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प्रदेश में मानसून के दस्तक के साथ ही खेती-किसानी में तेजी

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राज्य में 4.77 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लक्ष्य का 10 प्रतिशत बोनी पूर्ण

इस खरीफ सीजन में 48.69 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोनी का है लक्ष्य

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निर्देश: किसानों को उनकी मांग के अनुरूप सुगमता से मिले खाद-बीज

किसानों को 7.28 लाख मीट्रिक टन खाद और 3.09 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित

प्रदेश में अब तक 96.4 मि.मी. औसत वर्षा दर्जः राज्य की औसत वार्षिक वर्षा 1246.3 मिमी

रायपुर- प्रदेश में मानसून के दस्तक के साथ ही खेती किसानी का कार्य तेजी के साथ शुरू हो गया है। राज्य में अब तक 4.77 लाख हेक्टेयर क्षेत्रों में लक्ष्य का 10 प्रतिशत बोनी हो चुकी है। इस खरीफ सीजन में 48.69 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोनी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। 

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने किसानों को खेती-किसानी में सहुलियतें प्रदान करने के लिए सभी आवश्यक सहयोग करने संबंधित अधिकारियों निर्देशित किए गए हैं। उन्होंने किसानों को उनकी मांग के अनुसार सुगमता के साथ प्रमाणित खाद-बीज का वितरण करने को कहा हैं। खाद-बीज वितरण व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही पर कड़ी कार्यवाही करने के भी निर्देश दिए हैं। साथ ही सोसायटियों में पर्याप्त खाद-बीज का भण्डारण कर सतत निगरानी करने को कहा है। कृषि विकास एवं किसान कल्याण मंत्री रामविचार नेताम के मार्गदर्शन में कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा इन पर निरंतर निगरानी रखी जा रही है। 

प्रदेश के किसानों को अब तक 7.28 लाख मीट्रिक टन खाद और 3.09 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज का वितरण किया जा चुका है। कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि प्रदेश में मानसून की बौछारों के साथ शुरू हुए खेती-किसानी में बोनी का रकबा भी निरंतर बढ़ते जा रहा है। राज्य में अब तक 7.28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में विभिन्न फसलों जैसे धान, मक्का, कोदो, कुटकी, अरहर, मूंग, मूंगफली, रामतिल आदि की बोनी हो चुकी है, जो लक्ष्य का 10 प्रतिशत है। इस खरीफ सीजन में राज्य सरकार ने 48.69 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोनी का लक्ष्य रखा है। कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि 02 जुलाई 2026 की स्थिति में प्रदेश में अब तक 96.4 मिमी औसत वर्षा दर्ज की गई है, जबकि प्रदेश की औसत वार्षिक वर्षा 1246.3 मिमी है।  

अधिकारियों ने बताया कि इस वर्ष खरीफ 2026 के लिए बीज निगम द्वारा प्रदेश में 4.95 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरण का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें से 4.30 लाख क्विंटल बीज का भंडारण कर अब तक 3.09 लाख क्विंटल बीज का वितरण किसानों को किया जा चुका है, जो मांग का 62 प्रतिशत है। गत वर्ष इसी अवधि में 2.67 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज का वितरण किया गया था। इसी प्रकार प्रदेश में इस खरीफ सीजन में 15.55 लाख मीट्रिक टन उर्वरक वितरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उक्त लक्ष्य के विरूद्ध 13.16 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों का सहकारी एवं निजी क्षेत्रों में भंडारण किया गया है। उक्त भंडारण के विरूद्ध 7.28 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों का वितरण किसानों को किया जा चुका है, जो लक्ष्य का 47 प्रतिशत है।   

अधिकारियों बताया कि राज्य सरकार किसानों को खेती-किसानी में सहूलियते हो इस उद्देश्य से किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से अल्प कालीन कृषि ऋण उपलब्ध करा रहे है। खरीफ सीजन 2026 के लिए 30 जून की स्थिति में 5525 करोड़ रूपए का ऋण वितरण किया है, जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 4517 करोड़ रूपए का ऋण वितरण किया गया था। इस वर्ष किसानों को 8800 करोड़ रूपए ऋण वितरण का लक्ष्य रखा गया है।

जशपुर की नाशपाती से बढ़ रही किसानों की आमदनी, 3,500 से अधिक कृषक जुड़े फल उत्पादन से

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3500 हेक्टेयर में हो रही नाशपाती की खेती, देश के कई राज्यों में है जशपुर की नाशपाती की मांग

