नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का मंगलवार दोपहर दिल्ली के राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में निधन हो गया। वे 77 वर्ष के थे और पिछले कई महीनों से बीमार चल रहे थे। दोपहर करीब 1:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। बताया गया कि वे लंबे समय से आईसीयू में भर्ती थे और चिकित्सकीय निगरानी में थे।
मलिक अपने बेबाक बयानों और सरकार की आलोचना के लिए अक्सर सुर्खियों में रहते थे। बीते चार महीनों से उनका स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था, हालांकि बीच-बीच में उनके स्वास्थ्य में सुधार की खबरें भी आईं थीं।
जम्मू-कश्मीर में ऐतिहासिक फैसले के समय थे राज्यपाल
सत्यपाल मलिक ने अगस्त 2018 से अक्टूबर 2019 तक जम्मू-कश्मीर के अंतिम राज्यपाल के रूप में कार्य किया। उनके कार्यकाल के दौरान ही 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निरस्त कर राज्य का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया था। संयोगवश, आज ही इस ऐतिहासिक फैसले की छठी वर्षगांठ है।
इसके बाद उन्हें गोवा का राज्यपाल नियुक्त किया गया और फिर अक्टूबर 2022 तक उन्होंने मेघालय के राज्यपाल के रूप में सेवाएं दीं।
राजनीतिक करियर की शुरुआत समाजवादी विचारधारा से
सत्यपाल मलिक का राजनीतिक जीवन 1970 के दशक में एक समाजवादी नेता के रूप में शुरू हुआ। वे 1974 में बागपत से भारतीय क्रांति दल के टिकट पर उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए। बाद में वे लोकदल के महासचिव बने और 1980 से 1989 तक उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद रहे।
राजनीतिक जीवन के दौरान वे कई दलों से जुड़े, जिनमें भारतीय क्रांति दल, कांग्रेस, जनता दल (वी.पी. सिंह के नेतृत्व में) और अंततः 2004 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शामिल रही।
सार्वजनिक जीवन में यादगार योगदान
मलिक को एक निष्पक्ष, स्पष्टवादी और जनहितैषी राजनेता के रूप में जाना जाता रहा। खासकर जम्मू-कश्मीर में उनके कार्यकाल को एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा।