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भारत को स्वदेशी ड्रोन निर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए मिशन मोड में काम जरूरी: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

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नई दिल्ली- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि आने वाले वर्षों में भारत को स्वदेशी ड्रोन निर्माण का वैश्विक केंद्र (Global Hub) बनाने के लिए मिशन मोड में कार्य करना होगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों और बदलते युद्ध के स्वरूप को देखते हुए ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीक भविष्य की युद्ध रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।


रक्षा मंत्री नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आयोजित दो दिवसीय नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस सम्मेलन का आयोजन रक्षा उत्पादन विभाग द्वारा ‘एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजीज’ थीम पर किया गया है।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत को केवल ड्रोन तैयार करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ड्रोन के सभी महत्वपूर्ण घटकों—सॉफ्टवेयर, इंजन, बैटरी और अन्य तकनीकी हिस्सों—का निर्माण भी देश में ही करना होगा। उन्होंने बताया कि दुनिया के कई देशों में ड्रोन निर्माण के लिए अभी भी महत्वपूर्ण पुर्जे चीन से आयात किए जाते हैं, और भारत को इस निर्भरता को कम करते हुए आत्मनिर्भर बनना होगा।

रक्षा मंत्री ने कहा कि देश का रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) बड़े उद्योगों, MSMEs, स्टार्ट-अप्स और नवाचारकर्ताओं के सहयोग से मजबूत बनता है। उन्होंने निजी क्षेत्र को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया और भरोसा दिलाया कि सरकार भारत को स्वदेशी ड्रोन निर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए हर संभव सहयोग देगी।

इस अवसर पर रक्षा मंत्री ने Defence India Start-up Challenge (DISC-14) और ADITI 4.0 चैलेंज का शुभारंभ किया। इन पहलों के तहत रक्षा बलों, भारतीय तटरक्षक बल और रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी की ओर से कुल 107 समस्या कथन जारी किए गए हैं, जिनका उद्देश्य स्टार्ट-अप्स और नवाचारकर्ताओं को नई तकनीकों और समाधान विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसके अलावा, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSUs) द्वारा 101 नवाचार चुनौतियों की एक नई पहल भी शुरू की गई है, जिससे MSMEs और स्टार्ट-अप्स को डिजाइन-आधारित नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।

रक्षा मंत्री ने Innovations for Defence Excellence (iDEX) और ADITI को रक्षा क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने वाली गेम-चेंजर पहल बताया। उन्होंने बताया कि फरवरी 2026 तक लगभग 676 स्टार्ट-अप्स, MSMEs और नवाचारकर्ता इस रक्षा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ चुके हैं। अब तक 548 अनुबंध किए जा चुके हैं और 566 चुनौतियां शुरू की गई हैं। इनमें से 58 प्रोटोटाइप को लगभग ₹3,853 करोड़ के मूल्य के साथ खरीद के लिए स्वीकृति मिल चुकी है, जबकि लगभग ₹2,326 करोड़ के 45 खरीद अनुबंध पहले ही किए जा चुके हैं।

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज MSMEs कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। उन्होंने MSMEs और स्टार्ट-अप्स से आग्रह किया कि वे इंडस्ट्री 4.0 तकनीकों को अपनाकर अपनी क्षमता और संसाधनों का बेहतर उपयोग करें। उन्होंने ‘डिजिटल ट्विन’ जैसी आधुनिक तकनीकों का भी उल्लेख किया, जो जटिल प्रणालियों को समझने और बेहतर निर्णय लेने में सहायक होती हैं।

उन्होंने MSMEs की क्षमता बढ़ाने के लिए हॉरिजॉन्टल और वर्टिकल इंटीग्रेशन की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनके अनुसार, MSMEs का आपसी सहयोग और बड़े उद्योगों के साथ साझेदारी एक मजबूत नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करने में मदद करेगी।

रक्षा मंत्री ने बताया कि सरकार MSMEs को मजबूत बनाने के लिए लगातार कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि हाल के बजट में MSMEs के लिए इक्विटी, लिक्विडिटी और प्रोफेशनल सपोर्ट प्रदान करने की तीन-स्तरीय रणनीति अपनाई गई है, जिससे वे ‘चैंपियन MSMEs’ के रूप में उभर सकें।

उन्होंने यह भी बताया कि 2012-13 में देश में MSMEs की संख्या लगभग 4.67 करोड़ थी, जो अब बढ़कर लगभग 8 करोड़ हो गई है। सरकार ने MSMEs के पंजीकरण और पहचान को आसान बनाने के लिए Udyam Portal और Udyam Assist Portal जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म भी शुरू किए हैं।

कार्यक्रम के दौरान रक्षा मंत्री ने रक्षा उत्पादन विभाग की पांच महत्वपूर्ण प्रकाशन भी जारी किए, जिनका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, निर्यात को बढ़ावा और उद्योगों के लिए सुगम व्यवसाय वातावरण तैयार करना है। साथ ही, सम्मेलन में एक प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया गया, जिसमें भारतीय और विदेशी कंपनियों ने AI, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और स्मार्ट मटेरियल्स जैसी उन्नत विनिर्माण तकनीकों का प्रदर्शन किया।

इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान सहित सेना और रक्षा मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे।

रक्षा मंत्री ने अंत में MSMEs और स्टार्ट-अप्स से आह्वान किया कि वे नवाचार, नई तकनीकों को अपनाने और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ते हुए ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।

त्रि-सेवाओं का फ्यूचर वॉरफेयर कोर्स 02 फरवरी से नई दिल्ली में प्रारंभ

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त्रि-सेवाओं के फ्यूचर वॉरफेयर कोर्स का तृतीय संस्करण 02 से 25 फरवरी 2026 तक नई दिल्ली स्थित मानेकशॉ सेंटर में आयोजित किया जाएगा। यह पाठ्यक्रम मुख्यालय एकीकृत रक्षा स्टाफ के तत्वावधान में तथा सेंटर फॉर जॉइंट वॉरफेयर स्टडीज़ (CENJOWS) के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। इस संस्करण में सैन्य अभियानों में उभरते विशेषीकृत विषयों एवं डोमेन-विशिष्ट युद्धक विकास को समाहित करते हुए पाठ्यक्रम को और अधिक समृद्ध किया गया है।

यह कोर्स इस बात की गहन समझ विकसित करने पर केंद्रित है कि किस प्रकार प्रौद्योगिकी युद्ध संचालन को प्रभावित कर रही है, जिससे हमारी सोच, अवधारणाओं, सिद्धांतों, रणनीतियों तथा टैक्टिक्स, टेक्नीक्स और प्रोसीजर्स (TTPs) पर पुनर्विचार की आवश्यकता उत्पन्न हो रही है। पाठ्यक्रम के अंतर्गत महत्वपूर्ण विषयों का गहन अध्ययन, उभरती प्रौद्योगिकियों के व्यावहारिक प्रदर्शन तथा रक्षा बलों की क्षमताओं के लिए महत्वपूर्ण संस्थानों का भ्रमण भी शामिल है।

इस कोर्स में तीनों सेनाओं के अधिकारियों के साथ-साथ रक्षा उद्योग से जुड़े प्रतिनिधि—जिनमें स्टार्टअप्स, एमएसएमई, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (DPSUs) तथा निजी उद्योग शामिल हैं—भाग ले रहे हैं। सेनाओं से भाग लेने वाले अधिकारियों की वरिष्ठता मेजर से लेकर मेजर जनरल (एवं समकक्ष) तक है, जहाँ कनिष्ठ अधिकारी अपनी तकनीकी दक्षता एवं नवाचार दृष्टिकोण के साथ योगदान दे रहे हैं, वहीं वरिष्ठ अधिकारी अपने संचालन अनुभव एवं रणनीतिक ज्ञान से पाठ्यक्रम को समृद्ध कर रहे हैं।

फ्यूचर वॉरफेयर कोर्स का उद्देश्य सशस्त्र बलों की परिचालन प्राथमिकताओं को स्वदेशी रक्षा उद्योग की क्षमताओं के साथ संरेखित करना है तथा आधुनिक एवं भविष्य के युद्ध के विभिन्न पहलुओं पर मुक्त एवं सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करना है। इस दौरान पूर्व सैनिकों, सेवारत अधिकारियों, पूर्व राजदूतों, उद्योग विशेषज्ञों एवं शिक्षाविदों सहित विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ अपनी सहभागिता सुनिश्चित करेंगे, जिससे भारत की सुरक्षा चुनौतियों का व्यापक, गहन एवं पेशेवर विश्लेषण किया जा सके।