एक एकड़ से किसानों को हो रही 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है। जशपुर जिले के किसान नाशपाती की खेती के माध्यम से उल्लेखनीय आय अर्जित कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। प्राकृतिक रूप से अनुकूल जलवायु और उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन के कारण जशपुर आज राज्य के प्रमुख नाशपाती उत्पादक जिलों में शामिल हो चुका है।

जशपुर जिले में लगभग 3,500 से अधिक किसान करीब 3,500 हेक्टेयर क्षेत्र में नाशपाती की खेती कर रहे हैं। जिले में प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख 75 हजार क्विंटल नाशपाती का उत्पादन हो रहा है। इससे हजारों कृषक परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और जिले की पहचान फल उत्पादन के क्षेत्र में लगातार मजबूत हो रही है।

जशपुर की नाशपाती स्वाद, गुणवत्ता और आकर्षक आकार के कारण देश के विभिन्न राज्यों में विशेष रूप से पसंद की जाती है। जिले के सन्ना, पंडरापाठ, कंवई, महुआ, सोनक्यारी, मनोरा, धवईपाई और गीधा जैसे क्षेत्रों से नाशपाती की खेप दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडिशा सहित अन्य राज्यों में भेजी जाती है। फल को सावधानीपूर्वक कैरेट में पैक कर बाजारों तक पहुंचाया जाता है।

नाशपाती की खेती किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है। एक एकड़ क्षेत्र से किसानों को औसतन 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और किसान आधुनिक उद्यानिकी की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।

उद्यानिकी विभाग तथा नाबार्ड के सहयोग से किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, पौधरोपण, बागवानी प्रबंधन और विपणन संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत नाशपाती क्षेत्र विस्तार योजना संचालित की जा रही है, जिसके माध्यम से किसानों को अनुदान एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल से जशपुर जिले में उद्यानिकी आधारित कृषि को नई दिशा मिली है। नाशपाती की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि जशपुर को राज्य के एक उभरते हुए फल उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित कर रही है।

सफलता की कहानी-धान छोड़ फूलों की खेती ने बदली आनंदराम की तकदीर

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22 हजार के बदले कमाए 3 लाख रुपए

गेंदा उत्पादन से कोड़केल के किसान ने पेश की सफलता की मिसाल

रायपुर- छत्तीसगढ़ में किसान अब पारंपरिक धान की खेती छोड़कर फूलों की खेती अपनाकर अपनी तकदीर बदल रहे हैं। उद्यानिकी विभाग और सरकारी योजनाओं की मदद से गेंदा, गुलाब जैसे फूलों की वैज्ञानिक खेती कर किसान कम लागत में लाखों रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार आया है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन और उद्यानिकी विभाग से मार्गदर्शन मिलने के कारण किसान वैज्ञानिक पद्धति से अधिक उत्पादन ले रहे हैं। एक किसान आनंदराम सिदार की सफलता देखकर अब अन्य ग्रामीण भी परंपरागत खेती से आगे बढ़कर उद्यानिकी फसलों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

परंपरागत खेती के दौर में जहाँ किसान अक्सर कम मुनाफे से परेशान रहते हैं, वहीं रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखण्ड के एक छोटे से गाँव कोड़केल के किसान आनंदराम सिदार ने नवाचार से समृद्धि की नई इबारत लिखी है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन की श्गेंदा क्षेत्र विस्तार योजनाश् का लाभ उठाकर आनंदराम ने अपनी आय में कई गुना वृद्धि की है।

धान बनाम गेंदा- मुनाफे का बड़ा अंतर

आनंदराम सिदार पहले पारंपरिक धान की खेती पर निर्भर थे। वे 10 क्विंटल धान का उत्पादन कर मुश्किल से 31 हजार रुपए की कुल आय प्राप्त कर पाते थे, जिसमें से लागत काटकर उनके हाथ मात्र 22 हजार रुपए का लाभ आता था। लेकिन उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने 0.400 हेक्टेयर क्षेत्र में गेंदा फूल की खेती शुरू की, जिससे उनकी आय का ग्राफ अचानक बदल गया।

तकनीकी सहयोग और बंपर उत्पादन

वर्ष 2025-26 के दौरान उद्यानिकी विभाग ने उन्हें उन्नत बीज, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। आनंदराम की मेहनत और विभागीय सहयोग का नतीजा यह रहा कि उन्होंने कुल उत्पादन लगभग 44 क्विंटल गेंदा फूल बेचकर 

