Media24Media.com: संत कबीर जयंती पर विशेष- संत कबीर ने किया रूढ़ियों पर प्रहार और दिया मानवता का संदेश

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संत कबीर जयंती पर विशेष- संत कबीर ने किया रूढ़ियों पर प्रहार और दिया मानवता का संदेश

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 धनंजय राठौर- संयुक्त संचालक, (जनसंपर्क) रायपुर

संत कबीर दास भारतीय इतिहास, साहित्य और दर्शन के एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक सदियां बीत जाने के बाद भी फीकी नहीं पड़ी है। हर वर्ष ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली 'कबीर जयंती' केवल एक संत के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह उनके विचारों, उनकी निर्भीकता और समाज सुधार के संकल्प को याद करने का दिन है। मध्यकालीन भारत में जब समाज जात-पात, आडंबरों और संकीर्णता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब कबीर ने अपनी सीधी, सरल और मारक वाणी से समाज को झकझोरने का काम किया था। संत कबीर जी के सत्य, समरसता, समानता और मानवता के संदेश आज भी समाज को नई दिशा प्रदान करते हैं। उनके आदर्श सामाजिक सद्भाव, सेवा और राष्ट्र निर्माण के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेंगे।


कबीर का जीवन दर्शन: सादगी और समरसता

कबीरदास जी का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ था। लोक मान्यताओं के अनुसार, उनका लालन-पालन एक जुलाहा परिवार (नीरू और नीमा) द्वारा किया गया। कबीर ने किताबी ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक ज्ञान और 'आंखिन देखी' को सर्वोपरि माना। उन्होंने कहा भी है:-
"पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"

कबीर का दर्शन किसी एक धर्म या संप्रदाय तक सीमित नहीं था। वे एक सच्चे विश्व-मानव थे, जिन्होंने ईश्वर को किसी मंदिर, मस्जिद या तीर्थ स्थान में ढूंढने के बजाय मनुष्य के भीतर ही खोजने की सलाह दी। उनके दोहे आज भी जनमानस को जीवन की सच्चाई दिखाने का काम करते हैं जैसे –
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥”

इस दोहे के माध्यम से कबीर ने अहंकार धार्मिक कट्टरता और कर्मकांडों पर तीखा व्यंग्य किया है। उनकी भाषा सरल, सहज और लोकजीवन से जुड़ी हुई थी, जिससे आम लोग भी उनकी बातों को आसानी से समझ पाते थे।
कबीरदास ने अपने समय में फैले जातिवाद, धार्मिक कट्टरता और कर्मकांडों का खुलकर विरोध किया। वह हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे, उन्होंने दोनों ही धर्मों की रूढ़ियों की आलोचना की। यही कारण है कि उनके विचारों ने सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों को प्रभावित किया।

सामाजिक कुरीतियों पर करारा प्रहार

कबीरदास का मानना था कि ईश्वर एक ही है, चाहे कोई भी धर्म मानता हो। उन्होंने सिखाया कि बहुत सारे अनुष्ठान करना या धार्मिक रीति-रिवाजों का अंधाधुंध पालन करना व्यर्थ है। सबसे महत्वपूर्ण है ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम, ईमानदारी और सादा जीवन जीना। कबीर ने जाति व्यवस्था, मूर्ति पूजा और कठोर धार्मिक नियमों का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर हमारे हृदय में निवास करता है और उसे आंतरिक भक्ति के माध्यम से पाया जा सकता है, न कि बाहरी वस्तुओं से। उनकी कविताएँ इतनी शक्तिशाली और अर्थपूर्ण थीं कि उन्हें सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल किया गया है। इससे पता चलता है कि उनका संदेश सभी लोगों के लिए था, न कि केवल एक धर्म के लिए।

कबीर दास जी एक महान समाज सुधारक थे। उन्होंने अपने समय में समाज में व्याप्त आडंबरों और संकीर्णता, धार्मिक पाखंडों, छुआछूत और अंधविश्वासों पर तीखे प्रहार किए। वे धर्म के नाम पर होने वाले दिखावे के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने बिना किसी डर के हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों की कुरीतियों पर अपनी बात रखी:-

• बाह्य आडंबर पर
"कांकर पाथर जोरि के, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खु खुदाय ?"

• जातिवाद पर
"जाति-पाति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।"

आधुनिक युग में कबीर की प्रासंगिकता

आज 21वीं सदी में जब तकनीकी प्रगति के बावजूद दुनिया अक्सर वैचारिक मतभेदों, असहिष्णुता और सांप्रदायिकता से जूझ रही है, तब कबीर के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। कबीर हमें सिखाते हैं कि:
1. मानवता सबसे बड़ा धर्म है: किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म या जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्मों और उसके भीतर के प्रेम से होती है।
2. . सद्भाव और शांति: समाज में शांति बनाए रखने के लिए वाणी की मधुरता और आपसी समझ बहुत जरूरी है। जैसा कि उन्होंने कहा था—

"ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।"

संत कबीर दास ने लोगों को अंधविश्वासों का पालन किए बिना सच्चे मन से ईश्वर से प्रेम करना सिखाया। कबीर हमेशा कहते थे कि ईश्वर एक है, चाहे आप किसी भी धर्म को मानें। उनके जीवन और शब्दों ने हिंदुओं और मुसलमानों को करीब लाया और आज भी सभी धर्मों के लोग उनके संदेश से प्रेरणा पाते हैं। उनकी शिक्षाओं ने कबीर पंथ की नींव रखी और भक्ति एवं सूफी आंदोलनों को प्रभावित किया। हिंदू, मुसलमान और सिख सभी उन्हें पूजते हैं, और उनके काव्य अपनी शाश्वत ज्ञान और सार्वभौमिक अपील के लिए प्रसिद्ध हैं।

संत कबीर दास भक्ति काल के महान कवि, समाज-सुधारक और दार्शनिक थे। उन्होंने अपने अनमोल दोहों और विचारों के माध्यम से समाज में फैले अंधविश्वासों, पाखंडों और जाति-पाति का कड़ा विरोध किया। कबीर साहेब ने हिंदू-मुस्लिम एकता और मानवता का संदेश दिया। कबीर की शिक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए कबीर पंथ सक्रिय है, जो उनके विचारों सत्य, प्रेम, और समानता को समाज में फैलाने का कार्य कर रहा है।

संत कबीर दास जी की जयंती के इस पावन अवसर पर हमें कबीर के दोहों को केवल पढ़ने या सुनने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उनके संदेशों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। कबीर का मार्ग प्रेम, सत्य और समानता का मार्ग है। आज के समय में समाज में व्याप्त नफरत और असमानता को मिटाने के लिए 'कबीर का विचार' ही सबसे अचूक औषधि है। आइए इस कबीर जयंती पर हम एक ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प लें जहां हर इंसान के प्रति सम्मान हो और प्रेम ही सर्वोपरि हो।

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