Media24Media.com: सौर रेडियो तरंगों के रहस्य से उठा पर्दा, भारतीय वैज्ञानिकों ने सुलझाई टाइप-II बर्स्ट की पहेली

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सौर रेडियो तरंगों के रहस्य से उठा पर्दा, भारतीय वैज्ञानिकों ने सुलझाई टाइप-II बर्स्ट की पहेली

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 सौर ज्वालाओं (Solar Flares) से उत्पन्न सौर कोरोना शॉक्स पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने रेडियो तरंगों के ‘फंडामेंटल’ (मूल) और ‘हार्मोनिक’ (ओवरटोन) उत्सर्जन की सापेक्ष तीव्रता में होने वाले अंतर के पीछे के रहस्य को सुलझा लिया है।

यह अध्ययन इस बात की समझ को बेहतर बनाता है कि सौर शॉक्स रेडियो तरंगें कैसे उत्पन्न करते हैं और वे कोरोना में कैसे प्रसारित होती हैं। इससे अंतरिक्ष मौसम (Space Weather) के पूर्वानुमान में भी मदद मिल सकती है।

सौर ज्वालाओं या कोरोनल मास इजेक्शन (CME) से उत्पन्न शॉक्स ‘टाइप-II सोलर रेडियो बर्स्ट’ नामक विशेष प्रकार की रेडियो तरंगें उत्पन्न करते हैं। ये बर्स्ट लगभग 1000 किमी/सेकंड की गति से फैलते हैं और रेडियो तरंगों के रूप में दर्ज किए जाते हैं। ये उच्च आवृत्ति से निम्न आवृत्ति की ओर धीरे-धीरे शिफ्ट होते हैं, क्योंकि शॉक बाहर की ओर बढ़ता है।

आमतौर पर टाइप-II बर्स्ट दो भागों में होते हैं—फंडामेंटल और हार्मोनिक उत्सर्जन। सिद्धांत के अनुसार फंडामेंटल उत्सर्जन अधिक शक्तिशाली होना चाहिए, लेकिन कई बार हार्मोनिक उत्सर्जन अधिक मजबूत पाया गया, जो वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली था।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में एक टीम ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए दुनिया भर में स्थित CALLISTO उपकरणों और गौरिबिदनूर रेडियो वेधशाला के GLOSS स्पेक्ट्रोग्राफ से प्राप्त 58 टाइप-II रेडियो बर्स्ट के डेटा का विश्लेषण किया।

अध्ययन में पाया गया कि सूर्य के 75° से अधिक हेलियोग्राफिक देशांतर वाले सक्रिय क्षेत्रों से उत्पन्न घटनाओं में हार्मोनिक उत्सर्जन अधिक मजबूत होता है, जबकि 75° से कम देशांतर (सौर डिस्क के केंद्र के पास) से उत्पन्न घटनाओं में फंडामेंटल उत्सर्जन अधिक मजबूत होता है। यह अंतर सौर कोरोना में अपवर्तन प्रभाव, उत्सर्जन की दिशा और पृथ्वी से देखने के कोण के कारण होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, 75° से अधिक देशांतर वाले क्षेत्रों से आने वाले फंडामेंटल उत्सर्जन पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाते या कमजोर हो जाते हैं, जबकि हार्मोनिक उत्सर्जन व्यापक कोण में फैलते हैं, इसलिए वे अधिक मजबूत दिखाई देते हैं।

इस शोध के प्रमुख अन्वेषक डॉ. के. ससिकुमार राजा और प्रथम लेखक ऋषिकेश जी. झा ने बताया कि भविष्य में मशीन लर्निंग तकनीकों का उपयोग कर ऐसे विशाल डेटा का और गहराई से अध्ययन किया जाएगा।

यह शोध ‘सोलर फिजिक्स’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है और इससे सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष मौसम की बेहतर समझ विकसित करने में मदद मिलेगी।

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