 3 लाख रुपए से अधिक की कुल आमदनी हासिल की। धान की तुलना में बेहतर रिटर्न और कम समय में अधिक आय प्राप्त किया।

क्षेत्र के किसानों के लिए बने रोल मॉडल

आनंदराम सिदार की इस सफलता ने पूरे रायगढ़ जिले में गेंदा जैसी नगदी फसलों के प्रति अन्य किसानों का रुझान बढ़ा दिया है। अब क्षेत्र के कई किसान धान के स्थान पर फूलों की खेती को एक लाभकारी विकल्प के रूप में अपना रहे हैं। आनंदराम सिदार का कहना है कि शुरुआत में जोखिम लग रहा था, लेकिन उद्यानिकी विभाग के तकनीकी सहयोग और सही समय पर की गई देखरेख ने मेरी तकदीर बदल दी। आज मैं आत्मनिर्भर हूँ और अपने परिवार को बेहतर जीवन दे पा रहा हूँ।

विभाग की सक्रिय पहल

रायगढ़ जिले में राष्ट्रीय बागवानी मिशन की गेंदा क्षेत्र विस्तार योजना से जुड़ने के बाद आनंदराम सिदार का जीवन की दिशा ही बदल गई। उद्यानिकी विभाग की सक्रियता से फूलों की खेती अब एक टिकाऊ और मुनाफे वाले व्यवसाय के रूप में उभर रही है। विभाग द्वारा लगातार किसानों को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल रही है।

पारसनाथ बने किसान-मजदूर महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष,किसानो में हर्ष की लहर

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आरंग- राष्ट्रीय किसान नेता और समाजसेवी पारसनाथ साहू को किसान मजदूर महासंघ मध्यप्रदेश की संस्था द्वारा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया है। उन्होंने बताया यह  संस्था किसान मजदूर महासंघ मध्यप्रदेश द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर संचालित  है।जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार  कक्का ने उनकी सक्रियता और कार्य प्रणाली को देखते हुए नियुक्ति पत्र भेजकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनोनीत किये है। ज्ञात हो कि पारसनाथ साहू काफी लंबे समय से मजदूरों और किसानों की समस्याओं, अनाज का उचित लाभकारी समर्थन मूल्य पर खरीदी की कानूनी गारंटी दिलाने, प्रदेश मे धान खरीदी में होने वाली अव्यवस्थाओं और समस्याओं सहित सिंचाई,बिजली,पानी, खाद बीज इत्यादि की उपलब्धता सुनिश्चित कराने लगातार प्रयासरत हैं।

वहीं पारसनाथ को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाये जाने पर क्षेत्र व प्रदेश के किसानों में हर्ष की लहर है। उन्होंने कहा है अब किसानों और मजदूरों की मांग व समस्यायों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से रखते हुए उसके समाधान का प्रयास किया जाएगा। वहीं उनके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने पर अंचल के किसान नेता गोविन्द चन्द्राकर, श्रवण चन्द्राकर, झनकराम आवडे, घनाराम साहू, तेजराम विद्रोही, लक्ष्मी पटेल, दीपक चौहान,लल्लू सिंह,जुगनू चन्द्राकर, दूजेराम धीवर, योगेश, ईश्वरी साहू सहित सामाजिक संगठन पीपला वेलफेयर फाउंडेशन ने हर्ष व्यक्त करते हुए बधाई दिए हैं।

होली से पहले किसानों को बड़ी सौगात, 10 हजार करोड़ का होगा भुगतान

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रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में आज मंत्रालय महानदी भवन में मंत्रिपरिषद की बैठक हुई।

बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए।

छत्तीसगढ़ विधानसभा के षष्ठम् विधानसभा के अष्टम् सत्र (फरवरी-मार्च 2026) के लिए राज्यपाल के अभिभाषण को मंजूरी दी गई।

विधानसभा में प्रस्तुत किए जाने वाले बजट अनुमान 2026-27 के लिए छत्तीसगढ़ विनियोग विधेयक-2026 के प्रारूप को भी स्वीकृति दी गई।

कैबिनेट ने किसानों के हित में बड़ा निर्णय लिया।

समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले किसानों को 3100 रुपये प्रति क्विंटल के मान से अंतर की राशि का भुगतान होली से पहले एकमुश्त किया जाएगा।

खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में 25 लाख 24 हजार 339 किसानों से 141.04 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई।

कृषक उन्नति योजना के तहत लगभग 10 हजार करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा।

