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भारत की कॉफी उद्योग: वैश्विक मंच पर नई पहचान गढ़ती एक सशक्त कहानी

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भारत की कॉफी यात्रा का आरंभ 1600 ईस्वी के आसपास माना जाता है, जब सूफी संत बाबा बूदान यमन के मोचा बंदरगाह से सात कॉफी के बीज लाकर कर्नाटक के चिक्कमंगलूर स्थित बाबा बूदान गिरी पहाड़ियों में रोपित किए थे। घरेलू बागानों से शुरू हुआ यह सफर समय के साथ वाणिज्यिक खेती में बदल गया और आज भारतीय कॉफी अपनी विशिष्ट पहचान के साथ वैश्विक बाजार में अहम स्थान रखती है।

भारत में कॉफी की खेती लगभग 4.91 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पश्चिमी व पूर्वी घाटों तथा पूर्वोत्तर राज्यों में होती है। दो-स्तरीय छायादार कृषि प्रणाली, विविध वनस्पतियों और सतत खेती पद्धतियों के कारण भारतीय कॉफी पर्यावरण के लिए भी लाभकारी मानी जाती है। करीब दो मिलियन लोगों की आजीविका इस क्षेत्र से जुड़ी हुई है, जिनमें से अधिकांश छोटे किसान हैं—जो 99% खेतों और 70% उत्पादन के भागीदार हैं।

भारत का कॉफी परिदृश्य

देश की कुल कॉफी उत्पादन का 96% हिस्सा कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से आता है। कर्नाटक 2,80,275 मीट्रिक टन के साथ सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत के 13 विशिष्ट कॉफी क्षेत्र अपनी अनूठी जलवायु, ऊंचाई और स्वाद के कारण विश्व बाजार में अलग पहचान बनाए हुए हैं।

GI टैग से बढ़ी विश्वसनीयता

भारत के पाँच क्षेत्रीय और दो विशेष कॉफी प्रकारों को भौगोलिक संकेतक (GI) मान्यता प्राप्त है—

  • कूर्ग अरेबिका, वायनाड रोबस्टा, चिकमगलूर अरेबिका, अराकू वैली अरेबिका, बाबा बूदानगिरी अरेबिका

  • विशेष श्रेणी: मॉन्सून्ड मालाबार रोबस्टा

स्पेशलिटी कॉफी—जैसे मॉन्सून्ड मालाबार AA, मैसूर नगेट्स, रोबस्टा कापी रॉयल—बड़ी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लोकप्रिय हो रही हैं।

कॉफी बोर्ड की भूमिका

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय आई संकट की स्थिति से निपटने के लिए 1942 में “कॉफी एक्ट” के तहत कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना हुई। यह बोर्ड अनुसंधान, गुणवत्ता सुधार, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, निर्यात और किसानों को तकनीकी–वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने का काम करता है।

भारत के कॉफी निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि

भारत दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा कॉफी निर्यातक देश है।

  • FY 2024–25 में निर्यात 1.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा।

  • प्रमुख निर्यात बाजार: इटली, जर्मनी, बेल्जियम, रूस, यूएई।

  • भारत इंस्टेंट कॉफी का वैश्विक केंद्र बनता जा रहा है, जिसकी हिस्सेदारी कुल निर्यात में 38% है।

सरकारी नीतियों से मिली रफ्तार

  • GST में कमी: इंस्टेंट कॉफी पर टैक्स 18% से घटाकर 5% किया गया, जिससे बाजार में 11–12% तक कीमत कम होने और खपत बढ़ने की उम्मीद है।

  • भारत–UK CETA: भारतीय रोस्टेड व इंस्टेंट कॉफी को ब्रिटेन में अब ड्यूटी-फ्री प्रवेश मिलेगा।

  • भारत–EFTA TEPA: स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और आइसलैंड द्वारा भारतीय कॉफी पर 0% शुल्क—प्रीमियम बाजारों में बड़ी अवसर वृद्धि।

फाइन कप अवॉर्ड्स में ओडिशा की चमक

कॉफी बोर्ड द्वारा आयोजित “फ्लेवर ऑफ इंडिया – फाइन कप” प्रतियोगिता में 2024 में कोरापुट कॉफी ने दो पुरस्कार जीते—धोई हुई (washed) और नैचुरल दोनों श्रेणियों में। इससे ओडिशा की ऊंचाई वाली आदिवासी कॉफी को राष्ट्रीय पहचान मिली।

TDCCOL का आदिवासी किसानों के लिए योगदान

ओडिशा की प्रमुख सहकारी संस्था TDCCOL ने 2019 से कोरापुट में घर-घर जाकर कॉफी खरीदना शुरू किया।
मुख्य उपलब्धियां—

  • किसानों को ICTA आधारित उचित मूल्य

  • सीधे बैंक खातों में भुगतान

  • मूल्य संवर्धन के साथ "Koraput Coffee" ब्रांड का शुभारंभ

  • भुवनेश्वर, पुरी, कोरापुट और नई दिल्ली में कुल 8 “कोरापुट कॉफी कैफ़े”

कॉफी बोर्ड ने TDCCOL को ड्राइंग यार्ड, पल्पर जैसी सुविधाओं के लिए वित्तीय सहायता भी दी है।

भविष्य की दिशा

भारत में कॉफी बाजार 2028 तक 8.9% CAGR की रफ्तार से बढ़ने की उम्मीद है। आउट-ऑफ-होम कॉफी सेगमेंट 15–20% CAGR के साथ 3.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। कॉफी बोर्ड का लक्ष्य है कि वर्ष 2047 तक उत्पादन को 9 लाख टन तक पहुंचाया जाए।

निष्कर्ष

भारत की कॉफी गाथा दृढ़ता, नवाचार और समावेशी विकास की कहानी है। परंपरा और आधुनिक तकनीक के मेल ने भारतीय कॉफी को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी है। GI टैग, स्पेशलिटी कॉफी, आदिवासी समुदायों की भूमिका और तेजी से बढ़ते निर्यात के साथ भारत विश्व कॉफी उद्योग में अपनी मजबूत जगह बना रहा है। आने वाले वर्षों में गुणवत्ता, स्थिरता और मूल्यवर्धन पर ध्यान केंद्रित कर भारत की कॉफी उद्योग नए आयाम छूने को तैयार है।


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