Justice Varma case: सुप्रीम कोर्ट 28 जुलाई को न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा द्वारा दायर उस रिट याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ गठित तीन सदस्यीय न्यायिक जांच समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी है। यह मामला उस बहुचर्चित "नकदी बरामदगी कांड" से जुड़ा है, जिसने न्यायपालिका की साख को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि जांच समिति ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया और उन्हें न तो अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिला, न ही गवाहों से जिरह करने की अनुमति दी गई। वर्मा का कहना है कि समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों में "कल्पना को सबूत मानते हुए" फैसला दिया और दोषमुक्त होने का भार उनके ही कंधों पर डाल दिया गया।
क्या है मामला?
जांच की शुरुआत उनके सरकारी आवास में लगी आग और उसके बाद बरामद भारी मात्रा में नकदी के चलते हुई थी। इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने तीन न्यायाधीशों की एक आंतरिक समिति गठित की थी, जिसकी रिपोर्ट में "पुख्ता साक्ष्य" मिलने का दावा किया गया।
महाभियोग की प्रक्रिया शुरू
विवाद गहराते ही न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया गया, जिस पर 152 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। यह प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को सौंपा गया है। कांग्रेस, टीडीपी, जेडीयू, जेडीएस और सीपीएम सहित कई विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है।
राज्यसभा में भी यह मामला उठा है। सूत्रों के अनुसार, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को वर्मा को पद से हटाने की मांग वाला एक अलग प्रस्ताव मिला था, जिस पर उनके इस्तीफे से कुछ घंटे पहले ही 50 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे।
SC में कानूनी लड़ाई
अब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर है, जहां न्यायमूर्ति वर्मा ने रिपोर्ट को खारिज करने और स्वयं को दोषमुक्त सिद्ध करने का अवसर मांगा है। इस याचिका पर 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा, जो कि न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक अहम पड़ाव माना जा रहा है।