इसके अतिरिक्त, इस कोर्स में महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ पृथ्वी तत्वों, आपूर्ति श्रृंखला की संवेदनशीलताओं तथा क्षेत्रीय एवं वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य जैसे विषयों के विशेषज्ञ भी शामिल होंगे, जो भविष्य में परिचालन योजना एवं संचालन के लिए रक्षा बलों द्वारा अध्ययन एवं विश्लेषण किए जाने वाले विषयों के दायरे को और विस्तृत करेंगे।

सितंबर 2024 में आयोजित उद्घाटन संस्करण की सफलता के आधार पर, यह विस्तारित तीन सप्ताह का कार्यक्रम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान की उस परिकल्पना को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसका उद्देश्य अधिकारियों को आधुनिक युद्ध की जटिल चुनौतियों के लिए तैयार करना है।


DRDO की नई उपलब्धि: 77वें गणतंत्र दिवस पर दिखाएगा हाई-टेक रक्षा सिस्टम

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डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) 77वें गणतंत्र दिवस पर Kartavya Path पर Parade और Bharat Parv 2026 में देश की सुरक्षा के लिए विकसित अपनी प्रमुख तकनीकों को प्रदर्शित करेगा।

DRDO द्वारा प्रदर्शित प्रमुख प्रणालियाँ हैं:

Long Range Anti-Ship Hypersonic Missile (LR-AShM)
DRDO Tableau: ‘Naval Technologies for Combat Submarines’

LR-AShM (Kartavya Path पर प्रदर्शित)

DRDO LR-AShM को लॉन्चर के साथ परेड में दिखाएगा। यह मिसाइल भारतीय नौसेना की तटीय बैटरी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डिज़ाइन की गई है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल

  • स्थिर और गतिशील दोनों लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम

  • Mach 10 से शुरू होकर औसत Mach 5 की गति

  • क्वासी-बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी और कई “स्किप”

  • लो-एल्टीट्यूड पर उड़ान, जिससे रडार द्वारा पहचान कठिन

  • स्वदेशी एवियोनिक्स और हाई-एक्यूरेसी सेंसर

  • दो-स्टेज सॉलिड प्रोपल्शन

    • Stage 1 अलग हो जाती है

    • Stage 2 के बाद मिसाइल ग्लाइड करके लक्ष्य पर हमला करती है

DRDO Tableau (Bharat Parv, Red Fort)

DRDO का टेबलो 26 से 31 जनवरी 2026 तक Bharat Parv में प्रदर्शित होगा।

थीम:“Naval Technologies for Combat Submarines”

प्रदर्शित सिस्टम:

  1. Integrated Combat Suite (ICS)

  2. Wire Guided Heavy Weight Torpedo (WGHWT)

  3. Air Independent Propulsion (AIP)

Integrated Combat Suite (ICS)

  • नई पीढ़ी का सबमरीन-आधारित रक्षा प्रणाली

  • सिचुएशनल अवेयरनेस और युद्ध-तैयारी में मदद

  • 8 DRDO प्रयोगशालाओं एवं 150+ इंडस्ट्री पार्टनर्स का सहयोग

Wire Guided Heavy Weight Torpedo (WGHWT)

  • आधुनिक जहाज और सबमरीन खतरों को रोकने हेतु

  • उच्च गति और अधिक दूरी की क्षमता

  • भारतीय नौसेना के लिए मुख्य हथियार

Air Independent Propulsion (AIP)

  • सबमरीन को लंबे समय तक पानी के भीतर रहकर चलने की क्षमता

  • फॉस्फोरिक एसिड फ्यूल सेल और ऑनबोर्ड हाइड्रोजन जनरेटर

  • शांत और स्टील्थ संचालन

  • भविष्य की सबमरीन के लिए मॉड्यूलर डिज़ाइन

परेड में अन्य DRDO प्रणालियाँ

Kartavya Path पर Armed Forces contingents में DRDO के और भी कई सिस्टम प्रदर्शित होंगे, जैसे:

  • Arjun Main Battle Tank

  • Nag Missile System (NAMIS-II)

  • Advanced Towed Artillery Gun System

  • BrahMos Missile

  • Akash

  • Battlefield Surveillance Radar

  • Anti Tank Guided Missile

Aatmanirbhar Bharat की दिशा में DRDO का योगदान

DRDO ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए अकादमिक, उद्योग और सेवा संस्थाओं के साथ मिलकर कई उन्नत रक्षा प्रणालियाँ विकसित की हैं।
यह कदम रक्षा तकनीक में स्वदेशी विकास और Aatmanirbhar Bharat के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता है।


बेंगलुरु में ‘एयरोनॉटिक्स 2047’ राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ, वायुसेना प्रमुख ने किया उद्घाटन

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एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘एयरोनॉटिक्स 2047’ का शुभारंभ 4 जनवरी 2026 को बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (CABS) में हुआ। इस संगोष्ठी का उद्घाटन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने किया। अपने संबोधन में वायुसेना प्रमुख ने एलसीए तेजस की पहली उड़ान के 25 वर्ष पूर्ण होने पर ADA को बधाई दी तथा बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारतीय वायुसेना (IAF) की परिचालन तैयारियों को बनाए रखने के लिए निर्धारित समयसीमा के अनुरूप आपूर्ति सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

इस अवसर पर रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव एवं डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने आयात पर निर्भरता कम करने और विकसित भारत @2047 के विजन को साकार करने के लिए स्वदेशी अत्याधुनिक तकनीकों के विकास के महत्व को रेखांकित किया।

यह संगोष्ठी एयरोस्पेस समुदाय के विशेषज्ञों, औद्योगिक भागीदारों, शैक्षणिक संस्थानों, विमानन उत्साही लोगों तथा वक्ताओं को एक साझा मंच प्रदान कर रही है, जहाँ वे एयरोनॉटिक्स के विकास, डिजाइन नवाचार, विनिर्माण तथा भविष्य की संभावनाओं पर अपने विचार साझा कर रहे हैं। एयरोनॉटिक्स-2047 का मुख्य उद्देश्य आधुनिक एयरोस्पेस प्रौद्योगिकियों के विभिन्न पहलुओं का अन्वेषण करना है, जिनमें अगली पीढ़ी के विमानों के लिए विनिर्माण एवं असेंबली, डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग, उन्नत लड़ाकू विमानों के लिए एयरोडायनामिक्स, प्रणोदन प्रौद्योगिकियाँ, उड़ान परीक्षण तकनीकें, डिजिटल ट्विन तकनीक, प्रमाणन संबंधी चुनौतियाँ, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम एवं एवियोनिक्स, लड़ाकू विमानों के रखरखाव की चुनौतियाँ, विमान डिजाइन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा एक्चुएटर्स के लिए सटीक विनिर्माण शामिल हैं।

यह संगोष्ठी भारतीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के भविष्य और एलसीए तेजस की यात्रा—स्केच से स्क्वाड्रन तक—को भी रेखांकित करेगी। ADA द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया एलसीए तेजस अब तक 5,600 से अधिक सफल उड़ान परीक्षण पूरा कर चुका है। इस कार्यक्रम से 100 से अधिक डिजाइन एवं विकास केंद्र, जिनमें सरकारी प्रयोगशालाएँ, शैक्षणिक संस्थान और उद्योग शामिल हैं, जुड़े रहे। कार्बन कंपोजिट, हल्के पदार्थ, फ्लाई-बाय-वायर फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, डिजिटल यूटिलिटी मैनेजमेंट सिस्टम, ग्लास कॉकपिट जैसी कई विशिष्ट तकनीकों का विकास कर एलसीए को चौथी पीढ़ी का लड़ाकू विमान बनाया गया।

एलसीए एमके-1ए, स्वदेशी रूप से डिजाइन एवं निर्मित इस लड़ाकू विमान का उन्नत संस्करण है, जो भारतीय वायुसेना की परिचालन आवश्यकताओं को प्रभावी रूप से पूरा करेगा। एलसीए एमके-2 और एलसीए नेवी संस्करण वर्तमान में विकासाधीन हैं। संगोष्ठी के दौरान तेजस कार्यक्रम से जुड़े प्रतिष्ठित एवं अनुभवी विशेषज्ञों द्वारा तकनीकी व्याख्यानों की श्रृंखला भी प्रस्तुत की जाएगी।

एलसीए तेजस के विकास से भारत को अभूतपूर्व लाभ मिला है, क्योंकि देश ने अब स्वदेशी रूप से लड़ाकू विमान बनाने की क्षमता और सामर्थ्य दोनों हासिल कर ली हैं। एलसीए कार्यक्रम भारत के सबसे सफल स्वदेशी रक्षा कार्यक्रमों में से एक है, जिसके माध्यम से भारतीय वायुसेना को एक उत्कृष्ट वायु श्रेष्ठता लड़ाकू विमान प्राप्त हुआ है। अब तक 38 विमान (32 लड़ाकू और 6 प्रशिक्षक) भारतीय वायुसेना की दो स्क्वाड्रनों में शामिल किए जा चुके हैं।

संगोष्ठी के अंतर्गत बड़ी संख्या में पीएसयू, डीपीएसयू, उद्योग और एमएसएमई अपने स्वदेशी रूप से डिजाइन एवं विकसित एयरबोर्न अनुप्रयोगों से जुड़े उत्पादों का प्रदर्शन भी कर रहे हैं।

डीआरडीओ ने फाइटर एयरक्राफ्ट एस्केप सिस्टम का हाई-स्पीड रॉकेट-स्लेड परीक्षण सफलतापूर्वक किया

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने नियंत्रित वेग पर फाइटर विमान के एस्केप सिस्टम का सफल हाई-स्पीड रॉकेट-स्लेड परीक्षण किया है। चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL) के रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड (RTRS) सुविधा में किए गए इस परीक्षण ने कैनोपी सेवरेंस, इजेक्शन सीक्वेंसिंग और एयरक्रू रिकवरी को सफलतापूर्वक प्रमाणित किया।

यह परीक्षण एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के सहयोग से किया गया। यह जटिल डायनामिक परीक्षण भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल करता है, जिनके पास उन्नत इन-हाउस एस्केप सिस्टम परीक्षण क्षमता मौजूद है।

स्टैटिक परीक्षणों—जैसे नेट टेस्ट या ज़ीरो-ज़ीरो टेस्ट—की तुलना में डायनामिक इजेक्शन टेस्ट अधिक जटिल होते हैं और इजेक्शन सीट की कार्यक्षमता व कैनोपी सेवरेंस सिस्टम की प्रभावशीलता का वास्तविक मूल्यांकन करते हैं।

परीक्षण में LCA विमान के फोरबॉडी के साथ एक डुअल-स्लेड सिस्टम को ठोस प्रणोदक रॉकेट मोटरों के चरणबद्ध प्रज्वलन से नियंत्रित गति तक पहुंचाया गया।

इजेक्शन प्रक्रिया के दौरान प्रयुक्त एंथ्रोपोमोर्फिक टेस्ट डमी ने पायलट द्वारा अनुभव किए जाने वाले महत्वपूर्ण लोड, मोमेंट और एक्सेलेरेशन को रिकॉर्ड किया। पूरे इजेक्शन अनुक्रम को ऑनबोर्ड और ग्राउंड-बेस्ड इमेजिंग सिस्टम्स ने कैप्चर किया। परीक्षण को भारतीय वायुसेना (IAF) और इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन के अधिकारियों ने प्रत्यक्ष रूप से देखा।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO, IAF, ADA, HAL और उद्योग जगत को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर बधाई दी और इसे आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता का एक बड़ा मील का पत्थर बताया।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफल प्रदर्शन से जुड़े DRDO वैज्ञानिकों व टीम की सराहना की।

DRDO का इंडस्ट्री आउटरीच प्रोग्राम: आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को गति देने की दिशा में बड़ा कदम

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सरकार के आत्मनिर्भरता और विकसित भारत के विज़न को आगे बढ़ाते हुए, DRDO ने 1 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली स्थित DRDO भवन में एक Industry Outreach Programme आयोजित किया। इस कार्यक्रम में उत्तरी भारत की DRDO प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों और उनकी इंडस्ट्री पार्टनर्स ने भाग लिया। कुल 18 DRDO प्रयोगशालाओं के 220 वैज्ञानिक और विभिन्न रक्षा उद्योगों के 271 प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए।

कार्यक्रम में रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत मुख्य अतिथि थे, जबकि सचिव (रक्षा उत्पादन) संजीव कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस दौरान ‘DRDO की ToT Policy – 2025’ को लागू करने की नई प्रक्रिया भी जारी की गई।

कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएं

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ओपन हाउस चर्चा रहा, जिसमें विशिष्ट अतिथियों, DRDO विशेषज्ञों और सचिव (रक्षा उत्पादन) ने उद्योग जगत से प्राप्त प्रश्नों, सुझावों और चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। इस चर्चा का उद्देश्य PSUs और निजी उद्योगों के साथ मिलकर स्वदेशी रक्षा उत्पादन से जुड़े जटिल मुद्दों के समाधान तलाशना था।

इस दौरान DRDO मुख्यालय और विभिन्न प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों के बीच इन-हाउस ब्रेनस्टॉर्मिंग सत्र भी आयोजित किया गया। DRDO के कॉरपोरेट निदेशकों ने स्वदेशी अनुसंधान परियोजनाओं, नीतियों और प्रक्रियाओं की जानकारी साझा की, जो सेनाओं और अन्य सरकारी एजेंसियों के लिए उपयोगी साबित होंगी।

मुख्य वक्तव्य

DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भारतीय उद्योग की क्षमता पर विश्वास जताते हुए कहा कि आने वाले पाँच वर्षों में सरकारी नीतियाँ और परिपक्व होंगी तथा देश का स्वदेशी रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र कई गुना बढ़ेगा। उन्होंने DRDO के साथ साझेदारी में रक्षा क्षेत्र की विभिन्न तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उद्योगों को व्यापक अवसर उपलब्ध होने की बात कही।

सचिव (रक्षा उत्पादन) संजीव कुमार ने सरकार की स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों पर प्रकाश डाला और कहा कि वास्तविक आत्मनिर्भरता तभी संभव है जब डिज़ाइन से लेकर बड़े पैमाने पर निर्माण तक पूरा चक्र देश में ही पूरा किया जाए।

इंडस्ट्री सहयोग पर जोर

DG (Production Coordination & Services Interaction) डॉ. चंद्रिका कौशिक ने DRDO की इंडस्ट्री के साथ मिलकर स्वदेशीकरण बढ़ाने की पहलों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भारत अब रक्षा उपकरणों का आयातक होने से आगे बढ़कर शुद्ध रक्षा निर्यातक देश के रूप में उभर रहा है। उन्होंने उद्योगों को निरंतर R&D और DRDO के साथ गहरी सहभागिता के लिए प्रेरित किया।


भारतीय तटरक्षक ने पहली जहाज निर्माण, स्वदेशीकरण एवं आईटी सम्मेलन में किया बड़ा कदम

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भारतीय तटरक्षक बल (ICG) ने 27 नवंबर 2025 को कर्नाटक के मदिकेरी में पहली शिपबिल्डिंग, इंडिजेनाइजेशन एवं आईटी कॉन्फ्रेंस का सफल आयोजन किया। यह सम्मेलन भारत की समुद्री क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्धियों में से एक था आईसीजी और कोयंबटूर डिस्ट्रिक्ट स्मॉल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन एवं डिफेंस इनोवेशन एंड अटल इनक्यूबेशन सेंटर के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर। यह साझेदारी कोयंबटूर स्थित डिफेंस इनोवेशन हब के माध्यम से रक्षा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने और स्वदेशीकरण को गति देने का लक्ष्य रखती है।

