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नर्मदा जयंती आज, जानिए पूजा विधि और महत्व

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नर्मदा जयंती 19 फरवरी यानी आज मनाई जा रही है। नर्मदा जयंती पवित्र नदी मां नर्मदा को समर्पित है। मां नर्मदा का सर्वाधिक विस्तार मध्य प्रदेश में है। अतः नर्मदा जयंती पूरे मध्य प्रदेश में, बहुत श्रद्धा-भाव के साथ मनाई जाती है।









मान्यताओं के मुताबिक नर्मदा महापाप नाशनी अयोनिजा शिव अंग से प्रकट हुई है। स्कन्द पुराणके रेवा खंड  और अन्य ग्रंथों में नर्मदा का विपुल महत्व उल्लेख है। नर्मदा रहस्य का ज्ञान महेश्वर शिव से वायु देव को एवम वायुदेव से मार्कंडेय ऋषि को ज्ञात हुआ। न  -  मृता यानी नर्मदा। अनेक नाम और रेवा,सुरसा, शोण, मंदाकिनी,त्रिकुटा बालू वाहनी,चित्र कूटा। तमसा,रंजना, दशार्णा। विश्व में केवल नर्मदा नदी ही ऐसी है, जिसकी प्रदक्षिणा करने का पुण्य और विधान उल्लेखित है।









  • नर्मदा उद्भव/ अवतार से शिवलिंग पूजा प्रमुख।
  • द्वापर का महापंडित शिव भक्त रावण ने भी सनानुप्रंट शिव पूजन नर्मदा तट पर किया ।
  • राजर्षी हिरणतेजा नर्मदा को पृथ्वी लोक मे लाए।
  • नर्मदा जी की परिक्रमा विधान प्रारंभ पूजन और कढाई चढ़ाने के बाद प्रारंभ का है। 3 साल 3 माह और तेरह दिनों में पूर्ण होती है। मां नर्मदा की परिक्रमा अश्वतस्थामा करते हैं। तेरह सौ बारह किलोमीटर परिक्रमा मार्ग हैं।
  • सत्यनारायण कथा में भी रेवा खंड,नर्मदा जी का नाम है।
  • नर्मदा में 60 करोड़, 60हजार तीर्थ है। समस्त तीर्थ साल में एक बार नर्मदा के दर्शनार्थ स्वयं आते हैं। स्वयं देवी गंगा भी मिलने आती है।




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  • पश्चिम दिशा प्रवाही विश्व की एकमात्र देवी नर्मदा।
  • नर्मदा देवी के सनिंध्य वाले पितृ लोक के अधिकारी।
  • गौरीखंड क्षेत्र में तिल जल दान से पितरों को अक्षय तृप्ति मिलती है।
  • यह नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक क्षेत्र से प्रवाहित होकर सागर में समाहित हो जाती है।
  • नर्मदा के जन्म की का कथानक है
  • भगवान शिव त्रिकूट पर्वत( अमरकंटक )क्षेत्र में  अंधकासुर राक्षस के नाश के लिए समाधि स्थित थे।
  • उस समय ही देवता ब्रह्मा एवं विष्णु को के नेतृत्व में उनके पास पहुंचे और उन्होंने अपने पापों के निवारण के लिए शिवजी से उपाय पूछा ।
  • शिवजी ने अपने नेत्र खोल कर ,अपनी भृकुटी से देखा ।उसी समय एक प्रकाशमान अलौकिक बिंदु पृथ्वी पर अवतरित हुआ और वह बिंदु एक कन्या के रूप में परिवर्तित हो गया। इस कन्या का नाम नर्मदा रखा गया । एक अन्य विवरण में  उमा रुद्र के स्वेद से मोहनी कन्या उद्भूत हुई। ब्राह्मकल्पक में महेश्वर से प्रकट हुई।