सरकार प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से कर रही है। यह देश में सर्वाधिक है।

बीते दो वर्षों में किसानों को 25 हजार करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया जा चुका है।

इस वर्ष के भुगतान के बाद यह राशि बढ़कर 35 हजार करोड़ रुपये हो जाएगी।

धान की खुशहाली से सजी खुशियाँ:-किसान प्रेमचंद लहरे 9.61 लाख की धान बिक्री से करेंगे भतीजी का विवाह

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रायपुर- खरीफ विपणन वर्ष 2025- 26 में जिले में धान खरीदी का कार्य तेजी और पारदर्शिता के साथ जारी है। 15 नवंबर से प्रारंभ हुई धान खरीदी के अंतर्गत सारंगढ़- बिलाईगढ जिले में कुल 89 हजार 181 कृषक पंजीकृत हैं, जिनमें से अब तक 72 हजार 258 किसानों से 3 लाख 71 हजार 291 टन धान की खरीदी समितियों द्वारा की जा चुकी है। इस प्रकार जिले में लगभग 76 प्रतिशत धान खरीदी का लक्ष्य पूर्ण हो चुका है।

विकासखंड सारंगढ़ के धान उपार्जन केंद्र कोसीर में पंजीकृत ग्राम भाठागांव निवासी किसान प्रेमचंद लहरे ने बिना किसी परेशानी के मात्र दो टोकन के माध्यम से 310 क्विंटल धान का विक्रय किया। धान विक्रय के एवज में उन्हें 9 लाख 61 हजार रुपये की राशि का त्वरित भुगतान सीधे उनके बैंक खाते में प्राप्त हुआ।

धान बिक्री से मिली इस राशि ने किसान प्रेमचंद लहरे के परिवार में खुशियों का माहौल बना दिया है। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए बताया कि उनकी भतीजी का विवाह तय हो चुका है और धान बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग वे इसी शुभ अवसर में करेंगे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की किसान हितैषी नीतियों के कारण आज किसानों को समय पर भुगतान मिल रहा है और कार्य सुचारु रूप से हो रहा है।

किसान प्रेमचंद लहरे ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में धान खरीदी व्यवस्था सरल, पारदर्शी और भरोसेमंद बनी है। उल्लेखनीय है कि शासन के निर्देशानुसार जिले में धान खरीदी का कार्य जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में सभी उपार्जन केंद्रों पर किसानों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सफलतापूर्वक संचालित किया जा रहा है। समयबद्ध भुगतान और सुव्यवस्थित व्यवस्था से किसान संतुष्ट हैं और राज्य शासन के प्रति आभार व्यक्त कर रहे हैं।

भारत की कॉफी उद्योग: वैश्विक मंच पर नई पहचान गढ़ती एक सशक्त कहानी

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भारत की कॉफी यात्रा का आरंभ 1600 ईस्वी के आसपास माना जाता है, जब सूफी संत बाबा बूदान यमन के मोचा बंदरगाह से सात कॉफी के बीज लाकर कर्नाटक के चिक्कमंगलूर स्थित बाबा बूदान गिरी पहाड़ियों में रोपित किए थे। घरेलू बागानों से शुरू हुआ यह सफर समय के साथ वाणिज्यिक खेती में बदल गया और आज भारतीय कॉफी अपनी विशिष्ट पहचान के साथ वैश्विक बाजार में अहम स्थान रखती है।

भारत में कॉफी की खेती लगभग 4.91 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पश्चिमी व पूर्वी घाटों तथा पूर्वोत्तर राज्यों में होती है। दो-स्तरीय छायादार कृषि प्रणाली, विविध वनस्पतियों और सतत खेती पद्धतियों के कारण भारतीय कॉफी पर्यावरण के लिए भी लाभकारी मानी जाती है। करीब दो मिलियन लोगों की आजीविका इस क्षेत्र से जुड़ी हुई है, जिनमें से अधिकांश छोटे किसान हैं—जो 99% खेतों और 70% उत्पादन के भागीदार हैं।

भारत का कॉफी परिदृश्य

देश की कुल कॉफी उत्पादन का 96% हिस्सा कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से आता है। कर्नाटक 2,80,275 मीट्रिक टन के साथ सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत के 13 विशिष्ट कॉफी क्षेत्र अपनी अनूठी जलवायु, ऊंचाई और स्वाद के कारण विश्व बाजार में अलग पहचान बनाए हुए हैं।