अपने उद्घाटन भाषण में महानिदेशक परमेेश शिवमणि (DG ICG) ने स्वदेशी डिज़ाइन, मजबूत डिजिटल अवसंरचना और टिकाऊ सप्लाई चेन के माध्यम से शिपबिल्डिंग में आत्मनिर्भरता के रणनीतिक महत्व पर जोर दिया। उन्होंने भारतीय शिपयार्ड और उपकरण निर्माताओं के समर्थन की सराहना की, जिसने ICG की परिचालन क्षमता को मजबूत किया है। उन्होंने यह भी बताया कि 200वीं स्वदेशी निर्मित पोत (चौथा पॉल्यूशन कंट्रोल शिप) समुद्री परीक्षण के उन्नत चरण में है—जो ICG की तकनीकी दक्षता और इंजीनियरिंग उत्कृष्टता का प्रतीक है।

DG ने प्रोजेक्ट डिजिटल कोस्ट गार्ड की प्रगति का भी उल्लेख किया, जो ICG की सभी इकाइयों के लिए एक सुरक्षित, स्केलेबल और मजबूत डिजिटल नेटवर्क तैयार करने की दीर्घकालिक पहल है। उन्होंने कहा कि डिजिटल विस्तार का अनुपालन मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचे से होना चाहिए।

सम्मेलन के दौरान उन्होंने तीन महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी जारी किए:

  • ‘भारतीय तटरक्षक में शिपबिल्डिंग का इतिहास’ ई-बुक का टीज़र

  • ICG के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रोडमैप

  • ICG साइबर क्राइसिस मैनेजमेंट प्लान-2025

ये सभी दस्तावेज़ ICG की तकनीकी प्रगति, डिजिटल क्षमता-विकास और भविष्य-उन्मुख तैयारी की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

सम्मेलन ने समुद्री क्षेत्र से जुड़े विभिन्न हितधारकों के बीच सार्थक संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया। यह ICG को तकनीकी रूप से उन्नत, परिचालन रूप से सक्षम और पूर्णतः स्वदेशी समुद्री बल बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हुआ। वरिष्ठ गणमान्य व्यक्तियों, प्रमुख शिपयार्डों, उपकरण निर्माताओं, क्लासिफिकेशन सोसाइटीज और समुद्री विशेषज्ञों की भागीदारी ने इसे एक व्यापक मंच बनाया, जिसने आत्मनिर्भर भारत, तकनीकी नवाचार और ICG के डिजिटल परिवर्तन को गति देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भविष्य के युद्ध की तैयारी: मुख्यालय एकीकृत रक्षा स्टाफ करेगा ‘ब्रेनस्टॉर्मिंग सेशन 2.0’ का आयोजन

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मुख्यालय एकीकृत रक्षा स्टाफ (HQ IDS) द्वारा भारतीय रक्षा निर्माता सोसायटी (SIDM) के सहयोग से “ब्रेनस्टॉर्मिंग सेशन 2.0” का आयोजन 14 नवंबर 2025 को मानेकशॉ सेंटर, नई दिल्ली में किया जाएगा। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय होगा — ‘भविष्य के युद्ध के लिए रक्षा उद्योग पारिस्थितिकी तंत्र का उपयोग’ (Leveraging Defence Industry Ecosystem for Future Warfare)।

कार्यक्रम को जनरल अनिल चौहान, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, और रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार संबोधित करेंगे। यह एक दिवसीय सत्र रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों की अध्यक्षता में आयोजित कई उच्च-स्तरीय चर्चाओं से युक्त होगा, जिसमें मुख्यालय IDS, तीनों सेनाओं के मुख्यालय, रक्षा उत्पादन विभाग, DRDO, शैक्षणिक संस्थान और रक्षा निर्माण उद्योगों के वरिष्ठ अधिकारी भाग लेंगे।

चर्चा का केंद्र भविष्य के युद्ध से संबंधित महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर रहेगा — जैसे गोला-बारूद एवं विस्फोटक, स्वायत्त प्रणालियाँ (Autonomous Systems) और भविष्य की प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान एवं विकास (R&D)।

यह कार्यक्रम राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र के प्रमुख हितधारकों को एक मंच पर लाकर प्राथमिक चुनौतियों की पहचान, विकास के अवसरों की खोज, और व्यावहारिक कार्य योजनाओं के निर्माण को प्रोत्साहित करेगा।

इस सत्र से प्राप्त निष्कर्ष आत्मनिर्भरता (Aatmanirbharta) को आगे बढ़ाने, भविष्य के युद्ध क्षेत्रों में भारत की नेतृत्व क्षमता को सशक्त करने, और रक्षा क्षेत्र की परिचालन तत्परता एवं औद्योगिक क्षमताओं को और मजबूत करने में सहायक होंगे।

भारत को तकनीकी सृजनकर्ता बनाने के लिए नवाचार और सहयोग आवश्यक: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

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भारत को प्रौद्योगिकी के उपभोक्ता से सृजनकर्ता (consumer to creator) के रूप में परिवर्तित करने के लिए, रक्षा मंत्रीराजनाथ सिंह ने इस बात पर बल दिया कि हमें केवल नई तकनीकों को अपनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ऐसे वातावरण का निर्माण करना चाहिए जहाँ नवाचार (innovation) पनप सकें — इसके लिए मजबूत प्रक्रियाएँ, चुस्त संस्थान (agile institutions) और सहयोग की भावना (spirit of collaboration) आवश्यक हैं, जो सैनिक, वैज्ञानिक, स्टार्टअप और रणनीतिकार सभी को एकजुट करे। वे 11 नवम्बर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित दिल्ली डिफेंस डायलॉग के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। यह संवाद मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (MP-IDSA) द्वारा आयोजित किया गया था, जिसका विषय था — “रक्षा क्षमता विकास के लिए नई पीढ़ी की तकनीकों का उपयोग”।

रक्षा मंत्री ने कहा कि हमें ऐसे सिस्टम और पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystems) बनाने होंगे जो नई तकनीकों के निर्माण और अपनाने (creation and adoption) को स्वाभाविक, तेज़ और आत्मनिर्भर बना दें। उन्होंने कहा,

“यदि हमारी नींव मजबूत है, हमारे संस्थान चुस्त हैं, हमारे विचार खुले हैं और हमारा सहयोग निरंतर है, तो हर नई तकनीकी लहर हमें डुबोएगी नहीं, बल्कि आगे बढ़ाएगी। हम केवल दूसरों की बनाई तकनीकी क्रांतियों के अनुयायी नहीं बनेंगे, बल्कि भारत में जन्मी नई क्रांतियों के निर्माता बनेंगे।”

राजनाथ सिंह ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग (ML), क्वांटम कंप्यूटिंग और स्वॉर्म टेक्नोलॉजी जैसी विघटनकारी तकनीकों (disruptive technologies) को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति का असली पैमाना इस बात से तय होता है कि संपूर्ण रक्षा तंत्र (apparatus) कितनी प्रभावी ढंग से कार्य करता है।

उन्होंने कहा, “तकनीक की शक्ति केवल उपकरणों या एल्गोरिद्म में नहीं है, बल्कि उसमें है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान देने वाली हर प्रक्रिया, हर निर्णय, हर प्रणाली को कैसे नया आकार देती है।”

उन्होंने कहा कि तेज़ डेटा लिंक, AI एल्गोरिद्म, क्वांटम कंप्यूटिंग या स्वायत्त प्रणालियाँ (autonomous systems) तभी उपयोगी हैं जब हमारे आंतरिक प्रक्रियाएँ और मानव व संस्थागत क्षमता उन्हें शीघ्रता से आत्मसात करने में सक्षम हों। उन्होंने यह भी कहा कि रक्षा तत्परता का एक बड़ा हिस्सा उन “अदृश्य तकनीकों” पर निर्भर है — जैसे सुरक्षित डेटा आर्किटेक्चर, एन्क्रिप्टेड नेटवर्क, स्वचालित मेंटेनेंस सिस्टम, और इंटरऑपरेबल डाटाबेस।

राजनाथ सिंह ने बताया कि सरकार के प्रयासों से आज भारत का रक्षा औद्योगिक आधार (defence industrial base) नए आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ आगे बढ़ रहा है। डीआरडीओ, सशस्त्र बलों, उद्योग और अकादमिक जगत के बीच तालमेल ने अनुसंधान, परीक्षण, फीडबैक और नवाचार का एक सकारात्मक चक्र (virtuous cycle) बनाया है। उन्होंने कहा कि भारत अब केवल वैश्विक नवाचारों की बराबरी से संतुष्ट नहीं रह सकता — हमें तेज़ी और सहयोग के साथ नवाचार की संस्कृति को लगातार पोषित करना होगा।

