Media24Media.com: टाटा संस में बड़ा विवाद: एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर नोएल टाटा ने उठाए सवाल

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टाटा संस में बड़ा विवाद: एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर नोएल टाटा ने उठाए सवाल

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नई दिल्ली- देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल टाटा समूह की मुख्य कंपनी टाटा संस में अध्यक्ष पद को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। टाटा संस के अध्यक्ष एन. चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों के लिए फिर से अध्यक्ष बनाए जाने के फैसले पर टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा ने गंभीर आपत्ति जताई है।

17 सितंबर को टाटा संस के निदेशक मंडल ने एन. चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों के लिए फिर से अध्यक्ष बनाए जाने को मंजूरी दी थी। लेकिन इसके बाद नोएल टाटा ने इस पूरी प्रक्रिया और कंपनी के नियमों की व्याख्या पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आखिर विवाद की वजह क्या है?

इस पूरे मामले की जड़ टाटा संस के कंपनी के आंतरिक नियमों, जिन्हें ‘आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन’ कहा जाता है, में है।

नोएल टाटा का कहना है कि अध्यक्ष की दोबारा नियुक्ति के लिए अनुच्छेद 118 लागू होना चाहिए था। जबकि इस बार टाटा संस के निदेशक मंडल ने अनुच्छेद 121 के तहत प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

नोएल टाटा का तर्क है कि वर्ष 2022 में एन. चंद्रशेखरन की पिछली नियुक्ति के दौरान भी अलग प्रक्रिया अपनाई गई थी। उनका सवाल है कि जब कंपनी के नियम मौजूद हैं, तो इस बार उनकी अलग व्याख्या क्यों की गई?

निदेशक मंडल में भी सामने आया मतभेद

इस विवाद में टाटा संस के निदेशक मंडल में हुई मतदान प्रक्रिया भी बेहद महत्वपूर्ण है।

रिपोर्टों के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स की ओर से निदेशक मंडल में नामित निदेशकों में नोएल टाटा और वेंकटेशन श्रीनिवासन शामिल हैं।

मतदान के दौरान नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का विरोध किया, जबकि वेंकटेशन श्रीनिवासन ने इसका समर्थन किया।

मतों में बराबरी की स्थिति बनने के बाद निदेशक मंडल के अध्यक्ष हरीश मनवानी के निर्णायक मत का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को मंजूरी मिल गई।

यही निर्णायक मत अब पूरे विवाद का एक अहम हिस्सा बन गया है।

नोएल टाटा ने कानूनी सवाल क्यों उठाए?

नोएल टाटा का कहना है कि यदि अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए टाटा ट्रस्ट्स से जुड़े निदेशकों की निर्धारित मंजूरी जरूरी थी, तो केवल निर्णायक मत के जरिए उस आवश्यकता को खत्म नहीं किया जा सकता।

रिपोर्टों के अनुसार, नोएल टाटा ने इस मामले में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की कानूनी राय का भी हवाला दिया है।

वहीं, टाटा संस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप्तो सरकार की कानूनी राय का सहारा लिया गया है।

यानी इस समय विवाद केवल मतदान का नहीं है, बल्कि कंपनी के नियमों की कानूनी व्याख्या को लेकर है।

क्या चंद्रशेखरन की नियुक्ति रद्द हो सकती है?

अभी इस सवाल का अंतिम जवाब नहीं दिया जा सकता।

टाटा संस के निदेशक मंडल ने चंद्रशेखरन की पांच वर्ष की नई अवधि को मंजूरी दे दी है। लेकिन यदि टाटा ट्रस्ट्स इस फैसले को औपचारिक रूप से कानूनी चुनौती देता है, तो अदालत या संबंधित कानूनी मंच को यह तय करना पड़ सकता है कि:

  • अध्यक्ष की दोबारा नियुक्ति के लिए कौन-सा अनुच्छेद लागू होता है?

  • क्या टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की विशेष भूमिका थी?

  • क्या बराबरी की स्थिति में निर्णायक मत का इस्तेमाल वैध था?

  • और क्या पूरी नियुक्ति प्रक्रिया कंपनी के नियमों के अनुसार हुई?

इन सवालों का जवाब ही आगे की स्थिति तय करने में महत्वपूर्ण होगा।

टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। यही वजह है कि टाटा ट्रस्ट्स का टाटा संस के संचालन और महत्वपूर्ण फैसलों में विशेष महत्व है।

टाटा संस ही टाटा समूह की कई प्रमुख कंपनियों में हिस्सेदारी रखने वाली मुख्य कंपनी है। इसलिए टाटा संस में अध्यक्ष पद और उसके शासन से जुड़े फैसलों का असर पूरे टाटा समूह पर पड़ सकता है।

इसके पीछे टाटा संस के प्रस्तावित सूचीबद्ध होने का मुद्दा भी

इस विवाद की पृष्ठभूमि में टाटा संस के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है।

यदि टाटा संस शेयर बाजार में सूचीबद्ध होती है, तो कंपनी के स्वामित्व, शासन व्यवस्था और नियामकीय ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकते हैं।

इसीलिए टाटा संस में अध्यक्ष पद और कंपनी के शासन से जुड़े अधिकारों को लेकर चल रहा विवाद केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं माना जा रहा है।

अब आगे क्या?

फिलहाल एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को टाटा संस के निदेशक मंडल ने मंजूरी दे दी है।

लेकिन नोएल टाटा और टाटा ट्रस्ट्स की आपत्तियों के बाद यह मामला आगे कानूनी रूप ले सकता है।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि टाटा संस के कंपनी नियमों की सही कानूनी व्याख्या क्या मानी जाती है और क्या चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया उन नियमों के अनुरूप थी।

बड़ी बात

टाटा संस में इस समय विवाद सिर्फ अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर नहीं है। असली सवाल है—

टाटा संस के फैसलों में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका कितनी होगी, कंपनी के आंतरिक नियमों की व्याख्या कैसे होगी और भविष्य में टाटा समूह की शासन व्यवस्था किस दिशा में जाएगी।

चंद्रशेखरन की नई अवधि को निदेशक मंडल की मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन नोएल टाटा की आपत्ति ने इस फैसले पर कानूनी और शासन संबंधी सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में इस मामले की अगली कार्रवाई पर सभी की नजर रहेगी।

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