इस कन्या को उपस्थित देवताओं से अनेक आशीर्वाद ,और अनेक वरदान प्राप्त हुए।  नर्मदा कन्या  ने पूछा कि - हे प्रभु में सांसारिक जीवो के पाप को कैसे नष्ट करूंगी?
भगवान विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद दिया -तुम सभी के पापों को नष्ट करने वाली सिद्ध होगी तुम्हारे जल के पाषाण शिव के समान पूज्य होंगे ।






नर्मदे तवेम महाभागा सर्व पाप हरी भव






नर्मदा जी ने  शिव जी से वरदान मांगा कि-  जिस प्रकार गंगा देवी स्वर्ग से अवतरित होकर उत्तर क्षेत्र प्रसिद्ध हुई उस प्रकार दक्षिण क्षेत्र में मेरी भी प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि हो शिव जी ने उन्हें अजर अमर रहने का वरदान एवं कहा उमा सहित समस्त पितृ गण ,देवताओं सहित तुम्हारे निकट निवास  करने का वचन  दिया ।










इस संदर्भ में एक प्रकरण और भी है कि मार्कंडेय ऋषि जो अमर तुल्य हैं।  जब भयंकर अकाल पड़ा तब ऋषियों की प्रार्थना पर उन्हें उपाय बताया कि - दक्षिण गंगा तट पर जाकर निवास
करिए ।नर्मदा देवी आपके सभी प्राणों की रक्षा करेंगे करेंगी।






कलियुग में नर्मदा जल ,गंगा जल के समान पावन होगा जो दूषित नहीं होगा।
लेखक ने स्वयं नर्मदा जल रखा जो विगत 19 वर्ष मे भी दूषित अब तक नहीं हुआ है।
माघे च सप्तमयाम दास्त्रामे  च रवि दिन।
मध्याह्न समये राम भास्करेंण कृमागते।।
माघ महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मकर राशि पर सूर्य जाप अवश्य थे उस समय मध्यकाल में नर्मदा जी को जल स्वरूप में बहने का आदेश मिला था। रविवार को नर्मदा जल श्वेतकुष्ठ मोचक होता है। नर्मदा में ही बाण लिंग शिव और नर्मदेश्वर (शिव ) प्राप्त होते है।इनकी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है।





श्री नर्मदाष्टकम





सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम
द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम
कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 1





त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम
कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं
सुमस्त्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक् शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 2





महागभीर नीर पुर पापधुत भूतलं
ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम
जगल्ल्ये महाभये मृकुंडूसूनु हर्म्यदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 3





गतं तदैव में भयं त्वदम्बु वीक्षितम यदा
मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा
पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 4





अलक्षलक्ष किन्न रामरासुरादी पूजितं
सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षीलक्ष कुजितम
वशिष्ठशिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 5





सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै
धृतम स्वकीय मानषेशु नारदादि षटपदै:
रविन्दु रन्ति देवदेव राजकर्म शर्मदे





त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 6





अलक्षलक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं
ततस्तु जीवजंतु तंतु भुक्तिमुक्ति दायकं
विरन्ची विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 7





अहोमृतम श्रुवन श्रुतम महेषकेश जातटे
किरात सूत वाड़वेषु पण्डिते शठे नटे
दुरंत पाप ताप हारि सर्वजंतु शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 8





इदन्तु नर्मदाष्टकम त्रिकलामेव ये सदा
पठन्ति ते निरंतरम न यान्ति दुर्गतिम कदा
सुलभ्य देव दुर्लभं महेशधाम गौरवम
पुनर्भवा नरा न वै त्रिलोकयंती रौरवम 9





त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
नमामि देवी नर्मदे, नमामि देवी नर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
 





नर्मदा जी की आरती






ॐ जय जगदानंदी, मैया जय आनंद्करनी
ब्रह्मा हरिहर शंकर रेवा शिव हरी शंकर रुद्री पालान्ती,
ॐ जय जगादानंदी १
देवी नारद शारद तुम वरदायक, अभिनव पदचंडी,
सुरनर मुनि जन सेवत, सुरनर मुनि जन ध्यावत, शारद पदवंती,
ॐ जय जगदानंदी
देवी धुम्रक वाहन राजत वीणा वादयती,
झुमकत झुमकत झुमकत, झननन झननन झननन, रमती राजन्ती,
ॐ जय जगदानंदी २
देवी बाजत ताल मृदंगा, सुरमंडल रमती