GI टैग से बढ़ी विश्वसनीयता

भारत के पाँच क्षेत्रीय और दो विशेष कॉफी प्रकारों को भौगोलिक संकेतक (GI) मान्यता प्राप्त है—

  • कूर्ग अरेबिका, वायनाड रोबस्टा, चिकमगलूर अरेबिका, अराकू वैली अरेबिका, बाबा बूदानगिरी अरेबिका

  • विशेष श्रेणी: मॉन्सून्ड मालाबार रोबस्टा

स्पेशलिटी कॉफी—जैसे मॉन्सून्ड मालाबार AA, मैसूर नगेट्स, रोबस्टा कापी रॉयल—बड़ी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लोकप्रिय हो रही हैं।

कॉफी बोर्ड की भूमिका

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय आई संकट की स्थिति से निपटने के लिए 1942 में “कॉफी एक्ट” के तहत कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना हुई। यह बोर्ड अनुसंधान, गुणवत्ता सुधार, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, निर्यात और किसानों को तकनीकी–वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने का काम करता है।

भारत के कॉफी निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि

भारत दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा कॉफी निर्यातक देश है।

  • FY 2024–25 में निर्यात 1.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा।

  • प्रमुख निर्यात बाजार: इटली, जर्मनी, बेल्जियम, रूस, यूएई।

  • भारत इंस्टेंट कॉफी का वैश्विक केंद्र बनता जा रहा है, जिसकी हिस्सेदारी कुल निर्यात में 38% है।

सरकारी नीतियों से मिली रफ्तार

  • GST में कमी: इंस्टेंट कॉफी पर टैक्स 18% से घटाकर 5% किया गया, जिससे बाजार में 11–12% तक कीमत कम होने और खपत बढ़ने की उम्मीद है।

  • भारत–UK CETA: भारतीय रोस्टेड व इंस्टेंट कॉफी को ब्रिटेन में अब ड्यूटी-फ्री प्रवेश मिलेगा।

  • भारत–EFTA TEPA: स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और आइसलैंड द्वारा भारतीय कॉफी पर 0% शुल्क—प्रीमियम बाजारों में बड़ी अवसर वृद्धि।

फाइन कप अवॉर्ड्स में ओडिशा की चमक

कॉफी बोर्ड द्वारा आयोजित “फ्लेवर ऑफ इंडिया – फाइन कप” प्रतियोगिता में 2024 में कोरापुट कॉफी ने दो पुरस्कार जीते—धोई हुई (washed) और नैचुरल दोनों श्रेणियों में। इससे ओडिशा की ऊंचाई वाली आदिवासी कॉफी को राष्ट्रीय पहचान मिली।

TDCCOL का आदिवासी किसानों के लिए योगदान

ओडिशा की प्रमुख सहकारी संस्था TDCCOL ने 2019 से कोरापुट में घर-घर जाकर कॉफी खरीदना शुरू किया।
मुख्य उपलब्धियां—

  • किसानों को ICTA आधारित उचित मूल्य

  • सीधे बैंक खातों में भुगतान

  • मूल्य संवर्धन के साथ "Koraput Coffee" ब्रांड का शुभारंभ

  • भुवनेश्वर, पुरी, कोरापुट और नई दिल्ली में कुल 8 “कोरापुट कॉफी कैफ़े”

कॉफी बोर्ड ने TDCCOL को ड्राइंग यार्ड, पल्पर जैसी सुविधाओं के लिए वित्तीय सहायता भी दी है।

भविष्य की दिशा

भारत में कॉफी बाजार 2028 तक 8.9% CAGR की रफ्तार से बढ़ने की उम्मीद है। आउट-ऑफ-होम कॉफी सेगमेंट 15–20% CAGR के साथ 3.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। कॉफी बोर्ड का लक्ष्य है कि वर्ष 2047 तक उत्पादन को 9 लाख टन तक पहुंचाया जाए।

निष्कर्ष

भारत की कॉफी गाथा दृढ़ता, नवाचार और समावेशी विकास की कहानी है। परंपरा और आधुनिक तकनीक के मेल ने भारतीय कॉफी को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी है। GI टैग, स्पेशलिटी कॉफी, आदिवासी समुदायों की भूमिका और तेजी से बढ़ते निर्यात के साथ भारत विश्व कॉफी उद्योग में अपनी मजबूत जगह बना रहा है। आने वाले वर्षों में गुणवत्ता, स्थिरता और मूल्यवर्धन पर ध्यान केंद्रित कर भारत की कॉफी उद्योग नए आयाम छूने को तैयार है।


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