उन्होंने कहा, “तकनीकी नेतृत्व अलग-अलग प्रतिभाओं से नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय पारिस्थितिकी तंत्र (national ecosystem) से उभरता है, जो विचारों को प्रोत्साहित करता है, विफलताओं को स्वीकार करता है और उपलब्धियों का जश्न मनाता है।”

रक्षा मंत्री ने iDEX (Innovations for Defence Excellence) और TDF (Technology Development Fund) जैसी पहलों का विशेष उल्लेख किया, जो नई पीढ़ी के नवोन्मेषकों को प्रोत्साहित कर रही हैं। उन्होंने कहा,

“ये वही युवा नवोन्मेषक हैं जो एक ऐसे भविष्य के निर्माता हैं जहाँ स्वायत्त प्रणालियाँ, क्वांटम सेंसर, उन्नत सामग्रियाँ और अंतरिक्ष-आधारित निगरानी प्रणालियाँ भारतीय प्रतिभा की पहचान बनेंगी।”

उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता (Aatmanirbharta) को केवल निर्माण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि डिजिटल संप्रभुता (digital sovereignty) तक विस्तार करना चाहिए — अर्थात् उन एल्गोरिद्म, डेटा और चिप्स पर नियंत्रण जो हमारे प्लेटफॉर्म को संचालित करते हैं। उन्होंने कहा,

“सच्ची सामरिक स्वायत्तता तभी संभव होगी जब हमारा कोड उतना ही स्वदेशी होगा जितना हमारा हार्डवेयर।”

उन्होंने कहा कि सरकार सुरक्षित स्वदेशी सॉफ्टवेयर स्टैक्स, विश्वसनीय सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन और भारतीय डेटा पर प्रशिक्षित घरेलू AI मॉडल्स को प्रोत्साहित कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि तकनीक मानव निर्णय की जगह नहीं ले सकती, बल्कि उसे सशक्त (amplify) करती है, इसलिए हमें उभरती तकनीकों के नैतिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी आयामों पर भी निवेश करना होगा।

उन्होंने कहा, “भारत, एक सभ्यतागत शक्ति (civilisational power) के रूप में, जिम्मेदार और मानवीय सैन्य तकनीक के उपयोग पर वैश्विक संवाद का नेतृत्व कर सकता है और करना चाहिए।”

रक्षा मंत्री ने कहा कि तकनीक को केवल बल गुणक (force multiplier) ही नहीं, बल्कि संसाधन अनुकूलक (resource optimiser) के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूंजीगत खरीद प्रक्रियाओं (capital procurement process) में तकनीक और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कर निर्णय-निर्माण को बेहतर और संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि उन्होंने हाल ही में निर्देश दिया है कि हर खरीद प्रस्ताव के आरंभिक चरण में ही लाइफ-साइकिल लागत (life-cycle cost) का मूल्यांकन किया जाए ताकि निवेश का पूर्ण चित्र सामने आ सके — “हम केवल आज के निवेश को नहीं, बल्कि भविष्य की स्थिरता को भी देख सकें।”

राजनाथ सिंह ने सशस्त्र बलों से आग्रह किया कि वे केवल उपकरणों से संबंधित तकनीकों में ही नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स, योजना और प्रबंधन प्रणालियों में भी विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं को अपनाने पर ध्यान दें। उन्होंने कहा,

“श्रेष्ठ उपकरणों की तुलना में श्रेष्ठ प्रक्रियाओं का आयात अधिक उपयोगी है। जब हमारी प्रणालियाँ मजबूत, अनुकूलनीय और पारदर्शी होंगी, तो हमें उत्कृष्टता विदेश से खरीदनी नहीं पड़ेगी — हम उसे यहीं भारत में बना सकेंगे।”

उन्होंने कहा कि एमपी-आईडीएसए (MP-IDSA) इस दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का अध्ययन कर उन्हें भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में सहायता कर सकता है।

अपने भाषण की शुरुआत में रक्षा मंत्री ने 10 नवम्बर 2025 को दिल्ली में हुई दुखद दुर्घटना में मारे गए लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देश की प्रमुख जाँच एजेंसियाँ इस घटना की गहन और त्वरित जाँच कर रही हैं और जल्द ही परिणाम सार्वजनिक किए जाएंगे। उन्होंने आश्वासन दिया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और उन्हें न्याय के कठघरे में लाया जाएगा।

इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, डीजी एमपी-आईडीएसए राजदूत सुजन चिनॉय, मित्र देशों के राजदूत तथा वरिष्ठ नागरिक एवं सैन्य अधिकारी उपस्थित थे।

तकनीकी श्रेष्ठता ही आधुनिक युद्ध में सफलता की कुंजी: सीडीएस जनरल अनिल चौहान

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“ऑपरेशन सिंदूर आधुनिक युद्ध का एक सशक्त उदाहरण है, जिसमें प्रिसिशन स्ट्राइक क्षमताओं, नेटवर्क-केंद्रित अभियानों, डिजिटाइज्ड इंटेलिजेंस और मल्टी-डोमेन रणनीतियों का सीमित समय में प्रभावी उपयोग किया गया,” यह बात चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने 11 नवम्बर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित दिल्ली डिफेंस डायलॉग में “आधुनिक युद्ध पर तकनीक का प्रभाव” विषय पर अपने विशेष संबोधन में कही।

जनरल चौहान ने कहा कि सैन्य नेतृत्व के लिए बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को तेजी से ढालना अनिवार्य है, क्योंकि आज के दौर में तकनीकी श्रेष्ठता ही युद्धक्षेत्र में सफलता का निर्णायक तत्व बन गई है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि युद्ध का मूल उद्देश्य हमेशा विजय प्राप्त करना ही होता है, और जो तकनीक में आगे होंगे, वही अंततः विजेता बनेंगे। उन्होंने बताया कि नई उभरती तकनीकों, बदलते सैन्य सिद्धांतों और भूराजनीतिक परिस्थितियों ने आधुनिक युद्ध के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। आज युद्ध की दिशा तेजी से हो रहे नवाचारों, रणनीतिक साझेदारियों, और संगठनात्मक परिवर्तन से निर्धारित हो रही है।

दो दिवसीय यह आयोजन मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (MP-IDSA) द्वारा “रक्षा क्षमता विकास के लिए नई युग की तकनीकों का उपयोग” विषय पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया।

अपने स्वागत संबोधन में एमपी-आईडीएसए के महानिदेशक (DG) राजदूत सुजन चिनॉय ने इस अवसर के विशेष महत्व पर प्रकाश डाला, क्योंकि यह संस्थान के 60वें स्थापना दिवस के साथ भी मेल खाता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक रक्षा क्षमताओं को आकार देने में तकनीक की भूमिका परिवर्तनकारी रही है और दुनिया भर की सशस्त्र सेनाएँ अब औद्योगिक युग से सूचना एवं साइबर युग की ओर बढ़ रही हैं।

राजदूत चिनॉय ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), रोबोटिक्स, और क्वांटम फिजिक्स जैसी उभरती तकनीकें अब युद्ध और सुरक्षा के प्रमुख निर्धारक बनती जा रही हैं। उन्होंने विदेशी तकनीक के अधिग्रहण और स्वदेशी रक्षा निर्माण के बीच संतुलन बनाए रखने पर बल दिया तथा ‘आत्मनिर्भरता’ (Aatmanirbharta) की नीति के अंतर्गत स्वदेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।



यह संवाद नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, उद्योग जगत और शिक्षाविदों को एक मंच पर लाता है ताकि वे यह साझा कर सकें कि नई पीढ़ी की तकनीकों का उपयोग भारत की रक्षा क्षमताओं को और कैसे सशक्त बना सकता है।

इन चर्चाओं से डेटा-आधारित रक्षा प्रणालियों के विकास और भविष्य की सुरक्षा तकनीकों को दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान मिलने की उम्मीद है।

राजनाथ सिंह ने SIDM वार्षिक सत्र में कहा — ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में मेड-इन-इंडिया उपकरणों के प्रभावी उपयोग ने बढ़ाई भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा, निजी क्षेत्र को नवाचार और आत्मनिर्भरता पर दिया जोर