तोड़ीतान तोड़ीतान तोड़ीतान तुररड तुररड तुररड, रमती सुरवंती,
ॐ जय जगदानंदी 3
देवी सकल भुवन पर आप विराजत निशदिन आनंदी,
गावत गंगाशंकर सेवत रेवाशंकर तुम भाव मेटन्ती,
ॐ जय जगदानंदी 4
मैयाजी को कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती,
अमरकंठ में विराजत, घाटन घाट विराजत कोटि रतन ज्योति,
ॐ जय जगदानंदी 5
माँ रेवा की आरती जो कोई जन गावै मैया जो सुन्दर गावै
भजत शिवानन्द स्वामी जपत हरिहर स्वामी , मनवांछित फल पावै,
ॐ जय जगदानंदी 6





श्रीमद आदि शंकराचार्य रचित नर्मदाष्टक पद्यात्मक अनुदित-





उठती-गिरती उदधि-लहर की, जलबूंदों सी मोहक-रंजक
निर्मल सलिल प्रवाहितकर, अरि-पापकर्म की नाशक-भंजक
अरि के कालरूप यमदूतों, को वरदायक मातु वर्मदा।
चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा॥ 1॥ 
दीन-हीन थे, मीन दिव्य हैं, लीन तुम्हारे जल में होकर।
सकल तीर्थ-नायक हैं तव तट, पाप-ताप कलियुग का धोकर।
कच्छप, मक्र, चक्र, चक्री को, सुखदायक हे मातु शर्मदा।
चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा॥ 2॥ 
अरिपातक को ललकार रहा, थिर-गंभीर प्रवाह नीर का।
आपद पर्वत चूर कर रहा, अन्तक भू पर पाप-पीर का।
महाप्रलय के भय से निर्भय, मारकंडे मुनि हुए हर्म्यदा।
चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा॥ 3॥ 





मार्कंडे-शौनक ऋषि-मुनिगण, निशिचर-अरि, देवों से सेवित।





विमल सलिल-दर्शन से भागे, भय-डर सारे देवि सुपूजित।
बारम्बार जन्म के दु:ख से, रक्षा करतीं मातु वर्मदा।
चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा॥ 4॥ 





दृश्य-अदृश्य अनगिनत किन्नर, नर-सुर तुमको पूज रहे हैं।
नीर-तीर जो बसे धीर धर, पक्षी अगणित कूज रहे हैं।
ऋषि वशिष्ठ, पिप्पल, कर्दम को, सुखदायक हे मातु शर्मदा।
चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा॥ 5॥ 





सनत्कुमार अत्रि नचिकेता, कश्यप आदि संत बन मधुकर।
चरणकमल ध्याते तव निशि-दिन, मनस मंदिर में धारणकर।
शशि-रवि, रन्तिदेव इन्द्रादिक, पाते कर्म-निदेश सर्वदा।
चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा॥ 6॥ 





दृष्ट-अदृष्ट लाख पापों के, लक्ष्य-भेद का अचूक आयुध।
तटवासी चर-अचर देखकर, भुक्ति-मुक्ति पाते खो सुध-बुध।
ब्रम्हा-विष्णु-सदा शिव को, निज धाम प्रदायक मातु वर्मदा।
चरणकमल में नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा॥ 7॥ 





महेश-केश से निर्गत निर्मल, सलिल करे यश-गान तुम्हारा।
सूत-किरात, विप्र, शठ-नट को,भेद-भाव बिन तुमने तारा।
पाप-ताप सब दुरंत हरकर, सकल जंतु भाव-पार शर्मदा।
चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा॥ 8॥ 





श्रद्धासहित निरंतर पढ़ते, तीन समय जो नर्मद-अष्टक।
कभी न होती दुर्गति उनकी, होती सुलभ देह दुर्लभ तक।
रौरव नर्क-पुनः जीवन से, बच-पाते शिव-धाम सर्वदा।
चरणकमल मरण नमन तुम्हारे, स्वीकारो हे देवि नर्मदा॥ 9॥ 





स्नान के समय के मंत्र-सर्व पापनाशक सुखदायी दिन





गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलऽस्मिन्सन्निधिं कुरु।।





तीर्थ स्थल स्नान मन्त्र-





कुरुक्षेत्र -गया -गङ्गा -प्रभास -पुष्कराणि च । 
एतानि पुण्य तीर्थानि स्नान काले भवन्त्विह ॥ 2॥ 
त्वं राजा सर्व तीर्थानां त्वमेव जगतः पिता । 
याचितं देहि मे तीर्थं तीर्थराज! नमोऽस्तु ते ॥ 3॥
पुष्कराद्यानि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा । 
आगच्छन्तु पवित्राणि स्नान काले सदा मम ॥ 4॥ 
विष्णु -पादाव्ज-सम्भूते गङ्गे त्रिपथ गामिनि । 
धर्म द्रवेति विख्याते पापं मे हर जाह्नवि! ॥ 5॥ 
गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णलोकं स गच्छति ॥ 6॥ 





नारद पुराण नदी स्तोत्रं स्नान समय





नदी स्तोत्रं प्रवक्ष्यामि सर्व पाप प्रणाशनम् ।
भागीरथी वारणासी यमुना च सरस्वती ॥ 1॥ 
फल्गुनी शोणभद्रा च नर्मदा गण्डकी तथा । 
मणिकर्णिका गोमती प्रयागी च पुनः पुनी ॥ 2॥ 
गोदावरी सिन्धुनदी सरयू र्वर्णिनी तथा । 
कृष्ण वेणी भीमरथी खागिनी भव नाशिनी ॥ 3॥ 
तुङ्गभद्रा मलहरी वरदा च कुमुद्वती । 
कावेरी कपिला कुन्ती हेमावती हरिद्वती ॥ 4॥ 
नेत्रावती वेदवती सुद्योती कनकावती । 
ताम्रपर्णी भरद्वाजा श्वेता रामेश्वरी कुशा ॥ 5॥ 
मन्दरी तपती काली कालिन्दी जाह्नवी तथा । 
कौमोदकी कुरुक्षेत्रा गोविन्दा द्वारकी भवेत् ॥ 6॥ 
ब्राह्मी माहेश्वरी मात्रा इन्द्राणी अत्रिणी तथा । 
नलिनी नन्दिनी सीता मालती च मलापहा ॥ 7॥ 
सम्भूता वैष्णवी वेणी त्रिपथा भोगवती तथा । 





कमण्डलु धनुष्कोटी तपिनी गौतमी तथा ॥ 8॥ 
नारदी च नदी पूर्णा सर्वनद्यः प्रकीर्तिताः । 
प्रातःकाले पठेन्नित्यं स्नानकाले विशेषतः ॥ 9॥ 
कोटि जन्मार्जितं पापं स्मरणेन विनश्यति ।
इहलोके सुखी भूत्वा विष्णु लोकं सगच्छति ॥ 10॥
इति नारदीयपुराणे नदीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
जल पृथ्वी पर या नदी जल में छोड़े।





नर्मदा जयंती का महत्व





नर्मदा जयंती के धार्मिक महत्व की बात करें तो, नर्मदा नदी के पृथ्वी पर अवतरण दिवस को ही नर्मदा जयंती के रुप में मनाया जाता है। हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, इसी दिन मां नर्मदा नदी का अवतरण भगवान शंकर से हुआ था। इसी कारण इस दिन का महत्व बढ़ जाता है।


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