्वीकार करने में अनिच्छा के कारण अतीत में न्यायाधिकरण के कामकाज में संशोधन करना पड़ा, जिसमें प्रशासनिक सदस्यों को न्यायिक सदस्यों की अनुपस्थिति में बेंच का नेतृत्व करने की अनुमति शामिल थी।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने उपस्थित लोगों को याद दिलाया कि CAT 1985 में संविधान के अनुच्छेद 323-A के तहत स्थापित किया गया था, ताकि सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों को त्वरित और किफायती न्याय उपलब्ध हो सके और उच्च न्यायालयों पर सेवा-संबंधी मुकदमों का बोझ कम हो।

मंत्री ने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि न्यायाधिकरण में सभी रिक्त पदों को भर दिया गया, जिससे यह पूर्ण क्षमता के साथ कार्य कर सके। उनका कहना था कि अगली चुनौती लंबित मामलों को समयबद्ध तरीके से निपटाना और आधुनिक केस प्रबंधन प्रणालियों को अपनाना है।

न्यायिक प्रक्रियाओं में तकनीक की बढ़ती भूमिका को उजागर करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने ई-फाइलिंग, रिकॉर्ड्स का डिजिटलीकरण और वर्चुअल सुनवाइयों में हुई प्रगति का उल्लेख किया, जिसने महामारी के दौरान भी न्यायिक प्रक्रिया को सुचारू बनाए रखा। उन्होंने तेज़ और सुसंगत निर्णय सुनिश्चित करने के लिए AI-समर्थित केस प्रबंधन प्रणालियों की योजनाओं के बारे में भी बात की, बिना न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता किए।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने सुझाव दिया कि CAT अपनी बेंचों के बीच प्रदर्शन मापदंडों को अपनाए, जैसे निपटान दर, लंबित मामलों में कमी, तकनीक का उपयोग और वादी संतोष। उन्होंने कहा कि ऐसे उपाय सर्वोत्तम प्रथाओं के साझा करने को प्रोत्साहित करेंगे और पारदर्शिता में सुधार करेंगे।

सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए, उन्होंने बताया कि अधिकांश CAT बेंचों के पास अब समर्पित परिसरों की सुविधा है और बुनियादी ढांचे और मानव संसाधन को और मजबूत करने के प्रयास जारी हैं। उन्होंने अंत में जोर दिया कि जबकि सरकार संसाधन और तकनीक प्रदान कर सकती है, न्याय वितरण में ईमानदारी और सेवा की भावना उन लोगों की जिम्मेदारी है जिन्हें न्याय देने का दायित्व सौंपा गया है।

मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति बी.आर. गवैया ने अपने उद्घाटन भाषण में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह न्याय तक पहुँच आसान बनाने और उच्च न्यायालयों पर बोझ कम करने में अहम है। न्यायमूर्ति गवैया ने सुझाव दिया कि सरकारी विभागों को मामलों की समीक्षा करने के लिए नोडल कार्यालय स्थापित करने चाहिए, इससे पहले कि वे आगे की कानूनी कार्रवाई करें। उन्होंने AI का उपयोग करके मामलों को वर्गीकृत करने और फैसलों का कई भाषाओं में अनुवाद करने की वकालत की, साथ ही ट्रिब्यूनलों के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का सुझाव दिया।

स्वागत भाषण में, केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति रंजीत मोरे ने न्यायाधिकरण की अनूठी भूमिका और इसकी जरूरतों पर प्रकाश डाला, जो सामान्य अदालतों से भिन्न हैं। उन्होंने प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 की पृष्ठभूमि बताई और CAT के बेंचों और सर्किट बेंचों के विकास की जानकारी दी, जो देशभर में वादी के दरवाजे तक न्याय पहुंचाने की दृष्टि से स्थापित की गई थीं। उन्होंने सेवा न्यायशास्त्र में न्यायाधिकरण की बढ़ती भूमिका और समय पर न्याय सुनिश्चित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।

केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि जबकि CAT के निर्णय सराहनीय हैं, दोनों पक्षों द्वारा अपील की प्रक्रिया न्याय में देरी करती है और इसे नियंत्रित करना आवश्यक है। उन्होंने डिजिटल केस प्रबंधन और पारदर्शिता को सुधार के लिए महत्वपूर्ण बताया। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरामण ने CAT के विकास को एक विश्वसनीय संस्था के रूप में देखा और इसके सफलता के लिए योग्य नियुक्तियों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने न्यायाधिकरण के सदस्यों के लिए अधिक कार्यशालाओं और क्षमता निर्माण की आवश्यकता भी जताई।

इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले, और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, बार काउंसिल और संघों के सदस्य, तथा विधिक समुदाय के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे।


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