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा — “ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा मेड-इन-इंडिया उपकरणों के प्रभावी उपयोग ने भारत की क्षेत्रीय और वैश्विक प्रतिष्ठा को मजबूत किया”

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा ‘मेड-इन-इंडिया’ उपकरणों के प्रभावी उपयोग ने भारत की प्रतिष्ठा को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक सुदृढ़ किया है। उन्होंने घरेलू उद्योग, विशेष रूप से निजी क्षेत्र से, आत्मनिर्भरता की दिशा में नवाचार, अनुसंधान एवं विकास (R&D), तकनीक आधारित विनिर्माण, उप-प्रणालियों और घटकों के उत्पादन तथा आपूर्ति व रखरखाव श्रृंखलाओं में प्रभुत्व स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया।

वे 27 अक्टूबर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) के वार्षिक सत्र को संबोधित कर रहे थे, जिसका विषय था — “Defence Self-Reliance: Strengthening National Security through Indigenous Industry”।

रक्षा मंत्री ने कहा कि दुनिया ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आकाश मिसाइल सिस्टम, ब्रह्मोस, आकाशतीर एयर डिफेंस कंट्रोल सिस्टम और अन्य स्वदेशी प्लेटफॉर्म की ताकत देखी। उन्होंने कहा कि इस अभियान की सफलता का श्रेय भारतीय सशस्त्र बलों के साथ-साथ उन “उद्योग योद्धाओं” को भी जाता है, जिन्होंने नवाचार, डिजाइन और विनिर्माण के मोर्चे पर काम किया।

उन्होंने कहा, “हालांकि हमने दृढ़ संकल्प के साथ दृढ़ जवाब दिया है और हमारी सेनाएँ देश की सीमाओं की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं, फिर भी हमें आत्ममंथन करना होगा। ऑपरेशन सिंदूर हमारे लिए एक केस स्टडी होना चाहिए, जिससे हम भविष्य की दिशा तय करें। यह घटना हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि सीमाओं पर कभी भी, कहीं भी, कुछ भी हो सकता है — हमें हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए और यह तैयारी हमारे अपने संसाधनों पर आधारित होनी चाहिए।”

राजनाथ सिंह ने कहा कि आज के वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में ‘स्वदेशीकरण’ ही रक्षा क्षेत्र में उभरती चुनौतियों का एकमात्र समाधान है। उन्होंने कहा कि “स्थापित विश्व व्यवस्था कमजोर हो रही है और कई क्षेत्रों में संघर्ष बढ़ रहे हैं। ऐसे में भारत को अपनी सुरक्षा और रणनीति को पुनर्परिभाषित करना आवश्यक है।”

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने रक्षा निर्माण को बढ़ावा देने और घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए समान अवसरों वाला माहौल बनाया है। “हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत में केवल असेंबली न हो, बल्कि वास्तविक विनिर्माण आधार तैयार किया जाए — जो ‘Made in India, Made for the World’ की भावना को साकार करे,” उन्होंने कहा।

रक्षा मंत्री ने बताया कि 2014 से पहले भारत अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर था, लेकिन आज वह स्वयं रक्षा उपकरणों का निर्माण कर रहा है।
उन्होंने बताया — “2014 में रक्षा उत्पादन ₹46,000 करोड़ के आसपास था, जो अब बढ़कर ₹1.51 लाख करोड़ हो गया है, जिसमें ₹33,000 करोड़ निजी क्षेत्र का योगदान है। रक्षा निर्यात जो 10 वर्ष पहले ₹1,000 करोड़ से भी कम था, अब लगभग ₹24,000 करोड़ तक पहुँच गया है और मार्च 2026 तक ₹30,000 करोड़ तक पहुँचने का लक्ष्य है।”

उन्होंने कहा कि सरकार ने हाल ही में डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 लॉन्च किया है और डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 में संशोधन पर काम चल रहा है। उन्होंने निजी क्षेत्र से आग्रह किया कि वे रक्षा निर्माण में अपने योगदान को वर्तमान 25% से बढ़ाकर अगले तीन वर्षों में कम से कम 50% तक करें।

रक्षा मंत्री ने कहा कि उद्योग को घरेलू स्तर पर उप-प्रणालियों और घटकों के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए, ताकि विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम हो सके। उन्होंने कहा — “जब हम विदेशी प्लेटफॉर्म खरीदते हैं, तो उनके रखरखाव और पुर्जों की आपूर्ति पर भारी खर्च होता है। यदि हम इनके घटकों का निर्माण देश में ही करें, तो हमारी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।”

उन्होंने यह भी कहा कि “हमारा उद्देश्य सिर्फ भारत में असेंबली करना नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी आधारित विनिर्माण विकसित करना होना चाहिए।”

रक्षा मंत्री ने नवाचार और अनुसंधान पर जोर देते हुए कहा — “कोई भी देश नवाचार के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। SIDM के दस वर्ष पूरे होने पर, उद्योग को चुनौती लेनी चाहिए कि वह बड़े पैमाने पर तकनीकी उत्पाद विकसित करे और सरकार को प्रस्तुत करे। सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

इस अवसर पर रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, SIDM अध्यक्ष राजिंदर सिंह भाटिया, महानिदेशक रमेश के, पूर्व अध्यक्ष एस.पी. शुक्ला, सशस्त्र बलों, रक्षा मंत्रालय, उद्योग और स्टार्टअप जगत के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

नई दिल्ली में आयोजित द्विवार्षिक नौसेना कमांडरों के सम्मेलन 2025 के दूसरे संस्करण में संचालनात्मक तैयारी, समुद्री सुरक्षा और आत्मनिर्भर नौसेना पर हुई व्यापक चर्चा

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द्विवार्षिक नौसेना कमांडरों के सम्मेलन 2025 का दूसरा संस्करण 22 से 24 अक्तूबर 2025 तक नई दिल्ली स्थित नौसेना भवन (Nausena Bhawan) में आयोजित किया गया। तीन दिवसीय यह उच्च-स्तरीय सम्मेलन नौसेना कमांडरों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ, जिसमें संचालनात्मक तैयारी, समुद्री सुरक्षा, क्षमता विकास तथा त्रि-सेवा (Tri-Service) एकीकरण से संबंधित प्रमुख मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की गई।

सम्मेलन की शुरुआत नौसेना प्रमुख (Chief of the Naval Staff) के उद्घाटन संबोधन से हुई। विकसित होते भू-राजनीतिक परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए नौसेना प्रमुख ने राष्ट्रीय समुद्री हितों की रक्षा में भारतीय नौसेना की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि नौसेना अपनी तैयारी, अनुकूलता और क्षेत्रीय सहभागिता के माध्यम से समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है।
उन्होंने नौसेना को एक “Combat Ready, Credible, Cohesive and Future-Ready Force” के रूप में पुनः स्थापित करते हुए हालिया अभियानों, क्षमता वृद्धि तथा संयुक्त अभियानों की सराहना की। नौसेना प्रमुख ने 2047 तक ‘पूर्ण आत्मनिर्भर नौसेना’ (Aatmanirbhar Navy) के लक्ष्य की दिशा में हो रही प्रगति पर भी बल दिया, जो नवाचार, तकनीकी समावेशन और iDEX पहलों से प्रेरित है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 23 अक्तूबर 2025 को नौसेना कमांडरों को संबोधित किया और उनसे संवाद किया। उन्होंने भारतीय नौसेना की राष्ट्रीय हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना करते हुए इसकी उच्च स्तरीय संचालनात्मक तत्परता और सशक्त प्रतिरोध क्षमता की प्रशंसा की।
उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना की उपस्थिति हिंद महासागर क्षेत्र के लिए मित्र राष्ट्रों के लिए सुरक्षा का प्रतीक है, जबकि अस्थिरता फैलाने वालों के लिए चिंता का कारण है।
रक्षा मंत्री ने यह भी दोहराया कि आत्मनिर्भर नौसेना ही एक आत्मविश्वासी और शक्तिशाली राष्ट्र की नींव है। उन्होंने कहा कि स्वदेशी उपकरणों के माध्यम से अपनी क्षमताओं में वृद्धि के प्रयासों ने भारतीय नौसेना को ‘आत्मनिर्भरता का ध्वजवाहक’ बना दिया है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलने के लिए तकनीक और रणनीति का शीघ्र उपयोग आवश्यक है। आधुनिक युद्ध में मानवरहित और स्वचालित प्रणालियों (uncrewed & autonomous systems) के महत्व पर भी उन्होंने विशेष बल दिया।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS), चीफ ऑफ एयर स्टाफ (CAS) तथा कैबिनेट सचिव ने भी नौसेना कमांडरों के साथ विचार-विमर्श किया।
CDS ने अपने संबोधन में इंटीग्रेशन (Integration), संयुक्तता (Jointness) और संसाधनों के अनुकूलन (Resource Optimisation) की महत्ता पर बल दिया।

