Media24Media.com: आज SCO समिट, ट्रंप की टैरिफ नीति को चुनौती देगा यह मंच

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आज SCO समिट, ट्रंप की टैरिफ नीति को चुनौती देगा यह मंच

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 तियानजिन (चीन)। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का 25वां सम्मेलन आज चीन के तियानजिन में शुरू हो रहा है। यह सम्मेलन सिर्फ इसलिए अहम नहीं है कि यह 25वीं बैठक है, बल्कि इसलिए भी कि यह मंच अमेरिका की एकाधिकारवादी नीतियों और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ हथकंडों को चुनौती देने की रणनीति तैयार कर सकता है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान दौरे के बाद शनिवार को चीन पहुंचे हैं। सम्मेलन में उनके साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी अहम भूमिका निभाएंगे। इस बैठक में भारत, रूस और चीन समेत 20 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं।

अमेरिका को चुनौती देगा SCO

अमेरिका अब तक डॉलर और SWIFT जैसे वित्तीय तंत्र के जरिए पूरी दुनिया पर दबाव बनाता रहा है। मनचाहे टैरिफ और प्रतिबंध उसकी विदेश नीति के अहम औजार रहे हैं। हालांकि, अब भारत-चीन-रूस जैसे बड़े देशों का गठजोड़ इस दबाव को कमजोर कर सकता है। जनसंख्या, संसाधन, बाजार और आर्थिक क्षमता के मामले में SCO दुनिया में एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र के रूप में उभर रहा है।

ट्रंप की टैरिफ रणनीति पर पानी फेर सकते हैं तीनों देश

भले ही SCO सम्मेलन का मुख्य एजेंडा आतंकवाद, चरमपंथ और अलगाववाद के खिलाफ लड़ाई है, लेकिन आर्थिक सहयोग भी अहम मुद्दा रहेगा। कयास हैं कि भारत, चीन और रूस मिलकर ट्रंप की एकाधिकारवादी नीतियों के खिलाफ ठोस कदम उठा सकते हैं।

सर्कुलर ट्रेड की संभावना

विशेषज्ञों का मानना है कि तीनों देशों के पास एक-दूसरे की ताकत का इस्तेमाल कर वैकल्पिक व्यापार व्यवस्था खड़ी करने की क्षमता है।

  • रूस: तेल, गैस और खनिज
  • चीन: विनिर्माण तकनीक और ढांचा
  • भारत: बड़ा उपभोक्ता बाजार और IT सेवाएं

इस तरह का सर्कुलर ट्रेड अमेरिकी टैरिफ को अप्रभावी बना सकता है और एक नई, कम लागत वाली अर्थव्यवस्था खड़ी कर सकता है।

डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर जोर

डॉलर पर निर्भरता खत्म करने के लिए SCO देश डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर भी काम कर रहे हैं।

  • चीन ने CIPS (क्रॉस बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम)
  • रूस ने SPFS (फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन सिस्टम)
  • भारत जल्द ही UPI का ग्लोबल मॉडल लॉन्च करने जा रहा है।

अगर ये सभी आपस में जुड़ते हैं, तो SCO देशों को अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए अमेरिकी मुद्रा की आवश्यकता नहीं रहेगी।

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