सम्मेलन के दौरान ‘Regulations for Naval Armament Service’, ‘GeM Handbook’, ‘Foreign Cooperation Roadmap’ सहित पाँच नौसैनिक प्रकाशनों का विमोचन किया गया।
इसके अलावा, ‘NIPUN’ (Naval Intellectual Portal for Unified Knowledge) नामक एक ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च किया गया, जो नौसेना समुदाय के विभिन्न क्षेत्रों में किए गए बौद्धिक कार्यों का एकीकृत भंडार (aggregator) होगा।

सम्मेलन के समानांतर आयोजित ‘सागर मंथन’ (Sagar Manthan) कार्यक्रम 22 अक्तूबर को संपन्न हुआ, जिसमें नौसेना कमांडरों, विषय विशेषज्ञों और विचार नेताओं ने समसामयिक समुद्री और रणनीतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया।



एयर पावर के लिए महत्वपूर्ण तकनीकों के स्वदेशी विकास पर स्ट्रैटेजिक इनसाइट कॉन्फ्रेंस: रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने आत्मनिर्भरता और उन्नत एयरो टेक्नोलॉजी पर दिया जोर

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रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने भारत के घरेलू औद्योगिक आधार को मजबूत करने के लिए सारगर्भित नीति ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया। यह बात उन्होंने ‘एयर पावर के लिए महत्वपूर्ण तकनीकों के स्वदेशी विकास पर स्ट्रैटेजिक इनसाइट कॉन्फ्रेंस’ में उद्घाटन संबोधन देते हुए कही, जिसका आयोजन सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (CAPSS), नई दिल्ली में 17 अक्टूबर 2025 को किया गया।

रक्षा सचिव ने कहा कि औद्योगिक आधार का विविधीकरण मौनापोलियों को समाप्त करेगा, व्यवसाय करने में आसानी बढ़ाएगा और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में नवाचार को प्रोत्साहित करेगा। उन्होंने रक्षा में आत्मनिर्भरता के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता को दोहराया और भारत की एयर पावर क्षमताओं को मजबूत करने के लिए उन्नत एयरो टेक्नोलॉजी, फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल और लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल प्रणालियों के विकास के महत्व पर जोर दिया।

विशेष संबोधन में, वाइस चीफ ऑफ द एयर स्टाफ एयर मार्शल नरमेध्वर तिवारी ने एयर पावर की रणनीतिक परिणामों में भूमिका को रेखांकित किया, जैसा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखा गया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी विमान डिज़ाइन और विकास की क्षमता के साथ-साथ भारत को इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, उन्नत सेंसर, राडार और डेटा लिंक में भी विशेषज्ञता हासिल करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

मुख्य भाषण में, डायरेक्टर जनरल, AERO, DRDO डॉ. के. राजालक्ष्मी मेनन ने UAVs, मल्टी-सेंसर फ्यूज़न और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एयर ऑपरेशन्स में विनाशकारी संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्टील्थ टेक्नोलॉजी, एरोस्टैट्स और संवर्धित सेंसर से लैस एयरशिप्स, साथ ही क्वांटम, फोटॉनिक और ब्लॉकचेन तकनीकों के रक्षा प्रणालियों में समाकलन के बारे में बताया।

CAPSS के DG, एयर वाइस मार्शल (सेवानिवृत्त) अनिल गोलेनी ने बदलते सुरक्षा परिवेश और पड़ोस में बढ़ती तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच आत्मनिर्भरता के महत्व पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उन्नत एवियोनिक्स और अगली पीढ़ी के प्रोपल्शन सिस्टम के उपयोग पर जोर दिया और कहा कि इंटेलिजेंट कंट्रोल प्रोपल्शन, सुपर-क्रूज क्षमता और फ्लाय-बाय-लाइट सिस्टम भारत के एयरोस्पेस प्रभुत्व के भविष्य को निर्धारित करेंगे।

कार्यक्रम के दौरान रक्षा सचिव ने पुस्तक ‘एशियन डिफेंस रिव्यू 2025: जियो-पॉलिटिकल शिफ्ट्स एंड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप मल्टीलेटरलिज़्म इन द इंडो-पैसिफिक’ का विमोचन भी किया। साथ ही, स्वदेशी जेट इंजन सह-विकास, फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम्स, अनमैंड सिस्टम्स और एयरोस्पेस उत्पादन पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने पर कई तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।

इस कॉन्फ्रेंस में रक्षा मंत्रालय, भारतीय वायु सेना, DRDO और उद्योग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे और भारत की एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में यात्रा पर चर्चा की।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ARDE, पुणे का दौरा किया; DRDO की उन्नत रक्षा तकनीकों और भविष्य की योजनाओं का किया अवलोकन

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16 अक्टूबर, 2025 को रक्षा मंत्रालय की सलाहकार समिति, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की, ने पुणे स्थित आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (ARDE) का दौरा किया। ARDE, DRDO के आर्मामेंट एवं कॉम्बैट इंजीनियरिंग सिस्टम्स (ACE) क्लस्टर के अंतर्गत आने वाला एक प्रमुख प्रयोगशाला है। दौरे के दौरान समिति ने क्लस्टर की विभिन्न प्रयोगशालाओं द्वारा विकसित अत्याधुनिक उत्पादों का निरीक्षण किया। प्रमुख प्रदर्शित उत्पादों में एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम, पिनाका रॉकेट सिस्टम, लाइट टैंक ‘जोरावर’, व्हील्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म और आकाश-न्यू जनरेशन मिसाइल शामिल थे।

समिति को रोबोटिक्स, रेल गन, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम, हाई-एनर्जी प्रोपल्शन मटीरियल्स जैसे क्षेत्रों में विकसित हो रही तकनीकों की जानकारी भी दी गई। इसके अलावा, क्लस्टर की भविष्य की रोडमैप भी प्रस्तुत की गई।

रक्षा मंत्री ने “उभरती हुई प्रौद्योगिकियाँ और DRDO” विषय पर बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि रक्षा क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों और युद्ध की बदलती प्रकृति को समझना और अनुकूलित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उन्नत तकनीकें अब आवश्यकता बन गई हैं और सरकार इसका एकीकृत उपयोग सुरक्षा तंत्र में सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

राजनाथ सिंह ने कहा,

“आज का युग प्रौद्योगिकी वर्चस्व का है। जो राष्ट्र विज्ञान और नवाचार को प्राथमिकता देगा, वही भविष्य में अग्रणी होगा। प्रौद्योगिकी केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रही; यह हमारी रणनीतिक निर्णय प्रक्रिया, रक्षा प्रणाली और भविष्य की नीतियों की आधारशिला बन चुकी है। हमारा लक्ष्य केवल रक्षा में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि एक ऐसा वातावरण विकसित करना है जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करे और भारत को वैश्विक रक्षा नवाचार केंद्र के रूप में स्थापित करे।”

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भविष्य के परिवर्तनों को अपनाना केवल तकनीकी उन्नयन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मिशन होना चाहिए। “हमें केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता भी बनना चाहिए। इसके लिए आत्मनिर्भरता की गति तेज करनी होगी। रक्षा में आत्मनिर्भरता केवल लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे मजबूत ढाल है।”

रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की रक्षा में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की अटूट प्रतिबद्धता को दोहराया और कहा कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए प्रौद्योगिकियों के आयात पर निर्भर नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि कई देशों में उन्नत तकनीकों के मामले में संरक्षणवाद देखा जाता है और सूचना साझा नहीं की जाती। भारत ने इन बाधाओं को चुनौती दी है और स्पष्ट नीतियों के साथ किसी भी क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने में सक्षम हुआ है।

राजनाथ सिंह ने DRDO की सराहना करते हुए कहा कि पहले आयात की जाने वाली तकनीकें अब भारत में विकसित की जा रही हैं और भविष्य की वैश्विक चर्चा में शामिल उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि DRDO उद्योग, अकादमी और स्टार्टअप्स के सहयोग से एक नया R&D इकोसिस्टम तैयार कर रहा है। यह प्रयास अब केवल सरकारी प्रयास नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय प्रयास बन गया है।

रक्षा मंत्री ने कहा, “DRDO, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ, निजी उद्योग, स्टार्टअप्स और अकादमी मिलकर रक्षा नवाचार में नए मानक स्थापित कर रहे हैं। हमारे युवा AI, साइबर सुरक्षा, रोबोटिक्स, क्वांटम कम्युनिकेशन और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। उभरती हुई तकनीकें न केवल सेनाओं को आधुनिक बनाती हैं बल्कि युवाओं के लिए नए अवसर भी खोलती हैं।”

समिति के अन्य सदस्यों ने ACE क्लस्टर की उपलब्धियों की सराहना की और भविष्य की नीति निर्धारण के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए। रक्षा मंत्री ने आश्वासन दिया कि उनके सुझावों पर उचित ध्यान दिया जाएगा।

बैठक में राज्य मंत्री संजय सेठ, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, रक्षा R&D सचिव एवं DRDO अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। DG (ACE) और क्लस्टर के निदेशक एवं वैज्ञानिक भी बैठक में शामिल हुए।

32,000 फीट से सफल कॉम्बैट फ्रीफॉल जंप: DRDO ने विकसित किया स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम (MCPS)

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रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम (MCPS) ने हाल ही में 32,000 फीट की ऊंचाई से कॉम्बैट फ्रीफॉल जंप का सफल प्रदर्शन किया है। यह छलांग भारतीय वायु सेना (IAF) के परीक्षण जम्परों द्वारा की गई, जिसने इस स्वदेशी प्रणाली की दक्षता, विश्वसनीयता और उन्नत डिज़ाइन को प्रदर्शित किया। इस उपलब्धि के साथ, MCPS भारतीय सशस्त्र बलों में उपयोग में आने वाली ऐसी एकमात्र पैराशूट प्रणाली बन गई है, जो 25,000 फीट से अधिक ऊंचाई से तैनाती में सक्षम है।


यह प्रणाली DRDO की दो प्रयोगशालाओं —

  • एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ADRDE), आगरा, और

  • डिफेंस बायोइंजीनियरिंग एंड इलेक्ट्रोमेडिकल लेबोरेटरी (DEBEL), बेंगलुरु
    द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई है।

MCPS में कई उन्नत सामरिक विशेषताएं शामिल हैं, जैसे कि कम अवतरण दर (lower rate of descent) और बेहतर स्टीयरिंग क्षमता। इससे पैरा ट्रूपर्स को विमान से सुरक्षित रूप से बाहर निकलने, निर्धारित ऊंचाई पर पैराशूट खोलने, सटीक नेविगेशन करने और निर्धारित ज़ोन पर सुरक्षित लैंडिंग करने की सुविधा मिलती है।

यह प्रणाली Navigation with Indian Constellation (NavIC) के साथ संगत है, जिससे यह किसी भी विरोधी देश के विरुद्ध स्वतंत्र रूप से उपयोग की जा सकती है और बाहरी हस्तक्षेप या सेवा बाधा (interference/denial of service) से सुरक्षित रहती है।

इस सफलता ने स्वदेशी पैराशूट प्रणालियों के सेना में शीघ्र समावेशन (induction) का मार्ग प्रशस्त किया है। इससे उपकरण की रखरखाव और मरम्मत में लगने वाला समय न्यूनतम रहेगा और विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम होगी, विशेष रूप से युद्ध या संघर्ष के समय में।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO, सशस्त्र बलों और उद्योग जगत को इस सफलता पर बधाई दी। उन्होंने इसे भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और DRDO के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस उपलब्धि में शामिल DRDO टीम की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि एरियल डिलीवरी सिस्टम्स में आत्मनिर्भरता (self-reliance) की दिशा में एक बड़ा कदम है।

बेस रिपेयर डिपो, पालम में नोडल टेक्नोलॉजी सेंटर संगोष्ठी-2025 का आयोजन

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बेस रिपेयर डिपो, पालम ने 23 सितम्बर 2025 को नई दिल्ली में नोडल टेक्नोलॉजी सेंटर (NTC) संगोष्ठी-2025 का आयोजन किया। इस वर्ष का विषय था – ‘ब्लैक बॉक्स कॉन्सेप्ट को अपनाते हुए रिवर्स इंजीनियरिंग के माध्यम से स्वदेशीकरण’। यह आयोजन मेंटेनेंस कमांड की आत्मनिर्भरता और तकनीकी उत्कृष्टता की दिशा में एक पहल के अंतर्गत किया गया।

इस अवसर पर एयर कमोडोर हर्ष बहल, एयर ऑफिसर कमांडिंग, बेस रिपेयर डिपो, पालम मुख्य अतिथि रहे। एयर कमोडोर एल. श्रीराम, एयर कमोडोर (राडार), एयर मुख्यालय, विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इस संगोष्ठी में आईआईटी दिल्ली, आईआईटी मंडी और एनएसयूटी के प्रख्यात शिक्षाविदों तथा उद्योग प्रतिनिधियों ने भाग लिया और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में स्वदेशीकरण योग्य तकनीकों पर अपने विचार साझा किए। इस अवसर पर मुख्य अतिथि ने ‘NTC कम्पेंडियम–2025’ का विमोचन किया, जिसमें डिपो के स्वदेशीकरण प्रयासों की उपलब्धियाँ दर्ज हैं।

संगोष्ठी के दौरान एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसमें औद्योगिक साझेदारों को अपनी तकनीकी क्षमताएँ प्रदर्शित करने और भविष्य की स्वदेशीकरण आवश्यकताओं की पहचान हेतु उपयोगकर्ताओं से संवाद का अवसर मिला।

इस संगोष्ठी ने भारतीय वायु सेना की महत्वपूर्ण तकनीकों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट किया, जो शिक्षा जगत और उद्योग के साथ सहयोग के माध्यम से राष्ट्रीय रक्षा तैयारियों को सुदृढ़ बनाती है।


भारत ने रेल आधारित मोबाइल लांचर से अग्नि-प्राइम मिसाइल का सफल परीक्षण किया

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नई दिल्ली-डीआरडीओ ने स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड (SFC) के सहयोग से आज रेल आधारित मोबाइल लांचर से मध्यम दूरी की अग्नि-प्राइम मिसाइल का सफल परीक्षण किया। यह मिसाइल 2000 किलोमीटर तक की मारक क्षमता रखती है और अत्याधुनिक तकनीक से लैस है।

इस परीक्षण के लिए विशेष रूप से विकसित लांचर का उपयोग किया गया, जो रेल नेटवर्क पर स्वतंत्र रूप से संचालित हो सकता है और कम समय में प्रक्षेपण करने की क्षमता रखता है। यह प्रणाली पूरी तरह स्व-निर्भर है तथा इसमें आधुनिक संचार और सुरक्षा तंत्र मौजूद हैं।

परीक्षण के दौरान मिसाइल की उड़ान को विभिन्न ग्राउंड स्टेशनों से ट्रैक किया गया और सभी मिशन उद्देश्यों की सफल प्राप्ति हुई। यह उपलब्धि भविष्य में रेल आधारित प्रक्षेपण प्रणालियों को सेना में शामिल करने का मार्ग प्रशस्त करेगी।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सफल परीक्षण पर डीआरडीओ, एसएफसी और सशस्त्र बलों को बधाई देते हुए कहा कि इस उपलब्धि से भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने रेल नेटवर्क से कैनिस्टराइज्ड लांच प्रणाली विकसित की है।

डीआरडीओ अध्यक्ष और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव ने भी इस उपलब्धि पर वैज्ञानिकों और अधिकारियों को सराहा।


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